Thursday, 31 December 2020

पुरुषों से पक्षपात क्यों ( हास्य-व्यंग्य )डॉ लोक सेतिया

   पुरुषों से पक्षपात क्यों ( हास्य-व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

नारद जी सीधे सवाल करते हैं ईश्वर से कहने लगे आपका भी हिसाब उल्टा पुल्टा है। जो हाथ जोड़ मांगते हैं भगवान भरोसे रहते हैं उनको नहीं मिलता और जो आपसे नहीं मांगते सरकार से मांगते हैं उनको बिना आपसे मांगे कितना मिलता है। आपने समझाया था जो नहीं आते झोली फैलाकर आप उनको बुलाने को बेताब रहते हैं और जो गरीब मध्यम वर्ग आपकी भक्ति अर्चना पूजा करते हैं उन्हें थोड़ा मिलता है अधिक जतन करने पर भी। जिन अमीर लोगों को छप्पर फाड़कर देते हो वो कभी आपके दर्शन करने आते भी हैं तो दाता बनकर भिखारी बनकर नहीं। बिन मांगे मोती मिलें मांगे मिले न भीख ये बात क्या उचित है। शायद आपकी तरह भारत देश की सरकार ने सुनते हैं महिलाओं को बहुत कुछ देने का काम करने का वादा किया नहीं निभाया है। तीन तलाक पर कानून लेकर मुस्लिम महिलाओं को भरोसा दिलाया है खुद क्या हुआ जो अपनी पत्नी को बीच मझधार छोड़ आया है। साल नया जाने क्या लाया है पुरुषों ने पक्षपात का मुद्दा उठाया है। संगठन विवाहित पुरुष संघ जैसा महिलाओं से छुपकर बनाया है सवाल वही सामने आया है कोई शादी करने के बाद लड्डू खाकर कोई बिना लड्डू खाये पछताया है। विवाहित पुरुषों ने पत्नियों पर प्रताड़ित करने का इल्ज़ाम लगाया है। 
 
मांग उठाई है सरकार जी दुहाई है दुहाई है आप बताओ कौन हरजाई है। जब से शादी रचाई है हमारी शामत आई है। हर पत्नी को अपने पति में जहान भर की खामियां नज़र आती हैं खुद को सभी सर्व गुण संम्पन बतलाती हैं। दुनिया का हर पति बेचारा है दुनिया से जीत सकता घरवाली से हमेशा हारा है। सौ बार बिना गलती माफ़ी मांगकर करता गुज़ारा है। सरकार डूबते को तिनके का सहारा है कहलाता है पति परमेश्वर फिरता मारा मारा है। महिलाओं ने अपने पति को सुधारने का खुलेआम किया ऐलान हैं साथ निभाती हैं ये भी कितना बड़ा एहसान है। क्या आपने सभी महिलाओं को अच्छा और पुरुषों को खराब बनाया है नारद जी के सवाल पर ऊपरवाला चकराया है। भगवान को इस बात ने उलझाया है सरकार किस ने बनाई है क्या सिर्फ महिलाओं से वोट पाकर सत्ता पाई है। बराबरी की बात के मायने बदल जाते हैं खुद पहले अपनी पत्नी को सर पर बिठाते हैं जब नाचने लगती है समझ तभी पाते हैं। महिलाओं की झूठी तारीफ़ का अंजाम है पुरष नासमझ नहीं काबिल भी है मगर थोड़ा नादान है। 
 
सरकार ने पुरुषों को एकांत में बुलाकर बताया है। खुद अपनी पत्नी से जो नहीं निबाह पाया है उसने जाना पहचाना है महिलाओं को भगवान भी नहीं रोक टोक सकता है मेरी क्या मत मारी गई है जो नारी शक्ति से रार तकरार ठानूंगा। मेरी मज़बूरी है आपकी समस्या सही है लेकिन इसको समस्या नहीं मानूंगा आपने कब सरकार से पूछकर विवाह रचाया था। जो पेड़ आपने लगाया था क्या सोचकर हाथ बढ़ाया था। अंगूर खट्टे हैं हाथ नहीं आये महिलाओं ने मीठे आम खाये गुठली का क्या करना समझ नहीं पाये। सरकार ने चेतावनी दी है बात को यहीं खत्म करो भूल जाओ घर वापस जाओ ऐसा नहीं हो सरकार महिलाओं को बताये और आप धोबी के गधे बन जाओ। घर के न घाट के बनने से अच्छा है सुर ताल समझो उनकी उंगलियों पर नाचने का लुत्फ़ उठाओ। गर्म गर्म रोटी हलवा पूरी मिलती है जी भर खाओ।  


Wednesday, 30 December 2020

संकल्प नये वर्ष का ( कुछ नया ) डॉ लोक सेतिया

 संकल्प नये वर्ष का ( कुछ नया ) डॉ लोक सेतिया 

कितने साल से इक नई डायरी पर इस तरह संकल्प लिखता रहा हूं। लोग जैसे आमदनी खर्च का हिसाब रखते हैं बही खाते में मैंने उसी तर्ज़ पर हिसाब लगाया पिछले साल क्या खोया क्या पाया धन दौलत का कभी नहीं खाता बनाया दोस्ती और दोस्तों का सब अच्छा अनुभव लिखा याद रखने को और कड़वे अनुभव को दिलो-दिमाग़ से मिटाया भुलाया। बिछुड़े दोस्तों को पास बुलाया शिकवे गिले छोड़ गले से लगाया। मुकदर को हमने नहीं आज़माया तकदीर से धोखा किस ने नहीं खाया। फिर इस बार कुछ नया है दिल में आया कोई राज़ नहीं है कुछ भी नहीं छुपाया। सुने कोई समझे यही ख़्याल लेकर भरी महफ़िल में सभी को सुनाया। सबके दिलों पर दस्तक देने को मैं फिर एक बार खुद पास आपके आया। 
 
बीत गया जो उसका हिसाब देखा है मिला प्यार जितना दिया मैंने क्या उतना अभी रह गया चुकाना क्या बकाया। मनाने कोई आये चाहे नहीं आये मैंने पुरानी उन बातों को भुलाया बड़ा ही कठिन था रूठने वालों को मनाना बस कहा यार छोड़ो इस ढंग से मनाया। भला दुनिया में है कौन क्यों पराया हमने गैर को अपना हमेशा बनाया। बड़े ही प्यारे थे कुछ दोस्त जिनको खोया उनका दुनिया से चले जाना कोई बस नहीं अपना यादों में बसाया। 
 
संकल्प यही है बनाना है कोई जहां जिस में न पड़े दोस्ती पर कोई काला साया। मुहब्बत सभी से यही है ईबादत सियासत को छोड़ो जिसने सबको भटकाया। धर्म अपना बस इंसानियत है हर धर्म ने सबक जिसका पढ़ाया जो नफ़रत की बात करते हैं उनको समझ प्यार वाला कभी भी नहीं आया। बड़ा कौन है छोटा कोई नहीं है सभी को बराबर समझना पाठ पढ़ा पढ़ाया। 
 
ये सियासत वाले ये दौलत वाले ये झूठ का कारोबार करने वाले बड़े मक्क़ार हैं दिल के काले चेहरे उजाले। बिछाया फिर उन्होंने जाल अपना बिछाया मगर हमको बंद पिंजरे में रहना नहीं है हम आज़ाद पंछी सोने का पिंजरा नहीं भाया। कभी हमने खुदा इंसान को बनाया नहीं है सर अपना सत्ता की चौखट पर झुकाया नहीं है। दरबारी राग हमने तो गाया नहीं है झूठ को सच माना नहीं हमने सच से दामन बचाया नहीं है। जब तक जीना है शान से जीना मिलकर है अम्नो अमान से जीना हमारे देश की ख़ातिर जान हाज़िर है मरना यहीं और इसी हिन्दुस्तान में जीना।    

अच्छे दिन नहीं अच्छा साल लाएंगे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  अच्छे दिन नहीं अच्छा साल लाएंगे ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

सरकार चिंतित नहीं होती चिंतन करती है सत्ताधारी नेताओं शासन करने वालों का कोई दिन खराब नहीं होता है। उनको जो चाहिए जितना चाहिए मांगना नहीं पड़ता खुद हासिल करने का इख़्तियार मिला हुआ है। सोशल मीडिया से जानकारी मिली है जिसको आधुनिक एप्प्स वाली सरकार अनदेखा नहीं कर सकती है। अधिकांश लोग ख़त्म हो रहे साल को जमकर लताड़ लगा रहे हैं बुरा ही नहीं बेहद खराब होने का इल्ज़ाम लगा रहे हैं। उनको नहीं पता आने वाला अगला साल संख्या बढ़ जाने से कितना शुभ साबित होगा या नहीं होगा लेकिन उनकी निराशा को देखते हुए सत्ताधारी नेता को कुछ बिल्कुल नया और बेमिसाल करने का विचार आया है। उसको फिर साबित करना है कि उनकी हर समस्या का हल उसके पास है और किसी के पास नहीं है। 
 
    ये इक्कीसवीं सदी है दो हज़ार बीस साल गुज़र चुके हैं उस से पिछले सालों  को ईस्वी सदी से पूर्व उल्टी गिनती से बताया जाता है। सोचते सोचते जहांपनाह को ध्यान आया है कि गणित में भारतीय योगदान शून्य की खोज सबसे महत्वपूर्ण है लेकिन ऐतहासिक किताबों और घटनाओं में शून्य वर्ष को लेकर कहीं कोई बात नहीं मिली है। उनको हमेशा किसी कथा की सीख ध्यान में रही है जिस में उल्टी गिनती की बात से समस्या खुद समाधान बन जाती है। हिंदुत्व सभ्यता पांच हज़ार साल पुरानी है और उनकी मंशा यही है कि आधुनिक युग को छोड़कर वापस उसी वेदों उपनिषदों की कथाओं में वर्णित तौर तरीकों से देश और समाज को चलाया जाए। शून्य शब्द और अंक उनके जीवन में बड़े काम आये हैं उनको यकीन है देश जिस दशा में है उसको शून्यकाल कहना उचित है। संसद में शून्यकाल का अपना दौर रहा है और शून्यकाल का शून्यालाप स्तंभ अख़बारों में छपता रहा है। 
 
कैसे आने वाला साल बढ़िया हो सकता है उनको उपाय सूझ गया है। सालों की गिनती एक और जोड़कर बढ़ाने की जगह घटाने की परंपरा शुरू की जा सकती है और अभी एक संख्या बढ़ाने की बजाय दो हज़ार बीस घटाकर शून्य वर्ष से अपना इतिहास शुरू किया जाना उचित होगा। पिछले हिसाब किताब पर मिट्टी डालकर फिर से नया दिन नई रात जैसी शुरुआत। जिस वर्ष की संख्या इकलौती शून्य हो उस से कोई भयभीत होने की ज़रूरत नहीं होगी वो खुद एक होने को भला बनकर रहेगा। क्या आप अमुक समस्या से परेशान हैं चिंता छोड़िए मिल गया समाधान है। हैरानी की बात नहीं है आपको हर कोई इश्तिहार दिखलाकर या छपवाकर समझा रहा है। साबुन बेचने वाला इम्युनिटी बढ़वा रहा है अंधा है फिर भी आपको सही राह दिखला रहा है। समझदार वही है जो सबको उल्लू बना रहा आदमी आदमी से उकता रहा है। वक़्त वक़्त की बात है कोई इधर से उधर कोई यहां से वहां जा रहा है। बस जल्दी ये साल जा रहा है दफ़्तर में बैठा कोई नक़्शा बना रहा है इतिहास की किताब के पन्नों को फाड़कर पुर्ज़े उड़ा रहा है। दावा है कालिख है सफ़ेद कागज़ पर स्याही से लिखा किसने मिटाने से नहीं मिट सकता जलाने से धुंवां होता है इक इक पन्ने को नदी में बहा रहा है। जगजीत सिंह की गाई ग़ज़ल सुना रहा है , तेरे खुशबू में बसे खत मैं जलाता कैसे , राजेंदर नाथ रहबर की लिखी ग़ज़ल है।
 
सरकार इसको लेकर पूरी तैयारी कर रही है पिछले तमाम निशानों को मलियामेट किया जा रहा है। इतना ही नहीं बाबा जी जैसे चालाक साहूकारों और जालसाज़ी अभिनय कलाकारी खेल और टीवी सोशल मीडिया वालों से गठजोड़ कर देश की भलाई की कड़वी दवाई का इश्तिहार जारी करवा सबको पिछले समझा जाना पढ़ा लिखा भूलाने का उपचार देश हित में करवाया जाएगा। सब कुछ भूलकर उनकी मर्ज़ी का सबक पढ़वाया रटवाया जाएगा। शून्य होने का महत्व जब सबको समझ आ जाएगा कोई सभी खोकर भी बिल्कुल नहीं घबराएगा। पहले हर कोई शून्य की महिमा जाएगा उसके बाद एक बनकर ख़ुशी से इतराएगा। सरकार आधी रात को भी अध्यादेश जारी कर सकती है ये घोषणा की जा सकती है कि असली विकास वास्तविक आज़ादी और जनकल्याण की वास्तविक शुरुआत इस तरह से शून्य वर्ष की शुरआत से हो सकती है। आपको भरोसा रखना चाहिए क्यों दुनिया का आरम्भ शून्य और अंत भी शून्य ही है क्या लाये थे क्या लेकर जाओगे। पहली जनवरी को शून्य वर्ष का जश्न मनाओगे।  
 
आपको संविधान कानून न्यायालय मौलिक अधिकार चुनाव जैसे किसी झमेले में नहीं जाना है। उनका होना नहीं होना खुद ब खुद हो जाएगा क्योंकि उनका अस्तित्व शून्य समझा जाएगा। राजा राज चलाएगा अपने सलाहकार बनाकर खुद मौज मनाएगा कोई जियेगा कोई मर जाएगा बस उसी को सब मिलेगा जो राजा की आरती गाएगा। संसद विधानसभा आलीशान भवन बनवाएगा सब पुराना ढाकर अपना नाम खुदवाएगा। खेत को बाड़ कौन लगाएगा राजा ये बतलाएगा बाड़ खेत को जब खाएगा कितना मज़ा सरकार को आएगा ये तमाशा उसके मन भाएगा। जो उसने किया सभी से करवाएगा भीख मांगकर हर कोई खाएगा उसकी तरह मौज मनाएगा। जब पास नहीं कुछ रह जाएगा काहे को दिल घबराएगा। तनहा अपनी ग़ज़ल सुनाएगा। 

                 नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई 

                 है अपनी जेब तक ख़ाली कहीं पर घर नहीं कोई।

Tuesday, 29 December 2020

आपने सौ इल्ज़ाम लगाए ( जाने वाले की बात ) डॉ लोक सेतिया

 आपने सौ इल्ज़ाम लगाए ( जाने वाले की बात ) डॉ लोक सेतिया

मेरा नाम इतना बदनाम हुआ मगर क्यों हुआ मेरा कसूर क्या है। पता नहीं मेरे बाद आने वाले को खबर भी है कि नहीं कि उसके आने पर स्वागत होगा या आशंका या आखिर तक उसको भी चिंता रहेगी। अच्छा है कुछ ले जाने से देकर ही कुछ जाना चल उड़ जा रे पंछी। जाते जाते बड़े भारी मन से गुज़रा हुआ साल समझना चाहता है आखिर साल भर उसको कितना खराब बताया जाता रहा तो समय ने करवट ली और जो भी हुआ उस का दोष केवल वर्ष पर धरना क्या वास्तव में उचित है। ये कैसा चलन है निराधार ही किसी को इतने बड़े गुनाह का दोषी ठहराया जाये। क्या कोई नववर्ष या दिन महीना अपने साथ कुछ अच्छा बुरा लेकर आता है। आपने शायद इस बात को नहीं समझा होगा कि जिस किसी को हर दिन पल पल कोई हिक़ारत से देखता है अपशब्द उपयोग करता उसके लिए निरंतर वो जीते हुए मर जाता है। किसी देश में लोग पेड़ों को कभी नहीं काटते हैं मगर कभी कोई पेड़ रास्ते में रुकावट लगता है और उसको हटाना चाहते हैं तब नियमित हर दिन उस गांव या नगर वाले उसके करीब जाकर घेर कर खड़े हो उसको गलियां देते हैं और कहते हैं कुछ दिन में वह पेड़ अपने आप सूख कर मर जाता है। उस पेड़ को भी शायद मेरी तरह समझ नहीं आता होगा क्यों उस से इतनी नफरत लोग करते हैं। दुनिया को बेशक जाने वाले वर्ष में कितना खराब अनुभव रहा हो मगर दुनिया भर के लोगों की नफरत ने जाने से पहले उसे ज्याला में जला दिया है। 
 
खैर जो हुआ सो हुआ फिर भी आपको साल की संख्या गिनती को दोषी समझ सज़ा देनी है तो अभी दो दिन हैं सोच लो आपको कौन सी संख्या वाला साल अच्छा लगता है उसी को बुलवा लो शायद भविष्य को नहीं जानते तो कोई गुज़रा साल आपकी ज़िंदगी का सुनहरा काल रहा हो वापस वहीं से शुरआत कर सकते हैं। आपसे तय नहीं हो सके तो जिनसे भविष्यवाणी पूछते हैं उन्हीं से पूछ लो कौन सा वर्ष अच्छा होगा। आप की सरकारें बहुत दावे किया करती हैं अमुक संख्या वाले वर्ष तक देश दुनिया को बदलकर स्वर्ग जैसा बना देंगे अभी क्यों नहीं उसी संख्या के वर्ष को शुरू किया जाये। कठिनाई कोई नहीं है उनके बारे में सब मुमकिन है भरोसा है अब उनको इक नया अध्यादेश जारी करना है कि जाने वाले वर्ष के बाद किस को बुलावा देना है। 
 
हंसी मज़ाक की बात नहीं है कौन है जिसने ये कल्पना नहीं की होगी कि काश हम अपनी ज़िंदगी की शुरुआत फिर से किसी बचपन या जवानी के साल से कर सकते तो जो किया है पिछले जीवन में सब अलग ढंग से किया होता। कोई अमीरी कोई हाथ से निकली सत्ता या किसी प्यार को फिर हासिल करना चाहता और कोई पढ़ लिख कर ज़िंदगी बर्बाद होने की भूल सुधार अपराध गुंडागर्दी करना चाहता ताकि भविष्य में राजनीति में सफल हो सके। ज़िंदगी भर ईमानदारी करने वाला झूठ और धोखाधड़ी के रंग ढंग समझने की बात करता। ये तो पक्की बात है ऐसे बहुत लोग होते जो अपनी पत्नी को छोड़कर चले जाते या पत्नियां भी पति को ठोकर लगाकर सुख चैन से अकेली रहना पसंद करती। समस्या शादी की भी बाद में पता चलता है आगे कुछ भी हो सकता है और ठीक ऐसे आने वाले वर्ष का भी जश्न मनाते हैं जैसे दुल्हन मिलनी है या सपनों का राजकुमार आएगा घोड़े पर सवार हो मगर नसीब में मिलता वही है जो सोचा नहीं होता है। नववर्ष कहेगा आने से पहले बताओ क्या हसरत है बुलाने से पहले क्योंकि खोना भी पड़ता है पाने से पहले।
 


रहम की भीख ज़ालिम देते हैं ( हिक़ायत फ़साना ) डॉ लोक सेतिया

रहम की भीख ज़ालिम देते हैं ( हिक़ायत फ़साना ) डॉ लोक सेतिया 

    दरबार में चर्चा है कुछ लोग फिर से सर उठाने लगे हैं दर्द से कराहने चिल्लाने लगे हैं महल वाले घबराने लगे हैं ऊंचे गुंबद डगमगाने लगे हैं। लोग सभी दीवारें गिराने लगे हैं आज़ादी का मतलब समझाने लगे हैं। सत्ता के दलाल शोर मचाने लगे हैं भूखे नंगे लोग भरपेट क्यों खाने लगे हैं उनको सब समझ आने लगा है हम सभी मिलकर उल्लू उनको बनाने लगे हैं। लूटकर सभी कुछ खुद चोर सारे चोर चोर चिल्लाने लगे हैं मगर होश अपने ठिकाने लगे हैं। जनाब बताओ कोई ईलाज क्या सोच कर बंसी बजाने लगे हो , बात रोने की है और आप मुस्कुराने लगे हो। महाराज हाथ अपना उठा रहे हैं सभा को वास्तविकता समझा रहे हैं। ज़ालिम हैं सभी शासक दुनिया भर के ज़ुल्म करना है किये जा रहे हैं बदनसीब ज़ुल्म हद तक सहे चले जा रहे हैं आपको मुझको सभी शासकों को मज़े आ रहे हैं। कभी किसी ने ज़ालिम की तलवार नहीं तोड़ी है छीनकर घाव खाकर दर्द सहे जाते हैं मगर हद से बढ़ जाये तब मरहम की मांग करने आते हैं। हम अपनी रिवायत निभाते हैं बेज़ुबानों पर सितम ढाते हैं लोग खुद हमको ख़ुदा बनाते हैं फिर बेगुनाही की सज़ा पाते हैं। इंसान की औकात क्या शैतान की भी बिसात क्या हम राजनेताओं अधिकारी लोगों और धनवान लोगों से भगवान भी घबराते हैं हम उसको खिलौना समझ कर खुले बाज़ार सस्ते दाम बेच आते है। रावण के दाम बढ़ते जाते हैं राम सभी को आखिरी घड़ी याद आते हैं। 
 
  मन की बात कोई नहीं जाने झूठ को सच बनाते हैं दिमाग से काम चलाते हैं। साफ बात आपको बताएंगे जिस दिन लोग सच समझ जाएंगे क़ातिल से इंसाफ़ मांगने नहीं आएंगे। हर ज़ालिम की सरकार गिराएंगे तब आज़ादी का जश्न मनाएंगे। पर हमने ऐसा विधान बनाया है जिसकी निराली माया है। लोगों ने सभी को आज़माया है फिर बार बार धोखा खाया है पर हमने जैसे जाल बिछाया है कोई भी नहीं समझ पाया है। घोटालों का देश कहलाता किसने कंगाल बनाया है। सबको इक महगाथा बंटवाई है साहिब के गुणगान को छपवाई है। मिलकर सभी ने ऊंचे सुर में गाकर सभी को समझाना है चलो मिलकर सब साथ गाते हैं मेरी धुन पर गाकर झूमते जाते हैं। चिंता को दूर भगाते हैं। भजन कीर्तन शुरू है आंखें बंद सोचना समझना बंद बस तोते की तरह रटने लगे हैं। आपको भी इसको गुनगुनाना है मस्ती में बिना समझे गाना है ये सत्ता की हिदायत है उसकी सच्ची हिक़ायत सच्चा अफ़साना है। अब भजन की तरह पढ़ना।
 

 जूतों में बंटती दाल है अब तो ऐसा हाल है मर गए लोग भूख से सड़ा गोदामों में माल है। बारिश के बस आंकड़े सूखा हर इक ताल है लोकतंत्र की बन रही नित नई मिसाल है। भाषणों से पेट भरते उम्मीद की बुझी मशाल है मंत्री के जो मन भाए वो बकरा हलाल है। कालिख उनके चेहरे की अब कहलाती गुलाल है जनता की धोती छोटी है बड़ा सरकारी रुमाल है। झूठ सिंहासन पर बैठा सच खड़ा फटेहाल है जो न हल होगा कभी गरीबी ऐसा सवाल है। घोटालों का देश है मत कहो कंगाल है सब जहां बेदर्द हैं बस वही अस्पताल है। कल जहां था पर्वत आज इक पाताल है देश में हर कबाड़ी हो चुका मालामाल है। बबूल बो कर खाते आम देखो  हो रहा कमाल है शीशे के घर वाला  रहा पत्थर उछाल है। चोर काम कर रहे हैं चौबीस घंटे और पुलिस की हड़ताल है हास्य व्यंग्य हो गया दर्द से बेहाल है। जीने का था पहले कभी अब  मरने का सवाल है। ढूंढता जवाब अपने  खो गया सवाल है।

पैसे ने किया बस अंधा है , देशभक्ति उनका धंधा है। बिकते नेता  सरकार बिकी , काम आता उनका चंदा है। फस गई सरकार बेचारी है , चेहरे पर कालिख कारी है। सीखा नहीं लेकिन घबराना  जब चोरों से ही यारी है। अब दाग़ सभी लगते अच्छे , बेची सब शर्म हमारी है। जाने क्या अभिशाप मिला है सत्ता की कुर्सी खुद सबसे बड़ी बिमारी है। वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो , आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो। जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो , कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो। क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो , निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो। सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो , मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो। बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो , हर किसी का दुश्मन है , लेकिन तुम उसको बड़ा  भाई लिखो। देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो , नहीं लगी दहलीज पर , कहीं  कोई काई लिखो। पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो , जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो। बात निकली है उधर से पहुंची है वहां तक बंद दरवाज़े ऊंची दीवारों से टकराकर लौट आई है दोहे बनकर।
 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान। 

 

Sunday, 27 December 2020

आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिए जाएंगे पर , आपकी ताज़िम में कोई कसर होगी नहीं।

 गोपनीय दस्तावेज़ बंद लिफ़ाफ़ा ( श्वेत पत्र ) डॉ लोक सेतिया 

क्यों न पहले दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल पढ़ी जाये। बहुत कुछ समझना आसान हो जाएगा। ध्यान से पढ़ते हैं। 

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं , कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं। 

इन ठिठुरती उंगलियों को इस लपट पर सेंक लो ,धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं। 

बूंद टपकी थी मगर वो बूंदो-बारिश और है , ऐसी बारिश की कभी उनको खबर होगी नहीं। 

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है , पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं। 

आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिए जाएंगे पर , आपकी ताज़िम में कोई कसर होगी नहीं। 

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की असलियत , हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं। 

अब वास्तविक पोस्ट इक दुखियारी माता की दर्द भरी कहानी उसी की ज़ुबानी। 

            दो शब्द भूल गए हैं या बिसरा दिए गए हैं। पहले सरकार कभी कभी श्वेत पत्र जारी किया करती थी झूठ और अर्धसत्य से पर्दा उठाने को। अब पर्दों के पीछे कितने और पर्दे हैं सत्ता की हवेली घने अंधेरे में अनगिनत राज़ दफ़्न करती रहती है बाहर से जो महल चुंधियाती चकाचौंध रौशनी में चमकते दिखाई देते हैं उनके भीतर उजाला करना मना है। जैसे हवेली का हर कमरा कोई हम्माम है जिस में सभी नंगे हैं शर्मसार कोई भी नहीं। और इक और शब्द पीत पत्रकारिता हुआ करता था जब खबर सच सामने लाने की जगह किसी और मकसद या स्वार्थ से छिपाई जाये या गुमराह करने को झूठ को सच बताया जाये मनघड़ंत कहानियां बनाई जाएं। मां की ये दर्द भरी व्यथा कथा कोई नहीं जानता कोई नहीं समझता फिर भी उसके अपनी बात समय की डायरी के पन्नों पर अपने आंसुओं से भिगोकर अपनी कलम से लिख दी है। विरासत की तरह शायद। 
 
    मैंने अपने सभी बच्चों को एक जैसा समझा प्यार दिया पालन पोषण किया है। हर मां की पीड़ा है बच्चों को शिकायत रहती है। मां की मर्ज़ी नहीं होती हालात की विवशता भी होती है और अपनी विरासत परंपरा को सुरक्षित रखने का कर्तव्य निभाने का कार्य करना भी इसलिए उसको कभी इस कभी उस बेटे को उत्तरदायित्व सौंपना होता है। बच्चे जैसे भी हों लायक या नालायक मां किसी को पराया नहीं करती है। 74 वें साल में मां डायरी में लिख कर बंद लिफ़ाफ़े में अपने सिरहाने रखे बक्से में छिपकर जिसे रख रही है घर की देखभाल की ज़िम्मेदारी निभाने वाले बेटे की नज़र पड़ी तो जैसे घर का सभी कुछ जो मिला था उसको विरासत में संभालने को इसको भी बिना जाने समझे सस्ते दाम बेच सकता है। इतने सालों में जिनको ये बताता है कि लुटेरे थे उन्होंने अच्छा बुरा जो भी किया कितना कुछ घर के सदस्यों की भलाई सुरक्षा की खातिर बनवाया। आधुनिक युग में सभी के समान समय की रफ़्तार को समझ शिक्षा स्वास्थ्य बुनियादी ज़रूरतों पर ध्यान देते रहे। माना बहुत कुछ किया जाना चाहिए था जो किया नहीं गया मगर जितना मिला उसको बर्बाद नहीं किया जैसे ये बेटा रहीसाना ढंग से घर की कमाई से अपने शौक मौज मस्ती और अपने खास यार दोस्तों की दोस्ती निभाने को घर बार बेचने गिरवी रखने का काम करने लगा है। 
 
मैं मां का अच्छा बेटा हूं उसकी देखभाल करता हूं बड़ा शोर मचाया है। मां किस हाल में है उसके ज़ेवर क्या उसका हर उपयोगी सामान घर से गायब होता जा रहा है। बैंक में जमापूंजी की हालत कोई नहीं जानता है घर फूंक तमाशा देख रहे हैं भवन मूर्तियां आडंबर महिमामंडन पर दौलत खर्च कर क्या साबित करना चाहते हो। मां अच्छे दिन की बहार लाऊंगा कहकर घर की रखवाली की बात करने के बाद सभी भाई बहनों को बदनाम और खराब बताने लगा है। दिलों को तोड़कर दिल को बहलाने को झूमने गाने लगा है बच्चों के साथ मां को भी रुलाने लगा है। घर का सब सामान बेटे को बदलना है कोई पुरानी निशानी छोड़ना नहीं चाहता पिछले लोगों के नाम मिटाने हैं और उनकी जगह अपना नाम लिखना है। तोड़ना सीखा है उसने बनाना नहीं आता मगर बनाए भी क्यों उसको नहीं पता कब तलक सभी उसके हवाले है जैसे उस से पहले जिन्होंने बनाया था उनको कहां खबर थी कोई आएगा और सब तहस नहस कर देगा। तब जो होगा देखा जाएगा अभी तो मैं जो चाहूं मेरी मर्ज़ी। 
 
मां होना क्या है बस वही जानती है। मां का आदर बाहर दिखावे को घर में उस से पाना चाहते हैं अधिकार मानकर उसको देते हैं पेट भरने को दो रोटी कपड़ा एहसान समझ कर। बेटे को सब सौंप दिया तब भी लगता है जाने कितना जमा किया छुपा है कहते हैं मां क्या करना है सब मुझे दे दो। मां कभी गरीब नहीं होती बेटे कितने अमीर हो जाएं उनकी गरीबी मिटती नहीं कभी। कैसा युग है मां को भी नदी को भी गंदगी डालने की जगह समझने लगे हैं। बड़ा हो या छोटा चाहे बीच का मझला सभी को लगता है मां का सब उसका मगर मां की देखभाल करना दूसरे का फ़र्ज़ है। आपको ये डायरी मिल जाए तो जो लाल रंग के निशान हैं उनको सजावट मत समझना। मां ने लिखते समय आंसू बहाये हैं खून के आंसू उसी के धब्बे हैं कोई रंग से बनी रंगोली नहीं। बस और नहीं पढ़ा जाता भीगी पलकों से धुंधला नज़र आने लगा है। हर कोई मां के नाम पर भावुक होकर आंसू बहाते दिखाई दे जाता है कभी किसी ने अपनी मां के आंसुओं को समझा नहीं। मैंने इक बार देखा था अपनी मां को रोते हुए , नहीं बताया पूछने पर क्या हुआ था। मैं भी इक कविता लिख पाया था अपनी मां के आंसू शायद पौंछ भी नहीं पाया कि उसके अपने दुपट्टे के पल्लू से मिटा दिए और हमेशा की तरह ममतामई मुस्कान दर्द को ढक गई थी। कविता से अंत करता हूं। 
 

          मां के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।
 
      


 


Saturday, 19 December 2020

गर्दिशे वक़्त है बड़ी गुस्ताख़ , इसने शाहों के ताज उतारे हैं

   किसानों के लिए मीठी लोरी ( उलझन की बात ) डॉ लोक सेतिया 

      उस दिन डरावना सपना देखा था पसीने पसीने हो गए थे। रात को ख़्वाब देखा किसान खेत में पुराने बंद हुए करंसी नोट खाद की जगह डाल रहा और नये दो हज़ार पांच सौ सौ पचास बीस वाले रंगीन नोट की फसल उग रही है। शायद किसान नहीं वही कारोबारी धंधे वाला दोस्त है सोचने पर याद आया कल ही उसने अनुरोध किया था खेतीबाड़ी करनी है नोट उगाने हैं। मेरे देश की धरती सोना उगले उगले हीरे मोती मेरे देश की धरती। मनोज कुमार की फिल्म की बात झूठी नहीं हो सकती अब समझ आया किसान धरती को क्यों इतना महत्व देता है। दोस्त दोस्त नहीं है जान से बढ़कर है इनकार का सवाल ही नहीं। उसकी मर्ज़ी रब की मर्ज़ी दुनिया फ़र्ज़ी की अर्ज़ी क्या खुद्दारी क्या खुदगर्ज़ी। कितने किरदार निभाए हैं अगली फिल्म में किसान बनना है ठान लिया तीन तलाक से बढ़कर कमाल करेगी ऐसी अदाकारी होगी। सुरमाई अखियों में इक सपना दे जा रे। मधुर संगीत होना ज़रूरी है।
 
 बस उसने ज़िद कर ली किसान बनकर अभिनय करना है अपने ख़ास यार से अपनी लिखवाई कहानी के लिए कोई मधुर गीत किसी शायर से उधार मांगने को कहा। बिना अनुमति चुराना कोई कठिन नहीं पर उसको बदलवाना पड़ेगा किसान कोई गायक शराबी पिता की बेटी नहीं है। पिता की जगह अपना नाम शामिल करना है और समझाना है कैसे किसान बनकर नोटों की फसल बोकर काटते हैं। पुराने हज़ार पांच सौ वाले नोट को मटियामेट कर नया बीज दो हज़ार वाला सत्ता की दलदल में बो कर पांच साल में कमाल करना है रंगीन नये नोटों की बहार लानी है। किसान कब से सोया नहीं उसको गहरी नींद में सुलाना है। घर के उजियारे सो जा रे , पापा तेरे जागे तू सो जा रे। जागने से मन की मुरादें नहीं खिलती , ढूंढने से दिल्ली की सीधी राहें नहीं मिलती। मिला नहीं जो तुझे देश में हमारे दे जाएंगे सत्ता के अंधियारे। हाथी घोड़े भालू शेर चीते सारे , नेताओं ने कैसे कैसे रूप धारे। सपनों के खेत की छत पे हैं सितारे , लहलहाते हैं खलियान में नोट भरे गुब्बारे। अंबानी अडानी रिलायंस मिल कर गा रे। आजा पहले आजा पहले पा जा रे। 
 
 सपने बड़े सुहाने होते हैं सपनों के कारखाने होते हैं नये सपने कभी पुराने होते हैं इमली के दाने खिलाने होते हैं। इच्चक दाना बिच्चक दाना दाने ऊपर दाना नायिका शिक्षक है बच्चों को पढ़ा रही है पहेलियां गा रही है। मिर्ची भुट्टा मोर समझा रही थी  छत के ऊपर लड़की नाचे लड़का है दीवाना समझा रही थी। नायक ने आखिरी बंद बनाया सच क्या है सुनाकर समझाया , चालें वो चलकर दिल में समाया , खा पी गया किया है सफाया। तुम भी देखो बच कर रहना चक्कर में न आना। हमने माना कि तग़ाफ़ुल न करोगे लेकिन ख़ाक हो जाएंगे हम तुमको खबर होने तक। आह को चाहिए इक उम्र असर होने तक , कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक। दोनों यार मिलकर बैठे हैं पुरानी फ़िल्मों के टुकड़े जोड़ अपनी पसंद की कहानी बनाने लगे हैं। बाहर से किसी ने कह दिया फ्लॉप आईडिया है कब तक पुरानी चीज़ों का कबाड़ा करते रहोगे कभी कुछ अपना मौलिक किया होता। वक़्त वक़्त की बात है कभी कितने नायक सभी को जागने को कहते रहे जागरूक करना अच्छा समझते थे ये जागने नहीं देना चाहते बल्कि सुलाने को लोरी गाकर सपने देखने की सलाह देते हैं। राम करे ऐसा हो जाए मैं जागूं सारा जग सो जाये झूठे ख्वाबों में जनता खो जाये। 
 


Friday, 18 December 2020

ऐसे विदा कर रहे हो बेआबरू करकर 2020 को आप 2021 कहीं बन जाये मेरा बाप

         हमें भूल जाना अगर हो सके ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

  कितने जश्न मनाकर जिसे बुलाया था अब जब उसने जाना ही है तो विदा भी ढंग से करते। जाते जाते उसकी पलकें भीगी हुई हैं भला ऐसा भी कोई करता है। वक़्त कभी टिकता नहीं आदमी भी कब कहीं टिककर रहते हैं वक़्त को वक़्त पर चलते रहना होता है उसकी रफ़्तार बदलती नहीं है। लोग वक़्त को ख़राब बताते हैं फिर बाद में पछताते हैं इस से तो वही अच्छा था पुरानी यादों को याद करते हैं सुनते सुनाते हैं दिल को समझाते हैं। अच्छे दिन लौट कर कब वापस आते हैं जाने वाले को भूलना चाहोगे सोच लो याद करोगे दिल से भुला पाओगे। आखिर कब तक अंधेरों को उजाले बतलाओगे भोर होने पर दिन में चिराग़ जलाओगे। दीवार से कैलेंडर बदलने से तकदीर नहीं बदलती है आईना सच कहता है चेहरे बदलते हैं तस्वीर नहीं बदलती है। साल गिनती है ज़िंदगी का ख़्वाब हो जैसे क्या किताबों हिसाबों से मिलता सब को कितना कैसे। जाते जाते जाने वाले का दिल तोड़ दिया अपने आखिर तक आकर दामन उसका छोड़ दिया। अगले आने वाले साल से कुछ पूछा है क्या लाया है क्या भरोसा है आदमी का जब नहीं कोई ऐतबार है वक़्त किस जुर्म का मुजरिम है क्यों गुनहगार है। कितने बेदिल बेहरम बेतमीज़ हैं लोग महफ़िल से जाने वाले को देखते हैं कैसी निगाहों से जब आया था किये थे सलाम बिछाए फूल राहों पे गले लगाया था अदाओं से। अदब की विदाई भी नहीं मिली बेहयाओं से। बाज़ आये सभी खुदाओं से नाख़ुदाओं से मुझसे रूठे हैं रूठें मेरी बलाओं से। 
 
जाने वाला ये साल कहता है नेता नहीं हूं मैं कोई किसलिए करूं मैं आपकी दिलजोई मैंने चुराया नहीं किसी का पल भर भी मुझसे मिला जो नहीं दिया मैंने जिसने खोया किसी का नहीं लिया मैंने। मुझको घटाओगे कैसे बात फिर आगे बढ़ाओगे कैसे। मुझे भुलाओगे किसे याद करोगे गुज़रा ज़माना फिर नहीं आता है लाओगे किसको जिसको चाहोगे पकड़ पाओगे। कह रही चलती हुई हर घड़ी है ज़िंदगी क्या है सांसों की जुड़ती लड़ी है जीने वालों ने हर इक लम्हे से मुहब्बत की है चांद तारों अभी आंख अपनी लड़ी है। दुनिया ने नाहक मुझे बदनाम किया है जाने किस किस के गुनाहों को मेरे नाम किया है। भला क्यों किसी को बेगुनाही की सफाई देता इस दौर में कौन सलीके से है अब विदाई देता। मुझको अनचाही बेटी बनाया क्यों है जैसे अर्थी हो दुल्हन का डोला सजाया क्यों है। आपको अच्छी लगती नहीं बेटी साल बीस बीस की बेघर बेबस को बिना बात रुलाया क्यों है। 
 
साल आते रहे हैं जाते रहे हैं हर हाल में साथ निभाते रहे हैं हम संग संग हंसते रोते रूठते मनाते रहे हैं। पर हाथ ऐसे कभी छोड़ा नहीं करते अलविदा कहते हैं ऊपर उठा हाथ मरोड़ा नहीं करते। नहीं कोई कसूर मेरा शिकवा है न गिला है हर साल नया होता है पहले फिर पुराना भी चलता सिलसिला है। कांटों का नहीं फूलों का भी वजूद है गुलशन। मुझे मुहब्बत नहीं करते तो हिक़ारत से तो देखो मिले जब कभी फुर्सत ज़रा सोचो। मैंने देखा है आपको याद करते बीता ज़माना गुज़रा जो नहीं आएगा वापस चाहो भी बुलाना। नफरत कहां से सीखी कभी बताना खुद आपने खोया है था जो खुशिओं का ख़ज़ाना। तुम मुमकिन हो मेरी कहानी भूल जाना कोशिश करना फिर सोई मुहब्बत को जगाना। इंसान हो इंसान की इंसानियत समझना इंसानियत के दुश्मन को मत घर पर बुलाना दुनिया को सबक भाईचारे का सिखाना। ढाई अक्षर पढ़ना पढ़ाना। ये शेर किसी शायर का है बहुत पुराना। समझ सको अगर समझना समझाना वक़्त ठहरता नहीं खुद को ठहराना। 
 

                   वक़्त ने इक बार मेरे दर पे भी दी थी सदा ,  

                  अख़्तर इसके बाद सारी उम्र सन्नाटा रहा। 

 


 

 

 

 

 

 

 


Wednesday, 16 December 2020

आहों में है असर ना दुवाएं कबूल हैं , शायद कोई गरीब का पुर्सा नहीं रहा।

           जिसकी नीयत में दग़ा है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

जिसकी नीयत में दग़ा है आप होता है खराब , ख़ोशा -ए -गंदुम को देखो कब से दाता दान है। 
                                         ( मीर सोज़ )
 तू बता नावक-ए-जानां तेरी क्या है नीयत , ख़ंजर ए यार ने तो सर की कसम खाई है
                                 (  शेर सिंह नाज़ देहलवी )
 
किसी के चाहने वाले बल्कि किसी के गुनाहों में शामिल होकर बराबर हिस्सेदार लोग उसके हर कदम को सही दिशा में उठाया ज़रूरी उचित बता रहे होते हैं तब इक जुमला साथ जोड़ते हैं उसकी नीयत पर शक मत करना। ज़माना बदल गया है लोग नासमझ नहीं हैं भगवा धारण करने वाले साधु योगी भोगी लोभी देखे हैं। जिनकी नीयत को आप खोटा नहीं कह सकते वो , कभी उन तथाकथित बाबाओं की चौखट पर भी माथा टेकते थे  जिन्हें अदालत ने गुनहगार साबित होने के बाद हवालात की शोभा बढ़ा रहे हैं। नीयत अच्छी होती है जिनकी वे किसी को बर्बाद नहीं करते हैं खिड़कियां खोलते हैं दीवार गिराते हैं बंद कमरों में चोरी चोरी साज़िशें नहीं बुना करते हैं। जब सत्ता किसी का गला दबाती है तब चीख निकलती है और जनाब चाहते हैं आपकी सांस रुक जाए आपको उफ़ नहीं करनी चाहिए क्योंकि गला दबाने वाला खुद को चारागर बतलाता है। 

      सुना है सच्ची हो नीयत तो राह खुलती है , चलो सफ़र न करें कम से कम इरादा करें। 

                                 ( मंज़ूर हाशमी )

गज़ब किया तेरे वादे पे ऐतबार किया , तमाम रात क़यामत का इंतज़ार किया। उसने तो क़त्ल कर के भी कभी तौबा नहीं की जिनको क़त्ल किया उनकी मौत को हादिसा बता दिया और आह भरना भी जुर्म है पर हम जाकर रोने लगे।  उसकी गली में फ़रियाद करना भी बिना इजाज़त उसको मंज़ूर नहीं है। क्या हुआ क्यों हुआ कैसे हुआ जो भी हो जो नहीं होना चाहिए था हो ही गया है। अब पछताए क्या होत जब चिड़िया चुग गई खेत। मुन्ना भाई खलनायक शोले डॉन कितनी कहनियां हैं जिन्होंने मासूमियत शराफत सच्चाई ईमानदारी को दरकिनार कर गुंडागर्दी दहशत और अमीर बनने या जो भी चाहा हासिल करने को गैर कानूनी और अनुचित राह अपनाने को जायज़ है की धारणा बनाई। इसी में इक छिपा अर्थ भी था कि सच्चाई नैतिकता के साथ चलकर आपको सफलता नहीं मिल सकती। हमने सदियों जिन शिक्षाओं और मूल्यों को सर्वोच्च मान्यता दी और हासिल करने से अधिक महत्व त्याग करने को देने की बात देते रहे कुछ लोगों ने भारतीय सभ्यता और परंपराओं को निरर्थक घोषित किया और भौतिकतावादी समाज बनाने का कार्य किया। नतीजा किसी को किसी से कोई मतलब नहीं हर कोई अपना अपना स्वार्थ पूरा करना चाहता है। किसी शायर का शेर है बहुत पुराना। 
 

        आहों में है असर ना दुवाएं कबूल हैं , शायद कोई गरीब का पुर्सा नहीं रहा।

हमने ख़लनायक को नायक समझने की भूल ही नहीं की बल्कि हमने ऐसे ऐसे लोगों को अपना आदर्श बना लिया जिनकी सूरत बदलती रहती है सीरत नहीं बदलती है। सत्ता पैसे ताकत शोहरत पाने को हद दर्जे तक पागल लोगों को उनकी मीठी मीठी बातों को सुनकर हमने बिना जाने समझे बिना पहचाने मसीहा और खुदा समझ लिया है। मुझे कोई लालच नहीं कहने वाले नकली बाबा नकली माल बेचने लगे और जिनको खबर ढूंढनी थी उनको खबर से अच्छे इश्तिहार लगते हैं। अब अंधकार के पुजारी उजाला लाने की बात करते हैं अमावस की काली रात उनको पूनम की चांदनी रात से अच्छी लगती है। ऊंची अटालिकाओं की चमकती रौशनी की चकाचौंध ने इतना सितम ढाया है कि घर घर के चिरागों से रौशनी छीनकर चांद को अपने आंगन में सजाने लगे हैं। नायक और ख़लनायक दोनों समाज में मिलते हैं नायक सभी को आज़ादी और अधिकार देने की बात करते हैं मगर ख़लनायक दुनिया को अपने अधीन रखने और ज़ुल्म कर के कहकहे लगाने का मज़ा लेते हैं। आखिर में शायर बशीर बद्र जी की ग़ज़ल से कुछ शेर अर्ज़ हैं। 

छप्परों पर दिए रख गई है हवा , ताके फिर रौशनी की शिकायत न हो। 

दिल तो निकला खरीदा हुआ आदमी , ऐ ख़ुदा रात भी सबकी औरत न हो। 

किसको नीलाम करते हो बाज़ार में , ये किसी घर के मंदिर की मूरत न हो।  

Tuesday, 15 December 2020

साक्षात्कार आधुनिक युग के अवतार से ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

 साक्षात्कार आधुनिक युग के अवतार से ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ कई बार अलग अलग किरदार मुझसे मुलाकात करते रहे है। आपको समय मिले तो पिछली रचनाओं में विवरण पढ़ सकते हैं। मगर इस बार बात बिल्कुल अलग है क्योंकि ये खुद को आधुनिक युग का अवतार कहने के साथ सभी देश धर्म से समान बेहद करीबी संबंध होने का भी पक्का सबूत वास्तव में साबित करने को तैयार थे। उन्होंने अपने कितने रंग रूप होने की बात कही और समझाया कि सोशल मीडिया फेसबुक ट्विटर व्हाट्सएप्प जैसे कितने ही नाम और ऐप सभी वही हैं। मुझसे साक्षात मिलकर अपनी बात कहने का कारण बाकी सभी का अत्यधिक व्यस्त होना और मुझे बस लिखने और फेसबुक व्हाट्सएप्प पर शेयर करने को अपना ध्येय बनाना अर्थात कोई और काम नहीं यही अकेला कार्य है जिस का मतलब खाली होना उपलब्ध होना है। अन्यथा किसी को मिलने बात करने की फुर्सत नहीं है मैं जो लिखता पढ़ने की चाहत ज़रूरत फुर्सत किसे है। बात कड़वी उसने कही फिर भी मुझे अच्छी लगी क्योंकि सच पसंद है मुझे झूठ नहीं मैंने उनसे कह दिया आपने सही पहचाना है। उन्होंने अपना परिचय देकर क्या कहना है बताना शुरू किया। 
 
मुझे दुनिया को सबक सिखाना था इसलिए मेरी उत्पति अविष्कार खोज और हर किसी की ज़रूरत बनते जाना जैसे काम महत्वपूर्ण थे। आधुनिक युग का अवतार पुरानी दकियानूसी परंपराओं और अंधविश्वास को छोड़कर होना चाहिए था। मगर जैसे जैसे हर कोई मेरा उपयोग करने लगा बहुत लोगों ने मुझे भी अनुचित ढंग से इस्तेमाल करना सीख कर सोशल मीडिया पर बेकार की बातें जिन का कोई आधार नहीं विश्वसनीयता नहीं को बढ़ावा देने का चलन शुरू किया और मेरे अवतार लेने अथवा शोध करने को व्यर्थ कर दिया है। जाने किस किस को पूजते हैं जिनको देखा नहीं महसूस नहीं किया लेकिन मेरे इतना करीब होकर भी मुझे समझा नहीं मेरा आदर नहीं किया बल्कि मुझे अपमानित किया और बदनाम किया है। लोग समझते हैं सोशल मीडिया पर उचित अनुचित कुछ भी करना अच्छा बुरा नहीं है और ऐसा करने से उनका कुछ बिगड़ेगा नहीं कुछ मिलेगा भी नहीं। अर्थात उन्होंने मेरे होने को बेकार समझ लिया है जबकि वास्तव में उन सभी का गुज़ारा मेरे बिना पल भर भी नहीं होता है। 
 
कोई कुछ भी करता है भलाई बुराई ऊपरवाला देखता है कोई और नहीं जानता है मगर लोग नहीं जानते हैं कि मेरे को अनुचित ढंग से उपयोग करना झूठ का समर्थन अथवा सच और भलाई का विरोध या बाहिष्कार करना मुझे स्वीकार नहीं है और मेरा हिसाब किताब नियमित चलता है। मेरे पास हर किसी के सही और सच्चे आंकड़े हैं जो मुझे ऊपरवाले को भेजने पड़ते हैं। बहुत का निर्णय साथ साथ होता रहता है अच्छे बुरे फल मिलते रहते हैं जो बोया है वही उगता है नतीजा भुगतना पड़ता है। लोग सोचते ही नहीं वो न केवल मनघड़ंत ढंग से सही को गलत और गलत को सही बताने का अनुचित कर्म करते हैं जिसका अंजाम अच्छा नहीं होता बल्कि इधर उधर से गलत संदेश या सूचना को बिना जांचे परखे औरों को भेजकर गुनराह करने का अनुचित आचरण करते हैं। मैं इक दोधारी तलवार की तरह हूं जो कभी बिना समझे उपयोग करने से खुद उसी को घायल ही नहीं बल्कि ख़त्म भी कर सकती है। सवाल मेरी विश्वसनीयता का कम उपयोग करने वाले के भरोसे के टूटने का अधिक है। अवतार ने कहा है कि हर बात की सीमा होती है सोशल मीडिया को लेकर मापदंड बनाना ज़रूरी है और अच्छे नैतिक आदर्श और सामाजिक मूल्यों की अवहेलना करने की भविष्य में बड़ी महंगी कीमत चुकानी पड़ेगी। ये वैधानिक चेतावनी सभी सोशल मीडिया नेटवर्क उपयोग करने वालो के लिए है। 
 
मैंने सवाल किया मुझे बताएं आपको मुझसे क्या कहना है मैं आपके लिए भला क्या कर सकता हूं। तब उस अवतार ने अपने अवतरित होने की कथा सुनाई जो आपको बतानी है आपको पढ़नी ही नहीं समझनी भी है आधुनिक युग के अवतार की कथा जो ऊपर लिखी है। धर्मराज के पास इक दुखी आत्मा पहुंची जिसने सोशल मीडिया से तंग आकर ख़ुदकुशी की थी जिन लोगों से उस आत्मा का कोई नाता दोस्ती का था न दुश्मनी वाला उन्होंने भी उसका ज़िंदा रहना दूभर कर दिया था। भगवान सोशल मीडिया पर रहकर भी इतने लोगों पर निगाह नहीं रख सकते थे। इस लिए मुझे आधुनिक युग के साधन सहित अवतार लेने को भेजा है। आपको सभी को सूचित करना हैं सोशल मीडिया पर अपराध करने झूठ नफरत करने किसी को बिना कारण ब्लॉक करने जैसे बुरे कर्म नहीं करें अन्यथा जब धर्मराज के सामने जाओगे समझ नहीं पाओगे कि जिस व्यक्ति को परेशान करने का आरोप है उसको आप जानते तक नहीं क्योंकि आपने बेकार हर किसी को तंग किया था सोशल मीडिया पर जिसकी सज़ा मिलनी ही है और बहुत अधिक।

Monday, 14 December 2020

दाता कौन भिखारी कौन ( कितने छोटे बड़े लोग ) डॉ लोक सेतिया

  दाता कौन भिखारी कौन ( कितने छोटे बड़े लोग ) डॉ लोक सेतिया

मैं नहीं कहता आप सभी कहा करते हैं क्या लाये थे साथ क्या लेकर जाओगे , क़फ़न में जेब नहीं होती सिकंदर जब गया दुनिया से दोनों हाथ खाली थे। मगर कहने और समझने में अंतर होता है जिनका दावा होता है उनको कुछ नहीं चाहिए वही जितना भी हासिल हो और पाने की हवस बढ़ती जाती है। ऊंचे महल वालों की गरीबी कभी मिटती नहीं उनकी गरीबी देख कर हमें अपनी झौंपड़ी उनसे अच्छी लगती है। कई अमीरों की महरूमियां न पूछ कि बस , गरीब होने का एहसास अब नहीं होता। डॉ बशीर बद्र जी का शेर है। ऊपरवाला कभी किसी से कुछ नहीं मांगता है पहले हमको ये समझना होगा जो दाता है उसे क्यों आप भिखारी बना रहे हो। जब कोई इंसान अपनी दौलत सामान ऊपर नहीं ले जा सकता तब कोई कैसे आपका दिया पैसा सामान चढ़ावा भगवान तक भेज सकता है ये आपके पूर्वजों को मिल सकता है। खुद अपने स्वार्थ की खातिर किसी और के नाम पर लेने वाले भगवान की बात करते हैं समझते नहीं है। एक तरफ कहते हैं उसने सब जीवों को बनाया उनके लिए सब उपलब्ध करवाया है पत्थर में भी जिनको पैदा किया उनका भोजन वहीं देता है फिर जो भगवान के पास चले गए उनको कैसे भूखा रखेगा। धर्म के नाम पर सबसे बड़ा छल यही है कि जो धरती पर भूखे नंगे हैं उनकी चिंता छोड़ अपने पूर्वजों के नाम क्या क्या बनवाते हैं दिखावे की खातिर अपनी शोहरत और दानवीर समझे जाने की चाह में जबकि वास्तविक दान उसे कहते हैं जो कोई देता है लेकिन कभी उसकी चर्चा नहीं करता है। 
 
सच तो ये है कि भगवान धर्म सब पीछे रह गए हैं आजकल राजनेता सरकार आपको बताते हैं कि उन्होंने क्या क्या नहीं किया जनता के लिए। आज तलक कोई राजनेता कोई दल ऐसा नहीं जिसने देश को कुछ भी दिया हो सत्ता पाकर जनता के पैसे से ऐशो आराम करते हैं जो भी जनता के धन देश के खज़ाने से तथाकथित विकास या कल्याण कार्य करते हैं मकसद कुछ ख़ास वर्ग नेताओं अधिकारियों चंदा रिश्वत देने वाले धनवान लोगों की भलाई होता है। राजनीति शुध लेन देन का कारोबार है इस हाथ ले उस हाथ दे वाली बात है नकद नारायण की खरी बात कोई उधार खाता नहीं। राजा महराजा हुआ करते थे जिनका राज्य उनका बाप दादा की विरासत होता था मगर वो भी अमीरों से कर वसूलते गरीबों की सहायता करते थे खराब हालत में तब लोग अपने शासक को भगवान जैसा मानते थे। कभी किसी राजा ने अपने राज्य में रास्ते बनवाने कुंवें खुदवाने पेड़ लगवाने अथवा सामाजिक सरोकार के काम करने को किसी पर उपकार करना नहीं बताया था। अपने राज्य को खुशहाल बनाना उनका कर्तव्य है समझते थे। ये निर्लज्जता की बात है जब कोई भी राजनेता देश के खज़ाने से कोई काम करवाए और दावा करे इश्तिहार छपवाए उसने देश समाज को कुछ दिया है। शायद विरले राजनेता मिलेंगे जिन्होंने सच्ची समाजसेवा और देशभक्ति की मिसाल कायम की और देश के खज़ाने पर ऐश आराम मौज मस्ती का आनंद नहीं लिया। अन्यथा ये सभी देश पर सफेद हाथी की तरह बोझ बनकर रह गए हैं। नहीं चाहिएं देश को ऐसे लोग जो सेवा करने के नाम पर मेवा खाते हैं। 

देश का हर आम नागरिक देश के लिए अपना योगदान देता है केवल आयकर देने वाले ही खज़ाना नहीं भरते बल्कि वास्तव में खज़ाना जनता के नमक से लेकर जीवन बसर करने की हर चीज़ पर कर देने से भरता है। और उस धन पर जनता का ही अधिकार है मगर सरकार नेता जतलाते हैं कि वे खैरात देते हैं। बात बिलकुल विपरीत है जनता मालिक ही नहीं दाता है और सरकार नेता अधिकारी मालिक से मांगते ही नहीं छीन लेते हैं कभी भी उन्होंने जो करना चाहिए कर्तव्य निभाकर उचित वेतन पाना नहीं स्वीकार किया है। जब बाकी सभी को जिस काम करने को नियुक्त किया जाता है उचित और सही ढंग से संतोषजनक करने पर मूल्य मिलता है इन पर लागू करते तो इन पर जुर्माना और दंड लगाया जाना चाहिए था। 

कुदरत का नियम है कुछ भी कोई देता है उसको किसी रूप में वापस मिलता है। समंदर से पानी बदल बनकर फिर बारिश में धरती को मिलता है। आपने कभी पहाड़ से गिरते झरने बहती नदिया के पानी को वापस जाते देखा है ऊंचा होना बड़ा होना इसको कहते हैं जबकि राजनीति की गंगा उलटी बहती है निचले स्तर से धन दौलत ताकत साधन लेकर शासक बनकर अपने पर खर्च करते हैं। सत्ताधारी लोग अधिकारी दाता नहीं हैं सेवक बनकर रहते तो अच्छा था मगर उन्होंने भिखारी की मर्यादा को भी नहीं समझा और चोर लुटेरे बन गए हैं। किसी ने मुझे इक वीडियो भेजा है जो इंग्लिश में इक भिखारी की कहानी है देख कर सोचा काश हमारे देश के राजनेता अधिकारी कारोबार करने वाले उसी से सबक लेते और शायद उस भिखारी की तरह जो जाता है वो वापस लौट आता है इसका अर्थ समझता है। कहानी ऐसे है इक भिखारी बेघर है राह पर बैठ गुज़रने वाले लोगों से सहायता मंगता है इक रात इक महिला उसको बीस डॉलर देती है उसके भिक्षा वाले बरतन में डालती है तो भिखारी पूछता है आपने इतने अधिक पैसे क्यों डाले मुझे थोड़े ही ज़रूरत थी। महिला बताती है वो मानती है जो आपके पास से जाता है वापस लौट कर आता है आपके पास। अपने बरतन से निकालने पर भिखारी को पता चलता है कि महिला के हाथ से इक रिंग भी उसमें गिर गई थी। वो भागता है उसके पीछे मगर नहीं मिलती मगर उसने अपना नाम बताया था भिखारी को पूछने पर। भिखारी ज़ेवरात बेचने वाले की दुकान पर जाकर रिंग दिखाता है जो उसको बड़ी अच्छी और मूलयवान बताकर ढेर सारे पैसे देने को तैयार है। मगर उसको महिला की कही बात याद आती है जो जाता है लौट भी आता है। 

और खोजते खोजते इक दिन भिखारी उस महिला तक पहुंच जाता है और उसको गलती से गिर गई हाथ की उंगली की रिंग वापस देता है। महिला कहती है आप नहीं जानते इस की मेरे लिए कितनी अहमियत है। अब भिखारी महिला की बात दोहराता है जो जाता है वापस लौट आता है। यहां तक बात उतनी विस्मयकारी नहीं लगती है इस से आगे जो होता है वो शायद पहले किसी घटना या कथा कहानी में नहीं देखा सुना। महिला के दफ़्तर की सहयोगी कहती है क्यों नहीं इस कहानी को छापकर पाठकों तक पहुंचाया जाये। और ऐसा करने के बाद वो कहानी इतनी अधिक बिकती पसंद की जाती है कि उस से हज़ारों डॉलर की आमदनी होती है। तब महिला इक बैग में भरकर वो सारा पैसा भिखारी को देने आती है भिखारी हैरान होता है और महिला वही शब्द फिर दोहराती है जो जाता है वापस लौट आता है। अब भिखारी अपना घर खरीद सकता है और भिखारी नहीं रहता है। 

