Saturday, 8 August 2020

सुनो इक सच्ची कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 सुनो इक सच्ची कहानी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   मेरा नाम झूठ है ये सबसे बड़ा सच है , मुझसे सभी प्यार करते हैं सच कहता हूं सच से मुझे दुश्मनी हैं सभी लोग सच से डरते हैं। मेरा वजूद बहुत पुराना है मुझे याद हर प्यार का तराना है इश्क़ करने वालों से मेरा नाता पुराना है। कहानी मुहब्बत की मेरा फ़साना है हर आशिक़ से माशूक़ का जो भी झूठा बहाना है समझ लो मेरा किस्सा सदियों पुराना है। कभी झूठ बोलने से मौत मिल जाती थी कसम झूठी नहीं कोई खाती थी। फिर युग बदला लोग आधा सच बताने लगे जो कहना नहीं था उसको छिपाने लगे। शायद ये सच है दुमछल्ला लगाने लगे झूठ को इस तरह अपनाने लगे सच से दामन बचाने लगे झूठ से दिल लगाने लगे। आपने भी सुना और स्वीकार कर लिया कि ये दुनिया इक झूठा सपना है यहां कौन किसी का अपना है। जब ये संसार ही सच नहीं है झूठ है तब झूठ के इलावा बचा क्या है। झूठ है दुनिया और हमको जीना है यहीं झूठ को सच मानकर। आज कलयुग का ज़माना है आपके दिल में मेरा ठिकाना है बस यही आपको समझाना है मेरा आपका पक्का याराना है। हर किसी ने मुझे देवता माना है।

   ज़िंदगी में हर मोड़ पर कोई दोराहा आता है इक कठिन रास्ता सच की तरफ जाता है कोई सड़क नहीं है न कोई पगडंडी है कांटों भरी राह है खतरे ही खतरे हैं। मेरी तरफ आने को राजमार्ग बनाये हैं आसानी से हर मुश्किल से पार जाने को पुल बनवाये हैं झूठ ने सभी को लुभाया है गले से मुझे आपने भी लगाया है कितनी बार सभी ने आज़माया है यही पाया है सच है तपती धूप झूठ शीतल छाया है। नादान थे लोग जो झूठ से बचते थे सच की खातिर जीते थे बार बार मरते थे। सब लोग उनको ज़हर पिलाते थे सूली पर सच बोलने वाले को ही चढ़ाते थे सच का क़त्ल करने वाले मसीहा कहलाते थे। मुझसे कभी लोग नफरत किया करते थे जो भी झूठा हो पापी उसे कहते थे मगर वक़्त आने पर काम उनके झूठ ही आया सच कभी किसी का पेट नहीं भर पाया। झूठ हर समय सभी के काम आया झूठ को अपना जिस किसी ने बनाया खूब खाया सबको खिलाया झूठ की बुनियाद पर घर अपना बनाया बाहर घर के नाम सच लिखवाया। कुछ इस तरह झूठ को सच से महान बनाया। 

   देखो है झूठ का राज जब से आया सच दुनिया में कहीं भी नज़र नहीं आया। झूठ ही तेरा भगवान है बंदे चंगे लगते हैं जो लोग हैं मंदे। गंदे हैं फिर भी अच्छे हैं धंधें ये धर्म ये राजनीति ये सत्ता के हथकंडे। आपको मेरी चाहत का ऐतबार है जानते हैं झूठ ही सच्चा दिलदार है झूठ सभी का अपना है सच तो कोई टूटा हुआ सपना है अब सच का निशान नहीं है सच किसी के घर महमान नहीं है झूठ माई बाप है जिसका कोई एहसान नहीं है। मुझे खोजना है न देखना है न आज़माना है मैं रहता तुम्हारे अंदर मेरा ठिकाना है ये राज़ नहीं है पर फिर भी सबसे छुपाना है। इस युग इस जहां में रहने को झूठ को बचाना है ये रिश्ता अपना सबसे सुहाना है झूठ का अपना इक तराना है हमने मिलकर गाना गुनगुनाना है। सबको ये अब जाकर बताना है इक झूठ का मंदिर हमने बनाना है मिलकर झूठ को सबने मनाना है उस के दर से झोली भर भर के लाना है। झूठ ही आजकल भगवान बन गया है सच अनचाहा वरदान बन गया है सच को कभी अपना नहीं बनाना झूठ से नाता हमेशा निभाना। झूठ की नैया पार लगाएगी सच की दौलत नहीं किसी काम आएगी कोई बैरागन बिरहा का गीत जाएगी सच को खो गया है उसको बुलाएगी शहर गांव से बाहर अकेली भटकती रहेगी सुनसान वीराने में आधी रात को उसकी आवाज़ आएगी। 

आजकल इंसान में इंसान नहीं मिलते इंसान के भीतर ज़मीर आत्मा भगवान नहीं रहते। बस झूठ सभी के अंदर रहता है जो खुद को सच भी कहता है। पहचान सके तो पहचान लो खुद को झूठे हो मान लो मान लो खुद को। सच कभी मन में रहता था सभी के कहा करते थे झूठ कोई बोले उसको तुम हो झूठे कहीं के। मगर हुई जब झूठ से जान पहचान सभी की मुरादें मिलीं हुई पूरी हर हसरत सभी की। मन से सच को बाहर तब निकाला उसे ज़िंदा रहते ही क़त्ल कर डाला। दफ़्न सच को अपने अंदर कर दिया है होंटों के सच को सिल दिया है सच जाने कहां इक घुटन बन गया है सच पराजित नहीं हुआ शायद मर गया है। उठा कोई जनाज़ा न कोई मज़ार कहीं सच की बनी है करे कौन साबित है क़त्ल हुआ सच कैसे। झूठ है कानून झूठ है दौलत झूठ दुनिया झूठ पैसे झूठ की अदालत ने सुनाया है फैसला नहीं कोई गवाह हो जिसने सच को ज़िंदा भी देखा। कहीं अधमरा शायद रहता था कोई न कोई उसका वारिस न कोई वसीयत भी लावारिस की तरह सच का अंजाम होना था। सच क्या था लगता है मिट्टी का खिलौना था कभी न कभी चूर चूर होना था। सच फुटपाथ पर सोता था लगता है बिस्तर नहीं था न कोई बिछौना था। यही कभी होना था होना था।


Is God Lying about His Involvement in Violence?

Thursday, 6 August 2020

हैवानियत शर्मसार नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  हैवानियत शर्मसार नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    समझते हैं अभी भी दुनिया उन्हीं से है जिनको नहीं खबर आना जाना किधर से है। ये लोग जो खुद को भगवान समझते हैं इंसान को भी नहीं इंसान समझते हैं। लगता है इन्हें बड़ा काम किया है इस हाल में जो अपना काम किया है। क्या हवाओं ने कहा हमने चलना नहीं छोड़ा कोरोना के डर से किसी भी अनहोनी से घबरा के ये उनका फ़र्ज़ कुदरत का तरीका है कोई नहीं किसी पर एहसान किया है। सुनते थे जब नज़र आता है कयामत का नज़ारा मिट जाता है अपने होने नहीं होने का अहंकार सारा तब किया करते हैं गुनाहों से तौबा भीतर कोई ज़मीर जगाता है तब ऐसी घड़ी में इंसान बदल जाता है। पर देख कर हैरान हैं बंदे भी खुदा भी अभी भी गलत रास्ते पर कुछ लोग चल रहे हैं बड़े ऊंचे मीनार ज़मींदोज़ सामने पड़े हैं उनकी फ़ितरत है अभी भी अकड़ रहे हैं। अपने ईमान का सौदा हर रोज़ कर रहे हैं कहने को तो ज़िंदा हैं समझो तो मर गए हैं। रिश्वत बेईमानी अपने फ़र्ज़ को नहीं निभाना शराफ़त का लफ़्ज़ सीखा पढ़ा है न है जाना। उनको नहीं मालूम है दिन चार जीना चलना है रहेगा यहीं सब ठौर ठिकाना। इंसान हैं इंसानियत से पहचान नहीं है नहीं जानता बिना बात ही बदनाम नहीं है। काम आएगी ये पाप की दौलत न हराम की कमाई जब ऊपर वाले के घर होगी रसाई। अब तो इंसान बनकर दिखाओ अपने हक़ ईमान की रोज़ी रोटी कमाओ किसी को नहीं लूटो न किसी को सताओ जो गलत काम करते उनके हौंसले न बढ़ाओ शासक हो अफ़्सर हो पुलिस हो या हाकिम चाहे मुंसिफ थोड़ा तो ख़ौफ़ उस खुदा का खाओ। कितने गुनाह किये हैं हिसाब लगाओ अपने दिल पर हाथ रखकर सच सच बताओ भगवान की लाठी की कोई आवाज़ नहीं होती है मुमकिन है बाद में बहुत पछताओ। आदमी बनकर आदमी के साथ बात करो बस कुछ भी नहीं हस्ती तुम्हारी मत इतराओ।

     भगवान ये खुद को आपके भक्त बतलाते हैं आपके नाम पर सोशल मीडिया पर जमकर शोर मचाते हैं। मगर सच से घबराते हैं झूठ के गुण गाते हैं। कारोबार नौकरी राजनीति समाज सेवा जो भी करते हैं अपने मतलब की खातिर उल्लू सबको बनाते हैं हर हथकंडे आज़माते हैं हेरा फेरी लूट जालसाज़ी नैतिक अनैतिक सब तरीके अपनाते हैं खूब पैसा कमाते हैं। मौज मस्ती करते हैं गुलछर्रे उड़ाते हैं झूठ को सच सच को झूठ बनाकर दिखाते हैं मगर सब कुछ करने के बाद भी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे जाते हैं धर्म की बातें करते हैं धार्मिक भजन कीर्तन गाते हैं नमाज़ पढ़ते हैं मोमबत्ती जलाते हैं। दुनिया को ये आबाद नहीं बर्बाद कर रहे हैं अपनी झोली अपने झूठ अधर्म से भर रहे हैं। कौन इनको सबक सच वाला पढ़ाये भटके हुए हैं कोई राह सच की दिखाए सोई हुई इनकी इंसानियत शराफत को जगाये इंसान हैं इंसान इनको बनाये। जाने कैसे कैसे भगवान हैं इनके ये समझते हैं इनके आगाज़ भी हैं और अंजाम हैं इनके पर इनका कोई शुरुआत का पता न आखिर की खबर है। रहजन है वही जिसको बना लिया रहबर है ये रहजन को मसीहा समझने लगे हैं। मझधार को किनारा बताने लगे हैं ये लोग औरों को रुलाने लगे हैं सब खून के आंसू बहाने लगे हैं मगर ये बेरहम हंसने मुस्कुराने लगे हैं। अपने झूठ को सच बताकर कहते हैं बड़ा सच फरमाने लगे हैं श्मशान को देखो सजाने लगे हैं। खुद पर रहा इनको इख़्तियार नहीं है ये करते हैं गुनाह समझते हैं कर्म हैं करते अपने गुनाह पर शर्मसार नहीं हैं।

   

Wednesday, 5 August 2020

भय बिनु होई न प्रीति ( हे राम ) डॉ लोक सेतिया

  भय बिनु होई न प्रीति ( हे राम ) डॉ लोक सेतिया

रामचरित मानस में तुलसी दास समुंदर को जड़ बताते हुए इस तरह लिखते हैं। विनय न मानत जलधि जड़ , गए तीन दिन बीत। बोले राम सकोप तब , भय बिनु होई न प्रीती। हमने धार्मिक किताबों को पढ़ना या किसी से सुनना ही चाहा है उसको लेकर चिंतन करना अपने विवेक से समझना ज़रूरी नहीं समझा है। कब किसने किस संदर्भ में कुछ कहा और उसका नतीजा क्या हुआ ये भी नहीं सोचते हैं। किसी नेता ने जब इन शब्दों का उपयोग किया शायद धर्म की नहीं आस्था की भी नहीं यहां तक कि मर्यादा की भी बात को सोचना ज़रूरी नहीं समझा। हम जिस लोकशाही व्यवस्था में देश के संविधान के अनुसार रह रहे हैं क्या उस में ये बात अनुचित नहीं है। क्या कोई आपकी सुविधा को समझ कर जैसा आप विनती करते हैं करता नहीं है तो आप उसका अस्तित्व ही मिटा देंगे। अगर ये धर्म है तो अधर्म क्या है , तुलसी दास की रामायण की तरह भयभीत होकर न केवल अपनी विवशता और कुदरत का नियम भगवान राम को समझाना पड़ता है समुंदर को बल्कि वो भेंट लेकर उपस्थित होता है और अपने लिए नहीं जीव जंतुओं के लिए राम को विनाश नहीं करने को कहता है। वास्तव में ऐसा करते समय खुद राम अपने स्वार्थ में संयम खोकर विवेक से काम नहीं लेकर विनाश करने को तैयार होते हैं। फिर तो कोई किसी भी धर्म के ईश्वर से कुछ भी विनती करता है और उसे वो नहीं हासिल होता है तो क्या राम की तरह आचरण करते हुए हिंसक होकर भय का वातावरण पैदा करना चाहिए। वास्तव में ये सोच और आचरण भगवान की बात नहीं हो सकती है ऐसा केवल राम को शक्तिशाली दिखलाने को लिखने वाले ने अपनी कथा में बिना विचार किये कहा होगा क्योंकि उसको नहीं पता था कभी धर्म की बात को भी यथार्थ की कसौटी पर खरा साबित करने की ज़रूरत हो सकती है।

पढ़ लिख कर भी हमने सोचने समझने को ज़रूरी नहीं समझा तभी कितनी अनुचित बातों को गलत परंपराओं को ढोते चले आ रहे हैं। कोई सोने का हिरण या जीव हो सकता है और सोने की चाह किसी सीता को बन में भी अपने पति को उसे हासिल करने को भेज अपनी सुरक्षा की लक्ष्मण रेखा लांघ सकती है कभी समझा ही नहीं ये वास्तविकता नहीं इक संदेश दिया गया है महिलाओं को पुरुष समाज में उनकी सीमा पार नहीं करने को भयभीत करने को ही। क्या आज भी नारी को घर की चौखट बिना पिता भाई पति की अनुमति पार नहीं करने बात उचित कह सकते हैं तब तो हमको हज़ारों साल पीछे समाज को ले जाना होगा। शायद आज भी बहुत लोग धर्म के नाम पर ऐसा ही चाहते हैं उनके लिए पत्नी माता बहन बराबरी नहीं कर सकती हैं , तुलसी दास की सोच उनको पसंद है ढोल गंवार पशु और नारी ये सब ताड़न के अधिकारी। खेद की बात है कि अभी भी महिलाएं खुद को पुरुष से कम उनके आधीन और उनकी गुलाम बनकर रहने को गलत नहीं समझती हैं।

धर्म क्या है हमने विचार नहीं किया है धर्म मंदिर मस्जिद गुरुद्वारा गिरिजाघर जाकर पूजा अर्चना करना नहीं है अच्छाई सच्चाई और ईमानदारी की राह पे चलना है। नहीं कोई गंगा आपको पाप मुक्त नहीं कर सकती है क्योंकि अगर ईश्वर सत्य है उसका विधान शाश्वत है तो अच्छे बुरे कर्म का फल मिलना ही है। जिन्होंने आपको चढ़ावा चढ़ाने या कोई कर्मकांड करने से मनचाहा मिलने की बात समझाई है उनको मालूम था आपको लालच दिखला कर खुद उनका फायदा हो सकता है। आपको सच्चाई ईमानदारी की राह मुश्किल लगती है और ये आसान रास्ता पसंद आता है इसलिए अपने सोचा नहीं भगवान के साथ भी चालाकी चल नहीं सकती है। हमको ईश्वर और धर्म को लेकर विवेक से समझना चाहिए किसी भी धर्म की किताब को पढ़ना काफी नहीं है उसकी बात को समझना और उचित अनुचित पर ध्यान देकर अपने जीवन में आचरण करना वास्तविक धर्म है। सबसे पहले ये मूर्खता बंद करना ज़रूरी है कि उनका अपना किसी का अलग अलग भगवान हो सकता है। वो एक ही है और हम सभी उसी के बंदे हैं जो हमें बांटते हैं नफरत की बात कहते हैं उनको ईश्वर या धर्म की नहीं किसी अपने स्वार्थ की चिंता है उन से बचकर सावधान रहना चाहिए।

ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु जीसस सभी एक ही हैं और उनको किसी से कुछ भी नहीं चाहिए। उनका उपदेश उनका संदेश इंसान बनकर इंसानियत की राह चलने का है। और भगवान किसी महल ईमारत में नहीं इंसान और इंसानियत में रहते हैं। मुझे अधिक नहीं पता न समझने की ज़रूरत है मुझे इतना मालूम है कि हमारा ज़मीर हम सभी की अन्तरात्मा अपना मन सभी कुछ है। अपने मन को पाने से सब मिल जाता है। गोपालदास नीरज की ग़ज़ल से आपको आसानी से समझ आ सकता है।


