Sunday, 4 November 2018

मरना भी नहीं सीखा जीना भी नहीं आता ( मनन ) डॉ लोक सेतिया

 मरना भी नहीं सीखा जीना भी नहीं आता ( मनन ) डॉ लोक सेतिया 

   आज अपने ही कुछ शेर और कुछ विचार ज़िंदगी से मौत तक के सफर को समझने के लिए। बचपन था तो ज़िंदगी गले लगाती थी शायद हमसे ही भूल हुई जो उसकी अहमियत जानी ही नहीं। धीरे धीरे दूरियां बढ़ती गईं हमारी ज़िंदगी से दूर हम खुद हुए और इल्ज़ाम देते रहे ज़िंदगी को। आज स्मार्ट फ़ोन पर ज़िंदगी से विडिओ कॉल करते हैं।  सोशल मीडिया पर संदेश भेजते हैं मगर आमने सामने मिलती नहीं ज़िंदगी। इक मतला और इक शेर यूं है।
                  बस मुहब्बत से उसको शिकायत रही , इस ज़माने की ऐसी रिवायत रही।
                  उड़ गई बस धुंआ बन के सिगरेट का , राख सी ज़िंदगी की हिकायत रही।
ज़िंदगी को समझ सके नहीं हम भी और दुनिया ने भी समझाया नहीं इक सबक जो प्यार वाला ज़रूरी था। देर बहुत हो गई तब समझ आया कि जो प्यार करते थे सभी कुछ देकर हमें कहीं जाते रहे। 
और हम बेगानों को अपना बनाने में उम्र गंवाते रहे। इक मतला और इक शेर और ऐसे कहा है। 

                     उसको यूं हैरत से मत देखा करो , ज़िंदगी तो हादिसों का नाम है। 
                 काफ़िले में चल रहे हैं साथ साथ , अपनी अपनी फिर भी तन्हा शाम है।
ये भी कैसी अजीब बात है मौत मांगते हैं सभी मरना चाहते नहीं लोग। मौत को पास जाकर देखते तो पता चलता कितनी प्यारी है। मौत से लोग डरते रहे और मौत का डर दिखाते रहे जबकि।

                 मौत तो दरअसल एक सौगात थी , हर किसी ने उसे हादिसा कह दिया। 
                           शिकवा तक़दीर का करें कैसे , हो खफ़ा मौत तो मरें कैसे।
नहीं सीख पाये जीना हम फिर भी जीते रहे जैसे कोई गुनाह करते रहे। कोई तलाश थी जो अधूरी रही। कुछ शेर कहना चाहता हूं। 

                  मिलने को दुनिया में क्या न मिला , मझधार में नाखुदा न मिला।
                  ढूंढा किताबों में हमने मगर , जीने मरने का फ़लसफ़ा न मिला।
                  मुश्किलों का नाम है ये ज़िंदगी , दर्द का इक जाम है ये ज़िंदगी। 
                  मुस्कुराती सुबह आती है मगर , फीकी फीकी शाम है ये ज़िंदगी। 
                  है कभी फूलों सी कांटों सी कभी , नित नया अंजाम है ये ज़िंदगी। 

शायद तीस साल पहले अपनी वसीयत इक ग़ज़ल की शक्ल में लिखी थी जो मुझे मालूम है नहीं संभव हो सकता। भला दुनिया होने देगी ऐसा कोई किसी की मौत का जश्न मनाये इसे मंज़ूर करे। फिर भी हाज़िर है। 

( जश्न यारो मेरे मरने का मनाया जाये ) मेरी वसीयत

जश्न यारो , मेरे मरने का मनाया जाये ,
बा-अदब अपनों परायों को बुलाया जाये।

इस ख़ुशी में कि मुझे मर के मिली ग़म से निजात ,
जाम हर प्यास के मारे को पिलाया जाये।

वक़्त ए रुखसत मुझे दुनिया से शिकायत ही नहीं ,
कोई शिकवा न कहीं भूल के लाया जाये।

मुझ में ऐसा न था कुछ , मुझको कोई याद करे ,
मैं भी कोई था , न ये याद दिलाया जाये।

दर्दो ग़म , थोड़े से आंसू , बिछोह तन्हाई ,
ये खज़ाना है मेरा , सब को दिखाया जाये।

जो भी चाहे , वही ले ले ये विरासत मेरी ,
इस वसीयत को सरे आम सुनाया जाये।  

अलविदा ज़िंदगी 

और कब तलक मुझे 
रोके रहोगी प्यार से 
जाने भी दो अब तो 
शाम ढलने लगी है। 

न शिकवा न गिला है 
बहुत है जितना मिला है 
थक गया हूं चलते हुए 
खत्म अपना सिलसिला है।
 

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