Wednesday, 31 July 2019

शहंशाहों की मुहब्बत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

      शहंशाहों की मुहब्बत ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

 शासकों की मुहब्बत की दास्तां अलग हुआ करती है। इधर मुहब्बत का रंग ढंग बदला है आशिक़ महबूबा की जान लेते हैं। इक आशिक़ी देश से मुहब्बत की भी होती है आजकल जिसका शोर बहुत है , कभी देश की खातिर जान देने वाले खुद को महान कहते नहीं थे समझते थे जन्मभुमि का हक अदा करना है उसको आज़ाद करवा कर। पहले शाहजहां मुमताज की मुहब्बत को समझते हैं इक तस्वीर पर लिखी सच्चाई को समझते हैं। 







मुमताज शाहजहां की चौथी पत्नी थी सात पत्नियों में से और मुमताज से शादी करने को उसके पति का क़त्ल किया था उनहोंने उनके बच्चे को जन्म देते हुए छोटी आयु में मुमताज की मौत हो गई थी। जिसके बाद शाहजहां ने मुमताज की बहन से शादी कर ली थी। चलो इश्क़ मुहब्बत की बात से पहले बात करते हैं देश से मुहब्बत करने की और उसकी बदलती हुई आधुनिक परिभाषा की भी। मगर ताजमहल अपने देखा होगा कभी सोचा मुमताज को क्या मिला उसने नहीं देखा दुनिया को इक शहंशाह ने दिखाया उसकी मुहब्बत कैसी है। मगर फिर भी वो इक मज़ार है जिसमें किसी की जाने कितनी आरज़ूएं दर्द दफ़्न हैं। पत्थर कितने चमकदार हों उनमें कोई एहसास नहीं होता मुहब्बत तो बाद की बात है। साहिर ने कहा था इक शहंशाह ने बनवा के हसीं ताजमहल हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक।

         उनका दावा है उन से बड़ा देशभक्त कोई नहीं है यहां तक बात पहुंची है कि जो उनकी आलोचना करता है उसकी देशभक्ति पर शक किया जाता है। शाहजहां ने मुमताज की मुहब्बत में तालमहल बनवाया था ताकि उसकी बगल में अपनी मजार मरने के बाद बनाई जाये अर्थात मरने के बाद भी उसके जिस्म को पास रखना चाहते थे और उस पर बेतहाशा धन सरकारी खज़ाने से खर्च किया गया। आज भले आमदनी होती होगी ताजमहल देखने वालों से मगर तब शासक उस धन से देश की जनता की भलाई को कितना कुछ कर सकता था। शायद शाहजहां ने फिर जन्म लिया है या इक नया शहंशाह पैदा हुआ है जो अपने शौक अपनी शोहरत की खातिर बेतहाशा धन बर्बाद करता है। लोकशाही है राजाओं का शासन नहीं सत्ता मनमानी करने को नहीं देश की समस्याओं को समझने उनका हल निकालने को मिलती है। कितने करोड़ धार्मिक आयोजन सैर सपाटे पर कितने हज़ार करोड़ पचास देशों की सैर करने पर कितना धन आडंबर करने ऊंची मूर्तियां बनवाने पर कितना धन सरकारी खज़ाने से अपने फायदे को जनता को झांसा देने को सोशल मीडिया अख़बार टीवी चैनल पर इश्तिहार देने पर खर्च किये जिनसे कितने भूखे पेट भर सकते थे कितने स्कूल अस्पताल बनवा सकते थे। केवल अपने और अपने दल के लिए शासन बनाये रखना देशभक्ति कहलाता है तो बड़ी हैरानी की बात है। सत्ता का ऐसा मोह देश से नहीं कुर्सी से प्यार कहला सकता है।

  आज देश आर्थिक बदहाली और बेरोज़गारी और हर तरह से बुरे हालात में पहुंच गया है मगर आपको फुर्सत ही नहीं पिछले शासकों को खराब बताने के अनुचित काम से। जिनकी बात करते हैं उन्होंने कभी देश पर कोई उपकार करने का दावा आपकी तरह नहीं किया था। शहीदों की शाहदत को वोट पाने का औज़ार कभी किसी ने नहीं बनाया था पहले। आपके दल के नेता आये दिन गंभीर अपराध करते पाए जाते हैं मगर आपकी ज़ुबान से दो शब्द नहीं निकलते उसको देश समाज का दुश्मन बताने को। सत्ता पाने को कितने अपराधी दल में शामिल किये हैं कोई हिसाब नहीं जैसे कोई धर्मं परिवर्तन या गंगा स्नान हो पापियों के पाप धोने को। गंगा को वादा किया था बेटा होने की बात कही थी सफाई की गंगा पहले से मैली हो गई बताते हैं। हर दिन कोई धर्म के नाम पर भीड़ बनकर दंगा करता है कोई सत्ताधारी बलात्कारी सरकारी संरक्षण पाकर पीड़ित पक्ष को और परेशान करता है। ये सुशासन है देशभक्ति है। देश से मुहब्बत हो या किसी आशिक़ की आशिक़ी दोनों इबादत की तरह होती हैं और इबादत शोर मचाकर नहीं ख़ामोशी से की जाती है। आजकल फ़िल्मी ढंग से गुलाब देकर या उपहार भेजकर किसी से प्यार का इज़हार किया जाता है और इनकार करने पर मुहब्बत नफरत में बदल जाती है। वास्तविक मुहब्बत कभी ऐसी नहीं हुआ करती है ये वासना जिस्मानी हवस है जो इधर नज़र आती है। इक गीत बहुत पसंद किया गया था , आये दिन बहार के फिल्म से। मेरे दुश्मन तू मेरी दोस्ती को तरसे। मैंने इस से बढ़कर बद्दुआ किसी को देते नहीं सुना है ये चाहत हर्गिज़ नहीं है इसको मुहब्बत नहीं कहा जा सकता कि मुझे नहीं किसी और को मिले तो हद से ज़्यादा नफरत दिल में हो जाये। जिस दिल में मुहब्बत होती है नफरत को जगह नहीं हो सकती। जिनकी देशभक्ति नफरत को बढ़ावा देती है भेदभाव की बात करती है उनकी देशभक्ति भी अपने स्वार्थ की दिखावे की हो सकती है।

   ताजमहल फिल्म बनाने के वक़्त साहिर को गीतकार बनाने को कहा गया तो उन्होंने इनकार कर दिया था। क्योंकि उनकी नज़्म कुछ और बात कहती थी और सच्चा शायर पैसे शोहरत की खातिर अपनी ज़ुबान नहीं बदल सकता है। शायर कहता है मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको। मैं किसी शहंशाह की तरह नहीं जो मरने के बाद भी महबूबा को जकड़े रखना चाहता है। तुम मुझे ठुकरा के भी जा सकती हो तुम्हारे हाथ में मेरा हाथ है जंज़ीर नहीं। ये जिनकी देशभक्ति औरों को बंधक बनाये रखना चाहती है उसी तरह की है चाहत नहीं है मतलबपरस्ती की बात है।  इस आधुनिक शासक ने भी खुद अपनी शान दिखाने को वही दोहराया है। कुछ तस्वीरें देखते हैं।









मुस्लिम महिलाओं की बड़ी चिंता थी अच्छा है तीन तलाक को कानूनी अपराध घोषित करने को संसद में कानून बना दिया। मगर जिन महिलाओं को पति बिना तलाक छोड़ देते हैं उनका दर्द कोई कभी समझेगा। इनकी शानो शौकत देख का वो महिला जाने क्या सोचती होगी जिनको बिना कारण जनाब बेसहारा अकेली उस ज़माने में छोड़ आये थे जब छोड़ी हुई औरत का लोग जीना दूभर  देते थे। जब तक चाहा पत्नी होने की बात छुपाए रखी दस्तावेज़ में नहीं घोषित किया मगर जब लगा कहीं इसी से चुनावी नुकसान नहीं हो जाए घोषित कर दिया। चलो उनकी आपसी बात है हम कौन होते हैं।

     मगर क्या कानून बनाने से बाल मज़दूरी मिट गई दहेज लेना देना बंद हुआ और तो और बच्चों को शिक्षा का अधिकार भूखे को रोटी अनाज का अधिकार वास्तव में मिला है। कल कोई अपनी पत्नी को तीन तलाक देगा तो क्या होगा , महिला शिकायत करेगी तो शौहर जेल में बंद खुद अकेली बेसहारा और नहीं करेगी शिकायत तब तलाक  स्वीकार कर अलग। चाकू खरबूजे पर गिरे चाहे खरबूजा चाक़ू पर कटना खरबूजे को ही है। वोटबैंक के झांसे में हासिल आम नागरिक को कुछ नहीं होता है राजनीति अपना खेल खेलती है उसकी कोई संवेदना नहीं होती है।  खुदा खैर करे उन मुस्लिम महिलाओं को शायद कुछ राहत सच मिल जाये।

किसी की नज़र न लगे ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया

    किसी की नज़र न लगे ( खरी खरी ) डॉ लोक सेतिया 

पहले कुछ खूबसूरत तस्वीरों को देखते हैं। फिर समझने की कोशिश करते हैं इतनी अलग अलग अदाओं में फोटो सेशन करवाने में कितनी मेहनत कितना समय कितना पैसा लगा होगा। उस के बाद बही खाता बना कर हिसाब लगाने की नामुमकिन को मुमकिन करने की कोशिश की जाएगी। 











  शायद किसी और देश के सत्ताधारी राजनेता की पांच साल में इतनी तस्वीरें दिखाई दी होंगीं किसी को। हां हमने इक कलयुगी बाबा की ज़रूर देखीं हैं क्योंकि उसने अपनी खुद की फ़िल्में बनाई जिन में खुद ही अभिनय भी किया जाने क्या क्या नहीं किया। मगर इन जनाब का कहना है चौबीस घंटे देश की जनता की सेवा और भलाई करने का सब छोड़ छाड़कर। महिलाओं को सजने संवरने का शौक बहुत होता है और धनवान पति की आमदनी का काफी हिस्सा उनकी बनावट शृंगार मेकअप करवाने पार्लर के खर्च पर लगता है। रईस लोग ख़ुशी से पत्नी को सुंदर बनाये रखने दिखाई देने की कीमत चुकाते हैं। लेकिन भारत जैसा गरीब देश ऐसे महंगे खर्चीले शौक नहीं वहन कर सकता है। बात इतनी ही नहीं है फ़िल्मी अभिनेता नायिका को ये सब करना पड़ता है घंटों लगते हैं फिल्म की सफलता का सवाल होता है। देश की कितनी समस्याओं के बीच कैसे कोई सत्ताधारी नेता ये सब करने को समय निकाल सकता है। वास्तव में कोई कंप्यूटर हिसाब लगा सकता है ऐसे सैंकड़ों फोटो सेशन करवाने पर पांच साल में कितने महीने या शायद साल ही लगे हों। तब क्या गरीबों को लेकर केवल भाषण देने और मन की बात के नाम पर बहलाने का काम करते रहे। आधा समय तो आपका देश विदेश घूमने में ही लगता रहा। किसी भी एक व्यक्ति पर सरकारी खज़ाने से इतना बेतहाशा खर्च देश की गरीब जनता के साथ भद्दा मज़ाक नहीं तो क्या है। आपकी इतनी शानो शौकत की कीमत देश की जनता ने चुकाई है और बदले में मिला क्या है कोई नहीं जनता बस इक शोर जो हुआं हुआं जैसा लगता है।

Monday, 29 July 2019

आईना धुंधला और टूटा हुआ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     आईना धुंधला और टूटा हुआ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

  कुछ दिन पहले जो अख़बार टीवी चैनल सब बढ़िया है का गुणगान करते शोर मचाते थकते नहीं थे अचानक उनको देश की समाज की बदहाली का सच नज़र आने लगा है। जिन से कीमत पाकर झूठ को सच साबित करते रहे थे उनका मकसद हल होने के बाद शायद उन्हीं से पूछकर सच कहने का आडंबर करना शुरू किया है। अब ऊंची आवाज़ में सरकार की नाकामी की ही नहीं नेताओं के संगीन अपराधों में सरकारी विभाग पुलिस
का गुनहगार को बचाने से आगे उनके गुनाह पर पर्दा डालने साथ देने तक बेशर्मी की खबर बताने लगे हैं। जो राज्य से अपराध मिटाने की बात करते थे खुद उनके विधायक गंभीर अपराध करते हैं पुलिस एफआईआर नहीं दर्ज करती बल्कि जिस के साथ बलात्कार हुआ उसके परिवार के लोगों को बंद करती है मारपीट करती है और हद से बढ़कर जब ऊपरी अदालत जांच एजेंसी आदेश देते हैं गुनहगार को पकड़ते हैं पीड़ित को सुरक्षा देने का दायित्व मिलता है मगर फिर भी पीड़िता को सड़क दुर्घटना की शक्ल देकर घायल और चश्मदीद गवाह को मार दिया जाता है गलत दिशा से आते ट्रक द्वारा जिस का नंबर कालिख पोत कर छिपाया गया था ये सब हालात गवाही देते हैं शक पैदा करते हैं हादिसा नहीं हुआ करवाया गया है मगर जो सुरक्षाकर्मी साथ होने थे नहीं होते इतना सब पुलिस को सामन्य दिखाई देता है। टीवी वाले भी चुनाव से पहले इस तरह की खबर को सुर्ख़ियों में नहीं आने देते और राजनीती की बहस में उलझाने का अपना काम करते रहते।

    मीडिया बदला नहीं है पहले सरकारी बिकाऊ भौंपू बना हुआ था अब चेहरा बदल मुखौटा लगाया है सच की जनहित की बात करने का जबकि विवशता है अपने होने को अस्तित्व को बचाये रखना है तो दिखावे को ही सही आंखे बंद रख कर नहीं चलते रह सकते। सरकार से सवाल करने से पहले इन सभी से सवाल पूछना ज़रूरी है आप को पहले ये घना अंधेरा रौशनी क्यों लगता था अंधे नहीं थे अपनी आंखों पर स्वार्थ की पट्टी बांधी हुई थी। सत्ताधारी दल के तथाकथित साहसी नेता अपने दल के अपराधी को अभी भी दल से बाहर नहीं निकाल पाए हैं और उल्टा बेशर्मी से भगवाधारी साधु बनकर संसद का चुनाव जीतने वाले जेल जाकर उनका आभार व्यक्त करते हुए उनकी तारीफ करते हैं। मतलब साफ है सत्ता धारी दल के लोगों के गुनाह अपराध नहीं उनका अधिकार बन गए हैं।

     अब कोई शक की बात नहीं है कि जो भी दल सत्ता में होता है न्याय कानून और सुशासन की बात नहीं अन्याय करने लूटने अत्याचार करने को अपना हक मानता है। पुलिस जनता की सुरक्षा नहीं नागरिक को डराने दहशत फैलाने और दमन करने का काम करती है ठीक किसी आपराधिक गिरोह की तरह। जो दल आजकल सत्ता में है मनमानी करने में कोई लाज संकोच नहीं करता है। अपने नेताओं को समर्थकों को खुली छूट दे राखी है कानून हाथ में लेकर दंगे फसाद कत्ल करने की। अच्छे दिन यही होते हैं क्या उनसे सवाल कौन करे क्योंकि उनको जवाब देने की आदत नहीं है हर किसी को बुरा बताने से आप अच्छे साबित नहीं हो सकते हैं। देश की वास्तविक समस्याओं की बात कोई नहीं करता सरकार हर दिन कोई नया तमाशा करती है बहलाये रखने को। पुलिस न्यायपालिका अपना काम कम बातें अधिक करते हैं। आम नगरिक को मिले अधिकार वापस लेने और उन पर अंकुश लगाने को रोज़ नये तरीके नये बहाने खोजने को लगे रहते हैं। सरकारी इश्तिहार बताते हैं सब बढ़िया है मीडिया वास्तिक देश की समस्याओं से किनारा कर चुका है। खुद को सच के पैरोकार झंडा बरदार बताने वाले झूठ को सच बताने का काम करते हैं मगर खुद को संविधान का स्तंभ बताते नहीं थकते ये उपाधि उनको मिली नहीं उन्होंने खुद छीन कर हासिल की हुई है जबकि इसके काबिल वो नहीं बन सकते। उनको दौलत शोहरत ताकत चाहिए जो सच कहने से नहीं झूठ का साथ देने से हासिल होती है।