जितना कम सामान रहेगा

उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी

उतना तू हैरान रहेगा

उस से मिलना ना-मुम्किन है

जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल मिलें

ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मंदिर और मस्जिद हैं

मुश्किल में इंसान रहेगा

'नीरज' तू कल यहाँ होगा

उस का गीत विधान रहेगा

Tuesday, 4 August 2020

बुलाया नहीं गया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    बुलाया नहीं गया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   पत्नी जी ने आकर पूछा आपका मंदिर बनाया जा रहा है फिर से इक बार वही सब दोहराया जाएगा क्या आपको बुलावा आया है। नारद जी खबर लाये हैं भीड़ नहीं होगी केवल खास खास लोग उस अवसर पर जमा होंगे जिनको भूमिपूजन करना है उन्होंने  अपनी पत्नी तक को बुलाया नहीं है। क्या आप भी मुझे संग नहीं ले जाओगे। भगवान जी से कुछ कहते नहीं बना मगर जवाब देना ज़रूरी था बोले देखते हैं अभी कोई बुलाने को आया तो नहीं। नारद जी जाने क्या आधुनिक तकनीक की बात कर रहे थे ऑनलाइन देखने का उपाय करने को क्योंकि उनको किसी ने कोरोना की बात कही है और जाने वालों को मुंह ढक कर मास्क लगाकर अयोध्या आने को ज़रूरी किया गया है। भला मुझे अपना मुंह छिपाने की क्या ज़रूरत हो सकती है। सुना है उन्होंने देश की राजधानी में अपना सबसे भव्य आलीशान दफ्तर बनवाने का कीर्तिमान स्थापित किया है और देश भर में सैंकड़ों जगह अपने दल के भवन निर्मित करने के बाद अभी सैंकड़ों और जगह बनवा रहे हैं। आपका मंदिर भी उनके दफ्तर से कम आधुनिक सुख सुविधाओं से लैस नहीं होगा मुमकिन है अब उसकी सुरक्षा भी नया राफ़ेल विमान किया करेगा। आजकल मंदिर और राफ़ेल दोनों खबरों में छाए हुए हैं कोरोना कोरोना का रोना कुछ थम सा गया है जबकि नारद जी की जानकारी तो ये है कि कोरोना का कहर अभी जारी है। अच्छे अच्छे लोग कोरोना की चपेट में हैं न जाने आगे किस की बारी है। जब भूमिपूजन करने वाले को अपनी संगिनी को नहीं लाना है फिर आपको बुलावा आएगा भी या नहीं क्या खबर इतना तय है मुझे बुलावा हर्गिज़ नहीं आना है।

       नारद जी सही समय पर आये लड्डू का टोकरा भी साथ लेकर आये हैं। इक उपकरण दिखलाया है नाम स्मार्ट फोन बतलाया है कहने लगे एल ई डी टीवी भी मंगवाया है मगर आपके भक्तों का नेटवर्क आपके यहां नहीं काम करता ये अजब उनकी कलयुगी माया है। शायद आपने रिचार्ज नहीं करवाया है वाई फाई भी नहीं लगवाया है इंटरनेट की सुविधा ज़रूरी है ये कितनी मज़बूरी है। भगवान क्या आपने कोई नया सूट बूट मंगवाया है आपका भक्त कितना सज धज कर शान से आता है उसके पास देश भर का बही खाता है। क़र्ज़ लेकर घी पीने का सबक पढ़ाता है आपको मिला किसी बैंक का आधुनिक कार्ड है याद रखना जाने पर साथ होना आधार कार्ड पैन कार्ड है। अब बताओ आपकी कितनी कमाई है क्या इस साल की आय कर की रिटर्न भरवाई है। सोने का हिरण मिला है तो बताना होगा भाव सोने का आसमान पर है अपने सोने को बैंक लॉकर में रखवाना होगा। भगवान हैरान हैं ये क्या क्या गोरखधंधा है लगता है हर कोई आंखों वाला है मगर अंधा है। द्वारपाल ने आकर बताया है स्वर्ग से कुछ लोगों का समूह बाहर आया है आपको बाहर चलना होगा उनको भीतर लाना होगा उनको समझना है बहुत आपको सब समझाना होगा। भगवान उठकर द्वार पर जब आये हैं बाहर वालों ने विरोध के नारे लगाए हैं ये देख कर भगवान क्या सभी चकराए हैं।

    ये सभी भारत की आज़ादी के परवाने हैं उस लोक से आकर भी बेचैन रहते हैं दीवाने हैं। किसी ने पहला मुद्दा उठाया है भगवान ये कैसी आपकी माया है कितनी गर्मी है धूप है बारिश है करोड़ों लोगों के सर पर नहीं कोई साया है उन बेघर लोगों की कोई खबर नहीं है आपके कितने मंदिर हैं रहने को ये मंदिर और भी बनवाओगे। कभी कृष्ण बनकर सुदामा के घर भी जाओगे खुद छप्पन भोग लगाओगे सूखे चावल गरीबों को हर महीने पांच किलो बंटवाओगे ये बताते नहीं शर्माओगे। आपके देश में 80 करोड़ भिखारी हैं जिनको हक नहीं खैरात देकर दाता कहलाओगे। राम नाम की ये कैसी अजब लूट है सभी पर कितनी पाबंदी लगी हैं सत्ता वालों की सब छूट है। हम सभी को बदनाम किया है आज़ाद देश में नहीं बची आज़ादी है भूखी नंगी सभी आबादी है। भगवान क्या अब आपका बचा भरोसा है सच बताओ किसी मंदिर में रहते हो धर्म क्या है बताओ कुछ कहते हो। आपकी बात कौन करता है पाप करने से कोई नहीं डरता है जितने धनवान हैं बेईमान हैं अपराधी गुनहगार हैं देश की शान हैं। क्या उनके गुनाह माफ़ कर सकते हैं माफ़ करोगे तो कैसे इंसाफ कर सकते हैं। मंदिर बनने से क्या भला होगा जब शहर गांव गली गली रावण खड़ा होगा। भगवान नहीं मिलेगा भी अगर तो क्या होगा ये बताओ कहीं तो कोई बंदा बंदा होगा। कुछ तो इंसान इंसान जैसे रहने दो आज सच कहना है सच कहने दो , सच नहीं होगा तो कुछ भी नहीं होगा मंदिर होगा मगर नहीं भगवान होगा। इंसान हैरान परेशान होगा।

   बोले भगवान मैं कहां हूं मुझे ढूंढो खो गया हूं मुझको बंदी कैदी बना लिया है बेबस हो गया हूं। कब कहा मैंने मुझे कुछ भी चाहिए उनको भगवान नहीं बस मंदिर की चाहत है। मैं उधर का रहा न इधर का हूं मेरी दोनों तरफ मुसीबत है। वो जो कहते हैं क्या सदाक़त है कोई पूछे ये क्या सियासत है भगवान को बेचने लगे हैं और कहते हैं यही शराफत है। उनको मुझसे नहीं मुहब्बत है झूठ बोलने की जिनकी फ़ितरत है सत्ता वालों की बड़ी खराब आदत है। मुझसे पूछो मेरी मुसीबत है मुझको घायल किया है अपनों ने गैरों से नहीं शिकायत है आखिरी घड़ी याद आता है राम नाम वर्ना हर रोज़ झूठी दौलत है उनकी शोहरत नहीं शोर है झूठ का सच की पूछना क्या हालत है। इक ग़ज़ल पढ़ते हैं।

           इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का ( ग़ज़ल ) 

                           डॉ लोक सेतिया "तनहा"

इस ज़माने में जीना दुश्वार सच का
अब तो होने लगा कारोबार सच का।

हर गली हर शहर में देखा है हमने
सब कहीं पर सजा है बाज़ार सच का।

ढूंढते हम रहे उसको हर जगह , पर
मिल न पाया कहीं भी दिलदार सच का।

झूठ बिकता रहा ऊंचे दाम लेकर
बिन बिका रह गया था अंबार सच का।

अब निकाला जनाज़ा सच का उन्होंने
खुद को कहते थे जो पैरोकार सच का।

कर लिया कैद सच , तहखाने में अपने
और खुद बन गया पहरेदार सच का।

सच को ज़िन्दा रखेंगे कहते थे सबको
कर रहे क़त्ल लेकिन हर बार सच का।

हो गया मौत का जब फरमान जारी
मिल गया तब हमें भी उपहार सच का।

छोड़ जाओ शहर को चुपचाप "तनहा"
छोड़ना गर नहीं तुमने प्यार सच का। 







Sunday, 2 August 2020

तुम्हारी याद जब आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

    तुम्हारी याद जब आई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

तुम्हारी याद जब आई 
भरी महफ़िल में तन्हाई। 

बहारें  खो  गईं    जैसे 
जिधर देखा खिज़ा छाई। 

मुहब्बत किस तरह करते 
कहां पर्वत कहां खाई। 

समझते दोस्त दुनिया को 
यहां ठोकर बहुत पाई।

कोई दौलत ज़माने की
नहीं हमको कभी भाई।

क़यामत की सियासत है
उधर जाना इधर लाई।

हमारा कौन अब "तनहा"
हुआ करती थी बस माई।



Thursday, 30 July 2020

मां ने कहा है बेटा बहु को ले आओ ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया

   मां ने कहा है बेटा बहु को ले आओ ( कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

चिट्ठी लिखी है मां ने बेटे के नाम। सबसे ऊपर लिखा है राम जी का नाम। फिर लिखा है करना है इक ज़रूरी काम। इस से पहले कि आगाज़ करो याद करो शपथ निभाने को भूलने का अंजाम। दो शब्दों में समझ लो किस्सा तमाम देखो ढलने लगी है जीवन की शाम। बनाओ जो भी बनाना है बनाओ पर पहले मेरी बहु को घर पर ले कर आओ फिर आशिर्वाद दोनों मिलकर मुझसे पाओ। संग संग भूमिपूजन करते हैं ये बात है सच सच से नहीं मुकरते हैं। रामायण पढ़ी है तुमने कभी बच्चे धार्मिक अनुष्ठान बिन अर्धांगनी हैं आधे अधूरे कच्चे। बनवानी होगी कोई सोने की सबसे ऊंची मूर्ति छोटी बनाना तुम नहीं जानते क्या अपनी मां का कहा भी नहीं मानते। तैयार है कब वो आने को दुलारी है सुहागिन मेरी है दुलारी तुम राजकुंवर तो वो भी है इक राजकुमारी। इक बात समझ लो पत्नी से नहीं जीतोगे ये है वो जिस से सब दुनिया है हारी। ये राम राज्य कैसा है महलों में शान से रहते राजा और बन बन भटकती है जनक दुलारी। मां हूं बेटे के अवगुण कैसे बताऊं मुझे नहीं मालूम घर को स्वर्ग कैसे बनाऊं मैं ये ज़िद छोड़ो घर बहु लो लाऊं मैं मन की बात मैं भी उसको बताऊं मैं अपने हाथों से महंदी उसको लगाऊं मैं दुल्हन की तरह खुद उसको सजाऊं मैं। मेरा घर बने मंदिर कहीं और क्यों जाऊं मैं। खत्म करो सुनी थी दादी नानी से जो कहानी। इक था राजा इक थी रानी। शर्म को चाहिए चुल्लू भर पानी कब तक चलेगी आखिर मनमानी। खत को तार समझना कहीं मत बात को बेकार समझना पहले कभी नहीं समझे हो इस बार समझना। सात कसम निभाने का व्यवहार समझना।

चिट्ठी पढ़कर सुनाई अधिकारी ने और पूछा लिखना है कोई जवाब भेजना है आपको मां को। सरकार को हंसी आई कहने लगे कौन किसकी मां अब कौन किसका भाई। तुमको हमारी बात अभी तक समझ नहीं आई। मेरा नहीं है कोई किसी से नाता कुर्सी है भगवान मेरा कुर्सी है मेरी माता दुनिया के रिश्ते नाते और सभी भली बातें इश्तिहार की है बात मेरे दिन उनकी हैं घनी अंधेरी रातें। मां से होती हैं इक दिन मुलाकातें हमने कभी किसी की समझी नहीं मन की बातें ये चालें राजनीति की सीखी हैं हमने घातें भोले हैं लोग क्या जाने सत्ता की होती हैं सूखी बरसातें। मां ही नहीं भगवान भी हमने नहीं बुलाये ये मामले अजब हैं अब कौन उनको बताये मंदिर मस्जिद क्यों जाते हैं बनवाये राजनेता कभी किसी के होते नहीं हैं अपने हम हैं सभी के अपने और सभी हमारे लिए पराये। मतलब है जिनसे वही लोग हैं बुलाये पत्नी और मां हैं दूर से अच्छी लगती कोई पांव की है बेड़ी हमने ली छुड़ाय मां को कौन पैर उसके दबाये हर गलत बात पर कोई क्यों डांट खाय। हमने सीखा है बस यही उपाय जवाब लिखेंगे सब कुछ बीत जाये लिख देंगे चिट्ठी मिली है बाद में मां आपकी मिलती समय पर तो क्या सकते थे आदेश को ठुकराय। ये राम जानते हैं कोई झूठ मत बुलवाय आएगी घड़ी सासु-बहु को आएंगे हम लिवाय ये सपना आपका कहीं सच हो नहीं जाये। दिल मोरा मैया मोरी सोच सोच घबराये बासी रोटी कौन भला खाये जब हलवा पूरी मिले छपन्न भोग लगवाय।

झूठ की बुनियाद पर बनाया गया था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 झूठ की बुनियाद पर बनाया गया था ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

इस कदर बुलंद इमारत खण्हर कैसे बन गई पुरातत्व विभाग के जानकर अचंभित हैं। शिलालेख का पत्थर घोषित कर रहा है अभी सौ साल भी नहीं हुए जबकि भवन निर्माण किया गया था हज़ारों साल तक की अवधि को निर्धारित करते हुए। खुदाई में अजब बात सामने आई कि नींव की हर ईंट पर कुछ खुदा हुआ था जो अच्छी तरह से दूरबीन के लैंस से बहुत साफ करने पर पढ़ा गया तो हर ईंट पर झूठ झूठ लिखा हुआ था। ऐसा कभी देखा न सुना था कि कोई इमारत का निर्माण झूठ झूठ लिख कर नींव के पत्थर लगाकर खड़ा करे। किसी शायर ने अवश्य कहा था " दर और दरीचों के लिए सोच रहा है , वो कांच की बुनियाद पे दीवार उठाकर "। अचानक ब्लैक एंड वाइट फिल्मों के दृश्य की तरह कोई सैंकड़ों साल का बूढ़ा पुजारी हाथ में जलता हुआ चिराग़ लिए सामने चला आया और अजीब से आवाज़ में कहने लगा चले आये मुझे कब से इंतज़ार था। आपको जो समझना है जानना है मुझे सब मालूम है आपको खुदाई से कुछ भी नहीं समझ आएगा समझने को इस की वास्तविक कहानी को जानना ज़रूरी है। सबसे पहले कसम उठाओ ये कहानी जाकर सभी को सच सच सुनाओगे कुछ नहीं जोड़ेगे कुछ भी नहीं घटाओगे। चलो खामोश होकर सुनते जाओ ये कहानी नहीं वास्तविकता है। 

ये इक मंदिर था जिसको बनाने को धर्म राजनीती और न्यायपालिका ने मिलकर वर्षों तक तमाम तरह से कोशिशें की थी। धर्म के नाम पर लोगों को भीड़ बनाने को भावनाओं को भड़काने से लेकर नियम कानून को ताक पर रखने की खातिर सच को झूठ झूठ को सच बताया गया। न्यायपालिका से संविधान तक की अवमानना और शपथ उठाकर निभाना नहीं सब अनुचित अनैतिक आचरण किया गया तथाकथित बड़े बड़े भगवान के भक्तों द्वारा। सालों साल अदलती जंग और नफरत की स्वार्थ की राजनीति की रणनीति की जीत हुई और मंदिर का निर्माण किया गया। इस बीच किस किस ने कितने झूठ अदालत में सभाओं में और संसद विधानसभाओं के सदन में बोले उनका कोई हिसाब नहीं लगाया जा सकता है। मगर जब शुरुआत हुई तब भी शुरुआत करने वाले ने अपने पिछले झूठ पर झूठ बोलने के इतिहास को आगे बढ़ाते हुए सदी का सबसे बड़ा झूठ बोला कि उसने कितने साल पहले ये शपथ ली थी कि मुझे ही ये शुभ कार्य करना है इक दिन और तब तक चैन से सोना है न हंसना है न रोना है , यही मकसद मेरी छत है मेरा बिस्तर है बिछौना है। 

