हम सभी से उम्र भर डरते रहे हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
हम सभी से , उम्र भर डरते रहे हैं
कब जिए हम रोज़ बस मरते रहे हैं ।
दुश्मनी को दोस्ती का नाम दे कर
दोस्ती की , इल्तिजा करते रहे हैं ।
खा के ठोकर भी नहीं संभले कभी हम
फिर फ़िसल कर के , वहीं गिरते रहे हैं ।
था सुना , कुछ लोग होते थे जहां में
जो पराये दर्द को , हरते रहे हैं ।
क्या किया सरकार ने कैसे बताएं
खेत माली सब यहां चरते रहे हैं ।
कौन सच की बात करता है यहां पर
झूठ से गागर सभी भरते रहे हैं ।
नाख़ुदा बन कश्तियां ' तनहा ' डुबोते
आसरा तिनके का , ले तरते रहे हैं ।

1 टिप्पणी:
Wahhh बहुत बढ़िया अशआर सर👌👍
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