नवंबर 24, 2018

वह दो खुशनसीब ( वास्तविक घटना ) डॉ लोक सेतिया

      वह दो खुशनसीब ( वास्तविक घटना ) डॉ लोक सेतिया 

    कल सुबह की बात है मुझे मेरी धर्मपत्नी ने आकर बताया कि देखना दो लोग अपने घर के सामने इक साथ बैठे हैं जो बेहद खुश दिखाई देते हैं। आजकल झूठी मुस्कान वाले लोग ही मिलते हैं सच्ची ख़ुशी देखे ज़माना हो गया है। ख़ुशी ऐसी दौलत है जो इधर खो गई है। मैं जाकर मिला उनसे बात की और पूछा भाई आपको ये दौलत मिली किस तरह से , पता चला बचपन के दोस्त हैं और अचानक मुलाकात हो गई है। उनकी बाकी बात बताने से पहले अपनी बात करता हूं ताकि आपको फिर से याद दिलवा दूं दोस्ती मेरे लिए इबादत है ईमान है। आज उनकी बात से फिर उम्मीद जागी है कि अभी भी दुनिया में दोस्ती कायम है और मुझे जिस दोस्त की तलाश है वो ज़रूर मिलेगा किसी दिन। कुछ दिन पहले की घटना याद आई फिर से , पार्क में दो लोग आपस में बहस कर रहे थे एक का कहना था कि तुम मुझे जानते नहीं मैं इस शहर को खरीद सकता हूं और दूसरा कह रहा था तुझे मालूम नहीं मैं कौन हूं तुझे जेल में बंद करवा सकता हूं और ज़मानत भी नहीं होगी। हुआ कुछ भी नहीं लकड़ी की नहीं कागज़ी तलवारों की जंग थी। पता चला एक पत्रकार है जो अख़बार की नौकरी करता है मगर शहर को खरीदने की बात कहता है और दूसरा सेवानिवृत सुरक्षाकर्मी है। अहंकार की दौलत हर किसी के पास है किस बात का अहंकार है कोई नहीं जनता। मगर अब दोस्ती की बात और दोस्ती पर मेरे कुछ शेर और रचनाएं छोटी छोटी। 

जा के किस से कहें हमको क्या चाहिए ,

ज़हर कोई न कोई दवा चाहिए।


और कुछ भी तो हमको तम्मना नहीं ,

सांस लेने को थोड़ी हवा चाहिए।


हाल -ए -दिल आ के पूछे हमारा जो खुद ,

ऐसा भी एक कोई खुदा चाहिए।


अपनों बेगानों से अब तो दिल भर गया ,

एक इंसान इंसान सा चाहिए।


देख कर जिसको मिट जाएं दुनिया के ग़म ,

कोई मासूम सी वो अदा चाहिए।


जब कभी पास जाने लगे प्यार से ,

बस तभी कह दिया फ़ासिला चाहिए।


ज़िंदगी से नहीं और कुछ मांगना ,

दोस्त "तनहा" हमें आपसा चाहिए।

             मेरी निगाह में दोस्त खुदा से बढ़कर है और दोस्त मिल जाये तो दुनिया की सारी दौलत मिल गई है। मुझे दोस्त मिलते रहे और बिछुड़ते रहे हैं और दोस्त बनकर दुश्मनी करने वाले भी मिले हैं मगर फिर भी मेरा इक ख्वाब है कि कहीं कोई एक सच्चा दोस्त है जो मेरी तरह दोस्ती की चाहत रखता है। इक ग़ज़ल है यही सोच कर लिखी थी छह साल पहले जब बीमार होकर अस्पताल में भर्ती था।

