Wednesday, 5 December 2018

इक बेनाम चिट्ठी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         इक बेनाम चिट्ठी ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    किताब लाया था पुराना इतिहास समझने को मगर किताब में इक चिट्ठी संभाल कर रखी हुई मिल गई है। बाहर लिफ़ाफ़े पर कोई पता नहीं लिखा किसने किसको लिखी कब लिखी  क्यों लिखी। मुनासिब तो नहीं मगर ये सोचकर कि शायद किसी की ज़रूरी बात नहीं लिखी हो खोल कर पढ़नी पड़ी ताकि जिस किसी के नाम लिखी हो उस तलक पहुंचा दी जाये। लिखा हुआ है ध्यान से पढ़ना और समझाना किसने किसके नाम लिखी है और हो सके तो मुझे उसका नाम पता बताना या उसी को कहना आपके नाम की चिट्ठी रखी है ले ले आकर।
       .................  आपका  नाम तो मन आत्मा पर लिखा है पल पल याद करती हूं मगर लिखना उचित नहीं आपके आदर की बात है आपस की बात है। सिंहासन पर बैठ कर भी मुझे भूले नहीं होगे जाने क्यों दिल कहता है कोई विवशता रही होगी मुझे अकेली को बेसहारा बेबस बिना कोई अपराध बतलाये छोड़ कर जाने की। पता चला महिलाओं की इधर बहुत चिंता होने लगी है शायद मुझे भी नारी होने की सज़ा से मुक्ति मिल जाये आपके राज में। ये मत समझना आपके इतने बड़े महल में दासी बनकर भी रहना चाहती हूं ऐसा कहूंगी। राजा की रानी बनने का ख्वाब नहीं देखती हूं और अब साथ आकर रहने का तो सवाल ही नहीं है। आपको पास बुलाने की भी बात नहीं है बात केवल न्याय की है इंसाफ की है। अपनी गलती पत्नी को इस तरह बीच अधर में छोड़ने की गलती स्वीकार करनी तो चाहिए। औरों को तलाक देने की चिंता है खुद किस खातिर त्याग दिया था कोई कारण तो बताओ मुझे भी। समाज पुरुष से सवाल नहीं करता है नारी पर लांछन लगाते हैं अग्नि परीक्षा लेने के बाद भी शक बाकी रहता है।
               कई जगहों पर जाते रहते हो कभी अयोध्या की खबर ली। राम को बड़ा होने दो शासन करने दो बहलाओ मत बच्चा मानकर अब तो समझने लगे हैं भगवान भी कलयुगी राजनीति को। राम का नाम ज़ुबान पर लाने से पहले मर्यादा की बात याद रखना और राम मन में रहते हैं मंदिरों में नहीं। राम के नाम पर देश के कानून संविधान की धज्जियां उड़ाने वाले किसी और के भक्त होंगे। सत्ता हासिल करना किसी काम का नहीं होता अगर शासक बनकर देश जनता की सेवा करने की जगह खुद को महान बताने का कार्य करते हुई समय व्यतीत कर दिया। बड़े बढ़ाई न करें बड़े न बोलें बोल , रहिमन हीरा कब कहे लाख टका मेरा मोल। देश की जनता को नासमझ मत समझना हीरे और पत्थर को पहचानती है। बड़ी बड़ी बातें करने से कोई बड़ा बन नहीं जाता है पहाड़ पर खड़े हो दूर से नज़र आते रहते हो और भी बौने लगते हो। जिनको छोटा बनाने की बात करते हो उनको हंसी आती होगी उनके बाद उनकी जगह कोई ऐसा भी उनकी जगह आया है देख कर।
      ये भारत देश है अहिंसा का पुजारी है प्यार मुहब्बत और भाईचारे की राह दुनिया को दिखलाता रहा है। यहां स्वार्थी अहंकारी और ताकत से राज करने वालों को कोई आदर से नहीं देखता है। कथनी और और वास्तविक जीवन में आचरण और ऐसे व्यक्ति से दूर रहना अच्छा है। महिला हूं इस से बढ़कर कुछ नहीं कह सकती हूं मगर शायद अभी भी मेरे साथ किये अन्याय की बात को स्वीकार करने का साहस जिस में नहीं उस से कोई अपेक्षा रखना फज़ूल है। मेरी कहानी में आपका कोई वजूद नहीं है मगर आपके धर्म में मेरे बिना आपका कोई भी कर्म अधूरा समझा जाता है। राम को भी यज्ञ करने को पत्नी सीता का सोने का पुतला बनवाना पड़ा था आपके बस में तो वो भी नहीं शायद। मुझे सोने की चाहत भी नहीं कभी सोने का हिरण मांगा भी नहीं क्योंकि जानती हूं ये छल होता है राजनीति का या अधर्म का। देश की जनता को भी समझ आ चुका है कि आपकी सोने के हिरण लाने की बात का वास्तविकता क्या है।
          जाने ये कैसी देशभक्ति है जिस में सत्ता भगवान लगती है और भगवान सत्ता की सीढ़ी लगते हैं। हर बात की सीमा होती है अपने ही घर को आग लगाने वाले समझते हैं खुद बच जाएंगे। सच से इतना डर लगता है कि झूठ की शरण जाने में भी संकोच नहीं है। दावे करते हैं अपराधी पकड़े हैं गुनहगार को सज़ा मिलेगी जबकि वास्तविकता और ही है। चोर मचाये शोर क्या वास्तव में चौकीदार ही चोर साबित होगा दिल धड़कता है ऐसा हुआ तो कयामत होगी। लोग भरोसे शब्द का उपयोग करने से घबराने लगे हैं अब किस पर यकीन करे कोई। झूठ को इतना बार बार बोलने का कीर्तिमान किस के नाम होगा सब पूछते हैं क्या सच में झूठ बोलने से पाप लगने की बात सही है अगर है तो कितने झूठ बोलने पर कितनी सज़ा देते हैं भगवान। कम से कम भगवान के मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे को तो झूठ से अलग रखते। धर्म की राजनीति से आगे क्या झूठ को भी तख्त पर बिठाने का इरादा है। साजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है।

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