सबने देखा उसने बुनियाद का पत्थर लगाया जिस पर सच गया था लिखवाया , मगर ये कोई भी नहीं देख पाया कि जो जो पत्थर उसने अपने करकमलों द्वारा लगाया कुदरत ने अपना करिश्मा दिखाया। सच लिखा मिट जाता था झूठ खुद ब खुद उभर आया। आपने देखा होगा हर ईंट पर अंकित झूठ ही झूठ पाया बस झूठ कितना बड़ा होता आखिर नहीं टिक पाया हवा सच की चली ज़रा तो झूठ थरथराया ऊंचे आसमान से नीचे ज़मीं पर गिरता चला आया। झूठ के पांव नहीं होते सभी जानते हैं झूठ की बुनियाद पर भवन नहीं टिकते हैं ये समझाना ज़रूरी है। जाने कितनी बार कितने शासक आये और किसी पुरानी इमारत को ध्वस्त कर खुद इक नई आधारशिला लगवा बना चले गए ये सिलसिला चलता रहा है शायद अभी भी जारी रहेगा। आप सभी किसी नये शासक की कठपुतली बनकर आये हैं वही लिखोगे जो भी आपका आका लिखने को कहेगा। सच नहीं लिख पाओगे फिर इक और झूठ साबित करोगे सच है और जैसे आये हो चले जाओगे। इस बार कोई और नाम वाला पत्थर लगवाओगे कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा लाओगे फिर से शोर मचाओगे। देखो कुछ देर को तेज़ आंधी तूफ़ान आने को है वापस अपने ठिकाने पहुंच जाओ नहीं तो तिनकों की तरह बिखर जाओगे।

Wednesday, 29 July 2020

काम आया राफ़ेल भी कोरोना भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   काम आया राफ़ेल भी कोरोना भी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

लोग डरते हैं घबराते हैं हाय कोरोना चिल्लाते हैं राफ़ेल को देखते हैं झूमते हैं गाते हैं सत्ता वाले मन ही मन मुस्कुराते हैं। उनके लिए दोनों क्या क्या नहीं लाते हैं उनका खेल है उनका तमाशा है वो खेलते हैं सब ताली बजाते हैं। सौदा महंगा है जान सस्ती है आप क्या समझोगे क्या उनकी हस्ती है रोटी की कीमत मत पूछना वो कब रोटी बनाते हैं बड़े लोग जाने क्या क्या खाते हैं रोटी उनके लिए कोई खिलौना है जिस से खेलते हैं कहकहे लगाते हैं। आपको भूखे पेट भजन करवाते हैं उनका पेट नहीं कोई गहरा कुंवां है खाते जाते बस सभी कुछ खाते जाते हैं राम राज्य की बात कहते हैं रावण की कथा गाते हैं राम मंदिर किसे कहते हैं नहीं कभी समझ पाते हैं। उनके शासन में अपहरण फिरौती डाके लूट हत्या अपराध बढ़ते जाते हैं अपराधी दनदनाते हैं। राम नाम की धुन पर जो लोग झूमते हैं गाते हैं उनके किस्से अदालत तक पहुंच जाते हैं। इंसान नहीं बनते भगवान बन जाते हैं बड़ी देर बाद कभी शायद सज़ा पाते हैं अधिकांश पकड़े नहीं जाते हैं। इस धर्म के खेल में क्या क्या नहीं होता है धनवान राजनेता अधिकारी सभी अधर्मी कपटी की शरण जाते हैं पांव दबाते हैं निर्भय होकर वापस आते हैं। सच बताएं उनको कोरोना ने नहीं सताया है डरना क्या है उनके लिए अवसर बनकर आया है कोरोना ने उनको बाल बाल बचाया है उनसे अच्छा रिश्ता निभाया है। सत्ता का कोरोना हमजोली है सगा भाई है ताली थाली तभी बजवाई है कोरोना को पहले अंधेरा दिखलाया था फिर सभी से दिया जलवाया था अब मंदिर की शुरुआत में दीपक जलवाएंगे फिर अंधेरों से दोस्ती हमेशा निभाएंगे। आपका नसीब है खोया है खोना है जो भी बचा है उनको पाना है पाया है सभी कुछ पाएंगे लोग फिर हाथ मलते रह जाएंगे। बनेगा राम मंदिर अयोध्या भी कुछ लोग जाएंगे मगर क्या वहां कोई राम भगवान नज़र आएंगे खुद ही समझना हम नहीं बताएंगे राम नहीं किसी भी मंदिर में समाएंगे जिनको सच्चे मन से राम राम की लागी धुन उनको इंसान में भगवान नज़र आएंगे। और सब झूठी तसल्ली लिए घर लौट आएंगे राम की नहीं मंदिर की पत्थर की बनावट की बात सबको बताएंगे। आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास राम नहीं मिले सब काम रह जाएंगे राम उनकी सत्ता की सीढ़ी है नहीं आप समझ पाएंगें।

गंगा नहाने से क्या पाप धुल जाएंगे इस झूठ से कब तक सबको उल्लू बनाएंगे जो भी किया है वही सामने आएगा भवसागर से नहीं कोई पापी पाप करने वालों को पार लगवाएगा डूबेगा आपको भी डुबोयेगा नहीं कुछ कर पाएगा। मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे ईमानदारी और मेहनत की कमाई से कभी नहीं बनते हैं ये कलयुग के सहारे डूबने के हैं आसार इनके सारे नहीं मिलेंगे उनसे किनारे। राम कोई कारोबार नहीं है उसका कोई छोर आर पार नहीं है ये उसका संसार नहीं है उसकी चाल को समझो जो राम बेचता है किसी का यार नहीं है दिलदार नहीं है उसको राम से प्यार नहीं है। कोई दुश्मन राफ़ेल से घबराता नहीं है ये सब जानते हैं कोई भी ऐसे हथियार आज़माता नहीं है ये कुछ राज़ है झूठ का धंधा गंदा है सच का कोई बही खाता नहीं है। सच कोई किसी को बताता नहीं है सच लोगों को आजकल वैसे भी भाता नहीं है। राफ़ेल की है न कोई कोरोना की लड़ाई ये दोनों हैं इंसानियत के दुश्मन मेरे भाई कुछ हैवान हैं जिनको करनी है इनसे सगाई। ये उनकी है बिन ब्याही लुगाई उन्होंने इनसे अपनी सेज है सजाई मौज मनाई जी भर गया तो पराई। कहां राम हैं कहां उनकी सीता कोई नहीं लक्ष्मण कोई नहीं भाई ये नई रामायण लिखी किसी ने सभी ने सुनी उसी ने सुनाई।

सवाल है सीधा सच्चा साफ बस यही राम मंदिर से पहले क्या राम राज होगा कहीं। ये डर और लूट आतंक का राज है भूखी है जनता देश बर्बाद है नहीं काम मिलता नहीं सुरक्षित कोई। मंदिर मस्जिद बनाते रहोगे इंसानियत को भुलाते रहोगे ये कागज़ की नाव अंधे कुंवे में बहुत चल रही चलाते रहोगे मगर बाहर दुनिया तुमसे सच बुलवाएगी सच से कब तक कतराते रहोगे। मिला कुछ नहीं देश को आम लोगों को मिली है बदहाली बर्बादी सभी बेच कर सभी लूटकर किसी और तरफ भागते भगाते रहोगे। राम को बहुत बदनाम कर दिया है जाने क्या पढ़ा है समझा हुआ है। घड़ा पाप का भर गया है बस और नहीं जाता सहा है समझना थोड़े में सब कुछ कहा है। कहने को कुछ भी नहीं रहा है।

Monday, 27 July 2020

अब मंदिर भगवान से बड़ा हो गया है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  अब मंदिर भगवान से बड़ा हो गया है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

भगवान छोटे हो गए उनका मंदिर बड़ा हो गया है। भगवान हमेशा से थे मगर किसी ने ये भरोसा नहीं जताया कि वो कोरोना को खत्म कर देंगे बल्कि उल्टा समझा समझाया गया कि मंदिर भगवान के भरोसे मत रहना कोरोना उनसे भी फैल सकता है दरवाज़े ही बंद किये मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारा सभी ने। ये अब अचानक जाने कैसे किसी को पता चला है कि अयोध्या में भव्य राम मंदिर का भूमिपूजन होते ही कोरोना का अंत हो जाएगा। अच्छा है ये नहीं कहा कि अभी तक मंदिर नहीं बनाया इसी से भगवान ने कोरोना को भेजा समझाने को। मंदिर और ऊंचा और चौड़ा और अधिक गुंबद वाला होगा ये भी राम जी को खुश करने को बहुत है जैसे बकाया धन ब्याज सहित लौटाना। नारद जी सोचते होंगे नारायण नारायण नहीं मंदिर मंदिर जपना फायदे का है सत्ता भगवान के नाम से नहीं उसके मंदिर निर्माण की बात से मिलती है। भगवान कोई भी कोरोना में किसी काम नहीं आये मगर मंदिर बड़े काम आएंगे लगता है। कुछ लोग किसी नेता के भक्त बन गए हैं उनको लगता है जिस किसी ने भी उन नेता जी को उनके दल को वोट डाला उन सभी का नाम राम मंदिर बनाने वालों में शामिल हुआ है। भगवान राम किसी एक राजनीतिक दल के होकर रह गए हैं जिनको सत्ता पाने को राजनीति में आगे बढ़ने को कोई तथाकथित ढांचा गिराने का अपराध करना भी धर्म लगता है। विवादित जगह पर घर बनाना शायद कोई नियम कानून पालन करने वाला नहीं चाहेगा मगर ये तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम का मंदिर उसी जगह बनाने की ज़िद को जाने किस मर्यादा और धर्म का नाम देते रहे हैं। भगवान राम को नहीं जानते समझते बस मंदिर मंदिर रट लगाते हैं।

अपने देश के लोगों की जान बचाने के काम से बढ़कर अच्छा दान धर्म का काम कोई और नहीं हो सकता है। देश की सरकार आर्थिक संकट से गुज़र रही है कोरोना से लड़ने को सभी से दान मांगने के बाद विश्व बैंक से सबसे बड़ा क़र्ज़ ले रही है कोरोना से बचाव के लिए ही। ऐसे में ये धन जो राम मंदिर बनवाने पर खर्च किया जाएगा क्यों नहीं देश की आबादी को कोरोना से बचाव और गरीबी भूख जैसी समस्याओं के समाधान पर खर्च किया जाना चाहिए। लगता है सभी सच्चे मानव धर्म की बात भूल गए हैं भगवान घट घट में कण कण में बसते हैं मन में रहते हैं राम को राजपाट की चाहत नहीं थी। सत्ता की राजनीति को भगवान राम या किसी भी धर्म से अलग रखना चाहिए। उधर जिनके तथाकथित धर्मगुरु अपराध करने पर जेल में सज़ा पा रहे हैं उनके भी भक्त अपने गुरु को न केवल रिहाई देने बल्कि उनसे माफ़ी मांगने को कहते हैं ये दावा करते हैं वो ही कोरोना का अंत कर सकते हैं। ये कोरोना मतलबी लोगों को अवसर लगने लगा है कोई कोरोना की दवा खोजने का झूठ बोलकर कारोबार करना चाहता था तो किसी को कोरोना का भय दिखाना भी धर्म लगता है। धर्म क्या है धर्म उपदेश देने वालों ने ख़ामोशी रखना उचित समझा है ये कैसा धर्म है जिसकी कोई आवाज़ सुनाई नहीं देती मगर शोर बहुत मचा हुआ है। संकट के समय समस्या का हल तलाश किया जाता है दुनिया कोरोना की दवा वैक्सीन ढूंढ रही है और हम ऐसे समय मंदिर की बात करते हैं जैसे कोई मंदिर कहीं पहले नहीं है। भगवान का महत्व मंदिर होने से बढ़ता नहीं है भगवान को कोई कुछ नहीं दे सकता न उसको मंदिर की ज़रूरत है। मंदिर जिनकी चाहत है उनको भगवान को समझना पहले चाहिए जो लगता नहीं उनको किसी मर्यादा की चिंता है उनको भगवान की चाहत होगी।

रामायण के भगवान राम बन में रहते हैं महल में आने के बाद भी पत्नी बिना सुख साधन उपयोग नहीं करते धरती पर बिछौना बिछा कर सोते हैं। उनके नाम के मंदिर के विशाल भवन की शुरुआत ऐसा शासक करेगा जिस ने विलासितापूर्ण ढंग से जीने पर देश का खज़ाना जमकर लुटाया है जिसने मन की बात नहीं की मनमानी करने का इतिहास बनाया हो। कलयुग में जिसे लोगों ने खुद वोट देकर चुना बनाया हो जो अच्छे दिन दिखलाने के झांसे देकर सत्ता पाया हो और दिन पर दिन मुश्किलें जनता के लिए खड़ा करता लाया हो। खुद सैर सपाटे और झूले झूल दिल बहलाया मौज उड़ाया हो। आडंबर दिखलाने का किर्तिमान बनाया हो और झूठ बोलने का अपनी कही बात बदलने का खेल खेला खिलाया हो। राम मंदिर की पहली ईंट उस से रखवानी चाहिए जिस ने राम नाम की धुन पर सादगी से जीवन बिताया हो। मगर यहां सभी संत महत्मा शाही शान दिखाते हैं औरों को लोभ मोह अहंकार छोड़ने की कथा सुनाते हैं खुद धर्म के नाम पर क्या क्या बड़े बोल सुनाते हैं जो उनकी बात नहीं माने उस पर वाण चलाते हैं।

राम लला बचपन के हैं भगवान उनको कौन जाने क्या भाएगा कृष्ण कन्हैया गोकुल में मिट्टी कैसे खाएगा जब उसको भी पत्थर की हवेली में झूले पर बिठाया जाएगा। राम क्या हैं कृष्ण कौन है गीता क्या रामायण क्या छोड़ो उनकी बात को राम मंदिर किसने बनवाया लिखवाएगा। ये ताजमहल ऊंची मूर्ति क्या इनसे धर्म बढ़ाओगे पहले ढूंढो हैं राम कहां कैसे उनको समझाओगे वो राम नहीं मानेंगें कभी उनके बंदे बेघर बर्बाद रहें तो राम कैसे शहंशाह बनकर ऐसे महलों में आबाद रहें। राम सभी के राम हैं ये लगते हैं सत्ता और धनवानों के भगवान हैं। जो जतलाते हैं बनवा मंदिर बढ़ाई अपनी झूठी शान हैं जिस को समझे मालिक हैं हम इस घर के कुछ दिन को यहां महमान हैं। मंदिर बनने से पहले ही दीप जलाओ कहते हैं जाने ये कैसे लोग हैं किन परंपराओं की राह पे चलते हैं। अपनी सुविधा से अपने मापदंड बनाये हैं सीता माता की याद नहीं हनुमान जी को भुलाए हैं। शायद सोने की सीता जैसा कोई सोने का राम बनाओगे सोने के झूले में सोने का बिस्तर लगवाओगे राम लला कहते हैं क्या ऐसी सेज पर सुलाओगे रातों को नींद नहीं आएगी जगवाओगे और तड़पाओगे। लोरी तुमको आती नहीं तुम हर घड़ी शोर मचाओगे। राम सच है मगर सच बोलना बड़ा मुश्किल है जुर्म है शासक सत्ता का सच बताना भी।  अभी तक शुभ घड़ी उसको मानते थे जब जिस पल भगवान का जन्म हुआ राजतिलक हुआ अयोध्या आगमन और रावण पर विजय। मगर अब राम मंदिर का भूमिपूजन करने को शुभ मुहूर्त ढूंढ लिया है कितना बदल गया इंसान। मंदिर बड़ा हो गया है छोटे रह गए हैं भगवान उनकी बढ़ गई है शान।

चलो इक ग़ज़ल सुनते हैं।

पूछते सब ये क्या हो गया ( ग़ज़ल )

डॉ लोक सेतिया "तनहा"


पूछते सब ये क्या हो गया
बोलना तक खता हो गया।

आदमी बन सका जो नहीं
कह रहा मैं खुदा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।

भीख लेने लगे लगे आजकल
इन अमीरों को क्या हो गया।

नाज़ जिसकी वफाओं पे था
क्यों वही बेवफा हो गया।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे
काबिले बद-दुआ हो गया।

कुछ न "तनहा" उन्हें कह सका
खुद गुनाहगार-सा हो गया।

Wednesday, 22 July 2020

सब जानता सब कर सकता है ( अजब ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया

  सब जानता सब कर सकता है ( अजब ग़ज़ब ) डॉ लोक सेतिया 

ये अपने आप पर यकीं हो न हो दुनिया भर को भरोसा करवाना जानता है कि ये कोई जादूगर है जो कुछ भी कर सकता है। बस खुद को भगवान नहीं बताता वर्ना भगवान मैं हूं कह देता तो लोग यकीन करते मान भी लेते। और उसने जब जब जो भी सोचा कर दिया नतीजा चाहे कुछ भी उसको करना था और उसने ये कब कहा था सब ठीक कर सकता है सब सही में जानता समझता है। उसने सब किया भले कुछ भी ठीक नहीं किया बस खराब ही किया परीक्षा में उसने सभी सवालों के जवाब लिखे क्या हुआ जो सही नहीं लिखे बल्कि खराब लिख दिए। अध्यापक उसको शून्य से कम नंबर कैसे दे सकता था। जादूगर ने शून्य के आगे एक और पीछे इक और शून्य बनाकर सौ बना दिया। कोई माने नहीं माने उसके नंबर सौ में से सौ हैं उसकी कही हर बात सच है। आपको कल्पना करना आता है तो आप बदहाली में ख्वाब बुन सकते हैं जन्नत में रहते हैं। उसने सभी को जन्नत का ख्वाब दिखलाया था मगर ये नहीं बतलाया था कि जन्नत मरने के बाद मिलती है और मरने के बाद कौन आकर बताएगा उसको क्या मिला है। 

