मार्च 31, 2021

POST : 1478 इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

      इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है ( ग़ज़ल ) 

                            डॉ लोक सेतिया   ' तनहा '

इक मुसाफ़िर को अभी तक कारवां की तलाश है 
ख़्वाब में देखा था जिसको , उस जहां की तलाश है । 
 
अजनबी लगने लगे जब , दोस्त दुश्मन यहां सभी  
इस जहां में अब सभी को  , मेहरबां की तलाश है । 
 
बोल खुद पाते नहीं , कहनी उन्हें एक दास्तां 
बेज़ुबानों को यहां पर , हमज़ुबां की तलाश है । 
 
कुछ मुसाफ़िर थे जिन्हें खुद मंज़िलें ढूंढती रहीं 
है अजब तक़दीर अपनी इक मकां की तलाश है । 
 
मौसमों से मिट गए हैं , काफ़िलों के निशान तक 
हर किसी को आज कल इक कारवां की तलाश है । 
 
पूछती शायद , सड़क की लाश , सब से सवाल है 
क़त्ल खुद करके तुम्हें अब किस निशां की तलाश है । 
 
गुफ़्तगू आवाम से करनी है  ' तनहा ' निज़ाम ने 
दाद दे  हर बात पर , उस बेज़ुबां की तलाश है । 






 
 
 
 
 

2 टिप्‍पणियां:

Sanjaytanha ने कहा…

बहुत खूब

Sanjaytanha ने कहा…

बढ़िया शेर