Thursday, 18 July 2019

ज़मीर बिकने लगे मंडी में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     ज़मीर बिकने लगे मंडी में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     दलबदल का मौसम क्या जैसे कोई तूफ़ान है सबको उड़ाए ले जा रहा है। तिनकों की जैसी हैसियत हो गई है। सस्ते दाम बिकते बिकते थोक के भाव बिकने लगे हैं। हद तो अब हुई है जब कोई दल जगह जगह माल खरीदने को मेला लगाने का इश्तिहार देने लगा है। टके सेर भाजी टके सेर खाजा अंधेर नगरी चौपट राजा की कहानी का नया अध्याय है। विचार होते तो बदलने की बात होती जब कोई सोच विचार है ही नहीं और मकसद भीड़ जमा करने का है तो आदमी भेड़ बकरी बनने को राज़ी है हरियाली दिखाई देनी चाहिए। मगर चालाक गाड़ी वाला गधे के सामने कुछ इस तरह से चारा हवा में लटका देता है जिसको देख गधा भागता है और चारा उस से आगे आगे चलता रहता है। जो लोग विधायक सांसद बनकर खुद किसी के बंधक बनने को तैयार हैं उनसे देश की आज़ादी की बात करना फज़ूल है। गुलामों की मंडी फिर लगने लगी है खरीदार एक है बिकने को तैयार अनेक हैं ऐसे में कीमत मत पूछना। गुलाम दो वक़्त रोटी मिलने की उम्मीद पर खुद को बेचना चाहते हैं ज़मीर इतना सस्ता हो गया है कि लोक-लाज शर्मो-हया छोड़ नुमाईश में चले आये हैं। कानून किसी की बांदी है रखैल की तरह नाच रही है तमाशा देखने वालों को मज़ा आ रहा है। अपने कैसे कैसे लोगों को सर पर बिठा रखा है जो अपनी आज़ादी अपने आदर की नहीं सोचते आपकी आज़ादी और अधिकार की क्या चिंता करेंगे वो। गली गली बाजार सजा रहे हैं अमुक नेता इतने समर्थकों के साथ उधर से इधर आ रहे हैं। इस तरह भी अपनी कीमत बढ़ा रहे हैं एक के साथ दस मुफ्त खोटा सिक्का चला रहे हैं। आप भी देश को महान घोषित करने वाला गीत गुनगुना रहे हैं सत्यमेव जयते लिखा है जिस जगह झूठ का गुणगान गा रहे हैं। ये कैसी गंगा बहा रहे हैं हम्माम में सभी नंगे नहा रहे हैं। ऊपर जाना है गिरते जा रहे हैं दाग़दार को बेदाग़ बतला रहे हैं कोई नया डिटरजैंट बाजार में ला रहे हैं अपने रंग में रंगकर सबको स्वच्छ बना रहे हैं।

        मुल्तानी की इक गाथा है कोई खूबसूरत औरत बेवा हो जाती है तो कितने कुंवारे जिनकी शादी नहीं हो रही थी आस लगाए रहते हैं। मगर ऐसी महिला कटी पतंग की तरह होती है लुटते हैं और कई लूटने वालों के हाथ डोर हो तो मिलती नहीं किसी को बर्बाद हो जाती है। कभी कभी किसी बदनसीब का नसीब खुलता है अन्यथा मझधार में डोलती नाव की सी हालत रहती है। ज़माना बदला हुआ है समझने को ढंग बदलना होगा किसी कंपनी के शेयर के भाव नीचे गिरते हैं तो कई लोग खरीदने लगते हैं कौड़ियों के दाम ताकि जब कभी फिर उसके भाव शेयरबाज़ार में ऊंचे चढ़ते हैं तो मुनाफा कमा सकें बेचकर। अचानक कई कंपनियों की हालत खराब हो गई है ये राजनीति की मंडी है पहले उसका कारोबार मंदा करवाते हैं शोर मचाते हैं उनके पास सब माल नकली है बाद में उसी नकली सामान को मुफ्त के भाव खरीद अपने लेबल से असली बताकर बाज़ार में खरीदने वालों को चिपका देते हैं। ये जो आज सस्ते में बिक रहे हैं कल महंगे दाम बिक सकते हैं , कीमत खरीदने वाले की ज़रूरत पर निर्भर होती है।                     


   जो बात हम नहीं समझते वो ये है कि सौदा उनका नहीं उस जनता के भरोसे का किया जाता है जिस ने उनको बनाया था। हमको बताया जाता है हमारे साथ आपकी भी भलाई है चुपचाप धारा के साथ बहने में। धर्म नैतिकता उसूल ईमानदारी सच्चाई बड़ी बड़ी बातें खोखली लगती हैं जब हमारा इम्तिहान होता है। अपने जाति धर्म परिवार के व्यक्ति के अनुचित ही नहीं आपराधिक कर्म करने पर भी उसका बचाव करते हैं जबकि आपको खड़ा पीड़ित पक्ष के साथ होना चाहिए। किसी घटना की बात नहीं करना चाहता क्योंकि ये किसी एक समुदाय की बात नहीं है बल्कि हमारे समाज की भयानक तस्वीर है उसके दोगलेपन और आडंबर को सामने लाती है। जिस पर शर्मिंदा होना जब उस पर गर्व करने का काम करते हैं तो हम देश समाज धर्म उसूल सभी को दरकिनार करते हैं और अपने भविष्य को अंधकार में धकेलते हैं। बबूल बोने वाले आम नहीं खा सकते जो आज बोया है कल उसे ही काटना भी होगा।

    इश्तिहार देना पड़ता है जब बेचना हो और बिकने को सामान भी हो। तो क्या राजनीति भी घोड़ा मंडी है जो आजकल संसद विधायक बिकते खरीदे जाते हैं। इंसान जब बिकने लगता है तो इंसान नहीं रह जाता और नेता शायद इंसान नहीं कुछ और होते हैं असली कम नकली माल ज़्यादा। चमकती हुई हर चीज़ सोना नहीं होती है लोग ठगे जाते हैं पैकिंग या बाहरी चमक दमक आवरण की सज धज देख कर। जिस्मफरोशी के बाज़ार की रौशनियां आंखों को चुंधियाती हैं मेकअप का कमाल है जो वैश्या हरदम सुंदर और जवान लगती है। जाने सत्ता कोई अमृत कलश है जो बूढ़े भी पहले से जवान फुर्तीले होने लगते हैं। आजकल अजब ज़माना है लोग खाली शोरूम से ऑनलाइन सभी बेचते हैं खुद पास कुछ भी नहीं होता न कुछ बनाते हैं। इधर उधर से उठाते हैं बेचते हैं खूब मुनाफा कमाते हैं। बड़े धोखे हैं इस राह में बाबूजी ज़रा संभलना। राजनीति अब भरोसे की बात नहीं रही इस हाथ ले उस हाथ दे यही बन गई है। इश्तिहार पढ़कर लगता है कोई अपना माल लुटवा रहा है एक के साथ एक मुफ्त या 50 फीसदी ऑफ लुभाता है दुकानदार पहले से कई गुणा बढ़ी कीमत का लेबल लगाता है। खरीदार इसी लालच में फंसता है मार खाता है मॉल में सौ रूपये वाला सामान फुटपाथ पर दस रूपये में मिल जाता है मगर सस्ता माल घटिया कहलाता है। बाज़ार का इश्तिहार से गहरा नाता है पीतल झूठ का शाम तक सारा बिक जाता है खरा सोना बिना बिका रहकर खुद पर शर्माता है। देख लो झूठ अपने पर कितना इतराता है।

Tuesday, 16 July 2019

इंसान का सामान होना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

          इंसान का सामान होना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

 दुनिया के तराज़ू के पलड़े के दोनों तरफ मुझे नहीं बैठना। न तुलने का सामान होना है न ही तोलने का बाट होना है। नहीं मंज़ूर मुझे ये बड़े-छोटे अमीर-गरीब समझदार-नासमझ काबिल-नाकाबिल जैसे किसी भी दो हिस्सों में दुनिया समाज को बांटना। आपकी अमीरी आपकी समझदारी आपकी क़ाबलियत सफल होने की और आपका बड़पन्न आप सभी को मुबारिक हो। मुझे नहीं पसंद भेदभाव की सोच वाली ये दुनिया , मुझे लगता है हर इंसान इंसान होने का हकदार होने से बराबर है। जिस दिन आपकी किसी मशीन का कोई छोटा सा पुर्ज़ा नहीं काम करता उस दिन आप को उसकी अहमियत समझ आती है। ख़ामोशी से अपना काम करने वाला लगता है कोई काम नहीं कर रहा मगर कभी उसी धुरी पर बाकी कलपुर्ज़े चला करते हैं टूटते ही सबका चलना बंद हो जाता है।

        लाखों करोड़ हैं जिनके पास उनको अभी और की हवस है और धन दौलत नाम शोहरत पाने को सब करने को तैयार हैं। अमीरी इसको कहते हैं तो ऐसी अमीरी किस काम की बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर , पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर। ये ऊंचे कद वाले किसी के काम नहीं आते हैं समाज को देश को कुछ नहीं मिलता इन जैसों से। लेकिन हर छोटा कहलाने वाला कुछ न कुछ योगदान देता है समाज को देश को , उसकी गरीबी उसका अपराध नहीं है शोषण की व्यवस्था और अन्यायकारी सामाजिक संरचना है। जिस में बड़े ओहदे पर बैठा कम मेहनत कर भी अधिक मेहनताना लेता है और औरों को उनकी मेहनत और काबलियत का कम मेहनताना देकर रईस बनता है। अमीरी किसी और के हिस्से की लूट से मिलती है सबको पूरा मेहनत का दाम मिले तो अमीर की अमीरी बच नहीं सकती। हमने वो समाज बनाना है जिस में जितना है सबको समान हासिल हो , इस दुनिया से हमारी जंग इसी बात की है।

  अगर आप भी खुद को बाकी लोगों से बड़ा या अमीर या काबिल समझदार मानते हैं तो बस इतना कर दिखाना जो भी छोटा काम किसी से करवाते हैं खुद किसी और की खातिर करना पड़े तो क्या मेहनताना लेना मंज़ूर है उतना उसको देना जिस से छोटा समझ कोई काम करवाते हैं। नहीं समझ आया मुमकिन है बहुत काम आप किसी कीमत पर नहीं करना चाहोगे जिसके लिए चंद सिक्के देकर समझते हैं इतना क्या थोड़ा है। वास्तविक अमीरी उसे कहते हैं जो किसी से लेने नहीं देने की सोच रखते है। जिनके पास बहुत पास है मगर अभी और और और अधिक की लालसा रखते हैं सबसे बड़े गरीब होते हैं। मैं जानता हूं मेरी क्या काबलियत है और उसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। दाम लगाया उनका जाता है जो बिकाऊ हैं बाज़ार में अपनी कीमत ऊंची लगवा बिकने को राज़ी हैं , हम बिकने वालों में शामिल नहीं हैं। इक शेर मेरी ग़ज़ल का अंत में।

                        अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,

                          देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

Sunday, 14 July 2019

मंदिर में नये देवताओं का आगमन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 मंदिर में नये देवताओं का आगमन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आप सभी जानते ही हैं झूठ के देवता का पहला मंदिर फतेहाबाद में बनाया गया था। ये भी सभी समझते हैं कि इस कारोबार में भी कंपीटीशन बहुत है और भक्तों को चाहने वालों को आकर्षित करने को नया कुछ न कुछ करते रहना पड़ता है। जिस तरह अन्य जगहों पर किसी भी एक देवता के नाम के बनाये हुए मंदिर में कुछ और भी देवी देवता स्थापित किये गये होते हैं बस उसी तर्ज़ पर झूठ के देवता के घर भी आधुनिक युग को देखते हुए फेसबुक व्हाट्सएप्प जैसे लोगों के दिल बहलाने से लेकर ज्ञान पाने तक का काम आने वाले गुरुओं का आगमन किया गया है। पहले लोग खासकर महिलाएं और बड़े बज़ुर्ग कथा कीर्तन में शामिल होने जाते थे लेकिन आजकल दिन रात भजन कीर्तन की जगह सोशल मीडिया पर खोये रहते हैं। झूठ के देवता का इस से अच्छा और शानदार स्थान कहीं और नहीं है। आपको नये नये शहर पार्क पहाड़ आदि देखने का शौक है तो इस से अलग आधुनिक युग में कोई और कहीं नहीं मिल सकता है। बस जल्दी से आने और दर्शन कर मनोकामना पूर्ण होने का भरोसा रख इस के सबसे पहले अनुभव हासिल करने वालों में शामिल हों। आपका स्वागत है।

 नीचे झूठ के देवता को लेकर दो लिंक हैं समझने को , अब आगे इस की विशेषता पर थोड़ा जानकारी। सोशल मीडिया किसी पहाड़ पर चढ़ने के बाद इक सुरंग की तरह है। अपनी कई जगह ऐसी सुरंग देखी होंगी जो भीतर जाने के बाद आगे बाहर को खुलती हैं अंधियारा छट जाता है और दूसरी तरफ उजाला नज़र आता है लेकिन इन आधुनिक गुरुओं की नाम की सुरंग में आपको रौशनी की जगमग दिखाई देगी और आपको उस से बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं समझ आएगा। आप वास्तविक दुनिया को भूल कर कल्पना की इस दुनिया में खो जाओगे। इसका तिलिस्म आपको अपने आगोश में ले लेगा और आपको लगेगा इस से बढ़कर चैन सुकून किसी जगह नहीं मिलेगा। जन्नत स्वर्ग से बढ़कर खूबसूरत लगेगी आपको इसकी तंग गली जिस में आपको अकेले रहने का आनंद आएगा। भीड़ बहुत होगी मगर आप के और भीड़ के बीच में इक पारदर्शी शीशे की दिवार होगी , कोई हवा कोई आवाज़ आपको परेशान नहीं करेगी।