जिये जा रहे हैं इसी इक यकीं पर ,

हमारा भी इक दोस्त होगा कहीं पर।


यही काम करता रहा है ज़माना ,

किसी को उठा कर गिराना ज़मीं पर।


गिरे फूल  आंधी में जिन डालियों से  ,

नये फूल आने लगे फिर वहीं पर।


वो खुद रोज़ मिलने को आता रहा है ,

बुलाते रहे कल वो आया नहीं पर।


किसी ने लगाया है काला जो टीका ,

लगा खूबसूरत बहुत उस जबीं पर।


भरोसे का मतलब नहीं जानते जो ,

सभी को रहा है यकीं क्यों उन्हीं पर।


रखा था बचाकर बहुत देर "तनहा" ,

मगर आज दिल आ गया इक हसीं पर।


           इक छोटी सी लघुकथा भी लिखी थी आजकल की हालत को देख कर। पढ़ सकते हैं।

      फुर्सत नहीं ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

बचपन के दोस्त भूल गये थे महानगर में रहते हुए। कभी अगर पुराने मित्र का फोन आ जाता तो हर बार व्यस्त हूं , बाद में बात करना कह कर टाल दिया करते। कहां बड़े शहर के नये दोस्तों के साथ मौज मस्ती , हंसना हंसाना और कहां छोटे शहर के दोस्त की वही पुरानी बातें , बोर करती हैं। लेकिन जिस दिन एक घटना ने बाहर भीतर से तोड़ डाला तब यहां कोई न था जो अपना बन कर बात सुनता और समझता। महानगर के सभी दोस्त कहां खो गये पता ही नहीं चला। तब याद आया बचपन का पुराना वही दोस्त। फोन किया पहली बार खुद उसे अपने दिल का दर्द बांटने के लिये। तब मालूम हुआ कि वो कब का इस दुनिया को अलविदा कह चुका है। पिछली बार जब उसका फोन आने पर व्यस्त हूं कहा था तब उसने जो कहे थे वो शब्द याद आ गये
आज। बहुत उदास हो कर तब उसने इतनी ही बात कही थी "दोस्त शायद जब कभी तुम्हें फुर्सत मिले हमारे लिये तब हम ज़िंदा ही न रहें"। तब सच्चे मित्र को नहीं पहचाना न ही उसकी भावना को समझा , उसका हाल पूछा न उसका दर्द बांटना चाहा तो अब उसको याद कर के आंसू बहाने से क्या हासिल।

                      मैंने पहले भी कई बार बताया है कि मेरा इश्क़ मेरा प्यार मेरा जूनून लिखना है। मैं लिखने से इतना प्यार करता हूं कि बिना लिखे रहना ठीक उसी तरह है जैसे सांस लिए बिना पल भर भी जीना संभव नहीं है। किसी और से मुहब्बत करना मुमकिन नहीं था क्यों प्रेम की गली में कोई दूसरा नहीं समा सकता है। मेरा लेखन उसी अनजान अजनबी दोस्त के नाम है सभी कुछ कविता ग़ज़ल कहानी जो भी है। अब कल जो दो लोग मिले उन दोस्तों की खुशनसीबी की बात बताता हूं।

                         घर का पता ( लघुकथा ) डॉ लोक सेतिया

     राजपाल और वेद यही उनके नाम हैं। गांव के बचपन के सबसे अच्छे दोस्त हैं। कोई दस साल पहले राजपाल गांव से शहर चला आया और वेद उसके पास किराये के कमरे पर दो बार मिलने आया भी। फिर फोन लिया दोनों ने और फोन पर बात करने लगे शादी पहले हो चुकी थी दोनों की ही। राजपाल ने शहर में इक बस्ती में जगह लेकर मकान बना लिया था मगर आजकल लोग घर का पता नहीं लेते देते और फोन नंबर से ही काम चलाते हैं। फोन नंबर था दोनों के पास घर का पता पूछना ध्यान ही नहीं रहा। कई साल पहले राजपाल ने जब फोन नंबर नया लिया जैसा इधर अधिकतर लोग करते हैं तब अधिक पढ़ा लिखा नहीं होने के कारण दोस्त का नंबर सुरक्षित करना भूल गया। और सम्पर्क टूट गया था सालों से मगर राजपाल कुछ कारण से गांव भी नहीं जा सकता था और वेद को याद किया करता था। उसने बताया कि दो दिन पहले उसको लगा कि सस्ती कॉल दर और डाटा के चक्कर में नंबर बदलना उसे बहुत महंगा पड़ा है और इत्तेफाक से अगली सुबह बस के अड्डे पर उसने वेद को बैठे देखा तो लगा जैसे भगवान ने उसकी सुन ली है। आपको ये बात बताने का मकसद ये भी है कि जब भी कोई अपना दूर हो तब उस से फोन नंबर ही नहीं लें दें बल्कि अपना घर का दफ्तर का पता भी बदलने पर लिख कर रखते रहें। फोन नंबर बदलता रहता है कभी पहुंच से बाहर होता है मगर घर मकान का पता होने पर जब दिल चाहे मिलने जा सकते हैं , बुला सकते हैं। मेरे दोस्त डॉ बी डी शर्मा की क्लिनिक पर इक इबारत लिखी रहती थी। दोस्त के घर तक की सड़क कभी लंबी नहीं होती है , स्वागत है।


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