Monday, 9 July 2018

कायरता की कथाएं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       कायरता की कथाएं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

        शीर्षक कायरों की कायरता का इतिहास भी रखा जा सकता था मगर इतिहास लिखने वाले आजकल बचे नहीं हैं। इतिहास को तोड़ मोड़ कर अर्थ का अनर्थ होने लगा है। आजकल केवल झूठ का इतिहास लिखने का चलन है और उसे लिखने से अधिक घड़ा जा रहा है। लोग फेसबुक पर फॉलोवर्स की गिनती का इतिहास बनाने में लगे हैं अभी तक इसका हासिल क्या है कोई नहीं जानता है। खुद अपनी बढ़ाई करने की आदत ने आदमी को खिलौना बना दिया है। सच लापता है मिलता ही नहीं और झूठ हर गली चौराहे अपना शोरूम खोले हुए है। कायरता को अपनी साहूलियत से अच्छा सा कोई भी नाम दिया जाता है ताकि अपने भीतर की खीझ को ढका जा सके। सच ज़ुबान पर लाते ही नहीं हैं , झूठ बोलते ज़ुबां लड़खड़ाती भी नहीं। शर्म आना किसे कहते हैं अब शर्म से गाल लाल नहीं होते जब आशिक़ हुस्न की तारीफ करता है। नज़र झुकती नहीं न ही चार होती है , मुहब्बत भी तो कितनी बार होती है। ये राजनीति की दुकान है सौ टका की छूट है , फिर भी समाजसेवा में तगड़ी कमाई है , तरह तरह की लूट है। भाषणों में बहुत दहाड़ते हैं दो दिन बाद मुकर जाते हैं और पल्ला झाड़ते हैं। 
                         खुद को मुखर बतलाता है , जब बोलना हो झूठ खुद जुबां पर आता है। सच कहता हूं बार बार दोहराता है सच कहने से मन घबराता है। राग दरबारी खूब गाता है सरकार से जो मांगता है सब पाता है। झोली सरकार के सामने हर दिन फैलाता है , भीख लेता है मगर दाता कहलाता है। पांव सत्ता की कुर्सी के दबाता है जितना नीचे झुकता उतना ऊपर उठता जाता है। तमगे सीने पर लगवाता है। ज़मीर को मार कर अमीर होता जाता है। कौन जाने किस किस से कैसा नाता है , हर गधे को अपना बाप बताता है। जाने को मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाता है मगर धर्म कर्म से नहीं दूर का भी रिश्ता नाता है। भगवान जाने भगवान को क्या चढ़ाता है आता है खाली हाथ खाली जेब मगर वापस कभी नहीं खाली जाता है। कोई नहीं जनता मकसद क्या उसको लाता है , भगवान खुश हुआ दिल को बहलाता है। याद कब रखता ऊपर वाले का भी अपना बही खाता है जो हिसाब किताब में नहीं चूक पाता है। 
                        अभी आपको समझ नहीं आया शायद कथा किस किस की है। अब समझाता हूं।  नारद जी बहुत आते जाते हैं धरती पर और हर बार भगवान को कुछ नया सुनाकर खुश कर देते हैं। नारद जी बोले भगवन आपने पता लगाने को कहा था आपके भारत में शराफत कितनी बची हुई है। ऊपर उसी पर विवरण बताया जो अभी आप भी नहीं समझे ऐसा लग रहा है। हर कोई राजनीति में घुसना चाहता है क्योंकि ऐसा करते ही आप शराफत की चादर ओढ़ कर बदमाशों से बड़े बदमाश बन सकते हैं। अधिकतर लोग जो शरीफ हैं बदमाश बनना चाहते हैं शराफत से पीछा छूटता ही नहीं है। जब सत्ताधारी दल के छोटे छोटे नेताओं से मिलकर अपनेपन से बात की तो पता चला वो अपने दल के बड़े नेताओं की गलतबयानी और मनमानी से परेशान ही नहीं हैं बल्कि उनको लगता है बड़े नेता उनका शोषण करते हैं। पाप ऊपर वाले करते हैं मगर पापी ये नीचे के लोग समझे जाते हैं , जब मतलब हो उनको बलि का बकरा बना देते हैं सूली चढ़ाते हैं। ये सभी खुद आज अपने लिए बोलने की आज़ादी से वंचित हैं लोकतंत्र की झूठी बातें करने वाले बड़े बड़े नेताओं द्वारा अनुशासन की तलवार के डर से। नाम भर को कहीं दूर दराज शहरीकरण से बचे लोग शराफत से रहते हैं। अन्यथा अधिकतर शहरी लोग मज़बूरी में शरीफ और ईमानदार हैं।
                  वास्तव में अधिकतर लोग बुरे नहीं हैं मगर बुराई के साथ होते हैं कुछ पाने को कभी , तो कभी कुछ खोने के डर से। ये शायद विडंबना की बात है कि आज़ादी के इतने साल बाद भी लोग खुद किसी न किसी की गुलामी या चाटुकारिता के आदी हैं। उनको नहीं मालूम इतना भरोसा भगवान आप पर रखते और सच्चाई की राह चलते तो जो मिलता वो कितना अनमोल होता है। जिसे लोग समझते हैं बेहद शक्तिशाली है वो कितना कमज़ोर है और हर पल इक डर सताता है उसे सत्ता खोने का। अभी तक पुराने नेताओं को बुरा साबित करने में खुद को छोटा बनाने का काम करता आया है। जबकि उसे भी मालूम है कि उन लोगों ने ही लोकतंत्र को मज़बूती से स्थापित किया तभी आज उसके हाथ सत्ता है। मगर आज खुद वो सब से महान ही नहीं समझता बल्कि जैसे भी हो सत्ता पर काबिज़ रहना चाहता है। उसका मनसूबा देश की जनता को विवश कर केवल उसी के दल को वोट देने का ही नहीं साथ में दल में भी भीतरी लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म करने का है। आप उसकी मुस्कुराहट देख सोच ही नहीं सकते उसके भीतर क्या है। मन की बात करता है मन ही मन , जिसे लोग मन की बात समझते हैं वो क्या है खुद वो भी जनता नहीं। शराफत की बात करना आजकल दुश्वार है।

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