Wednesday, 4 March 2020

महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया

महिला दिवस पर इक नारी की बात ( विचारणीय ) डॉ लोक सेतिया 

मुझे पिता से पति से बराबरी करने की ज़रूरत नहीं है। जैसे कोई नदी अपने दो तटबंधों के बीच बहती है और अपने आस पास की दुनिया को बनाती संवारती रहती है। तटबंध उसको रोकते नहीं आगे बढ़ने से बांधे रखते हैं पानी को किनारे तोड़ कर बाढ़ होने नहीं देते। आधुनिक महिला को अपना बदन ढकना उचित नहीं लगता है क्योंकि उसको नहीं मालूम उसकी नग्नता जिनको पसंद है उनकी नज़र में महिला कोई इंसान नहीं इक सामान है नुमाईश का औरों के दिल बहलाने को सजना और अपने खुद के लिए संवरना दो अलग बातें हैं। महिला कम नहीं किसी से नासमझ भी नहीं है फिर भी जो किसी को चाहता है उस पुरुष भाई पिता पति या कोई दोस्त भी सखी भी हो सकती है अगर देश समाज की कड़वी वास्तविकता को जानकर किसी को उसी की सुरक्षा की खातिर संभलने को कहता है तो ये समझना किसी को क्या अधिकार है आदेश उपदेश देने का तो विचार करना होगा अपना अहम बड़ा है कि सुरक्षा और आदर की खातिर सलाह पर ध्यान देना। 

जैसे महिलाओं की भावनाओं को महिला समझती है जिस तरह पुरुष शायद नहीं ठीक उसी तरह पुरुष भी अपने पुरुषवादी समाज को हमसे बेहतर जानते समझते हैं। ये हम स्वीकार करें चाहे नहीं करें नारी कोमल मन और भावनाओं से कुदरत की रची रचना है जबकि पुरुष सवभाव से कठोर और मन से काम वासना के अधीन भीतर से किसी शिकारी की तरह है और अधिकांश पुरुष अपनी घर की महिलाओं को छोड़ बाकी को बस इक औरत ही समझते हैं और हर कोई खूबसूरत महिला को हासिल करना चाहता है। महिलाओं को अपने सजने संवरने और पुरुष से महंगे उपहार की चाहत रखने ने खुद उसी को छोटा बनाया है क्योंकि हर उपहार देने वाला खुद को बड़ा और अधिकारी होने का भाव रखता है। महिला कमज़ोर नहीं होती है उसकी इच्छाएं ही उसको कमज़ोर बनाती हैं। जब महिला उम्मीद रखती है पिता भाई पुरुष उसको आगे बढ़ने को सहायक हों तब उसे स्वीकार करना होगा खुद अपने लिए समाज से समानता हासिल करना कठिन है असंभव नहीं। और वास्तव में उन्हीं महिलाओं ने अपने समाज को दिशा दिखाई है जो बिना कोई समझौता किये अपने मकसद पाने की राह पर चलती रही हैं। जो बंधन सामाजिक ताने बाने को मधुरता बनाये रखने को हैं उनको निभाना कोई खराब बात नहीं है। 

बेशक समाज की कुत्सित सोच को बदलना चाहिए मगर नारी को ये अपनी अस्मिता खोकर नहीं कायम रखते हुए करना है। अपने बेटे-बेटी को उचित समझ और शिक्षा देकर खुद अपनी न सही अपनी आगे की आने वाली पीढ़ियों को इक अच्छा और सुरक्षित समाज देने में योगदान दे सकती हैं। सिर्फ अपने लिए अधिकार और समानता हासिल करना कोई महान उद्देश्य नहीं हो सकता है। आप शिक्षित हैं स्वालंबी हैं तो उन महिलाओं को आगे बढ़ाने को साथ दे सकती हैं जिनको अपनी शक्ति और स्वाभिमान को समझना अभी बाकी है। मगर जब महिला दिवस मनाने वाली महिलाएं अपने घर या पार्टी में कामकाजी महिलाओं को अपने से कम समझती हैं और उनको भी महिला दिवस में शामिल नहीं करती उनकी बातें भाषण व्यर्थ हैं केवल आडंबर हैं। क्या इस 8 मार्च को अपनी महिला कर्मचारी को छुट्टी देकर महिला दिवस की शुरुआत कर सकती हैं।

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