मार्च 07, 2021

POST : 1475 गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

गांव का अपना सब मकां ढूंढते हैं 
गर्मियों की फिर छुट्टियां ढूंढते हैं । 
 
जा के वापस कच्ची गली में वहां पर  
अपने पांवों के  कुछ निशां ढूंढते हैं । 
 
ख़्वाब जितने देखे रहे सब अधूरे 
उम्र भर हम फिरते गुमां ढूंढते हैं । 
 
सुन के खबरें सबकी हुई नींद गायब  
निगहबानी को  , पासबां ढूंढते हैं । 
 
सबक नफरत का भूलने के लिए अब  
प्यार वाली  , इक  दास्तां ढूंढते हैं । 
 
पा के ऊंचे पद लोग थे झुक के रहते 
हम उन्हीं जैसे , रहनुमां ढूंढते हैं । 
 
मतलबी  दुनिया बेरहम लोग कितने   
हम कहां  ' तनहा '  मेहरबां ढूंढते हैं ।
 

 
 

1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' ने कहा…

बहुत सुन्दर।
अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ।