Wednesday, 11 November 2020

करोड़पति खेलने का ख़्वाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    करोड़पति खेलने का ख़्वाब ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  विषय शोध का लगा मुझे भले ये खेल मुझे खेलना नहीं आता और मैंने हमेशा इसकी आलोचना ही की है। इतने साल में जितने भी खिलाड़ी हॉट सीट पर पहुंचे उन सभी ने इक राज़ खोला कि उनके पिता माता ने यही सपना देखा था अमिताभ बच्चन के सामने बैठना और खेल खेल में अमीर होते जाना। मेरी तरह आपके माता पिता ने भी ऐसा ख़्वाब देखा होता तो एक करोड़ सात करोड़ नहीं तो तीन लाख बीस हज़ार से पच्चीस पचास लाख तक की धनराशि हमारे खाते में भी तुरंत भिजवाते सदी के महानायक टीवी चैनल की मेहरबानी से। देश की गरीबी ख़त्म  और लोगों की ख्वाहिशें कब की पूरी हो गई होती अगर देश और राज्य की सरकारों ने अपनी योजना में इस नामुराद खेल को शामिल किया होता और राजनेता भाषण में समझाते कि सिर्फ राजनीति ही अमीर बनने का इकलौता साधन नहीं है और टीवी पर बैठे करोड़पति खेल खेलते खेलते भी को लाख कमा सकता है। पैसा क्या है हाथ का मैल है हम हाथ मलते नहीं रहते बहती गंगा में डुबकी लगाते और इस पार से उस पार पहुंच जाते अर्थात गुमनाम से नाम वाले हो जाते। 
 
  अब लगता है मेरे माता पिता ने करोड़पति खेल का सपना नहीं देखा क्योंकि उनके समय में टीवी पर ये होता ही नहीं था रामायण महाभारत सीरियल भी ठीक से उनको देखना नसीब नहीं हुआ। धार्मिक किताबें भजन और सदियों पुरानी धारणा पढ़ लिख कर अच्छे आदमी बनकर दिखाना जैसी नसीहत देते रहे पैसे के पीछे भागने की बात को गलत बताते रहे। सच्चाई ईमानदारी और भलाई की बातें इंसान को धनवान बनने नहीं देती हैं डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करना शिक्षक बनकर शिक्षा का दान देकर सबको सोचने समझने की बात सिखलाना यही सबक पढ़ाते रहे। खूब धन दौलत कमाने का महत्व उनको समझाना ज़रूरी नहीं लगा था। मगर मैंने वही भूल कैसे दोहराई और अपनी संतान को काबिल मेहनती बनाने का पाठ पढ़ाया आसान ढंग से पैसा बनाने की राह दिखलाई ही नहीं। अगर आपने भी अपने माता पिता की तरह अपने बच्चों को करोड़पति खेल का महत्व नहीं समझाया तो मुमकिन है कभी बड़े होकर उनको आपसे ये शिकायत हो कि सबसे ज़रूरी बात उनको मालूम ही नहीं थी क्योंकि आपने उनको ये मार्ग बताया ही नहीं था। 
 
   देर आये दरुस्त आए जनके बच्चे छोटे हैं उनको समझाना चाहिए , खेलोगे कूदोगे बनोगे नवाब पढ़ोगे लिखोगे हो जाओगे बर्बाद। पढ़ने को कौन बनेगा करोड़पति के सवाल काफ़ी हैं बस कुछ भी और पढ़ना किसी काम का नहीं है। इसी सप्ताह इक दिन पहले मकेनिकल इंजीनरिंग के सभी विषयों में पहला स्थान पाने वाले राष्ट्रपति से सम्मानित युवक इस खेल में तीन लाख बीस हज़ार तक भी नहीं पहुंचे तो दर्शक सोचने लगे क्या ख़ाक पढ़ाई की। मुझे अफ़सोस हुआ ये सोचकर की सिरसा हरियाणा के होनहार युवक ने हमारे इलाके और राज्य की शान को अपनी वास्तविक योग्यता से कितना ऊंचे शिखर पर पहुंचाने के बाद अपनी नासमझी से करोड़पति खेल में फ़िसड्डी साबित होकर कहां ला खड़ा किया है। जाने कितनी किताबें रटी मगर कहीं से कोचिंग नहीं हासिल की सबसे महत्वपूर्ण 15 - 16 सवालों का जवाब देने का चार चार हेल्पलाइन उपयोग करने के बाद। कल दिल्ली की इक महिला एक करोड़ जीती तब ध्यान देने पर समझ आया कि उनको कई बार सवालों के सही जवाब नहीं पता थे फिर भी उनका कहना था रिस्क लेना उनकी आदत है ज़िंदगी खतरों का खेल है इक खतरा और सही और इस तरह खतरों से खेलते खेलते खेल खेल में करोड़पति बन गई। खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान।   
 
   लेकिन कौन बनेगा करोड़पति खेलने के लिए उस शो की औपचारिकता पूरी करना ही काफी नहीं है। आपको वहां जाने से पहले कोई पांच समझदार जानकर लोग भी चुनने होते हैं जो आपकी सहायता वीडियो कॉल पर बहुत कम समय में सही जवाब देकर कर सकते हों। मुझे बड़ी कठिनाई होती किसको रखना किसको छोड़ना चाहिए जब इधर वास्तविक जीवन से सोशल मीडिया तक जान पहचान वाले खुद को सभी विषयों को जानने वाले बतलाते हैं और साथ भी लेकर जाने को हौसला बढ़ाने वाले व्यक्ति का चुनाव आसान नहीं होता। मुझे यकीन है मैं जिस किसी से बात करता मुझे यही सलाह मिलती जनाब आपके बस की बात नहीं है क्योंकि मुझ में इतना साहस संयम और आत्मविश्वास ही नहीं है। मुझे तो पता होता है किसी बात का सच क्या है फिर भी कोई सामने गलत को सही बताता है तो खामोश रहता हूं मालूम है लोग गलत होकर भी गलती मानते नहीं जबकि मुझ जैसे सही होने पर भी अपना अपराध स्वीकार कर शर्मिंदा हो जाते हैं। मैंने केबीसी में जाने को कोई आवेदन कभी किया नहीं फिर भी कितनी बार यही सोचकर दिल घबराता है कि अगर बिना आवेदन ही मुझे बुलावा मिल गया किसी दिन तो क्या होगा। समझ गए कितना ख़ौफ़ है मेरे मन में इस खेल को लेकर।

2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

बहुत सार्थक।
धनतेरस की हार्दिक शुभकामनाएँ आपको।

Sanjaytanha said...

सही कहा sir तब पेरेंट्स बच्चों को संस्कार सिखाते थे अच्छी सीख देते थे...kbc कोई योग्यता का पैमाना नहीं है