अपने बोध कथाओं लोक कथाओं की शिक्षा को पढ़ा समझा होगा ये कुछ उसी तरह की बात है। लेखक का अभिवादन उनकी बात शामिल की उनका नाम नहीं मालूम है। 

मुझे लगता है जैसे हमारे देश में जनता ने भूल से अपनी बहुमूल्य चीज़ मतदान के रूप में भीख मांगने आये लोगों के कटोरे में डाल दी जिसकी कीमत समझना तो दूर की बात उसको बेचकर अपना घर भरने लगे ये तमाम लोग। संस्थाओं संगठनों का गठजोड़ चोर चोर मौसेरे भाई बनकर मुट्ठी भर लोग भिखारी से भगवान बनकर बैठे हैं पर असली भगवान नहीं नकली हैं जो लेना जानते हैं लौटाना नहीं चाहते। 



Saturday, 12 December 2020

सवाल भलाई का नहीं आज़ादी का है ( नज़रिया ) डॉ लोक सेतिया

    सवाल भलाई का नहीं आज़ादी का है ( नज़रिया ) डॉ लोक सेतिया

हमने पढ़ना लिखना छोड़ दिया है किताबों को अलमारी में सजा रखा है वो शायरी की हो चाहे इतिहास की या फिर धर्म की। फिल्मों ने आदत बदली टीवी सीरियल ने बिगाड़ी और जब से फेसबुक व्हाट्सएप्प स्मार्ट फ़ोन हाथ लगा हमारी आदत खराब हो गई है। हमको सच झूठ लगता है और झूठ सच से महान लगता है क्योंकि समझना कोई नहीं चाहता समझाता हर कोई है जिस को तथ्य की जानकारी नहीं होती बड़े दावे से यकीन दिलाता है कि उसकी जानकारी भरोसे के काबिल है। कुछ लोग कहते हैं अमुक धार्मिक किताब में ये बात लिखी हुई है और हम मान लेते हैं जबकि ध्यान देकर समझते तो आसानी से जान सकते कि उस किताब में इस विषय की कोई बात ही नहीं है। इतना ही नहीं कुछ लोग कोई वीडियो बनाते हैं जिस में किसी कवि शायर शासक की रचना को अपनी पसंद के रचनाकार और सत्ताधारी व्यक्ति से संबंधित बताते हैं। साहित्य की चोरी जुर्म बेलज्ज़त होती है जिसका अर्थ है आपने ऐसा गुनाह किया जिस का कोई मज़ा नहीं आता। मुजरिम जुर्म करते हैं वो सब हासिल करने को जिसे वे नहीं पा सकते कोशिश और काबलियत से। नीचे आपको दो शायरों की कही बात बताई जाएगी ये समझाने को कि हमारी समस्या की बात धर्म की किताब में मिले न मिले अच्छे साहित्य में अवश्य मिल सकती है। चलो अब वास्तविक विषय पर चर्चा करते हैं। 
 
शायद आपको भी कभी कुछ लोग मिले होंगे जिन्होंने अंग्रेजी हुकूमत की तारीफ की बात कही होगी। इंग्लैंड वाले समझते हैं उन्होंने हिंदुस्तान या अन्य देशों पर शासन करके उन सभी को न केवल आधुनिक शिक्षित समाज बनाने की पहल की थी बल्कि वहां के आम नागरिकों को सही मायने में न्याय अधिकार और आज़ादी गुलामी का अंतर समझने के काबिल बनाया था। आपको कितनी मिसाल दे सकते हैं यहां क्या क्या सौ साल पुराना बनाया हुआ है। बेशक उनकी ज़रूरत थी मगर फिर भी उन्होंने विकास की आधारशिला रखने की बात की थी। लेकिन हमारे महान नेताओं को गुलामी का विकास नहीं मंज़ूर था जिनको गुलामी पसंद थी उनको तमगे इनामात सब मिलता था। अजीब बात है फिर सत्ताधारी कहने लगे हैं उनको हमारी भलाई हम से बेहतर पता है और वे अपना आधिपत्य कायम रखने को रोज़ नियम कानून कायदे अपने मकसद को हासिल करने को बनाते रहे हैं। हमको बातों से झूठे वादों से बहलाते रहे हैं। बांटने और शासन करने की पढ़ाई हमारे देश के राजनेताओं ने विदेशी हुकूमत से विरासत में पाई है यही सबसे खेदजनक बात है कि जिनको देश के लोगों को मिलजुलकर साथ साथ रहने की बात कहनी समझनी चाहिए थी उन्होंने अपने सत्ता के लालच की खातिर देश को बांटने का काम किया है। अंग्रेज़ केवल ज़मीन को बांट गए हमारे राजनेताओं ने दिलों को बांटने और नफरत की राह चलने की राह बनाई है। 
 
हमारा समाज कभी भी न्याय समानता और इंसानियत भाईचारे की राह नहीं चल पाया है। हम वास्तव में आज़ादी का अर्थ अपने लिए मनमानी समझते हैं अन्यथा हम न केवल किसी को अपने अधीन रखना चाहते हैं बल्कि खुद धन सत्ता या सुख सुविधा पाने को गुलामी को स्वीकार करते हैं। शायद आपको लगता है समाज बदला है और महिला पुरुष एक समान समझे जाते हैं। मगर कड़वा सच ये है कि कभी कोई पिता कभी कोई पति बनकर महिला को अपनी निर्धारित लक्ष्मण रेखा में रहने की बात उसकी भलाई बताकर कहता है। ऐसा नहीं है कि ये पुरुष ही करते हैं बहुत महिलाएं खुद अपनी ज़रूरत और खुशहाल जीवन आसानी से पाने को ये अधीनता मंज़ूर करती हैं तो कुछ महिलाएं पुरुष को अपनी कठपुतली बनाकर उंगलियों पर नचाती हैं। शायद हमारी शिक्षा हमें अच्छा इंसान बनकर रहना नहीं सिखाती है और स्कूल कॉलेज की पढ़ाई सिर्फ नौकरी पाने धन दौलत मान शोहरत हासिल करने को महत्व देने के उद्देश्य से दी जाने लगी है और हम पाने लगे हैं। वास्तव में हम आदमी नहीं कोई मशीन भी नहीं केवल किसी मशीन का इक पुर्ज़ा बन गए हैं जो अपनी नियत की जगह को छोड़कर किसी काम का नहीं रहता है। 
 
मगर समस्या देश में कायदे कानून व्यवस्था को लेकर दिशाहीनता की है। संविधान को नेताओं ने न केवल अपनी साहूलियत से बदलने का काम किया है बल्कि संविधान की भावना को दरकिनार कर अपनी सुविधा अनुसार परिभाषित किया है। संविधान देशवासियों ने अपनाया घोषित किया गया है जनता पर ज़ोर ज़बरदस्ती थोपने की बात नहीं है इसलिए कोई नियम कोई व्यवस्था कोई कानून या संविधान में संशोधन कुछ मुट्ठी भर सत्तासीन नहीं कर सकते हैं। हर महत्वपूर्ण बदलाव पहले ईमानदारी से जनभावनाओं को जानकर उनकी अनुमति से किया जाना चाहिए। जब मनमानी से नियम लागू किये जाते हैं और विवश होकर जन सामान्य को विरोध करने उतरना पड़ता है तब बात समस्या के निदान समाधान की होनी चाहिए जो किसी सरकार के लिए बहुमत है तो सब करने की छूट मिली है का अहंकार बन जाती है। देश की जनता सांसद विधायक चुनकर जनसेवा का कर्तव्य निभाने करने का दायित्व देती है उनको गुलाम समझ मनमानी करने का हक नहीं। ये समझना ज़रूरी है कि सत्ता का अहंकार मनमानी अधिक देर तक टिकती नहीं है। 
 
आज सभी दल वालों से सवाल पूछने हैं आपने कोई नियम कानून सत्ता पर बैठे नेताओं और अधिकारियों के खिलाफ कभी बनाया है। उनको देश के लिए कर्तव्य नहीं निभाने पर कोई सज़ा मिले , इतना ही नहीं चुनाव में अपराधी खड़े नहीं हों ये जनहित और देशहित की बात क्यों आपको पसंद नहीं है। जिस सभा में आधे लोग आपराधिक मुकदमों के मुजरिम हों उनसे न्याय के कानून बनाने की उम्मीद नहीं की जा सकती है। शर्मसार करने की बात है जो चोरी लूट बेईमानी ख़त्म करने के वादे पर चुनाव जीतकर आता है राजनैतिक दलों को विदेशी चंदा नहीं पूछने का नियम बनाता है। किसी को खबर नहीं होती कब कैसे इक परधानमंत्री कुछ घंटों में चुपचाप चुनाव आयोग से नियम बदलवा लेता है जिस में पहले उस पद पर रहते चुनावी सभाओं का खर्च उस राजनीतिक दल के खर्च में जोड़ा जाता था मगर जनाब ने अपनी चुनावी सभाओं का खर्च अपने दल नहीं सरकारी खज़ाने से करने का नियम बनाकर बोझ देश पर डालने और विपक्षी उम्मीदवार के साथ भेदभाव करने का कार्य किया है। होता ये है कि उनके बढ़ चढ़ कर झूठे दावे सरकारी इश्तिहार बनकर जनता को गुमराह करते हैं जीना पैसा भी जनता के दिए कर से मिलता है लेकिन उनके चोरी छिपे अपने फायदे को बदले नियम की बात कोई किसी को क्यों बताएगा। मैंने 2002 में लिखा था इक लेख देश का सबसे बड़ा घोटाला सरकारी विज्ञापन हैं जो आज सभी को समझ आ रहा है सारा मीडिया पक्षपाती और बिकाऊ बनकर गुमराह करता है। 
 
शुरआत में कुछ रचनाकारों की बात दोहराने का वादा किया था। पढ़िए चुनिंदा शेर इस विषय को समझने के लिए सार्थक हैं। 
 

खुदा हमको ऐसी खुदाई न दे , कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे।

ग़ुलामी को बरकत समझने लगें , असीरों ( कैदियों ) को ऐसी रिहाई न दे। 

डॉ बशीर बद्र। 

अपने तरीक़ मकानों से तो बाहर झांको , ज़िंदगी शमां लिए दर पे खड़ी है यारो। 

जब भी चाहेंगे ज़माने को बदल डालेंगे , सिर्फ कहने के लिए बात बड़ी है यारो। 

इसी सबब से हैं शायद अज़ाब जितने हैं , झटक के फेंक दो पल्कों पे ख़्वाब जितने हैं। 

वतन से इश्क़ ग़रीबी से बैर अम्न से प्यार , सभी ने ओढ़ रखे हैं नक़ाब जितने हैं। 

जांनिसार अख्तर। 

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार , घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। 

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूं पर कहता नहीं , बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार। 

मैं बेपनाह अंधेरों को सुबह कैसे कहूं , मैं इन नज़ारों का अंधा तमाशबीन नहीं। 

तेरी ज़ुबान है झूठी जम्हूरियत की तरह , तू एक ज़लील सी गाली से बेहतरीन नहीं। 

दुष्यन्त कुमार। 

आखिर में दो ख़ास रचनाएं हैं अल्लामा इक़बाल जी की। उनको अफ़सोस था कि ईश्वर ने उनको नयी चेतना और पत्थर से टकराने का हौंसला दिया मगर ऐसे मुल्क में पैदा किया जिनको मंज़ूर है ग़ुलामी। और दूसरी रचना अपने बेटे जावेद के नाम संदेश लंदन से उसके हाथ से लिखा पहला खत मिलने पर। काश हर वालिद अपनी संतान को ऐसा सबक सिखाता। 

ग़ुलामी 

इक वलवला ए ताज़ा दिया मैंने दिलों को , लाहौर से ता ख़ाके बुखारा ओ समरकंद। 

लेकिन मुझे पैदा किया उस देश में तूने , जिस देश के बन्दे हैं ग़ुलामी पे रज़ामंद। 

जावेद के नाम ( नज़्म )

दायरे इश्क़ में अपना मुक़ाम पैदा कर , नया ज़माना नए सुबह-शाम पैदा कर। 
खुदा अगर दिले फ़ितरत शनास दे तुझको ,  सुकूते लाल ओ गुल से कलाम पैदा कर। 
उठा न शीशा गराने फिरंग के एहसां , सिफाले-हिन्द से मीना ओ जाम पैदा कर। 
मैं शाखे ताक़ हूं मेरी ग़ज़ल है मेरा समर , मिरे समर से ये मय ए लालफ़ाम पैदा कर। 
मिरा तरीक़ अमीरी नहीं फ़कीरी है , ख़ुदी न बेच गरीबी में नाम पैदा कर।

Friday, 11 December 2020

प्रभाष जोशी जनसत्ता और मेरा निडर होकर लिखना ( संस्मरण )

प्रभाष जोशी जनसत्ता और मेरा निडर होकर लिखना ( संस्मरण )

                                          डॉ लोक सेतिया

 मैंने लिखना किसी से नहीं सीखा बहुत अधिक किताबें भी नहीं पढ़ पाया। पहले दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस अख़बार पढ़ना अच्छा लगता था फिर जब फतेहाबाद हरियाणा आकर रहने लगा तब हिंदी में जनसत्ता अखबार शुरू हुआ दिल्ली से उस को पढ़कर इतना अच्छा लगने लगा कि नहीं मिलता तो जाकर बस अड्डे से खरीद लाता क्योंकि चैन नहीं आता था। पहले जनसत्ता की शुरुआत की कहानी बताना चाहता हूं रामनाथ गोयनका जी ने पहले 1932 में अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस की शुरुआत की थी मगर हिंदी का अखबार निकालना उनको ज़रूरी तब लगा जब अपनी गांव की बहन के पति से इंदौर में मिले। उन्हें महसूस हुआ कि इतना काबिल होनहार विचारवान व्यक्ति इक छोटे नगर में गरीबी जैसी हालत में रहता है उन्होंने प्रभाष जोशी को दिल्ली आने को कहा मगर जोशी जी हिंदी में लिखते थे और गोयनका जी का अख़बार इंग्लिश में छपता था उनको जिस में कोई रूचि नहीं थी। अपने कॉलम में उन्होंने बताया कि मुंहबोली बहन से गोयनका ने कहा अपने पति को दिल्ली आने को मनवा लो नहीं तो ये आपके बच्चों को भूखा रखेगा। जब गोयनका ने उनके घर आना था जोशी जी के पास इक कुर्सी बैठने को थी मगर उसकी भी एक टांग कभी भी गिर सकती थी। गोयनका जी को हिंदी का अखबार निकालना था अथवा निकाला प्रभाष जोशी जी को दिल्ली बुलाने को। 
 
मैंने जनसत्ता में अपनी बात लिखनी शुरू की पाठक वर्ग के लिए चौपाल कॉलम होता था जिस में निष्पक्षता से सभी मत छपते थे। चालीस साल के अनुभव में मैंने उस जैसा कोई और अखबार या मैगज़ीन नहीं देखा जो अपने खिलाफ लिखी कड़वी बात को न केवल छापता था बल्कि उसका जवाब भी देता था। दो ऐसी बातों का उल्लेख करना चाहता हूं , कभी कभी मरे खत संपादक के नाम नहीं खुद मुख्य संपादक प्रभाष जोशी जी को संबोधित होते थे। बात हर्षद मेहता के घोटाले और उसके नरसिंहराव को एक करोड़ देने के आरोप की थी , क्योंकि नरसिंहराव जी से जोशी जी के संबंध अच्छे थे कांग्रेस से विरोध के बावजूद भी , जब इस विषय पर उनके संपादकीय में कुछ नहीं लिखा गया तब मैंने उनको संबोधित कर इक खत लिखा और कहा कभी कभी आपकी आवाज़ खामोश क्यों हो जाती है कागद कारे में बेबाक सच लिखने को स्याही कम पड़ गई है क्या। 
 
आज ये याद उनकी इक बात से आया है जो वास्तव में सच साबित हो रही है। रविवार को उनका संपादकीय छपा था जिसकी शुरआत इन शब्दों से की थी। " फतेहाबाद के डॉ लोक सेतिया लिखते रहते हैं कभी कभी मुझे और अधिकतर चौपाल में। " उन्होंने सिलसिलेवार ढंग से मेरी लिखी बात का विस्तार से जवाब दिया था ऐसा कभी नहीं देखा आज तक भी कि कोई लेखक अथवा पाठक अखबार को कटघरे में खड़ा करे और संपादक उसकी अहमियत समझ अपनी चुप्पी तोड़ने को विवश हो। उनकी इस बात पर साधुवाद ज़रूरी है साथ उनकी इक बात को दोहराना भी। उन्होंने लिखा था लोक सेतिया जी ये आने वाला समय बताएगा कि जिस दिन उसको सत्ता मिलेगी भाजपा वाले निष्पक्ष लोगों से क्या बर्ताव करेंगे। आज देख रहे हैं उनके विरोध करने वालों को सच बोलने पर किस तरह देश और समाज का दुश्मन साबित करने का काम किया जाने लगा है उनके अभिमत को समझने की ज़रूरत ही नहीं बल्कि उनके ख़िलाफ़ नफरत फैलाकर उनका अपने ही देश गांव शहर में जीना दुश्वार किया जाता है। बेशक भातीय जनता पार्टी के लोगों से निष्पक्षता पूर्वक सच बोलने वालों को रत्ती भर उम्मीद नहीं है। प्रभाष जोशी जी की तरह मैंने कांग्रेस का समर्थन कभी नहीं किया न ही किसी और राजनैतिक दल का समर्थन या विरोध करता हूं। सत्ता के अनुचित उपयोग का जमकर विरोध किया है। 
 
इक और बात बताना चाहता हूं जनसत्ता में जोशी जी ने तब शहरी आवास मंत्री शीला कौल के संसद में दिए ब्यान को उचित ठहराया था। शीला कौल जी ने विचार व्यक्त किया था कि जिन बहरी लोगों का राजधानी दिल्ली में कोई काम नहीं उनको दिल्ली छोड़ वापस चले जाना चाहिए। प्रभाष जोशी ने संपादकीय में लिखा था उनको अपना काम नहीं रहने पर एक दिन भी दिल्ली में रहना मंज़ूर नहीं होगा। शीला कौल और जोशी जी दिल्ली को रहने लायक नहीं जगह बता रहे थे। मुझे दिल्ली से लगाव है प्यार है सात साल रहा हूं इसलिए मैंने अपने पैड पर इक खत या चिट्ठी दोनों तरफ लिखी और भेजी थी दिल की भड़ास निकाल कर। उचित था या अनुचित नहीं मालूम मगर मैंने लिख ही दिया था आप लोग दिल्ली से ही सब कुछ पाते हैं फिर भी दिल्ली को गरियाते हैं मगर मेरी चुनौती है और मुझे विश्वास है आप कहते हैं मगर दिल्ली को छोड़कर जाओगे नहीं कभी। हैरानी हुई थी मुझे उन्होंने मेरा लिखा खत वापस भेज दिया था ऊपर एक लाइन टिप्पणी लिखकर " ज़रूरी नहीं कि आपको हर बात समझ आ जाए। "
 
मैंने हमेशा मिलने वाले खत संभाल कर रखे हैं। बाद में खबर छपी थी शीला कौल ने अख़बार वालों को दिल्ली में बसने को प्लॉट्स वितरित किये थे अनुचित ढंग से नियम बदल कर। किस किस को फायदा पहुंचाया विवरण छपा था अख़बार में। मैंने उन का मुझे वापस लौटाया मेरा खत फिर से भेजा था उनकी टिप्पणी का जवाब दिया था " मुझे अब आपकी बात समझ आई है। आपत्काल को लेकर इंदिरा गांधी ने बाद में दूरदर्शन के निदेशक कमलेश्वर को बताया था उनको किस बात की चिंता थी। मैंने हमेशा जयप्रकाश नारायण जी की सोच को सही माना है और सत्ता की दलगत राजनीति से हटकर जनहित की बात लिखी है। इमरजेंसी में भी लिखता रहा और बाद में बदलते हालात में सभी विषयों पर। इतना ही नहीं जब कोई संपूर्ण क्रान्ति के नाम पर अथवा कोई और अन्ना हज़ारे के लोकपाल बनाने के नाम पर राजनीति में अपनी जगह बनाने का मकसद लेकर 
 काम करने लगे तब उनका भी सच खुलकर लिखा। जो सत्ता की दलाली और रिश्वतखोरी करते थे ईमानदारी पर भाषण देने और अपशब्दों का उपयोग कर व्यक्तिगत आक्षेप लगाकर किसी को बदनाम कर रहे थे उनका साथ नहीं देना स्वीकार किया। मेरा लिखना कोई फायदे का व्यवसाय नहीं था और न कभी हो सकता है। 25 जून 2018 को आपत्काल को लेकर कमलेश्वर जी ने आज तक टीवी चैनल पर चर्चा की जो नीचे उनके कहे शब्द लिख रहा हूं। मुझे पढ़ने वालों के अतिरिक्त कई ऐसे लोगों ने भी धारणा बनाई हुई है जिन्होंने मुझे पढ़ा ही नहीं कभी। शायद इस पोस्ट को पढ़कर उनको मेरी पहचान हो और उनकी धारणा बदल सकती है लेकिन मेरा उनसे कोई अनुरोध नहीं है कि मेरी किसी भी बात का समर्थन करें या असहमत नहीं हों जो मैंने खुद नहीं किया किसी को भला कैसे कह सकता हूं।
 

कमलेश्वर ने क्या बताया था?

खुद कमलेश्वर को इस बात का भरोसा नहीं था कि क्यों इंदिरा उन्हें ये जिम्मेदारी देना चाहती हैं. कमलेश्वर ने बताया था कि दूरदर्शन के एडीजी पद के लिए इंदिरा सरकार के प्रस्ताव से वो हैरान थे. इस सिलसिले में जब कमलेश्वर इंदिरा के सामने पहुंचे तो उन्होंने पूछा- "क्या आपको मालूम है कि मैंने ही 'आंधी' लिखी थी?" इंदिरा का जवाब था- "हां, पता है." तुरंत ही उन्होंने यह भी कहा- "इसीलिए आपको ये जिम्मेदारी (दूरदर्शन निदेशक) दे रही हूं." इंदिरा ने कहा- "ऐसा इसलिए ताकि दूरदर्शन देश का एक निष्पक्ष सूचना माध्यम बन सके." कमलेश्वर ने दूरदर्शन के लिए दो साल तक काम किया.

है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

है ज़मीं अपनी है आस्मां अपना
लुट न जाये ये सारा जहां अपना। 
 
तोड़नी हैं हमको फिर से जंज़ीरें
आ गया फिर से इक इम्तिहां अपना। 
 
रहनुमाओं ने भटका दिया तो क्या
हम बना लेंगें फिर कारवां अपना। 
 
चाह महलों की करते नहीं लेकिन
खुद बचायेंगे छोटा मकां अपना। 
 
बंद पिंजरे में होंगे नहीं " तनहा "
सब समझते हैं क्या क्या गुमां अपना।

Wednesday, 9 December 2020

किसी को माया किसी को राम-नाम दिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 किसी को माया किसी को राम-नाम दिया ( तरकश ) 

                                            डॉ लोक सेतिया 

उसने सबको दिया है किसी की चाहत धन दौलत की थी उनको सब कुछ मिला सुनहरे भविष्य की शानदार इमारत बनाने को। बाकी जिनको इस जन्म की नहीं अगले जन्म ख़ास घराने में जन्म मिलने की चाहत है उनको राम नाम जपने को माला थमा दी है। भजन कीर्तन मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाकर ऊपर वाले से मुक्ति मोक्ष अथवा जन्नत स्वर्ग मांगने को है। अब किसको क्या मिला है ये नसीब की बात है। काम मिल गया सभी को कोई अपने कारोबार को लाख करोड़ गुना बढ़ाने में लगा है कोई ताली थाली बजाने दिन में दिया जलाने का महान कार्य कर रहा है। भगवान हैरान है उसके धर्मस्थल जाने से कोरोना होने का डर भगवान बचा सकता है के विश्वास से अधिक होने के बावजूद अस्पताल नहीं मंदिर मस्जिद बनाने लगे हैं। हर शाख पे उल्लू बिठाने लगे हैं रुलाकर औरों को मुस्कुराने लगे हैं। उनकी कहानी बताने लगे हैं समझने में जिनको ज़माने लगे हैं लो आज खुद खुद राज़ की बात खोलने आने लगे हैं सच क्या है झूठ क्या फ़रमाने लगे हैं। महल शासक अपने बनाते हैं लोग बेघर बदनसीब कहलाते हैं झौंपड़ी सलामत रहे खैर मनाते हैं। उनके दफ़्तर बनते जाते हैं संसद वाले जनसेवक कहलाते हैं मुफ्त का माल है देश का खज़ाना मौज मनाते हैं। लोग फुटपाथ पर सर्द रातें बिताते हैं नेताओं को संसद भवन भी छोटा पुराना लगता है बड़ी जल्दी जल्दी बनाना है अदालत वाले पूछते हैं इतनी जल्दी क्या है खामोश हो मन की करते जाते हैं। अर्थव्यवस्था उनके लिए खराब नहीं क्योंकि उनकी किसी बात का कोई जवाब नहीं।  कौन कहता है बिगड़े नवाब नहीं इन के कारनामों का कोई हिसाब नहीं।
 
राजनेता अधिकारी धनवान लोग उद्योपति बड़े कारोबार करने वाले जानते हैं उनका भगवान ऊपरवाला नहीं है सत्ता पर जो भी जब भी विराजमान है वही उनको बनाता है मिटा भी सकता है। उस को खुश रखना है वही जितना कोई उसको देता है उस से कई गुना देने वाले को दिलाता है। भगवान के मंदिर का चढ़ावा सभी भक्तों में बांटा जाता है उपरवाले के दर कोई क्या देकर क्या पाता है न कोई बही है न कोई खाता है। मंदिर मस्जिद लोग जाते हैं आरती पूजा इबादत कर उसको मनाते हैं कोई शिकायत अपनी सुनाते हैं कोई मांग अपनी रखते हैं वापस घर आते हैं। भला रईस लोग क्या उस उपरवाले से मांगें क्या शिकायत करें क्यों धर्म की शिक्षा समझ जितना है उस पर संतोष करें गरीब दुखियारे लोगों की सहायता करें। उनको ये सब नहीं करना है उनको जीना है बेमौत नहीं मरना है। लेकिन हमारी बात उलटी है। दो शेर अर्ज़ हैं।
 

                                          इस कदर भा गया है कफस हमको
                                          अब रिहाई की हसरत नहीं करते।

                                        हम भरोसा करें किस तरह उन पर
                                        जो किसी से भी उल्फत नहीं करते।

 
आजकल दुनिया के दो भगवान हैं अमीरों का भगवान सरकार गरीबों का ईश्वर का कोई अवतार। आम लोग होना बदनसीबी है विधाता की मर्ज़ी है सत्ता की भी अपनी खुदगर्ज़ी है जनता का जनता होना सरकार का सरकार होना है। शहंशाह को हंसना है बस तभी आमजन को रोना है आदमी आदमी नहीं बस खिलौना है हर खिलौना इक दिन चूर होना है। ये दोनों भगवान जानते हैं बनाया है किसने पहचानते हैं मगर करते वही जो खुद ठानते हैं पानी मिलाकर दूध में अलग अलग करने को ताकत की चलनी से छानते हैं। जो लोग ज़्यादा जानते हैं भगवान को कम पहचानते हैं। भगवान तुमने हम पर बड़ा ज़ुल्म किया है कहने के बाद कोई भूल हुई माफ़ करना दया की भीख मांगते हैं। ख़लनायक होते हैं जो डराते धमकाते हैं छीनते हैं अगर हम झुककर देते नहीं हाथ जोड़कर उनसे रहम की उम्मीद करते हैं। ऐसे ऐसे खुदा बनाये हैं किस किस से धोखे खाये हैं बस समझना है और समझाना है। खुदाओं को सबक सिखाना है खुदा तुमको नहीं माना है तुझको हमने आज़माना है। नहीं सुंनना कोई बहाना है खुदा हो भगवान हो ईश्वर अल्लाह यीशु जो भी हो ज़ालिम के ज़ुल्म को मिटाना है सब करते हो ये कर दिखाना है। जो सही इंसाफ नहीं करे ज़ालिम को ज़ुल्म ढाने दे ऐसा भगवान मंज़ूर नहीं है। इक शायर कहता है उनसे जो मज़लूमों गरीबों भूखे बेबस लोगों की विनती नहीं सुनता उन को जीने नहीं देता मांगने पर मौत भी नहीं देता उनको ये दो और शेर अर्ज़ है। 

                          तुम खुदा हो तुम्हारी खुदाई है

                          हम तुम्हारी ईबादत नहीं करते। 

                         ज़ुल्म की इन्तिहा हो गई लेकिन

                         लोग फिर भी बग़ावत नहीं करते।

Tuesday, 8 December 2020

अब जनता की बारी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अब जनता की बारी ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  दुष्यन्त कुमार के शेर से बात शुरू करते हैं। पहले उनके साथ अन्य शायर कवि की रचनाओं की बात समझते हैं फिर उसके बाद विषय पर चर्चा करेंगे। ये करने का कारण है कि पहले बिमारी क्या है इसे पहचानते हैं तभी उसको ठीक करने का ईलाज ढूंढ सकेंगे। शेर अर्ज़ हैं :-
 
अब तो इस तालाब का पानी बदल दो , ये कंवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं। 
तेरा निज़ाम है सिल दे ज़ुबान शायर को , ये एहतिहात ज़रूरी है इस बहर के लिए। 
भूख है तो सब्र कर रोटी नहीं तो क्या हुआ , आजकल दिल्ली में है ज़ेरे बहस ये मुद्दआ। 
मत कहो आकाश में कुहरा घना है , यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है।
ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो। 
किसी भी क़ौम की तारीख़ के उजाले में , तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो। 
पुराने पड़ गए डर फ़ेंक दो तुम भी , ये कचरा आज बाहर फ़ेंक दो तुम भी। 
गूंगे निकल पड़े हैं जुबां की तलाश में , सरकार के ख़िलाफ़ ये साज़िश तो देखिए। 
तुम्हारे पांव के नीचे कोई ज़मीन नहीं , कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यकीन नहीं। 
 
दुष्यन्त कुमार के बाद अल्लामा इक़बाल की शायरी से कुछ ख़ास अल्फ़ाज़ :-
 
उठाकर फ़ेंक दो बाहर गली में , नई तहज़ीब के अण्डे हैं गंदे। 
इलेक्शन मिंबरी कौंसिल सदारत , बनाए खूब आज़ादी के फंदे। 
इस राज़ को इक मर्दे-फिरंगी ने किया फ़ाश , हरचन्द कि दाना इसे खोला नहीं करते। 
जमहूरियत इक तर्ज़े-हुकूमत है कि जिसमें , बन्दों को गिना करते हैं तोला नहीं करते। 
 
