Friday, 21 December 2018

बाबुल के घर से ससुराल तक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     बाबुल के घर से ससुराल तक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

             मुझे सेवा का अवसर देकर देखो तब पता चलेगा अभी तक आपको दिल से चाहने वाला कोई नहीं मिला। बड़े घर से आई बहु सर चढ़कर रहती है मैंने गरीबी देखी है चाय बनाना आता है और क्या चाहिए। गर्म चाय की प्याली भी इतनी महंगी होगी किस को मालूम था। चाय का वादा खुश करने तक था पीना नसीब नहीं हुआ। मगर घर आते ही बर्तन से बर्तन टकराने की बात ही नहीं थाली को ठोकर लगाने का अपशकुन होने लगा। दो दिन बाद तेवर बदले हुए थे , ये देश कोई घर है या सराय है जो भी लोग आते रहे सब ने सब उल्टा सीधा ही किया है अब मुझे ही सब को तोड़ फोड़ सुधारना होगा। नई बहु का फरमान जारी हुआ और सब अपने हिसाब से करने नहीं करवाने को हुक्म दिया जाने लगा। नया बनाना है की बात की जगह जो भी पहले से है उसे बर्बाद करना शुरू कर दिया। समझने में भूल हुई मगर कहते हैं कुछ दिन में सब को समझने लगेगी। चलो माना आजकल बहु राज करने को आती है सास ससुर की सेवा या ननद देवर से निभाने की बात सोच कर नहीं आती फिर भी घर आते ही सब उल्ट पुल्ट करने की जल्दबाज़ी करना सही नहीं होता है। पहले आकर खुद दिल जीतने और अपना बनाने को ख़ामोशी से घर बार की बात समझनी पड़ती है। फिर धीरे धीरे सब को अपनी तरफ करना पड़ता है और जो बदलना हो सबको सहमत कर करना पड़ता है। कभी कभी कुछ दिन का लाड प्यार मिलते ही अगर खुद को सबसे बढ़कर समझने लगती है नई नवेली बहु तो नासमझी में ऐसा आचरण करने लगती है कि जो ख़ुशी से चुनकर पसंद कर लाये थे जल्दी ही पछताने लगते हैं। बंधन को अधिक कसने से भी बंधन में दरार आने का खतरा रहता है। 
          सरकार वैसे भी स्थाई नहीं होती है और पांच साल बाद फिर अवसर होता है रखना है या हटाना है चौकीदार को। किया धरा कुछ नहीं और नाज़ नखरे सज धज पर जितना मनमर्ज़ी उड़ाते रहे और बार बार दोहराते रहे अभी तक जिस जिस को घर की मालकिन बनाया किसी ने भी कुछ भी किया। बाप दादा सब निक्क्मे नकारा लोग थे बस मैं अकेली बाहरवीं पास मिली आपको नसीब से अब सब बदलना है मुझे मेरे हिसाब से। घर की चाबियां हाथ आईं तो मान लिया पुरखों ने जितना कमाया जमा किया है सब जैसे दिल करे खर्च करने का अधिकार है। घर का सामान बदलने तक भी सब चुप रहे जब घर के सदस्य ही बदलने लगे तो खटका हुआ जैसे कोई बहु ससुराल आकर मायके का आधिपत्य कायम करने को बेशर्मी पर उतर आई हो। कभी तो उसे  लेकर आने वाले देश की जनता को सरकार बनाने वालों को दिखाई भी देता सब तोड़ा फोड़ा है या कुछ खुद नया बनाया भी है। चार साल तक नखरे कौन झेलता है आखिर हुआ वही जिसका डर था। आखिर कोई कब तक सुनता रहेगा हर किसी की बुराई और खुद अपने बढ़ाई वो भी जब सामने कुछ भी अच्छा किया नज़र नहीं आ रहा हो। मगर नखरे अभी भी खुद को सबसे अच्छा मनवाने की ज़िद पर अड़ रही नई नवेली दुल्हन जैसे। चार दिन और चार साल में बहुत अंतर होता है अब सज धज से नहीं आरती भजन नाच गाना नहीं वास्तविक काम काज को देखते हैं। काम की न काज की ढाई मन अनाज की।
          क्या क्या ख्वाब दिखलाए थे सच कोई भी नहीं हुआ , अपनी मर्ज़ी और मनमानी से जिस जिस को अपने ख़ास लोगों को लेकर आए सब छोड़ कर जाने लगे हैं।  कोई भी अपनी सीमा से बढ़कर आपकी अनुचित बातों को उचित साबित कर खुद की विश्वसनीयता नहीं खोना चाहता है। झूठ की सीमा होती है झूठ कहकर अपने मतलब का निर्णय हासिल करना झूठ खुलते ही अदालत भी खुद को ठगी महसूस करती है। अब झूठ के सहारे कब तक टिक सकता है कोई। मगर ऐसी मुसीबत आसानी से जान नहीं छोड़ती है अभी भी उसे लगता है हर कोई खुश है उसने जो भी किया भले सब परेशान हैं मगर कोई जान बूझकर तो नहीं किया परेशान। इस बार की गलती फिर नहीं दोहराने का भी वादा नहीं करना क्योंकि आदत बदलती नहीं इतनी आसानी से। हर जगह हालत यही है मालकिन बनते ही सर पर सवार हो जाते हैं पहले लगता है भोले मासूम चेहरे से प्यार हुआ था क्या कोई और था या नकाब लगाई हुई थी। अच्छी बहु मिलती होगी किसी ज़माने में , आजकल जो भी नई बहु आकर सास ननद की बात क्या जिस के संग ब्याही उसी को चैन से रहने दे तो बड़ी बात है। बाबुल के घर भले कुछ नहीं देखा हो ससुराल में सब कुछ होना ज़रूरी है। मामला पहले दिन से शुरू हो जाता है हनीमून विदेश में पहली शर्त है। सारी दुनिया घूम कर भी घर में पैर टिकता नहीं है। लाज का घूंघट पहना ही नहीं तो लाज कैसी। कुछ भी समझाओ तो मायके संदेश भेजती है और उधर से मासूम बेटी पर रहम नहीं करते सुनाई देता है। जो पैसे वाला पिता है विवाह में कितना खर्च किया याद दिलवाने लगता है बेशक इस बात का आज की बात से कोई सरोकार नहीं हो। ससुराल वाले कहते रहें हमने तो दहेज मांगा नहीं उल्टा मना किया था महंगी गाड़ी मत दो फिर भी आप अपनी शान पर अड़े हुए थे। लगता है दामाद नहीं बनाया किसी को खरीदा है बेटी का गुलाम बनकर रहने को। बाबुल से घर से आंसू बहाती चली कन्या ससुराल पहुंच बहु का रूप धारण करते ही पति से लेकर सास ससुर तक को रुलाने लगती है और सब को बुरा साबित करने लगती है। सरकार बनाने के बाद चुनावी वादे छोड़ पिछली सरकार की और विपक्षी दल के नेताओं की बुराइयां गिनवाने लगते हैं आजकल खुद अच्छा कर दिखाने की बात को दरकिनार कर के।

              


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