Tuesday, 17 July 2018

या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो( आलेख ) 

                                      डॉ लोक सेतिया 

  कहो भी क्या कहना है , अब बोलते क्यों नहीं।  नानी मर गई है क्या। ये हाल चाल पूछना है ये हालत खराब करना। माफ़ करना आपकी अदालत में आना बहुत बड़ी भूल थी। जाने आजकल की महफिलों को ये क्या हुआ है। शोर तो है वाह जनाब माशाआलहा का मगर आवाज़ है कि दबी दबी सी लगती है। दिन का उजाला है फिर भी दिखाई कुछ भी नहीं देता है। कितने आफ़ताब धरती पर चमकते हुए हैं पर अंधियारा है कि मिटने को राज़ी ही नहीं। सब ज्ञानी हैं सभी कुछ की जानकारी है राजनीति से लेकर धर्म तक और देश भक्ति से लेकर समाजसेवा तक हर किसी को खबर है। खबर नहीं फिर भी कौन हैं हम क्या हैं , किधर को जाना चाहते थे और आ गए किस जगह हैं। ज़ुबान है कि बोलती नहीं है , आंखें हैं लेकिन दिखाई कुछ भी नहीं देता है , कानों में शोर कितना है मगर सुनाई कुछ नहीं देता है। हाथ भी हैं मगर उन्हें कानों को ढकने तक की कोशिश करना बेकार है। बिना किसी हथकड़ी बंध गये हैं , ताली बजाने के इलावा हिलते भी नहीं हैं। आप कहते हो बताओ सब बढ़िया तो है। दिल भी क्या बुरा है दुश्मन ए जां पर फ़िदा है , इश्क़ की दास्तान है। ऐसे में कोई ग़ालिब नहीं दाग़ नहीं मीर तकी मीर नहीं। ग़ज़ल की बात कौन करे , दर्द को समझता है कौन , जाने ये किस तरह की शायरी है। हज़ारों सुनने वाले हैं सुनाने वालों को सलीका नहीं हो तो सुनने वालों को शऊर कैसे आये। मजमा लगाने जैसी बात है दिल से दिल में उतरने वाली कोई बात नहीं है। गद्य पद्य दोनों की दशा एक जैसी है। शोहरत तो बहुत है , दौलत भी बहुत है , नज़ाकत की बात खो गई है। ग़ज़ल गाई किसी ने तो ग़ज़ल छुपकर खड़ी थी ख़ामोशी से रो गई है। शायर को पता भी नहीं चला वो अपना दामन अश्कों से भिगो गई है। अजीब सी घुटन लग रही है ये कैसी बरसात हो गई है। अपने अश्कों में मेरी दुनिया डुबो गई है। मुंशी जी आपकी कहानी खो गई है मूंगा से पूछा यहां क्यों खड़ी है , भूल गई कहना था , तेरा लहू पीऊँगी। न उठूंगी। मुंशी ने पूछा कब तक पड़ी रहोगी। नहीं बोली जो कहना था , तेरा लहू पीकर जाऊंगी। गरीब की हाय लगती नहीं आजकल। नमक का दरोगा , दो बैलों की कथा। प्रेमचंद कोई नहीं है कहानियां कितनी बदनसीब हैं। परसाई श्रीलाल शुक्ल ये सभी व्यंग्यकार लिखते रहे मगर बदला क्या जो मेरे लिखने से बदलेगा। नींद क्यों रात भर नहीं आती। 
                                      यूं हसरतों के दाग़ मुहब्बत में धो लिए , खुद दिल से दिल की बात कही और रो लिए। घर से चले थे हम तो ख़ुशी ( अच्छे दिन ) की तलाश में , ग़म राह में खड़े थे ( बदहाली ) वही साथ हो लिए। होटों को सी चुके तो ज़माने ने ये कहा , ये चुप सी क्यों लगी है अजी कुछ तो बोलिए। अब समझे आप सरकार ने सवाल किया है बोलते क्यों नहीं। आमदनी दुगनी हुई कि नहीं। इधर कुआं उधर खाई। जो बोलने को सिखाया छमिया बोल गई तो लोग पूछते हैं दिखा दोगुनी कमाई कहां छुपाई है। धान की फसल बर्बाद हुई तो जिस सीताफल की बात करती हो साथ की सभी महिलायें जो था वो भी लुटा बैठी हैं। ये गणित बहुत कठिन है अलजब्रा मुझे समझ नहीं आता किसी ने फेसबुक पर पोस्ट पर लिखा। थोड़ा इंतज़ार करो अभी जिओ का उत्कृष्ट संस्थान खुलेगा तो पढ़ाई करना , जो पहले पढ़ा लिखा सब फज़ूल था। आजकल यही अच्छा है हर किसी के पास स्मार्ट फोन है जो मर्ज़ी करो।  मगर रुकना आज सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया है नफरत फ़ैलाने वालों पर कठोर कानून बनाओ। अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारो , सबसे अधिक नफरत किस ने फैलाई है। हम अच्छे बाकी सब बुरे यही उनका प्यार का सबक है। जो हमें अच्छा नहीं मानते देश की भलाई नहीं चाहते। किसी का विरोध अपराध ही नहीं क्या क्या नहीं हो गया। चुप रहो इस शहर में रहना है सच कहना है तो कोई और जगह तलाश करो। मैं ग़म को ख़ुशी कैसे कह दूं , जो कहते हैं उनको कहने दो। या दिल की सुनो दुनिया वालो या मुझको अभी चुप रहने दो।