    ये दर्पण टूटा हुआ है और धुंधली तस्वीर दिखाई देती है खुद उनको अपना ही चेहरा नज़र नहीं आता है। इस आईने को फैंकने का समय आ गया है।

Sunday, 28 July 2019

मुहब्बत हक़ीक़त भी अफसाना भी ( इश्क़-इबादत ) डॉ लोक सेतिया

 मुहब्बत हक़ीक़त भी अफसाना भी ( इश्क़-इबादत ) डॉ लोक सेतिया 

 शोर बहुत सुनते रहे खुदा है मुहब्बत , मुहब्बत महबूबा से भी होती है वतन से भी इंसान को इंसान से प्यार सबसे बड़ा धर्म है। जो कहते थे जो सुनाई देता था दिखाई नहीं देता था यही उलझन थी। दीनो धर्म की कितनी किताबें पढ़ीं समझने को जो लिखा हुआ था अमल में सामने नज़र नहीं आता था। शायरी की किताबों को पहले भी पढ़ा तो था मगर समझने को वो नज़र वो दिल नहीं था उस वक़्त लगता है जो मायने ही कुछ और समझ आते थे। अरसे बाद पुरानी शायरी की किताब फिर से पढ़ी तो पता चला बात मुहब्बत की है मगर उस तरह की नहीं जो हमने समझा था। चलो पढ़ते हैं सुनते हैं समझते हैं आशिक़ी का मतलब इस तरह से अब। 



मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग , मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग

मैंने समझा था तू है दरख्शां है हयात , तेरा ग़म है ग़म ए  दहर का झगड़ा क्या है 
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात , तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है 
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगों हो जाए , यूं न था , मैंने फ़क़त चाहा था यूं हो जाए। 

अनगिनत सदियों के तरीक बहिमाना तलिस्म , रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुवे 
जा-ब - बजा बिकते हुए कूचा-ओ -बाज़ार में जिस्म , खाक़ में लिथड़े हुए खून में नहलाए हुए 
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे , अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे 

और भी दुख हैं ज़माने में मुहब्बत के सिवा , राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा 
मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग , मुझसे पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग। 

             इश्क़ मुहब्बत प्यार का दम भरने से पहले समझ तो लेते ये है क्या बला। बात केवल दो दिलों की नहीं है बात दुनिवायी मुहब्बत की ही नहीं है बात खुदा भगवान की इबादत की भी है और अपने देश अपने आवाम हर इक इंसान से प्यार की भी है। मुमकिन है जो सबक आपको धर्म की किताब पढ़ने से नहीं समझ आया शायरी की किताब पढ़ने से समझ आ जाये। जब समाज में हर तरफ नफरत की आग लगी ही कोई मुहब्बत का फूल खिल कैसे सकता है। फैज़ अहमद फैज़ की मुहब्बत वतन से है किसी हसीना से नहीं भला कोई अदब वाला देश समाज की बर्बादी को अनदेखा कर किसी हसीना की मुहब्बत में खो कैसे सकता है। साहिर लुधियानवी भी सवाल करते हैं जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहां हैं। आजकल तो फिल्म बनाने वाले सच्ची मुहब्बत को समझते हैं न ही देशभक्ति को केवल आडंबर करते हैं और पैसे कमाने को अपनी साहूलियत से इधर उधर से चीज़े उठा लेते हैं। शायद आपको खबर नहीं होती जो आपको परोसा गया है किसी की नकल है और मंच पर नायक नहीं हैं विदूषक हैं हर तरफ। राह दिखाने की नहीं राह से भटकाने की बात करते हैं। अम्न  से प्यार गरीबी से बैर वतन से इश्क़ , सभी ने ओड़ रखे हैं नकाब जितने हैं। इक शायर की ग़ज़ल का शेर है।
   
              फिल्म निर्देशक राज खोसला ने गीतकार मजरूह सुलतानपुरी को कहा उनकी फिल्म के लिए इक गीत लिखने को जिसका मुखड़ा , तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है हो। चिराग़ फिल्म की बात है मजरूह जी ने कहा ये फैज़ अहमद फैज़ की नज़्म के शब्द हैं उनकी इजाज़त लिए बिना इस्तेमाल नहीं कर सकता। तब पाकिस्तान में फैज़ को खत लिख कर उनकी अनुमति मिलने के बाद ही गीत लिखा और बहुत पसंद किया गया भी। आजकल फिल्म टीवी सीरियल के कहानी लिखने वाले जानते ही नहीं और प्यार की कहानी के नाम पर जाने क्या क्या परोसने का काम करते हैं। टीवी शो पर आशिक़ी को मज़ाक बनाकर हंसाने का नहीं बल्कि वास्तविक प्यार को उपहास बनाने का अपराध किया जाता है। समाज में नैतिकता के मूल्यों के पतन का एक बड़ा कारण यही मुंबई की फ़िल्मी बस्ती है जो रिश्तों का व्यौपार करती है अमीर होने को। समाज के लिए उनको अपना कोई कर्तव्य नहीं मालूम बस दावा करते हैं दिखावा करते हैं वास्तव में खुद भी भटके हुए समाज को भी भटकाना चाहते हैं। अदब के लोग शायर कलाकार कथाकार लोगों का दायित्व है सही मार्ग और सच्चाई को दिखाने का और अच्छे देश समाज की परिकल्पना की बात करने का। जैसे पुराने फ़िल्मकार शायर कथाकार किया करते थे। नया ज़माना आएगा , हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे। सुनते ही जोश भर आता है उम्मीद जागती है। अब निराशा के सिवा कुछ है मीडिया में तो फूहड़ भद्दा हास्य जो समझ आये तो हंसने की नहीं रोने की बात है।

         आजकल आपको कहीं न कोई सच्चा आशिक़ मिलेगा न ही देश पर न्यौछावर होने वाले वास्तविक
देश से प्यार करने वाले साहस पूर्वक देश समाज की लड़ाई अन्याय का डटकर विरोध करने वाले नज़र आते हैं। देशभक्त होने की बात करते हैं देश पर कुर्बान होने को सीमा पर सैनिक हैं हम अपने देश में रहकर क्यों देश समाज के खिलाफ आचरण करने वालों को मिटाने को सामने नहीं आते , असली पहचान यही है। बात प्यार की करें तो प्यार को जाना समझा नहीं है किसी को पाना हासिल करना प्यार नहीं है। खुद को किसी को सौंपना सच्ची मुहब्बत है इबादत की तरह। हम तो भगवान से भी सौदेबाज़ी करते हैं पूजा अर्चना भी कुछ मांगने को किसी स्वार्थ से करते हैं। खुद को समर्पित करना सीखा नहीं तो ऊपर वाले से नाता हो सकता है न किसी से इश्क़ ही।  ये कब क्यों हुआ कैसे हम प्यार मुहब्बत को छोड़ इक ऐसी ज़िंदगी जीने लगे जो लगता है चमक है रौशनी है मगर सच में है घना अंधेरा कोई। दिल में धड़कन है मगर एहसास नहीं है दर्द का अपने बेगाने सभी के दुःख दर्द को बराबर समझने वाला दिल नहीं है। जब दिल पत्थर का बन जाता है तो उस में कोई एहसास नहीं बचता ख़ुशी दर्द सब से बेखबर आदमी अपने आप में खोया नहीं जानता ये जीना जीना नहीं है। आधुनिकता ने मतलबी लोगों की चालों बातों में फंसकर हमने उन कहानियों को प्यार की दास्तान समझ लिया जो दरअसल प्यार को क़त्ल करने का काम कर रही थीं और ऐसी कहानी लिखने वाले उन पर फिल्म टीवी सीरियल बनाने वाले खुद मुहब्बत को इक सौदेबाज़ी से अधिक नहीं समझते थे। प्यार मुहब्बत का अर्थ ही बदलकर रख दिया उन्होंने अपनी मर्ज़ी या साहूलियत की खातिर। और हमने उनकी ज़िंदगी की आवारगी और मौज मस्ती की ऐशपरस्ती को मुहब्बत मानकर इश्क़ प्यार को इक इल्ज़ाम बना दिया है।

 बात शुरू की थी मुहब्बत की हक़ीक़त को समझने की शायरी की किताब से। शायर कवि जिस प्यार की बात करते रहे उस में आकर्षण और हासिल करने को कुछ भी हद से बढ़कर करने की बात कभी नहीं थी। कुछ भटके हुए लोगों ने हम सभी को जो राह बताई वो कुछ और है प्यार की मुहब्बत की राह हर्गिज़ नहीं। आशिक़ी किसी को बदनाम बेआबरू करने का काम कभी नहीं करती है जान देना जान लेना नहीं जाँनिसार करना किसी पर अपनी जान न्यौछावर करने का नाम है। प्यार किया नहीं जाता हो जाता है और तब जाति मज़हब नहीं दिखाई देता है। इश्क़ खुदा की इबादत की तरह है मीरा का भजन है राधा का नाता है हमने जाने कैसे मान लिया कि कोई रिश्ता कोई नाम बंधन का होना चाहिए प्यार करने वालों के लिए। आशिक़ी मुहब्बत प्यार से बढ़कर कोई भी रिश्ते का नाम नहीं हो सकता है। खुदा और उसकी इबादत करने वाले की तरह अनुबंध नहीं होता है कोई भी। आज समझ आता है पुराने लिखने वालों ने प्यार मुहब्बत इश्क़ पर क्यों ज़िंदगी भर इतना लिखा लिखते रहे क्योंकि इसकी ज़रूरत और सब से बढ़कर थी। इंसान को इंसान बनाये रखने को और कोई भी पढ़ाई कोई चीज़ काम नहीं आती है। हमने कितना कुछ पाया होगा बदलते परिवेश से मगर जो खो दिया है हमने समझा ही नहीं कितना ज़रूरी था। जैसे कोई फूल बिना सुगंध बिना कोमलता के कागज़ी या प्लास्टिक से बना या पत्थर का हो सजावट को , देखने में सुंदर मगर वास्तविकता में बेजान हो।

  आखिर में आपको इक गीत ऐसा जगमोहन जी का गाया हुआ सुनाता हूं जो मुझे लगता है सच्चे प्यार का सबसे पुराना गाना है जिसको सुनकर अनगिनत आशिक़ों ने मुहब्बत की है।


 



दिल को है तुमसे प्यार क्यों ये न बता सकूंगा मैं , ये न बता सकूंगा मैं। 

पहले मिलन की छांव में तुमसे तुम्हारे गांव में , आंखें हुई थी चार क्यों। ये   . .........     
रूप की कुछ कमी नहीं दुनिया में इक तुम्हीं नहीं , पर मैं तुम्हारी याद में रहता हूं बेकरार क्यों। ये ....
तुमको नज़र में रख लिया दिल में जिगर में रख लिया , खुद मैं हुआ शिकार क्यों ये न बता सकूंगा मैं। 
दिल को है तुमसे प्यार क्यों ये   ...... .......  




Friday, 26 July 2019

गणित और बही-खाते का फर्क ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  गणित और बही-खाते का फर्क ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   गणित किताबी बात है मेरा दोस्त दसवीं के गोस्वामी जी ने मुझे कहा था हम हैरान होते थे तुम सौ में से सौ अंक कैसे हासिल कर लेते थे हम तो मुश्किल से पास होकर खुश हो जाते थे। सबूत मेरी दसवीं की नंबर वाली सूचि है पास होने पर मिले सर्टिफिकेट पर अंकित। मगर हिसाब किताब कारोबार या दुनिया और रिश्तों का मुझे ज़रा भी नहीं समझ आया। आजकल सरकार भी बजट को बही-खाता बताती है तो मुझे भी लगा जितना याद है थोड़ा लिख कर रखा जाना चाहिए। कभी काम नहीं आएगा मगर दिल बहलाने को ख्याल अच्छा है जन्नत की तरह। तारीख की बात छोड़ देते हैं ज़रा कठिन है हिसाब ज़िंदगी भर का जो है। 

बहुत लोग होते हैं जो बच्चों की पढ़ाई लिखाई पालन पोषण पर किया खर्च याद रखने को लिख भी लिया करते हैं। शादी के समय पिता बेटे की कीमत ब्याज सहित चाहता है कन्या पक्ष से। उस ज़माने में बेटी को पढ़ाने पर खर्च नहीं करते थे दहेज जमा करते थे अब बेटियों को पढ़ाने लिखाने और कमाने लगती हैं तब भी बेटे के परिवार की बात आदर की ज़रूरी है दहेज नहीं आजकल शान रखने की बात की जाती है। आपकी शान आपके दम पर हो या बहु के घरवालों के सर पर बोझ की तरह नहीं समझते लोग। खैर बचपन में भाई भाई होते थे चाचा मामा बुआजी के बेटे भी भाई बनकर रहते थे। मेरे पास सभी आते और उनकी महमान नवाज़ी खिलाने पिलाने से मौज मस्ती तक जेब खाली होने पर दोस्त से उधार लेकर भी खूब खर्च करता था आदत खानदानी थी पास नहीं हो तो क़र्ज़ लेकर भी महमान की खातिर करनी ज़रूरी है। कभी किसी ने जाकर घर नहीं बताया मैंने उनको क्या क्या दिया कितनी बार घर वापस जाने की किराया भी मुझसे लेते थे। मगर एक बार गलती हुई जो इक भाई से दो सौ रूपये मांग लिए थे और फिर घर से सालों तक ताने सुनता रहा शर्म नहीं आई ऐसे लेते हुए। ये मापदंड मुझे समझ नहीं आये आज तलक भी खैर। 

पढ़ाई के बाद काम करने लगा तो थोड़ी सी आमदनी से भी दोस्तों पर खूब खर्च किया। कभी गिनती की बात नहीं थी मिलते आते जाते बेहिसाब खर्च किया जाता रहा। सच्ची बात है शर्म की बात नहीं है अच्छे अमीर परिवार से था मगर अपनी आमदनी गरीबी जैसी होने पर भी खुद को गरीब समझता नहीं था। नाते रिश्ते निभाता सबको आने पर अच्छी तरह से आवभगत करता था। शादी से पहले कमाई जितनी भी थी थोड़ी भी बहुत लगती थी उसी से खुश रहता था। जेब खाली भी होती तब भी दिल खाली नहीं रहता था क़र्ज़ की पीते थे मय और समझते थे यही रंग लाएगी अपनी फ़ाक़ामस्ती एक दिन , शेर ग़ालिब का है। मैं शराबी नहीं हूं और अपने शौक की खातिर क़र्ज़ नहीं लिया जीवन भर। लगता है कोई पिछले जन्म का क़र्ज़ है सभी का मुझ पर बकाया चुकाने को। अब लगता है शायद ब्याजदर बहुत ज़्यादा है सूद भी नहीं चुकता हुआ असल वहीं का वहीं खड़ा है कोई सरकार भी इस की माफ़ी की योजना नहीं बना सकती है। 

रिश्ते होते ही उधार की तरह हैं किश्तों को समय पर चुकाना लाज़मी है अन्यथा बदनामी होती है। इक चचेरी बहन बोली थी भाभी को लेन देन की समझ नहीं अब उसको भाई की कमाई थोड़ी है तब भी दोष भाभी पर मढ़ दिया था। मगर पत्नी होने का इतना तो खमियाज़ा भरना होता है आमदनी कम होने पर अगर अधिक होती तो शान भी दिखाती ही। लेकिन हम नासमझ नहीं समझे जैसे भी हो कमाई का ढंग  बनाना चाहिए , ज़िंदगी ईमानदारी शराफत और उसूलों पर चलकर नहीं कटती है। शादी से पहले गरीबी का एहसास कभी नहीं हुआ मगर उसके बाद जैसे बीवी का क़र्ज़ बढ़ता ही गया ज़िंदगी भर उनकी मेहरबानियों का हिसाब नहीं चुकाया जा सका मुझसे। शायद दार्शनिक लोग इस विषय पर लिखना समझाना भूल गए कि आपके पास कितनी दौलत कितनी आमदनी होनी लाज़मी है शादी तब करनी उचित है। मुश्किल यही है बाकी दुनिया वाले दोस्त रिश्तेदार आपको कर्ज़दार होने का एहसास कभी कभी करवाते हैं अवसर मिलने पर मगर पत्नी आपको चौबीस घंटे याद दिलवाती है उसी से घर चलता है नहीं तो ऐसे कंगाल का जाने क्या होता। कोई दोस्त भी सलाह नहीं देता शादी करने के खतरे कितने हैं बच सको तो बचना ऊपर से विवाह करने को कहते हैं नाचने खाने पीने को मौका मिलने का लालच इतना अधिक है। 

सच्ची बात है कोई किसी का नहीं दुनिया में सब पैसे के नाते रिश्ते दोस्ती भाईचारा निभाते हैं। हर किसी के हिसाब में औरों से लेनदारी ही लेनदारी का पन्ना है देना है जिसका ये उसका काम है अपने हिसाब में लिखता रहे। मुझे इक चायवाले खोखे वाले की पुरानी बात याद आई है , बाज़ार में सभी को दुकानदारों को मुहल्ले वालों को चाय पिलाता था। सबका खाता बना रखा था मगर जब कोई काफी दिन उधारी चुकाने नहीं आता तो अजीब आदत थी हंसी ठिठौली करते हुए छोटू जो चाय देने जाता था उसका नाम लेकर बोलता था , अमुक व्यक्ति नज़र नहीं आया क्या उसके खाते पर मर गया लिख दूं और जो भी सुनता कह उठता चाचा मेरी उधारी जमा कर लो कभी मर गया मत लिख देना। लोग खुद को मर गया घोषिष करने से तब डरते थे अब तो विदेश भागने की परंपरा चल पड़ी है। मगर कोई कुछ भी करता रहे लोग किसी के मरने के बाद भी उसका खाता बंद नहीं करते हैं उसके वारिसों से वसूली जारी रहती है। भारत देश पर हर नागरिक पर विदेशी क़र्ज़ चढ़ा हुआ है बढ़ता जाता है क़र्ज़ चुकाना हम ने हमारी आगे आने वाली संतानों ने है और वसूल करने को नेता लोग हैं सरकारी अमला है जिसको जाने कितने जन्मों का क़र्ज़ हमसे लेना बाकी है। आपको गणित आता होगा मगर सरकार की तरह बही-खाता बनाना नहीं आता जिस में खर्च करने की बात है आमदनी होने की ज़रूरत नहीं है। क़र्ज़ लेकर घी पीने की मिसाल अभी भी कायम है।

Thursday, 25 July 2019

सवालों में उलझे हुए लोग ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया

   सवालों में उलझे हुए लोग ( अजब मंज़र ) डॉ लोक सेतिया 

 हमने कथाओं कहानियों में पढ़ा था कोई किसी से जाकर कहता है मैंने कहीं ऐसा अजब मंज़र देखा जिसको देख मन विचलित है क्योंकि उसका मतलब नहीं समझ आता मुझे। और उस अनहोनी असंभव लगती बात का अर्थ कोई समझाता है। आज ऐसे सवाल बहुत हैं हमारे सामने मगर शायद कोई जवाब देने वाला ही दिखाई नहीं देता है और हम भी विचलित नहीं होते चाहे कुछ भी सामने घटता रहे हम अपनी आंखें बंद कर सोचते हैं दृश्य गायब हो गया है। कायरता ने हमें सच देखने सुनने से बचने का आसान रास्ता दिखाया है हम सोचते हैं समाज में किसी से क्या होता है हमें क्या चिंता की ज़रूरत है। आजकल की घटनाओं को समझने को देखते हैं देश में समाज में क्या क्या घट रहा है कोई बता सकता है ये समाज की कैसी तस्वीर सामने आ रही है और इस का आने वाला कल भविष्य कैसा हो सकता है। चलो कुछ समाचारों घटनाओं को ध्यान से समझते हैं। 

सरकार संवैधानिक संस्थाओं को बदलने का हर संभव जतन कर रही है जिन नियम कानून से मनमानी पर अंकुश लगता है हटाया जा रहा है। हर जगह चाटुकार लोग बैठाए जा रहे हैं देश के संविधान की अनुपालना करवाने को बनी हुई संस्थाओं के पदों पर। संसद विधानसभा को इक अखाड़ा बना दिया गया है और चर्चा नहीं विचार विमर्श नहीं दांव पेच इस्तेमाल कर जीत हासिल करने पर ध्यान है। उचित अनुचित की कोई व्याख्या नहीं है जिसकी लाठी उसकी भैंस की मिसाल है। लोकलाज की परवाह नहीं है अपनी गलती को गलती नहीं मानते हैं इल्ज़ाम किसी और पर धरते हैं। दलबदल का मौसम है जो पापी अपराधी सत्ता की चौखट पर चला आता है माथा टेकता है उसके गुनाह माफ़ हो जाते हैं। कानून की तलवार चलती है विपक्षी नेताओं को ठिकाने लगाने को उनकी कीमत घटाने को गड़े मुर्दे उखाड़ मुकदमे दर्ज किये जाते हैं मोल भाव तय होने के बाद फिर दफ़्ना देते हैं उन सभी आपराधिक आरोपों को किसी फाइल में। ईमानदारी का शोर बहुत है इश्तिहार भी मगर कोई अदालत से भगोड़ा आपराधिक मुकदमे का दोष लिए आरोपी किसी संस्था पर नियुक्त कर देते हैं। 

सत्ता पक्ष विपक्ष दोनों के नेता नफरत की आग भाषण में लगाते हैं भाषा की मर्यादा को ताक पर रखकर। नैतिकता की कहीं कोई बात नहीं है। धर्म के नाम पर दंगे करवाने की बात की जाती है। उधर भवन बनाये जाते हैं ऊंचे ऊंचे मचानों की तरह ऊपर चढ़कर नज़ारा देखने को , जिस मकसद से विभाग बनाया हुआ न्याय और निष्पक्षता से सबको समान न्याय देने को उस की हालत जर्जर गिरती इमारत की तरह है। बीस साल बाद कोई अदालत किसी को निर्दोष घोषित करती है , अपराध साबित नहीं हुआ या झूठा दोष लगाया गया था दोनों ही तरह से अन्याय हुआ है। अदालत को इतना समय लगता है ज़िंदगी खत्म हो जाती है फिर भी हम न्याय की उम्मीद की बात करते हैं क्योंकि न्याय मिलता है ख़ास लोगों को तुरंत ही मरते हैं सामान्य नागरिक छोटे छोटे अपराध के आरोप में जेलों में कोई नहीं देखता है। सरकार को वोटों की खातिर बड़े बड़े अपराधी साधु संत लगते हैं उनकी हर बात को अनदेखा किया जाता है संरक्षण दिया जाता है। धर्म सबसे बड़ा अड्डा बन गया है जहां पर हर गुनाह खुलेआम किया जाता है। हम धर्म की अफीम के नशे में सच झूठ पाप पुण्य का अंतर नहीं समझते और अपराधी को गुरु मान उसकी जय-जयकार करते हैं अधर्म को धर्म बताते हैं। 

जिनको सच बताना था टीवी अख़बार वाले चुनाव तक सत्ता का गुणगान करते रहे और मुंह बंद रखा लालच की खातिर। अब चुनाव के बाद दिखावे को जनता की जनहित की बात करने लगे हैं अपने पर लगे बिक चुके लोगों का समूह का दाग़ मिटाने की कोशिश भर है। कर्तव्य ईमानदारी से नहीं निभाते चाहते हैं निष्पक्षता का दिखावा कर छवि को सुधार सकें मगर इतने बदनाम हैं अब कोई चाहकर भरोसा नहीं कर सकता है। पैसे और स्वार्थ ने अंधा बना दिया है खबर नहीं अनावश्यक बहस दिन भर उलझाने को करते हैं। किसी सवाल का जवाब नहीं खोजते सवाल को सवाल से भिड़ाने का मज़ा लेते हैं। जुर्म अपराध दुर्घटना उनके लिए बेचने का सामान है। अपनी सूरत को पहचानते ही नहीं हैं कोई उनको आईना कैसे दिखाए जिनका कारोबार है आईने बेचने का हर शहर हर गांव गली गली। 

हम आधुनिक जानकर स्मार्ट फोन पर मनोरंजन के नाम पर समय बिताने को बेकार संदेश भेजते हैं उनकी सच्चाई को जाने समझे बिना ही। विचलित करने वाली बात को किनारे खड़े तमाशा देखने वाले आदमी की तरह समंदर के उठते तूफान किसी जलती हुई बस्ती की आग को रौशनी बताते हैं मगर जानते हैं। झूठ सच को मिला कर हमने जाने क्या बना दिया है। अपने छोटे छोटे मासूम बच्चों को स्मार्ट फोन से खेलने देकर उनको ऐसी अंधी गली में जाने देते हैं जिसका दूसरा छोर बंद है वापस निकलने को राह नहीं वापस मुड़ने की जगह नहीं है। पढ़ना भाता नहीं किसी गंभीर विषय पर चर्चा करना लगता है नाहक की परेशानी है। सामाजिक संबंधों को हमने अपने मतलब को बदलने और तबाह करने को कोई कसर नहीं बाकी छोड़ी है। अब हम स्वस्थ संवाद नहीं करते हैं या किसी की हां में हां मिलाते हैं या किसी की चाटुकारिता से खुश होते हैं झूठा गुणगान सुन कर। वैचारिक मतभेद को हम विरोध मानते हैं और अपनी जगह दोनों की बात सही और अलग भी हो सकती है इस को समझना छोड़ दिया है। हम जैसे बातचीत करने नहीं लड़ने भिड़ने को तैयार रहते हैं जो वास्तव में हमारी कमज़ोरी है ताकत नहीं है। निष्कर्ष नहीं निकालते सच को नहीं परखते बस उलझन को उलझाने को लगे रहते हैं। 

चांद की बात करते हैं दौड़ने की बात होती है मगर सरकार खुद दंगे फसाद अपराध होने तक सोई रहती है। कोई विधायक सत्ता का भागीदार सहयोगी दल का छह महीने पहले लिखित जानकारी देता है कि उस जगह अन्याय अत्याचार होता है सरकारी अधिकारी भू माफिया से मिलकर शोषण करते हैं गरीबों को डराते हैं धमकाते हैं मगर राज्य का मुख्यमंत्री कोई कारवाई नहीं करता है और कुछ लोग अपनी सेना बनाकर खुले आम हथियार लहराते हुए लोगों को कत्ल कर लाशें बिछा देते हैं तब सरकार ब्यान देने और न्याय कानून की बात कहने लगती है मगर अपने दोष को पिछली सरकारों पर डालना चाहती है। इंसानियत की आदमी की जान की कोई कदर नहीं उसकी कीमत लगाई जाती है हर मरने वाले को चंद रूपये मुवावज़ा देते हैं उसके परिवार को ये न्याय नहीं है किसी लाश को कफ़न से ढकने की बात है। लेकिन हम को किसी बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कल की घटना भूल जाती है आज अभी की नई घटना पर वीडियो देख रहे हैं। भावनाशून्य समाज बनता जा रहा है हम सहानुभूति जताते हैं संवेदना व्यक्त करते हैं दिखावे की दो आंसू बहाते हैं पल भर बाद फिर कोई चुटकुला सुनते सुनाते हैं। 

                                 ( जारी है चर्चा अगली पोस्ट पर )

Wednesday, 24 July 2019

भगवान से कितनी बड़ी भूल हुई ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान से कितनी बड़ी भूल हुई ( विमर्श ) डॉ लोक सेतिया 

 कोई है जिसने दुनिया बनाई होगी , सभी मानते हैं मगर यकीन नहीं करते या सोचते हैं अभी तो सामने नहीं है अगर किसी दिन होगा आमना-सामना तो मना लेंगे। अभी तो मौज उड़ा लें दिल की दिमाग की अपने मतलब की मनमानी की बातें कर लें। पर ऊपर बैठा पछताता होगा ऊपर वाला अपनी सबसे बड़ी भूल इंसान बनाने की करने को लेकर। इंसान बनाया था मगर इंसान क्या बन गया है कैसे बन गया इंसान में इंसानियत का नाम नहीं है। चलो आज भगवान की नहीं खुद इंसान से इंसान की कथा कहानी नहीं हक़ीक़त जानते हैं। 

मैं किसी और की नहीं खुद अपनी ही बात करने चला हूं। क्या मैं इंसान कहलाने के काबिल रह गया हूं। लगता तो नहीं मुझ में आदमी इंसान होने की कोई निशानी बची हुई होगी। शायद इस पल कुछ लम्हें को थोड़ी सोई हुई शराफत जागी है जो आज सच कहने का साहस जुटा पाया हूं। खुदा की इबादत वतन की अपनी धरती की मुल्क की मुहब्बत जो भी कारोबार व्यौपार करता हूं उसकी इज्ज़त हर रिश्ते की कीमत को मैंने अपने स्वार्थ की खातिर तहस नहस कर डाला है। उसकी ऊपर वाले की इबादत को भी आडंबर दिखावा बना दिया है उसके नाम पर हैवानियत तक करने लगे हैं। सियासत को ऐसी मंडी बना डाला हैं जहां देशभक्ति देश के प्यार का लेबल लगाकर अपने ज़मीर को बेचते हैं शैतान भी जो करने से बचेगा राजनीति उस से भी बढ़कर नीचे गिर कर सब करती है। विवेक बचा नहीं है ऊंचे सिंहासन पर बैठ कर खुद को कितना बौना बना डाला है। 

शिक्षा को लोगों को स्वास्थ्य सेवा देने को हमने लूट और धन दौलत कमाने का साधन बना लिया है। गुरु होना धरती पर भगवान का दूसरा रूप होना अपनी पहचान छोड़ इंसान भी नहीं रह गए हैं। मुहब्बत इश्क़ प्यार जो जीवन का आधार था एक दूसरे की खातिर सब छोड़ने का चलन था खुद उसको ही हमने विश्वास के लायक नहीं रहने दिया है। जिसे प्यार करने का दम भरते हैं उसी को छलने लगे हैं। जब इंसान इंसान का दुश्मन बन गया है तब दुनिया रहने के काबिल रही नहीं है जीने के लिए तो कोई जगह ही नहीं छोड़ी है। आदमी आदमी को क्या भगवान तक को धोखा देने की बात करता है अपने जन्मदाता को शर्मसार करते हैं। भगवान को खुद समझ नहीं आ रहा इतनी बड़ी भूल क्योंकर की थी। आदमी दुनिया की सर्वोतम रचना सोचकर बनाया था आज सबसे ख़तरनाक़ जीव बन गया है। भगवान भी इंसान से घबराने लगे हैं जाने किस दिन उसको भी बदलने में सफल नहीं हो जाएं और दुनिया पर शैतान का शासन चलने लगे। अभी भी इस में कोई कमी तो नहीं रही है , हर जगह नाम भगवान का है नज़र तो शैतान ही आता है।

Monday, 22 July 2019

क्या पूछते हो कौन हूं क्या हूं मैं ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया

 क्या पूछते हो कौन हूं क्या हूं मैं ( हाल-ए-दिल ) डॉ लोक सेतिया 

  आज सोचा खुलकर साफ़ साफ़ बात की जाये , बस बहुत हुआ ज़िंदगी गुज़ार दी सोचते सोचते कैसा होना था क्यों नहीं उस तरह का जैसा सब लोग चाहते हैं। ग़ालिब की ग़ज़ल याद आती है , हरेक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है , तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़े गुफ़्तगू क्या है। ये जो हर दिन मुझसे सवाल करते हैं मैं कौन हूं क्या हूं कैसा हूं बताएं तो सही ये क्या तौर तरीका ढंग तहज़ीब है। मुझे रहने दो मुझ जैसा अपने जैसा क्यों बनाना चाहते हो , तुम क्या मुझ जैसे बन सकते हो कभी नहीं। मैंने नहीं चाहा किसी को बदलना फिर मुझी को हर कोई क्यों बदलने की सलाह सुझाव निर्देश आदेश देता है। समझ नहीं आता औरों को क्या परेशानी है मेरे मुझसा होने से बस यही जो उनको पसंद है मैं उस तरह का नहीं हूं। कोई है जो दुनिया को जैसा पसंद है ठीक उसी तरह का हो , खुद आप भी कब किसी और की पसंद के अनुसार बन सकते हो। 

मुझे समझ नहीं आता क्या जिस तरह ख़ुशी को दिखाने को लोग बंदर की तरह नाचते उछलते हैं ज़ोर ज़ोर से ठहाके लगाकर हंसते हैं झूमते गाते नज़र आते हैं क्या वास्तव में उनको अपने भीतर ख़ुशी अनुभव होती है। और अगर होती है तो पल दो पल बाद उनके चेहरे उदास मुरझाए क्यों लगते हैं। सबको औरों की कमियां दिखाई देती हैं ढूंढते रहते हैं हर किसी में कमी क्या है , किसी दिन तलाश करते सब में कुछ अच्छाई की तो हर कोई अच्छा लगता। कोई भी किसी को अच्छा नहीं लगता है। कभी कोई आशिक़ किसी महबूबा को चांद सितारे तोड़ कर ला देने का झूठा ख्वाब दिखलाने की जगह वादा करता तुम जैसी हो तुम्हें बदलना नहीं उसी तरह पसंद करता हूं करता रहना है करूंगा ये कसम खाता हूं। बस फिर कुछ भी और उसको नहीं चाहिए होता। महिलाओं को झूठे सपने चांदी सोने के गहने और महंगे उपहार पैसे और सामान से खुश करने की कोशिश करने वाले उसकी ख़ुशी किस बात में है ज़रा सोचते तो जानते। गुलामी की ज़ंजीर भाती नहीं दिल से इक कसक रहती है काश अपनी मर्ज़ी से जीने की इजाज़त होती लेकिन कोई किसी को इजाज़त देता नहीं है। अपने जीने का अधिकार अपनी आज़ादी हासिल करनी होती है भीख मांगने की तरह खैरात में नहीं मिलती है। 

आप ऐसे क्यों बोलते हैं खाते हैं पहनते हैं हर छोटी से छोटी बात पर नज़र रहती है। नहीं ये अपनापन नहीं प्यार मुहब्बत हर्गिज़ नहीं है ये बंधन है अनचाहा मर्ज़ी का नहीं। कोई भी पिंजरे में कैद नहीं रहना चाहता और लोग आपको आकाश में उड़ने की अनुमति कभी नहीं देंगे उनको रिश्तों की रस्सी नहीं जंज़ीर से जकड़े रखना है आपको। क्या इस तरह खोने का कोई डर है या फिर हमने गुलामी को कोई भला सा नाम दे दिया है। शायद मेरी तरह आप भी बचपन से बुढ़ापे की दहलीज़ तक इसी उलझन में खुद की नहीं औरों की मर्ज़ी से जी जी कर जीने का अभिनय करते रहे जिए नहीं जीने की तरह पल भर भी। किसी दिन इसी तरह जैसे मैं ऐलान कर रहा हूं आपको भी करना पड़ेगा बस बहुत हुआ अब और नहीं मुझे रहने को जैसा भी हूं मैं। अच्छा हूं बुरा हूं जो भी हूं जैसा भी आपको कोई दर्द कोई तकलीफ कोई परेशानी नहीं देता तो क्या कारण है जो मुझे हर दिन अनचाहा होने का एहसास करवाते हैं। काश कभी हर कोई खुद अपने आप को लेकर विचार करता सोचता समझता खुद जैसा है क्यों है किसी दूसरे को कुछ कहने की बात फिर ज़ुबान पर आती ही नहीं।

Sunday, 21 July 2019

रंगीन से बेरंग फिर बदरंग ( यहां-वहां-कहां-कहां ) डॉ लोक सेतिया

  रंगीन से बेरंग फिर बदरंग ( यहां-वहां-कहां-कहां ) डॉ लोक सेतिया  

     उनको नाम शोहरत और पहचान की ज़रूरत है। राजनीति उनको रास्ता लगती है दल कोई भी हो उनको अपने मतलब से मतलब है। जब जब जिस समस्या की खबर की गूंज होती है उसको लेकर शोर मचाने लगते हैं तो लगता है उनसे बढ़कर किसी को चिंता नहीं। बाल मज़दूरी बंधुआ मज़दूरी महिलाओं के साथ होने वाले अपराध सरकारी विभाग में वेतन की कमी से शोषण तक कभी पानी की समस्या कभी पेड़ पौधों की हवा की कभी गंदगी की बात। चार दिन चर्चा और मोर्चा रैली निकालने की औपचारिकता निभाते हैं। उस के बाद ख़ामोशी छा जाती है। समझ नहीं आता किस तरह से राजनीति में हाशिये से फिर से धुरी पर आ सकते हैं। तीर निशाने पर लगते नहीं चूक जाते हैं , कभी कभी होता है राजनीति नहीं करने की कसम खाने वाले सत्ता पाने को गिरगिट से बढ़कर रंग बदलते हैं। ये सत्ता का लहू मुंह को लगने के बाद इक नशा चढ़ता है जो जीते जी उतरता नहीं कभी। नशा कोई भी हो खराब होता है इस को लेकर भी राजनीति की जा सकती है नेता अधिकारी सब भाषण देते हैं घर जाकर थककर दो घूंट लेने में हर्ज़ नहीं है। नशाबंदी करने वालों को मिलकर जाम छलकाने में संकोच नहीं होता है। बड़ी मुश्किल है गरीबी भूख शिक्षा को लेकर सामाजिक संस्थाएं धरातल पर काम नहीं करते केवल सरकार को कठोर कदम उठाने को लिखने का काम करते हैं। सरकार है जो सड़क पर चलने का कीर्तिमान बनाती है आरटीआई से जानकारी मिलती है सभी बड़े नेता दिन में 14 घंटे सरकारी वाहन पर सफर करते रहे करीब सात सौ किलोमीटर रोज़ाना सैर की। जाने कब काम किया कब आराम किया और खाना पीना कैसे हुआ होगा। मामला समझ से बाहर का है। 

        ऊपर मिल बैठ देश की आज़ादी की जंग में शहीद हुए सभी महान आत्मा लोग ये बात समझ नहीं पा रहे उनको कैसे कोई अपनी जाति बिरादरी धर्म से जोड़कर अपनी अपनी राजनीति कर सकते हैं। जिस महान शहीद की याद की बात है उस की जाति के लोग बैनर उठाए नारे लगाते हैं मगर उन पर शहीद का नाम लिखा दिखाई नहीं देता। अमुक वर्ग का समाज आपका स्वागत करता है हर किसी को अपने नाम बिरादरी का नाम लिखवाना याद रहा। कोई जाकर उनसे पूछे जिनकी बात है क्या जानते हैं उनको लेकर , यकीन करें उनको बस यही मालूम है अपनी जाति बिरादरी के थे बाकी कुछ भी नहीं। शहीद क्या उनके आगे बढ़ने की सीढ़ी हैं ये सोचकर उन शहीदों को हैरानी हो रही है। बात एकता अखंडता की की जानी चाहिए थी मगर हर कोई बांटने की हिस्सा मांगने की करता है। देश समाज को क्या अपनी जाति बिरादरी को भी देना कुछ नहीं उसके नाम की राजनीति कर ऊपर जाना चाहते हैं। आये दिन किसी वर्ग जाति धर्म की सभा आयोजित की जाती है। किसी को संकुचित विचारधारा पर ऐतराज़ नहीं है हर कोई अपने दायरे में कोल्हू का बैल बनकर इक गोल दायरे में घूमता रहता है। शहीदों की शहादत का आदर उनकी राह चलकर किया जा सकता है मगर ये कठिन राह कौन जाना चाहता है। गर्व गौरव करना अच्छा है मगर कुछ सबक भी सीखते तो बेहतर होता। 

     गुलाब गुलाबी नहीं सफ़ेद काला पीला लाल कितने रंग का उगाने लगे हैं। हरी मिर्च लाल होते होते अपना स्वाद खोती गई और फायदे की जगह नुकसान करने लगी। फल सब्ज़ी सब को किसने वास्तविक रंग स्वाद को छोड़ कुछ और बना दिया है। कुदरत की बनाई चीज़ को जैसी है रहने नहीं दिया और इस खेल में खिलवाड़ अपने स्वस्थ्य से होने लगा है। आदमी को कुदरत ने जैसा बनाया क्या ठीक नहीं था जो हर कोई चाहता है रंग काला नहीं गोरा हो सांवला नहीं चमकता हुआ हो नकली मेकअप के पीछे असली चेहरा छुप जाए। मिट्टी को गर्म किया ईंट बनाकर और पत्थर को पीस कर फिर से पत्थर बनाने का काम किया तो पता नहीं चला कि आदमी खुद भी खुशबू कोमलता खोकर कठोर बनता गया। इंसान को इंसान का दर्द नहीं महसूस होता बस खुद अपने दर्द का पता चलता है। कितना ज्ञान हासिल किया मगर ज्ञान की परिभाषा भी नहीं याद रही जितना पढ़ा लिखा भूल गया और याद रहे स्वार्थ मतलबपरस्ती दो शब्द जिनको भुलाना था पहले। मैं का अहंकार सबसे बुरी बात है तुम कौन हर कोई कहता है , नासमझी को समझदारी कहने लगे हैं लोग। माना दुनिया रंगीन है रंगबिरंगी दुनिया है मगर आदमी ने रंगीन को बेरंग किया और फिर बदरंग किया है। ये खुद किया है हमने और अब परेशान हैं ये खूबसूरत दुनिया हुआ करती थी इतनी खराब कैसे बन गई जो देखते हुए भी घबराते हैं। आईने में अपनी शक्ल नहीं पहचानते हैं ये लोग जो औरों को दिखाने का काम करते हैं समाज की तस्वीर क्या है। साहित्य की बात करने वालों को सामाजिक विषयों से सरोकार से अधिक चिंता अपने को स्थापित करवाने की होती है। सच की बात कहने वाले कितने हैं और कितने हैं जिनको साहित्य की साधना करनी है। बाकी लोगों की तरह लिखने वालों ने भी झूठ से दोस्ती कर ली है और उन राहों से समझौता कर लिया है जो उधर जाती हैं जिधर हर कोई इक अंधी दौड़ में भाग रहा है पैसे और नाम ताकत और शोहरत की खातिर।

Thursday, 18 July 2019

ज़मीर बिकने लगे मंडी में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     ज़मीर बिकने लगे मंडी में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     दलबदल का मौसम क्या जैसे कोई तूफ़ान है सबको उड़ाए ले जा रहा है। तिनकों की जैसी हैसियत हो गई है। सस्ते दाम बिकते बिकते थोक के भाव बिकने लगे हैं। हद तो अब हुई है जब कोई दल जगह जगह माल खरीदने को मेला लगाने का इश्तिहार देने लगा है। टके सेर भाजी टके सेर खाजा अंधेर नगरी चौपट राजा की कहानी का नया अध्याय है। विचार होते तो बदलने की बात होती जब कोई सोच विचार है ही नहीं और मकसद भीड़ जमा करने का है तो आदमी भेड़ बकरी बनने को राज़ी है हरियाली दिखाई देनी चाहिए। मगर चालाक गाड़ी वाला गधे के सामने कुछ इस तरह से चारा हवा में लटका देता है जिसको देख गधा भागता है और चारा उस से आगे आगे चलता रहता है। जो लोग विधायक सांसद बनकर खुद किसी के बंधक बनने को तैयार हैं उनसे देश की आज़ादी की बात करना फज़ूल है। गुलामों की मंडी फिर लगने लगी है खरीदार एक है बिकने को तैयार अनेक हैं ऐसे में कीमत मत पूछना। गुलाम दो वक़्त रोटी मिलने की उम्मीद पर खुद को बेचना चाहते हैं ज़मीर इतना सस्ता हो गया है कि लोक-लाज शर्मो-हया छोड़ नुमाईश में चले आये हैं। कानून किसी की बांदी है रखैल की तरह नाच रही है तमाशा देखने वालों को मज़ा आ रहा है। अपने कैसे कैसे लोगों को सर पर बिठा रखा है जो अपनी आज़ादी अपने आदर की नहीं सोचते आपकी आज़ादी और अधिकार की क्या चिंता करेंगे वो। गली गली बाजार सजा रहे हैं अमुक नेता इतने समर्थकों के साथ उधर से इधर आ रहे हैं। इस तरह भी अपनी कीमत बढ़ा रहे हैं एक के साथ दस मुफ्त खोटा सिक्का चला रहे हैं। आप भी देश को महान घोषित करने वाला गीत गुनगुना रहे हैं सत्यमेव जयते लिखा है जिस जगह झूठ का गुणगान गा रहे हैं। ये कैसी गंगा बहा रहे हैं हम्माम में सभी नंगे नहा रहे हैं। ऊपर जाना है गिरते जा रहे हैं दाग़दार को बेदाग़ बतला रहे हैं कोई नया डिटरजैंट बाजार में ला रहे हैं अपने रंग में रंगकर सबको स्वच्छ बना रहे हैं।

        मुल्तानी की इक गाथा है कोई खूबसूरत औरत बेवा हो जाती है तो कितने कुंवारे जिनकी शादी नहीं हो रही थी आस लगाए रहते हैं। मगर ऐसी महिला कटी पतंग की तरह होती है लुटते हैं और कई लूटने वालों के हाथ डोर हो तो मिलती नहीं किसी को बर्बाद हो जाती है। कभी कभी किसी बदनसीब का नसीब खुलता है अन्यथा मझधार में डोलती नाव की सी हालत रहती है। ज़माना बदला हुआ है समझने को ढंग बदलना होगा किसी कंपनी के शेयर के भाव नीचे गिरते हैं तो कई लोग खरीदने लगते हैं कौड़ियों के दाम ताकि जब कभी फिर उसके भाव शेयरबाज़ार में ऊंचे चढ़ते हैं तो मुनाफा कमा सकें बेचकर। अचानक कई कंपनियों की हालत खराब हो गई है ये राजनीति की मंडी है पहले उसका कारोबार मंदा करवाते हैं शोर मचाते हैं उनके पास सब माल नकली है बाद में उसी नकली सामान को मुफ्त के भाव खरीद अपने लेबल से असली बताकर बाज़ार में खरीदने वालों को चिपका देते हैं। ये जो आज सस्ते में बिक रहे हैं कल महंगे दाम बिक सकते हैं , कीमत खरीदने वाले की ज़रूरत पर निर्भर होती है।                     


   जो बात हम नहीं समझते वो ये है कि सौदा उनका नहीं उस जनता के भरोसे का किया जाता है जिस ने उनको बनाया था। हमको बताया जाता है हमारे साथ आपकी भी भलाई है चुपचाप धारा के साथ बहने में। धर्म नैतिकता उसूल ईमानदारी सच्चाई बड़ी बड़ी बातें खोखली लगती हैं जब हमारा इम्तिहान होता है। अपने जाति धर्म परिवार के व्यक्ति के अनुचित ही नहीं आपराधिक कर्म करने पर भी उसका बचाव करते हैं जबकि आपको खड़ा पीड़ित पक्ष के साथ होना चाहिए। किसी घटना की बात नहीं करना चाहता क्योंकि ये किसी एक समुदाय की बात नहीं है बल्कि हमारे समाज की भयानक तस्वीर है उसके दोगलेपन और आडंबर को सामने लाती है। जिस पर शर्मिंदा होना जब उस पर गर्व करने का काम करते हैं तो हम देश समाज धर्म उसूल सभी को दरकिनार करते हैं और अपने भविष्य को अंधकार में धकेलते हैं। बबूल बोने वाले आम नहीं खा सकते जो आज बोया है कल उसे ही काटना भी होगा।

    इश्तिहार देना पड़ता है जब बेचना हो और बिकने को सामान भी हो। तो क्या राजनीति भी घोड़ा मंडी है जो आजकल संसद विधायक बिकते खरीदे जाते हैं। इंसान जब बिकने लगता है तो इंसान नहीं रह जाता और नेता शायद इंसान नहीं कुछ और होते हैं असली कम नकली माल ज़्यादा। चमकती हुई हर चीज़ सोना नहीं होती है लोग ठगे जाते हैं पैकिंग या बाहरी चमक दमक आवरण की सज धज देख कर। जिस्मफरोशी के बाज़ार की रौशनियां आंखों को चुंधियाती हैं मेकअप का कमाल है जो वैश्या हरदम सुंदर और जवान लगती है। जाने सत्ता कोई अमृत कलश है जो बूढ़े भी पहले से जवान फुर्तीले होने लगते हैं। आजकल अजब ज़माना है लोग खाली शोरूम से ऑनलाइन सभी बेचते हैं खुद पास कुछ भी नहीं होता न कुछ बनाते हैं। इधर उधर से उठाते हैं बेचते हैं खूब मुनाफा कमाते हैं। बड़े धोखे हैं इस राह में बाबूजी ज़रा संभलना। राजनीति अब भरोसे की बात नहीं रही इस हाथ ले उस हाथ दे यही बन गई है। इश्तिहार पढ़कर लगता है कोई अपना माल लुटवा रहा है एक के साथ एक मुफ्त या 50 फीसदी ऑफ लुभाता है दुकानदार पहले से कई गुणा बढ़ी कीमत का लेबल लगाता है। खरीदार इसी लालच में फंसता है मार खाता है मॉल में सौ रूपये वाला सामान फुटपाथ पर दस रूपये में मिल जाता है मगर सस्ता माल घटिया कहलाता है। बाज़ार का इश्तिहार से गहरा नाता है पीतल झूठ का शाम तक सारा बिक जाता है खरा सोना बिना बिका रहकर खुद पर शर्माता है। देख लो झूठ अपने पर कितना इतराता है।

Tuesday, 16 July 2019

इंसान का सामान होना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

          इंसान का सामान होना ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

 दुनिया के तराज़ू के पलड़े के दोनों तरफ मुझे नहीं बैठना। न तुलने का सामान होना है न ही तोलने का बाट होना है। नहीं मंज़ूर मुझे ये बड़े-छोटे अमीर-गरीब समझदार-नासमझ काबिल-नाकाबिल जैसे किसी भी दो हिस्सों में दुनिया समाज को बांटना। आपकी अमीरी आपकी समझदारी आपकी क़ाबलियत सफल होने की और आपका बड़पन्न आप सभी को मुबारिक हो। मुझे नहीं पसंद भेदभाव की सोच वाली ये दुनिया , मुझे लगता है हर इंसान इंसान होने का हकदार होने से बराबर है। जिस दिन आपकी किसी मशीन का कोई छोटा सा पुर्ज़ा नहीं काम करता उस दिन आप को उसकी अहमियत समझ आती है। ख़ामोशी से अपना काम करने वाला लगता है कोई काम नहीं कर रहा मगर कभी उसी धुरी पर बाकी कलपुर्ज़े चला करते हैं टूटते ही सबका चलना बंद हो जाता है।

        लाखों करोड़ हैं जिनके पास उनको अभी और की हवस है और धन दौलत नाम शोहरत पाने को सब करने को तैयार हैं। अमीरी इसको कहते हैं तो ऐसी अमीरी किस काम की बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर , पंथी को छाया नहीं फल लागे अति दूर। ये ऊंचे कद वाले किसी के काम नहीं आते हैं समाज को देश को कुछ नहीं मिलता इन जैसों से। लेकिन हर छोटा कहलाने वाला कुछ न कुछ योगदान देता है समाज को देश को , उसकी गरीबी उसका अपराध नहीं है शोषण की व्यवस्था और अन्यायकारी सामाजिक संरचना है। जिस में बड़े ओहदे पर बैठा कम मेहनत कर भी अधिक मेहनताना लेता है और औरों को उनकी मेहनत और काबलियत का कम मेहनताना देकर रईस बनता है। अमीरी किसी और के हिस्से की लूट से मिलती है सबको पूरा मेहनत का दाम मिले तो अमीर की अमीरी बच नहीं सकती। हमने वो समाज बनाना है जिस में जितना है सबको समान हासिल हो , इस दुनिया से हमारी जंग इसी बात की है।

  अगर आप भी खुद को बाकी लोगों से बड़ा या अमीर या काबिल समझदार मानते हैं तो बस इतना कर दिखाना जो भी छोटा काम किसी से करवाते हैं खुद किसी और की खातिर करना पड़े तो क्या मेहनताना लेना मंज़ूर है उतना उसको देना जिस से छोटा समझ कोई काम करवाते हैं। नहीं समझ आया मुमकिन है बहुत काम आप किसी कीमत पर नहीं करना चाहोगे जिसके लिए चंद सिक्के देकर समझते हैं इतना क्या थोड़ा है। वास्तविक अमीरी उसे कहते हैं जो किसी से लेने नहीं देने की सोच रखते है। जिनके पास बहुत पास है मगर अभी और और और अधिक की लालसा रखते हैं सबसे बड़े गरीब होते हैं। मैं जानता हूं मेरी क्या काबलियत है और उसकी कोई कीमत नहीं लगाई जा सकती। दाम लगाया उनका जाता है जो बिकाऊ हैं बाज़ार में अपनी कीमत ऊंची लगवा बिकने को राज़ी हैं , हम बिकने वालों में शामिल नहीं हैं। इक शेर मेरी ग़ज़ल का अंत में।

                        अनमोल रखकर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में ,

                          देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई।

Sunday, 14 July 2019

मंदिर में नये देवताओं का आगमन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 मंदिर में नये देवताओं का आगमन ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

आप सभी जानते ही हैं झूठ के देवता का पहला मंदिर फतेहाबाद में बनाया गया था। ये भी सभी समझते हैं कि इस कारोबार में भी कंपीटीशन बहुत है और भक्तों को चाहने वालों को आकर्षित करने को नया कुछ न कुछ करते रहना पड़ता है। जिस तरह अन्य जगहों पर किसी भी एक देवता के नाम के बनाये हुए मंदिर में कुछ और भी देवी देवता स्थापित किये गये होते हैं बस उसी तर्ज़ पर झूठ के देवता के घर भी आधुनिक युग को देखते हुए फेसबुक व्हाट्सएप्प जैसे लोगों के दिल बहलाने से लेकर ज्ञान पाने तक का काम आने वाले गुरुओं का आगमन किया गया है। पहले लोग खासकर महिलाएं और बड़े बज़ुर्ग कथा कीर्तन में शामिल होने जाते थे लेकिन आजकल दिन रात भजन कीर्तन की जगह सोशल मीडिया पर खोये रहते हैं। झूठ के देवता का इस से अच्छा और शानदार स्थान कहीं और नहीं है। आपको नये नये शहर पार्क पहाड़ आदि देखने का शौक है तो इस से अलग आधुनिक युग में कोई और कहीं नहीं मिल सकता है। बस जल्दी से आने और दर्शन कर मनोकामना पूर्ण होने का भरोसा रख इस के सबसे पहले अनुभव हासिल करने वालों में शामिल हों। आपका स्वागत है।

 नीचे झूठ के देवता को लेकर दो लिंक हैं समझने को , अब आगे इस की विशेषता पर थोड़ा जानकारी। सोशल मीडिया किसी पहाड़ पर चढ़ने के बाद इक सुरंग की तरह है। अपनी कई जगह ऐसी सुरंग देखी होंगी जो भीतर जाने के बाद आगे बाहर को खुलती हैं अंधियारा छट जाता है और दूसरी तरफ उजाला नज़र आता है लेकिन इन आधुनिक गुरुओं की नाम की सुरंग में आपको रौशनी की जगमग दिखाई देगी और आपको उस से बाहर निकलने का कोई मार्ग नहीं समझ आएगा। आप वास्तविक दुनिया को भूल कर कल्पना की इस दुनिया में खो जाओगे। इसका तिलिस्म आपको अपने आगोश में ले लेगा और आपको लगेगा इस से बढ़कर चैन सुकून किसी जगह नहीं मिलेगा। जन्नत स्वर्ग से बढ़कर खूबसूरत लगेगी आपको इसकी तंग गली जिस में आपको अकेले रहने का आनंद आएगा। भीड़ बहुत होगी मगर आप के और भीड़ के बीच में इक पारदर्शी शीशे की दिवार होगी , कोई हवा कोई आवाज़ आपको परेशान नहीं करेगी।

आपको उड़ना है तो आपको चिड़िया की तरह के गुरूजी के दर से जाने होगा और आपको खुला आकाश मिलेगा। चिड़िया को चहचहाना है शब्द की सीमा है जिधर मर्ज़ी उड़न भर सकते हैं कोई आपको रोकता टोकता नहीं है। कितनी चिड़िया हैं बेहिसाब हैं उनके पीछे पीछा करने को असंख्य हैं। कभी इस डाल कभी उस डाल कोई ठिकाना नहीं है हर चिड़िया आज़ाद है चिड़ा कोई नहीं राज करने को। इस गुरु जी के साथ आपको व्हाट्सएप्प नाम के महागुरु भी नज़र आएंगे उनके पास सभी कुछ है। शब्द हैं तस्वीर हैं आवाज़ है देखने को चलती फिरती तस्वीर भी हैं। मगर इसका नशा चढ़ने के बाद आपको होश खोने का खतरा है सुध बुध खो बैठते हैं दिन रात का पता नहीं चलता है। भूख प्यास याद नहीं रहती है। इक और मुड़ती हुई सी शीशे की नली भी नज़र आएगी जो गुरु से बढ़कर आपको खुद गुरु बनाने का साधन भी हो सकती है। समझ आने के बाद आप खुद अपने नाम से यू ट्यूब चैनल शुरू करते हैं और उसके बाद कोई पागलखाना आपका ईलाज नहीं कर सकता है। पागलपन चरम सीमा होती है इबादत की हर तरह वही नज़र आता है। आपको ध्यान नहीं रहा कि इस आधुनिक मंदिर के देवता गुरुओं से आपको मिलेगा क्या ये सवाल पूछना था , खुद ही बता देता हूं अपनी ज़िंदगी अपनी दुनिया के दुःख दर्द परेशानियों से मुक्ति मिलना। बस सब मिल गया ये एहसास होता है कुछ बाकी नहीं बचता पाने को इसके बाद विरक्त होने की बारी है। एक बार आओगे तो कभी वापस नहीं जाओगे यहीं के बनकर रह जाओगे। अतिथि कब आओगे।

झूठ के देवता पर जानकारी पाने को लिंक :-

 http://blog.loksetia.com/2018/06/572.html 

 

http://blog.loksetia.com/2018/07/blog-post_98.html








Saturday, 13 July 2019

बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया - ( भाग दो )

   बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया 

                                         (  भाग दो  )

भगवान की कथा नारद मुनि जी से वार्तालाप से शुरू हुई थी। नारद जी को भगवान ने यही देखने को नियुक्त किया हुआ था वैसे उनकी हंसी ठिठौली सभी देवी देवताओं से चलती रहती है। देवियां अपनी बात कहती हैं जानती हैं उनके देवों तक बात पहुंचनी ही है। ऊपर वाले को चिंता थी अपनी दुनिया की इसलिए नारद जी को हालचाल जानने को भेजा था धरती पर। साथ चलते आप भी कहा था नारद जी ने तो बताया था खुद जाकर देखने का जतन किया था मगर धरती पर जिन जगहों पर उनके घर होने का यकीन लोगों को है जब ऊपर वाला देखने गया तो भीतर नहीं जाने दिया। सवाल करते ही बाहर जाने को आदेश जारी कर दिया संचालन करने वालों ने। परिचय देने पर उपहास किया गया कि ईश्वर भला सामने दिखाई देते हैं कभी। मुझे जानते नहीं पहचानते नहीं बस मुझे बेचते हैं उनका कारोबार है अपमानित होकर लौट आया था और लगा था अगर और समझने समझाने की कोशिश करता तो धर्म और भगवान के नाम पर बांटने वाले फसाद ही करवा देते। नारद जी ने जो बताया वो बेहद भयानक था भगवान भी डर गये सुनकर। कोई उपाय सूझ नहीं रहा है समय बिताने को दुनिया बनाने की दास्तान बताने लगे थे।

   सुनकर आपको कुछ भी समझ नहीं आएगा कि जितने भी लोग हैं जिन्होंने ईश्वर खुदा अल्लाह कितने नाम दे रखे हैं भगवान को सभी एकमत हैं कि दुनिया बनाने वाला एक ही है। फिर हर धर्म वालों का अलग अलग अपना परमात्मा क्यों है। चलो नाम कोई भी सब एक उसी की बात करते हैं तो फिर आपस में झगड़ा किस बात का है। अब तो लोग किसी किसी इंसान को सफलता दौलत शोहरत मिलने पर भगवान का दर्जा देने लगते हैं। जाने किस किस का मंदिर बना दिया है हद तो इस बात की है कि अहिंसा की बात कहने वाले गांधी को कत्ल करने वाले का मंदिर बना डाला है। सत्ता धन या अन्य भौतिक चीज़ों की जिनकी हवस की कोई सीमा नहीं है जो पैसे लेकर बाज़ार की वस्तुओं को बिकवाने को इश्तिहार विज्ञापन करते हैं टीवी चैनल और अख़बार सोशल मीडिया उन्हें भी भगवान कहते हुए संकोच नहीं करते हैं। ऊपर वाले को कहना ही पड़ा कि अगर आजकल की दुनिया को ऐसे लोग भगवान लगते हैं तो मुझे भगवान कहलाना पसंद नहीं होगा।

तमाम धार्मिक संस्थाएं दान मांगने की बात करती हैं और दानराशि को वास्तविक धार्मिक कार्य , दीन दुखियों की भलाई गरीबों की सहायता बेघर लोगों को छत देने भूखों को खाना खिलाने रोगियों का ईलाज करवाने पर खर्च नहीं करते हैं बल्कि बड़े बड़े ऊंचे मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरुद्वारे बनाने पर खर्च करते हैं। कोई उनको समझा नहीं सकता भगवान को रहने को महल की ज़रूरत नहीं होती और कोई भगवान को कुछ देने के काबिल नहीं हो सकता है। उसने दुनिया बनाई है कण कण में बसता है किसी जगह बंध कर नहीं रहता है। भगवान को गर्मी सर्दी धूप छांव रात दिन आंधी तूफान बरसात से कुछ फर्क नहीं पड़ता है। उसके एक इशारे पर सब होता है हो सकता है। भगवान के नाम पर कितना कुछ बेकार बर्बाद किया जाता है जिस से लाखों लोगों की भूख प्यास मिटाई जा सकती थी नंगे बदन लोगों को तन ढकने को कपड़ा रहने को आवास मिल सकते थे। भगवान को महसूस होने लगा जैसे ये सब करने के दोषी वह खुद हैं आखिर उन्होंने ऐसा करने कैसे दिया। दुनिया बनाने से पहले इसकी कल्पना की होती तो कभी ये दुनिया नहीं बनाई होती। नारद जी आपके सवाल का जवाब नहीं है मेरे पास कि मुझे दुनिया बनाकर क्या मिला। नारदजी चुटकी लेना नहीं भूले बोले आपको भगवान होने का सबूत देना था शायद जबकि ये दुनिया बनाने से पहले आपका अस्तित्व प्रमाणित था इस से आपके होने नहीं होने का संशय पैदा हुआ है। जो नास्तिक हैं यही कहते हैं अगर खुदा ईश्वर अल्लाह वाहेगुरु यीशु मसीह है तो ये सब क्यों होने देता है।

Friday, 12 July 2019

बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया - ( भाग एक )

    बनाकर दुनिया क्या मिला ( दास्ताने खुदा ) डॉ लोक सेतिया 

                                      (  भाग एक  )

