Tuesday, 4 September 2018

सरकार की नज़र है जनता पर ( कठोर धरातल ) डॉ लोक सेतिया

  सरकार की नज़र है जनता पर ( कठोर धरातल ) डॉ लोक सेतिया 

      आज इस तस्वीर को देखकर दिल दहल गया है। बताया गया है ये सूडान में 1993 में आए सूखे और भुखमरी की तस्वीर है। मगर मुझे लगा ये किसी भी देश की सरकार और उस देश की जनता की असलियत को बयां करने को बनाई गई है। गरीब जनता भूख से बेबसी से इक जिस्म नहीं बिना मांस का हड्डियों का ढांचा भर है और सत्ता का गिद्ध उस पर निगाहें लगाए है। शायद इस गिद्ध में भी इतना इंतज़ार करने की समझ है जो सत्ता रुपी गिद्ध में कभी नहीं दिखाई देती है। गिद्ध कौन कहता है कम हो रहे हैं , बढ़ रहे हैं जिधर देखो गिद्ध टकटकी लगाए नौच खाने को व्याकुल हैं। और गिद्ध केवल सरकारी दफ्तरों में ही कुर्सियों पर बैठे हों ऐसा भी नहीं है। समाज में हर तरफ गिद्ध ही गिद्ध हैं जो ज़िंदा इंसानों को ही चबा जाना चाहते हैं उनके मरने तक का इंतज़ार नहीं करते। जिस देश में करोड़ों लोग हर दिन भूखे सोते हैं और बिना किसी छत के आसमान के नीचे सर्द रातें , गर्मी में तपती लू और आंधी तूफान झेलते हैं उस देश की सरकारों को जनता को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध करवाना भी अपना कर्तव्य नहीं लगता , और हर बार झूठा दावा करते हैं कितने साल बाद ये सब नहीं होगा। मगर वही लोग खुद अपने पर बेतहाशा धन बर्बाद करते हैं उसी जनता का जिसे नोच खाने के सिवा और क्या कह सकते हैं। एक आदमी को रहने को महल और उस की देखभाल पर लाखों रूपये खर्च का मतलब कितने हज़ारों की कितने दिन की भूख मिट सकती इतना धन केवल शानो शौकत दिखाने को। नहीं गरीबों से इनको रत्ती भर भी सहानुभूति नहीं है। देश सेवा के नाम पर इक अमानवीय अपराध है जनता के सेवक बनकर उसकी दौलत को यूं उड़ाना। 
                 अभी केरल में आई बाढ़ में कहा गया किसी अरब देश की सहायता स्वीकार नहीं की गई , ये सच है या झूठ या आधा सच मुझे कुछ नहीं कहना। मगर मुझे पूछना है उन सभी धर्म वालों से जिनके पास अंबार लगे हुए हैं वो किस दिन किस के लिए हैं। अगर धर्म के लिए हैं तो देश में इतने लोग गरीब हैं भूखे हैं और शिक्षा स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित हैं क्यों इन सभी को दौलत जमा करनी धर्म लगती है जबकि हर धर्म संचय नहीं करने की शिक्षा देता है और ज़रूरत से अधिक जमा करने को दरिद्रता बताता है। और भी लोग हैं जो दया और समाजसेवा का दम भरते हैं मगर अपने पास हज़ारों करोड़ होने पर भी उनकी हवस कम नहीं होती है और पैसा कमाने में सब कुछ करना उचित समझते हैं। गांधी जी ने ही नहीं पहले भी सभी महान लोगों ने ऐसा कहा है कि दुनिया में सबकी ज़रूरत को बहुत है सब कुछ , मगर किसी की भी हवस पूरी करने को काफी नहीं है। अर्थशास्त्री भी बताते हैं कुछ लोगों के पास बहुत अधिक है इसी कारण बाकी लोगों के पास ज़रूरत को भी नहीं है। वो चाहे जो भी लोग हों जिन लोगों ने भी जिस किसी भी तरह देश की संपदा का बड़ा हिस्सा अपनी तिजोरी में बंद किया हुआ है वास्तव में बाकी लोगों के हिस्से का लूट का ही है। 
          ये कैसी व्यवस्था है जो गरीब को और गरीब बनाती जाती है और मुट्ठी भर अमीरों को और भी रईस। उस पर जनता को कोई करोड़पति बनने के सपने दिखला कर दौलतमंद बनता जाता है तो कोई किसी और तरीके से अपने स्वार्थ सिद्ध करने को भी महानता साबित करता है। सत्ता और दौलत का गठबंधन हो चुका है और अपराध इनको जोड़ने वाली कड़ी का काम कर रहा है। पुलिस सरकारी अधिकारी सभी विभाग और बड़े बड़े उद्योगपति मिलकर वही कर रहे हैं जो अधमरे बच्चे को देखकर गिद्ध की नज़र से दिखाई देता है। हम कहते हैं बहुत धर्म को मानने वाले हैं मगर वो धर्म धरातल पर तो नदारद है। कोई किसी पर दया नहीं करता बल्कि गरीबी का उपहास करते हैं और धनवान होने का अहंकार करते हैं चाहे हमने वो दौलत कैसे भी जमा की हो। आज फिर अगर गुरु नानक आये तो इन तमाम धनवान लोगों , नेताओं , अधिकारीयों की रोटियों को निचोड़ इक लहू की नदी बहती दिखला सकता है। कितने लोग हैं जिनकी दौलत वास्तव में महनत और हक सच की कमाई से जमा हुई है। अधिकतर की कमाई गरीबों के लहू से ही हासिल की हुई है। 
 

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