Monday, 13 May 2019

भगवान की उलझनें बहुत हैं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान की उलझनें बहुत हैं ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

   कभी अपनी खुद की परेशानियों को दरकिनार कर ऊपर वाले की उलझनों पर कोई ध्यान देता तो पता चलता अपनी दुनिया से ज़्यादा परेशान खुद दुनिया बनाने वाला है। हम आप अपने घर कारोबार का हिसाब रखते हुए भी गलती कर जाते हैं मगर भगवान को तो गलती करने की भी अनुमति नहीं है सारी दुनिया का हिसाब किताब बराबर रखना ही रखना पड़ता है। हज़ार नहीं अनगिनत तरह के गणित लगाने होते हैं और कोई सीए नहीं कंप्यूटर नहीं कोई आधुनिक गूगल जैसी सुविधा नहीं ऐप्स का उपयोग नहीं। चलो इक छोटी सी लगने वाली बात को लेकर ही समझते हैं कितना कठिन नहीं लगभग असंभव कार्य है इंसाफ करना। 

                                          पहली उलझन


    पति-पत्नी गठबंधन करते हैं अगले सात जन्म का रिश्ता बनाने की सात कसम खाई जाती हैं। उसके बाद हर पत्नी करवाचौथ का उपवास रखती है अपना सुहाग बना रहे और सदसुहागिन बनकर जीना मरना चाहती है। आपको इस में कोई समस्या नहीं नज़र आई होगी जबकि बहुत कठिन है ऊपर वाले का इतनी सी बात को संभव कर दिखाना। अधिकतर पति आयु ही नहीं में भी बड़े होते हैं इक नियम जैसा बना हुआ है। अब पति की लंबी आयु से पत्नी के सदासुहागिन  के वरदान से पत्नी को पहले जाना होता है जहां छोड़ ऊपर वाले के पास , अगला जन्म उसी को पहले मिलता है और जितने साल पति बाद में अकाल चलाणा करता है अगली बार जन्म लेने में उतना अधिक वक़्त बाद में फिर से जन्म मिलता है। समस्या का समाधान तभी हो सकता है अगर अगली बार पति को महिला पत्नी को पुरुष बनाकर जन्म देने का कार्य किया जाये मगर मामला गड़बड़ है पति-पत्नी फिर वही होने का वादा कर चुके थे। ऐसे में अगले जन्म में पत्नी का जन्म पहले और पति का बाद में होना ज़रूरी है जिस से उलझन पैदा होती है। पत्नी बड़ी पति छोटा समाज को मंज़ूर नहीं होता है। इस बार उपवास रखते समय इस बात पर विचार करना। बारी बारी पत्नी का पति और पति का पत्नी बनाने का उपाय स्वीकार है या नहीं।

                                            दूसरी उलझन 

ऊपर वाला जिसको जैसा बनाता है और जिस काम करने का हुनर देता है कोई उस को पसंद करता नहीं। अब हालत ये है कि लोग अच्छे भले धंधे करते हैं मगर चाहते हैं काश चौकीदार जैसा रुतबा हासिल हो जाए। व्यवस्था बनाने को सरकार भी तय करती है किस काम का क्या बजट होगा किस को कितना वेतन मिलेगा क्या काम कितने समय तक करना होगा और नहीं किया तो कठोर करवाई की जा सकती है। सरकार से हर कोई डरता है मगर ऊपर वाले का भी कोई बजट है और सबको उसकी बात मानकर कार्य करना है बदले में नियमानुसार वेतनादि मिलेगा इस की परवाह कोई नहीं करता है। ऊपर वाला जब आमना सामना होगा तब देखा जाएगा यही सोच जिसकी जो मर्ज़ी करते हैं। ऊपर वाला बेबस है चुप चाप देखता है ये सब अपने सामने घटते हुए।

                                    तीसरी उलझन पागलपन

      शीर्षक पढ़कर अंदाज़ा मत लगाना बात दीवानगी की नहीं है पागलपन की है। पागल कौन है कैसे बताया जाये पागल सभी खुद हैं मगर पागल बनाते हैं औरों को। पागल होने की निशानी यही है कि वो सामने असली दुनिया को नहीं देखता और पागलपन में इक अपनी दुनिया बनाकर उसी को वास्तविकता समझता है। हम लोग वास्तविक समाज से बचकर स्मार्ट फोन की झूठी बनावटी दुनिया में जीते हैं और मनोरंजन को बड़ा मकसद समझते हैं। क्या इसको समझदारी कह सकते हैं या फिर इक पागलपन छाया हुआ है। सबसे पहले उनकी बात करते हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित ही नहीं करते बल्कि जिनको हम सब को असली समाज की तस्वीर दिखानी थी लेकिन वो वास्तविकता से बचते हुए इक काल्पनिक दुनिया को देखते और दिखलाते हैं। टीवी चैनल खबर मनोरंजन के नाम पर जिस दुनिया की बात करते हैं देश की तीन चौथाई आबादी से उसका कोई लेना देना नहीं है। फिल्म टीवी सीरियल जाने किस समाज की कैसी कहानियां और संगीत या शो दिखलाते हैं जो हमारी आस पास की दुनिया से मेल नहीं खाता है। सच नहीं है सब झूठ ही झूठ है मगर इस झूठ के सामान को बेचकर ये टीवी चैनल और फ़िल्मकार अभिनय करने वाले मालामाल हो रहे हैं। अर्थात उनको समाज को सच नहीं दिखाना मार्गदर्शन की तो बात ही क्या बस कमाई करनी है चाहे किसी भी तरह से हो। ऐसा लगता है कुछ लोग जो किसी तरह इक आरामदायक जीवन जी रहे हैं उनको बाकी समाज जो साधनविहीन है को लेकर कोई चिंता नहीं है। क्या अपने ही देश के लोगों के लिए ऐसी उदासीनता उचित है। समझा जाये तो हम पागल बन गये हैं और पागलपन पाकर खुश भी हैं।

                              उलझन की उलझन सबसे बड़ी उलझन 

  अभी तक मेरा भारत महान है ऐसा कहने पर क्यों महान है कोई सवाल नहीं पूछता था। अब महान होने का सबूत मिलने लगा है। प्यार के ढाई अक्षर कौन से हैं नहीं पता झूठ दो अक्षर से बड़ा बन गया है झूठ महान भी है उसकी शान भी है। लोग सत्य की खोज किया करते थे अब कोई झूठ पर शोध किया करता है। इक रेडियो कार्यकर्म हुआ करता था अंधेर नगरी चौपट राजा जिसका न्याय कमाल हुआ करता था। चोर की दाढ़ी में तिनका तलाश करते थे भैंस लाठी वाले की हो जाती थी। गूंगी गुड़िया सबसे अच्छा गाती थी कोयल कौवे से हार जाती थी। शासक का निर्णय आखिरी होता है न्याय अपने भाग्य पर रोता है। कल तक कौन उनसे सवाल करता था खुद वही हाल बेहाल करता था जो कहता सब दोहराते थे उसके संग संग रोते गाते थे। खुद उसने किसी को बुलाया है साक्षात्कार अजब दे दिखाया है। हमने सोचा था जवाब आएगा हैरान हैं सवाल ही बेमिसाल आया है। अपने आम चुराया है किस तरह आम को खाया है ,आपकी जेब खाली है डिजिटल कैमरा आज़माया है जब बना भी था आपके पास था टेक्नोलॉजी पर सितम ढाया है इंटरनेट से पहले नेट चलाया है। काला धन की बात क्या करनी है ब्लैक एंड वाइट को कलर बनाया है। हर किसी को मज़ा आया है ये कौन है जो झूठ का पिटारा लाया है हर झूठ उसका सच कहलाया है। देश क्यों महान था कोई बताने की बात नहीं समझ आती थी ये महानता को घसीट लाया है। क्या है जो नहीं कर दिखाया है उसने भगवान का खोटा सिक्का चलाया है। अपने चार युग सुने थे पांचवां युग लेके आया है ये झूठ का युग बहुत अच्छा है हर कोई इसके सामने अभी बच्चा है। चांद सूरज हवा पानी सब पर चलती उसकी मनमानी। चोर की भी है कोई नानी जो सुनाती है अपनी कहानी। तीर ऐसा कोई चलाता है जो रात को भी दिन बनाता है रास्ते उसके जो भी आता है उसी की दास्तां सुनता सुनाता है ख्वाब देखता नहीं दिखाता है हथेली पर सरसों उगाता है। देश भूखा रह जाता है वो भी बहुत थोड़ा खाता है खाता नहीं खाने पीने की हर बात को हवा में उड़ाता है। ज़िंदगी का साथ उड़ाता चला गया हर फ़िक्र को धुवें में ...........

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