Saturday, 14 July 2018

वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    वो आये घर हमारे खुदा की कुदरत है , हम कभी उनको कभी अपने घर को देखते हैं। 

 स्वागत है आपका मेरे शहर में महोदय। जब कोई घर आता है तो हंस कर अभिवादन करते हैं। ऐसे में अपने दुःख दर्द की बात नहीं करते। आंसू आने लगें तो छुपा लेते हैं रोक लेने चाहियें फिर भी छलकने लगें तो कहना चाहिए आंसू ख़ुशी के हैं। आंसू का कोई रंग नहीं होता जाति धर्म नहीं होता आंसू ही हैं जो सुख दुःख दोनों समय काम आते है। आज देश के राष्ट्रपति आ रहे हैं कई दिन से खबर पढ़ते रहे है क्या क्या प्रबंध किये जा रहे हैं। आज सुबह सैर पर गया तो देखा सड़कें धुली धुली हैं , फॉयर बिर्गेड की गाड़ियां खड़ी हैं कई तैयार और पुलिस की जिप्सियां वाहन दौड़ते फिर रहे हैं। अनाज मंडी के पीछे किसान विश्राम भवन की बंद दिखाई देने वाला गेट खुला हुआ है साफ सफाई की जा रही है चार पांच गाड़ियां पोर्च में खड़ी हैं जिन पर वीआईपी का लेबल चिपका हुआ है। मुझे भी कोई ऐतराज़ नहीं है आपकी शानो शौकत पर , आपके घर रौशनियां हों मगर हर गरीब के घर भी इक छोटा सा दिया भी जलता रहना चाहिए। सबको अपने हिस्से का आसमान मिले। मुझे नहीं लगता असली किसान उस भवन में आराम करना तो क्या कभी अंदर भी जा सके होंगे।  मगर सरकारी लोग किसान से लेकर कुछ भी होने का लाभ उठा सकते हैं।  उनकी मर्ज़ी।                             अभी कुछ शेर दुष्यंत कुमार के याद करते है। 
आपके क़ालीन देखेंगे किसी दिन , इस समय तो पांव कीचड़ में सने हैं। 
जिस तरह चाहो बजाओ इस सभा में , हम नहीं हैं आदमी , हम झुनझुने हैं। 
हरियाणा की सरकार चाहती है हम निराशा की बातें छोड़ आशावादी बातें करें। उनके आये दिन आयोजित तमाशों को देख कर आनंद लें खुश होकर ताली बजाएं। यथार्थ की बात करना निराशा नहीं होता है , अंधेरा है जब तक नहीं स्वीकार करोगे दिया कैसे जलाओगे। 
मत कहो आकाश में कुहरा घना है , ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है। 
दोस्तो ! अब मंच पर सुविधा नहीं है , आजकल नेपथ्य में सम्भावना है। 
आजकल सवाल करना जुर्म है। आपकी देशभक्ति कटघरे में खड़ी कर देते हैं। हम इतना तो कह सकते हैं दुष्यंत की तरह। 
इस अंधेरे में दिया रखना था , तू उजाले में ही बाल आया है। 
हमने सोचा था जवाब आएगा , एक बेहूदा सवाल आया है। 
बस दो शेर और दुष्यंत कुमार के सुनाकर फिर अपनी बात कहता हूं। नहीं कहूंगा तो खुद अपना ज़मीर मुझे मुजरिम ठहराएगा। घबरा गया सच लिखने से , डर गया डराने से। फिर ज़िंदा क्यों है। 
ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो। 
किसी भी कौम की तारीख़ के उजाले में , तुम्हारे दिन हैं किसी रात की नकल लोगो। 