आपने फिल्मों में बंदूक पिस्तौल आधुनिक गन सभी से गुंडों और पुलिस वालों को लड़ते देखा है कितने मर जाते हैं घायल हो जाते हैं लेकिन वास्तव में वही अभिनेता फिर किरदार बदल अभिनय करते हैं कोई सच में नहीं मरता है। मगर हम देखने वाले यही समझते हैं ख़लनायक का अंत हो गया , रावण हर बार जलता है अगली बार उसका कद और ऊंचा होता जाता है। किसी से हमने सुरक्षा की खातिर हथियार युक्त विमान खरीदा मगर उसको अपना राज़ बता बैठे कि इसको हमने डराने को दिखाने को खरीदा हैं हम लड़ाई नहीं करना चाहते शांति के पुजारी हैं। हमने लड़ाई नहीं लड़ाई का अभ्यास दिखावा करने का तमाशा टीवी सोशल मीडिया पर देखा दिखाया वास्तव में उसको उपयोग करना ही नहीं है ये तय है कि हमने अरबों रूपये खर्च कर परमाणु बंब दिखाने को रखे हैं उनका इस्तेमाल करना मानवता का विनाश करना होगा जानते हैं। तब ये सभी समझदार देश विनाश का सामान बनाते क्यों हैं। क्योंकि उनका कारोबार है इनको बेचना खरीदना उनको चलाना नहीं। जैसे आपको कोई खिलौने के फल या कोई खाने पीने की वस्तु देता है उस से आप खुश हो सकते हैं अपना पेट नहीं भर सकते हैं। 

आपको याद है कभी किसी नेता पर इक तोप में दलाली खाने का इल्ज़ाम लगा था और उसको सत्ता से बाहर कर दिया था मगर जिस दुश्मन को गले से लगाया था वो चुपके से हमारे घर में घुस आया था। तब उसी तोप ने अपना कमाल दिखाया था सबकी ज़ुबान पर ताला लगाया था। चोरी साबित नहीं हुई चोर कहलाया था और चोर चोर कहने वालों को खूब मज़ा आया था। चोर कौन था और कौन था जिसने चोर का शोर मचाया है। उसी जैसा कोई फिर से आया था अपनी झोली में सब है सबको नाच नचाया था। आया रे आया रे खिलोने
वाला खेल खिलौने ले के आया रे ,आओ मेरी आंख के तारो कहां गए ओ मेरे प्यारो। देखो मैंने गुड्डे की शादी है रचाई मेरी प्यारी गुड़िया की बारात है आई। संजीव कुमार फिल्म में बच्चों का दिल बहला रहे थे कोई दुनिया भर को उल्लू बनाने को खेल खिलौने से खुश करना चाहता है। सम्मोहन करना जानते हैं कुछ लोग और कोई उनकी आंखों में आंखें डालकर सम्मोहित हो कर जो वो बोलता है उसी को दोहराता है। मगर इक बात ध्यान रखनी ज़रूरी है आप कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकते हैं लेकिन सभी को हमेशा को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता है। जादूगर ओ जादूगर तू है बड़ा बाज़ीगर।


Tuesday, 21 July 2020

कोरोना रटते जग मुआ ( कथा-सागर ) डॉ लोक सेतिया

      कोरोना रटते जग मुआ ( कथा-सागर ) डॉ लोक सेतिया 

         गुरूजी घर बैठे ज्ञान की गंगा बहा रहे हैं आधुनिक गुरूजी वीडियो पर सतसंग का अर्थ समझा रहे हैं। आपने अभी तक चैनल को लाइक नहीं किया फेसबुक ट्विटर पर इंस्टग्राम पर फॉलो नहीं किया तो पहले यही शुभ काम करें फिर घंटी बजाएं सोते हुए को जगाएं। कहीं और मत जाएं यहीं सब है पहले आएं पहले पाएं हर किसी मत आज़माएं आओ आपको उनसे मिलवाएं जिनके नाम की माला से भवसागर से पार हो जाएं। क्यों हम अमरीका चीन से घबराएं झूठी लगन लगाकर बंदे फिर पाछे पछताएं। कौन कौन कोरोना वाला कैसे समझें और समझाएं कोरोना से बचना है या कोरोना को पास बुलाएं। सच्ची बात किसको पता है चलो किस को ढूंढ कर लाएं लेकिन जाना कहीं नहीं है अपने मन को ये समझाएं बाहर कुछ भी नहीं मिलेगा मिलेगा सब जब भीतर को जाएं। अंतर्मन की बात को समझें मन भटकेगा मन को समझाएं उसकी लीला कौन है जाना आओ मिलकर कोरोना गायें। कुछ भी नहीं सच इक वही सच है सच को समझें सच समझाएं। बना लिए भगवान भी कितने और कितने ईश्वर खुदा बनाएं नहीं कोई बचाता कोरोना से काहे किसकी शरण को जाएं। मंदिर मस्जिद गिरिजाघर गुरूद्वारे गली गली कब तक चुनवाएं नहीं वहां पर मिलता कोई घर पर कीर्तन कर सुख पाएं। ये भक्ति कोई खेल तमाशा जो दुनिया को हम दिखलाएं अपने भीतर रहता है वो कस्तूरी है हम मृग की तरह दौड़ते ही जाएं फिर पछताएं। 

      नीरज जी की बात को समझें कोई ऐसा मज़हब नया चलाएं जिस में इंसान को बस केवल इंसान बनाएं। मंदिर मस्जिद के झगड़े जिनके हैं उनको लड़ने दो हम सभी हैं उसके बंदे आपस में मिलकर झूमें गाएं। किसी की चालों में बातों में आकर अपना चैन मन का नहीं गंवाएं इक उसी ने सभी को बनाया मूर्ख हैं जो उसको बनाएं। मूर्खों की टोली कहती है तुमको ज्ञान की बात बताएं ये सब इक थैली के चट्टे बट्टे हमको बांटें मौज मनाएं अब तो अपने दिल से सोचें उनकी चालों से बच जाएं। जिनको उसका पता नहीं है कहते हैं सबको उस से मिलवाएं ये भटके हुए राही हैं खुद अंधे राह सबको दिखलाएं। करते सब कोरोना कोरोना नहीं जानते है कौन कोरोना क्या होना है कब क्या होना। ये पीतल है चमकता सोना जागो जागो तुम मत सोना जागना है पाना सोना है खोना बस इतनी सी बात नहीं समझे और नहीं किसी बात का रोना। जो भी करते थे ऊंची आवाज़ में बड़ी बात उन सबको कोरोना ने जमाई जमकर लात नहीं समझे फिर भी शायद वो अपनी औकात।

     खेल खिलाड़ी और खिलौना इसका उसका किस किस का कोना उनको पाना तुमको खोना। जिनकी देखी सुनी बढ़ाई उनको दौलत पाप की कमाई झूठी शान नहीं काम आई जब अपने पांव में फ़टी बुआई। उनके दान धर्म के चर्चे उनके शोहरत उनके खर्चे हैं सारे झूठे ही पर्चे नहीं किसी काम के चर्चे। कितना बड़ा अंबार है जिनका बस दो गज़ आखिर आकार है उनका काली सफेद कैसी कमाई लूट की दौलत काम नहीं आई। जब कोरोना दर्शन देता है साथ नहीं जाता कुछ भी किसी के जाने किस काम की सोने की लंका बजा करता था जिनका भी डंका उनका नहीं निशान भी बाकी और कितने अरमान हैं बाकी। कहते करते समाज की सेवा खाते हैं सेवा का मेवा ऐसा कोई धर्म नहीं है उनको कोई शर्म नहीं है। आखिर कोई हिसाब तो होगा पाया खोया अच्छे बुरे कर्म का दूध और पानी का जली आग सब राख भी होगा। क़यामत के दिन इंसाफ़ भी होगा कोई गुनाह नहीं माफ़ भी होगा जिसकी जैसी करनी उसकी होगी वैसी ही भरनी। किस भगवान का बनवाओगे तुम मंदिर जिसकी ऊंची ईमारत जिस की होगी अकूत दौलत क्या उस में भगवान मिलेंगे या फिर नफरत के भेदभाव के इंसान नहीं शैतान मिलेंगे। भगवान का नाम बदनाम किया है क्या क्या उसके नाम किया है खुदा ईश्वर वाहेगुरु जीसस क्या इनका कारोबार करोगे कब तक कितनी बार करोगे। मोह माया झूठ के जाल से छुटकारा पाओगे कैसे इक दिन बाबुल के घर जाना है अपने दाग़ छुपाओगे कैसे। आज की कथा सतसंग बस इतना है आखिर में भजन की तरह आरती समझ इस ग़ज़ल को मिलकर गाओगे।

  आया नहीं दाग़ अब तक छुपाना ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा" 

आया नहीं दाग अब तक छुपाना
मैली है चादर हमें घर भी जाना।

हम ने किया जुर्म इक उम्र सारी
बस झूठ कहना नहीं सच बताना।

सुन लो सभी यार मुझको है कहना
की जो  खताएं उन्हें भूल जाना।

मुझ से बुरा और कोई नहीं है
मैं खुद बुरा हूं भला सब ज़माना।

दस्तूर मेरा यही तो  रहा है
जीती लड़ाई को खुद हार जाना।

तुमने निकाला हमें जब यहां से
फिर ठौर अपना न कोई ठिकाना।

"तनहा" जहां छोड़ जाये कभी जब
सबको सुनाना उसी का फसाना।

Monday, 20 July 2020

गांधारी ने सब देख लिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      गांधारी ने सब देख लिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      आखों पर पट्टी बंधी रहती है न्याय की देवी की मगर न्याय करने वाले कह रहे हैं हमको सब दिखाई दे रहा है फिर भी आपको अवसर मिल रहा है कल तक विशेष जांच दल नियुक्त कर जो नज़र आ गया हर किसी को उसको ढकने छिपाने का उपाय कर सकते हैं। आपको नहीं समझ आया या अचरज हो रहा है कि जब आपको साफ साफ नज़र आने लगा है फिर किसलिए आंखों के डॉक्टर से लैंस डलवाने की बात कह रहे हैं। लगता है कुछ दिन पहले महभारत सीरियल देखा अभी खुमार बाकी है। गांधारी अपने बेटे को जीतने का आशिर्वाद नहीं देने के बाद भी मौत से बचाने को उपाय बना लेती है और दुर्योधन को नंगे आने को आदेश देती है ताकि जीवन भर बंद रखने के बाद आंखें खोलें तो सामने नज़र आया हाड़ मांस का इंसान पत्थर का बन जाएगा। कृष्ण के कहने से दुर्योधन अपने कमर से नीचे के भाग को पेड़ के पत्ते से ढक लेते हैं और वो भाग पत्थर नहीं बन सकता है। न्याय की देवी की पट्टी भी जाने कैसे खुल गई और लगता है सामने खड़ी व्यवस्था जैसे पत्थर की बेजान हो गई है। 

   देख कर अनदेखा करना ये कोई दोस्त की मुहब्बत की बेरुखी की बात नहीं है ये उनकी मज़बूरी है उनको अदालत की कुर्सी मिली ही ऐसी शर्त पर थी कि आपको वही देखना होगा जो सत्ता दिखाएगी। बड़ी वफ़ा से निभाई तुमने हमारी थोड़ी सी बेवफ़ाई , हज़ार रहें मुड़ के देखीं कहीं से कोई सदा न आई। अभी तक सब ठीक ठाक ही नहीं बढ़िया से बढ़कर लाजवाब क्या बेमिसाल चल रहा था। सरकार के पासे सीधे पड़ते रहे शकुनि की चाल की तरह कुशलता पूर्वक ये मामला इतना नंगा है की लोग शर्म से अपनी आंखें बंद कर लेते मगर क्या करते जब खेल खुला फर्रुखाबादी वाला हो। जो पहले हुआ ये उस से अगली कड़ी है तब सीबीआई के अधिकारी की शिकायत सीबीआई के अधिकारी ने दर्ज करवाई सीबीआई की जांच करने की टीम ने आधी रात को सीबीआई दफ्तर पर छापा मार कर सीबीआई की अदालत में मुकदमा दायर किया था। अब अदालत गुनहगार को क़त्ल करने वाले आरोपी पर उसी को जांच गठित करने को अवसर दे रही है। शायद किसी और देश की अदालत के इक मुकदमे की बात किसी फ़िल्मी कहानी में सुनी देखी थी दोहराई जा रही है।

  कहानी यूं है इक न्यायधीश की अदालत में इक मुकदमा सामने लाया गया। अपराध साबित करने को दोनों पक्ष दलीलें देते रहे गवाह पेश करते रहे। सुनवाई करते करते घटना के समय स्थान की बात हुई तो न्यायधीश महोदय को ध्यान आया कि जो बताया जा रहा सब झूठ है क्योंकि खुद वो उस समय उसी जगह उपस्थित रहे थे। लेकिन न्याय करने वाला खुद अपनी गवाही नहीं दे सकता था। जब निर्णय देने का समय आया तो न्यायधीश ने वकीलों को ही सज़ा सुना दी ये कहकर कि उन्होंने जान बुझ कर अदालत को गुमराह किया है मनघड़ंत आरोप नकली सबूत और झूठे गवाह पेश किये गए हैं। फैसले में लिखा कि ये लोग नहीं जानते थे कि खुद मैं उस दिन उस समय उसी जगह उपस्थित था। लेकिन वकील फिर वकील ठहरे ऊपर की अदालत चले गए और न्यायधीश को ही कटघरे में खड़ा करवा दिया ये कहकर कि उनको पहले पता था तो उन्हें इस मुकदमे से ही हट जाना चाहिए थे उनकी गवाही की कोई अहमियत नहीं समझी जा सकती है। क्योंकि अदालत को खुद कुछ भी देखना नहीं होता है उसको जो वकील और गवाह दिखलाते हैं उसी को सच मानकर निर्णय देना होता है। बेशक उनको मालूम था मगर उन्हें अपने देखे को अनदेखा कर जो दिखलाया गया उसको सच मानकर निर्णय देना था। तब ऊपरी अदालत ने बेहद खेद जताते हुए फैसला किया था कि न्यायधीश को गवाह सबूत को देखने के बाद भी अपने विवेक से उचित निर्णय करने का अधिकार होता है और वकील और पुलिस का काम न्याय करने में सहयोग देना होता है न कि इंसाफ़ की आंखों में धूल झौंकने का काम करना अर्थात मुकदमा चलाने वाले वकील और सभी विभाग अपराधी ही नहीं बल्कि उनको भविष्य में इस काम करने का अधिकार भी नहीं हो सकता है।  जनाब आपको सब दिखाई दे रहा है मगर आप चाहते हैं उसको सपना समझना तो फिर इंसाफ भी इक झूठा सपना बनकर रह जाएगा।

Friday, 17 July 2020

सब कुछ तोड़ो दिल को छोड़ो ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   सब कुछ तोड़ो दिल को छोड़ो ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  ऐसा लोग कहते थे कभी , आजकल नहीं समझते , धन दौलत पैसा गया तो कुछ भी नहीं गया , सेहत खराब हो गई तो कुछ चला गया है , चाल चलन बिगड़ गया तो सब चला गया कुछ भी नहीं बचा है। कुछ उसी तर्ज़ पर हाथ जोड़कर नेताओं से निवेदन है विधायक तोड़ लो हम फिर और विधायक सांसद बना लेंगे जिनकी कीमत तो होगी फिर भी मुमकिन है उनका भाव इतना ऊंचा हो कि खरीदार ही नहीं मिले बिकने को सभी राज़ी हैं कहने को पंडित मुल्ला क़ाज़ी हैं। पुल टूटते रहते हैं सड़क गड्ढे बन जाती है कश्ती नदी को छोड़ शहर की गली में चलने लगती हैं बारिश आती है तो जो ढका छिपा सामने आ जाता है नहीं आये तो सूखा इतना कि गरीब की आंख से बहते अश्क़ अमीर की आंख का पानी मर जाता है। आप कश्ती को किनारे मत लगाओ बेशक नाख़ुदा बन कश्ती को मझधार में डुबो देना पतवार को छोड़ सकते हैं लोग डूबते डूबते भी जीवन नैया से उस पार जाने को बेताब हैं जन्नत मिलेगी स्वर्ग मिलेगा उम्मीद रहती है। पर ऊपर वाले के वास्ते खुदा का वास्ता है कोई दिल कभी मत तोड़ना ये दिल टूटता है तो फिर नहीं जुड़ता है। आपका दिल सत्ता की सीमेंट से पत्थर का हो जाता है हम लोगों का दिल नाज़ुक है शीशे से भी हम आपसे पत्थर से फ़रियाद करते हैं हमसे टकराना मत हज़ार टुकड़े हो जाएंगे दिल के कोई इधर कोई उधर बिखर जाएगा फिर नहीं जुड़ेगा। 

    हमारा दिल कोई बाज़ार का सामान नहीं है दिल को दौलत से मत तोलना दिल लेना दिल देना दिल वालों की नगरी में दिलवालों का काम है सरकार के पास दिल नहीं होता बस दिमाग़ होता है जो प्यार के नाम पर खुराफ़ात करता है दिल को दौलत के तराज़ू में तोलता है और दिलों से खेलता है। खिलौना समझ कर दिल से खेलना जिनकी फ़ितरत है बड़ी बुरी उनकी बेवफ़ाई की आदत है। आपकी सियासत भी क्या सियासत है आपको खुद से भी होती अदावत है अपनी चाहत ही इबादत है मुहब्बत है चाहे बग़ावत है। सत्ता की सुंदरी के मोहपाश में बंधे राजनेता कभी सन्यास की बात नहीं करते सन्यासी भी राजनीति में आकर ऐसे फंसते हैं कि उनको बिना कुर्सी चैन नहीं आता बगैर सत्ता जल बिना मछली से तड़पते हैं। किसी दार्शनिक ने चिंतन किया और समझने की कोशिश की महल को घर को छोड़कर बन में पर्वत पर जाने का कारण क्या है। जो लोग चाहते हैं उनको साधु संत समझें लोग जो मोह माया से मुक्त हैं वैराग्य हो गया है भगवान के भजन सिमरन में जीवन बिताते हैं मगर वास्तव में उनको अपने ही दिल पर काबू नहीं होता है मन भटक जाता है सुंदरी को देख कर भगवान भजन में मन नहीं रमता है परेशान होकर चले जाते हैं कहीं वीराने में। लौटते हैं खाली हाथ मन लगता नहीं भगवान मिलते नहीं उनकी हालत इधर के रहे न उधर के ही वाली हो जाती है।

         जैसे कोई दलबदल करता है मगर पछताता है दिल चाहता है जो हासिल होता नहीं फिर घर वापसी की उम्मीद रखते हैं। रूठना मनाना कहने की बात है असली मकसद सौदेबाज़ी होता है राजनीति कोई कभी घाटे उठाने को नहीं करता है। आशिक़ी में दिल फ़ायदा नुकसान नहीं सोचता कभी जनता दिल से काम लेती है किसी न किसी पर दिल फ़िदा हो जाता है मगर सत्ता को वफ़ा का अर्थ नहीं मालूम राजनीति का नाम ही धोखा है बेवफ़ाई है। जनता बेचारी किस्मत की मारी है हो जाती किस किस पर बलिहारी है जीतने की कोशिश की मगर हरदम हारी है। देश की राजनीति और सरकारी विभाग अधिकारी कर्मचारी धनवान पैसे वाले कारोबारी उद्योगपति वर्ग से गठबंधन कर वो भी बेचने का काम करते हैं जो उनके पास कभी भी नहीं होता है। ईमानदारी और सच्चाई आत्मा और ज़मीर ऐसे शब्द हैं जो उनकी किताब में नहीं मिलते हैं। देशभक्ति जनसेवा का तमगा लगाकर फिरते हैं देश को खाने वाले। अपना अपना दल है अपने शोरूम की तरह जो कभी फुटपाथ पर मजमा लगाते थे आजकल किसी मॉल के आलीशान हाल में अपना खेल तमाशा दिखलाते हैं। गांव के सरपंच से शुरू सफर संसद पे जाकर रुकता तो नहीं ठहरता है कुछ देर को। आकाश पर घर बसाने की आरज़ू हर किसी की होती है जबकि आसमान का कोई अस्तित्व होता ही नहीं है। कुछ भी नहीं होने के बावजूद ऊपर छाए रहने का नाम ही राजनीति है। शोहरत की बुलंदी अधिक समय टिकती नहीं है।
आपके पास जाने क्या क्या होगा हम लोगों के पास दिल की दौलत के सिवा कुछ भी नहीं होता है। ये सलामत रहे बस इतना चाहते हैं दिल जिस भी हाल में है मेहरबानी करो इसको ऐसे ही रहने दो। कितनी बार टूटेगा जुड़ेगा नहीं बिखर जाएगा। 

Thursday, 16 July 2020

बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 बदले-बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

        
    हमारी सरकार भी आशिक़ की महबूबा जैसी है हमको कितनी अच्छी लगी थी जब दिल आया था उसको अपनी बनाया था। अब उसको अपने बनने संवरने से ही फुर्सत नहीं मिलती हम दर्द ए दिल की बात कहते हैं सुनती ही नहीं है। मिलने की कोई सूरत नहीं है खत लिखते हैं पढ़ती नहीं महबूबा जवाब का इंतज़ार करते रहते हैं हम। दूर के ढोल सुहावने होते हैं अब समझ आने लगा है उसके पास सौ बहाने हैं हज़ार काम हैं करने को हमारी तरह खाली तो नहीं है। इक दिन बड़े नखरे से अदा से कहने लगी ये सब्सिडी छोड़ क्यों नहीं देते और सभी ने छोड़ दिया जो भी सरकार ने जब मांगा दे दिया या देना लाज़मी था। कोई उस से नहीं कह सकता तुम भी छोड़ दो कितने फज़ूल खर्चे करती फिरती हो मगर कह नहीं सकते अपनी सरकार है महबूबा है शान से रहती है अच्छा है। शायद कभी कहेगी बस अब कोई कर नहीं देना बहुत दे दिया कब तक अपना पेट काटकर सरकारी खज़ाना भरते रहोगे कुछ लोगों पर बर्बाद करने को , मगर ये झूठा सपना नहीं सच होगा कभी भी। आजकल पहचानती नहीं है ये महबूबा हमको हमसे आधार कार्ड मांगती है खुद जिसका कोई आधार नहीं था अब खुद को संसार मानती है। ऐ मुहब्बत तेरे अंजाम पे रोना आया , हमने सोचा था कि बारिश में बरसेगी अच्छे दिनों की शराब , आई बरसात तो बरसात ने दिल तोड़ दिया। यही आशिक़ी का रोना है दूर रहना मुश्किल लगता था करीब आकर जीना मुहाल हो गया है , कमाल होना था मगर क्या कमाल हो गया है धोती फाड़कर जैसे रुमाल हो गया है। जो कबाड़ी था मालामाल हो गया है बाकी हर बंदा कंगाल हो गया है।

   चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएं हम दोनों। उस मोड़ से शुरू करें हम फिर से ज़िंदगी , हर शय जहां हसीन थी हम तुम थे अजबनी। हर कोई पछताता है काश उस से कभी मुलाकात नहीं होती कोई बात नहीं होती ये बेमौसम की बरसात नहीं होती। अपनी चांदनी रात की मुलाकात नहीं होती हुस्न-ओ -इश्क़ की करामात नहीं होती। तेरे वादे पर जिए हम तो ये जान ए झूठ जाना कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता। ये न थी हमारी किस्मत के दीदार ए यार होता , कोई रूह चैन पाती किसी दिल को करार होता। मेरे महबूब तुझे मेरी मुहब्बत की कसम कोई लौटा दे मुझे ऐसी सरकार से पहले के वही दिन जैसे भी थे इन अच्छे दिनों से बेहतर थे। कोई पुल टूट गया बह गया पहली बरसात में , नर्म लहज़े भली बातें मुहज़्ज़ब लहज़े पहली बारिश में ही ये रंग उतर जाते हैं। लोग सरकार को दोष देने लगे मगर सरकार नदी पर बने पुल के ढहने बहने का इल्ज़ाम गांव के लोगों पर लगा रही है उन्होंने लॉक डाउन का पालन नहीं किया घर बैठे रहते तो ये दिखाई कैसे देता। नेताओं की बात और है उनको चुनाव लड़ना है कोरोना बढ़ता है उनकी बला से सरकार बनी रहनी चाहिए। आठ साल में बना पुल महीने भर भी काम नहीं आया सरकार बनाने गिराने की बात और है उनका खेल ख़त्म नहीं होता है कोशिशें नाकाम भी होती रहती हैं इरादे कायम रहते हैं।

        इक और राज्य की पुलिस ने सरकारी ज़मीन पर खेती करने वाले किसान पर जमकर लाठी चलाई उस की पत्नी तक को नहीं बख्शा बच्चे बिलखते रहे कानून का बेहरम नंगा नाच चलता रहा। ऐसे पुलिस वालों को सज़ा तबादला करना जांच करना और क्या फांसी चढ़ाओगे। पुलिस वाले पर ज़ुल्म करने वाले को मुठभेड़ में कत्ल का इंसाफ आम मुजरिम और गुनहगार पुलिस दोनों पर न्याय कानून अलग अलग। पुलिस कानून को पालन करवाती है मनवाती है खुद नहीं पालन करती मनवाती कभी। साहब बीवी और ग़ुलाम कमाल की फ़िल्म थी मगर कहानी बदल गई है। फिल्म में नायिका की बात मन में रहती है नायक साहब की बीवी की उलझन सुलझाता रहता है खुद अपनी उलझन नहीं सुलझा पाता है। चौदवीं का चंद की कहानी जुड़ गई है नायक दोस्ती निभाते निभाते अपनी बीवी से रिश्ता नहीं निभा सकता नायिका वही है गीत और है बदले बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं। बीवी घर बैठी गुरुदत्त की फिल्मों में अपनी दास्तां तलाश कर रही है। पिया रंगून नहीं दिल्ली जा बैठे हैं उनकी मन की बात रेडियो पर गूंजती है। शुरुआत खूबसूरत थी चौदवीं का चांद हो या आफ़ताब हो जो भी हो तुम ख़ुदा की कसम लाजवाब हो। हमको गुलामी करनी है आज़ादी से घबराते हैं और सरकार की दाढ़ी बढ़ती गई है उनको देख कर सोचते हैं ये क्या सूरत बना रखी है। मगर कोई देवदास नहीं हैं साहब साहब हैं वो चाहते हैं रोनी उदास शक्ल बनाकर दिखाना पर लगती नहीं उनकी अंदर की भावना छुपती नहीं छिपाने से। समस्या इतनी ही है कि देश की सरकार और राज्यों की पुलिस दोनों से कायदे की कथा नहीं लिखी जा रही है इधर उधर की कितनी फ़िल्मी कहानियां मिलाकर पैरोडी गीत और गंभीर विषय को कॉमेडी बना देते हैं। प्यार और सरकार दोनों बिना ऐतबार नाम को रह जाते हैं। शादी को छोड़ दिया ऐतबार को तोड़ दिया तकरार ही बची है।


Tuesday, 14 July 2020

कभी खुद को भी देखो दर्पण में ( बदलते बाट ) डॉ लोक सेतिया

  कभी खुद को भी देखो दर्पण में ( बदलते बाट ) डॉ लोक सेतिया 

      उसने क्या किया किस किस ने क्या किया सब की बात कहते हैं खुद तुमने क्या किया नहीं सोचा कभी। ये बड़ी अजीब बात है संवेदना का मर जाना है जो कुछ लोग किसी को कोरोना होने को भी उपहास और मनोरंजन की बात समझते हैं। माना टीवी चैनल मीडिया पागल है पैसे टीआरपी और विज्ञापन की कमाई ने अंधा किया हुआ है उनको समाज दिखाई नहीं देता बस वही लोग नज़र आते हैं जो इनकी झोली भरते हैं। ये आधुनिक वैश्याएं हैं इनको सच का झंडाबरदार मत समझो ये करते हैं झूठ का गुणगान तो क्यों देखते हो इनको छोड़ दो पागल को समझाया नहीं जाता पागल सभी को पागल बताता है। लेकिन दर्द तकलीफ परेशानी किसी की भी हो इंसानियत का अर्थ है उस से संवेदना होना जिनको किसी नायक को कोरोना होना चुटकुले का विषय लगता है कभी भगवान न करे उनके किसी अपने करीबी को हो तो क्या होगा। नायक है या कोई भी आखिर इंसान तो पहले है और आपने अपनी इंसानियत को क्यों छोड़ दिया। हम हर किसी की सलामती की दुआ मांगते हैं तभी भले लोग हैं अन्यथा बेदर्द लोग हैं। 

   यही कुछ दिन पहले किसी अभिनेता के ख़ुदकुशी करने पर हुआ। ख़ुदकुशी करना दुःख दर्द चिंता की बात है मगर जीने के लिए साहस होना चाहिए वर्ना लोग कब किसी को चैन से जीने देते हैं। किसी पर आपने इल्ज़ाम धर दिया ख़ुदकुशी को विवश किया था कभी सोचा मुमकिन है खुद आपने जाने अनजाने कब किसी को इस सीमा तक आहत किया हो कि उसका जीना दूभर हो जाये। क्या कभी नहीं किया आपने , सच तो ये है आपने सभी ने अपने ही लोगों को परेशानी में अकेला छोड़ना ही नहीं उनको ताने मरना अपमानित करना जैसे गुनाह भी किये हैं। ये समाज बड़ा बेरहम बेदर्द है जो अपने दर्द को ही जानता है किसी और का दर्द दर्द नहीं लगता है , कभी कहा होगा फालतू नाटक करते हैं अब ये रोकर दिखा रहा है खुद रुलाया है नहीं सोचा कभी। 

     सोशल मीडिया फेसबुक व्हाट्सएप्प ने आपको अवसर दे दिया लिखने जो चाहे कहने का मगर आपने उसको सामाजिक सदभावना बढ़ाने दोस्ती करने आपस में विचार विमर्श करने के लिए सार्थक उपयोग नहीं किया। आपने अपनी भड़ास अपनी नफरत अपने भीतर छुपी किसी को नीचा दिखाकर खुश होने की गंदी सोच और मानसिकता की खातिर इस्तेमाल किया है। कितने लोगों ने लिखा वो अपराधी था उसको क़त्ल किया गया तो ठीक हुआ मगर अपराधी और सभ्य समाज एक जैसे नहीं हो सकते हैं अपराधी अपराधी हैं क्योंकि कानून को नहीं मानते लेकिन पुलिस और समाज अपराधी नहीं बन सकता उसको नियम कानून और न्यायपालिका और देश के संविधान को सर्वोच्च समझना चाहिए। किसी को भी अपराध करने का अधिकार नहीं हो सकता है। आज गुनहगार को बिना अदालत के निर्णय के सज़ा दी गई कल आपको कोई मुजरिम बताकर सज़ा दे तो क्या होगा क्या आपको न्याय अदालत और अपना पक्ष रखने का हक नहीं होना चाहिए। सबसे बड़ी बात अगर देश की पुलिस ही कानून का पालन नहीं करती और बदले की भावना से क़त्ल करती है तब कानून न्याय व्यवस्था है कहां। ये वही पुलिस है जो खुद अपराधी को पालती है उसको बढ़ावा देती है जब खुद पुलिस पर अपराधी भारी पड़ा तब होश आया पहले क्या किया था और पुलिस करती क्या है नेताओं के तलवे चाटती है देखते हैं उनको नेताओं के जूते साफ करते हुए। अपनी गरिमा खुद पुलिस ने ख़ाक में मिलाई है पुलिस सुरक्षा बल किसी नेता अधिकारी की नहीं देश की सुरक्षा की खातिर हैं उनकी आस्था संविधान और देश के कानून में होनी चाहिए किसी व्यक्ति या सरकार में नहीं। 

   आपको आपत्काल याद है मगर क्या लोकनायक जयप्रकाश नारायण की कही बात याद है। 25 जून 1975 को दिल्ली के रामलीला मैदान में यही तो कहा था उन्होंने कि पुलिस या सुरक्षा बल को किसी नागरिक पर लाठी गोली चलानी नहीं चाहिए जब लोग शांति पूर्वक अपने अधिकार के लिए धरना प्रदर्शन कर रहे हों। आपको जनता की सुरक्षा करनी है दमन नहीं करना है , दमनकारी सरकार या कोई भी विभाग देश के संविधान और कानून के खिलाफ है। आपको किधर खड़े होना है ये आपको विचार करना है। अपने को आईने के सामने खड़े कर फिर निर्णय करो सही गलत का।

Saturday, 11 July 2020

लाज का घूंघट खोल दो ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      लाज का घूंघट खोल दो ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

