Sunday, 7 February 2021

मौका मिला है राज चलाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      मौका मिला है राज चलाओ ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

ये समझो और समझाओ मौका मिल जाये तो मत शर्माओ जो चाहो करते जाओ अपनी भूख प्यास मिटाओ पाछे नहीं पछताओ। युग बदलता है पिता की विरासत बच्चों को मिलती है पूरी होती है बाप की दौलत से क्या क्या हसरत दिल में पलती रही अधूरी होती है। बहू जब भी सास बनती है छलनी बदलती है चाल चलती है बहू क्या नहीं पैतरें बदलती है बस ये चलन है सुबह होती है शाम ढलती है। जब से हमने सरकार बनाई है अपना मख़्खन दूध मलाई है छाछ सभी को बंटवाई है। लोग पुराने थे पुरानी सोच रखते थे नींद में भी जो होश रखते थे हम तो चैन की नींद सोते हैं खुल कर जीते हैं मौज मनाते हैं हम कभी नहीं रोते रुलाते हैं और रुलाकर हंसते है उनकी किस्मत में रोना है रोते हैं। कितने मूर्ख होते थे दौलत को संभालते बढ़ाते थे खुद सादा जीवन बिताते थे खर्च कम करते अधिक बचाते थे। हमने बदले दस्तूर पुराने हैं अपने याराने याराने हैं सब खज़ाने हमको लुटाने हैं दोस्त दुनिया भर से खरीद लाने हैं सबको इस राज़ का पता भी है सबसे आसान ये रास्ता भी है। साथ कोई कुछ नहीं लाया है और कुछ साथ लेकर नहीं जाना है किसलिए बचाना है खाना ख़ज़ाना खाकर जाना है। बाद वालों को सबक सिखाना है अपने दम पर जहां बनाना है हम नहीं कायल उनके जो ढंड से खुद मर जाते हैं और रज़ाई अपनी बच्चों के नाम छोड़ जाते हैं। उनको जीने का हुनर नहीं मालूम था जीना क्या होता है चलो आज हम बताते हैं। अपनी कथा कहानी खुद लिखते हैं खुद सुनते हैं सुनाते हैं हम मियांमिठ्ठू बनकर अपने को सबसे अच्छा बताते हैं। झूठ नहीं है सच वही है जो हम मानते ही नहीं मनवाते हैं। 
 

   ( कथा काल्पनिक है पहले बताते हैं। चलो खुद से खुद भी मिलते हैं आपको मिलवाते हैं। )

अध्याय पहला। कभी किसी की मत सुनो अपने सपने खुद चुनो बुनकर ख़्वाब अपनी धुन पर नाचो झूमों गाओ लोग क्या कहते हैं घर परिवार सबको छोड़ो इक दोहा याद आया है सुनते जाओ। अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम , दास मलूका कह गए सबका दाता राम। काम करना ज़रूरी नहीं है आराम करना ज़रूरी है आराम बड़ी चीज़ है। आपको धंधा करना है तो सोच समझ कर चयन करना उचित है। भीख मांगना खराब नहीं है भिखारी से बढ़कर कोई नवाब नहीं है। भीख सभी लोग चाहते हैं वेतन काम का जितना भी हो रिश्वत बिना गुज़ारा नहीं होता है पैसे बगैर कोई हमारा सहारा नहीं होता है। कभी बख़्शीश कहा जाता था काम के बाद अधिकारी क्लर्क बिना मांगे पाकर सर झुकाता है मगर रिश्वत का अपना आधार है ये नहीं सिर्फ उपहार है ये लेन देन का खुला बाज़ार है आपको हाज़िर जो भी दरकार है इक यही बिन छपा इश्तिहार है। पैसे वालों की रही हमेशा अपनी सरकार है। भीख मांगने में शर्म की बात नहीं बस इसी झगड़े पर सुहागरात बन पाई सुहागरात नहीं। दोनों मिलकर भीख मांगेंगे उनको बात सच्ची भाई नहीं बस मानते हम नहीं अपनी लुगाई नहीं सब कुछ पाना है हमने कोई हरजाई नहीं। बात उसने भी आगे बढ़ाई नहीं। हमारी हजामत करे मिला नाई नहीं दाढ़ी बढ़ती गई बढ़ाई नहीं सच समझते मेरे भाई नहीं। 
 
अध्याय दूसरा। भीख मांगने वाले साधु महात्मा संत बनकर विकास की डगर चलते रहते हैं। भीख देने वाले वहीं रह गए भिखारी हलवा पूरी खाकर संतोष की व्याख्या समझाते रहे दान देने से दौलत बढ़ती है इसका मतलब दिखाते रहे भीख वाले दौलत जमाते रहे। धर्म का काम महनत की कमाई से किया जाता नहीं चोर डाकू धर्म करते हैं पूजा पाठ दान सभी कुछ भगवान के पास सब भक्त समान हैं एक नंबर दो नंबर का कोई खाता नहीं जो सर झुकाता नहीं कुछ बिन मांगे पाता नहीं। ये हिसाब सबको समझ आता नहीं।  
 
अध्याय तीसरा। स्वर्ग नर्क की दास्तां हैं अपने लिए सब कुछ यही जहां है ज़िंदगी मौत के दरमियां कौन जाने क्या इम्तिहां है। जान है तो जहान है अपनी शान अपनी पहचान है घर किसी और का है दुनिया में हर कोई चार दिन का महमान है। गरीबी अभिशाप है अमीरी वरदान है ये राजनीति जो नहीं समझता है नासमझ बड़ा नादान है। हमने तीन रास्ते बनाये हैं फ़रिश्ते ढूंढ कर हम लाये हैं जाल ऐसे बिछाए हैं लोग नाहक घबराये हैं। मौत का क्या भरोसा है ज़िंदगी ने यही परोसा है जन्नत मिलती है मरने के बाद मौत से डरकर जी नहीं सकते। ज़हर पीते हैं झूठा शहद लगता है अमृत सच का पी नहीं सकते। स्वर्ग नर्क मोक्ष की चाह ने ज़माने को उलझाया है जिसने खोजा है उसने पाया है लोग डरते हैं जिससे खुद उन्हीं का साया है। आपने टीका लगवाना है नहीं कोई चलेगा बहाना है रोग भागे नहीं भागे नहीं जानता कोई मगर कहा मैंने सभी ने माना है। टीका लगवाने से क्या क्या होगा कुछ नहीं होगा तो तजुर्बा होगा। मौत से बढ़कर कुछ हो नहीं सकता रोना यही है खोने वाला खोकर रो नहीं सकता। हमने बड़ी महनत से इनको बनाया है समझ लो उपरवाले की यही माया है दर्द दवा का यही रिश्ता है। रोग से मरने से अच्छा है ईलाज से मर जाना। सोचो अगर पैसे से दवा से उपचार से लोग मौत से बच सकते तो कोई धनवान कभी नहीं मरता दुनिया में गरीबी कब की खत्म हो गई होती। 
 

  ( ये शुरुआत है कथा कभी ख़त्म नहीं होती है। पढ़ सुन कर चिंतन करते हैं। )

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