आज सब चाक चौबंद है राष्ट्रपति जी और उनकी धर्म पत्नी जी को आना है। हमेशा सब चाक चौबंद क्यों नहीं रहता। ऐसा लगता है जैसे आज ही हर बात हो सकती है सब उपाय करने चाहिएं। क्यों सब उपाय हमेशा नहीं हों कि केवल किसी वीवीआईपी के आने पर महीनों सब ठीक करना पड़े वो भी अगले दिन फिर से खराब होने देने के लिए। जब कोई किसी बड़े पद पर होता है तो अजीब अजीब ख्वाहिशें दिल की पूरी करता है , कोई सेना के लड़ाकू विमान की सैर करता है कोई समंदर में युद्धपोत पर जाता है। जब जंग हो क्या उनको करना है ये सब , रहीसाना शौक हैं जो देश का कितना धन खर्च कर पूरे किये जाते हैं। इनका अर्थ कुछ भी नहीं। मगर ये तमाम लोग गरीबी की बात ही नहीं करते बल्कि दावा करते हैं खुद इन्होने गरीबी देखी है। देखी थी माना मगर क्या आज गरीबी का दर्द याद है , वो भूख वो बेबसी वो मौत से बदतर जीना। अगर याद है तो आप राष्ट्रपति हों प्रधानमंत्री मुख्यमंत्री या संसद विधायक या किसी भी बड़े पद पर आसीन लोग , किस तरह इतने संवेदनाहीन हो जाते हैं कि करोड़ों लोगों की भूख मिटा सकता है इतना खाते हैं और उससे ज़्यादा उड़ाते हैं। ये देश के गरीबों की रोटी से खेलने वाले कौन हैं , क्या देश सेवक हैं , देशभक्त हैं।


Friday, 13 July 2018

आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया

    आदमी का मशीन हो जाना ( सच्ची बात ) डॉ लोक सेतिया 

          कितना आगे बढ़ गया अब देखो इंसान। मैं अभी तक किसी और ही दुनिया में था। ऐसा तो ख्वाब में भी नहीं सोचा था। हम अपने माता पिता को उनके चले जाने के बाद सालों तक भुला नहीं पाते हैं। कभी कभी तो अजनबी लोग भी इतने अच्छे लगते हैं कि उनकी मौत की खबर पर यकीन नहीं होता है। कल ही तो देखा था भला आज कैसे हो गया ये सब। माना हादिसे होते हैं तो हम चाह कर भी कुछ नहीं कर सकते कुदरत भी क्या क्या कहर ढाती है। दुर्घटना में बाढ़ में बिजली गिरने से मौत कब कैसे आती कोई कुछ नहीं कर सकता है। हर दिन शोकसभा में सुनते हैं ऊपर वाले की मर्ज़ी है क्या कर सकते हैं। दुआ मांगते हैं आत्मा को सद्गति दे ऊपर वाला और उसके प्रियजनों को दुःख सहने की शक्ति दे। सच कहूं अभी भी लिखने का साहस नहीं हो रहा है या फिर अभी भी यकीन नहीं हो रहा जो हुआ सच वही हुआ जो मुझे दिखाई दिया। नहीं भला ऐसे कैसे हो सकता है। या फिर कोई वास्तव में इतना ज्ञानी हो सकता है जो भगवान कृष्ण के अर्जुन को गीता के सन्देश की बात को समझ गया हो। मरना है सब को और इस सच्चाई को स्वीकार करना ही पड़ता है। फिर खुद उसी ने शोकसभा आयोजित क्यों की और सब को सूचना भी दी। और लोग माना शोक प्रकट करने जाते हैं केवल नाम को ही मगर जिसका अपना नहीं रहा उसका दुःख अपना ही होता है हज़ार लोग बांटने को आएं संवेदना व्यक्त करें वास्तव में कम नहीं होता है। मगर कोई अपने माता पिता के आकस्मिक निधन को ऐसे स्वाभाविक घटना की तरह समझ इस तरह से बातें कर सकता है जैसी कुछ हुआ ही नहीं हो मेरे लिए समझना कठिन है। मेरी खुद की आयु साठ साल है , क्या मतलब उसकी अस्सी साल से अधिक होगी और कितना जीना चाहिए। पास बैठा कोई दूसरा साथ दे रहा था ये अच्छा है दो तीन दिन आई सी यू में रहा नहीं तो महीनों बिस्तर पर पड़े रहना बहुत खराब मौत होती है उसके बाद। आपस में बातें कर रहे थे कोई रोग नहीं था कोई परेशानी नहीं थी घर से निकले भले चंगे और अचानक ये असंभव सी बात हो गई। बहुत आराम से रहते थे पेंशन मिलती थी पचास हज़ार से अधिक हर महीने और इस आयु में खाना पीना क्या होता है दाल सब्ज़ी , रोग भी कैसे होते हैं तेज़ाब बनना या गैस या कब्ज़। 
               छोड़ यार अपनी बात बताओ किस किस देश में सैर की। और उसके बाद आधा घंटा तक विदेशों की बात होती रही। होटल की खाने पीने की और वहां के तौर तरीकों की। किसी पार्टी में जाकर जैसे चर्चा करते हैं। मुझे मौत से डर नहीं लगता मगर ये मौत मुझे डरावनी लगी।  क्योंकि अधिकतर लोग जीना चाहते ही नहीं या जीना जानते ही नहीं मगर शायद बहुत थोड़े लोग होंगे जो सच में हर हाल में ज़िंदा रहते हैं। ऐसे व्यक्ति का निधन विचलित करता है , उसे जीना था जीना जनता था जीता भी था और जीना चाहता भी था। नहीं उसे इस तरह नहीं जाना था , ये नहीं सोचा था उसने। उसकी ज़िंदगी में कितनी अनहोनी घटनाएं घटी फिर भी वो ज़िंदादिल ज़िंदगी से हारा नहीं कभी। हम तो कायर लोग हैं जो जीना जानते ही नहीं और मौत से भी डरते हैं इसलिए जीते हुए भी मरते हैं। मैंने बहुत कम लोग अपने सामने ऐसे देखे हैं जिनके चेहरे पर शिकन नहीं दिखाई देती बेशक उनके भीतर कितने समंदर गहराई में दर्द वाले दबे रहते हैं। मैं तीस साल से जनता रहा हूं उनको अपने शहर में आकर आते जाते , फिर बसते हुए , और अब पता चला वो चले गए थे इस शहर से किसी और शहर , जहां से और और आगे चले गये हैं किसी दूसरी दुनिया में। जो मर गया उसे क्या फर्क पड़ता है कोई उसके जाने से दुखी है या नहीं।  सुनते रहे हैं कुछ लोग वसीयत मिलने पर खुश होते हैं , मगर यहां तो सब पहले दे दिया था उन्होंने। आदमी में और मशीन में एक ही अंतर है कि मशीन को सुख दुःख का एहसास नहीं होता है। आदमी की रगों में लहू बहता है जो लाल रंग का होता है , कहावत सुनी थी उसका लहू सफ़ेद हो गया है। शायद कुछ ऐसा ही लगा मुझे।

