Tuesday, 29 May 2018

ईमान की बात , ईमानदारी के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

    ईमान की बात , ईमानदारी के साथ ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

   पहले संक्षेप में आज ही की बात। कल रात को किसी व्यक्ति ने जौनपुर से फोन किया राष्ट्रधर्म पत्रिका में मेरा लेख पढ़कर। मेरे पास पत्रिका नहीं आई थी , डाकघर सामने ही है इसलिए सुबह जाकर देखा जहां डाक छांटते हैं मेरी दो पत्रिकाएं रखी थी। तब केवल सफाई करने वाले आये हुए थे और डाकखाना खुलने में अभी समय था। मैंने उस सफाईकर्मी को बताया कि मेरा नाम डॉ लोक सेतिया है और ये मेरे ही नाम की डाक है मैंने ले जा सकता हूं। जी नहीं उसने कहा आप बाद में आकर ले जाना जब डाकिया या और डाकघर के लोग आ गए हों तभी। मुझे बहुत अच्छा लगा उसका वो काम नहीं करना या करने देना जिसका अधिकार उसको नहीं है। उसी डाकघर में दो लोग काम करते हैं एक डाकिया जो डाक बांटने में कुछ देरी कर रहा था अन्यथा मुझे कल ही पत्रिका मिल जाती , और दूसरा ये जो जनता है कि जिस जगह वो काम करता है उस जगह रखी किसी चीज़ को छेड़ना उसका अधिकार नहीं है। सलाम उस सफाईकर्मी को। मुझे कई बातें याद आ गईं हैं पुरानी। बी के चम जी लिखा करते थे अंग्रेजी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस में कॉलम। अंत में उस लेख की बात बतानी है , पहले आज की बात। 

                                  अधिकारों के दुरूपयोग की बात

 सरकारें बदलती हैं सरकारी तौर तरीके नहीं बदलते , ढंग नहीं बदलते। कल कोई कर रहा था और कोई और कर रहा है। कल तक अधिकारी उस दल के नेता के लिए अनुचित कार्य करते थे अब इस दल के नेता के लिए करते हैं। बदला कुछ भी नहीं बल्कि और अधिक खराब हालत होती जाती है। हरियाणा रोडवेज़ की खबर आई है कि जो कंडक्टर क्लर्क का काम पर लगा रखे थे उनको अपने काम पर लगाया जायेगा ताकि बस सेवा सही हो सके। ये अकेली घटना नहीं है , शहर के पार्क पर नियुक्त बताये माली बड़े अधिकारी की कोठी पर काम करते हैं , इतना ही नहीं पुलिस के सिपाही अफ्सरों के घरेलू नौकर की तरह काम करते हैं। पुलिस के बड़े अधिकारी अपने विभाग के सिपाही से ऐसा काम लेने देते हैं और अधिकारी भी ऐसा करते संकोच नहीं करते। सत्ता और पद का दुरूपयोग तो है ही साथ में छोटे पद पर नियुक्त सुरक्षाकर्मी कुंठा का शिकार हो जाते हैं। हम सोचते ही नहीं क्यों किसी सिपाही ने ख़ुदकुशी कर ली या किसी को मार डाला। जिन लोगों को नियम कानून लागू करने हैं वो खुद किसी नियम किसी नैतिक मूल्य की परवाह नहीं करते हैं। मगर आम नागरिक पर नियम लागू करने में इनका रुख बदल जाता है। किसी से घूस लेते हैं तो उसकी बड़ी से बड़ी गलती भी नहीं दिखाई देती और किसी को परेशान करना चाहते तो अकारण ही कमियां तलाशते हैं। फिर से इक बात को दोहराना ज़रूरी है कि देश में कोई भी सत्ताधारी नेता कोई भी घोटाला बिना सचिव आईएएस अधिकारी की मिलीभगत नहीं कर सकता है , क्योंकि संविधान में किसी भी चेक या भुगतान पर पहले अधिकारी के हस्ताक्षर होना लाज़मी है। इसका मतलब यही हुआ कि हर नेता के हर घोटाले में अधिकारी वर्ग शामिल होता ही है। ये वास्तव में शर्मनाक है , जिनको आम नागरिक की आमदनी से कई गुना अधिक वेतन मिलता है , सुख सुविधा सुरक्षा मिलती है वही देश और संविधान के लिए ईमानदार और वफादार नहीं होते। 

                      काला धन और नोटबंदी तथा उसका नाकाम होना

        अब ये कोई राज़ की बात नहीं है कि नोटबंदी असफल रही है। कारण बहुत हैं और नीयत की भी बात साफ़ नहीं होना इसमें आती है। गरीब लहरों पर बिठाये जाते हैं पहरे , समंदरों की तलाशी कोई नहीं लेता। मगरमच्छ सुरक्षित हैं मछलियां मर गई सभी। मुझे लगा था जैसे कोई बाज़ार से आटा दाल सब्ज़ी घी तेल सब शुद्ध लेकर खाना पकाये और सबको प्यार से खिलाये मगर लोग बिमार हो जाएं। क्योंकि आपने जिन बर्तनों में खाना बनाया और परोसा वही साफ़ नहीं थे , खाना गंदा होना ही था। सरकार की रसोई में सभी बर्तन अर्थात जिन बैंकों से ये सब करवाया गया वही ईमानदार नहीं थे। कितने बैंक वालों ने बहती गंगा में खूब मस्ती की बहुत दिन तक नहाये नंगे होकर। आपके सब नियम बेकार हुए। मगर यहां भी अजीब घोटाला हुआ। सरकारी बैंकों में घोषित किया गया कि इस काम में जितने लोग ओवरटाइम करेंगे उनको उस समय के अतिरिक्त पैसे मिलेंगे। अब सब से अधिक काम उन्होंने किया जो लोग कैश काउंटर पर ड्यूटी देते हैं , लेकिन अधिकतर हुआ ऐसा कि मैनेजर और बड़े अधिकारीयों के लिए लिखा जाता रहा अधिक समय काम किया और जो स्टाफ काउंटर पर भुगतान करता जमा करता जिसे सांस लेने की फुरसत नहीं मिली उनको नहीं मिला कुछ भी या फिर नाम मात्र को। जब तक हस्ताक्षर करना काम समझा जायेगा और वास्तविक काम करने वाले की उपेक्षा की जाती रहेगी सही कामकाज नहीं हो सकता। 

                                    बी के चम के लेख की बात

   उन्होंने अपने लेख में तीन ईमानदार लोगों को लेकर लिखा था। मुझे दो घटनाएं याद हैं तीसरी भूल गई है। एक बार वो अपने इक अधिकारी दोस्त से मिलने गए तो पता चला वो नौकरी के लिए आये आवेदकों का इंटरव्यू ले रहे हैं। कमरे में जाते उनको फोन पर बात करते देखा सुना और लिख रहे थे कागज़ पर , समझ गया कि नेता जो मंत्री हैं किसी की सिफारिश कर रहे हैं। बेहद निराशा हुई ये भी सिफारिश पर किसी को नौकरी देते हैं। मगर तभी बात समाप्त करते हुए उनहोंने कहा मंत्री जी आपका दिया नाम लिख लिया है और आप उनको बता सकते हैं कि उनको साक्षात्कार के अयोग्य घोषित किया जा रहा है नियमानुसार ऐसा सिफारिश करवाना अयोग्य बना देता है। मान गए उनके हौंसले की बात को , कोई चिंता नहीं थी , क्या होगा अधिक से अधिक तबादला। 
    दूसरी घटना शिमला की माल रोड की है , इक बड़े अधिकारी कार में जा रहे थे कि इक सुरक्षकर्मी अवरोधक लगा कर खड़ा था , साहब ने ड्राइवर को भेजा बताओ कौन हूं और रास्ता खुलवाओ। नहीं माना वो तो खुद नीचे उतर कर उसके पास जाकर बोले जानते हो मैं अमुक विभाग का आला अधिकारी हूं और कभी किसी दिन तुम्हारी नियुक्ति मेरे आधीन भी हो सकती है। जी मैं जनता हूं उसने कहा। अधिकारी बोले सोचो तब क्या होगा तुम्हारा। उसका जवाब था सर , तब आपको यकीन होगा कि कम से कम एक आदमी आपके आधीन ऐसा है जो अपना कर्तव्य निभाता है ईमानदारी से। मेरी निष्ठा अपने काम और देश के लिए है। सैल्यूट किया था उस अधिकारी ने और धन्यवाद किया था ये सबक समझाने के लिए।

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