Wednesday, 24 April 2019

अभिनेता अक्षय कुमार की सबसे बेहतरीन कॉमेडी ( हंसना नहीं - रोना मत ) डॉ लोक सेतिया

     अभिनेता अक्षय कुमार की सबसे बेहतरीन कॉमेडी ( व्यंग्य )

                        ( हंसना नहीं - रोना मत ) डॉ लोक सेतिया 

ऑस्कर अवार्ड से भी ऊपर की बात है। अभिनय करना अभिनेता का काम है हेरफेरी करनी भी अच्छी है अदालत में वकालत से लेकर किसी सैनिक का किरदार फिल्मों में करना कमाल की बात नहीं है।  कमाल की बात किसी हंसने हंसाने वाले का रोने रुलाने वाले का साक्षात्कार लेने का किरदार इस तरह निभाना कि असली टीवी अख़बार के खबरची भी पांव पकड़ने लगें। चलो आपकी आपस की बात है सत्ता पर बैठा जो नहीं करवाता थोड़ा है मगर हद की भी हद पार कर दी अपने चुनाव के समय देश के नेता से इतने तीखे सवाल। चलो सवाल जवाब पर चर्चा करते हैं। 

ऐसे समय राजनेता घबराते हैं जाने क्या सवाल बवाल खड़ा कर दे। नायक फिल्म देखी होगी अनिल कपूर नहीं नहीं करते एक दिन का सी एम बनने को राज़ी हो जाते हैं। सपना देखा होगा अक्षय कुमार ने कभी सच उनको कोई चुनौती दे और खतरों के खिलाड़ी खेल दिखला कर खेल ही बदल डालें। देश की कितनी बड़ी समस्या पर इतना सीधा और तीखा सवाल , किसी लड़की ने पूछा है आप आम खाते हैं। कठिन सवाल मगर चेहरे पर पसीना क्या कोई शिकन तक नहीं आराम से आम खाने की तरह मुस्कुराते हुए जवाब देकर दिल जीत लिया। बस और देखना मुश्किल था उठकर चला आया टीवी को चलता छोड़कर। बाकी सदस्य गंभीरता से देख रहे थे मैं जल्दी भावुक हो जाता हूं दर्द भरा गीत सुनते आंखें भीग जाती हैं। सबके सामने रोना अच्छी बात नहीं है अलग आकर समझता रहा ये क्या हो रहा है भाई ये क्या हो रहा है। 

साक्षात्कार का आखिरी हिस्सा देखना पड़ा बुलावा आने पर , पत्नी की आवाज़ थी किधर चले गये अकेली छोड़कर। ये इल्ज़ाम भी हमारे सर नहीं कभी नहीं , चला गया वापस। अगला सवाल सवाल नहीं था कुछ और था , अक्षय कुमार कह रहे थे मुझे लगता है आपको सन्यासी होने की चाहत रही होगी। सच लगा उनकी दिल की धड़कन सुनाई देने लगी थी। कहीं झूठ मूठ को ही राजनीति से सन्यास लेने की बात आई और कलेजा मुंह को आने लगा। बच्चे की जान लोगे क्या , अक्षय कुमार का रटा रटाया डॉयलॉग याद आया। 

जितने भी वक़्त का साक्षात्कार रहा हो ऑस्कर का दावेदार बनाने की हैसियत रखता है। जब चुनाव के समय आम खाने की बात हो तो कोई गुठलियां नहीं गिनता है। अब आम भी पेड़ पर पके हुए हों तो खाने का लुत्फ़ और है। पिछली बार पड़ोसी देश से आम का उपहार मिला था उसका स्वाद भूला नहीं कौन जाने इस बार किसकी शपथ की बात हो और कौन आम भेजने की परंपरा को याद रखता है रस्म निभाई जाती है या भुलाई जाती है। बात कुछ ख़ास नहीं है बात इतनी सी है बात ही बात से बात बनाई जाती है। अक्षय कुमार की बात बन गई हो उम्मीद की जा सकती है।

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