Thursday, 12 July 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 4 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग -4          

                                   डॉ लोक सेतिया 

  आज की कहानी वास्तव में बेहद कठिन मोड़ की बात थी। इक पिता जो छोटी सी नौकरी में बेहद ईमानदारी से काम करता है , जिस जगह काम करता है जो मालिक था वो अब नहीं है और उसका बेटा उसे नौकरी से हटा नहीं सकता क्योंकि मरने से पहले उसे पिता ने ऐसा कहा था। ऐसे में जब वो अपने आज के मालिक से क़र्ज़ मांगता है तो खरी खोटी सुना मना कर देता है। मगर तभी शाम को उसे दस लाख रूपये बैंक में जमा करवाने को देकर भेजता है लेकिन बैंक पहुंचने पर बैंक बंद हो गया होता है। विवशता में इतनी बड़ी रकम उसे घर में रखनी पड़ती है , सुबह होने पर पता चलता है कि रात को घर में चोरी हो गई है। मालिक उसे पुलिस थाने ले जाता है और उसी पर शक जताता है कि तभी पुलिस का हवालदार इक चोर को पकड़ कर लाता है उसी बैग के साथ। मगर बैग में कोई पैसा नहीं होता और चोर स्वीकार करता है कि हां मैंने चोरी की है मगर इस बैग में कुछ भी नहीं था। पुलिस मानती है कि वो चोर से चोरी की राशि बरामद कर ही लेंगे , मगर घर आने पर उसे पता चलता है कि चोर की चोरी से पहले उनकी अपनी औलाद ने ही पैसे चुरा लिये थे अपनी अपनी ज़रूरत को पूरा करने की खातिर। इस बात की चिंता किये बगैर कि उनके ऐसा करने से पिता पर क्या क्या मुसीबत आ सकती है। अभी कहानी को यहीं रोक कर स्टुडिओ में बैठे लोगों की बातें करते हैं। 
     बेटे बेटी ने चोरी की बहुत लोग इसे उनकी मज़बूरी ही नहीं बता रहे थे बल्कि पिता को ही कटघरे में खड़ा कर कह रहे थे वो अच्छा पिता नहीं साबित हुआ क्योंकि बच्चों की ज़रूरत पूरी नहीं कर सकता था। अब उनकी मज़बूरी या ज़रूरत भी जानना ज़रूरी है। बेटी की ससुराल वालों की मांग और बेटे को नौकरी मिलने के लिए लाखों रूपये की ज़रूरत। अर्थात जो पिता संतान की उचित या अनुचित किसी भी तरह की मांग को पूरी नहीं कर सकता है उसकी ईमानदारी किस काम की। ये बेहद खेद की बात है जो ऐसे शो में भाग लेने वाले तथाकथित आधुनिक समाज के लोग ईमानदारी और नैतिकता को अनावश्यक समझते हैं। जब एंकर ने पूछा कि क्या पिता को अपने बच्चों की चोरी की बात पुलिस को बता देनी चाहिए तो ज़्यादातर लोग नहीं चाहते थे।  उनकी चोरी और गुनाह ही नहीं अपने ही पिता से धोखा करने को बच्चों की भूल बता बचाने की बात कर रहे थे। ये सब देखकर समझ सकते हैं अगर पकड़े जाने का डर नहीं हो तो इनमें से अधिकतर कोई भी अपराध कर सकते हैं। शायद उनको नहीं समझ आया हो कि जो लोग उनकी जान पहचान के हैं उनकी राय सुनकर और उनकी सोच जानकर उन पर भरोसा नहीं करेंगे अगर कोई ऐसी घटना घट जाये। 
        सोशल मीडिया पर आकर कुछ भी बोलने और समझाने की आदत का ये भी साइड इफ़ेक्ट है। जब कुछ भी कहना हो किसी घटना को लेकर या कोई राय देनी हो जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। थोड़ा संयम रखना सीखना चाहिए। अन्यथा बाद में पछताना पड़ता है। यही हुआ इस कहानी के आखिर में। पिता अपने बच्चों को पकड़वाने की जगह खुद पर चोरी का इल्ज़ाम ले कर बेगुनाह को बचा खुद हवालात में बंद हो जाता है। बेटा अपनी नौकरी पाकर खुश है और बेटी ससुराल जाने की बात से खुश है , अपने पिता की बात उनको मूर्खता लगती है। मगर जिस मालिक को सभी स्टुडिओ में बैठे दर्शक बुरा भला कह रहे थे , वही जब पता चलता है की वो इंसान चोर नहीं बल्कि उस के बच्चों ने चोरी की है तो उसे आकर छुड़वाता भी है और ये भी कहता है कि जब तक आप नहीं कहोगे आपके बच्चों पर कोई करवाई नहीं करेगा। उसे अपने पिता की कही बात अब समझ आती है और वो उनको आदर देता है बड़ों की तरह और अगले दिन से काम पर आने को कहता है। ये कहानी का सुखद अंत है मगर सवाल बाकी छोड़ जाती है ये कहानी भी , मुजरिम उस कहानी के पात्र नहीं हैं , वास्तव में हमारा समाज कटघरे में खड़ा है। क्या हम खुद वास्तविक जीवन में ईमानदार इंसान की कदर करते हैं ? शायद नहीं !!