  जिसने सबकी कथा लिखी तकदीर लिखी खुद उसकी दास्तान नहीं लिखी किसी ने। जितनी भी किताबें बिकती हैं उसके नाम पर लिखने वाले लोगों ने सब कुछ लिखा ऊपर वाले का दर्द नहीं लिखा। शायद सोचा भी नहीं जो सबको सभी देता है उसको क्या दुःख दर्द क्या कमी होगी। मगर इस से अधिक दर्द की बात क्या होगी कि जिसने सबको खुला आसमान धरती हवा पानी और जीने का सब सामान दिया और सांस लेने चलने फिरने बोलने सोचने की हर तरह की आज़ादी दी उन्हीं लोगों ने खुद बनाने वाले को बेजान इमारत और पत्थर बना कर अपनी ज़रूरत मर्ज़ी और साहूलियत के अनुसार बंधक बना लिया किसी मुजरिम की तरह कैद कर लिया। अब इंसान की मर्ज़ी है कब उसको अपने ही इंसानों से मिलने दे कब उसकी आरती पूजा ईबादत कैसे हो और किस तरह उसके नाम पर चढ़ावा किसी की इच्छा से खर्च हो या जमा किया जाता रहे।  दुनिया को बनाने वाला आज पशेमान है ये सोचकर कि मैंने क्या बनाना चाहा था और ये कैसे क्या हुआ जो ऐसी दुनिया बन गई है जो इंसान के रहने लायक ही नहीं भगवान इस दुनिया में रहना भी चाहेगा तो कोई रहने देगा नहीं। हर किसी ने पहले अपने अपने भगवान तराश लिए फिर उन खिलौनों को बनाकर खुद को भगवान समझने लगे हैं। ऊपर कहीं बैठा ऊपर वाला याद कर रहा है अपने इस कारनामे को कैसे अंया को बनाने वाला आज जाम दिया था। दुनिया बनाने वाली की सच्ची कहानी सुनते हैं खुद उसी की ज़ुबानी।

    बस यही बात नहीं बता सकता कि मैंने ऐसा करने का विचार किया तो आखिर क्यों किया। बाकी सब बता सकता हूं कुछ छुपाने की ज़रूरत नहीं है। मैंने दुनिया की रचना की तो सब बनाता चला गया खूबसूरत दुनिया दिलकश नज़ारे और जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता आज तक भी वो सभी कुछ मैंने बना दिया। फिर सोचा ये सब नज़ारे बेकार हैं अगर इनको देखने वाला कोई नहीं हो कोई इनका उपयोग करे आनंद ले सके तभी बनाने का कोई हासिल है। और तब मैंने इंसान को बनाया बिल्कुल अपनी तरह का ही और उसको सब कुछ दे दिया शक्ति विवेक समझ और सोचने को दिमाग़ भी। क्या भला है क्या बुरा है क्या करना है क्या नहीं करना है समझने को विचारों की ताकत के साथ कुछ बेहतर करने को सपनों की उड़ान भी हर किसी को दे दी। ये सोचकर कि परख कैसे हो मैंने खूबसूरत वादियों के साथ वीराना भी बना दिया , हरे भरे गुलशन बनाए तो कहीं उजड़ा हुआ रेगिस्तान भी बनाया , इंसान में अच्छाई शामिल की तो अच्छाई बुराई का फर्क समझाने को इक शैतान भी बुराई क्या है समझाने को बना बैठा। बहुत कुछ था और सब के लिए था मगर शैतान में लोभ लालच अहंकार और अधिक पाने की ललक या भूख या हवस थी जो थमने का नाम नहीं लेती थी। शैतान हैवान बनता गया और इंसान इंसानियत को छोड़ने लगा तो जिस मकसद से बनाई थी दुनिया वो मकसद ही लगने लगा सफल नहीं हुआ। मगर मैंने आदमी को आज़ादी से जीने रहने अच्छे कर्म करने बुरे कर्म से बचने का संदेश देकर भेजा था और उसने हामी भरी थी मुझे भरोसा था अपनी बात अपना वचन निभाने की बात भूलेगा नहीं।

     इंसानों में भी मैंने कुछ को चुना जो मेरी तरह से मेरा काम कर सकेंगे दुनिया को भलाई की राह बतलाने का भटकने से बचाने का पाठ पढ़ाया करेंगे। मैंने इंसान को संवेदना का वरदान दिया था खुश रहने दर्द सहने और हंसने रोने हमदर्द बनकर साथ निभाने को अपनापन और मधुर भावनाओं से भरा दिल देकर। प्यार मुहब्बत भाईचारा और हर किसी का कल्याण हो ये विचार दिया था। शैतान एक था और इंसान बहुत थे फिर भी किसी किसी इंसान को शैतान जैसा बनने की चाहत जाने कैसे होने लगी। आज भी बुराई हर किसी को अपनी तरफ आकर्षित करती है और लोग भलाई को छोड़ उस तरफ चले जाते हैं। मैंने किसी इंसान को मुझे याद करने को नहीं कहा बस इतना वादा किया था तुम सब दुनिया में अकेले ही हो कोई साथी बन सके तो बना लेना मगर फिर भी जब भी कोई संगी साथी छोड़ जाये तो अपने आप को अकेला मत समझना। मुझे अपने भीतर तलाश करना बंद आंखों से भी मुझे सामने पास देख सकोगे। ये इक छोटी सी बात किसी को भी ध्यान नहीं रही है। लोग ध्यान भक्ति की बातें करते हैं वास्तविक मनन चिंतन नहीं करते हैं। धीरे धीरे इंसान बदलता गया और बदल कर आधा आदमी आधा जानवर बनता गया , बाहर से इंसान दिखाई देता है भीतर सब के शैतान छुपा रहता है। मेरा कोई नाम था ही नहीं है भी नहीं हो सकता भी नहीं मगर हर किसी ने पहले मिट्टी का कोई खिलौना बनाकर भगवान कहकर बेचा फिर जिसने जैसे मर्ज़ी मुझे बनाने का दावा किया। सब ने समझा खुद को भगवान को बनाकर भगवान से ऊपर हो जाना है। इस तरह उन्होंने खुदा ईश्वर अल्लाह कितने नाम से कोई कारोबार चला दिया और धर्म नाम देकर मेरी कहानियां गढ़कर सुनाने लगे। भोले भाले लोग उनकी चाल को नहीं समझ पाए और खुद मुझे भूलकर उनकी कही झूठी बातों को सच समझने लगे।

   लोग सोचते हैं सब ऊपर वाला करता है वही सब का भाग्य लिखता है मगर कोई विचार नहीं करता मैंने कभी किसी को अच्छे कर्म करने से रोका नहीं बुराई को राह जाने को नहीं कहा है। हर दिन उनको विवेक बताता है सही गलत क्या है मगर अपने विवेक की कोई सुनता ही नहीं। अपनी शैतानी सोच को बदलना नहीं चाहते लोग इंसान बन कर नहीं रहते तो किसकी भूल है। क्या इंसान को सब देकर मैंने बुरा किया है मुझे किसी से कोई बैर नहीं किसी से कोई शिकायत नहीं मगर जो बीजते हैं उसका फल सामने आता है। स्वर्ग कोई नहीं है जन्नत कहीं नहीं है यही दुनिया मैंने सबसे खूबसूरत बनाई थी इन इंसानों ने ही उसको बर्बाद कर दिया है।

                                 ( आगे की दास्तान अगली पोस्ट पर पढ़ना )

              

Thursday, 11 July 2019

सरकार नहीं इश्तिहार है ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

        सरकार नहीं इश्तिहार है ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

2956433 संख्या शौचालय बनाने का दावा किया गया है हरियाणा सरकार के ताज़ा विज्ञापन में। शायद कुछ ऐसी संख्या हो सकती है पिछले चार साल में हरियाणा सरकार के विज्ञापनों की भी। दुष्यन्त कुमार की भी कल्पना इस सीमा की नहीं रही होगी क्योंकि तब सरकारी इश्तिहार इस तरह बदलने का चलन नहीं था। चलो इस की सच्चाई को छोड़ देते हैं यकीन करते हैं कम से कम सरकारी फाइलों में तो गिनती सही होगी। मगर मुमकिन ये भी है कि सरकारी विज्ञापन बनाने से पहले इस बात का विचार किया गया हो कि कौन सी संख्या शुभ होगी। ये हो सकता है अंक ज्योतिष वाले इन को जोड़ कर भाग्यशाली अंक की बात कर सकते हैं ये विचार करते हुए कि 75 का आंकड़ा हासिल करना है तो 39419 की गिनती का महत्व है। 32849 काफी होते तो 90 का आंकड़ा भी मुमकिन था। किस किस गांव में कितने बने हैं किसको जाकर गिनती करनी है। मगर इक बात साफ़ है गालिब के शेर की तरह , कहां महखाने का दरवाज़ा ग़ालिब और कहां वाईद , पर इतना जानते हैं हम कल वो जाता था कि हम निकले। मुझे इतना तो पता है कि साल डेढ़ साल पहले जब हरियाणा के सीएम खट्टर फतेहाबाद पुलिस के राहगिरी कार्यकर्म में भाग लेने आये थे तब मॉडल टाउन पपीहा पार्क के बाहर चार चलते फिरते शौचालय जींद से लेकर एक दिन को दिखाने को खड़े किये गए थे। अगले दिन वापस ले जाते हुए नज़र आये थे तो सोशल मीडिया पर शेयर किया था मैंने। ये बताना उचित होगा कि उनको उपयोग नहीं किया जा सकता था क्योंकि कोई पानी की सीवर की व्यवस्था नहीं थी और न ही उनको इस्तेमाल करने को कोई सीढ़ी लगाई गई थी। तभी सवाल उठाया था अगर फतेहाबाद शहर में उपलब्ध होते तो जींद से मंगवाने की ज़रूरत नहीं होती। मगर बात केवल शौचालय की संख्या की नहीं है। असली विषय है ये सरकार है ये इश्तिहार है जैसे आजकल अख़बार देख कर समझना मुश्किल होता है कि क्या समाचार है खबर है और क्या इश्तिहार है ये पैसे देकर छपी खबर है। 

अधिक विस्तार में नहीं जाकर फिर से बताना है 2002 में लिखा लेख सरिता के फरवरी अंक में छपा था , आज तक का सबसे बड़ा घोटाला। सरकारी विज्ञापन की ही बात थी और आंकड़े देकर बताया था कि पिछले पचास साल से तब तक जितना धन इस तरह से खर्च नहीं बर्बाद कहने से भी आगे बढ़कर कह सकते हैं टीवी अख़बार वालों को खुश करने अपने प्रभाव में रखने को सभी घोटालों की धनराशि से अधिक कुछ मुट्ठी भर लोगों को फायदा पहुंचाने को किया जाता रहा सभी सत्ताधारी लोगों द्वारा। मुझे याद है जो आज सत्ता पर काबिज़ हैं तब उनको मेरी बात सौ फीसदी सही लगी थी , मगर शायद उन्हीं की सरकार ने पिछली सभी सरकारों को बहुत पीछे छोड़ दिया है। पहले बात अपने आलोचना से बचना भर था जो आज उस से बहुत खतरनाक बढ़ कर चुनावी जीत का साधन बना लिया गया है। आज सत्ताधारी दल के नेता मानते ही नहीं दावा करते हैं कि चुनाव सोशल मीडिया के दम पर उसका सहारा लेकर लड़ना है और जीतना है। आपको इस का अर्थ समझना होगा। 

स्मार्ट फोन फेसबुक व्हाट्सएप्प पर आप मनचाही बात पहुंचा सकते हैं सामने से कोई सवाल नहीं कर सकता है। जनता से एकतरफा संवाद लोकतंत्र की निशानी नहीं हो सकता है। ऐसा मुमकिन है कि सरकार की वास्तविकता पता चले तो हैरानी हो कि कितने इश्तिहार छपते रहे कितना धन व्यर्थ खर्च किया जाता रहा केवल किसी नेता को महिमामंडित करने को जबकि उनका यही कदम किसी लूट से कम नहीं है। रोज़ सामने आती है खबर कि सार्वजनिक शौचालयों की दशा कितनी खराब है कहीं साफ सफाई नहीं कहीं पानी ही नहीं है। जनता के पैसे को अपनी मर्ज़ी से कुछ लोगों को या किसी ख़ास व्यक्ति संस्था को मुहैया करवाना ईमानदारी हर्गिज़ नहीं कहला सकता है। लोकलाज की परवाह नहीं करते हुए चुनवी लाभ के लिए सरकारी खज़ाने का दुरुपयोग करना अनुचित है। वास्तव विकास लोगों को सामने दिखाई देना चाहिए जो नहीं नज़र आता तभी महीने बाद पुराने इश्तिहार को बदल कोई नया इश्तिहार चिपकवा देते हैं। दुष्यंत कुमार को लगता था , अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार , घर की हर दिवार पर चिपके हैं इतने इश्तिहार। इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके जुर्म हैं , आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फरार।

  इश्तिहार देना पड़ता है जब बेचना हो और बिकने को सामान भी हो। तो क्या राजनीति भी घोड़ा मंडी है जो आजकल संसद विधायक बिकते खरीदे जाते हैं। इंसान जब बिकने लगता है तो इंसान नहीं रह जाता और नेता शायद इंसान नहीं कुछ और होते हैं असली कम नकली माल ज़्यादा। चमकती हुई हर चीज़ सोना नहीं होती है लोग ठगे जाते हैं पैकिंग या बाहरी चमक दमक आवरण की सज धज देख कर। जिस्मफरोशी के बाज़ार की रौशनियां आंखों को चुंधियाती हैं मेकअप का कमाल है जो वैश्या हरदम सुंदर और जवान लगती है। जाने सत्ता कोई अमृत कलश है जो बूढ़े भी पहले से जवान फुर्तीले होने लगते हैं। आजकल अजब ज़माना है लोग खाली शोरूम से ऑनलाइन सभी बेचते हैं खुद पास कुछ भी नहीं होता न कुछ बनाते हैं। इधर उधर से उठाते हैं बेचते हैं खूब मुनाफा कमाते हैं। बड़े धोखे हैं इस राह में बाबूजी ज़रा संभलना। राजनीति अब भरोसे की बात नहीं रही इस हाथ ले उस हाथ दे यही बन गई है। इश्तिहार पढ़कर लगता है कोई अपना माल लुटवा रहा है एक के साथ एक मुफ्त या 50 फीसदी ऑफ लुभाता है दुकानदार पहले से कई गुणा बढ़ी कीमत का लेबल लगाता है। खरीदार इसी लालच में फंसता है मार खाता है मॉल में सौ रूपये वाला सामान फुटपाथ पर दस रूपये में मिल जाता है मगर सस्ता माल घटिया कहलाता है। बाज़ार का इश्तिहार से गहरा नाता है पीतल झूठ का शाम तक सारा बिक जाता है खरा सोना बिना बिका रहकर खुद पर शर्माता है। देख लो झूठ अपने पर कितना इतराता है। चलो इक ग़ज़ल सुनाता हूं सरकार क्या होती है थोड़े में समझाता हूं।

सरकार है बेकार है लाचार है - लोक सेतिया "तनहा"

सरकार है  , बेकार है , लाचार है ,
सुनती नहीं जनता की हाहाकार है।

फुर्सत नहीं समझें हमारी बात को ,
कहने को पर उनका खुला दरबार है।

रहजन बना बैठा है रहबर आजकल ,
सब की दवा करता जो खुद बीमार है।

जो कुछ नहीं देते कभी हैं देश को ,
अपने लिए सब कुछ उन्हें दरकार है।

इंसानियत की बात करना छोड़ दो ,
महंगा बड़ा सत्ता से करना प्यार है।

हैवानियत को ख़त्म करना आज है ,
इस बात से क्या आपको इनकार है।

ईमान बेचा जा रहा कैसे यहां ,
देखो लगा कैसा यहां बाज़ार है।

है पास फिर भी दूर रहता है सदा ,
मुझको मिला ऐसा मेरा दिलदार है।

अपना नहीं था ,कौन था देखा जिसे ,
"तनहा" यहां अब कौन किसका यार है। 

 

Wednesday, 10 July 2019

गुफ़्तगू पतझड़ की बहार से ( अनकही कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 गुफ़्तगू पतझड़ की बहार से ( अनकही कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

  चलते चलते थोड़ा थक गया हूं ज़रा देर आराम करना चाहता हूं आगे सफर पर जाने से पहले। खुद से कितनी बार कही कहानी अपनी बार बार दोहराने से बदलती नहीं है बस याद ताज़ा हो जाती है। आज लिखने लगा तो शुरू से लिखना चाहिए सब नहीं जितना याद है उतना सही। संक्षेप में जीवन भर की बात जैसे किसी गागर में सागर भरने की कोशिश करना। हर कोई ज़िंदगी की तलाश में है मगर ज़िंदगी कोई सामान तो नहीं जो मिलेगा तलाश करने से , ज़िंदगी मिलती है खुद को खोने से और हर कोई सब कुछ पाना चाहता है। मैंने ज़िंदगी को देखा है मगर करीब से नहीं थोड़ा फ़ासला रखकर , पास जाने से डरता हूं कहीं जिसको हक़ीक़त मानता रहा वो इक ख्वाब निकले छूते ही नींद खुले और सपना बिखर जाए। चलो शुरुआत करता हूं। 

मैं किसी पौधे की तरह इक तपते हुए रेगिस्तान में अपने आप उग आया था। हर तरफ प्यास ही प्यास थी और मुझे ख्याल आया कि मुझे इक प्यार का झरना बनकर बहना है सभी की प्यास को बुझाना है। हर किसी से मुहब्बत करने लगा मगर जाने क्यों लोग मुहब्बत को समझते ही नहीं थे। सबको दौलत शोहरत ताकत की चाहत थी और प्यार मुहब्बत की इस दुनिया में कोई कीमत ही नहीं थी। ये इक बाज़ार की तरह था जिस में कोई खरीदार था कोई बिकने का सामान , मेरी हैसियत खाली हाथ बाजार चले आए नासमझ की थी जिसको खरीदना कुछ भी नहीं था और बिकना भी नहीं था किसी कीमत पर भी। चमकती रेत को पानी समझ दौड़ रहे लोग प्यार के बहते झरने की ओर आये ही नहीं आवाज़ देता रहा मैं हर किसी को। भागते हुए कोई सुनता नहीं देखता ही नहीं मुड़कर दाएं बाएं बस सामने दिखाई देती है चमकती हुई रेत प्यास बुझाने को। प्यास किसी की बुझी नहीं सभी प्यासे ही रहे मरने तक। जिस तरफ प्यार मुहब्बत था किसी को उस तरफ आना ही ज़रूरी नहीं लगा कभी भी। 

ज़िंदगी की परिभाषा कोई समझता नहीं समझाता नहीं। जीना इक रास्ता है मंज़िल नहीं है मंज़िल है कोई इश्क़ कोई आशिक़ी ढूंढना इश्क़ करने को। मैंने यही समझा और चलता रहा ढूंढने को अपनी मंज़िल अपनी आशिक़ी अपनी मुहब्बत अपना जुनून। बचपन से दोस्ती की चाहत रही मगर दोस्ती की किताब किसी पाठशाला में पढ़ाई नहीं जाती थी। दोस्त बनते मगर दोस्ती नहीं करते सभी दोस्ती में कोई मतलब तलाश करते थे। दोस्तों की मेहरबानी है जो अरमानों की दौलत अपनी पूंजी बची हुई है सबने लौटा दी वापस उनको दोस्ती से बढ़कर दुनियादारी लगती थी। संगीत से प्यार हुआ मगर घर के बड़ों ने कहा कि ये गाना बजाना छोटे लोगों का काम है मिरासी लोग करते हैं , मुझे चाहत थी तो सबसे छुपकर संगीत सुनता गाया करता गुनगुनाया करता। किसी मंच पर चला गया तो संचालक को मेरा पहनावा देख कर लगा मंच पर आने से पहले लिबास बदलना होगा किसी से मांग कर पहन लो तब जाना मंच पर। पहला अनुभव ही ऐसा हुआ कि फिर कितने साल खामोश रहकर तनहाई में गुज़ार दिये मैंने। 

दर्द से जाने कब कैसे मुलाक़ात हुई और दर्द मेरा हमसफ़र बन गया। दर्द आंसू और आरज़ू कहीं कोई फूल खिलाने की और इक सपना अपनी इक नई दुनिया बसाने की जिस में सब अपने हों कोई बेगाना नहीं हो। कोई इक घर जो खुला रहता हो हर किसी की खातिर जिस में सिर्फ प्यार मुहब्बत भाईचारा हो अजनबी नहीं लगे कोई भी अनजान भी अपना लगता हो जिस जगह। बीच में कोई नदी आई तेज़ बहाव नफ़रत की जलती हुई आग और अंधेरी रात तेज़ तूफ़ान और गरजती बिजली हर कोई डरकर छुपकर बैठ गया। मल्लाह से कहा उस पार ले चलो तो उसने इनकार कर दिया समझाया भंवर है डूबने का खतरा भी है उस पार कोई जहां नहीं है। बहुत कहता रहा तुम माझी हो ले चलो पार उधर मेरे सपनों का जहां है चाहे नहीं भी मिले मुझे जाना है। नहीं मंज़ूर कोई भी बहाना मुझे तो आज भी है उस पार जाना। 

साल गुज़रते रहे मैं कभी राह से भटकता रहा कभी किसी और मंज़िल को अपनी मंज़िल समझता रहा। पर चैन नहीं मिला सुकून नहीं आया तो फिर चलने लगा। ग़ज़ल मिली कभी कविता कभी कहानी सबसे दिल लगाया सबको अपनाया। मगर लोग खुद को बाज़ार में बेचने को लिखते रहे किताब ईनाम नाम शोहरत तमगे पुरुस्कार और दौलत जमा करते रहे। मैंने सीखे नहीं ऐसे ज़माने वाले तौर तरीके अंदाज़ आज तलक। अपने ही अरमानों से इक कश्ती बनाई और जो भी मिला उसको उसकी मंज़िल तक पार पहुंचा आता जाता रहा। नाखुदा बनकर पता चला कि कश्ती का मल्लाह किसी किनारे नहीं लगता है उसको किसी न किसी दिन नदी की तेज़ धारा में हिचकोले खाते खाते सबको बचाते हुए डूबना ही है। कितनी बार डूबने के बाद मुझे लहरों ने ही फिर वापस किनारे लाकर फेंक डाला है। 

बहुत चिंतन करने के बाद ये बात समझ आई है कि ज़िंदगी किसको कहते हैं और जीने का हासिल क्या है। यूं ही बेमकसद जीना ज़िंदगी नहीं होता है ज़िंदगी उनकी सार्थक है जो कुछ कर गए। जिनका अपना कोई मकसद रहा था जुनून था जिसकी खातिर जिये भी मरे भी। देश समाज दुनिया को अच्छा और खूबसूरत बनाने को सभी को इंसानियत का पाठ पढ़ाने को आपस में मिलकर रहने और भाईचारा बढ़ाने को साहस पूर्वक सच का साथ देने अन्याय और झूठ का विरोध करने को जीवन भर कोशिशें करते रहे। कोई धन दौलत का अंबार जमा नहीं किया क्योंकि उनकी पूंजी लोगों का प्यार और भरोसा थी जो कायम है उनके बाद भी। ये समझ आने के बाद सोचता हूं अभी जीकर सार्थक किया क्या है। जब जागे तभी सवेरा समझते हैं कोशिश करनी होगी कुछ अच्छा करने की अन्यथा जिया नहीं जिया क्या अंतर है। कोई साथ चले कि नहीं चले मुझे चलना है इक मंज़िल की तलाश को , जो मेरे नहीं जाने कितने लोगों की ख्वाबों की ताबीर होगी। इस समाज से दुनिया की राह से कांटें चुनकर हटाने हैं और खिलाने हैं कुछ सदाबहार महकते फूलों के चमन।

पतझड़ ने कहा है फिर से बहार से मुझे अलविदा करने के बाद आओ अब मगर रहना हमेशा सभी के जीवन में हरियाली रंग और खुशबू बन कर। बहार ने वादा किया है मुझे आएगी और निभाएगी अपना वादा जो किया था सभी से। मौसम बदलेगा अभी शायद थोड़ा जतन और करना है मिलकर सबको अपने उजड़े हुए गुलशन को फिर से खिलाने को। हम आप अपने अपने स्वार्थ छोड़कर साथ साथ हाथ से हाथ मिलाते हुए क्या है जो नहीं कर सकते हैं। अबके बहार लाएंगे जो कोई पतझड़ का मौसम छीन नहीं सकेगा , नफरत की आंधी भी जिस को बर्बाद नहीं कर सकेगी हमने नफरत को मिटाना है मुहब्बत के गुलशन के फूलों को खिलाना है।

अब यहां से नई शुरुआत करनी है। अभी लिखनी है कहानी प्यार की। आपने भी किरदार निभाना है।




Monday, 8 July 2019

सच्ची-झूठी संवेदना , असली-नकली चेहरे ( आजकल का समाज ) आलेख - डॉ लोक सेतिया

  सच्ची-झूठी संवेदना , असली-नकली चेहरे ( आजकल का समाज )

                               आलेख - डॉ लोक सेतिया 

बात हर दिन की अपने अलग ढंग से होती है फिर भी कल रात से बात शुरू करता हूं खत्म कभी नहीं हो सकती मगर आज सुबह तक की भी सच्ची बात बताना चाहता हूं। कल रत टीवी पर रियलिटी शो पर इक सैलाब था भावनाओं का मेरी भी आंखे नम हो गईं दिल भर आया देख कर। इक बच्चे की बात बताते हुए जो संगीत और गाने के शो में भाग लेने आया हुआ है कोई उसकी आवाज़ से पहले उसकी बात बताना चाहता है कहते हुए मंच पर आया तो वीडियो दिखाया उस बच्चे के पास फटे हुए जूते हैं जिसको उसके पिता ने खुद हाथ से ठीक करने की कोशिश भी की मगर उस के छेद से पानी अंदर चला जाता है और स्कूल पहुंचने में देरी हो जाती है। ये दिखाने के बाद कहने लगा कि आज कुछ लाया है उस बच्चे को उपहार देने को , और नये जूतों की जोड़ी भावनात्मक होकर अश्क भरी आंखों से अपने हाथ से पहनाई। घटना सही है और सच भी इस में कोई शक नहीं सवाल नहीं मगर इतना साफ है ऐसा सोचकर किया गया दर्शकों को दिखाने को कि हम लोग संवेदनशील हैं और भलाई का काम करते हैं। दिखाना ज़रूरी नहीं था इक तमाशा बनाया गया किसी की गरीबी बेबसी को खुद की महानता साबित करने को। आपको लगता है ये दिखाने से लोग भी गरीबों के हमदर्द बन सकते हैं तो माफ़ करना पल भर बाद लोग कोई और बात करने लगते हैं। ये दर्द भी उनके लिए मनोरंजन का ही इक भाग है चुटकले की तरह या फिर संचालक बनकर किसी रियलिटी शो में किसी महिला जज से हंसी ठिठोली में आवारगी की बातें करना किसी की पहचान बन जाता है। ये सब बेचने का सामान है और आपको नहीं पता असली काम विज्ञापन से कमाई करना है हर शो या सीरियल स्पॉन्सर का फायदा पहले देखता है बाकी हर बात पीछे रह जाती है। मध्यांतर के बाद अचानक आपको गंभीर विषय से किसी का इश्तिहार दिखाने पर लाते हैं और नायक अदाकार कलाकार आपको समझाते हैं। उनका मकसद था हासिल कर जाते हैं। 

शो बदलते हैं बेबस लोग भी बदल जाते हैं अब किसी की बचपन की निराशा की कैसे उसको हर कोई खुद से नीचा समझ अपमानित करता था , बुझी बुझी आंखें फीका चेहरा और निराशा भरा जीवन। और कैसे कैसे उसने हासिल किया सब कुछ। कोई आकर नाम शोहरत पाने के बाद चाहता है देश की एकता की भावना को लेकर कोई गीत कोई फिल्म या कुछ और बनाकर सबको देशभक्ति का पाठ पढ़ाये। देशभक्त हम सब हैं मगर कुछ लोगों ने अपना नाम रखकर या इस विषय को भुनाने को फिल्म गीत बनाकर खूब पैसा कमाया है। और हमने मान लिया उनकी देशभक्ति की भावना सच्ची और बेमिसाल है। मगर ये भूल जाते हैं कि उन्होंने ही बेहद बुरे खलनायकी वाले और गुंडे तमाम अपराधी कर्म करने वाले किरदार को भी दिखलाया ही नहीं उसको जायज़ भी ठहराने का काम किया है लोगों से खलनायक की गंदी बात पर तालियां बजवाईं हैं। मकसद कोई समाज को दिशा दिखलाना नहीं भटकाना है। मीडिया टीवी फिल्म वालों ने मानवीय संवेदनाओं को भी बाज़ार में बेचने का सामान बनाया है कमाई करने को। आजकल जो पतन समाज का दिखाई देता है उसके लिए इन सभी की किसी न किसी ढंग से ज़िम्मेदारी बनती है। मगर हमने उनको खुदा समझने की भूल की है जबकि वास्तव में ये भी अपनी तरह से इंसान ही हैं जो मोह माया और लालच हवस के जाल में उलझे हैं बस उनके पास अपने को जायज़ ठहराने को जवाब है जैसा समाज है हम वही दिखलाते हैं। नहीं ये मकसद नहीं है आपको लोग नहीं कहते गंगदी परोसने को आप गंदगी को परोसते हैं और उसे स्वादिष्ट बनाते हैं जो अपराध है अपने असली कर्तव्य से विमुख होने का। 

उनकी बात छोड़ सामने अपने समाज की करते हैं। हम धर्म की अच्छे विचारों की बातें करते हैं मगर असली जीवन में आचरण कुछ और होता है। आज सुबह देखा सैर पर किसी को इक पल में सभ्यता का बदला ढंग अपनाते हुए , कोई मिला जिसको खुद से छोटा मानते हैं तो बात करने का अंदाज़ अलग था तभी कोई सामने बराबर का आता दिखाई दिया तो अनदेखा कर जिसको खुद से बड़ा समझते हैं उसके सामने हाथ जोड़ सर झुकाये नमस्कार करने लगे। हर किसी से इंसान समझ कर नहीं मिलते हम लोग। शायद इतनी जल्दी कोई अदाकर भी अपना किरदार नहीं बदल सकता जिस तरह लोग चेहरा हाव भाव बदलते है। लगता है जैसे हर चेहरे पर कोई मुखौटा चिपका हुआ है असली सूरत की पहचान करना मुमकिन ही नहीं है। 

                       देश समाज जाने किस तरफ जाता जा रहा है। सब मतलबी स्वार्थी हैं और हर कोई देश से प्यार इंसानियत की हमदर्दी की सच्चाई भलाई की बातें करता है। राजनीति का अर्थ ही किसी भी तरह शासन और अधिकार हासिल करना है। ये कैसी व्यवस्था है कि जिस देश की आधी आबादी भूख और बुनियादी सुविधाओं से परेशान बदहाल है उस देश के निर्वाचित संसद विधायक शाही शान से गुलछर्रे उड़ाते हुए खुद को जनता का सेवक कहते हैं। अधिकारी कर्तव्य की भावना ईमानदारी को भूल कर मनमानी करते हैं और जो नहीं करना चाहिए वही अवश्य करते हैं लेकिन जिसको करना उनका फ़र्ज़ है कभी नहीं करते। देश का संविधान और कानून इन लोगों को केवल अपने स्वार्थ सिद्ध करने को उपयोगी लगता है। ये ऐसा रक्षक हैं जो जनता की सुरक्षा के नाम पर उस पर ज़ुल्मों सितम करना अपना अधिकार मानते हैं कोई नियम कानून इन पर लागू होता नहीं है। इनसे अधिक सवेंदनहीन कोई भी नहीं है। 

धर्म सबसे बड़ी लूट का साधन है धार्मिक जगहों पर धन के अंबार जमा हैं मगर धर्म वाले उसका उपयोग धर्म का पालन कर दीन दुःखियों की सेवा या मानव कल्याण पर नहीं आडंबर पर बर्बाद किया करते हैं। जिस धर्म की बात करते हैं उसका पालन खुद इनको नहीं करना आया कभी भी। हर कोई नज़र कुछ आता है होता कुछ और ही है। कोई बाबा बनकर कमाई का धंधा करते मालामाल होकर भी दावा करता है उसका मकसद मुनाफा कमाना नहीं है। बड़े से बड़े नाम वाले झूठ बोलने में संकोच नहीं करते अपने आचरण पर शर्मसार नहीं हुआ करते हैं। शिक्षक चिकिस्तक व्यौपारी अपनी सेवा के दाम कई गुणा वसूल करते हैं और कहते रहते हैं साथ में आपको कोई छूट कोई फायदा ख़ास अवसर पर देते हैं किसी को किसी पर रहम नहीं आता है और देखने बात करने में सब शरीफ हमदर्द लगते हैं। जो जितना पढ़ लिख जाता है उच्च पद या बहुत सारा धन जमा कर लेता है और भी बेदर्दी से काम लेता है। ऊंचाई जिसको कहते हैं ज़मीर को कहीं छोड़ हासिल की जाती है। मगर इसको आधुनिकता और विकास बताया जाता है। दुनिया देखने को पहले से सुंदर लगती है जबकि वास्तव में इसकी शक्ल भयानक होती गई है। असलियत जो है दिखावा उसके विपरीत किया जाता है।

Saturday, 6 July 2019

नाम बदलने से बदलेगा नसीब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     नाम बदलने से बदलेगा नसीब ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

         खोजने पर भगवान मिलते हैं तो हर समस्या का उपाय मिलना क्या बड़ी बात है। बजट को बहीखाता नाम देने का अर्थ गहरा है हम नासमझ लोग समझते समझते इस नर्क से किसी और दुनिया के नर्क चले जाएंगे। जिन को धरती पर स्वर्ग मिला है उनकी ऊपर भी जगह आरक्षित है। आरक्षण ऊपर तक पहुंचा हुआ है आज से नहीं कितनी सदियों से वर्ग वर्ग का कानून बना हुआ है। नाम बदलने से राशिफल बदलता है सरकारी ऐलान है आपको स्वीकार करना होगा। ये बजट नहीं है उनका बहीखाता है। जिसने लिखा था नाम में क्या रखा है उसने भी लिख कर अपना नाम साथ हस्ताक्षर किये थे ताकीद के साथ। ये अजीब दास्तानें हैं उलझनें सुलझाने से और उलझती जाती हैं। उनका कहना है कि सूटकेस बदनाम बहुत है तभी उन्होंने उसकी जगह बहीखाता लाने का निर्णय किया है माता जी ने सुझाव दिया था ऐसा करने का। फिर उस बाहरी आवरण को भगवान के दर्शन भी करवाने का काम किया है। आगे भगवान को देखना है क्या कैसे करते हैं। लोग पहले से जानते थे देश भगवान भरोसे है अब सरकार भी खुद पर नहीं ऊपर वाले पर यकीन कर चलती है। अब कोई उनको बताएगा बदनाम सूटकेस नहीं लोग रहे हैं रिश्वत देने लेने वाले। अगर फिर भी बदनामी की बात की जाये तो लालाजी की बहीखाता की बदनामी मुन्नी की बदनामी से बढ़कर रही है। खराबी सूटकेस में नहीं होती न ही बहीखाते में खराबी होती है। खराब नियत लोगों की होती है , मगर कहने का अधिकार उनका है हम तो सुन सकते हैं समझने की कोशिश कर सकते हैं।

      थोड़ा थोड़ा समझने की कोशिश कर रहे हैं। मिसाल के तौर पर धर्म की किताबों को ऐसी भाषा में लिखते थे जो आम लोग नहीं पढ़ सकते न उनको पढ़ने की अनुमति होती है। धर्म की दुकानदारी करने वाले जब जैसे उसका अर्थ निकाल आपको उल्लू बना सकते हैं। धर्म कोई भी हो उनके अनुसार कोई बहीखाता नाम का हिसाब लिखने का कीमती सामान होता है जिस में पाप-पुण्य लेना-देना जैसे दो शीर्षक रहते हैं। साहूकार की बही हो सरकार का बजट या धर्म वालों का गणित आपको समझ नहीं आना चाहिए तभी धंधा बढ़ता है। धर्म वाले लिखते हैं हम करें तो सौ गुनाह माफ़ कोई और करने को सोचे भी तो सज़ा का हकदार। कोई तर्क की बात करना अपराध है ये उनका बनाया नियम उनकी मर्ज़ी से है। उनका धर्म का तराज़ू है मगर तोलने को बाट कई हैं जैसे चाहते वज़्न बताने की सहूलियत रहती है। सरकार को कोई किताब मिल गई है जो अनहोनी को संभव करने का दावा करती है बस आंख बंद कर भरोसा करो जो कहते हैं करते जाओ। कल्याण होगा विश्वास रखना है कल्याण नहीं होने पर शक किताब पर नहीं उपाय बताने वाले पर नहीं खुद पर शक करो कि हमसे ही कोई भूल चूक हुई होगी। दक्षिणा की बात मत करना ये विचार मन में लाना ही अधर्म है धर्म पर अविश्वास है तभी आपको हासिल कुछ नहीं होता है। बजट की बात और थी बहीखाते की अलग है सरकार कहती है बेघर लोगों को घर बनाने को क़र्ज़ लेना फायदे का होगा मगर घर खरीदना है तो मकान की कीमत के साथ बिजली का बिल रख रखाव का खर्च भी जोड़ कर सरकारी दक्षिणा वसूली जाएगी। अर्थ आपको समझ कभी नहीं आने वाला है ये बच्चों की डंडे से पिटाई की तरह है मास्टरजी से लेकर पिताजी तक करते हैं आपकी भलाई के नाम पर। पिटाई से बच्चे सुधरते हैं या ढीठ और बेशर्म बनते हैं अभी शोध जारी है।

हर शहर में कोई न कोई खुद को असली लाल किताब वाला बतलाता है। अब पहली बार सामने दिखाई दी है लाल किताब लाल रंग के सुंदर कपड़े में लिपटी हुई। सब ने देखा मगर कोई समझा नहीं सरकार ने भी राज़ को राज़ रहने दिया। लाल किताब दुनिया का सबसे बड़ा खज़ाना है जिस में सब का भाग्य लिखा हुआ है लाल किताब वाले आपकी हर समस्या का समाधान कर सकते हैं। मैं जानता हूं इक ऐसे ही लाल किताब वाले
को जिसके पिताजी लाल किताब से भविष्य बांचने का काम किया करते थे। फेसबुक पर भी बहुत लोग खुद को लाल किताब धारी होने का दावा करते हैं। पहले लाल किताब के दर्शन करते हैं।


लाल किताब है या नहीं होती है इस पर संशय नहीं रहा है। सरकार के पास सुरक्षित है अर्थात सरकार खुद अपना भाग्य जैसा चाहती है बना सकती है आपको अपना भाग्य बदलवाना है तो बाकी सब को भूल कर असली लाल किताब जिसके पास है उसके पास चले जाओ। अभी भी अगर आपको नहीं समझ आया करिश्मा कैसे हो रहा था तो फिर कभी नहीं समझोगे। आज आपको लाल किताबी उपाय बताते हैं मगर आज़माना नहीं क्योंकि लाल किताब जिसके पास होती है वह खुद लाल सियाही से उपाय लिख कर देता है। लाल किताब देख कर आपको पिछले जन्म की और अगले जन्म की भी बात बताई जा सकती है। लाल किताब को संसद में लाना सबके सामने सब की जानकारी से छुपाकर संभव नहीं था मगर अब उनकी सरकार है जिनको लेकर सब मुमकिन है का दावा किया जाता रहा है। जब लाल किताब पास हो तब नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है।

लाल किताब को लाल कपड़े में लपेटने का असर होता है कि धार्मिक किताब की तरह उस पर शक या सवाल करना गलत माना जाता है।  अभी कोई नहीं जानता कि ये लाल किताब अभी तक कहां थी किस के पास थी। क्या देश की सरकार पिछले इतने साल तक इसकी अवेहलना करती रही या बेकार समझती रही। या फिर पहले देश के सत्ताधारी को नास्तिक होने का भी दोषी घोषित किया जा सकता है ऐसा बताकर कि हमने इसको दबे हुए खज़ाने की तरह खोजा है। मगर जब इस को खोलकर पढ़कर सुनाया गया तो किसी को समझ नहीं आया इसको बजट नहीं बहीखाता सही जो भी नाम दे दिया जाये इस से सबको सब कुछ मिलेगा कब कैसे। सरकार दावा करती है कि उसने देश ही नहीं सब दुनिया की हर समस्या का हल पा लिया है। शायद भूख गरीबी बेरोज़गारी आपसी भेद भाव ही नहीं राजनीति से अपराधियों का ख़ात्मा तक इस से मुमकिन होगा सरकारी बात पर भरोसा किया जाये अगर। मगर अभी आतंकवाद को लेकर पड़ोसी देश पर निर्भर करता है क्योंकि लाल किताब सीमा पार कोई वार नहीं कर सकती है।

जल कैसे बचाया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   जल कैसे बचाया जा सकता है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   पानी बचाओ पानी व्यर्थ नहीं करो विज्ञापन देने से भाषण देने से कोई मैराथन दौड़ का तमाशा करने से कुछ भी नहीं होगा। पानी भारत में अभी भी कम नहीं है लेकिन जितना ज़रूरत है उस से अधिक खर्च नहीं फज़ूल बर्बाद किया जाता है। सबसे पहली बात देश की राज्यों की सरकारें इस को लेकर हद दर्जे की उदासीन हैं लापरवाही है समाज हित की आपराधिक अनदेखी तक। चांद पर जाने और जाने कितने ऐसे अनावश्यक कार्यों आडंबर करने पर धन खर्च करने से पहले अगर देश भर में साफ़ पीने का पानी उपलब्ध करवाने को महत्व देते तो शायद ये विकराल समस्या नहीं सामने आती। आपको क्या लगा मेरी बात में कोई विरोधाभास है जब पानी ही नहीं तो सबको साफ पानी मिले कैसे। चलो इक कल्पना करते हैं क्या कैसे संभव है। 

चौबीस घंटे साफ पानी की सप्लाई :-

अगर हर किसी को साफ पीने का पानी चौबीस घंटे देने का कार्य सरकारी विभाग करते तो किसी को भी घर दफ्तर बाज़ार में पानी जमा करने को टैंक नहीं बनवाने होते। विकसित देशों में पहला काम यही किया गया है जबकि कई देशों में पानी की उपलब्धता हमसे बहुत कम थी या कठिनाई से मिलता है पानी। यकीन करें अगर जलघर से पानी बिना बाधा लगातार सप्लाई किया जाये तो केवल उतना ही जल खर्च होगा जितना चाहिए। हर किसी को बिजली की मोटर नहीं लगवानी पड़ती और बिजली की भी बचत होती। कितनी बिमारियां स्वच्छ जल नहीं मिलने से होती हैं उन की भी समस्या हल हो सकती थी। कभी विचार करना आपको नल से ताज़ा पानी मिलता लगातार तो कोई ज़रूरत नहीं होती जमा करने की सीधे ज़रूरत होने पर नल से जितना चाहते उतना ही लेते। 

तालाब नदियों झरनों की सुरक्षा :-

बारिश में कितना पानी व्यर्थ जाता है कभी हर जगह गांव शहर जलभराव को तालाब हुआ करते थे। घर नहीं डूबते थे जितना अधिक पानी बरसात का होता तालाब से खाली ज़मीन पर जाता कुछ रहता बचा हुआ कुछ धरती के नीचे चला जाता। अब खाली जगह छोड़ी नहीं कहीं भी कच्ची जिस से पानी धरती के भीतर जाकर नीचे का जलस्तर ऊंचा करता उल्टा हमने धरती के नीचे से पानी का सीमा से बढ़कर दोहन कर इतना नीचे कर दिया है कि निकालने को फिर बिजली और उपाय करते हैं जो और कठिनाई पैदा करते हैं। 

अनुचित अनावश्यक निर्माण :-

सब से अधिक ये अपराध हर सरकार ने किया है और करती जा रही हैं। सरकारी विभाग के पास कर्मचारी के आवास और दफ्तर को बहुत जगह हुआ करती थी जिस का काफी हिस्सा खुला भी रखते थे। आपने देखा होगा सरकारी भवन और नगरपरिषद या नगरपालिका के दफ्तर कितने खुले हुआ करते थे। आमदनी बढ़ाने को या आधुनिक बनाने को खाली जगह को निर्माण कर लिया गया। आप के लिए नियम हैं सरकारी विभाग को अपने ही नियम तोड़ने से कोई नहीं रोक सकता है। कहने को भारत गरीब देश है और अभी भी करोड़ों लोगों के पास घर नहीं हैं जबकि सरकार के पास हर गांव हर शहर में इतने भवन और इमारतें बनी हुई हैं जिनका उपयोग भी शायद कभी ही किया जाता है। कई देशों में सरकारी इमारतों को बेघर लोगों को रात को ठहरने को उपलब्ध करवाने का चलन है। लेकिन हमारे देश में कोई सरकारी किसी भवन या इमारत को उपयोग करना चाहे तो अधिकारी आसानी से अनुमति नहीं देते मगर खुद उनको कोई आयोजन करना होता है तो जनता के पार्क से लेकर सड़क तक उनके आधीन होते हैं। सरकारी अधिकारियों को बड़े बड़े बंगले और तमाम सुविधाओं के साथ उनकी कॉलोनी की हरियाली को पानी की सप्लाई पहल के आधार पर होती है। संविधान का सबको समानता का अधिकार अधिकारी नेता सत्ताधारी अपने बड़े बड़े बंगलों में रहने से उपहास बनाते हैं।

नदियों पहाड़ों की सुरक्षा :-

पानी मिलता है पहाड़ों से बर्फ पिघलने से और नदियों से कितनी तरह से , झरने बरसाती नदी नाले कुदरत ने हमेशा से उनकी स्वछता को बरकरार रखने का उपाय किया हुआ है। हमने कभी घूमने फिरने की कारोबारी तरीके से आर्थिक फायदे की खातिर उनकी सुरक्षा को दांव पर लगाया है। कहीं पहाड़ को काटकर निर्माण करने को कहीं धार्मिकता को लेकर नदियों को नुकसान पहुंचाया तो कभी नदी की राह पर बहाव को अपनी सुविधा से बदलने का काम छेड़ छाड़ की तो जगह जगह अपनी गंदगी नदी में डालकर उसको गंदा नाला बना दिया है। तथाकथित आधुनिक विकास करते हुए हमने विनाश ही किया है। समाज और सरकार की उपेक्षा और सीमा से अधिक मनमानी व लापरवाही का नतीजा है कि आज हम उस दशा को पहुंचे हैं जहां हमें अपने तौर तरीके बदलने की ज़रूरत है मगर हमने आदत बना ली है मर्ज़ी से उपयोग करने की कुदरत की हर चीज़ को जिसे छोड़ना मुश्किल है और नहीं छोड़ेंगे तो प्यास सामने साफ दिख रही है।

पानी पर सभी का हक :-

सरकार अपने पर जिस तरह बेतहाशा धन साधन सुख सुविधा पाने और ऐशो आराम पर खर्च करने को अनुचित नहीं समझती जबकि जिस देश में भूख गरीबी हो एक एक नेता को इतना सब मिलना गुनाह समझा जाना चाहिए क्योंकि ये देश के राजा या शासक मालिक नहीं जनसेवक हैं। पानी भी उनको हिस्से से बढ़कर मिलना अमानवीय आपराधिक कार्य है। राजनेताओं को किसी भी बात पर वोटों की राजनीति करने में कोई संकोच नहीं होता है। पानी कुदरत का उपहार है अपने उसको भी बांटने का काम किया है और सब जानते हैं कैसे राजनेता अपनी ज़मीन पर खेती की सिंचाई या औद्योगिक उपयोग को मनमाने तरीके से पानी लेते नहीं छीनते हैं।

 शबाब ललित की ग़ज़ल है :-

अन-गिनत शादाब जिस्मों की जवानी पी गया
वो समुंदर कितने दरियाओं का पानी पी गया 

नर्म सुब्हें पी गया शामें सुहानी पी गया
हिज्र का मौसम दिलों की शादमानी पी गया 

मेरे अरमानों की फ़सलें इस लिए प्यासी रहीं
एक ज़ालिम था जो कुल बस्ती का पानी पी गया 

ले गए तुम छीन कर अल्फ़ाज़ का अमृत-कलस
मैं वो शिवशंकर था जो ज़हर-ए-मआ'नी पी गया 

दुष्यंत कुमार कहते हैं :-

यहाँ तक आते आते सूख जाती हैं कई नदियां 
मुझे मालूम है पानी कहां ठहरा हुआ होगा।