Friday, 18 May 2018

मेरी अपनी मुहब्बत की कहानी - डॉ लोक सेतिया

       मेरी अपनी मुहब्बत की कहानी - डॉ लोक सेतिया 

   मुहब्बत की नहीं जाती हो जाती है , मुझे भी उस से इश्क़ हो गया। कब क्यों कैसे हुआ कभी किसी को पता चला है। आप जो समझ रहे हैं वैसा नहीं है , मेरा विवाह प्रेम विवाह नहीं है। साफ बात है कि जिस मुहब्बत की बात कर रहा हूं वो मेरी बीवी नहीं है। ये भी झूठ नहीं है कि मुझे उस से आज भी मुहब्बत है और हमेशा रहेगी भी। आपने इश्क़ नहीं किया अगर आप सोचते हैं कि इश्क़ करना छोड़ दूं , भला इश्क़ कभी मर्ज़ी से किया जाता है या छोड़ा जाता है। बस हो जाता है तो हो ही जाता है और उसके बाद चैन नहीं आता बिना मुहब्बत के। जान के साथ जाता है और बाद में भी निशानी छोड़ जाता है। जानता हूं मिलना चाहते हो मेरी महबूबा से , थोड़ा इंतज़ार तो करो अभी। नाम जान कर क्या करोगे , खूबसूरत बहुत है। बला का हुस्न है बयां करना आसान नहीं है। ग़ज़ल जैसी नाज़ुक कविता जैसी दिलकश और कहानी जैसी भी जो शुरू कहां से हुई और खत्म कब कहां कोई बता नहीं पाता। कोई कहानी कभी खत्म नहीं हुआ करती , केवल विराम दे देते हैं। और उसके बाद , याद आया उपन्यास का नाम यही तो था , और उसके बाद। बहुत साल संभाल कर रखा था पर न जाने कहां खो गया , दत्त भारती मेरी पसंद के उपन्यासकार थे। कितना रुलाया उनकी लिखी कहानी ने मुझे , बार बार पढ़ता था। जिल्द फट गई थी उपन्यास की किताब की , बिना जिल्द की किताब कब तक रहती बचकर। बिक गई हो शायद रद्दी में अनजाने में , नहीं नहीं मैं भला बेच सकता हूं किताबों को रद्दी में , कभी नहीं। चाहता हूं दिलोजान से। 
                                  अब लगता है कुछ कुछ समझ गये हो तो छुपाना क्या , बता ही देता हूं मैंने बस इसी से मुहब्बत की है , अपनी कलम से लेखनी से और लिखना ही मेरी इबादत है जूनून है। ये बुरी आदत है इक पागलपन है नशा है जो छोड़े नहीं छूटता किसी भी लेखक से। जो लिखना छोड़ देते हैं वो ज़िंदा नहीं रहते बाद में , कोई लिखने वाला लिखना छोड़ देता है तो वो सच्चा आशिक़ नहीं है उसका इश्क़ इश्क़ था ही नहीं। झूठी मुहब्बत की कहानी सुनाते हैं वो लोग। मुहब्बत में सब से बड़ी मुश्किल यही तो है आशिक खुद नहीं जनता मुहब्बत क्यों हुई , महबूबा को क्या जवाब दे , दिल को है तुझ से प्यार क्यों ये न बता सकूंगा मैं। ये मेरा दिवानापन है या मुहब्बत का सुरूर , तू न पहचाने तो है ये तेरी नज़रों का कसूर। इन प्यार के कुछ गीतों ही ने कितने आशिक पैदा किये होंगे। जगमोहन जी का गया ये गीत बहुत लोकप्रिय रहा है , इक बार की बात है वो इक कार्यकर्म में शामिल होने आये किसी शहर तो किसी ने मंच पर जाने से पहले कहा जगमोहन जी आपने मुझे बर्बाद कर दिया , वापस उतरने लगे कार्यकर्म के अंत में तो फिर वही बोल सुनाई दिये। रहा नहीं गया उनसे , बुलाया उसे पास और पूछा भाई मैं नहीं जनता आपको , भला क्या किया मैंने जो आप इल्ज़ाम धर रहे हो अपनी बर्बादी का मुझपर। वो बोला आपका ये जीत रेडिओ पर बजता रहता था , और सामने की खिड़की में इक हसीन लड़की बैठी रहती थी , गीत सुनते नज़रें मिलती और मुहब्बत हो गई थी। अब बीवी है मेरी हमने शादी कर ली थी , अब पछताता हूं तभी आपको सच कहा आप ही ने मुझे बर्बाद किया है। हंस दिए जगमोहन जी भी उसके साथ साथ। मुहब्बत बर्बाद तो करती ही है , इश्क़ करने वालों को , आशिकी का यही मज़ा है। इक आशिक़ गाता है वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है इल्ज़ाम किसी और के सर जाये तो अच्छा। ये क्या बात हुई मुजरिम कोई और झूठा इल्ज़ाम किसी पर। इक पंजाबी ग़ज़ल है , उसका इक शेर है , तुम कहते हो मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है , नहीं हेराफेरी नहीं। मैनूं इश्क़ दा लगेया रोग मेरे बचणे दी नहींयों उम्मीद। 
                                 मुहब्बत कर किसी को कुछ भी मिला नहीं कभी , वो कहते हैं ना , इश्क़ ने ग़ालिब निक्क्मा कर दिया , वरना हम भी आदमी थे काम के। मेरी ज़िंदगी भी मेरे लिखने के जूनून ने कम बर्बाद नहीं की। लोग पागल समझते हैं और बच कर दूर रहते हैं इस डर से कि कहीं उनको भी ये नामुराद रोग नहीं लग जाये। आसान नहीं है इश्क़ करना और होना , ज़माने में अजी ऐसे कई नादान होते हैं , वहां ले जाते हैं कश्ती जहां तूफ़ान होते हैं। मुहब्बत सबकी महफ़िल में शमां बनकर नहीं जलती , हसीनों की नज़र सब पर छुरी बनकर नहीं चलती , जो हैं तकदीर वाले बस वही कुर्बान होते हैं। हर किसी को नहीं मिलता यहां प्यार ज़िंदगी में ,खुशनसीब है जिसको मिली ये बहार ज़िंदगी में। इक शायर की बहुत पुरानी ग़ज़ल है। 
रंग जब आसपास होते हैं , रूह तक कैनवास होते हैं। 
खून दे दे के भरना पड़ता है , दर्द खाली गलास होते हैं। 
सैंकड़ों में बस एक दो शायर , गहरी नदियों की प्यास होते हैं। 
हमने यूं ही मिजाज़ पूछे थे , आप नाहक उदास होते हैं। 
कल यूं ही बैठे बैठे इक चुटकुला बना लिखा अपनी फेसबुक वाल पर। मास्टरजी समझाते हैं इश्क़ कभी मत करना। ठीक है विद्यार्थी मान जाता है। मास्टरजी आशिर्वाद देते हैं लंबी आयु जीने का। विद्यार्थी कहता है मास्टरजी इश्क़ नहीं करना तो जी कर करेंगे क्या। 
इक दोस्त ने कमेंट किया खतरनाक चुटकुला है। भाई खतरनाक क्या नहीं है। इस देश में खतरा ही खतरा है। और सच बोलने से अधिक खतरा किसी बात में नहीं है। खतरों में बीता है अपना हर दिन नहीं हर पल भी। तभी तो अपने लिखने को और बेबाक सच बोलने को अपनी मुहब्बत कहता हूं , नहीं छोड़ सकता चाहे जो भी अंजाम हो। जगजीत सिंह की गाई इक ग़ज़ल हाज़िर है। 

सच्ची बात कही थी मैंने , लोगों ने सूली पे चढ़ाया ,

मुझको ज़हर का जाम पिलाया , फिर भी उनको चैन न आया। 

वक़्त जहां भी ले के गया है , ज़ुल्म मिला है ज़ुल्म सहा है ,

सच का ये इनाम मिला है , सच्ची बात कही थी मैंने। 

सबसे बेहतर कभी न बनना , जग के रहबर कभी न बनना ,

पीर पैयंबर कभी न बनना , सच्ची बात कही थी मैंने। 

चुप रहकर भी वक़्त गुज़ारो , सच कहने पे जां मत वारो ,

कुछ तो सीखो मुझसे यारो , सच्ची बात कही थी मैंने। 

अभी मुहब्बत की कहानी बहुत बाकी है , आखिरी सांस तक जारी रहेगी। अपनी इक ग़ज़ल के शेर से विराम लेता हूं। 
         सब लिख चुके आगाज़ हम अंजाम लिखेंगे , अब ज़िंदगी को ज़िंदगी के नाम लिखेंगे।
                                                  लोक सेतिया "तनहा"

1 comment:

sanjay said...

Bahut bdhiya....👌👍