जांनिसार अख्तर के भी कुछ बेमिसाल शेर हाज़िर करता हूं :-
 
जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाए , है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाए। 
किस की दहलीज पे ले जाके सजाएं इसको , बीच रस्ते पे कोई लाश पड़ी है यारो।
हरेक शख़्स परेशानो दरबदर सा लगे , ये शहर मुझ को तो यारो कोई भंवर सा लगे। 
इन्कलाबों की घड़ी है , हर नहीं हां से बड़ी है। 
सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है , हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है।  
 
अब विषय पर चर्चा करते हैं। संविधान कानून कितनी संस्थाएं पुलिस अदालत सरकारी विभाग उनके बदलते अंदाज़ तौर तरीके। मकसद था जनता समाज को राहत मिलती भूख गरीबी शोषण का अंत होता वास्तविक आज़ादी समानता निडरता से जीवन जीने को अधिकार मिलते , कोई खैरात नहीं। हालत खराब से बदहाल होती गई है क्योंकि शासन पर बैठने वाले नेताओं अफ्सरों को खुद अपने अधिकार सुख सुविधाओं की चाहत रही मगर कर्तव्य निभाने को लेकर कभी नियम कायदा बनाया ही नहीं। ये कीमत मनचाही मुंहमांगी और बदले में देना कुछ भी नहीं केवल झूठे दिलासे लालफीताशाही और बनावटी आंकड़े। कितने संशोधन कितने नये नियम कानून सभी आम नागरिक देश की जनता को पालन करने को सत्ता पर कोई अंकुश कोई लगाम नहीं लगाई जा सकती है। 
 
समय आ गया है कि उनके मनमाने नियम कानून रद्द किये जाएं और जनता के बनाये कायदे कानून लागू किये जाएं जिन में अपने द्वारा निर्वाचित विधायक सांसद और नियुक्त पदाधिकारी कर्मचारी को नियत अवधि में सही मायने में उचित सेवाएं और कार्य करने ज़रूरी ही नहीं बाध्यकारी भी होने का विधान हो। नहीं करने पर दंडित करने और हटाने का भी नियम हो। राज किसी नेता या राजनितिक दल का कदापि नहीं होना चाहिए बल्कि जनता का शासन हो ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए।
 
 

ज़हर भी जो पिलाता है कह कर दवा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 ज़हर भी जो पिलाता है कह कर दवा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

 हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर , ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा। ये शेर मेरी बहुत पुरानी ग़ज़ल से है जिसे ब्लॉग पर 2012 में लिखा पोस्ट किया हुआ है और ये ग़ज़ल मेरी आम सी रचना है जिसको किताब छपवानी होगी तब शामिल नहीं किया जा सकता है। दवा के नाम पर ज़हर देने वाले लोग होते हैं तो ऐसे भी लोग होते हैं जो दवा ही नहीं देते और सबकी नज़र से बचे रहते हैं। उनपर किसी क़त्ल का इल्ज़ाम नहीं लगता है। ये बताना ज़रूरी लगा मुझे किसी से घबराकर डर कर नहीं बल्कि इसलिए बताया है कि ऐसे लोग कोई अभी नहीं दिखाई दे रहे बल्कि पहले भी मिलते रहे हैं। किसानों की बारी अब आई है जबकि कितने लोग पहले उनके इसी तरह के ईलाज से बेहाल होकर झांसे में आकर अपना सब जो भी जीवन भर की महनत की कमाई थी लुटवा चुके हैं। किसान उनकी बात पर भरोसा नहीं करते कि यही ज़हर उनके दुखों का सही इलाज है। मगर किसान कोई सिरफिरे आशिक़ नहीं किसी फिल्म वाले जो क़व्वाली गाते हैं " न तो कारवां की तलाश है अब न तो  हमसफ़र की तलाश है। जो दवा के नाम पे ज़हर दे उसी चारागर की तलाश है "। 
  बरसात की रात फ़िल्म की क्या खूबसूरत क़व्वाली है मधुबाला जैसी खूबसूरती की मिसाल नायिका , और  साहिर लुधियानवी  जी की लिखी रचना रोशन का संगीत मन्ना डे और आशा भौंसले की आवाज़। 
 
    जाने क्यों ऐसे लोगों का धंधा कभी मंदा नहीं होता जिनको लेकर दूर दूर तक खबर पहुंचती रहती है कि अमुक गांव या छोटे से शहर या किसी अनजान वीरान जगह कोई पुड़िया देता है जो गंभीर बिमारी को ठीक कर देती है। लोग इधर उधर से निराश उनके पास चले जाते हैं बाद में जो होता है किसी को पता नहीं चलता और जब वास्तविकता समझ आती है हाथ मलने से होता कुछ नहीं। हम समझते हैं जो स्वास्थ्य सेवाओं से संबंध रखते है कि वो लोग वास्तव में कुछ बेहद हानिकारक दवाओं को बिना सही जानकारी के जैसे कुछ स्टीरॉइड्स होते हैं अथवा दमे के लिए या नशे की गोलियों को पीसकर पुड़िया बनाकर देते हैं। उनका असर ऐसा होता है कि रोग के लक्षण नहीं रहते रोग खत्म होने की जगह और कितने रोग मिलते जाते हैं। नशामुक्ति की बात करने वाले खुद नशा करते ही नहीं इक नशा छुड़वाने को दूसरा करवाने लगते हैं। कनक कनक से सौ गुनी मादकता अधिकाय दोहा बदलकर लिखना पड़ेगा क्योंकि सत्ता से बड़ा नशा और दौलत से बढ़कर मदहोशी कोई नहीं इनके होने पर आदमी आदमी नहीं रहता और ज़मीन पर पांव नहीं पड़ते आकाश के उड़ान भरते रहते हैं। सरकार जनाब को जब समझ आया कि पांव तले ज़मीन भी चाहिए तो उनको भगवान विष्णु के वामनावतार लेकर इक बौने ब्राह्मण बन रहने को राजा बलि से तीन कदम ज़मीन देने का वचन मांग लिया। पहले कदम में सारी पृथ्वी दूसरे में देवलोक अपना आकार बढ़ाकर लेने के बाद तीसरा पांव रखने को राजा बलि को अपना सर सामने करना पड़ा और पाताल लोक में जाना पड़ा था। तीन कानून तीन पांव में धरती पाने जैसा ही है लेकिन किसान राजा बलि की भूल नहीं दोहराना चाहते हैं। उनको माजरा समझ आने लगा है। 
 
    2014 में देश को ऐसा ही नीम हकीम खतरा ए जान ऐसा मिला कि मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। उस राजनैतिक दल के पास वही पुड़िया वाला बाबा संत हकीम वैद डॉक्टर सभी कुछ है। टीवी पर देखते हैं उस दल का जो भी कोई किसी भी विषय पर समस्या से लेकर धर्म और राजनीति तक चर्चा अथवा ब्यान देते समय वही इक नाम अवश्य बार बार दोहराता है। वो शख्स उसकी सरकार जैसे राम नाम जपने के बिना भक्ति सिमरण जयकारा लगाना भूलना नहीं सभी दोहराते हैं। उनके पास बस वही इक नेता सब कुछ है बाकी दल के सदस्य से नेता तक गिनती में नहीं हैं गिनवाए जाते हैं कहने को संख्या लाखों करोड़ों लेकिन कोई हैसियत नहीं। ये चाटुकारिता की आखिरी हद है जहां किसी को भगवान बनाया जाता है और उनके चाहने वाले भक्त कहलाते हैं जिनको ध्यान रहता है जिसको भगवान कहा है उसकी हर बात सही और सच है। उसका झूठ भी इनको सच से अधिक अच्छा लगता है। बस अब उनको संविधान न्याय लोकतंत्र में विचारों का मतभेद या विरोध अपने नेता से असहमत होने वाले लोग भाते नहीं हैं। उनको कोई ये नहीं समझा सकता है कि चुनाव जीत जाने से किसी नेता को जनभावनाओं के ख़िलाफ़ निर्णय करने की मनमानी करने का अधिकार नहीं होता है। जिन लोगों ने आपको सत्ता पर बिठाया है उनके साथ अहंकार की भावना का अंजाम आपत्काल का नतीजा बाद में सामने आता है तब बड़े बड़े सत्ताधारी नेताओं की ज़मानत ज़ब्त हो गई थी। जिनकी आलोचना करते हैं उनकी तरह से आचरण करना तो लगता है समय से सबक नहीं सीखा है। 
 
लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी की 25 जून 1975 की बात शायद याद दिलवानी ज़रूरी है। मुझे कभी नहीं भूला उनका भाषण दिल्ली के रामलीला मैदान में खुद जाकर सभा में सुना था ये मेरे लिए बड़ी खुशनसीबी की बात है। तब देश भर में विपक्षी दलों का विरोध का दिल्ली की गद्दी पर बैठे सत्ताधारी के ख़िलाफ़ जारी था और जेपी ने अपने संबोधन में इक बात कही थी। सुरक्षा बलों से कहा था कि क्योंकि शांतिपूर्वक विरोध करना जनता का संवैधानिक अधिकार है इसलिए जब लोग ऐसा कर रहे हों तब आपको किसी सत्ताधारी नेता या अधिकारी के आदेश पर उनका दमन करने को लाठी गोली नहीं चलानी चाहिए। क्योंकि देश की पुलिस या सुरक्षा बल देश और संविधान और न्याय के लिए हैं अत्याचार करने को नहीं है और अन्य अत्याचारी निर्देश को नहीं मानना चाहिए। आपत्काल घोषित करने को उनका भाषण आधार बनाया गया था। विडंबना की बात है कि जो आजकल सत्ता पर काबिज़ हैं वो आपत्काल की निंदा करते हैं मगर उस समय के सत्ताधारी से बढ़कर निरंकुश आचरण कर रहे हैं। उस समय किसी को हर कीमत पर अपनी कुर्सी बचानी थी और आज के सत्ताधारी को भी ज़िद है कि अपने थोपे जनविरोधी कानूनों को हटाना नहीं बल्कि उस को अच्छी फायदेमंद दवा बताकर पिलाना है किसान जिसे ज़हर समझते हैं पीना नहीं चाहते हैं। खेल  तमाशा किसी और का है खिलाड़ी कौन है और तमाशबीन कौन लेकिन जिसके पास गेंद बल्ला है बहुमत है उसका दावा है पहली दूसरी तीसरी चौथी सभी खेलना उसी को है बाक़ी मैदान से बाहर खड़े रह चुप चाप खेल का सत्यानास होते देख ताली बजाएं। अंपायर खुद वही है कौन आउट करार दे सकता है विपक्ष की हर गेंद नोबॉल घोषित है। ग़ज़ल पढ़ कर समझना।

ग़ज़ल - डॉ लोक सेतिया "तनहा"


आई हमको न जीने की कोई अदा
हम ने पाई है सच बोलने की सज़ा।

लब पे भूले से किसका ये नाम आ गया
जो हुए बज़्म के लोग मुझ से खफ़ा।

हो गया जीना इन्सां का मुश्किल यहां
इतने पैदा हुए हैं जहां में खुदा।

हैं कुछ ऐसे भी इस दौर के चारागर               ( चारागर = चिकित्सक )
ज़हर भी जो पिलाते हैं कह कर दवा।

हाथ में हाथ लेकर जिएं उम्र भर
और होता है क्या ज़िंदगी का मज़ा।

आज "तनहा" हमें मिल गई ज़िंदगी
छोड़ मझधार में जब गया नाखुदा।            ( नाखुदा  = माझी )
 
कव्वाली का मज़ा लेना हाज़िर है। बरसात की रात। आजकल सर्दी की ढंडी रात है।
 
 
 

Sunday, 6 December 2020

फ्लॉप शो तीन शतक से शून्य तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   फ्लॉप शो तीन शतक से शून्य तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

बड़े से बड़े अभिनेता बड़े से बड़े निर्देशक की बड़े से बड़े बजट की बेहद सफल निर्माता की फ़िल्म शानदार कहानी संगीत सब लाजवाब होने के बावजूद दर्शकों के बिना पर्दे पर टिकती नहीं है। आपको यकीन नहीं है तो मेरा नाम जोकर फिल्म को याद कर सकते हैं। बात बहारों के सपने से शुरू हुई थी और सेवक चौकीदार जैसे बदलते नामों के साथ बदलती अदाओं का असर कितनी मदहोश करने वाली नशीली चमकीली सोशल मीडिया के शोर शराबे की कड़ियों से नामुमकिन को मुमकिन करते पायदान पर चढ़ते गए। तीन कदम उठाना भारी पड़ सकता है क्योंकि ज़मीन पर रहने वाले उन भोले भाले आम गांव के खेती किसानी करने वालों को मंज़ूर नहीं कोई उनको अपने पैरों तले कुचलने के मनसूबे बनाकर सेवक चौकीदार का रूप धरकर खेत को खाने वाली बाड़ बन जाये। टीवी पर बिग बॉस शो फ्लॉप हो जाता है क्योंकि दर्शक ऊब जाते हैं घर वालों की झगड़ने की नौटंकी देखते देखते। मगर एंकर और शो बनाने वाले पुराने चल चुके कारतूस फिर से लाये हैं। 
 
जनाब ने भी वही पुराने तीर निकाल लिए हैं अपने अधिकार मांगने और उनके थोपे कायदे कानून को स्वीकार नहीं करने वालों को बदनाम करने का ढंग अपनाकर। चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा लगाए बंद दरवाज़े के पीछे चालें बांटने से कुचलने की अपने सत्ता के अहंकार कायम रखकर। सांप के मुंह में छंछूदर की हालत है क्योंकि यदि सांप एक बार छंछूदर को मुंह में पकड़ ले तो उसके लिए छोड़ना और निगलना दोनों घातक होते हैं। उगलने पर वो अंधा हो जाता है और निगलने पर कोढ़ी हो जाता है। ये जनता सब जानती है पहचानती है मीठी मीठी बातों पर यकीन किया अपनी भूल को मानती है। पैसा दो गुना करने वाले ठग होते हैं इसका पता चलने में समय लगता है। चिट फंड कंपनी की बातों में आकर अपना धन गंवाने वाले नासमझ होते हैं और ठगने वाले उनको मूर्ख समझते हैं उल्लू बनाते हैं। 
 
उनको लगता है कि ये किसी बाबा का आंदोलन जैसा है जिस में बाबा सलवार पहन निकल लिया था या फिर किसी मासूम अन्ना को सामने रखकर चलाया आंदोलन जो राह से भटक गया था और देश समाज में बदलाव की बात छोड़ खुद ही बदलने वाले लोग सत्ता पाने को मकसद समझने लगे थे। चले थे हरिभजन को ओटन लगे कपास यही कर रहे हैं इक चादर मैली सी बनाई है देखें कब तलक संभलती है। माना आपका अभिनय बेमिसाल है आपके तमाशे भी कमाल होते रहे हैं और फ़िल्मी अदाकारों से बढ़कर सजने संवरने में आप से माहिर कोई राजनेता नहीं देखा है देश की जनता ने पहले न आगे कभी देखना चाहेंगे लोग क्योंकि सिर्फ मनोरंजन से गुज़र बसर होता नहीं है। टीवी सीरियल की तरह बिना दर्शक आप तालियों की आवाज़ भर सकते हैं कॉमेडी शो से उन बातों पर ठहाके लगवा सकते हैं जो वास्तव में फूहड़ता और बकवास कहला सकती हैं। मगर लोकराज लोकलाज से चलता है हमने अपने नेताओं से यही सुना हुआ है। मंच उखड़ने को है दर्शक अंडे टमाटर फेंकना छोड़ चुके हैं क्योंकि अंडे टमाटर के दाम नेताओं की विश्वसनीयता के दाम से अधिक हैं उनको बेकार बर्बाद नहीं किया जा सकता है। अन्यथा गांव के लोगों के पास ये दोनों रहते हैं उन्हें जिसको फैंकना है फैंकते हैं अपने ढंग से सही समय पर। तीन सौ बनाने वाले खिलाड़ी को शून्य पर आउट होते देखा है सवाल सही बॉल के ठीक निशाने पर लगने का है। 
 