आपको उड़ना है तो आपको चिड़िया की तरह के गुरूजी के दर से जाने होगा और आपको खुला आकाश मिलेगा। चिड़िया को चहचहाना है शब्द की सीमा है जिधर मर्ज़ी उड़न भर सकते हैं कोई आपको रोकता टोकता नहीं है। कितनी चिड़िया हैं बेहिसाब हैं उनके पीछे पीछा करने को असंख्य हैं। कभी इस डाल कभी उस डाल कोई ठिकाना नहीं है हर चिड़िया आज़ाद है चिड़ा कोई नहीं राज करने को। इस गुरु जी के साथ आपको व्हाट्सएप्प नाम के महागुरु भी नज़र आएंगे उनके पास सभी कुछ है। शब्द हैं तस्वीर हैं आवाज़ है देखने को चलती फिरती तस्वीर भी हैं। मगर इसका नशा चढ़ने के बाद आपको होश खोने का खतरा है सुध बुध खो बैठते हैं दिन रात का पता नहीं चलता है। भूख प्यास याद नहीं रहती है। इक और मुड़ती हुई सी शीशे की नली भी नज़र आएगी जो गुरु से बढ़कर आपको खुद गुरु बनाने का साधन भी हो सकती है। समझ आने के बाद आप खुद अपने नाम से यू ट्यूब चैनल शुरू करते हैं और उसके बाद कोई पागलखाना आपका ईलाज नहीं कर सकता है। पागलपन चरम सीमा होती है इबादत की हर तरह वही नज़र आता है। आपको ध्यान नहीं रहा कि इस आधुनिक मंदिर के देवता गुरुओं से आपको मिलेगा क्या ये सवाल पूछना था , खुद ही बता देता हूं अपनी ज़िंदगी अपनी दुनिया के दुःख दर्द परेशानियों से मुक्ति मिलना। बस सब मिल गया ये एहसास होता है कुछ बाकी नहीं बचता पाने को इसके बाद विरक्त होने की बारी है। एक बार आओगे तो कभी वापस नहीं जाओगे यहीं के बनकर रह जाओगे। अतिथि कब आओगे।

झूठ के देवता पर जानकारी पाने को लिंक :-

 http://blog.loksetia.com/2018/06/572.html 

 

http://blog.loksetia.com/2018/07/blog-post_98.html








Saturday, 13 July 2019

बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया - ( भाग दो )

   बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया 

                                         (  भाग दो  )

भगवान की कथा नारद मुनि जी से वार्तालाप से शुरू हुई थी। नारद जी को भगवान ने यही देखने को नियुक्त किया हुआ था वैसे उनकी हंसी ठिठौली सभी देवी देवताओं से चलती रहती है। देवियां अपनी बात कहती हैं जानती हैं उनके देवों तक बात पहुंचनी ही है। ऊपर वाले को चिंता थी अपनी दुनिया की इसलिए नारद जी को हालचाल जानने को भेजा था धरती पर। साथ चलते आप भी कहा था नारद जी ने तो बताया था खुद जाकर देखने का जतन किया था मगर धरती पर जिन जगहों पर उनके घर होने का यकीन लोगों को है जब ऊपर वाला देखने गया तो भीतर नहीं जाने दिया। सवाल करते ही बाहर जाने को आदेश जारी कर दिया संचालन करने वालों ने। परिचय देने पर उपहास किया गया कि ईश्वर भला सामने दिखाई देते हैं कभी। मुझे जानते नहीं पहचानते नहीं बस मुझे बेचते हैं उनका कारोबार है अपमानित होकर लौट आया था और लगा था अगर और समझने समझाने की कोशिश करता तो धर्म और भगवान के नाम पर बांटने वाले फसाद ही करवा देते। नारद जी ने जो बताया वो बेहद भयानक था भगवान भी डर गये सुनकर। कोई उपाय सूझ नहीं रहा है समय बिताने को दुनिया बनाने की दास्तान बताने लगे थे।

   सुनकर आपको कुछ भी समझ नहीं आएगा कि जितने भी लोग हैं जिन्होंने ईश्वर खुदा अल्लाह कितने नाम दे रखे हैं भगवान को सभी एकमत हैं कि दुनिया बनाने वाला एक ही है। फिर हर धर्म वालों का अलग अलग अपना परमात्मा क्यों है। चलो नाम कोई भी सब एक उसी की बात करते हैं तो फिर आपस में झगड़ा किस बात का है। अब तो लोग किसी किसी इंसान को सफलता दौलत शोहरत मिलने पर भगवान का दर्जा देने लगते हैं। जाने किस किस का मंदिर बना दिया है हद तो इस बात की है कि अहिंसा की बात कहने वाले गांधी को कत्ल करने वाले का मंदिर बना डाला है। सत्ता धन या अन्य भौतिक चीज़ों की जिनकी हवस की कोई सीमा नहीं है जो पैसे लेकर बाज़ार की वस्तुओं को बिकवाने को इश्तिहार विज्ञापन करते हैं टीवी चैनल और अख़बार सोशल मीडिया उन्हें भी भगवान कहते हुए संकोच नहीं करते हैं। ऊपर वाले को कहना ही पड़ा कि अगर आजकल की दुनिया को ऐसे लोग भगवान लगते हैं तो मुझे भगवान कहलाना पसंद नहीं होगा।

तमाम धार्मिक संस्थाएं दान मांगने की बात करती हैं और दानराशि को वास्तविक धार्मिक कार्य , दीन दुखियों की भलाई गरीबों की सहायता बेघर लोगों को छत देने भूखों को खाना खिलाने रोगियों का ईलाज करवाने पर खर्च नहीं करते हैं बल्कि बड़े बड़े ऊंचे मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारे बनाने पर खर्च करते हैं। कोई उनको समझा नहीं सकता भगवान को रहने को महल की ज़रूरत नहीं होती और कोई भगवान को कुछ देने के काबिल नहीं हो सकता है। उसने दुनिया बनाई है कण कण में बसता है किसी जगह बंध कर नहीं रहता है। भगवान को गर्मी सर्दी धूप छांव रात दिन आंधी तूफान बरसात से कुछ फर्क नहीं पड़ता है। उसके एक इशारे पर सब होता है हो सकता है। भगवान के नाम पर कितना कुछ बेकार बर्बाद किया जाता है जिस से लाखों लोगों की भूख प्यास मिटाई जा सकती थी नंगे बदन लोगों को तन ढकने को कपड़ा रहने को आवास मिल सकते थे। भगवान को महसूस होने लगा जैसे ये सब करने के दोषी वह खुद हैं आखिर उन्होंने ऐसा करने कैसे दिया। दुनिया बनाने से पहले इसकी कल्पना की होती तो कभी ये दुनिया नहीं बनाई होती। नारद जी आपके सवाल का जवाब नहीं है मेरे पास कि मुझे दुनिया बनाकर क्या मिला। नारदजी चुटकी लेना नहीं भूले बोले आपको भगवान होने का सबूत देना था शायद जबकि ये दुनिया बनाने से पहले आपका अस्तित्व प्रमाणित था इस से आपके होने नहीं होने का संशय पैदा हुआ है। जो नास्तिक हैं यही कहते हैं अगर खुदा ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु यीशु मसीह है तो ये सब क्यों होने देता है।

Friday, 12 July 2019

बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया - ( भाग एक )

    बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया 

                                      (  भाग एक  )

  जिसने सबकी कथा लिखी तकदीर लिखी खुद उसकी दास्तान नहीं लिखी किसी ने। जितनी भी किताबें बिकती हैं उसके नाम पर लिखने वाले लोगों ने सब कुछ लिखा ऊपर वाले का दर्द नहीं लिखा। शायद सोचा भी नहीं जो सबको सभी देता है उसको क्या दुःख दर्द क्या कमी होगी। मगर इस से अधिक दर्द की बात क्या होगी कि जिसने सबको खुला आसमान धरती हवा पानी और जीने का सब सामान दिया और सांस लेने चलने फिरने बोलने सोचने की हर तरह की आज़ादी दी उन्हीं लोगों ने खुद बनाने वाले को बेजान इमारत और पत्थर बना कर अपनी ज़रूरत मर्ज़ी और साहूलियत के अनुसार बंधक बना लिया किसी मुजरिम की तरह कैद कर लिया। अब इंसान की मर्ज़ी है कब उसको अपने ही इंसानों से मिलने दे कब उसकी आरती पूजा ईबादत कैसे हो और किस तरह उसके नाम पर चढ़ावा किसी की इच्छा से खर्च हो या जमा किया जाता रहे।  दुनिया को बनाने वाला आज पशेमान है ये सोचकर कि मैंने क्या बनाना चाहा था और ये कैसे क्या हुआ जो ऐसी दुनिया बन गई है जो इंसान के रहने लायक ही नहीं भगवान इस दुनिया में रहना भी चाहेगा तो कोई रहने देगा नहीं। हर किसी ने पहले अपने अपने भगवान तराश लिए फिर उन खिलौनों को बनाकर खुद को भगवान समझने लगे हैं। ऊपर कहीं बैठा ऊपर वाला याद कर रहा है अपने इस कारनामे को कैसे अंया को बनाने वाला आज जाम दिया था। दुनिया बनाने वाली की सच्ची कहानी सुनते हैं खुद उसी की ज़ुबानी।

    बस यही बात नहीं बता सकता कि मैंने ऐसा करने का विचार किया तो आखिर क्यों किया। बाकी सब बता सकता हूं कुछ छुपाने की ज़रूरत नहीं है। मैंने दुनिया की रचना की तो सब बनाता चला गया खूबसूरत दुनिया दिलकश नज़ारे और जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता आज तक भी वो सभी कुछ मैंने बना दिया। फिर सोचा ये सब नज़ारे बेकार हैं अगर इनको देखने वाला कोई नहीं हो कोई इनका उपयोग करे आनंद ले सके तभी बनाने का कोई हासिल है। और तब मैंने इंसान को बनाया बिल्कुल अपनी तरह का ही और उसको सब कुछ दे दिया शक्ति विवेक समझ और सोचने को दिमाग़ भी। क्या भला है क्या बुरा है क्या करना है क्या नहीं करना है समझने को विचारों की ताकत के साथ कुछ बेहतर करने को सपनों की उड़ान भी हर किसी को दे दी। ये सोचकर कि परख कैसे हो मैंने खूबसूरत वादियों के साथ वीराना भी बना दिया , हरे भरे गुलशन बनाए तो कहीं उजड़ा हुआ रेगिस्तान भी बनाया , इंसान में अच्छाई शामिल की तो अच्छाई बुराई का फर्क समझाने को इक शैतान भी बुराई क्या है समझाने को बना बैठा। बहुत कुछ था और सब के लिए था मगर शैतान में लोभ लालच अहंकार और अधिक पाने की ललक या भूख या हवस थी जो थमने का नाम नहीं लेती थी। शैतान हैवान बनता गया और इंसान इंसानियत को छोड़ने लगा तो जिस मकसद से बनाई थी दुनिया वो मकसद ही लगने लगा सफल नहीं हुआ। मगर मैंने आदमी को आज़ादी से जीने रहने अच्छे कर्म करने बुरे कर्म से बचने का संदेश देकर भेजा था और उसने हामी भरी थी मुझे भरोसा था अपनी बात अपना वचन निभाने की बात भूलेगा नहीं।

     इंसानों में भी मैंने कुछ को चुना जो मेरी तरह से मेरा काम कर सकेंगे दुनिया को भलाई की राह बतलाने का भटकने से बचाने का पाठ पढ़ाया करेंगे। मैंने इंसान को संवेदना का वरदान दिया था खुश रहने दर्द सहने और हंसने रोने हमदर्द बनकर साथ निभाने को अपनापन और मधुर भावनाओं से भरा दिल देकर। प्यार मुहब्बत भाईचारा और हर किसी का कल्याण हो ये विचार दिया था। शैतान एक था और इंसान बहुत थे फिर भी किसी किसी इंसान को शैतान जैसा बनने की चाहत जाने कैसे होने लगी। आज भी बुराई हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करती है और लोग भलाई को छोड़ उस तरफ चले जाते हैं। मैंने किसी इंसान को मुझे याद करने को नहीं कहा बस इतना वादा किया था तुम सब दुनिया में अकेले ही हो कोई साथी बन सके तो बना लेना मगर फिर भी जब भी कोई संगी साथी छोड़ जाये तो अपने आप को अकेला मत समझना। मुझे अपने भीतर तलाश करना बंद आंखों से भी मुझे सामने पास देख सकोगे। ये इक छोटी सी बात किसी को भी ध्यान नहीं रही है। लोग ध्यान भक्ति की बातें करते हैं वास्तविक मनन चिंतन नहीं करते हैं। धीरे धीरे इंसान बदलता गया और बदल कर आधा आदमी आधा जानवर बनता गया , बाहर से इंसान दिखाई देता है भीतर सब के शैतान छुपा रहता है। मेरा कोई नाम था ही नहीं है भी नहीं हो सकता भी नहीं मगर हर किसी ने पहले मिट्टी का कोई खिलौना बनाकर भगवान कहकर बेचा फिर जिसने जैसे मर्ज़ी मुझे बनाने का दावा किया। सब ने समझा खुद को भगवान को बनाकर भगवान से ऊपर हो जाना है। इस तरह उन्होंने खुदा ईश्वर अल्लाह कितने नाम से कोई कारोबार चला दिया और धर्म नाम देकर मेरी कहानियां गढ़कर सुनाने लगे। भोले भाले लोग उनकी चाल को नहीं समझ पाए और खुद मुझे भूलकर उनकी कही झूठी बातों को सच समझने लगे।

