Sunday, 31 January 2021

सरकार और भगवान चुकाते एहसान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  सरकार और भगवान चुकाते एहसान ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

अरे ओ नादान इंसान पढ़ भगवान और सरकार का अनकहा ब्यान। चुकाते हैं अपने को बनाने वालों के एहसान। भगवान ने दुनिया बनाई थी अच्छाई सच्चाई सबकी भलाई थी नहीं उसने समझी अपनी बढ़ाई थी। ईश्वर अल्लाह नाम कोई नहीं था अकेला था अनोखा अलबेला था कोई नहीं गुरु न कोई चेला था पास रखा पैसा पाई न इक धेला था। कितने समझदार बंदों ने उसको मशहूर कर दिया भक्ति अर्चना ईबादत महिमा गुणगान का दस्तूर मंज़ूर कर दिया। बिना मांगे बगैर किसी आदेश निर्देश उनहोंने अकेले उसके कितने नाम कथा रूप रंग अपनी कल्पना से बनाकर हर किसी को अपने भगवान से परिचित करवा दिया। किस किस चीज़ को इंसान ने अपने हाथ से तराशा सुंदर छवि तस्वीर बहुत कुछ बहुत नाम देकर भगवान को हर किसी का महमान बना दिया। भगवान हैरान हैं कौन किसकी पहचान हैं भगवान ने इंसान बनाये जिन बंदों ने भगवान बनाया बन गए विधाता से बढ़कर महान हैं। पंडित जी मौलवी संत महात्मा असली नकली धर्म उपदेशक मंदिर मस्जिद गिरिजाघर बनाने वालों के ईश्वर पर कितने एहसान हैं बस कैसे सभी से कर्जमुक्त हो भगवान इसी को लेकर परेशान हैं।
 
जो लोग उनको बनाते हैं ये उन्हीं के बन जाते हैं। अमीर चंदा देते हैं चुनाव लड़ते नहीं उनको कठपुतली बनाकर नचवाते हैं लड़वाते हैं सरकार बन जाती है मनचाही मुराद बिन मांगे ही पाते हैं। राजनेता अपनी वफ़ादारी उन्हीं से निभाते हैं तिजोरी खाली करते देश की अमीरों की भरते जाते हैं। मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जो भी बनवाते हैं पत्थरों पर नाम खुद अपना लिखवाते हैं या जो आपको धर्म की व्याख्या समझाते हैं भगवान को बेचते हैं बदनसीब खरीद लाते हैं। आप भगवान की महिमा गुणगान गाते हैं मांगते हैं खैरात नहीं मगर पाते हैं। रईस बिना मांगे धन दौलत हीरे मोती पाकर अपनी लूट की कमाई को धार्मिक आयोजन पर खर्च कर दानवीर कहलाते हैं। गरीबों की व्यथा दोनों को सुनाई नहीं देती दुर्दशा जनता की दिखाई नहीं देती। सरकार और भगवान जानते हैं उनका आस्तिव्य मतदाता या भक्त नहीं बनाते उनको संसद विधानसभा या मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा में जगह धनवान लोग जिस आमदनी से उपलब्ध करवाते हैं वो खून पसीने की ईमानदारी की महनत की नहीं होती है। जब बीज खाद ऐसे हैं तो फसल कैसे अलग हो सकती है। 
 
भगवान समझ गए हैं जो रोज़ उनके दर पर आते हैं झुकाते सर चंद सिक्के भेंट चढ़ाते हैं खुश रहने कुछ पाने की आस लगाते हैं भजन गाते हैं उसको मनाते हैं सभी हासिल हो जाता है बदल जाते हैं। ईश्वर इंसान को तकलीफ में ही याद आते हैं। भगवान उनकी बातों में कभी नहीं आते हैं भक्तों की परीक्षा लेते हैं उनको आज़माते हैं। मतलबी सभी हैं भगवान को बनाते हैं खुश करने को आरती गाते दीप जलाते हैं। भगवान को ये बात समझ आई है तमाम सामन्य भक्तों की करनी नहीं भलाई है उन्हें भक्त बनाये रखना है इस बात में चतुराई है। ये छोड़ कर भगवान का दर कहां जाएंगे ये घर के बुद्धू घर लौट ही आएंगे। क्या पाएंगे क्या खोएंगे समझ नहीं आता है इंसान खुद अपना भाग्य विधाता है। सरकार भी भगवान भी समझदार होते हैं जो देता है पहले बाद में वही पा जाता है। खैरात उतनी मिलती है जितनी झोली फैलाता है। कभी भरती नहीं सरकार की झोली तिजोरी कभी भगवान बेचने वालों की हसरत नहीं मिटती रह जाती है अधूरी। समझो सभी लोग भगवान की यही मज़बूरी एहसान चुकाना है सब से ज़रूरी।

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