Friday, 11 December 2020

है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना
लुट न जाये ये सारा जहां अपना। 
 
तोड़नी हैं हमको फिर से जंज़ीरें
आ गया फिर से इक इम्तिहां अपना। 
 
रहनुमाओं ने भटका दिया तो क्या
हम बना लेंगें फिर कारवां अपना। 
 
चाह महलों की करते नहीं लेकिन
खुद बचायेंगे छोटा मकां अपना। 
 
बंद पिंजरे में होंगे नहीं " तनहा "
सब समझते हैं क्या क्या गुमां अपना।

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