   लोग सोचते हैं सब ऊपर वाला करता है वही सब का भाग्य लिखता है मगर कोई विचार नहीं करता मैंने कभी किसी को अच्छे कर्म करने से रोका नहीं बुराई को राह जाने को नहीं कहा है। हर दिन उनको विवेक बताता है सही गलत क्या है मगर अपने विवेक की कोई सुनता ही नहीं। अपनी शैतानी सोच को बदलना नहीं चाहते लोग इंसान बन कर नहीं रहते तो किसकी भूल है। क्या इंसान को सब देकर मैंने बुरा किया है मुझे किसी से कोई बैर नहीं किसी से कोई शिकायत नहीं मगर जो बीजते हैं उसका फल सामने आता है। स्वर्ग कोई नहीं है जन्नत कहीं नहीं है यही दुनिया मैंने सबसे खूबसूरत बनाई थी इन इंसानों ने ही उसको बर्बाद कर दिया है।

                                 ( आगे की दास्तान अगली पोस्ट पर पढ़ना )

              

Thursday, 11 July 2019

सरकार नहीं इश्तिहार है ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

        सरकार नहीं इश्तिहार है ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

2956433 संख्या शौचालय बनाने का दावा किया गया है हरियाणा सरकार के ताज़ा विज्ञापन में। शायद कुछ ऐसी संख्या हो सकती है पिछले चार साल में हरियाणा सरकार के विज्ञापनों की भी। दुष्यन्त कुमार की भी कल्पना इस सीमा की नहीं रही होगी क्योंकि तब सरकारी इश्तिहार इस तरह बदलने का चलन नहीं था। चलो इस की सच्चाई को छोड़ देते हैं यकीन करते हैं कम से कम सरकारी फाइलों में तो गिनती सही होगी। मगर मुमकिन ये भी है कि सरकारी विज्ञापन बनाने से पहले इस बात का विचार किया गया हो कि कौन सी संख्या शुभ होगी। ये हो सकता है अंक ज्योतिष वाले इन को जोड़ कर भाग्यशाली अंक की बात कर सकते हैं ये विचार करते हुए कि 75 का आंकड़ा हासिल करना है तो 39419 की गिनती का महत्व है। 32849 काफी होते तो 90 का आंकड़ा भी मुमकिन था। किस किस गांव में कितने बने हैं किसको जाकर गिनती करनी है। मगर इक बात साफ़ है गालिब के शेर की तरह , कहां महखाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहां वाईद , पर इतना जानते हैं हम कल वो जाता था कि हम निकले। मुझे इतना तो पता है कि साल डेढ़ साल पहले जब हरियाणा के सीएम खट्टर फतेहाबाद पुलिस के राहगिरी कार्यकर्म में भाग लेने आये थे तब मॉडल टाउन पपीहा पार्क के बाहर चार चलते फिरते शौचालय जींद से लेकर एक दिन को दिखाने को खड़े किये गए थे। अगले दिन वापस ले जाते हुए नज़र आये थे तो सोशल मीडिया पर शेयर किया था मैंने। ये बताना उचित होगा कि उनको उपयोग नहीं किया जा सकता था क्योंकि कोई पानी की सीवर की व्यवस्था नहीं थी और न ही उनको इस्तेमाल करने को कोई सीढ़ी लगाई गई थी। तभी सवाल उठाया था अगर फतेहाबाद शहर में उपलब्ध होते तो जींद से मंगवाने की ज़रूरत नहीं होती। मगर बात केवल शौचालय की संख्या की नहीं है। असली विषय है ये सरकार है ये इश्तिहार है जैसे आजकल अख़बार देख कर समझना मुश्किल होता है कि क्या समाचार है खबर है और क्या इश्तिहार है ये पैसे देकर छपी खबर है। 

अधिक विस्तार में नहीं जाकर फिर से बताना है 2002 में लिखा लेख सरिता के फरवरी अंक में छपा था , आज तक का सबसे बड़ा घोटाला। सरकारी विज्ञापन की ही बात थी और आंकड़े देकर बताया था कि पिछले पचास साल से तब तक जितना धन इस तरह से खर्च नहीं बर्बाद कहने से भी आगे बढ़कर कह सकते हैं टीवी अख़बार वालों को खुश करने अपने प्रभाव में रखने को सभी घोटालों की धनराशि से अधिक कुछ मुट्ठी भर लोगों को फायदा पहुंचाने को किया जाता रहा सभी सत्ताधारी लोगों द्वारा। मुझे याद है जो आज सत्ता पर काबिज़ हैं तब उनको मेरी बात सौ फीसदी सही लगी थी , मगर शायद उन्हीं की सरकार ने पिछली सभी सरकारों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पहले बात अपने आलोचना से बचना भर था जो आज उस से बहुत खतरनाक बढ़ कर चुनावी जीत का साधन बना लिया गया है। आज सत्ताधारी दल के नेता मानते ही नहीं दावा करते हैं कि चुनाव सोशल मीडिया के दम पर उसका सहारा लेकर लड़ना है और जीतना है। आपको इस का अर्थ समझना होगा। 

स्मार्ट फोन फेसबुक व्हाट्सएप्प पर आप मनचाही बात पहुंचा सकते हैं सामने से कोई सवाल नहीं कर सकता है। जनता से एकतरफा संवाद लोकतंत्र की निशानी नहीं हो सकता है। ऐसा मुमकिन है कि सरकार की वास्तविकता पता चले तो हैरानी हो कि कितने इश्तिहार छपते रहे कितना धन व्यर्थ खर्च किया जाता रहा केवल किसी नेता को महिमामंडित करने को जबकि उनका यही कदम किसी लूट से कम नहीं है। रोज़ सामने आती है खबर कि सार्वजनिक शौचालयों की दशा कितनी खराब है कहीं साफ सफाई नहीं कहीं पानी ही नहीं है। जनता के पैसे को अपनी मर्ज़ी से कुछ लोगों को या किसी ख़ास व्यक्ति संस्था को मुहैया करवाना ईमानदारी हर्गिज़ नहीं कहला सकता है। लोकलाज की परवाह नहीं करते हुए चुनवी लाभ के लिए सरकारी खज़ाने का दुरुपयोग करना अनुचित है। वास्तव विकास लोगों को सामने दिखाई देना चाहिए जो नहीं नज़र आता तभी महीने बाद पुराने इश्तिहार को बदल कोई नया इश्तिहार चिपकवा देते हैं। दुष्यंत कुमार को लगता था , अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार , घर की हर दिवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।

  इश्तिहार देना पड़ता है जब बेचना हो और बिकने को सामान भी हो। तो क्या राजनीति भी घोड़ा मंडी है जो आजकल संसद विधायक बिकते खरीदे जाते हैं। इंसान जब बिकने लगता है तो इंसान नहीं रह जाता और नेता शायद इंसान नहीं कुछ और होते हैं असली कम नकली माल ज़्यादा। चमकती हुई हर चीज़ सोना नहीं होती है लोग ठगे जाते हैं पैकिंग या बाहरी चमक दमक आवरण की सज धज देख कर। जिस्मफरोशी के बाज़ार की रौशनियां आंखों को चुंधियाती हैं मेकअप का कमाल है जो वैश्या हरदम सुंदर और जवान लगती है। जाने सत्ता कोई अमृत कलश है जो बूढ़े भी पहले से जवान फुर्तीले होने लगते हैं। आजकल अजब ज़माना है लोग खाली शोरूम से ऑनलाइन सभी बेचते हैं खुद पास कुछ भी नहीं होता न कुछ बनाते हैं। इधर उधर से उठाते हैं बेचते हैं खूब मुनाफा कमाते हैं। बड़े धोखे हैं इस राह में बाबूजी ज़रा संभलना। राजनीति अब भरोसे की बात नहीं रही इस हाथ ले उस हाथ दे यही बन गई है। इश्तिहार पढ़कर लगता है कोई अपना माल लुटवा रहा है एक के साथ एक मुफ्त या 50 फीसदी ऑफ लुभाता है दुकानदार पहले से कई गुणा बढ़ी कीमत का लेबल लगाता है। खरीदार इसी लालच में फंसता है मार खाता है मॉल में सौ रूपये वाला सामान फुटपाथ पर दस रूपये में मिल जाता है मगर सस्ता माल घटिया कहलाता है। बाज़ार का इश्तिहार से गहरा नाता है पीतल झूठ का शाम तक सारा बिक जाता है खरा सोना बिना बिका रहकर खुद पर शर्माता है। देख लो झूठ अपने पर कितना इतराता है। चलो इक ग़ज़ल सुनाता हूं सरकार क्या होती है थोड़े में समझाता हूं।

सरकार है बेकार है लाचार है - लोक सेतिया "तनहा"

सरकार है  , बेकार है , लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है। 

 

Wednesday, 10 July 2019

गुफ़्तगू पतझड़ की बहार से ( अनकही कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 गुफ़्तगू पतझड़ की बहार से ( अनकही कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

  चलते चलते थोड़ा थक गया हूं ज़रा देर आराम करना चाहता हूं आगे सफर पर जाने से पहले। खुद से कितनी बार कही कहानी अपनी बार बार दोहराने से बदलती नहीं है बस याद ताज़ा हो जाती है। आज लिखने लगा तो शुरू से लिखना चाहिए सब नहीं जितना याद है उतना सही। संक्षेप में जीवन भर की बात जैसे किसी गागर में सागर भरने की कोशिश करना। हर कोई ज़िंदगी की तलाश में है मगर ज़िंदगी कोई सामान तो नहीं जो मिलेगा तलाश करने से , ज़िंदगी मिलती है खुद को खोने से और हर कोई सब कुछ पाना चाहता है। मैंने ज़िंदगी को देखा है मगर करीब से नहीं थोड़ा फ़ासला रखकर , पास जाने से डरता हूं कहीं जिसको हक़ीक़त मानता रहा वो इक ख्वाब निकले छूते ही नींद खुले और सपना बिखर जाए। चलो शुरुआत करता हूं। 

मैं किसी पौधे की तरह इक तपते हुए रेगिस्तान में अपने आप उग आया था। हर तरफ प्यास ही प्यास थी और मुझे ख्याल आया कि मुझे इक प्यार का झरना बनकर बहना है सभी की प्यास को बुझाना है। हर किसी से मुहब्बत करने लगा मगर जाने क्यों लोग मुहब्बत को समझते ही नहीं थे। सबको दौलत शोहरत ताकत की चाहत थी और प्यार मुहब्बत की इस दुनिया में कोई कीमत ही नहीं थी। ये इक बाज़ार की तरह था जिस में कोई खरीदार था कोई बिकने का सामान , मेरी हैसियत खाली हाथ बाजार चले आए नासमझ की थी जिसको खरीदना कुछ भी नहीं था और बिकना भी नहीं था किसी कीमत पर भी। चमकती रेत को पानी समझ दौड़ रहे लोग प्यार के बहते झरने की ओर आये ही नहीं आवाज़ देता रहा मैं हर किसी को। भागते हुए कोई सुनता नहीं देखता ही नहीं मुड़कर दाएं बाएं बस सामने दिखाई देती है चमकती हुई रेत प्यास बुझाने को। प्यास किसी की बुझी नहीं सभी प्यासे ही रहे मरने तक। जिस तरफ प्यार मुहब्बत था किसी को उस तरफ आना ही ज़रूरी नहीं लगा कभी भी। 

ज़िंदगी की परिभाषा कोई समझता नहीं समझाता नहीं। जीना इक रास्ता है मंज़िल नहीं है मंज़िल है कोई इश्क़ कोई आशिक़ी ढूंढना इश्क़ करने को। मैंने यही समझा और चलता रहा ढूंढने को अपनी मंज़िल अपनी आशिक़ी अपनी मुहब्बत अपना जुनून। बचपन से दोस्ती की चाहत रही मगर दोस्ती की किताब किसी पाठशाला में पढ़ाई नहीं जाती थी। दोस्त बनते मगर दोस्ती नहीं करते सभी दोस्ती में कोई मतलब तलाश करते थे। दोस्तों की मेहरबानी है जो अरमानों की दौलत अपनी पूंजी बची हुई है सबने लौटा दी वापस उनको दोस्ती से बढ़कर दुनियादारी लगती थी। संगीत से प्यार हुआ मगर घर के बड़ों ने कहा कि ये गाना बजाना छोटे लोगों का काम है मिरासी लोग करते हैं , मुझे चाहत थी तो सबसे छुपकर संगीत सुनता गाया करता गुनगुनाया करता। किसी मंच पर चला गया तो संचालक को मेरा पहनावा देख कर लगा मंच पर आने से पहले लिबास बदलना होगा किसी से मांग कर पहन लो तब जाना मंच पर। पहला अनुभव ही ऐसा हुआ कि फिर कितने साल खामोश रहकर तनहाई में गुज़ार दिये मैंने। 

दर्द से जाने कब कैसे मुलाक़ात हुई और दर्द मेरा हमसफ़र बन गया। दर्द आंसू और आरज़ू कहीं कोई फूल खिलाने की और इक सपना अपनी इक नई दुनिया बसाने की जिस में सब अपने हों कोई बेगाना नहीं हो। कोई इक घर जो खुला रहता हो हर किसी की खातिर जिस में सिर्फ प्यार मुहब्बत भाईचारा हो अजनबी नहीं लगे कोई भी अनजान भी अपना लगता हो जिस जगह। बीच में कोई नदी आई तेज़ बहाव नफ़रत की जलती हुई आग और अंधेरी रात तेज़ तूफ़ान और गरजती बिजली हर कोई डरकर छुपकर बैठ गया। मल्लाह से कहा उस पार ले चलो तो उसने इनकार कर दिया समझाया भंवर है डूबने का खतरा भी है उस पार कोई जहां नहीं है। बहुत कहता रहा तुम माझी हो ले चलो पार उधर मेरे सपनों का जहां है चाहे नहीं भी मिले मुझे जाना है। नहीं मंज़ूर कोई भी बहाना मुझे तो आज भी है उस पार जाना। 

साल गुज़रते रहे मैं कभी राह से भटकता रहा कभी किसी और मंज़िल को अपनी मंज़िल समझता रहा। पर चैन नहीं मिला सुकून नहीं आया तो फिर चलने लगा। ग़ज़ल मिली कभी कविता कभी कहानी सबसे दिल लगाया सबको अपनाया। मगर लोग खुद को बाज़ार में बेचने को लिखते रहे किताब ईनाम नाम शोहरत तमगे पुरुस्कार और दौलत जमा करते रहे। मैंने सीखे नहीं ऐसे ज़माने वाले तौर तरीके अंदाज़ आज तलक। अपने ही अरमानों से इक कश्ती बनाई और जो भी मिला उसको उसकी मंज़िल तक पार पहुंचा आता जाता रहा। नाखुदा बनकर पता चला कि कश्ती का मल्लाह किसी किनारे नहीं लगता है उसको किसी न किसी दिन नदी की तेज़ धारा में हिचकोले खाते खाते सबको बचाते हुए डूबना ही है। कितनी बार डूबने के बाद मुझे लहरों ने ही फिर वापस किनारे लाकर फेंक डाला है। 

बहुत चिंतन करने के बाद ये बात समझ आई है कि ज़िंदगी किसको कहते हैं और जीने का हासिल क्या है। यूं ही बेमकसद जीना ज़िंदगी नहीं होता है ज़िंदगी उनकी सार्थक है जो कुछ कर गए। जिनका अपना कोई मकसद रहा था जुनून था जिसकी खातिर जिये भी मरे भी। देश समाज दुनिया को अच्छा और खूबसूरत बनाने को सभी को इंसानियत का पाठ पढ़ाने को आपस में मिलकर रहने और भाईचारा बढ़ाने को साहस पूर्वक सच का साथ देने अन्याय और झूठ का विरोध करने को जीवन भर कोशिशें करते रहे। कोई धन दौलत का अंबार जमा नहीं किया क्योंकि उनकी पूंजी लोगों का प्यार और भरोसा थी जो कायम है उनके बाद भी। ये समझ आने के बाद सोचता हूं अभी जीकर सार्थक किया क्या है। जब जागे तभी सवेरा समझते हैं कोशिश करनी होगी कुछ अच्छा करने की अन्यथा जिया नहीं जिया क्या अंतर है। कोई साथ चले कि नहीं चले मुझे चलना है इक मंज़िल की तलाश को , जो मेरे नहीं जाने कितने लोगों की ख्वाबों की ताबीर होगी। इस समाज से दुनिया की राह से कांटें चुनकर हटाने हैं और खिलाने हैं कुछ सदाबहार महकते फूलों के चमन।

पतझड़ ने कहा है फिर से बहार से मुझे अलविदा करने के बाद आओ अब मगर रहना हमेशा सभी के जीवन में हरियाली रंग और खुशबू बन कर। बहार ने वादा किया है मुझे आएगी और निभाएगी अपना वादा जो किया था सभी से। मौसम बदलेगा अभी शायद थोड़ा जतन और करना है मिलकर सबको अपने उजड़े हुए गुलशन को फिर से खिलाने को। हम आप अपने अपने स्वार्थ छोड़कर साथ साथ हाथ से हाथ मिलाते हुए क्या है जो नहीं कर सकते हैं। अबके बहार लाएंगे जो कोई पतझड़ का मौसम छीन नहीं सकेगा , नफरत की आंधी भी जिस को बर्बाद नहीं कर सकेगी हमने नफरत को मिटाना है मुहब्बत के गुलशन के फूलों को खिलाना है।

अब यहां से नई शुरुआत करनी है। अभी लिखनी है कहानी प्यार की। आपने भी किरदार निभाना है।




Monday, 8 July 2019

सच्ची-झूठी संवेदना , असली-नकली चेहरे ( आजकल का समाज ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

  सच्ची-झूठी संवेदना , असली-नकली चेहरे ( आजकल का समाज )

                               आलेख - डॉ लोक सेतिया 

बात हर दिन की अपने अलग ढंग से होती है फिर भी कल रात से बात शुरू करता हूं खत्म कभी नहीं हो सकती मगर आज सुबह तक की भी सच्ची बात बताना चाहता हूं। कल रत टीवी पर रियलिटी शो पर इक सैलाब था भावनाओं का मेरी भी आंखे नम हो गईं दिल भर आया देख कर। इक बच्चे की बात बताते हुए जो संगीत और गाने के शो में भाग लेने आया हुआ है कोई उसकी आवाज़ से पहले उसकी बात बताना चाहता है कहते हुए मंच पर आया तो वीडियो दिखाया उस बच्चे के पास फटे हुए जूते हैं जिसको उसके पिता ने खुद हाथ से ठीक करने की कोशिश भी की मगर उस के छेद से पानी अंदर चला जाता है और स्कूल पहुंचने में देरी हो जाती है। ये दिखाने के बाद कहने लगा कि आज कुछ लाया है उस बच्चे को उपहार देने को , और नये जूतों की जोड़ी भावनात्मक होकर अश्क भरी आंखों से अपने हाथ से पहनाई। घटना सही है और सच भी इस में कोई शक नहीं सवाल नहीं मगर इतना साफ है ऐसा सोचकर किया गया दर्शकों को दिखाने को कि हम लोग संवेदनशील हैं और भलाई का काम करते हैं। दिखाना ज़रूरी नहीं था इक तमाशा बनाया गया किसी की गरीबी बेबसी को खुद की महानता साबित करने को। आपको लगता है ये दिखाने से लोग भी गरीबों के हमदर्द बन सकते हैं तो माफ़ करना पल भर बाद लोग कोई और बात करने लगते हैं। ये दर्द भी उनके लिए मनोरंजन का ही इक भाग है चुटकले की तरह या फिर संचालक बनकर किसी रियलिटी शो में किसी महिला जज से हंसी ठिठोली में आवारगी की बातें करना किसी की पहचान बन जाता है। ये सब बेचने का सामान है और आपको नहीं पता असली काम विज्ञापन से कमाई करना है हर शो या सीरियल स्पॉन्सर का फायदा पहले देखता है बाकी हर बात पीछे रह जाती है। मध्यांतर के बाद अचानक आपको गंभीर विषय से किसी का इश्तिहार दिखाने पर लाते हैं और नायक अदाकार कलाकार आपको समझाते हैं। उनका मकसद था हासिल कर जाते हैं। 

शो बदलते हैं बेबस लोग भी बदल जाते हैं अब किसी की बचपन की निराशा की कैसे उसको हर कोई खुद से नीचा समझ अपमानित करता था , बुझी बुझी आंखें फीका चेहरा और निराशा भरा जीवन। और कैसे कैसे उसने हासिल किया सब कुछ। कोई आकर नाम शोहरत पाने के बाद चाहता है देश की एकता की भावना को लेकर कोई गीत कोई फिल्म या कुछ और बनाकर सबको देशभक्ति का पाठ पढ़ाये। देशभक्त हम सब हैं मगर कुछ लोगों ने अपना नाम रखकर या इस विषय को भुनाने को फिल्म गीत बनाकर खूब पैसा कमाया है। और हमने मान लिया उनकी देशभक्ति की भावना सच्ची और बेमिसाल है। मगर ये भूल जाते हैं कि उन्होंने ही बेहद बुरे खलनायकी वाले और गुंडे तमाम अपराधी कर्म करने वाले किरदार को भी दिखलाया ही नहीं उसको जायज़ भी ठहराने का काम किया है लोगों से खलनायक की गंदी बात पर तालियां बजवाईं हैं। मकसद कोई समाज को दिशा दिखलाना नहीं भटकाना है। मीडिया टीवी फिल्म वालों ने मानवीय संवेदनाओं को भी बाज़ार में बेचने का सामान बनाया है कमाई करने को। आजकल जो पतन समाज का दिखाई देता है उसके लिए इन सभी की किसी न किसी ढंग से ज़िम्मेदारी बनती है। मगर हमने उनको खुदा समझने की भूल की है जबकि वास्तव में ये भी अपनी तरह से इंसान ही हैं जो मोह माया और लालच हवस के जाल में उलझे हैं बस उनके पास अपने को जायज़ ठहराने को जवाब है जैसा समाज है हम वही दिखलाते हैं। नहीं ये मकसद नहीं है आपको लोग नहीं कहते गंगदी परोसने को आप गंदगी को परोसते हैं और उसे स्वादिष्ट बनाते हैं जो अपराध है अपने असली कर्तव्य से विमुख होने का। 

उनकी बात छोड़ सामने अपने समाज की करते हैं। हम धर्म की अच्छे विचारों की बातें करते हैं मगर असली जीवन में आचरण कुछ और होता है। आज सुबह देखा सैर पर किसी को इक पल में सभ्यता का बदला ढंग अपनाते हुए , कोई मिला जिसको खुद से छोटा मानते हैं तो बात करने का अंदाज़ अलग था तभी कोई सामने बराबर का आता दिखाई दिया तो अनदेखा कर जिसको खुद से बड़ा समझते हैं उसके सामने हाथ जोड़ सर झुकाये नमस्कार करने लगे। हर किसी से इंसान समझ कर नहीं मिलते हम लोग। शायद इतनी जल्दी कोई अदाकर भी अपना किरदार नहीं बदल सकता जिस तरह लोग चेहरा हाव भाव बदलते है। लगता है जैसे हर चेहरे पर कोई मुखौटा चिपका हुआ है असली सूरत की पहचान करना मुमकिन ही नहीं है। 

                       देश समाज जाने किस तरफ जाता जा रहा है। सब मतलबी स्वार्थी हैं और हर कोई देश से प्यार इंसानियत की हमदर्दी की सच्चाई भलाई की बातें करता है। राजनीति का अर्थ ही किसी भी तरह शासन और अधिकार हासिल करना है। ये कैसी व्यवस्था है कि जिस देश की आधी आबादी भूख और बुनियादी सुविधाओं से परेशान बदहाल है उस देश के निर्वाचित संसद विधायक शाही शान से गुलछर्रे उड़ाते हुए खुद को जनता का सेवक कहते हैं। अधिकारी कर्तव्य की भावना ईमानदारी को भूल कर मनमानी करते हैं और जो नहीं करना चाहिए वही अवश्य करते हैं लेकिन जिसको करना उनका फ़र्ज़ है कभी नहीं करते। देश का संविधान और कानून इन लोगों को केवल अपने स्वार्थ सिद्ध करने को उपयोगी लगता है। ये ऐसा रक्षक हैं जो जनता की सुरक्षा के नाम पर उस पर ज़ुल्मों सितम करना अपना अधिकार मानते हैं कोई नियम कानून इन पर लागू होता नहीं है। इनसे अधिक सवेंदनहीन कोई भी नहीं है। 

धर्म सबसे बड़ी लूट का साधन है धार्मिक जगहों पर धन के अंबार जमा हैं मगर धर्म वाले उसका उपयोग धर्म का पालन कर दीन दुःखियों की सेवा या मानव कल्याण पर नहीं आडंबर पर बर्बाद किया करते हैं। जिस धर्म की बात करते हैं उसका पालन खुद इनको नहीं करना आया कभी भी। हर कोई नज़र कुछ आता है होता कुछ और ही है। कोई बाबा बनकर कमाई का धंधा करते मालामाल होकर भी दावा करता है उसका मकसद मुनाफा कमाना नहीं है। बड़े से बड़े नाम वाले झूठ बोलने में संकोच नहीं करते अपने आचरण पर शर्मसार नहीं हुआ करते हैं। शिक्षक चिकिस्तक व्यौपारी अपनी सेवा के दाम कई गुणा वसूल करते हैं और कहते रहते हैं साथ में आपको कोई छूट कोई फायदा ख़ास अवसर पर देते हैं किसी को किसी पर रहम नहीं आता है और देखने बात करने में सब शरीफ हमदर्द लगते हैं। जो जितना पढ़ लिख जाता है उच्च पद या बहुत सारा धन जमा कर लेता है और भी बेदर्दी से काम लेता है। ऊंचाई जिसको कहते हैं ज़मीर को कहीं छोड़ हासिल की जाती है। मगर इसको आधुनिकता और विकास बताया जाता है। दुनिया देखने को पहले से सुंदर लगती है जबकि वास्तव में इसकी शक्ल भयानक होती गई है। असलियत जो है दिखावा उसके विपरीत किया जाता है।

Saturday, 6 July 2019

नाम बदलने से बदलेगा नसीब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     नाम बदलने से बदलेगा नसीब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

         खोजने पर भगवान मिलते हैं तो हर समस्या का उपाय मिलना क्या बड़ी बात है। बजट को बहीखाता नाम देने का अर्थ गहरा है हम नासमझ लोग समझते समझते इस नर्क से किसी और दुनिया के नर्क चले जाएंगे। जिन को धरती पर स्वर्ग मिला है उनकी ऊपर भी जगह आरक्षित है। आरक्षण ऊपर तक पहुंचा हुआ है आज से नहीं कितनी सदियों से वर्ग वर्ग का कानून बना हुआ है। नाम बदलने से राशिफल बदलता है सरकारी ऐलान है आपको स्वीकार करना होगा। ये बजट नहीं है उनका बहीखाता है। जिसने लिखा था नाम में क्या रखा है उसने भी लिख कर अपना नाम साथ हस्ताक्षर किये थे ताकीद के साथ। ये अजीब दास्तानें हैं उलझनें सुलझाने से और उलझती जाती हैं। उनका कहना है कि सूटकेस बदनाम बहुत है तभी उन्होंने उसकी जगह बहीखाता लाने का निर्णय किया है माता जी ने सुझाव दिया था ऐसा करने का। फिर उस बाहरी आवरण को भगवान के दर्शन भी करवाने का काम किया है। आगे भगवान को देखना है क्या कैसे करते हैं। लोग पहले से जानते थे देश भगवान भरोसे है अब सरकार भी खुद पर नहीं ऊपर वाले पर यकीन कर चलती है। अब कोई उनको बताएगा बदनाम सूटकेस नहीं लोग रहे हैं रिश्वत देने लेने वाले। अगर फिर भी बदनामी की बात की जाये तो लालाजी की बहीखाता की बदनामी मुन्नी की बदनामी से बढ़कर रही है। खराबी सूटकेस में नहीं होती न ही बहीखाते में खराबी होती है। खराब नियत लोगों की होती है , मगर कहने का अधिकार उनका है हम तो सुन सकते हैं समझने की कोशिश कर सकते हैं।

      थोड़ा थोड़ा समझने की कोशिश कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर धर्म की किताबों को ऐसी भाषा में लिखते थे जो आम लोग नहीं पढ़ सकते न उनको पढ़ने की अनुमति होती है। धर्म की दुकानदारी करने वाले जब जैसे उसका अर्थ निकाल आपको उल्लू बना सकते हैं। धर्म कोई भी हो उनके अनुसार कोई बहीखाता नाम का हिसाब लिखने का कीमती सामान होता है जिस में पाप-पुण्य लेना-देना जैसे दो शीर्षक रहते हैं। साहूकार की बही हो सरकार का बजट या धर्म वालों का गणित आपको समझ नहीं आना चाहिए तभी धंधा बढ़ता है। धर्म वाले लिखते हैं हम करें तो सौ गुनाह माफ़ कोई और करने को सोचे भी तो सज़ा का हकदार। कोई तर्क की बात करना अपराध है ये उनका बनाया नियम उनकी मर्ज़ी से है। उनका धर्म का तराज़ू है मगर तोलने को बाट कई हैं जैसे चाहते वज़्न बताने की सहूलियत रहती है। सरकार को कोई किताब मिल गई है जो अनहोनी को संभव करने का दावा करती है बस आंख बंद कर भरोसा करो जो कहते हैं करते जाओ। कल्याण होगा विश्वास रखना है कल्याण नहीं होने पर शक किताब पर नहीं उपाय बताने वाले पर नहीं खुद पर शक करो कि हमसे ही कोई भूल चूक हुई होगी। दक्षिणा की बात मत करना ये विचार मन में लाना ही अधर्म है धर्म पर अविश्वास है तभी आपको हासिल कुछ नहीं होता है। बजट की बात और थी बहीखाते की अलग है सरकार कहती है बेघर लोगों को घर बनाने को क़र्ज़ लेना फायदे का होगा मगर घर खरीदना है तो मकान की कीमत के साथ बिजली का बिल रख रखाव का खर्च भी जोड़ कर सरकारी दक्षिणा वसूली जाएगी। अर्थ आपको समझ कभी नहीं आने वाला है ये बच्चों की डंडे से पिटाई की तरह है मास्टरजी से लेकर पिताजी तक करते हैं आपकी भलाई के नाम पर। पिटाई से बच्चे सुधरते हैं या ढीठ और बेशर्म बनते हैं अभी शोध जारी है।

हर शहर में कोई न कोई खुद को असली लाल किताब वाला बतलाता है। अब पहली बार सामने दिखाई दी है लाल किताब लाल रंग के सुंदर कपड़े में लिपटी हुई। सब ने देखा मगर कोई समझा नहीं सरकार ने भी राज़ को राज़ रहने दिया। लाल किताब दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना है जिस में सब का भाग्य लिखा हुआ है लाल किताब वाले आपकी हर समस्या का समाधान कर सकते हैं। मैं जानता हूं इक ऐसे ही लाल किताब वाले
को जिसके पिताजी लाल किताब से भविष्य बांचने का काम किया करते थे। फेसबुक पर भी बहुत लोग खुद को लाल किताब धारी होने का दावा करते हैं। पहले लाल किताब के दर्शन करते हैं।


लाल किताब है या नहीं होती है इस पर संशय नहीं रहा है। सरकार के पास सुरक्षित है अर्थात सरकार खुद अपना भाग्य जैसा चाहती है बना सकती है आपको अपना भाग्य बदलवाना है तो बाकी सब को भूल कर असली लाल किताब जिसके पास है उसके पास चले जाओ। अभी भी अगर आपको नहीं समझ आया करिश्मा कैसे हो रहा था तो फिर कभी नहीं समझोगे। आज आपको लाल किताबी उपाय बताते हैं मगर आज़माना नहीं क्योंकि लाल किताब जिसके पास होती है वह खुद लाल सियाही से उपाय लिख कर देता है। लाल किताब देख कर आपको पिछले जन्म की और अगले जन्म की भी बात बताई जा सकती है। लाल किताब को संसद में लाना सबके सामने सब की जानकारी से छुपाकर संभव नहीं था मगर अब उनकी सरकार है जिनको लेकर सब मुमकिन है का दावा किया जाता रहा है। जब लाल किताब पास हो तब नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है।

लाल किताब को लाल कपड़े में लपेटने का असर होता है कि धार्मिक किताब की तरह उस पर शक या सवाल करना गलत माना जाता है।  अभी कोई नहीं जानता कि ये लाल किताब अभी तक कहां थी किस के पास थी। क्या देश की सरकार पिछले इतने साल तक इसकी अवेहलना करती रही या बेकार समझती रही। या फिर पहले देश के सत्ताधारी को नास्तिक होने का भी दोषी घोषित किया जा सकता है ऐसा बताकर कि हमने इसको दबे हुए खज़ाने की तरह खोजा है। मगर जब इस को खोलकर पढ़कर सुनाया गया तो किसी को समझ नहीं आया इसको बजट नहीं बहीखाता सही जो भी नाम दे दिया जाये इस से सबको सब कुछ मिलेगा कब कैसे। सरकार दावा करती है कि उसने देश ही नहीं सब दुनिया की हर समस्या का हल पा लिया है। शायद भूख गरीबी बेरोज़गारी आपसी भेद भाव ही नहीं राजनीति से अपराधियों का ख़ात्मा तक इस से मुमकिन होगा सरकारी बात पर भरोसा किया जाये अगर। मगर अभी आतंकवाद को लेकर पड़ोसी देश पर निर्भर करता है क्योंकि लाल किताब सीमा पार कोई वार नहीं कर सकती है।

जल कैसे बचाया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   जल कैसे बचाया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   पानी बचाओ पानी व्यर्थ नहीं करो विज्ञापन देने से भाषण देने से कोई मैराथन दौड़ का तमाशा करने से कुछ भी नहीं होगा। पानी भारत में अभी भी कम नहीं है लेकिन जितना ज़रूरत है उस से अधिक खर्च नहीं फज़ूल बर्बाद किया जाता है। सबसे पहली बात देश की राज्यों की सरकारें इस को लेकर हद दर्जे की उदासीन हैं लापरवाही है समाज हित की आपराधिक अनदेखी तक। चांद पर जाने और जाने कितने ऐसे अनावश्यक कार्यों आडंबर करने पर धन खर्च करने से पहले अगर देश भर में साफ़ पीने का पानी उपलब्ध करवाने को महत्व देते तो शायद ये विकराल समस्या नहीं सामने आती। आपको क्या लगा मेरी बात में कोई विरोधाभास है जब पानी ही नहीं तो सबको साफ पानी मिले कैसे। चलो इक कल्पना करते हैं क्या कैसे संभव है। 

चौबीस घंटे साफ पानी की सप्लाई :-

अगर हर किसी को साफ पीने का पानी चौबीस घंटे देने का कार्य सरकारी विभाग करते तो किसी को भी घर दफ्तर बाज़ार में पानी जमा करने को टैंक नहीं बनवाने होते। विकसित देशों में पहला काम यही किया गया है जबकि कई देशों में पानी की उपलब्धता हमसे बहुत कम थी या कठिनाई से मिलता है पानी। यकीन करें अगर जलघर से पानी बिना बाधा लगातार सप्लाई किया जाये तो केवल उतना ही जल खर्च होगा जितना चाहिए। हर किसी को बिजली की मोटर नहीं लगवानी पड़ती और बिजली की भी बचत होती। कितनी बिमारियां स्वच्छ जल नहीं मिलने से होती हैं उन की भी समस्या हल हो सकती थी। कभी विचार करना आपको नल से ताज़ा पानी मिलता लगातार तो कोई ज़रूरत नहीं होती जमा करने की सीधे ज़रूरत होने पर नल से जितना चाहते उतना ही लेते। 

तालाब नदियों झरनों की सुरक्षा :-

बारिश में कितना पानी व्यर्थ जाता है कभी हर जगह गांव शहर जलभराव को तालाब हुआ करते थे। घर नहीं डूबते थे जितना अधिक पानी बरसात का होता तालाब से खाली ज़मीन पर जाता कुछ रहता बचा हुआ कुछ धरती के नीचे चला जाता। अब खाली जगह छोड़ी नहीं कहीं भी कच्ची जिस से पानी धरती के भीतर जाकर नीचे का जलस्तर ऊंचा करता उल्टा हमने धरती के नीचे से पानी का सीमा से बढ़कर दोहन कर इतना नीचे कर दिया है कि निकालने को फिर बिजली और उपाय करते हैं जो और कठिनाई पैदा करते हैं। 

अनुचित अनावश्यक निर्माण :-

सब से अधिक ये अपराध हर सरकार ने किया है और करती जा रही हैं। सरकारी विभाग के पास कर्मचारी के आवास और दफ्तर को बहुत जगह हुआ करती थी जिस का काफी हिस्सा खुला भी रखते थे। आपने देखा होगा सरकारी भवन और नगरपरिषद या नगरपालिका के दफ्तर कितने खुले हुआ करते थे। आमदनी बढ़ाने को या आधुनिक बनाने को खाली जगह को निर्माण कर लिया गया। आप के लिए नियम हैं सरकारी विभाग को अपने ही नियम तोड़ने से कोई नहीं रोक सकता है। कहने को भारत गरीब देश है और अभी भी करोड़ों लोगों के पास घर नहीं हैं जबकि सरकार के पास हर गांव हर शहर में इतने भवन और इमारतें बनी हुई हैं जिनका उपयोग भी शायद कभी ही किया जाता है। कई देशों में सरकारी इमारतों को बेघर लोगों को रात को ठहरने को उपलब्ध करवाने का चलन है। लेकिन हमारे देश में कोई सरकारी किसी भवन या इमारत को उपयोग करना चाहे तो अधिकारी आसानी से अनुमति नहीं देते मगर खुद उनको कोई आयोजन करना होता है तो जनता के पार्क से लेकर सड़क तक उनके आधीन होते हैं। सरकारी अधिकारियों को बड़े बड़े बंगले और तमाम सुविधाओं के साथ उनकी कॉलोनी की हरियाली को पानी की सप्लाई पहल के आधार पर होती है। संविधान का सबको समानता का अधिकार अधिकारी नेता सत्ताधारी अपने बड़े बड़े बंगलों में रहने से उपहास बनाते हैं।

नदियों पहाड़ों की सुरक्षा :-

पानी मिलता है पहाड़ों से बर्फ पिघलने से और नदियों से कितनी तरह से , झरने बरसाती नदी नाले कुदरत ने हमेशा से उनकी स्वछता को बरकरार रखने का उपाय किया हुआ है। हमने कभी घूमने फिरने की कारोबारी तरीके से आर्थिक फायदे की खातिर उनकी सुरक्षा को दांव पर लगाया है। कहीं पहाड़ को काटकर निर्माण करने को कहीं धार्मिकता को लेकर नदियों को नुकसान पहुंचाया तो कभी नदी की राह पर बहाव को अपनी सुविधा से बदलने का काम छेड़ छाड़ की तो जगह जगह अपनी गंदगी नदी में डालकर उसको गंदा नाला बना दिया है। तथाकथित आधुनिक विकास करते हुए हमने विनाश ही किया है। समाज और सरकार की उपेक्षा और सीमा से अधिक मनमानी व लापरवाही का नतीजा है कि आज हम उस दशा को पहुंचे हैं जहां हमें अपने तौर तरीके बदलने की ज़रूरत है मगर हमने आदत बना ली है मर्ज़ी से उपयोग करने की कुदरत की हर चीज़ को जिसे छोड़ना मुश्किल है और नहीं छोड़ेंगे तो प्यास सामने साफ दिख रही है।

पानी पर सभी का हक :-

सरकार अपने पर जिस तरह बेतहाशा धन साधन सुख सुविधा पाने और ऐशो आराम पर खर्च करने को अनुचित नहीं समझती जबकि जिस देश में भूख गरीबी हो एक एक नेता को इतना सब मिलना गुनाह समझा जाना चाहिए क्योंकि ये देश के राजा या शासक मालिक नहीं जनसेवक हैं। पानी भी उनको हिस्से से बढ़कर मिलना अमानवीय आपराधिक कार्य है। राजनेताओं को किसी भी बात पर वोटों की राजनीति करने में कोई संकोच नहीं होता है। पानी कुदरत का उपहार है अपने उसको भी बांटने का काम किया है और सब जानते हैं कैसे राजनेता अपनी ज़मीन पर खेती की सिंचाई या औद्योगिक उपयोग को मनमाने तरीके से पानी लेते नहीं छीनते हैं।

 शबाब ललित की ग़ज़ल है :-

अन-गिनत शादाब जिस्मों की जवानी पी गया
वो समुंदर कितने दरियाओं का पानी पी गया 

नर्म सुब्हें पी गया शामें सुहानी पी गया
हिज्र का मौसम दिलों की शादमानी पी गया 

मेरे अरमानों की फ़सलें इस लिए प्यासी रहीं
एक ज़ालिम था जो कुल बस्ती का पानी पी गया 

ले गए तुम छीन कर अल्फ़ाज़ का अमृत-कलस
मैं वो शिवशंकर था जो ज़हर-ए-मआ'नी पी गया 

दुष्यंत कुमार कहते हैं :-

यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां 
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।


Friday, 5 July 2019

शायरी वैश्या के कोठे से संसद तलक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

  शायरी वैश्या के कोठे से संसद तलक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   जिनको महफ़िल के आदाब नहीं मालूम उनसे गुफ़्तगू करना फज़ूल होता है। मैंने पिछले कई सालों से टीवी पर खबरें और बहस देखना छोड़ दिया है अख़बार भी कभी चार छह मंगवाता था दिन भर पढ़ता रहता अब एक ही मंगवाता हूं सरसरी नज़र डालता हूं पढ़ने की ज़रूरत नहीं होती सब वही पहले सा होता है। कल आधा बाकी बजट संसद में पेश किया गया नहीं देखा नहीं सुना बिना पढ़े ही इक रचना लिखी खबर का शीर्षक देख कर ही। ये मशहूर होना है कि बदनाम होना कहा जाये जो इधर ग़ज़ल शायरी जिसे बड़ी मुश्किल से वैश्या के कोठे से उतार कर दुष्यंत कुमार जैसे शायरों ने इंसान और इंसानियत के आम ज़िंदगी के सरोकार से जोड़ा था वापस बेदिल बेअदब राजनेताओं की मंडी में लाई गई है बिना उसकी मर्ज़ी के। हर दिन कोई नेता किसी शायर के शेर का क़त्ल करता है किसी ग़ज़ल की आबरू तार तार करता है। कल संसद में क्या हुआ होगा आपको कोई ज़हमत नहीं उठानी पड़ेगी बस शायर राजेश रेड्डी की शायरी के इस वीडियो को समझना होगा केवल सुनने की बात नहीं है। बड़े आसान शब्दों में सीधी सच्ची खरी बात कहते हैं , सुनिए उसके बाद चर्चा करते हैं। 


पहली ही ग़ज़ल समझाती है। 
चलेगा चार दिन सिक्का तुम्हारा , फिर उसके बाद क्या होगा तुम्हारा। 
बड़े होकर है जीना जाहिलों में , धरा रह जाएगा बस्ता तुम्हारा। 

हो सकता है जो अदबी उसूलों से वाक़िफ़ नहीं इसको भी कहें कि शोहरत की बात है बदनाम होकर भी नाम होने की चाहत रखने वाले लोग और होते हैं। दुनिया के बाज़ार से अलग रहने वाले राजेश रेड्डी जैसे वास्तविक शायरी कहने वाले शायर तो साफ कहते हैं। 

ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊं , बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊं। 
मेरे अंदर से गर दुनिया निकल जाये , मैं अपने आप में भरपूर हो जाऊं। 
न बोलूं सच तो कैसा आईना मैं , जो बोलूं सच चकनाचूर हो जाऊं।

उनकी हर ग़ज़ल का शेर आज भी आपको हक़ीक़त लगेगा समझोगे अगर। 

अब क्या बताएं टूटे हैं कितने कहां से हम , खुद को समेटते हैं यहां से वहां से हम। 
क्या जाने किस जहां में मिलेगा हमें सुकून , नाराज़ हैं ज़मीं से खफ़ा आस्मां से हम।
मिलते नहीं हैं अपनी कहानी में हम कहीं , गायब हुए हैं जब से तेरी दास्तां से हम। 
अब तो सराब ही से बुझाने लगे हैं प्यास , लेने लगे हैं काम यकीं का गुमां से हम। 
क्या जाने किस निशाने पे जाकर लगेंगे कब , छोड़े तो जा चुके हैं किसी की कमां से हम। 
ग़म बिक रहे थे मेले में खुशियों के नाम पर , मायूस होके लौटे हैं हर इक दुकां से हम। 

( सराब कहते हैं रेगिस्तान की चमकती हुई रेत को मृगतृष्णा जो पानी लगती है होता नहीं पानी )

शायरी लाजवाब हुनर है ग़ालिब को गुरुर था बादशाह का तख़्तो ताज़ छिन्न सकता है उनसे उनका हुनर कोई नहीं छीन सकता है। मगर ये राजनेता और दुनिया के ऐसे तमाम लोग जिनको दर्द से कोई एहसास ही नहीं बड़े बेदर्द होकर देश की जनता से ज़ालिमाना ढंग से पेश आते हैं उनके मुंह से ऐसी ग़ज़ल का शेर और शायरी सुनकर लगता है जैसे कदाचार करता है किसी नाज़ुक बेबस अबला के साथ। ग़ज़ल की नाज़ुकी उसकी पहचान है इधर जो शायर मंच पर ग़ज़ल को कहते नहीं पढ़ते हैं चिल्ला कर शोर करने की तरह उनका भी जुर्म कम नहीं है। बाज़ारू बिकने की चीज़ नहीं है ग़ज़ल , कहां दर्दे दिल की बात कहां नाम पैसा शोहरत और आयोजक की बढ़ाई करने की सलीका जो किसी ज़माने में दरबारी कवि अपनाते थे ख़िताब और मांहवार पेंशन पाने को। अब तो सोशल मीडिया पर इश्क़मिजाज़ी और ख़ुदपरस्ती के लिए अच्छे शेरों को तोड़ मरोड़ कर कचरा करने का गुनाह लोग करने लगे हैं। अगर उनको ये शायरी से मुहब्बत लगता है तो फिर ये प्यार भी वहशीपन वाला है ज़बरदस्ती से किसी को अपना बनाने की नाकाम कोशिश करना गुनाह है। 

मनवीय संवेदनाओं को महसूस करने को दर्द को भावनाओं को व्यक्त करने को लिखे कलाम को ऐसे लोग बोलते हैं जिनकी संवेदनाएं ही मर चुकी होती हैं इस से अधिक विडंबना की बात भला क्या होगी। आपको अगर यही अच्छा लगता है तो नकली की वाह वाह करना छोड़ इन झूठे दोगले लोगों के किसी के चुराए शेर को सुनकर तालियां बजाने से बेहतर है अच्छी शायरी की किताब लेकर पढ़ना या उनकी वीडियो ऑडियो संगीत को सुनिए। बनावटी माल नकली सामान बाज़ार में बाक़ी कोई कम था जो शेरो शायरी को भी ले आये हैं। संसद पहुंच कर ग़ज़ल को लगता होगा फिर वापस वैश्या के कोठे पहुंच गई हूं। 

याद आया कहावत भी है वैश्यावृति और राजनीति दुनिया के दो सबसे पुराने पेशे हैं और दोनों में बहुत समानता भी है। वैश्या की मुहब्बत हर किसी को मिलती है पैसे से उसी तरह से राजनेताओं का प्यार भी जनता से देश से मतलब पाने को ही होता है। चलते चलते।

बजट है अबके बही खाता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     बजट है अबके बही खाता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

चलो कुछ बदलाव तो हुआ अबके देश की सरकार का बजट लाल रंग के सूटकेस की जगह लाल कपड़े में लिपटा हुआ दस्तावेज़ बन पेश किया बही खाता नाम देकर। लालजी का बहीखाता बदनाम रहा है उस में लालजी का जमा बढ़ता रहता है कर्जदारों का क़र्ज़ कम ही नहीं होता असल से ब्याज ज़्यादा होता जाता है। सरकार या देश का बजट वास्तव में कभी मुनाफे वाला नहीं हुआ भले उसके पास कमी किसी तरह की नहीं होती है। लाख करोड़ से कम की बात करना लगता है चिल्लड़ की बात है। घाटा ही घाटा है और घाटे को बढ़ाने को ही विकास कहते हैं। टीवी अख़बार बेकार समझने समझाने की नाकाम कोशिश करते हैं जबकि सच में पेश करने वाले को भी खबर नहीं होती इस जादू के पिटारे से कौन सा जिन्न निकलने वाला है। कागज़ पर लिखा हुआ बताते हैं कभी भी काम आ सकता है। पहले लिख बाद में दे भूल पड़े तो कागज़ से ले , दुकानदार अपने बच्चों को पहला सबक यही देते थे। सरकार बजट पेश करते हुए लिखती है किस किस को इस साल कितना देना है और किस किस से कैसे कितना वसूलना है फिर भी कहीं से क़र्ज़ उठाना भी होगा ये बताया नहीं जाता बस कहते हैं इस साल घाटा बढ़कर इतना हो जाएगा। ये घाटा कौन देगा बराबर करने को कोई नहीं बताता कोई नहीं सवाल करता है। चादर जितनी है पांव उतने बढ़ाने की कोई बात नहीं चादर को खींच तानकर फैलाने को जाल बुनते हैं। सरकार को कभी भूखे नहीं सोना पड़ता है बेघर भी नहीं होती कभी सरकार उसकी शानो शौकत भी बढ़ती जाती है शासक लोग और विपक्षी दल के लोग भी खुद अपने लिए जितना चाहते खुद ही बढ़ा लेते हैं। कर की वसूली और आमदनी बढ़ाने को देश की संपदा बेचने का भी रास्ता होता है अलीबाबा चालीस चोर की कथा का आधुनिक संस्करण यही है। चोरों की नगरी है राजधानी और खज़ाना ऐसा है जिस का ताला बंद होता नहीं कभी खुला रहता है। सरकारी गोदाम का अनाज चूहे खाते रहते हैं सड़ता भी रहता है मगर भूखे लोगों तक पहुंचाने की फाइल खो जाती है चूहे कुतर जाते हैं।

जो किसी ने नहीं सोचा सरकार को पता चल गया है , लालजी की बही का सच समझते सब हैं समझ पाए नहीं लोग। बही के कागज़ लाल रंग की जिल्द में इक सफ़ेद रंग के धागे से पिरोये हुए होते हैं। बही को बांधे रखते हैं मगर खोलने को धागे को निकाल कर किसी का खाता निकाल उस कागज़ को फाड़ने या निकालने से कोई दूसरा बीच में रखने की सुविधा होती है। पन्ना नंबर सही रखना कोई कठिन काम नहीं सब मुमकिन है। आधुनिक काल में सरकारी साइट्स या ऐप्स पर कुछ अपलोड करने के बाद डिलीट करने का विकल्प रहता है। कहीं आपको यहां बजट की जानकारी तो नहीं चाहिए थी पढ़ने को , क्या होगा उस से दिल बहलाओगे जन्नत का ख्वाब समझकर। जिनको मिलना है उनको इसकी ज़रूरत नहीं है उनकी पसंद और ज़रूरत पहले से सरकार पूछ चुकी होती है। कल कोई आपको रेखा खींच कर दिखाएगा पैसा कितने फीसदी किस को मिलेगा किस तरह से आएगा। बजट बनाने के बाद भी कभी आंबटित राशि खर्च नहीं हो सकेगी अड़चन एक नहीं सौ हैं तो कहीं बजट में नहीं शामिल सरकार की मर्ज़ी से खर्च करने को उपाय भी होता है। बजट किसी और काम को आंबटित था उसको किसी और को देने को कागज़ पर लिखने भर की देरी है आदेश है पहले से सब सही करने को बैठे हैं। सही करना मतलब ठीक करना नहीं होता है हस्ताक्षर करने को कहते हैं , कहते थे कभी किसी दल का कोई लिखित हिसाब किताब नहीं था। खाता न बही केसरी जो कहे वो सही ये हर सत्ताधारी का हिसाब है नाम कोई और होता है असली तिजोरी की चाबी जिसके पास वही मालिक होता है।

आजकल के युवा नहीं जानते कभी पुरानी फिल्मों में सूदखोर की बही बड़ी बदनाम हुआ करती थी। गोपी फिल्म में गोपी साहूकार की दुकान पर नौकरी करते हुए लालजी की बही के पन्ने फाड़ने लगता है तो कोई सवाल करता है पता भी है कौन से पन्ने फाड़ने हैं और गोपी कहता है जो फाड़ने हैं वही फाड् रहा हूं। अब कोई गोपी नहीं है जो साहस करे और जिन पन्नों को फाड़ना चाहिए फाड़ने का काम करे। मगर कहते हैं दुनिया घूमती हुई वापस उसी जगह पहुंच जाती है जहां से चलना शुरू किया था। ऑनलाइन बैंकिंग तक पहुंचने के बाद वापस पुराने बही खाते पर आने का कुछ महत्व अवश्य है। इसको आप प्रतीकात्मक समझ सकते हैं सिंबॉलिक शब्द उपयुक्त होगा।

Wednesday, 3 July 2019

जो बोओगे वही काटोगे ( सामाजिकता की बात ) डॉ लोक सेतिया

 जो बोओगे वही काटोगे ( सामाजिकता की बात ) डॉ लोक सेतिया

 विषय का विस्तार बहुत है , चिंता का अंबार बहुत है। निरर्थक की बहस नहीं है समझने को सार बहुत है। सब पहले यही समझते हैं हमने अपनी संतान को अच्छी परवरिश दी है बड़े होकर समझेंगे हमारी उलझन को। किसी और की बात सुनते हैं पढ़ते हैं कि ऐसा हुआ क्या कर दिया तो दिल में पहली बात आती है खुद उन्होंने भी यही किया होगा शायद अपने बड़ों के साथ। मगर ऐसा होता नहीं है हर माता पिता अपनी संतान को अपनी हैसियत से बढ़कर नहीं है पास वो भी उपलब्ध करवाना चाहते हैं। बच्चों की बिना अर्थ की तुतली आवाज़ को भी सुन कर ख़ुशी महसूस करते हैं उनको बढ़ावा देते हैं फिर भी वही बच्चे बड़े होने पर माता पिता की बातों को अनावश्यक उपदेश कहकर अनसुना करते हैं कभी खिल्ली उड़ाते हैं और समझते हैं हम पढ़ लिख कर आधुनिक समाज को जानते हैं इनको खबर नहीं दुनिया कहां से कहां पहुंच गई है। तमाम बच्चे समझते हैं हमने माता पिता को पैसा कमा कर दिया सब सुख सुविधा उपलब्ध करवाते हैं इस से बढ़कर उनको क्या चाहिए। बस उनको इतना सा ही तो समझाते हैं जैसा हम सोचते हैं आप वैसा किया करो। रिश्तों का संबंध कभी शर्तों पर नहीं कायम रहता है माता पिता संतान को किसी अनुबंध में बांधकर नहीं रखते हैं कि आपको बदले में इस तरह करना होगा। मगर फिर भी बड़े होकर हर बच्चे को लगता है मुझे जितना मिला थोड़ा है और माता पिता को भी शिकायत होने लगती है इसकी उम्मीद नहीं की थी। यही बात घर से बाहर समाज की है और देश को लेकर भी इक निराशा दिखाई देती है जिस जिस से जो अपेक्षा है पूरी नहीं होती हर कोई समझता है मैं जो भी करता हूं ठीक करता हूं। अपने आप से बाहर निकल कर समझते हैं जो कड़ी घर से शुरू होती है पूरे समाज और देश को जोड़ती हुई निर्धारित करती है हम क्या क्यों कैसे हैं। 

