Wednesday, 24 June 2020

जाने कहां खो गए ऐसे लोग ( सफर मुसाफ़िर ) डॉ लोक सेतिया

  जाने कहां खो गए ऐसे लोग ( सफर मुसाफ़िर ) डॉ लोक सेतिया 

   नहीं आज उनका किसी का भी कोई जन्म दिन नहीं है न ही उनकी निजि ज़िंदगी की बात है। मगर ये दिन उनकी याद के बिना पूरा नहीं हो सकता है। आज लोकनायक जयप्रकाश नारायण जी के बहाने ऐसे कई लोग याद आये हैं। 25 जून 1975 को आपत्काल घोषित हुआ उस से अधिक महत्व इस बात है कि आज़ादी के पहली बार किसी ने अपने देश की अपनी ही चुनी हुई सरकारों के ख़िलाफ़ शांतिपूर्वक अंदोलन करने की राह दिखलाई थी और दूर से तमाशा देख कर नहीं खुद इक ज्वाला में कूदकर उस आग को जलाया था जो आज भी हमारे सीनों में जलती है दुष्यंत कुमार के शब्दों में। मुझे अफ़सोस होता है जब लोग गांधी नेहरू भगत सिंह लक्ष्मी बाई जैसे कितने महान लोगों की बात करते हैं मगर जेपी कौन थे उन जैसे कितने लोग जो हमेशा अपने आदर्शों विचारों की कठिन डगर पर बिना किसी स्वार्थ चलते रहे जीत हार की चिंता नहीं की न ही कौन साथ चलता है कौन छोड़ जाता है इसकी परवाह की उनको कुछ भी पता नहीं होता है। हां उनको अमिताभ बच्चन की ज़िंदगी का सब मालूम होता है ये विडंबना है कि 11 अक्टूबर को लोग असली जन नायक की नहीं फ़िल्मी तथाकथित सदी के घोषित महानायक की बात करते हैं। ऐसे लोग बातें भली भली करते हैं मकसद पैसा शोहरत हासिल करना होता है। नकली नायक नकली बाबा नकली नेता देशसेवक होने का दावा भी झूठा वास्तविक चाहत लालच लोभी सत्ता धन और कारोबार या ऐसी राजनीति जिस का कोई नैतिक आदर्श से मतलब नहीं यही लोग हर तरफ दिखाई देते हैं और महान कहलाते हैं। जाने कहां खो गए ऐसे लोग जो अपना घर जलाकर रौशनी करते थे। जाँनिसार अख्तर के शब्दों में।

                      जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं 

                      देखना ये है कि अब आग किधर लगती है। 

                       सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है 

                       हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है। 

Rekhta  रेख़्ता में मुझे तलाश करने पर जाँनिसार अख़्तर के ये अल्फ़ाज़ नहीं मिले। आपको जावेद अख़्तर को लेकर मालूम है उनके वालिद क्योंकि शोहरत और सफ़लता की बुलंदी पर नहीं थे लोग नहीं जानते हैं। 
कुछ ऐसा ही मजाज़ लखनवी जी को लेकर है। असरार उल हक़ मजाज़ , महिलाओं के लिए उनसे अच्छा पैग़ाम किसी ने दिया हो मुझे नहीं दिखाई दिया मीर ग़ालिब से आज तक। दो शेर उनकी नज़्म से भी पढ़ते हैं। 

                             तेरे माथे पे ये आंचल बहुत ही खूब है लेकिन 

                       तू इस आंचल को इक परचम बना लेती तो अच्छा था। 

                           तेरा ये ज़र्द रुख ये खुश्क लब ये वहम ये वहशत 

                           तू अपने सर से ये बदल हटा लेती तो अच्छा था। 

आपको तो उन सत्येंद्र दुबे का भी नाम याद नहीं जो सच की खातिर क़त्ल कर दिया गए। ये 2003 की बात है 27 नवंबर को 30 साल की आयु में अपने जन्म दिन को ही। कारण उन्होंने इक पत्र लिखा था अटल बिहारी वाजपेयी जो को पीएमओ से गोपनीय खत पहुंचा भ्रष्टाचार करने वालों तक जिन्होंने उनको क़त्ल कर अपना रास्ता साफ कर दिया। राष्ट्रीय राजमार्ग योजना की बात है जिन बड़े खुली सड़कों पर आज भी आप शान से चलते हैं कभी सोचा किसी ईमानदार आईएएस अधिकारी का खून बहा होगा उन्हीं पर। 

   कोई यकीन करेगा ऐसे लोग जो उसूलों की राह पर बिना डरे बिना विचलित हुए चलते रहे जबकि उनको खुद कोई पद कोई तमगा कोई भी सत्ता का अधिकार नहीं चाहिए था। जयप्रकाश नारायण जी को कितने बड़े बड़े पद प्रस्ताव सामने रखे गए मगर उनको कोई पद नहीं चाहिए था। उनको देश की गरीबों की शोषण की सत्ता के अनुचित आचरण के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ बुलंद करनी थी। जो सोये हुए हैं उनको जगाना था मगर क्या हम जागे हैं या फिर किसी नशे की गहरी नींद में बेसुध हैं। आज भी बहुत लोग दावा करते हैं जेपी की संपूर्ण क्रांति की सोच को कायम रखने की मगर अधिकांश का मकसद और होता है जैसे उनके आंदोलन में जो लोग शामिल थे उनकी वास्तविकता सामने आई तो बेहद निराशा हुई उनको सभी को। कितने नाम हैं मत पूछो आपको विश्वास नहीं होगा कि क्या ये वही लोग हैं जो एमर्जेन्सी में डरते छिपते थे आज शासक बनकर तानशाही ढंग से आचरण करते हैं। बड़े नज़दीक से देखा जाना समझा है उनको मैंने अब शायद उनको मेरी पहचान भी याद नहीं होगी कभी मेरे पास खुद चल कर आये थे सहायता ली थी छिपने को और कई तरह से।

आज जयप्रकाश नारायण सत्येंद्र दुबे और ऐसे सच्चे देश समाज के शुभचिंतक कहीं नहीं नज़र आते हैं जबकि आज उनकी ज़रूरत पहले से अधिक है। इक बात इक नेता ने कही थी , आसान है किसी भी नेता या महान व्यक्ति की छवि को धूमल करना मगर क्या आप ऐसा एक भी व्यक्ति बना सकते हैं सोचना ज़रूर।

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