Sunday, 9 December 2018

बेवफ़ाई भी नहीं किस्मत में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   बेवफ़ाई भी नहीं किस्मत में ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

      हर कोई बात करता है वफ़ा नहीं मिली। हम से पूछो जो बेवफ़ाई को भी तरसते हैं। कोई मिल जाता फिर चाहे वफ़ा के बदले वफ़ा नहीं जफ़ा ही मिलती हम उसे भी खुशनसीबी समझते और बेवफ़ाई का गिला भी नहीं करते। मगर काश कोई होता मुहब्बत इश्क़ प्यार का स्वाद पता चलता और कुछ नहीं तो तजुर्बा ही हासिल कर सकते। रोग है दिल का तो क्या हुआ दिल लगाना कोई दिल्लगी की बात तो नहीं है। हर कोई चाहता है कोई दिल को इतना भा जाये कि दिल जिस पर आये बिना उसके रहा ही नहीं जाये। जाने क्यों स्कूल तो क्या कॉलेज की पढ़ाई में भी इस पर कोई विषय ही नहीं था कि मुहब्बत प्यार इश्क़ क्या होता है कैसे होता है किया नहीं जाता। कहानियों में फिल्मों में गीतों में देखते सुनते थे दिल धड़कता है नींद नहीं आती ख्वाब देखते हैं और हसीन सपने सजाते हैं। लोग कहने को कहते थे प्यार खुदा की इबादत है मुहब्बत बिना ज़िंदगी बेकार है लेकिन कभी अख़बार में खबर छपती दो प्यार करने वालों का दुनिया वालों ने क्या बुरा हाल नहीं किया तो लगता दुनिया दुश्मन होती है मुहब्बत की क्यंकि उसकी आदत है जो खुद को हासिल नहीं किसी और को मिले तो जलते हैं। कहते हैं हर किसी को कोई न कोई दुनिया में सब से हसीन सब से अलग लगता है मुझे तो कोई भी लड़की ऐसी नहीं लगी जो बाकी लड़कियों से अलग हो। यकीन नहीं होता तो कुछ बातें बताता हूं जिस पर आप चाहो तो किसी भी लड़की से बात कर सकते हैं सभी की राय एक ही होगी। हर लड़की यही चाहती है कि .......
                           खुद भले कैसी लगती हो उसे चाहने वाला बेहद खूबसूरत और समझदार होने के साथ पैसे वाला भी हो। जो उसको चांद तारे तक तोड़ कर लाकर दे सकता हो और ज़िंदगी भर उसकी हर आरज़ू पूरी करना चाहता हो। उसकी ख़ुशी की खातिर जान देने की बात करता हो और उसे फूलों की रानी बनाकर रखना चाहता हो। खुद कंगाल हो तब भी अपनी महबूबा को महल बना देने का वादा करता हो , सबसे बड़ी बात बड़े बड़े सपने सच करने की कसम खाता हो और कभी झूठ नहीं बोलने की भी बात करता हो। इतना ही नहीं हर लड़की जिस को दिल देती है उस से किसी भी हाल में नाराज़ नहीं होने और जैसे वो चाहती हो उसी तरह जीने को राज़ी होने की शर्त भी जोड़ती है। इस तरह की हज़ार बातों को मनवाने के बावजूद भी कोई मान सकता है कि प्यार मुहब्बत में सैदेबाज़ी नहीं होती है कोई बंधन नहीं शर्त नहीं रखी जाती है। मालूम नहीं लोग किस तरह से अपने लिए कोई आशिक़ या माशूका ढूंढ लेते हैं जो इन सारी बातों पर खरा साबित हो। मुझे तो यही समझ आया कि ये इश्क़ प्यार मुहब्बत राजाओं और रईसों के भी बस की बात नहीं है तो हम जैसे आम लोग इतना कीमती सामान देख सकते हैं हासिल नहीं कर सकते हैं।
                   हमारे समय में प्यार चोरी चोरी किया जाता था और बड़े साहस वाले किया करते थे। कुछ लोगों की बात पता चल जाती थी जब बात बिगड़ जाती और कभी कभी कोई खुद ही अपनी बात बताया करता था दोस्तों को। लेकिन सच तो यही है कि दोनों सूरत में अंजाम एक ही देखते थे। आपको कुछ घटनाओं की बात बताता हूं। इक हॉस्टल में कमरे में साथ रहे को कभी किसी कभी किसी दूसरी से इश्क़ होने का एहसास होता रहता था और आखिर में एक उसके साथ जन्म जन्म का रिश्ता निभाने को तैयार भी हुई थी। साल भर मुलाकात होती रही और अमीर लड़का खूब पैसे उड़ाता भी रहा मगर जब लड़की के घरवालों को पता चला तो जमकर पिटाई कर आशिक़ी का भूत उतारा गया और लड़की की शादी किसी और लड़के से कर दी गई। जी नहीं इसे उनकी कहानी का अंत नहीं समझना आप , घरवालों को इस बारे बताने वाली छोटी बहन बाद में उस से प्यार पींग पर झूलती रही और किसी तरह उस से शादी भी कर ली थी। मगर यहां भी कहानी खत्म नहीं हुई और एक तरफ उसे दूसरे शहर में घर लेकर साथ रखा पति पत्नी बनकर और उधर माता पिता के अनुसार एक और लड़की से शादी कर प्यार और शादी का खेल जारी रखा। अधिक विस्तार में जाने की ज़रूरत नहीं है बस इतना समझ लो प्यार जैसा कुछ भी नहीं था इक रोग था और लाईलाज था।
        इक और साथी की बात और भी अजीब है बेहद भले सवभाव का बहुत सुंदर लड़का था और डॉक्टर बनने वाला था साल भर बाद। शहर के बड़े अधिकारी की लड़की से प्यार हुआ और हॉस्टल के कॉलेज के दोस्त सोच भी नहीं सकते थे वो कोई ऐसा काम भी करता है। हंसमुख दोस्त जब उदास रहने लगा तब मुश्किल से पता चला कि जिस लड़की से मिलने शहर के दूसरे कॉलेज जाता था किसी खूबसूरत लड़की से उसकी सगाई अफ़्सर पिता ने किसी आईएएस लड़के से कर दी थी वो भी खुद लड़की की मर्ज़ी से ही। ये जनाब एक विकल्प थे और बेहतर विकल्प को चुना था लड़की ने। ऐसी तमाम कहानियों से समझ आया कि दिल आने और फ़िदा होने की कोई बात नहीं है बात अवसर पर चौका छक्का जड़ने की होती है। इक ग़ज़ल याद आई उस समय की फिल्म की। ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफान होते हैं। मुहब्बत सबकी महफ़िल में  शमां  बनकर नहीं जलती  , हसीनों की नज़र सब पर छुरी बनकर नहीं चलती। जो हैं तकदीर वाले बस वही क़ुर्बान होते हैं। शमां की बज़्म में आकर ये परवाने समझते हैं , यहीं पर उम्र गुज़रेगी ये दीवाने समझते हैं। मगर इक रात के वो तो फख्त महमान होते हैं। आप समझ गये होंगे हम तमाम लोग केवल किनारे पर बैठ कर लहर देखने वाले ऐसे ही रहते हैं।
                          अभी तलक आपको ये बात नहीं समझ आई होगी कि जब दिल लिया दिया नहीं और कोई तजरुबा ही नहीं तो फिर नसीब की बात कहां से बीच में ले आये हैं। कहने को हमने भी इश्क़ किया है लिखने से जुनून की हद तक मगर लोग बताते हैं कि ग़ज़ल कविता में बगैर आशिक़ी वो बात नहीं आती है। केवल ख्वाब में किसी को महबूबा समझ ग़ज़ल कहना और किसी से चोट खाकर ग़ज़ल कहना दोनों में ज़मीन आसमान का अंतर है। तभी ग़ज़लकार कविता पाठ करने वाले मंच पर बेवफ़ाई की खुलकर बातें किया करते हैं जबकि किसी कहानी में पढ़ा था जिसको चाहते उसकी रुसवाई नहीं कर सकते। तब सोचता हूं लोग जिनकी बेवफ़ाई के चर्चे करते हैं खुद भी वफ़ा निभाते तो कभी ऐसा नहीं करते। बेवफ़ा तो आप भी हैं फिर उनकी बेवफ़ाई की शिकायत किसलिए करते हैं। मुहब्बत करना आता है निभाना नहीं आता वर्ना कोई किसी को चाहता तो उसी की बुराई भला कैसे करता। मेरा इक शेर आखिर में पेश है।

किसी को बेवफ़ा कहना मुझे अच्छा नहीं लगता ,

निभाई थी कभी उसने भी उल्फ़त याद रखते हैं।


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