हमने संतान को बड़े होकर क्या करना है क्या बनकर दिखाना है कैसे आधुनिक ढंग से जीना है कितना धन किस किस तरीके से जोड़ना है नाम शोहरत पाने को क्या करते हैं दुनियादारी की समझ देते हैं। अच्छे इंसान बनने की सच कहने के साहस की ईमानदारी की कर्तव्य की बातें सिखाना शायद हम सोचते हैं बड़े होकर खुद सीख जाएंगे बच्चे। हमने बहरी परिवेश कपड़े पहनने अच्छे नज़र आने की बात समझाई मगर भीतर मन से सुंदर होने का सबक पढ़ाया नहीं या खुद हमें भी नहीं पढ़ाया गया था। हम चाहते हैं जो बनाना उसको बनाने को पहले बहुत कुछ करना भी था जो किया ही नहीं। हमने बचपन से सभी से अनावश्यक मुकाबला करने की सोच बना ली थी और अपनी संतान को तुम औरों से किस बात में कम हो सबसे बढ़कर समझदार हो की भावना को स्थापित किया और बढ़ावा दिया है। अपनी गलती को समझना तो क्या स्वीकार भी नहीं करना ऐसी आदत बनाने के दोषी हम खुद हैं। मैं ये हूं मैं वो हूं जाने हर किसी को खुद को बेकार इक अहंकार कैसे आ जाता है जो बाहर हर किसी को अपने से कमतर समझते समझते घर में भी सब से काबिल होने का गुरुर पैदा कर देता है। स्वाभिमान की बात और होती है आत्मसम्मान की कीमत नहीं समझते हम मतलब को गधे को बाप कहना पड़ता है ये धारणा बना ली है। जिन विकसित देशों में जाकर व्यवस्था और सब बड़े छोटे बराबर होने को देख हम तारीफ करते हैं खुद अपने देश और समाज में आचरण करते हुए उस तरह नहीं चलते हैं। मनमानी और मतलबपरस्ती की आदत को हमने समझा है अवगुण नहीं खासियत है अपनी बुरी बात को अच्छा साबित करना चाहते हैं। 

कितने अच्छे स्कूल कॉलेज की पढ़ाई कितना अच्छा कारोबार हो जो सबसे महत्वपूर्ण है नैतिक आचरण जो जैसा है उसी तरह का नज़र आना और गलती करने पर पछतावा या भूल का सुधार करने का हौंसला रखना कोई सोचता ही नहीं इनके बिना आदमी विवेक शून्य बनकर ऐसा समाज बनाता है जो संवेदना से रहित है। ऊपर चढ़ने की चाहत में राह उचित अनुचित का विचार करते ही नहीं हैं। आधुनिकता और झूठी दिखावे की सभ्यता ने हमसे जो बेहद मूलयवान था छीन लिया है जो दिया है वो सच कहा जाये तो किसी काम का नहीं है। हीरा खोकर पत्थर जमा करने का काम करते हैं हम लोग। मगर सब जानते समझते ऐसा होने कैसे देते हैं हम , कारण है कि हम चिंतन नहीं करते अपने बारे न देश समाज के बारे। कोई कौन होता है हमें उपदेश देने वाला हम सही हैं या गलत उनको क्या लेना देना। खुद अपने आप से डरते हैं खुद को आईने में देखने का साहस नहीं करते। जब किसी से कोई शिकायत रखते हैं तब क्या सोचा कभी औरों को भी हमसे कितनी शिकायत हो सकती हैं। जब हम मज़बूर होते हैं तब समझते हैं बेबसी का दर्द क्या है लेकिन जब हर किसी की विवशता पर हंसते हैं मज़बूर होने पर किसी का शोषण करते हैं भूल जाते हैं इंसानियत क्या है।
      नाम मुहब्बत प्यार के अपनेपन के हैं फिर भी इन में सब कुछ होता है मधुर संबंध मिलना बड़ा कठिन है। लोग हैं जो निभाए जाते हैं जैसे कोई बोझ ज़िंदगी ने सर पर रख दिया है ढोना मज़बूरी है। हर रिश्ते की कुछ कीमत होती है जो चाहे अनचाहे चुकानी पड़ती है। रिश्ते बनाते नहीं हैं बने बनाये मिलते हैं और निभ सके चाहे न निभे निभाने पड़ते हैं। दिल का दिल से कोई नाता होता भी है सच कोई नहीं जानता बात दिल की कहते हैं दिल से पूछो दिल की दिल ही जानता है। दर्द से दिल भरा होता है फिर भी मिलते हैं हंसते मुस्कुराते हुए ये चेहरे हैं कि मुखौटे हैं जो क़र्ज़ की तरह होटों पर हंसी रखनी होती है और अश्कों को छुपकर किसी कोने में बहाना होता है अकेले अकेले। दुनिया भर में कोई कंधा सर रख रोने को नहीं मिलता कोई आंचल पलकों के भीगेपन को पौंछता नहीं है। दर्द देते हैं अश्क मिलते हैं रिश्ते क्या कोई ख़ंजर हैं जो घायल करना जानते हैं मरहम लगाना नहीं आता है। ये जो सुनते हैं हमदर्दी के साथ निभाने के नाते किस दुनिया की बात है इस दुनिया में तो नहीं मिलते खोजते रहते हैं जीवन भर। मुझे अकेला छोड़ दो कौन है जो ऐसा कहना नहीं चाहता पर कहा नहीं जाता है कहने पर सवाल होते हैं। जब आपको साथ चाहिए आप अकेले होते हैं भरी महफ़िल में और जब कभी आपको अकेले रहना होता है भीड़ लगी रहती है। कोई तकलीफ हो लोग आते हैं हालचाल पूछने को मगर ज़ख्मों को छेड़ कर दर्द बढ़ा जाते हैं , रिश्ते हैं रिश्तों की रस्म निभा जाते हैं। ज़रूरत होती है बुलाओ भी नहीं आ सकते पर बिन बुलाये भी चले आते हैं कितने अहसां जताते हैं। 
  बेगानों ने कहां किसी को तड़पाया है ये किस्सा हर किसी ने सुनाया है जिसको चाहते हैं उसी ने बड़ा सताया है। दर्द देकर कोई भी नहीं पछताया है हर अपने ने कभी न कभी सितम ढाया है। रिश्ते ज़ंजीर हैं रेशम की डोरी नहीं हैं हर किसी का इक पिंजरा है बंद रखने को कैद करने को। रिश्ते आज़ादी नहीं देते हैं जाने कितने बंधन निभाने होते हैं हंसते हंसते तीर खाने पड़ते हैं। कोई नाता नहीं जो खुली ताज़ा हवा जैसा हो जिस का कोई खुला आकाश हो पंछी की तरह उड़ने को फिर शाम को घौंसले में लौट आने को। कितनी शर्तों पे जीते मरते हैं सच नहीं कहते इतना डरते हैं , बात झूठी करनी पड़ती है करते हैं। सुलह करते है फिर फिर लड़ते हैं। मतलब की दुनियादारी है हर रिश्ता नाता बाज़ारी कारोबारी है हर पल बिकती है वफ़ादारी है कितनी महंगी खरीदारी है। भीड़ है हर तरफ मेला है जिस तरफ देखो इक झमेला है कोई बवंडर है कि तूफ़ान कोई ये जो इतना विशाल रेला है। जीना किसने दुश्वार किया है हर किसी को गुनहगार किया है कभी छुपकर कभी सरेबाज़ार किया है। अपने भी तो रिश्तों का व्यौपार किया है खोने पाने का हिसाब हर बार किया है। कितने रिश्तों ने परदा डाला है कितनों ने शर्मसार किया है। ये रिश्ते हैं कि पांव की बेड़ियां हैं हाथ पकड़े हैं कि लगी हथकड़ियां हैं। ज़िंदगी भर जिसको निभाया है हुआ फिर भी नहीं अपना पराया है इक बार नहीं सौ बार आज़माया है। अब नहीं मिलती धूप के वक़्त कहीं भी छाया है। इक गीत याद आया है। 
  
       आज आगे की बात करते हैं। इक कहानी जैसी बात है दो अजनबी मिलते हैं जान पहचान होती है। कोई कहता है अकेला हूं मुझे साथ लेते चलो। चलना है तो चल सकते हो मेरे साथ लेकिन मैं नंगे पांव पैदल चलता हूं और बस चलते जाना है बने बनाये रस्ते पर नहीं खुद अपनी राह बनाता हूं। तुम जब तक साथ चल सकते हो चलना जब थक जाओ रुक जाना तेज़ जाना हो आगे बढ़ जाना कोई शर्त नहीं साथ निभाने की जितना साथ चल सकते हैं चलना जब नहीं निभे तो अलग हो जाना किसी शिकायत गिले शिकवे के। तुम को मेरी राह कठिन लगेगी कभी तो चले जाना अपनी मर्ज़ी की राह पर अलविदा कहकर। मुझे नहीं आता है दिखावे की दुनियादारी निभाना और मुझे औरों को भी साथ लेकर चलना है खुद आगे बढ़ने को किसी को राह में नहीं छोड़ना है। धन दौलत महंगे उपहार नहीं हैं खाली जेब है और खुश रहता हूं जिस भी हाल में , मिलते हैं लोग बिछुड़ते रहते हैं यादें बनकर रह जाते हैं। आज तुम मुझे कोई कीमती उपहार देना चाहते हो कल मुझसे चाहोगे बदले में शायद नहीं दे पाऊं ये जो तुम नहीं लेना चाहता दे रहे हो यही अमानत है जब भी चाहो लौटा दूंगा मगर मुझे रिश्तों में हिसाब करना नहीं आता है। बहुत कुछ है जो एक साथ रहते मिलता है जिसको धन दौलत से तोला नहीं जा सकता है। कुछ भी नहीं छुपाया था सब बताया था अपनी विवशता अपनी सोच और अपने मकसद को लेकर भी। अचानक सवाल करने लगे आपकी कोई बात मुझे मंज़ूर नहीं है और मज़बूरी को अविश्वास समझ लिया अब और नहीं आपके साथ चलना संभव है। ठीक है जितना साथ चले अच्छा है। ये इक पंजाबी की कविता या ग़ज़ल की बात है। कोई झूठ नहीं कोई हेरा फेरी नहीं मगर मंज़िल अपनी अपनी जाना है तो किसी मोड़ पर राह बदल सकती है। हम लोग रिश्तों को इक कैद बना लेते हैं दोस्ती या प्यार या कोई भी नाता हो चाहते हैं अपनी शर्तों पर साथ निभाना है लेकिन दिल से कोई ऐसा नहीं कर सकता है। घर को पिंजरा मत बनाओ रिश्तों को जंजीर बनाकर साथ जकड़ने से रिश्ता इक बोझ बन जाता है। कोई मिलता है तो किसी मोड़ पर अलग भी होना पड़ता है ऐसे में बिछुड़ने का दर्द हो मगर गिले शिकवे कर जो मधुर नाता रहा उसको कड़वी याद बनाना उचित नहीं है।

          जीवन खोने और खो कर पाने का नाम है। हम पाना सब कुछ चाहते हैं खोने को तैयार नहीं होते है। सभी कुछ आज तक किसी को नहीं मिला है। जो मिला उसको लेकर खुश नहीं होते और जो नहीं मिल सका उसको लेकर दुःखी रहते हैं। दोस्ती रिश्तों के संबंध में देना है तो बदले में पाने की शर्त रखकर मत दो क्योंकि जितना भी मिलेगा आपको कम लगेगा जितना दिया वो बहुत अधिक लगता है। जब पलड़े में तोलने लग जाते हैं तो दुनियादारी होती है अपनापन प्यार मुहब्बत नहीं बचता है। फिर आपको बार बार जतलाना पड़ता है किसी को चाहते हैं जबकि जतलाने की बताने की ज़रूरत होनी नहीं चाहिए।

शोर की ख़ामोशी से मुलाकात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     शोर की ख़ामोशी से मुलाकात ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

जिसकी लाठी उसकी भैंस की तरह सत्ता पास है सबसे अच्छा होने का शोर खुद उनका है। उनसे पहले भी जो नहीं बोलने की पहचान से जाने जाते हैं दो बार सत्ता पर रहे हैं। उनको लेकर हैरान भी परेशान भी थे और अपनी हर किसी को अपमानित करने की आदत से मज़बूर भी इसलिए संसद में मज़ाक उड़ाने को कह दिया था। आपसे सीखना है राजनीति के हम्माम में भी इतने घोटालों के बाद आपके दामन पर इक छींटा तक नहीं नज़र आया। क्या ग़ुसलख़ाने में भी रेनकोट डाल कर नहाते हैं। कौन बताये उनको ईमानदारी का कोई रेनकोट आपके बाजार में नहीं मिलता है। मौन रहे थे अच्छा किया वाहियात किस्म की बात पर जवाब नहीं देना ही समझदारी है। मगर अब खुद को सबसे अच्छा कहलाने वाले समझ नहीं पा रहे हमने देश की अर्थव्यवस्था को जिस बदहाल हालत में पहुंचा दिया है उस से बाहर निकलने का कोई रास्ता बचा भी है। तब याद आया कभी उन्होंने देश की अर्थव्यवस्था को बचाने का कार्य किया था वित्तमंत्री बनकर। राजनेताओं को शायद शर्म नहीं आती किसी को अपमानित करने के बाद अवसर आने पर गले मिलकर मतलब की बात करने की। और भले लोग अपनी शराफ़त को छोड़ते नहीं हैं घर आये महमान का आदर किया करते हैं। पहले अपनी बनाई वित्तमंत्री को मिलने भेजा औपचारिक नहीं थी मुलाकात तैयारी थी अपनी डूबती नैया को किस तरह बचाया जाये ये ज़रूरी सबक किसी और से नहीं सीखने का जोखिम उठाया जा सकता। असली किया धरा सब खुद का है और नासमझी में मनमानी करते करते देश की अर्थव्यवस्था की कश्ती को बीच मझधार ले आये हैं। माझी शब्द सुना होगा पतवार थामे कश्ती को पार लगाने का काम करते हैं उर्दू भाषा में उसको नाखुदा कहते हैं , इक शेर है " नाखुदा को खुदा कहा है तो फिर , डूब जाओ खुदा खुदा न करो "। परवीन फ़ाकिर की ग़ज़ल है। मेरी भी इक ग़ज़ल है चलो पेश करता हूं।

हमको ले डूबे ज़माने वाले , नाखुदा खुद को बताने वाले 

मेरी सब से लोकप्रिय ग़ज़ल - लोक सेतिया "तनहा"

हमको ले डूबे ज़माने वाले ,
नाखुदा खुद को बताने वाले।

देश सेवा का लगाये तमगा ,
फिरते हैं देश को खाने वाले।

ज़ालिमों चाहो तो सर कर दो कलम ,
हम न सर अपना झुकाने वाले।

उनको फुटपाथ पे तो सोने दो ,
ये हैं महलों को बनाने वाले।

तूं कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ,
मेरी अर्थी को उठाने वाले।

तेरी हर चाल से वाकिफ़ था मैं ,
मुझको हर बार हराने वाले।

मैं तो आइना हूँ बच के रहना ,
अपनी सूरत को छुपाने वाले। 
जिनको हमने नाखुदा समझा था वही हमको ले डूबे हैं। बात हो रही थी शोर की मुलाकात की ख़ामोशी के साथ। ख़ामोशी नहीं जाती है उस तरफ शोर ही है जिसको ख़ामोशी की ज़रूरत पड़ जाती है। मगर क्या कहा होगा शोर ने क्या जवाब मिला होगा ख़ामोशी से बताएगा कौन ख़ामोशी बता नहीं सकती और शोर को बताना नहीं मंज़ूर। फिर भी कल्पना करते हैं। 
  आप आये घर हमारे खुदा की कुदरत है हम कभी आपकी शान को कभी हमारे घर की सादगी को देखते हैं। आपको तो पहले के सभी खराब लगते हैं फिर क्यों ज़हमत उठाई हमारे पास आने की जब नवरत्न आपके दरबार में हैं आपके बनाये हुए। अपने सुनते हैं सरकारी संचार की भारत संचार निगम लिमिटेड कंपनी जिसकी जायदाद तीन लाख करोड़ है उसको 950 करोड़ में अपने कारोबारी दोस्तों को बेचने का विचार कर रहे हैं।
सरकारी विमान कंपनी को भी आप निजी हाथों में सौंपना चाहते हैं। घर का सामान संभालना नहीं आता या अपने खास लोगों को सस्ते में बेचना चाहते हैं ताकि छींटों से बचे रहें और जी भर कर बौछारों से खुलकर नहाने का लुत्फ़ भी उठाते रहें। इतना तो समझते हैं लोग कि देश की आर्थिक बदहाली का आपके दल का विश्व की सबसे अमीर राजनीतिक पार्टी बनने का कोई नाता अवश्य है। आगे कब क्या करना है पता नहीं।
 कल शायद देश की हालत को भी बिगाड़ कर किसी को ठेके पर देने की बात सोचने की नौबत आ जाये। आपने पिछले पांच साल में बेतहाशा धन बर्बाद किया है विदेशी दौरों से देश भर में अपने गुणगान को जमकर शोर मचाने पर। अच्छे दिन की जगह बुरे दिन कोई और नहीं लाया है कम से कम पचास साल पहले मर चुके व्यक्ति को अपने अपकर्मों का दोष नहीं दे सकते हैं। पांच साल और मिल गए  हैं आपको जो मर्ज़ी करने को कोई आपको कुछ नहीं कहने वाला है। आपको हैरानी नहीं हुई ख़ामोशी ये सब बोलती रही और शोर चुपचाप सुनता रहा भला कैसे। मगर यही होता है ख़ामोशी बिना आवाज़ जो समझा देती है शोर ऊंची ऊंची आवाज़ करने के बावजूद नहीं समझा सकता है। 
      आखिरकार शोर करने वाले को कहना ही पड़ा अपने सच कहा था हालत जितनी आपको आशंका थी उस से भी बढ़कर चिंतनीय दशा तक खराब हो चुकी है। आपको नज़र आता है मैंने कितना खूबसूरत लिबास पहना है मगर सच कहूं खुद को महसूस करता हूं जैसे राजा नंगा है कहानी जैसी हालत नहीं हो। कोई सच बताता ही नहीं सब घबराते हैं सच कहा तो सूली चढ़ा दिया जायेगा मगर आपको सच बोलने से कोई रोक नहीं सकता है। अब आप मुझे सच सच बताओ मैंने जिस को पहना हुआ है क्या वो पोशाक जैसा सब लोग शोर मचा रहे हैं मेरी रथयात्रा पर पुष्प वर्षा कर रहे हैं वास्तव में पहनी हुई है , कहीं मेरी हालत हम्माम में कुछ भी नहीं पहने व्यक्ति जैसी तो नहीं लग रही है। ख़ामोशी मुस्कुराई और धीमे से बताया आपकी जिस्म वाली पोशाक तो लाजवाब है आपके भीतर की वास्तविकता ढकी छिपी है मगर देश की अर्थव्यवस्था की दशा को कब तक देश की जनता से छिपाओगे आखिर सामने आनी ही है। आपको नेक सलाह कभी किसी की भाती नहीं है जिसने भी दी अपने उसी को किनारे लगा दिया। नाखुदा होने का दावा किया था अब डूबने के आसार बने हैं तो खुदा खुदा करने से बात नहीं बनेगी। भगवान उसी को बचाता है जो खुद कोशिश करते हैं बचाने की। आपको तो आदत है जानकर कश्ती को मझधार में ले जाने की तूफ़ान से खेलने की आदत खतरनाक होती है। इक ग़ज़ल भी है सुनोगे जाने से पहले अच्छी है। 

जीवन मृत्यु फिल्म की है और धोखे से जालसाज़ी से किसी बेगुनाह को सज़ा दिलवाले वाले लोगों को अंजाम तक पहुंचाती है कहानी। इशारा समझ सकते हैं काफी है।   


Tuesday, 2 July 2019

क्या ज़िंदा हैं सभी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      क्या ज़िंदा हैं सभी ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

       पहले अपनी बात कहता हूं जी रहा हूं मगर वास्तव में जीना नहीं आया अभी तलक मुझे। बेकार गाता रहा हमेशा ही , किस तरह जीते हैं ये लोग बता दो यारो , हमको भी जीने का अंदाज़ सिखा दो यारो। किसे आता है सलीका जीने का जो सिखलाता। सब लोग सूखे तालाब किनारे बैठे हैं प्यास लेकर नाता निभाने को। जब बहुत अधिक बोलने लगे कोई तो उसको खामोश रहने की सलाह देते हैं लेकिन चुप रहना क्या आसान है उसके लिए जिस के भीतर तूफान मचलते रहते हैं भंवर लिए फिरता है कदम कदम अपने साथ। कुछ इसी तरह सोचकर समझ आया जितना लिखा किसी काम का नहीं है अब विराम लेकर थोड़ा याद रखने के काबिल काम का लिखना बेहतर है। लिखना भी खुद पढ़ना भी खुद है किस को बिना मतलब की बात पढ़ना सुनना पसंद है बात करते हैं तो भी कोई मकसद छिपा रहता है। अब जब मरने की तैयारी करनी चाहिए हसरत जाग उठी है थोड़ा सा हम भी जी कर देख लेते। किसी ने कहा था मौत के बाद जीना है तो दो काम हैं करने को , या कुछ कर जाना लिखने के लायक या फिर लिख जाना पढ़ने के काबिल। अपने आप पर गर्व नाज़ करना फज़ूल है अभी तो नाज़ करने जैसा कुछ भी नहीं किया है। आज़ादी की चाहत में कैदखाने की दिवारों को और ऊंचा करते रहे हैं जाने किस डर से और समझते रहे यही सुरक्षा की ज़रूरत है।

  इधर समस्या खड़ी हो गई है , सरकार को पता चला है देश में जनसंख्या में कुछ गड़बड़ है। नोटबंदी की तरह अचानक घोषणा की गई है सबको अपने ज़िंदा होने का हल्फनामा जमा करवाना होगा कुछ दिन के अंदर और इक दस्तावेज़ हासिल करना होगा ये घोषणा करने का कि हां अमुक नाम का व्यक्ति मरा नहीं है। ज़िंदा होने की बात फिर भी साफ नहीं लिखी जाएगी क्योंकि ज़िंदा होने का भरोसा नहीं किसी का भी। सांस चलती है दिल धड़कता है विवेक काम नहीं करता उसको ज़िंदा नहीं कहते हैं मरने की राह पर मदहोशी की बात है। जाने कितनी चलती फिरती लाशें हैं जिन में ज़िंदगी होने का कोई एहसास नहीं होता है। जी रहे हैं मगर जीते हैं मर मर कर मुर्दों की तरह से , फर्क इतना है लोग खुद अपनी अर्थी को उठाये फिरते हैं। सीने पर बोझ लिए सांसों की गिनती करते वक़्त गुज़रते हैं। 

    इस से पहले कि आप घर से निकल पड़ें समझ लेना ज़रूरी है ज़िंदगी के अलामात क्या हैं। पहला काम आपको अपने भीतर झांकना है कोई आत्मा ज़मीर नाम का है भी या नहीं। बेच तो नहीं बैठे किसी को किसी दिन जाने अनजाने में। एक्स रे अल्ट्रासाउंड से आधुनिक उपकरण है जो आपके सामने पाते ही घोषित करेगा आपका ज़मीर है या नहीं है। नहीं समझे तो आईना सामने रखकर देखना , मन का दर्पण आपको साफ सच बता देगा। उस के बाद जाना किसी डॉक्टर से जांच करवाने लेकिन ख्याल रखना उस डॉक्टर के पास ज़िंदा होने का आत्मा और ज़मीर के सुरक्षित और स्वस्थ्य होना का दस्तावेज़ है तभी अन्यथा उसको अपने साथ किसी और के पास लेकर जाना। ज़िंदा नज़र आना और ज़िंदा होने का फर्क होता है संवेदना रहित गतिमान व्यक्ति बिना भावना या एहसास के बस इक मशीन है। मशीन खुद नहीं करती कुछ भी जिस के हाथ मशीन होती है उस की मर्ज़ी से चलती फिरती काम करती है। जैसे कोई वाहन किसी चालक की इच्छा से आता जाता है , हम किसी को इंसान नहीं इस्तेमाल की चीज़ समझते हैं और उसकी पसंद नापसंद नहीं समझते पूछते जानते समझते। जो हम चाहते हैं उस से करने की उम्मीद करते हैं। कोई काम आप करना नहीं चाहते करना पड़ता है वेतन पाने को नौकरी का सवाल होता है तब आदमी आदमी नहीं रहता मशीन हो जाता है।

    कहने को आपका शहर देश या गांव है मगर जैसा होना चाहिए होता नहीं है आपको बेगानापन लगता है। लोग भागते रहते हैं देश विदेश घूमते हैं चार दिन सैर करने को लाजवाब जगह भी हमेशा रहने को कभी लगता है मज़बूरी है। जिस जगह आपको हमेशा रहकर ख़ुशी मिले उस जगह आपका घर होना मुमकिन नहीं होता है। घर अपना नहीं किराये का भी हो तब भी आपको अपनी मर्ज़ी से रहने की अनुमति मिलना ज़रूरी नहीं होता मिल ही जाये। घर क्या कमरे का कोई इक कोना आपका अपना हो अपने अनुसार रहने को और कोई आपके हंसने रोने नाचने गाने झूमने पर अंकुश नहीं लगा सकता हो तो खुल कर जीने का लुत्फ़ लिया जा सकता है। दुनिया के नियम कानून आपको जीने नहीं देते और मरने की भी मनाही होती है फिर भी कहते हैं इस ढंग से जीना है उस ढंग से जीना सही नहीं है। आज़ाद होना चाहते हैं सभी मगर किसी दूसरे को आज़ादी देने को कोई तैयार नहीं होता , और किसी का मनमर्ज़ी से जीना क्यों आपको खराब लगता है।

      और होंगे जिनको चिंता रहती है मौत के बाद लोग याद रखें मुझे , मैंने तो चाहा है लोग भूल जाएं मुझे भी मेरी सभी खताओं को भी। किस किस का मुजरिम नहीं हूं क्या किया है ऐसे जीता रहा जैसे कोई हर दिल इक गुनाह करता है। कुछ भी नहीं है मुझ में याद रखने के काबिल और कोई हसरत नहीं बाद मरने के याद करे कोई , हसरत है थोड़ी फुर्सत मिले इजाज़त मिले ज़माने की तो पल दो पल जीकर देखा जाये ज़िंदगी किसे कहते हैं। मरने के इंतज़ार में सांसे की गिनती को जीना नहीं कहते हैं।