छह साल से बहरूपिया नित नया रंग रूप नया लिबास नया किरदार बनकर देश को ठगता रहा है। ये बहरूपिया लोगों की सदियों पुरानी परंपरा है उनको वरदान है कि अभिशाप मिला हुआ कि उनको खुद कुछ महनत करके नहीं मांग कर जीवन भर ऐश करना है। खुद को कलाकार मानते हैं ऐसे लोग धीरे धीरे बहरूपिये गांव शहर से नदारद हो गए थे और मुंबई नगरी जैसे महानगर उनका बसेरा बन गया था। ये उन सभी बहरूपियों का सरदार चालीस साल भीख मांगकर जीता रहा उसके बाद उसने राजनीति के मंच पर अपनी कलाकारी दिखानी शुरू की तो लोग उसकी कलाकारी के कायल इस तरह हो गए कि उनको रोज़ उसका ढोंग करना सच्चा और अच्छा लगने लगा। एक फिल्म में सबसे अधिक रंग रूप किरदार निभाने वाले संजीव कुमार को बहुत पीछे छोड़ एक ही दिन में किरदार अपना रूप रंग बदलने का कीर्तिमान बनाया है। उसका सड़क पर शो देश विदेश में थिएटर में क्या शानदार सजी सभाओं में अपना प्रदर्शन किरदार बदलने की कलाकारी का मंचन सफल रहा है। कोई आम नागरिक किसान मज़दूर भला उनका मुकाबला कर सकता है जो उनकी दिल्ली आने की ज़िद करता है और कितने अलग अलग परिधान पहने चला आया है। 
 
कौन क्यों आया है इस को समझने को छोड़कर बहरूपिया उनके पहनावे पर ऐतराज़ करता है। दाढ़ी मूंछ कपड़े से उनको जाति धर्म से ही नहीं जाने किस किस देश विदेश से जोड़ता है। उनको इधर उधर की बात करनी आती है यही बहरूपिये की कला है और लोग पूछने लगे हैं काफ़िला क्यों लुटवाया है क्यों लुटवाना चाहते हो। चौकीदार भेस बदल कर बहरूपिया बनकर चालीस चोरों का सरदार बन गया है ये वास्तविकता हर किसी को अब समझ आने लगी है।

Saturday, 5 December 2020

सावधान ये ख़तरनाक मोड़ है ( गुलामी की जंज़ीरें ) डॉ लोक सेतिया

  सावधान ये ख़तरनाक मोड़ है ( गुलामी की जंज़ीरें ) डॉ लोक सेतिया

शायद बहुत कम लोग हैं जिनको आज़ादी की जंग के इतिहास से पहले विदेशी राज की इतिहास की नज़रों ने वो मंज़र भी देखा है दो सौ साल तक की गुलामी की दास्तां मालूम होगी। देश आज फिर से करीब तीन सौ साल पुराने हालात के ख़तरनाक मोड़ पर खड़ा लग रहा है। फर्क तब राजशाही थी बाप दादा की विरासत में गद्दी मिलती थी और सिंहासन मिलते कोई मालिक बन जाता था और राज्य की जनता उसकी गुलाम जिसे शासक के आदेश का पालन करना होता था और उसके ज़ुल्म उसके फैसले सर झुककर मानने पड़ते थे। क्योंकि उन में से बहुत शासक वास्तव में काबिल नहीं होते थे इसलिए विदेशी चालाक शासक उनको आसानी से अपनी चालों का शिकार बना लिया करते थे और हिंदुस्तान जो कुदरती संपदा का भंडार था और सोने की चिड़िया कहलाता था उनके हाथ की कठपुतली बन कर खुद लुटने को तैयार हो गया था। आपने ईस्ट इंडिया कंपनी नाम अवश्य सुना होगा जो महमान बनकर कारोबार करने आये थे और उसके बाद धीरे धीरे एक एक कर के राजाओं जागीरदारों को अपने बिछाए जाल में फंसाते गए। और हमारे देश के वास्तविक राजाओं को बेबस और बेचारे बना कर उनके नाम पर सत्ता का मनमाना इस्तेमाल करते रहे। अफ़सोस है कि हमने लगान फ़िल्म को देखा है मगर मनोरंजन की नज़र से या अभी रानी पद्मावती पर बनी फिल्मों को देखते समय इतिहास की सच्चाई को समझने की जगह इक सिरफिरे आशिक़ की नाकाम इश्क़ की कहानी से अधिक कुछ नहीं समझा। 
 
 शायर मुज़फ़्फर रज़्मी ने कहा है " ये ज़ब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने , लम्हों ने ख़ता की थी सदियों ने सज़ा पाई "। लगता है कुछ उसी तरह का और शायद उस से बढ़कर आज हो रहा है। देश उनकी बाप दादा की विरासत नहीं है आज़ादी हासिल करने को सौ साल तक लड़कर कितनी कुर्बानियां देकर जंग लड़नी पड़ी है ये उनको नहीं समझ आएगा जिन्होंने या जिनके पुरखों ने गुलामी को आज़ादी से बेहतर समझा था और जो आज़ादी के लिए लड़ते थे उनकी मुखबिरी और जासूसी किया करते थे। जिनको कुछ लोग महान घोषित करते हैं उन्होंने विदेशी शासकों के सामने सर झुकाकर लिखित माफ़ीनामे दिए थे। इतना ही नहीं उन्होंने आज़ादी का और देश के तिरंगे का भी आदर तब तक करना ज़रूरी नहीं समझा था जब तक उनकी विचारधारा के राजनेता सत्ता पर बैठ नहीं गए थे। मगर हमारी सभ्यता और परंपरा बड़ी बड़ी गलतियों को भाईचारे और एकता की खातिर माफ़ कर देने की रही है अन्यथा जो देश के संविधान की धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत की बात स्वीकार नहीं करते उनको देश की राजनीति में जगह मिलनी कठिन थी। 
 
आज ये सब दोहराने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि जो ज़ख़्म मिले थे अपने ही देशवासिओं के दिए भरने के बाद कुरेदना पीड़ादायक है। लेकिन इतिहास को दोबारा उसी गुलामी की राह पर जाते नहीं देखा जा सकता है। आपको क्या लगता है सरकार सब कुछ ख़ास धनवान लोगों को देने या बेचने अथवा लंबी अवधि तक किराये या पट्टे पर दे कर देश को कुछ लोगों के पास बंधक बना कर अच्छा काम कर रही है। लेकिन सरकारी संस्थान और संम्पति पर अधिकार पाकर भी उनका इरादा देश की सबसे बड़ी संपदा ज़मीन को हथियाना साफ नज़र आने लगा है। ये देश कृषि पर आधारित अर्थव्यवस्था है और तीन चौथाई जनता खेती मज़दूरी जैसे कार्यों से जीवन यापन करती है। जैसा डर लग रहा है सरकार कृषि को मुनाफ़ाखोर लोगों के हाथ जाने देना चाहती है किसान की आवाज़ को अनसुना कर अथवा बहला फुसलाकर कोई झुनझुना देकर समझौते के नाम पर तब सिर्फ किसान बर्बाद होंगे ये मत समझना हमारी आपकी सभी की बारी आएगी ये तय है। पर क्या टॉलस्टॉय की कहानी हाउ मच लैंड ए मैन नीड्स की तरह उनकी लालच की कोई सीमा नहीं है। और इसके आगे जो हो सकता है उसकी कल्पना लगता है सत्ताधारी राजनेताओं को अभी नहीं है।  
 
चलो आपको आगे ले चलते हैं दस बीस तीस साल बाद मैं नहीं रहूंगा कुछ और भी हम में नहीं देख सकेंगे मगर जिस दिशा को राजनीति आगे बढ़ रही है अंदेशा यही है। अधिकांश ज़मीन के मालिक बेशक नहीं बने होंगे मगर खेती किसानी और खाने पीने की सभी वस्तुओं अनाज के भंडार कुछ अमीर धनवान लोगों के पास उनकी मलकियत होंगे। उस के बाद किसान से गुलाम बंधुआ मज़दूर की तरह विवश होकर काम के बाद उनकी नज़र देश को अपने कब्ज़े में लेना हो सकता है। उनकी कठपुतली बनकर लोग चुनाव लड़ेंगें जीतेंगे और संसद विधानसभाओं में बैठकर सरकार बनाएंगे चलाएंगे। जिस तरह अमरीका में निर्वाचित लोग लॉबी बनकर कानून के समर्थन या विरोध करने तक ही बात नहीं है बल्कि सर्वोच्च अदालत के न्यायधीश तक किसी राजनैतिक दल के हित को देखकर फैसले करते हैं। ये अच्छा है कि वहां लोग शिक्षित हैं और मुखर होकर विरोध करते हैं साथ वहां का मीडिया निडर और निष्पक्ष है इसलिए बेशर्मी से कुछ भी करना उतना सहज नहीं है। मगर भारत जैसे देश में पुलिस आज भी न्याय व्यवस्था कायम रखने का कर्तव्य छोड़ कर अपने देश के नागरिकों का दमन करती है शांतिपूर्वक विरोध करने नहीं देती है।  
 
चिंता इस बात की है कि आज कोई लोकनायक जयप्रकाश नारायण तानशाही के ख़िलाफ़ खड़ा नहीं है और कोई दूसरा महात्मा गांधी फिर नहीं मिलेगा देश को आज़ाद करवाने को। आज जो सत्ता पर विराजमान हैं वो जिस डाल पर बैठे हैं उसी को काटने का काम कर रहे हैं।   सिर्फ किसान की ज़मीन की नहीं हमारे पांव के नीचे भी ज़मीन नहीं बचेगी सावधान। समझ रहे हैं हम जिस सुरंग से गुज़रने वाले हैं वो मंज़िल तक पहुंचने का छोटा और आसान रास्ता है मगर वास्तव में हम ऐसी अंधी गली में जा रहे हैं जो कहीं उजाले की तरफ नहीं निकलेगी बल्कि इक खाई में लेजाकर ख़त्म करेगी। ये किसी राक्षस की मायाजाल की जैसी कथाओं की बात है।

Friday, 4 December 2020

नेगिटिव अच्छा पॉज़िटिव ख़राब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   नेगिटिव अच्छा पॉज़िटिव ख़राब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

  बाकी ज़माने दुनिया वालों विश्व के तमाम देशों को जो बात कोरोना ने आकर समझाई हमारे देश में किसी को बहुत पहले समझ आ गई थी। उन्होंने नेगेटिव होना पसंद किया और उनको अच्छा लगा जैसे कोई ख़लनायक डायलॉग बोलता है डरना चाहिए उनका डर हो ये अच्छा है। मगर उनको ये बात यूं ही समझ नहीं आई उन्होंने ध्यान पूर्वक देखा समझा तभी अपनाया इस नकारात्मकता के महान विचार को अपना आदर्श बनाकर तमाम लोगों को उल्टी पढ़ाई नफरत की पढ़वा कर अपना अनुयायी ही नहीं अपना अंधभक्त बना दिया। जितने भी बड़े बड़े राजनेता देश के उनसे पहले हुए उन्होंने भले देश समाज के लिए कितने ही सराहनीय कार्य किये कुछ समय बाद सभी ने उनकी अच्छाई को भुला दिया लेकिन उनसे जो जो भी गलतियां हुईं गलत कदम अनुचित आचरण या मनमर्ज़ी के फैसले किये उनको किसी ने कभी भुलाया नहीं कभी माफ़ नहीं किया। बस किसी के दामन पर कोई दाग़ कोई छींटा पड़ गया तो किसी भी आयोग या न्यायपालिका के निर्दोष घोषित करने से उनकी दाग़दार चादर चमकदार सफ़ेद हो नहीं पाई मैली चादर लेके उनको उस दुनिया में जाना पड़ा। मगर बाद मरने के क्या होगा इसकी चिंता वो लोग कभी नहीं करते जिनको जब तलक हैं मौज करना पसंद है। शायद ऐसा पहली बार हुआ कि कोई सत्ताधारी शासक बाद में हमेशा इतिहास में मशहूर होकर रहने को नेगटिविटी की अहमियत को समझ कर इस राह पर चलने और आलोचना निंदा की परवाह छोड़ आगे बढ़ता जा रहा है चलता चले जा रहा है। 
 
हज़ार साल तक लोग याद रखेंगे उनके झूठे वादों के कीर्तिमान बनाने को। अच्छे दिन लाने की बात का असर ऐसा है कि कोई कभी भविष्य में उनकी मांग तो क्या सपने में भी चाहत नहीं करेगा। ये शब्द रात को सपने में सुनकर लगता है जैसे डरावना ख़्वाब था जो ख़त्म होने को ही नहीं है। लोग प्यार को भूल जाते हैं मार याद रहती है बचपन से बुढ़ापे तक। क्या खूबसूरत कमाल करते हैं जनाब अपने करम गिनवाते हैं उंगलियों पर जबकि उनके ज़ुल्मों-सितम का कोई हिसाब ही नहीं। ये शब्द किसी शायर की ग़ज़ल के हैं और ये आगे भी जाने किस शायर की कही बात है कि , वो अगर ज़हर देता तो सबकी नज़र में आ जाता , तो यूं किया कि मुझे वक़्त पर दवाएं नहीं दीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ जो हुआ उसकी कल्पना शायर क्या कोई नहीं कर सकता क्योंकि उसने जानकर इरादतन गलत दवाएं देने जैसा काम किया। ऐसे ऐसे निर्णय अकेले अपनी मनमानी से किये बिना जानकर लोगों से सलाह मश्वरा किये कि देश की व्यवस्था संविधान और सभी न्याय और सुशासन देने को स्थपित अंग बेकार और बेमानी हो कर रह गए। 
 
उनकी सोच कोरोना की तरह है नेगेटिव होना अच्छी बात लगती है पॉज़िटिव कोई होना नहीं चाहता। पल पल गिनती जारी है कितने पॉज़िटिव अभी बाक़ी हैं सबको नेगेटिव करना लक्ष्य है। बताया जा रहा है इक टीका ईजाद किया जा रहा है सभी को रोग के रोगाणु का इंजेक्शन दिया जाएगा जिस से उनके शरीर में रोग से लड़ने की क्षमता विकसित होगी कितने समय को अभी पता नहीं है। लेकिन तत्वज्ञानी विचार व्यक्त कर रहे हैं कि पिछले दिनों के सोशल मीडिया पर देखे परिणाम साबित करते हैं कि नकारात्मक राजनीति का असर आने वाली पीढ़ियों तक कायम रहेगा। इतना ही नहीं उच्च शिक्षित बड़े बड़े पदों पर नियुक्त लोग भी विवेकहीनता का शिकार होकर नेगेटिव विचारधारा को बढ़ावा देकर जिस शाख पर बैठे हैं उसी को काटने का काम करने को देश और समाज की भलाई कह कर कर रहे हैं। नेगेटिव होना इतना अच्छा पहले कभी नहीं लगता था।