Monday, 8 February 2021

एक के बदले सौ मिलेंगे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया ( व्यंग्य भी साथ चार ग़ज़ल भी )

   एक के बदले सौ मिलेंगे ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

                   ( व्यंग्य भी साथ चार ग़ज़ल भी )

ये भी नोटबंदी की तरह ही है मगर क्योंकि योजना ख़ास वर्ग तक सिमित है इसलिए इसकी घोषणा नहीं की जा सकती थी। करंसी नहीं सच की बदलने की बात है क्योंकि उनको पक्का यकीन हो गया था सच बहुत पुराने युग में उपयोगी था और आजकल झूठ उसकी जगह स्थापित हो चुका था अतः सच की कीमत कुछ भी नहीं रही इसलिए बदलना लाज़मी था। बस जो जो भी सच का धंधा करते थे उनको समझा दिया था जितना बचा हुआ सच आपके तहखाने में है उसको हम से बदल सकते हैं। सिर्फ इतना नहीं आपको गले सड़े बेकार सच के बदले में खनकदार चमकीला झूठ मिलेगा सस्ते दाम पर एक देकर सौ वापस पाओ समय रहते फायदा उठाओ। योजना मिल बांट कर खाओ पहले खुद को बेचो उसके बाद झूठ बेचने का धंधा चलाओ जितना चाहो लेते जाओ रोज़ आओ रोज़ पाओ खूब खाओ खिलाओ। सच की दुकानदारी करने वालों ने सच बेच कर झूठ सौ गुणा पाया और शॉपिंग मॉल में शोरूम बनाकर भाव और भी बढ़ाकर मुनाफा कमाया। किसी को भी ये समझ नहीं आया सच जिस ने खरीदा उसने क्या कमाया। झूठ बेचने वाला खामोश रहा अपना खोटा सिक्का चलाया उल्लू सबको खूब बनाया सच का नामो-निशान मिटाकर खुद सच बनकर सामने आया। आखिर इक दिन हमको सारा खेल दिखाया सच और झूठ दोनों से मिलवाया। 
 
खरा सच खालिस दूध सबसे लिया अपनी मशीन में डालकर मख्खन चिकनाई अलग कर उसका शुद्ध देसी घी बनाया खुद पिया अपने लोगों को बेचकर बदले में समर्थन या मनचाहा काम लिया। बचा हुआ था सफेद पानी उसमें मिलवट कर गाड़ा किया सौ गुणा कर वापस उन्हीं को दिया। सच वाले झूठ बेचने लगे हैं तलवे चाटने लगे हैं हाथ जोड़ने लगे हैं। सच नज़र आये उसको क़त्ल करते हैं नहीं ज़िंदा सच कोई छोड़ने लगे हैं। । उनके पास झूठे वादों का भंडार जमा था तमाम अच्छे दिन रोज़गार काला धन विदेश से लाने और खैरात बांटने से विकास और सस्ता पेट्रोल डीज़ल जो मांगो मिलने वाले। सब से बचाने को खुद चौकीदार बन भाई बंधुओं को भी चौकीदार बनकर रखवाली करने के नाम पर हरियाली पाने के रंग ढंग निराले बनाये हैं। एक एक सच को दफ़नाया हज़ार झूठ उगाये हैं झूठ के बाग़ लगाए है लोग सारे रुलाये हैं अच्छे दिन खुद अपने बनाये हैं। नया ज़माना लाये हैं राहों पर कांटें बिछाए हैं कुछ लोग खिलखिलाए हैं जिनको अंदाज़ भाए हैं बाकी सभी बहुत पछताए हैं। 
 

 सच लिखना अपराध है बोलना मना है सच को ग़ज़ल बनाकर सुनाया जा सकता है सामने दिखलाया भी जा सकता है और झूठ से छिपकर बचाया भी जा सकता है।  जाँनिसार अख़्तर जी की लाजवाब ग़ज़ल पहले उसके बाद इस नाचीज़ की भी तीन ग़ज़ल सच को लेकर हाज़िर हैं। 

ग़ज़ल - जाँनिसार अख़्तर जी की 

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए 
है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए। 
 
दिल का वो हाल हुआ है गमें दौरां के तले 
जैसे इक लाश चटानों में दबा दी जाए। 
 
हमने इंसानों के दुःख दर्द का हल ढूंढ लिया 
क्या बुरा है जो ये अफ़वाह उड़ा दी जाए। 
 
हम को गुज़री हुई सदियां तो न पहचानेंगी 
आने वाले किसी लम्हे को सदा दी जाए। 
 
हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए। 
 
कम नहीं नशे में जाड़ों की गुलाबी रातें 
और अगर तेरी जवानी भी मिला दी जाए।
 
 

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का ( ग़ज़ल ) 

        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का
अब तो होने लगा कारोबार सच का।

हर गली हर शहर में देखा है हमने ,
सब कहीं पर सजा है बाज़ार सच का।

ढूंढते हम रहे उसको हर जगह , पर
मिल न पाया कहीं भी दिलदार सच का।

झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर
बिन बिका रह गया था अंबार सच का।

अब निकाला जनाज़ा सच का उन्होंने
खुद को कहते थे जो पैरोकार सच का।

कर लिया कैद सच , तहखाने में अपने
और खुद बन गया पहरेदार सच का।

सच को ज़िन्दा रखेंगे कहते थे सबको
कर रहे क़त्ल लेकिन हर बार सच का।

हो गया मौत का जब फरमान जारी
मिल गया तब हमें भी उपहार सच का।

छोड़ जाओ शहर को चुपचाप "तनहा"
छोड़ना गर नहीं तुमने प्यार सच का।  
 
 

इक आईना उनको भी हम दे आये ( ग़ज़ल ) 

डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इक आईना उनको भी हम दे आये
हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं।
 
बदकिस्मत होते हैं हकीकत में वो लोग
कहते हैं जो हम तकदीर बनाते हैं।

सबसे बड़े मुफलिस होते हैं लोग वही
ईमान बेच कर जो जागीर बनाते हैं।

देख तो लेते हैं लेकिन अंधों की तरह
इक तिनके को वो शमशीर बनाते हैं।

कातिल भी हो जाये बरी , वो इस खातिर
बढ़कर एक से एक नजीर बनाते हैं।
मुफ्त हुए बदनाम वो कैसो लैला भी
रांझे फिर हर मोड़ पे हीर बनाते हैं। 
 
 

पथ पर सच के चला हूं मैं ( ग़ज़ल )

 डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

पथ पर सच के चला हूं मैं
जैसा अच्छा - बुरा हूं मैं। 

ज़ंजीरें , पांव में बांधे 
हर दम चलता रहा हूं मैं।

कोई मीठी सुना लोरी
रातों रातों जगा हूं मैं। 

दरवाज़ा बंद था जब जब
जिसके घर भी गया हूं मैं। 

मैंने ताबीर देखी है
इन ख्वाबों से डरा हूं मैं। 

आना वापस नहीं अब तो
कह कर सबसे चला हूं मैं। 

खुद मैं हैरान हूं "तनहा"
मर कर कैसे जिया हूं मैं।
 
 
 
 

No comments: