Sunday, 30 December 2018

साल नया है लोग पुराने हैं ( बात वक़्त की ) डॉ लोक सेतिया

    साल नया है लोग पुराने हैं ( बात वक़्त की ) डॉ लोक सेतिया

       एक दिन कुछ घंटे बाकी हैं फिर साल बदल जाएगा तारीख बदलती रहेगी मगर शायद हम वही पुराने ही बने रहेंगे। कुछ पुरानी चीज़ें अच्छी होती हैं जिनको सहेज कर संभाल कर सुरक्षित रखना अच्छी बात है लेकिन कब तक पुराना कूड़ा कर्कट जमा रखेंगे। फटे पुराने चीथड़े पहना हिंदुस्तान दुष्यंत कुमार को मिला था आज भी वही का वही है चलो उनके कुछ शेर दोहराते हैं।
ख़ास सड़कें बंद हैं तब से मरम्मत के लिए , ये हमारे वक़्त की सबसे सही पहचान है।
कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए , मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिंदुस्तान है।
       अभी किसी ने इक वीडियो भेजा किसी देश के लोग झूठे वादे करने वाले नेताओं को उठाकर कूड़ेदान में फेंक रहे थे वो इसी काबिल थे। हमने भी कितना कूड़ा सभी राजनीतिक दलों में ढेर लगा रखा हुआ है उसको साफ करना है। इतनी गंदगी लोकशाही के गंभीर रूप से बीमार किये हुए है। कोई राजनीतिक दल खुद अपने घर की गंदगी को बाहर नहीं फेंकने वाला उनकी सड़ी गली विरासत को हमीं को मिटाना होगा और लोकशाही की आड़ में बहुमत के नाम पर किसी का शासन जो जनता को गुलाम समझता है खत्म करना होगा। जिनको संविधान की शपथ की लाज नहीं और हमारे अधिकार और न्याय भी हमको देना नहीं चाहते उनकी जगह संसद विधानसभाओं में नहीं कहीं किसी कूड़ेदान में होनी चाहिए। सड़ी गली व्यवस्था को कब तक ढोते रहेंगे हम सभी। जो विधायक या संसद जनता के लिए नहीं अपने दल या किसी नेता के लिए निष्ठा रखता है और खुद किसी दल और नेता का बंधक बनकर रहता है अपनी बात कहने से डरता है उस से किसी को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है। चाटुकारिता देश की आज़ादी को खतरा है और ऐसे लोग स्वार्थ की खातिर समाज को दरकिनार करने वाले तानाशाही को बुलाते हैं। ये जो इश्तिहार हैं जिनमें नेताओं की तस्वीरों के साथ लिखा हुआ है क्या क्या हुआ है उनको लगवाने का अर्थ ही है कि जनता को वास्तव में वो दिखाई देता नहीं है। झूठ बोलने को सभाएं करना लोगों को किसी भी तरह लाना भीड़ जुटाने को केवल भाषण देने को उसकी जगह अब सरकार को सांसद विधायक को खुद लोगों के सामने जाकर जनता के सवाल सुन उनको जवाब देने चाहिएं। मालिक देश की जनता है और आप उसी के साथ व्यवहार करते हैं गुलामों बंदी कैदियों की तरह ये संविधान का अपमान है। पूछने को बेहद आसान सवाल हैं ये कुछ मगर इनके जवाब आसान नहीं देना किसी नेता और सरकार के लिए। मुख्य सवाल ये हैं।
                                 चांद पर जाना अंतरिक्ष की उड़ान से पहले देश की जनता को साफ़ पीने का पानी भी उपलब्ध नहीं है तो कैसा विकास कैसा भविष्य है। कौन कौन सा राक्षस है जो करोड़ों के हिस्से का पानी पीता है करोड़ों के हिस्से की रोटी अकेला खा जाता है। जब देश में अनाज बहुत है तो कोई भी भूखा क्यों है। आपने आलीशान भवन बना लिए अपने लिए और तमाम सुविधाएं जमा कर लीं हैं मगर करोड़ों लोग खुले आसमान में सर्द रातें और तपती लू में बला की गर्मी में जीते हैं उनके हिस्से की रौशनी किस ने छीन ली है। अमीर और गरीब के बीच की खाई की तरह वीवीआईपी और आम आदमी के बीच इतना अंतर का अर्थ क्या यही नहीं है कि हमारे पास कुछ बचता नहीं क्योंकि आपकी अधिक हासिल करने की लालच की कोई सीमा ही नहीं है। जिस देश में शिक्षा भी दो तरह की हो इक अमीर बच्चों की इक गरीब बच्चों की उस में समानता की बात इक छल के सिवा क्या है। किसी को भी शिक्षा स्वास्थ्य के नाम पर ही नहीं किसी भी व्यवसाय के नाम पर उचित लाभ से बढ़कर लूट का अधिकार क्यों होना चाहिए। कारोबार का अर्थ मुनाफाखोरी नहीं हो सकता है। बहुत मुश्किल नहीं है अगर किसी को भी सीमा से अधिक की अनुमति नहीं हो तो जिनके पास नहीं उनको अपने आप मिलने की राह बन जाएगी , अर्थव्यवस्था का नियम है। कोई भी कितने घर बना सकता है कितने साधन जुटा सकता है कोई हद हो तभी बाकी की खातिर बचेगा कुछ। अगर ताकतवर और धनवान के पास ही जितना चाहे हासिल करने की छूट होगी तो हज़ारों साल तक व्यवस्था बदलेगी नहीं। छीनने की इजाज़त किसी को नहीं होनी चाहिए और शुरुआत सरकार से ही की जानी चाहिए। बंगले महल किस के लिए जो सेवक हैं और जो मालिक है जनता उसके लिए भीख मांगने का अधिकार क्या इसी को आज़ादी कहते हैं। जब तक सत्ताधारी नेता बेतहाशा धन अपने ऐशो आराम पर खर्च करते रहेंगे और सरकारी अधिकारी कर्तव्य निभाना भूल कर राजनेताओं की जीहज़ूरी कर अपने घर भरते रहेंगे संविधान की भावना को छलनी किया जाता रहेगा।  ऐसी तमाम बातें हैं कोई सीमा नहीं है मगर संक्षेप में समझ लिया तो अब खुद हम भी अपने खुद के आचरण पर ध्यान देकर पुराने रंग ढंग बदलने चाहिएं।
                                 भगवान और मंदिर की नहीं इंसान की बात हो वास्तविक धर्म ईमान की बात हो। सच की बात हो निस्वार्थ भावना से अपना कार्य करने की बात हो। स्वार्थ में अंधे होकर उचित अनुचित का भेद भुलाने की बात नहीं हो और निडर होकर जीने का सलीका हो। अपने मतलब को दरकिनार कर देश और समाज की चिंता हो और भाईचारा बढ़ाने और सब को समानता की बात का महत्व समझना होगा। अपने खुद से ऊपर उठकर सोचना होगा समाज की भलाई को आगे रखकर। चलो नये साल से हम भी नया करने की बात करते हैं और जो जो भी पुरानी बातें इस में अड़चन पैदा करती हैं आज साल के आखिर में उनको त्याग देने का भी संकल्प लेना होगा।

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