   खुद को अपराध न्याय सुरक्षा सामाजिक सरोकार के जानकर सभी कुछ समझने वाले बतलाने वाले कुछ कह रहे हैं। पुलिस को सब मालूम रहता है कब कौन चोर चोरी करेगा कौन क्या अपराध करता है हर पुलिस वाला शरीफ आदमी को और बदमाश को देखते ही पहचान लेता है। पुलिस की मर्ज़ी ख़ुशी है जिसे चाहे अपराधी साबित करने को सबूत बना ले और जिसे बेगुनाह साबित करना हो उसके सबूत मिटा भी दे। मगर इस सब के बावजूद भी पुलिस का इंसाफ ही सच्चा इंसाफ है जो निर्णय कोई अदालत कितने साल लगाकर कितना पैसा खर्च करवा कर देती है किसी पुलिस वाले ने पहले ही कहा होता है कुछ हज़ार में मामला सुलटवा सकता है। बेशक पुलिस एनकउंटर में किसी को मारती है तो अपराधी गुनहगार की मौत के साथ न्याय और कानून की भी हत्या होती है मगर क़त्ल करने क़त्ल होने और क़ातिल कहलाने में बड़ा अंतर है। पुलिस जब क़त्ल करती है तब इंसाफ ताबड़तोड़ होता है सनी दयोल की तरह वाला न कोई सुनवाई न कोई सबूत न कोई गवाह। दामिनी फिल्म सुपरहिट रही थी आपने भी खूब तालियां बजाईं थी फिर अब क्या हुआ , होना यही चाहिए था ऐसे गुनहगार को सज़ाए मौत कह रहे सभी। पुलिस ने मामला सस्ते में निपटा दिया है। पुलिस वाले जानते हैं किस आतंकवादी को बचाना है उसको कश्मीर से दिल्ली चंडीगढ़ पहुंचा रहे थे तो क्या हुआ तब मामला और था। पुलिस को बाकायदा रिश्वत देकर आंतकवादी सहयोग ले रहा था पुलिस का पुलिस से तालमेल नहीं होने से बात खुल गई और आतंकवादी अपने मकसद में सफल नहीं हुआ तो क्या। ऐसा कभी कभी हो जाता है अन्यथा पुलिस का रिकॉर्ड है जिस से रिश्वत लेती है उसको बचा लेती है। 

    अदालती व्यवस्था किसी काम की नहीं है एक अदालत कोई निर्णय देती है ऊपर की अदालत बदल देती है और उस से बड़ी अदालत हैरान होती है कि पहले सही निर्णय था फिर खुद सरकारी वकील ऊपरी अदालत क्यों गया। सरकारी वकील अपराधी पर मुकदमा चलाता है उसे गुनहगार साबित करने को लेकिन चाहता है उसको बेगुनाह साबित करना। जितने मुजरिम छूटते हैं अपराध साबित नहीं होने के कारण सब वकील की मेहरबानी से मुमकिन है। मामला जितना ऊपर जाता है रिश्वत और अदालती कारवाई दोनों का भाव बढ़ता जाता है। बड़ा जूता ज़्यादा पालिश खाता है। पुलिस सुधार की बात बहुत होती है मगर पुलिस को सुधारना कौन चाहता है जिन राजनेताओं को ऐसा करना चाहिए उनकी राजनीति का अंत हो जाएगा जिस दिन देश की पुलिस सही मायने में कानून का पालन करने करवाने लगेगी। आधे राजनेता सलाखों के पीछे होंगे ही उनकी ज़मानत नहीं हो सकेगी। जब देश की संसद में आधे सांसद और विधानसभाओं में आधे विधायक जुर्म की खूबसूरत दुनिया से आये हों तब सरकारी विभाग पुलिस या अन्य अधिकारी भला देश समाज के लिए ईमानदार हो कैसे सकते हैं। 

     सांसद विधायक बिकते हैं सरकार बनाने गिराने को तब जनमत कहां होता है। चुनाव पर करोड़ रूपये खर्च करने वाले या राज्य सभा की मेंबरशिप पाने को करोड़ों का हेर फेर होना क्या संविधान और कानून के अनुसार होता है। जब ये होना है होता है तो खुले आम बोली लगे क्या खराबी है जब नाचन लागी तो घूंघट काहे को। बंद करो अदालत सभी और पुलिस को न्याय की दुकान चलाने दो जैसे चल रही है खुले आम हो तो भारत महान बनने में कोई फर्क नहीं पड़ेगा। पुलिस थाने बिकते हैं तो न्याय भी उपलब्ध हो क्या खराबी है जिसको जहां से सस्ता मिले या अपनी मर्ज़ी का महंगे दाम भी ले ले। ईमान बिकते हैं भगवान बिकते हैं तो इंसाफ और न्याय भी बाज़ार में बिकने से परेशानी क्या है। आत्मनिर्भर होने का इक तरीका ये भी है क्यों किसी और के भरोसे रहे कोई।  लगता  है जल्दी ही शेयर बाजार की तरह विधायक सांसद के भाव ऊपर चढ़ते नीचे गिरते दिखाई देंगे। अब इस से नीचे कितना जाओगे रसातल में पहुंच गए हैं। 

गणिका डाकू और सिपहसलार ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया

   गणिका डाकू और सिपहसलार  ( व्यंग्य-कथा ) डॉ लोक सेतिया 

    जाने कितने आशिक़ थे उस के जो उसकी अदाओं पर फ़िदा थे। उसका नाच देखते गाना सुनते और उस पर अपनी दौलत उड़ाते रहते। इक डाकू उस से दिल लगा बैठा और उसे कहा बाकी सब को अपने ठिकाने पर आने से रोक दो बस मेरे लिए नाचना गाना होगा। गणिका भला किसी एक की होकर कैसे रहती उसने नगर के सिपहसलार को संदेसा भिजवा कर अपने ठिकाने बुलवा लिया। जैसे सभी को अपनी सच्ची मुहब्बत का भरोसा दिलवाना जानती थी सिपहसलार को भी अपने प्यार के जाल में फंसा लिया। जब लगा वो पूरी तरह बस में है तो डाकू से बचाने की बात कह दी। सिपहसलार ने अपने कितने राज़ गणिका को बता दिए जिसे जानकर गणिका को लगने लगा कि शायद डाकू उसको माफ़ कर भी दे गलती मानने पर लेकिन ये जो नगर का सुरक्षा का काम करने को नियुक्त किया गया है शासक द्वारा डाकू से अधिक खतरनाक है।

  काफी समय तक गणिका दोनों से मुहब्बत का दिखावा करती रही निभाती रही अपने ठिकाने पर किसी को भी नहीं आने दिया और उन दो सिरफिरे आशिक़ों से उनके अपनी माशूक़ा को दिए ठिकानों पर मिलती रही। राजदरबार में गणिका की अच्छी जान पहचान बढ़ती गई और कई रईस नवाब उसको छुपकर अकेले में मिलते रहे। धीरे धीरे गणिका का रुतबा राजा के दरबार से उसके महल तक होता गया। इक गणिका और चाहने वाले तमाम लोग आपसी रंजिश हो गई और बढ़ते बढ़ते जान से मरने का खेल होने लगा। ऐसे में जो कभी नहीं होना संभव था हो गया जब खुद गणिका को कोई इतना भाया कि नगर छोड़ उसके साथ किसी और राजा के राज्य में चली गई। मगर जाने से पहले डाकू को भी और सिपहसलार को भी खत लिख कर दोनों को दूसरे पर अपहरण करने की धमकी देने की बात बता गई ताकि वो आपस में उलझे रहे और उसे कहीं तलाश नहीं करें।

   सिपहसलार ने अपने सिपाही डाकू को पकड़ मारने को भेज दिए मगर डाकू को पहले ही जानकारी मिल गई थी और डाकू  गिरोह ने सिपहसलार के सिपाही को मार डाला। ये खबर होते ही सिपहसलार ने जाकर डाकू का ठिकाना तहस नहस कर दिया जब उसको पकड़ नहीं सका। बस हर तरफ शोर मच गया सिपहसलार के सिपाही डाकू के शिकार हो गए हैं। आखिर उसने इक इक कर डाकू के सारे साथी मौत के घाट उतार डाले मगर सरगना को नहीं पकड़ सका। मगर फिर इक और गणिका ने डाकू को बचाने और सिपहसलार से समझौता करवाने का वादा किया और अपने पास डाकू को हिरासत में पकड़वा दिया। सौदेबाज़ी में कोई गड़बड़ नहीं हुई मगर उस से दूर जाने पर सिपहसलार ने अपनी माशूक़ा गणिका को लेकर पूछा तो बात बिगड़ गई और सिपहसलार के सिपाहियों ने उसके आदेश पर डाकू को कत्ल कर दिया। जिस गणिका के पास कितने ही राज़ थे उसका कभी कोई पता नहीं चला और राजा ने अपने सिपहसलार को मौत की सज़ा दे दी ये सोचकर कि उसने गणिका को कहीं अपने पास रख लिया है।
  
         गणिका अभी भी नाच रही होगी किसी और को खुश करने को जो उसकी बाज़ारी मुहब्बत जो बिकती है सिक्कों की खातिर को असली समझ जान लेने जान देने का खेल खेलने को तैयार हैं।

Friday, 10 July 2020

अब नहीं ज़रूरत हमारी ( उस लोक की बात ) डॉ लोक सेतिया

  अब नहीं ज़रूरत हमारी ( उस लोक की बात ) डॉ लोक सेतिया

भगवान ने अपने सीसीटीवी पर देखा शनिदेव जी अभी तक अपने कक्ष से बाहर नहीं निकले तभी उनके व्हाट्सएप्प पर शनिदेव का संदेश मिला जिस में अपना न्याय करने का काम छोड़ने का निर्णय सूचित किया गया था। ये सामान्य घटना नहीं थी और भगवान भी न्याय के मामले में कोई हस्ताक्षेप नहीं करने की शपथ को दरकिनार नहीं कर सकते थे। न्याय का भार कोई और देवता नहीं वहन कर सकता है क्योंकि उनकी अपने अपने भक्तों से अनुराग की आदत जो है। भगवान जानते हैं शनिदेव को मनाना उनके अकेले की बस की बात नहीं है इसलिए सभी अन्य देवताओं की विशेष बैठक तुरंत बुलाना ज़रूरी हो गया। जब बाकी सभी आ गए तब भगवान ने शनिदेव से बात करने को वीडियो कॉल करना उचित समझा। जय शनिदेव महाराज जी क्या बात है आपने अपना न्याय का कार्य त्यागने का निर्णय ले लिया कोई परेशानी है तो बताएं। आप जानते हैं न्याय के बिना संसार का क्या हाल हो सकता है और निष्पक्ष न्याय सर्वोच्च अदालत की तरह केवल आप ही कर सकते हैं जो निर्णय देते समय पिता तक का भी लिहाज़ नहीं करता है। सभी देवता देवियां आये हैं आप भी आ जाएं या हम सभी आपके पास निवेदन करने आ सकते हैं आपसे अनुमति लेना ज़रूरी है। शनिदेव ने कहा किसी के भी आने की ज़रूरत नहीं है मगर फिर भी इंतज़ार करें मैं आपके आवास पर उपस्थित होता हूं। 

     शनिदेव ने आते ही सभी को अभिवादन करने के बाद खुद ही कहा आपको पूछने की ज़रूरत नहीं है आपको खबर भी है मगर फिर भी अपने आप ही खुद बताता हूं क्यों मैंने इक खबर का संज्ञान लेते हुए ये संदेश भेजा अपना फैसला बताने को। जब पुलिस वाले ही अपराधी को पकड़ अदालत में पेश करने की ज़रूरत नहीं समझते और खुद ही निर्णय करते हैं उसको जान से मारने की सज़ा दे देते हैं और सरकार अदालत देख समझ कर भी खामोश रहते हैं अदालत को अपनी तथाकथित मानहानि नहीं दिखाई देती तब मेरी क्या आप सभी देवी देवताओं की भी ज़रूरत है भी कि नहीं ये गंभीर चिंतन का विषय है। मुझे अगर न्याय नहीं करना करवाना तो मेरा कक्ष से बाहर जाना किस काम का। कोरोना काल है सबको अपनी सुरक्षा की चिंता है और घर में बंद रहना है विवशता होने पर मुंह बंद रखना है पट्टी बांध कर निकलना है। 

  तभी यमराज जी भी खड़े होकर अपनी बात कहने लगे , बोले ये सच है आजकल जो कोई भी मरता है कोरोना ने उसकी जान ली ऐसा समझते हैं कोई भगवान की धर्मराज की बात नहीं करता और यमराज है भी या नहीं कोई नहीं सोचता है। मेरा काम भी कोई और करता है ये होने लगा है तो मेरा भैंसा भी कहता है हमको छुट्टी मिल गई है बदनाम होने से बच गए हैं। बस ये शुरुआत थी एक एक कर सभी देवी देवता जो कब से खामोश थे अपने अपने विभाग के उपयोगी नहीं रहने के कारण अपनी अपनी दर्द भरी दास्तां खुलकर बताने लगे। महकाल जी चाह कर भी कुछ नहीं कह सके और बजरंग बली हनुमान जी भी संकट हरने में खुद को विवश पा रहे थे। देवी लक्ष्मी को बताना पड़ा उनके खज़ाने की दशा क्या है और कौन है जिसने कुबेर से बढ़कर खज़ाना बढ़ा लिया है लूट खसूट और चोरी हेराफेरी का युग है बात राम राज्य की होती है आचरण की मत पूछो कभी दानव भी ऐसा नहीं करते थे जो डायन होती थी वो भी चार घर छोड़ देती थी। 

ईश्वर भी विचार करने लगे और सोचने लगे क्या अब दुनिया मेरी मर्ज़ी से चल रही है लगता तो नहीं है। अब मेरे नाम पर धर्म स्थल बनाने का ही काम किया जाता है मैं वहां रह नहीं सकता ऐसा वातावरण है। जब किसी सरकार के बस में कोई भी विभाग नहीं रहे तब उसको होने बने रहने का क्या अधिकार है। भगवान दुःखी होकर कहने लगे मुझे बताओ मेरा कोई अस्तित्व बचा ही नहीं है मैंने अपना पद छोड़ कर जा भी नहीं सकता किसे सौंपूंगा ये कर्तव्य और अधिकार। लगता है इस दुनिया का अंत करना ही उपाय है जब इंसान इंसान नहीं बन सकता भगवान समझने लगा है और शैतान बन गया है। ये शैतान का शासन है मगर हम क्या शैतान से हार मानकर उसको मनमानी करने देंगे। शनिदेव जी आपने हम सभी की आंखें खोल दी हैं लेकिन आपको अभी निराश होकर कोई निर्णय जल्दबाज़ी में नहीं लेना चाहिए। अभी आप इस विषय को छोड़ कर अपने कर्म करते रहें हम सभी की विनती है जल्द ही पूर्ण सभा में कठोर निर्णय इसको लेकर अवश्य लिया जाएगा। बस हर सीमा पर हो चुकी है अब मुझे भगवान देवी देवताओं को तमाशाई नहीं बनकर रहना है जो भी करना चाहिए करना ही पड़ेगा।

गुनाहगार का क़त्ल इंसाफ़ का जनाज़ा ( वारदात ) डॉ लोक सेतिया

 गुनाहगार का क़त्ल इंसाफ़ का जनाज़ा ( वारदात ) डॉ लोक सेतिया 

     जो दवा के नाम पे ज़हर दे , उसका क़ातिल ही उसका मुंसिफ़ है , कानून के रखवाले ही जब अपराधी बन जाते हैं जैसी कितनी बातें ज़हन में आती हैं। देश में कोई विधान है कानून का संविधान का शासन है जिस में अपराध अपराध ही है कोई गुनहगार करे या फिर पुलिस सुरक्षा के लोग। हम किसी अपराधी के मरने से कभी भी चिंतित नहीं होते हैं मगर गैरकानूनी ढंग से बदले की भावना या कोई और मनसूबा रख कर किसी का नियोजित ढंग से क़त्ल करना उसको एनकाउंटर बताना हमारी चिंता का विषय है होना भी चाहिए। क्या हमारा देश वास्तव में महान कहलाएगा अगर यहां सत्ता के अधिकार या पुलिस की वर्दी का उपयोग कोई मनमाने ढंग से नियम कानून को ताक पर रखकर करे। मगर सब जानते हैं जिनको कानून व्यवस्था लागू करनी है खुद उनकी आस्था कानून में नहीं है बल्कि सच ये है कि पुलिस आदतन अपराधी से गठजोड़ करती है और उसकी सहमति और जानकारी से अपराधी अपराध करते हैं। विकास दुबे की अपराध कहानी भी यही है और ये कोई कानपुर और उत्तर प्रदेश राज्य की बात नहीं हर शहर हर राज्य की यही सच्चाई है। मुझे याद है कुछ साल पहले हरियाणा मानव अधिकार आयोग के सदस्य और पदाधिकारी फतेहाबाद आये थे और इक बैंक्वेट हाल दि फाइव एकर्स के शानदार भवन में भाषण दिए गए थे जिस में हैरानी की बात थी अपने छोटे दफ्तर से दो भवन बनने को उपलब्धि बता रहे थे जबकि उनको नागरिक के मानव अधिकारों की दशा और उसके हनन की बात करनी चाहिए थी। मंच पर पुलिस और अन्य विभाग के अधिकारी बैठे थे और दोनों तरफ से इक दूसरे की तारीफ की जा रही थी। ऐसे में कोई उनको अधिकारी वर्ग की अन्याय की बात करने का साहस नहीं कर सकता था। मगर कुछ लोग पुलिस की मारपीट की शिकायत करने चले आये थे जिनको बाद में मिलने को कहा गया अर्थात जो आपका पहला फ़र्ज़ है उस को महत्व नहीं दिया गया।  

   पुलिस आम नागरिक से कभी भी सभ्य व्यवहार करने की आदी नहीं रही है। पैसा और जान पहचान उनके लिए कोई भी कर्तव्य निभाने के लिए इक शर्त है अन्यथा आपको भटकाना  और टाल मटोल करना उनको आता है। अधिकांश अपराधी पुलिस की जानकारी में जो चाहे करते हैं रिश्वत और मुफ्तखोरी पुलिस को अपने अधिकार लगते हैं। अपराधी और पुलिस का गठबंधन जब तक आपसी टकराव नहीं हो चलता रहता है जो विकास दुबे के मामले में भी हुआ सभी जानते हैं। अपराधी ने साज़िश की उसका जुर्म संगीन है मगर पुलिस को अपराधी की तरह नहीं देश के कानून के रक्षक की तरह आचरण करना चाहिए। पुलिस को भी कानून से न्याय व्यवस्था से खिलवाड़ की अनुमति नहीं होती है। अगर हमारी पुलिस आपराधिक ढंग से कार्य करती है और सत्ताधारी नेता अपराध को बढ़ावा देते हैं और संसद विधानसभाओं में गंभीर अपराध के दोषी या आरोपी सदस्य बनकर माननीय कहलाते हैं तो ये समाज के लिए खतरनाक और डरावनी बात है। क्या ऐसे तमाम अपराधियों को इसी तरह सड़क का न्याय देना उचित होगा तब तो कोई भी पुलिस या अन्य सुरक्षा बल की वर्दी पहन अपने विरोधी या दुश्मन को कत्ल कर उसे कोई भी नाम दे देगा। हम कई देशों की आलोचना करते हैं कि वहां सेना और पुलिस जो मर्ज़ी करते हैं। हम देश पर गर्व तभी कर सकते हैं अगर देश में नागरिक सुरक्षित हैं कोई असमानता भेदभाव अन्याय किसी के साथ नहीं हो और सभी को निडर होकर जीने का हक हो , डर अपराधी से हो या पुलिस या नेता या धनवान अथवा अफ़्सर से गलत ही है।

 आपको सरकारी फॉर्म मिलते हैं सब दर्ज होता है बस आपको खाली जगह पर नाम और जानकारी भरनी होती है। उसी कहानी को नाम मुजरिम कौन समय और जगह बदली हुई मगर पहले से निर्धारित की हुई भोले मासूम पुलिस वाले लिखते हैं सुनाते हैं कोई भरोसा करे नहीं करे उनकी बला से। एन्कॉन्टर को आप कानून के नाम पर देश के सबसे बड़े गिरोह , जैसा किसी अदालत ने कहा था कि इस देश की पुलिस अपराधियों का संगठित गिरोह है। पुलिस वाले एन्कॉन्टर कभी अपनी मर्ज़ी से नहीं करते हैं उनको मज़बूर होकर ऐसा करना पड़ता है अन्यथा गुनहगार अदालत में जाने कितने पुलिस वालों और नेताओं के साथ उसका इस्तेमाल करते रहे लोगों को बेनकाब कर सकता है।  इतने बड़े बड़े शातिर अपराधी ऐसी मूर्खता करते हैं खुद हिरासत में पकड़े जाने के बाद बीच राह किसी पुलिस वाले से पिस्तौल छीन कर भागने की कोशिश कर अपनी मौत को बुलावा देते हैं जबकि उनको पता होता है अदालत उनको इक दिन बेगुनाह करार देकर बरी करेगी और हर दाग़ी नेता की तरह वो न्यायपालिका पर भरोसा था का ब्यान दोहराएंगे। 1975 से 2020 तक का सफर भी दुष्यंत कुमार की बात दोहराने से नहीं रोक सका है , " यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है , चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिए। पुलिस अदालत इंसाफ सभी उस तरफ जा रहे हैं जहां किसी शायर की नज़र में " क्या बतलाएं हमने कैसे सांझ सवेरे देखे हैं , सूरज के आसन पर बैठे घने अंधेरे देखे हैं "। " उनके पत्ते ही अगर आग बरसाने लगे , कौन फिर बैठेगा बरगदों की छांव में "।  ये कोई हैरानी की बात नहीं है इसी की आशंका थी ये नहीं होता तो जाने क्या होता। पुलिस का काम खुद ही निर्णय करना नहीं है क्योंकि ऐसा करने पर गुनाहगार से पहले इंसाफ़ का क़त्ल हो जाता है।


Thursday, 9 July 2020

ढूंढो ढूंढो ढूंढो चौकीदारों को ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   ढूंढो ढूंढो ढूंढो चौकीदारों को ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

                 कुछ दिन महीने या साल भर पहले कितने लोग चौकीदार होने को गौरव की बात समझते थे। मैं भी चौकीदार बतलाने वालों से फेसबुक भरी रहती थी। अचानक याद आया तो ढूंढने पर कोई नहीं मिला कल मुझे जाने उन सभी को हुआ क्या। छुट्टी न कोई हड़ताल कोई तो करो पड़ताल कहां सब चले गए क्या कोई वेतन का झगड़ा था या कोई चोर पुलिस का लफड़ा क्या हुआ कुछ तो राज़ है छुपा हुआ। कुकरमुत्ते की तरह उनकी फसल फैलती जाती थी ख़त्म कैसे हुई लहलहाती फसल। ये घर बिना चौकीदार सजता नहीं हम क्या करें कोई होना चाहिए रात भर जागते रहो की आवाज़ लगाने को। भगवान न करे कहीं कोई अनहोनी तो नहीं हुई जैसे कोई ऐसी नशीली हवा चली जो सभी चौकीदार गहरी नींद में सो गए। मालूम नहीं उनका कौन सा विभाग है जिस से जाकर सूचना के अधिकार का उपयोग कर जानकारी हासिल की जा सकती है। सबसे पहले जिसने खुद को देश का चौकीदार बताया था उसी को अपने भाई बंधुओं की खोज खबर लेनी चाहिए।  इक दिन किसी कॉमेडी शो में कोई खिलाड़ी से हास्य जगत में आने के बाद राजनीति में चले जाने वाले बंदे ने सरदार जी ने बताया था उनको इक नेता ने समझाया था कि जिन तिजोरियों के खज़ाने लुट जाते हैं उन पर कोई ताले नहीं लगाता है। ये वही कहानी तो नहीं कि जब देश का खज़ाना लुट चुका तब चौकीदार को हटा दिया गया कहकर कि रखवाली किस की करोगे जब रखवाली करने को कुछ बचा ही नहीं तब वेतन कहां से मिलेगा। शायद ये स्थाई नौकरी नहीं थी ठेके पर निर्धारित समय को नियुक्ति हुई थी और समय गुज़रते ही अनुबंध खत्म। 

       ऐसे में मामला बेरोज़गार होने का बनता है इतने लोग चौकीदार के पद पर नियुक्त थे उनकी क्या दशा होगी कोई तो उनकी चिंता करे। चोर और पुलिस का खेल चौकीदार के बगैर कैसे चलेगा। फेसबुक पर इक ऐसे दोस्त की पुरानी डी पी दिखाई दी तो उसको संदेश भेजा क्या हुआ आपकी सारी बिरादरी ठीक तो है। जवाब आया आपको संसदीय भाषा में बात करनी चाहिए अन्यथा मुझे आपको मानहानि का नोटिस भेजना पड़ेगा। मैंने हैरान होकर पूछा क्या असभ्य शब्द मैंने उपयोग किया है तो कहने लगे सब जानते हैं अब ये चौकीदार शब्द गंदी गाली बन चुका है इसका उच्चारण नहीं किया जाना चाहिए। मुझे बिटिया ने समझाया हुआ है पापा जी वकील से कभी बहस नहीं करना जीत कर भी घाटे में रहोगे। मैंने पूछा वो कैसे तो बेटी जो वकालत करती है बोली पहले मेरी फीस दो फिर सलाह मिलेगी। बात समझ आ ही गई। लेकिन जाने क्यों मुझे चौकीदारों को ढूंढना ज़रूरी लगता है मेरा निवेदन है जिस किसी को खबर है कौन कौन चौकीदार था या खुद ही जो चौकीदार कहलाने को शान समझते थे वो भी पूरी जानकारी मुझे उपलब्ध करवाने की अनुकंपा करें क्योंकि असंगठित बेरोज़गार लोगों को उनका अधिकार दिलवाने का मेरा मकसद है। किसी का बकाया वेतन या फिर हटाने पर मिलने वाला मुआवज़ा बकाया होगा ज़रूर भला उनका शोषण कैसे किया जा सकता है। 

    आपको अपना नाम दर्ज करवाना चाहिए ये आपको भविष्य में पूर्ण सुरक्षा दे सकता है। पंजीकरण बेहद आसान है आपको अपनी फेसबुक पर लिखना होगा " मैं भी चौकीदार नहीं हूं " जैसे पहले होने का ऐलान किया था बस उसी तरह से ही। भले आपने अपना दल बदल लिया हो दिल बदल गया हो या भीतर से ही आपकी आत्मा ने आपको समझाया हो तब भी आपने जितने कार्यकाल तक सेवा दी है चौकीदार बनकर आप को उतना ही वेतन मिलना चाहिए सभी सुविधाओं के साथ जितना पहला खुद को चौकीदार बताने वाला लेता रहा है और अभी भी ले ही रहा है। जब उसने खुद को चौकीदार कहना छोड़ने के बाद भी उस लाभ के पद के फायदे उठाना नहीं छोड़ा तब आपको क्या ज़रूरत है अपने हक को छोड़ने की ये कोई सौ दो सौ रूपये की रसोई गैस की सब्सिडी नहीं है लाखों नहीं करोड़ों की बात है। आपको दिल्ली जाना चाहिए सब मांगे अपनी मनवाने को जैसे महमूद मेहरबान फिल्म में अपने गधे को सभी गधों का लीडर बनाकर जाने का संदेश दे रहे हैं। 

 



Monday, 6 July 2020

विकास लापता सुरक्षा घायल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    विकास लापता सुरक्षा घायल ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      जहां कहीं भी हो देश की व्यवस्था को तुम्हारी तलाश है। खोजने वाले को ईनाम दस गुणा बढ़ा देने का वादा किया है विकास बिना कुछ भी अच्छा नहीं लगता है उनको जिनसे विकास का मधुर संबंध कितने साल से रहा है। उनको बेमौत मार दिया दिल तोड़ दिया उनकी वफाओं का ये कैसा सिला दिया है। जिसकी उम्मीद नहीं होती वही दिल के टुकड़े टुकड़े करता है तो मुश्किल होती है कैसे बताएं किस किस को कैसे समझाएं कि हमारी किसी से कैसी मुहब्बत रही है। बदनाम खुद भी होना पड़ता है अपने आशिक़ की बेवफ़ाई की दास्तां सुनाने में बंद दरवाज़े की राज़ की बात होने लगी है ज़माने में। दिल का क्या हाल हुआ दिल लगाने में किसी को अपना बनाने किसी के भाग जाने में , लोग डूब गए हैं गंगा नहाने में। गंगा मैली हुई और भी पाप धोने धुलवाने में बस इतना ही फर्क है पास आने दूर जाने में। 

   इधर मामला संगीन है बहुत लोग देशभक्ति और धर्म की अपनी परिभाषा मानते हैं मनवाते हैं। उनका कुतर्क है सत्ता से सवाल मत करो सत्ता और उनके तथाकथित भगवान को झूठ बोलने का अधिकार है इतना ही नहीं उसका झूठ भी बड़े काम का है उस के झूठ को दुनिया सच मानती है और अब देश को उनका झूठ ही बचा सकता है जितवा सकता है। ये वही लोग हैं जो नोटेबंदी में परेशान थे कैसे अपने ही पैसे को अपना बताकर अपना धंधा या कोई भी काम करें मगर ऐसे लोगों को सत्यमेव जयते या सत्य ही ईश्वर है जैसे शब्द दीवार पर लिखने को होते हैं वास्तव में आचरण करने को नहीं। देशभक्ति धर्म ईमानदारी उनके लिए बड़ी बड़ी अच्छी लगने वाली ऐसी बातें हैं जिनका पालन वो कभी नहीं करते हैं कोई उनको आईना नहीं दिखला सकता है। ये समझदार लोग उनको नासमझ बतलाते हैं जो देश की मौजूदा हालत पर सत्ता और सरकार से सवाल करते हैं उनका विचार है कि सवाल विपक्ष से किये जाने चाहिएं और देश की अर्थव्यवस्था से लेकर कानून व्यवस्था और स्वास्थ्य से शिक्षा की खराब दशा का इल्ज़ाम पहले की सरकारों के सर जाना चाहिए। 

  विकास विकास की रट लगाते विनाश को घर बुलाते रहे , अपराधी दाग़ी नेताओं को सत्ता पाने को अपना हमजोली बनाते रहे उनको निर्दोष साबित करने से लेकर मुकदमे वापस लेने तक सब बेशर्मी से करते रहे। जिस व्यक्ति पर खुद कितने आपराधिक मुकदमें दर्ज थे उसी को राज्य का मुखिया बनाते रहे जो सत्ता मिलते ही हज़ारों को मुकदमे वापस लेने की राहत देने का फ़रमान सुनाते रहे। अपराधी दनदनाते रहे और लोग उनके गीत गाते रहे झूमते नाचते गुनगुनाते रहे ज़ख़्म खाते रहे मुस्कुराते रहे। विकास उनको धोखा देकर उनको उन्हीं की बिछी बिसात पर पटखनी देकर उनकी आंखों में धूल झौंककर गायब हो गया है तब समझ आया घर का भेदी लंका ढाये और बोये पेड़ बबूल के आम कहां से खाय। इक विकास ने कितनों को नंगा कर दिया है ये सत्ता का हम्माम है जिस में सभी नंगे हैं। विकास की बात ख़त्म नहीं होने वाली है अभी चलती रहेगी और विकास को सरकार सुरक्षा बल ढूंढते रहेंगे जैसे देश की जनता अच्छे दिनों को ढूंढती फिरती है। आखिर में इक ग़ज़ल से विषय को अल्पविराम देते हैं विराम देना मुमकिन नहीं है। 

 

             बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ( ग़ज़ल ) 

                             डॉ लोक सेतिया "तनहा"

बहती इंसाफ की हर ओर यहां गंगा है ,
जो नहाये न कभी इसमें वही चंगा है।

वह अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये ,
हाथ अगर उसका छुएं आप तो वो दंगा है।

महकमा आप कोई जा के  कभी तो देखें ,
जो भी है शख्स उस हम्माम में वो नंगा है।

ये स्याही के हैं धब्बे जो लगे उस पर ,
दामन इंसाफ का या खून से यूँ रंगा है।

आईना उनको दिखाना तो है उनकी तौहीन ,
और सच बोलें तो हो जाता वहां पंगा है।

उसमें आईन नहीं फिर भी सुरक्षित शायद ,
उस इमारत पे हमारा है वो जो झंडा है।

उसको सच बोलने की कोई सज़ा हो तजवीज़ ,
"लोक" राजा को वो कहता है निपट नंगा है। 

Friday, 3 July 2020

बाज़ीगर जादूगर सौदागर छलिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 बाज़ीगर जादूगर सौदागर छलिया  ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

एक भी अनेक भी जैसे कोई ठगने वालों की टोली हो। आपको ये सभी काल्पनिक किरदार फिल्मों में दिखाई देते रहे हैं अब सामने हैं मगर आपको पहचान नहीं हो रही है। आपको नटवरलाल अच्छे लगते हैं ये सभी नटवरलाल की संतानें हैं। चालीस चोरों की टोली है अलीबाबा कोई नहीं अब ये भी इनका कमाल है कि जितने भी नायक थे हुए हैं या बन सकते हैं उनको इन्होने जोकर बना दिया अपनी जादूगरी दिखला कर। और जिसको जोकर नहीं बनाया जा सकता था उसको खलनायक साबित कर दिया और ये सभी जो वास्तव में खलनायक ही हैं नायक महानायक बन कर आसमान पर छा गए हैं आंधी की तरह। धूल ने सूरज को ढक दिया है और अटल जी की कविता भरी दुपहरी में अंधियारा सूरज परछाई से हारा फिर सच हो गई है। अब आंधी का दावा है दिए की सुरक्षा करने का। आपने शायद कभी देखा हो कलाकार लोग पुरानी फिल्मों को कभी विदेशी फिल्मों को बदल कर अपनी नई फिल्म बना लेते थे और कभी तो कितनी पुरानी फ़िल्मी तस्वीरों को जोड़कर गडमड कर कुछ और ही बना पेश करते रहते हैं। संगीत में ये बहुत है अच्छे दिल को छूने वाले दर्द और प्यार की भावना वाले नग्में आधुनिक धुन पर मिलाकर इक शोर किसी डिस्को में झूमने को बनाने का चलन बेहद सफल हो रहा है। रोने की बात पर ठहाके लगते हैं बस यही देश समाज में होने लगा है। इतनी कहानियां एक साथ जुड़ गई हैं कि असली नकली की पहचान नहीं हो सकती है। जो बाबा खुद नकली साबित हो चुका है फिर से उसी का बाज़ार खुल गया है खोटा सिक्का चलने लगा है। 

    देशभक्ति का सौदागर देश को ही बेचने की बात करने लगा है ये उसी का कमाल है सबकी झोली खाली है इक वही मालामाल है सोने जैसा रंग है तेरा चांदी जैसे बाल इक तू ही धनवान है गोरी बाकी सब कंगाल। गोरी शब्द की जगह आपके मन में जो नाम आया है अभी सच है , क्योंकि मन की बात है। मन से कुछ भी छिपता नहीं है मगर मन चंचल है झूठे ख़्वाब बड़े बड़े सपने दिखलाता है और आपको सपने सच होने की उम्मीद होने लगती है। उसका शतरंज का खेल अजब ग़ज़ब है उसकी उलटी चाल भी सीधी समझी जाती है और सामने कोई खिलाड़ी नहीं होता है विरोधी उसको पसंद नहीं है खुला मैदान उसका अधिकार है जिधर जो खेल चाहे खेल सकता है। मैदान कोई भी हो खेल उसी का है खिलाड़ी अकेला वही है उसकी टीम में बाकी सभी अनाड़ी हैं और ऐसे अनाड़ी खुद अपने गोलपोस्ट में गेंद डाल देते हैं मगर ये हारी बाज़ी को अपनी जीत घोषित कर देता है अपने हाथ से गेंद को उठाकर सामने के गोलपोस्ट में डाल सकता जिस में कोई गोलकीपर होता ही नहीं है। उसकी मर्ज़ी से नियम बदल जाते हैं खेल बदल जाता है और खेल का मैदान तमाशा दिखलाने का स्थान बन जाता है। नमस्कार , भाइयो और बहनों , मित्रो मेरे प्यारे देशवासियो कितने आयोजन उस के निर्देशन अभिनय की मिसाल हैं। और इक मीडिया है जो ताली बजा बजा कर क्या खूब है तमाशा लाजवाब है घोषणा करने को तैयार रहता है।

  इक मदारी है उसका बंदर है और जमूरे ही जमूरे है , कभी एक जमूरा हुआ करता था मदारी का खेल उसी पर आधारित होता था। जमूरे बता कितने लाख करोड़ और जवाब होता देश की जनता से अधिक वोट मिले आपको छह सौ करोड़ मत से विजयी हुए आप। उनका झूठ पकड़ा जाता साबित नहीं होता कभी भी। अदालत गवाह कानून सब उसकी कठपुतलियां हैं उसकी कही बात गीता रामायण से बढ़कर है। उसकी टोली के लोग दवा के नाम पर ज़हर देते हैं लोग स्वस्थ्य होने की जगह स्वर्ग सिधार रहे हैं मगर फिर भी सब को यकीन है यही मोक्ष दिलवा सकता है अच्छे दिन नहीं अब सीधे स्वर्ग भेजने का उपाय है। देश की अर्थव्यवस्था को इतना ऊंचा खड़ा कर दिया है कि नीचे अस्सी करोड़ लोग दो जून रोटी की खैरात पाने की हालत में पहुंच गए हैं। दाता इक वही है भिखारी सारा देश है ये बेमिसाल शासन का ही कमाल है।

    आपने बापू के तीन बंदरों की बात सुनी होगी इक देखता नहीं इक बोलता नहीं इक सुनता नहीं है। मगर इक लिखने वाले ने लिखा था कि वास्तव में बापू के पास चार बंदर थे जब बापू तीन बंदरों की कथा सुना चुके तब वो चौथा बंदर कहीं बाहर गया हुआ था भाषण देने को। उसने कहा बापू मुझे भूल गए अपनी कहानी में मेरा नाम नहीं बताया काम नहीं बताया मेरी पहचान क्या होगी। बापू ने कहा भविष्य में हर तरफ तुम ही टीम नज़र आओगे लोग इन तीन बंदरों को भूल जाएंगे तुम जो बस बोलना जानते हैं भाषण देने में निपुण हैं वही शासन करेंगे। मैंने जानकर तुम्हारी गैरहाज़िरी में तीन बंदरों से सबकी पहचान करवाई है ताकि तुम्हारी किसी को पहचान नहीं हो पाए क्योंकि जब लोग तुम्हें जान पहचान लेंगे तुम्हारा खेल खत्म हो जाएगा। बापू के तीन बंदर शोकेस में बंद हैं चौथा खुला है उछलता कूदता है मनमानी करता है बाग़ पर उसका अधिकार है खाता भी है और जितना खा सकता है उस से कई गुणा अधिक उजाड़ता है बर्बाद करता है।

Monday, 29 June 2020

दुश्मन से दोस्ती दोस्तों से दुश्मनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  दुश्मन से दोस्ती दोस्तों से दुश्मनी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   ये आपकी मर्ज़ी है इसको सियासत से जोड़ सकते हैं या मुहब्बत से और कोई चाहे तो तिजारत से भी। सबसे पहले इक पुराना सबक इक कहावत को भूलना नहीं चाहिए , मूर्ख दोस्त से समझदार दुश्मन अच्छा होता है। सरकार बड़ी अजीब चीज़ है दिखाई नहीं देती जब ढूंढते हैं मगर जब उसको ज़रूरत होती है सामने खड़ी होती है चीन की ऊंची दीवार की तरह। सरकार देश नहीं होती है मगर सरकार समझती है वही देश है जबकि सरकार बदलती रहती है देश वही रहता है। सबसे पहले हमको सरकार की नहीं देश की चिंता होनी चाहिए क्योंकि सरकारें कभी देश की चिंता नहीं करती हैं उनकी चिंता सत्ता और सरकार होने रहने की रहती है। सत्ता पक्ष विपक्ष चोर चोर मौसेरे भाई हैं इनकी लड़ाई इनकी जंग काठ की तलवारों से चुनावी मैदान में गंदी ज़ुबान से जनता को दिखलाने को होती हैं अन्यथा उनको आपस में कोई दुश्मनी कभी नहीं होती है। उनकी ब्यानबाज़ी जनता को बहलाने उल्लू बनाने के काम आती है और इनका पाला बदलना दिल से दिल मिलना शुद्ध तिजारत होती है सांसद विधायक बिकते हैं खरीदे जाते हैं। फर्रूखाबादी खेल है चलता रहता है चलता रहेगा जब तक वैश्या अपना जिस्म बाज़ार में बेचेगी नेता अपनी आत्मा जो ज़िंदा नहीं मर चुकी होती है उस अपनी लाश का सौदा करते रहेंगे। मुहब्बत और जंग में फिर भी शायद कोई सीमा होती है लेकिन ये जो अनीति है राजनीति या विदेश नीति किसी भी देश की सरकार की किसी और देश की सरकार से दोस्ती और दुश्मनी की रणनीति उस में कोई सीमा नहीं होती कोई नियम नहीं कोई मर्यादा नहीं और उसूल तो होते ही नहीं है ये अवसर की राजनीति होती है जो दो तरह की होती है इक सामने इक पर्दे के पीछे। 

    अब दोस्त की दुश्नमी की बात की कथा कहानी सुनाते हैं। ये वही है जिसने कई साल पहले हम भाई भाई हैं कहते हुए भाई की पीठ में खंज़र घौंप दिया था। हमने खंज़र घौंपने वाले को क्षमा कर दिया उसको गले लगाया उसके साथ झूले झूले और जिसकी पीठ में खंज़र घौंपा गया था अभी तक भी उसको दोषी ठहराते रहे हैं। हमने खुद को समझदार माना और विश्वास किया अपनी समझ पर कि वही जिसने पहले कभी किसी से वफ़ा नहीं की हमसे वफ़ाएं निभाएगी। गाइड फ़िल्म का गीत गुनगुना रहे हैं आजकल चाहा क्या क्या मिला बेवफ़ा तेरे प्यार में। दिल है कि मानता नहीं अभी भी साहब को उसको बेवफ़ा कहना मंज़ूर नहीं है कहते हैं न तुम बेवफ़ा हो न हम बेवफ़ा हैं मगर क्या करें अपनी रहें जुदा हैं। साहब उसको दोष नहीं देते कहते हैं नहीं उसने अपनी सीमा नहीं लांघी हमने भी उसको बुरा भला नहीं कहा फिर झगड़ा काहे का है। कितनी जान कुर्बान करेंगे ऐसी आशिक़ी में सांढों की लड़ाई में फसल बर्बाद धूल उड़ाई और खड़े हैं सीना ताने। नवाब लोग मुर्गे लड़वाते थे मज़े लिया करते थे आजकल शासक खेल तमाशे करते हैं कभी किसी को ताजमहल किसी को धार्मिक आरती किसी को शानदार बाग़ की सैर जाने क्या क्या उस तरफ इस तरफ करते रहते हैं। खेल खेल में बच्चों की तरह लड़ना झगड़ना रूठना मनाना चलता है ये सीमा पर तकरार ये रार ये वार पर वार सब उनका मनोरंजन ही है आपको ताली बजानी है उनको सरकार चलानी है वार्ता से बात बनानी है। 

  ये आतंकवाद ये कभी सीमा पर संधि कभी संधि का उलंघन उनके अपने शतरंज के मोहरे हैं चाल है शह मात नहीं होने देते बाज़ी कभी इक तरफ नहीं होने देते। आपको इनको छोड़ अमिताभ बच्चन जी की तरह करोड़पति का खेल खिलवाना चाहिए जो खेलते हैं शायद कभी थोड़ा जीते सकते हैं खिलवाने वाले जीत कर करोड़ नहीं बिशुमार दौलत बनाते रहते हैं। आपको ऐप पर खेल में नाम दर्ज करवाना है यहां उनकी ऐप्पस पर पाबंदी की बात याद आई है। ये इक पर्दा है घूंघट कर लिया उस को देखना नहीं उसको अपना चेहरा नहीं दिखाना है उसको तड़पाना है। यही हमारी जीत है वो आकर गलती मानेगा तो घूंघट उठा देंगे फिर से उनसे मुहब्बत का तिजारत वाला लेन देन का रिश्ता चलने लगेगा। आपको नहीं समझ आता उनका झगड़ा किस बात का है उनकी दोस्ती कैसी है दुश्मनी क्यों है। उन सभी को सभी देश की सरकारों को , देश नहीं क्योंकि देश सरकार नहीं हैं ये पहले बताया है , जिन समस्याओं से लड़ना है कोरोना को हराना है गरीबी भूख और शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं बुनियादी ज़रूरतों जनता की को उपलब्ध करवाना है मगर करते नहीं हैं उन से आपका ध्यान हटवाना है। राजनीति बड़ी बेरहम होती है जब कोई राजा मरता था उसके साथ ही कोई उसके तख़्त पर ताजपोशी करवाता था , यहां मातम और जश्न समोरह इक साथ होते रहे हैं। नेता बदलते हैं तो पिछले सत्ताधारी से कोई सीख नहीं लेते क्योंकि जीतने वाला समझता है अपनी समझ चालाकी और चालों से उसने पिछले को हराया है तो उस से अकलमंद हूं जबकि हारने वाले का अनुभव वास्तव में काम का होता है। मुझे राहत इंदौरी जी की ये ग़ज़ल बेहद पसंद है शुरू से ही। 

                       दोस्ती जब किसी से की जाये , दुश्मनों की भी राय ली जाये।

 

 




Sunday, 28 June 2020

मुश्किल कहना मन की बात ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  मुश्किल कहना मन की बात ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

    होते होते होते प्यार हो गया मगर महबूबा को जाने क्या सूझी जो आशिक़ ने जब भी कोशिश की दिल की बात कहने की अभी नहीं फिर कभी यहां नहीं कहीं और ऐसे नहीं कुछ और ढंग से सोशल मीडिया पर भी नहीं और अकेले अकेले भी नहीं। आखिर इक दिन पूछ लिया इरादा क्या है किसी और से तो नहीं लगा लिया दिल बता दो तू नहीं और सही। इस बात पर माशूक़ा को अपने मन की चाहत बतानी पड़ी कहा मुझसे मन की बात कहनी है तो रेडियो पर निर्धारित समय पर कहना अन्यथा ख़ामोश रहो। मालदार बाप की औलाद को लगा ये कोई बड़ी बात है वादा कर बैठा। जब रेडियो के दफ़्तर जाकर बात की तो मालूम हुआ क्या क्या करना होगा और जैसे कोई हर महीने मन की बात करता है उसका खर्चा आठ करोड़ हर एपिसोड का आता है। मुहब्बत करना बाद में उसका इज़हार करना ही इतना महंगा होगा बेचारे आशिक़ को सपने में भी अंदाज़ा नहीं था। किसी ने बताया छोड़ो सरकारी रेडियो को ऍफ़ ऍम रेडियो से गुज़ारा कर सकते हैं मगर पता चला उनका दायरा उतना बड़ा नहीं है जो आशिक़ के शहर से महबूबा के शहर तक सुनाई से सके। राजनीति ने मन की बात को भी इतना मुश्किल बना दिया है कि आम इंसान अपने मन की बात मन में ही रखने को मज़बूर है। कोई पहचान वाला मिला जिसने समझाया आप कवि होते या ग़ज़ल कविता कहते होते तो कोई अवसर मिल भी सकता था , कविता पढ़ते अपनी महबूबा को सुनवा कर बात बन जाएगी। कविता का शीर्षक रखते  मन की बात। आशिक़ ने गूगल पर ढूंढा और मन की बात कविता मिल ही गई। लिखने वाले को तलाश किया फेसबुक पर मिले तो अपनी समस्या बताकर उनकी कविता अपने नाम से सुनाने की इजाज़त मिल ही गई हाथ जोड़कर। उसके बाद रेडियो पर सौ पापड़ बेले तब जाकर सिफ़ारिश और उपहार देकर कविता पढ़ने का अवसर मिल गया। मगर जैसा होता है जवानी में सभी किसी की कविता ग़ज़ल चुराकर अपनी माशूक़ा को तुम्हारे लिए खुद लिखी है कहकर सुनाते हैं। मुहब्बत और जंग में सब जायज़ समझा जाता है। रेडियो पर किसी अनजाने कवि की कविता को अपनी बताकर पढ़ कर कह दिया मेरे मन की बात जिसे भी पसंद आई हो मुझे कल इंडिया गेट पर मिल कर जवाब दे सकती है। 


मन की बात ( कविता ) डॉ  लोक सेतिया 

देख कर किसी को
बढ़ गई दिल की धड़कन
समा गया कोई
मन की गहराईओं में
किसी की मधुर कल्पनाओं में
खोए  रहे रात दिन
जागते रहे किसी की यादों में
रात - रात भर करते रहे
सपनों में उनसे मुलाकातें।

चाहा कि बना लें उन्हें
साथी उम्र भर के लिए
हर बार रह गया मगर
फासला कुछ क़दमों का
हमारे बीच।

उनकी नज़रें
करती रहीं इंतज़ार 
खामोश सवाल के जवाब का
पर हम साहस न कर सके
प्यार का इज़हार करने का कभी।

समझ नहीं सके वो भी
हमारी नज़रों की भाषा को
और लबों पे ला न पाए
दिल की बात कभी हम।

 ये ऊपर लिखी कविता सुनकर सोचता रहा आशिक़ कल क्या होगा। धड़कन बढ़ गई नींद नहीं आई। 

  कविता पढ़ने पर चेक भी मिला साथ में लेकर जब इंडिया गेट पहुंचे आशिक़ तो जो नहीं होना था हो गया। महबूबा से पहले कई और यही समझकर कि उनके लिए लिखी सुनाई गई है मिलने चली आईं और बात बनने की जगह बिगड़ गई जब वो जिसका इंतज़ार था आई तो अपने आशिक़ को गोपियों से घिरा पाया। मामला उलझ गया है अब कसम खाने और असलियत बताने पर भी भरोसा नहीं हुआ। तब बताया कि ये कविता जिनकी है उनसे मिलकर अपने प्यार की खातिर अनुमति ली है चाहो तो उनसे पता कर सकती हो। लिखने वाले का नंबर लिया सच जानकर आखिर मान भी गई। मन की बात किसी और की लिखी हुई चाहे खुद लिखी हो कहना बहुत मुश्किल है। बहुत कठिन है डगर पनघट की।