गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं
गर्मियों की फिर छुट्टियां ढूंढते हैं ।
जा के वापस कच्ची गली में वहां पर
अपने पांवों के कुछ निशां ढूंढते हैं ।
ख़्वाब जितने देखे रहे सब अधूरे
उम्र भर हम फिरते गुमां ढूंढते हैं ।
सुन के खबरें सबकी हुई नींद गायब
निगहबानी को , पासबां ढूंढते हैं ।
सबक नफरत का भूलने के लिए अब
प्यार वाली , इक दास्तां ढूंढते हैं ।
पा के ऊंचे पद लोग थे झुक के रहते
हम उन्हीं जैसे , रहनुमां ढूंढते हैं ।
मतलबी दुनिया बेरहम लोग कितने
हम कहां ' तनहा ' मेहरबां ढूंढते हैं ।

1 टिप्पणी:
बहुत सुन्दर।
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।
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