Saturday, 6 April 2019

बुरा होता है भला होना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     बुरा होता है भला होना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

        अच्छे होने में बुरा क्या है ये समझना समझाना चाहता हूं।  अच्छी सूरत भी क्या बुरी शय है , जिसने डाली बुरी नज़र डाली। जिनकी पत्नी बेहद खूबसूरत होती है उनके चेहरे पर हमेशा इक ख़ौफ़ छाया रहता है। इक उपन्यासकार दत्त भारती लिखते थे जिसकी पत्नी की सुर्खी का रंग जितना लाल होगा उसके पति के चेहरे का रंग उतना पीला होगा। अमीरी भी इक अभिशाप होती है हर किसी की नज़र लगने का डर होता है। बात इतनी नहीं है इक धर्म की कथा बताती है जिसकी लोग बुराई करते हैं उसके पाप कम होते जाते हैं इसलिए किसी दुश्मन की नहीं बुराई अपनों की करनी चाहिए। नेताजी को समझाओ कितनी बुराई औरों की करते हैं अपनों को देखते तो शर्मिंदा हो जाते। मुझे अपने बुरा होने या बुरा समझे जाने से कोई परेशानी नहीं है।  

  मैं हमेशा से जनता था मुझ जैसे लोग किसी को भी पसंद नहीं आ सकते हैं। आज ऐसा कमेंट पहली बार किसी दोस्त का पढ़ने को मिला , अच्छी पोस्ट कम पसंद की जाती हैं। उनको नहीं पता उनका ये एक कमेंट कितना महत्व रखता है दिल से धन्यवाद आपका दोस्त। ये पोस्ट आपकी दोस्ती के नाम लिखना उचित लगा। 
यूं इक लिखने वाले दोस्त ने पहले भी बताया था आपकी पोस्ट पर कमेंट लिखते लोग कतराते हैं कि कहीं उनको सरकार विरोधी नहीं समझा जाने लगे। सच किसी का पक्ष लेता है न ही विरोध करता है सच केवल वास्तविकता बताता है बिना भेदभाव किये कौन अपना है कौन बेगाना है। जिस दिन सोच समझ कर गणित लगाकर फायदा नुकसान देख लिखने की ज़रूरत हुई लिखना छोड़ देना होगा। इक बात से कितने फ़साने याद आये हैं नये दोस्त कुछ दुश्मन पुराने याद आये हैं। हमने हर रंग के फूल अपने आंगन में सजाये हैं कागज़ के फूल कभी नहीं हमको भाये हैं। 

          किसी एक की बात नहीं है बहुत बार बहुत लोग पहले खुद किसी की बात बताया करते फिर कहते भाई ये लिखना मत आपस की बात है। उनको पता होता है मेरी आदत किसी की व्यक्तिगत आलोचना नहीं है और किसी का विरोध करना मेरा सवभाव नहीं है झूठ को सच कहना नहीं आता है। मेरी रचनाओं में सभी किरदार जीवन से जुड़े हुए हैं मगर कोई नहीं समझ सकता क्या किस को लेकर अनुभव किया है। कई साल पहले की बात है इक अख़बार की कोई बात उचित नहीं लगी तो उसी पर इक ग़ज़ल लिखी और सबसे पहले उसी अख़बार को भेज भी दी जो बड़े अच्छे सलीके से छपी भी। ग़ज़ल है :-

               इक आईना उनको भी हम दे आये , हम लोगों की जो तस्वीर बनाते हैं। 

     मुझे लगता था कोई चाहता है जिस बात की चर्चा हो उसको लेकर कहता है राज़ की बात है किसी को नहीं बतानी। भाई राज़ अपने पास रखते क्यों फाश किया है इरादा राज़ को सरेआम करने का है। मगर इक बात नहीं समझते लोग कि मुझ जैसे नासमझ लोग भी इतना तो समझते ही हैं और जब कोई मेरे लिखने की झूठी तारीफ करते हैं पता चलता है। आजकल भी कई लोग कहते हैं मिलने पर आपकी कलम कमाल लिखती है मगर नहीं सवाल करता क्या पढ़ा जो अच्छा लगा क्यंकि मालूम है उनका साहित्य से कोई नाता नहीं है और वास्तव में उन्हें खबर नहीं कि मैं लिखता क्या हूं। क्लिनिक पर कोई अलमारी में साहित्य की किताबों को देख कहता है क्या पढ़ने को हैं अब क्या समझाया जाये लोग किताबों को घर की सजावट को भी उपयोग करते हैं दिखाने को मगर मेरे पास थोड़ी गिनती की किताबें हैं पढ़ता हूं जब भी मन चाहता है बार बार। कोई मांगता है तो देना संभव नहीं क्योंकि फिर वापस मिलने की बात कठिन लगती है। 

        जीवन भर यही समझा है हर कोई जब किसी को अच्छा आदमी बताता है तो इक लहज़ा तंज का छुपा रहता है। जो बात कही नहीं जाती वो होती है दुनियादारी नहीं समझता इस से फासला रखना ठीक है। जिन को लोग भला इंसान कहते हैं वो हमेशा अकेला नज़र आता है कोई उसके साथ चलना नहीं चाहता कुछ कदम भी। शोहरत नाम की और लोग पसंद करें इसकी चिंता कभी नहीं की है फिर भी लोग समझते हैं हर किसी को नाम की चाहत होती है। सच कहा जाये तो अपना नाम बदनाम अधिक है जिसने कभी मुझे पढ़ा नहीं वह भी मेरे लेखन पर अधिकार पूर्वक राय दिया करते हैं। किसी को समझना क्या इतना सहज हो सकता है मैं खुद अपने आप को नहीं समझ पाता ठीक से और जो लोग खुद से अजनबी हैं मुझे समझने की बात तो क्या मुझी को आकर समझाते हैं कि आप क्या हैं कौन हैं। मुझसे अधिक मुझे कौन जान सकता है , ऐसा फ़िल्मी डायलॉग है सफर फिल्म का नायक कहता है मैं तुम्हें तुम से बेहतर जानता हूं और नायिका जवाब देती है मेरी खुशनसीबी है। बेशक इतना प्यार कोई किसी से करेगा तो उसको उससे बढ़कर समझेगा भी। मगर कब ऐसा वास्तविक जीवन में होता है। यहां हर कोई सोशल मीडिया पर इसी बात का आलाप लगाए है कि कोई मुझे समझता ही नहीं। नेताजी को भी लगता है लोग जानते हैं पर समझते नहीं उनकी असलियत कुछ और है। समझदार को इशारा बहुत है हम झूठ को झूठ कहने पर बुरा मानते हैं क्योंकि हमने सीखा है काने को काना नहीं एक आंख से देखने वाला कहना चाहिए। अंधों में काना राजा होता है अंधे को अंधेरे में कहा जाता है बहुत दूर की सूझती है। 

        अभी तक मुझे खुद नहीं समझ आया जो लिखा कितना सार्थक विषय है। बात निकली है तो किधर को पहुंचती है नहीं पता होता। ये कलम भी अब मनमानी करती है लिखना नहीं जो लिखवाती है , कहते हैं आजकल कलम लिखती नहीं कोई सरकार है जो लिखवाती है। उनकी कलम सभी को भाती है जो झूठ को सच का मसीहा बतलाती है राग दरबारी की कला नहीं सबको आती है। अपनी कलम अभी भी ऐसा नहीं करती शर्माती है लाज खाती है। दिया है बुझी हुई बाती है तेल महंगा है दिल जलाती है।

No comments: