Friday, 21 September 2018

ग़ज़ल 222 धुआं धुआं बस धुआं धुआं - डॉ लोक सेतिया "तनहा'

    धुआं धुआं बस धुआं धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा' 

धुआं धुआं बस धुआं धुंआ
न रौशनी का कहीं निशां। 

हैं लोग अब पूछते यही
कहां रहें जाएं तो कहां। 

बहार की आरज़ू हमें
खिज़ा की उसकी है दास्तां। 

है जुर्म सच बोलना यहां
सिली हुई सच की है ज़ुबां। 

जला रहे बस्तियां सभी
नहीं बचेगा कोई मकां। 

न धर्म कोई न जात हो
हमें बनाना वही जहां। 

उसी ने मसली कली कली
नहीं वो "तनहा" है बागबां।

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