Wednesday, 11 July 2018

अल्लाह की मर्ज़ी है ( की मैं झूठ बोलिया ) डॉ लोक सेतिया

   अल्लाह की मर्ज़ी है ( की मैं झूठ बोलिया ) डॉ लोक सेतिया 

सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाय , लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय। 
ओ की मैं झूठ बोलिया , की मैं कुफर तोलिया। कोइना भाई कोइना। 
     पंजाबी बोलियां कहते हैं इसे। आज कुछ इसी अंदाज़ में सवाल जवाब। सवाल भी आपके ही हैं और जवाब भी अपने ही हैं। उनसे सवाल क्या , और उनके जवाब क्या , कब कौन कर रहा क्या व्यौपार मत लिखो। बेदर्द शासकों को यूं अवतार मत लिखो। झूठे बयान देती ये सरकार मत लिखो। उनके फरेब की बात सौ बार मत लिखो। उनके गुनाह सब माफ़ , बदकार मत लिखो। आईन देश का क्यों गया हार मत लिखो। 

पहला सवाल :-

आपने वादे बहुत किये देश की जनता के साथ , वास्तविकता में हुआ कुछ भी नहीं। क्या आप स्वीकार करते हैं आपने जो जो कहा सब झूठ साबित हुआ। आपने कहा था मेरा कोई कसूर कोई कमी निकले तो मुझे सज़ा देना। अब आप खुद बता दो क्या सज़ा मिलनी चाहिए आपके अपराधों की। 

जवाब हाज़िर है :-

मैंने कोई गलती नहीं की , कोई गुनहगार नहीं हूं मैं , मैंने तो कोई कमी नहीं छोड़ी। जिस खुदा पर भरोसा था कि वो मेरी हर इच्छा को पूरी करेगा। जैसे ऊंचे सिंघासन पर बिठाना। उसी पर छोड़ा था सब को अच्छे दिन दिखाना ज़रूर बेशक दूर से ही। शायद उसने दिखलाये भी होंगे मगर जब दिखा रहा तब लोग नहीं देख रहे थे। लोगों का ध्यान इधर उधर बहुत रहता है। कोई मंदिर कोई भगवान का दर नहीं बचा जिस चौखट पर झुकाया नहीं जाकर सर अपना। सब जानते हैं जो भी करता है वही करता है , उसने किसकी झोली भरी किसकी खाली रही ये उसी की मर्ज़ी है। अल्लाह जो करता है मंज़ूर करना पड़ता है , मेरे चाहने से क्या हो सकता है। 

दूसरा सवाल :-

आप अपनी नाकामी को ऐसे ढक नहीं सकते हैं। आपको अपने भगवान राम दोषी लगते हैं।  भगवान को राजनीति में लाना उचित नहीं है। अपने वादे आपको पूरे करने थे राम जी की मर्ज़ी नहीं आती आड़े इस में। 

जवाब हाज़िर है :-

आपने राम और रहीम को मिला दिया है जो सही नहीं है। राम जी ने अपने भक्तों की भलाई करनी थी , अल्लाह ने अपने बंदों की भलाई करनी थी। और जो हर किसी को मानते हैं उनकी तरफ कोई नहीं देखता है। सबसे पहले आपकी आस्था एक में होनी चाहिए। हर किसी की चौखट पर जाने वाले खली हाथ रहते हैं। 

तीसरा सवाल :- 

संविधन देश को देश की सरकार को धर्म निरपेक्षता का सबक पढ़ाता है। आपको अपना काम करना है कोई खुदा कोई अल्लाह कोई यीशु मसीह कोई वाहेगुरु आपको रोकने नहीं आया होगा। राजधर्म को छोड़ आपने सब धर्मों की चिंता की , अपना वास्तविक धर्म निभाया ही नहीं। 

जवाब हाज़िर है :-

मुझे दोष देते हो अपना काम खुद नहीं करना ज़रूरी समझा और भगवान भरोसे सब कुछ छोड़ दिया। मगर देश आजतक भगवान भरोसे ही चलता रहा है , मैंने मेरी सरकार ने भी वही किया जो पहले की सभी सरकारों ने किया है।  बड़ा गर्क देश का। जनता भी तो सब हरि इच्छा पर छोड़ती है। किसे क्यों चुनती है कभी सोचती ही नहीं। हम नेताओं के वादे सुनती है और लालच में आ जाती है। अगर खुद अपने बीच से अच्छे सच्चे और ईमानदार लोगों को चुन कर भेजती तो अपने आप सब ठीक हो जाता। आप बताओ 125 करोड़ की आबादी में क्या 543 लोग ऐसे नहीं हैं जिनको कोई वेतन सुविधा नहीं चाहिए देश की सेवा करने के बदले। खुद कांटों को बोती है स्वार्थी नेताओं को वोट देकर। 

अंतिम सवाल :-

आपको क्या लगता है देश में वास्तविक लोकतंत्र कैसे मज़बूत हो सकता है। कोई मसीहा तो आकर कुछ नहीं करेगा। भविष्य क्या है और कैसे बदल सकता है। 

जवाब हाज़िर है :-

वोट देना काफी नहीं है लोकतंत्र को समझना होगा। राजनेता कभी मसीहा नहीं बन सकते हैं।  उनका मकसद सत्ता होता है। पांच साल इंतज़ार नहीं किया करती ज़िंदा कौमें याद रखना। जो सरकार मनमानी करती हो और सत्ता मिलते ही आम जनता की बातों को महत्व नहीं देती हो उसका विरोध करना चाहिए। मगर यहां जो बात सबसे महत्वपूर्ण है विरोध किसी भी नेता या सरकार की इजाज़त लेकर नहीं हो सकता है। अधिकार पाने को संघर्ष करना पड़ता है हर राज्य हर मुल्क की जनता को। कोई भी थाली में रखकर परोस कर आपको हक नहीं देता है।

एक नाक़ाबिलेगौर शोहरत ( बेसिर पैर की ) डॉ लोक सेतिया

  एक नाक़ाबिलेगौर शोहरत  ( बेसिर पैर की ) डॉ लोक सेतिया 

     अमर्त्य सेन के नाम से दुनिया वाकिफ है , मगर भारत देश में बहुत थोड़े लोग जो अख़बार टीवी और शिक्षा अर्थशास्त्र से या फिर लेखन से जुड़े हैं परिचित हैं। अन्यथा आप किसी से पूछो तो जवाब मिलेगा नहीं जानते या फिर नाम सुना तो है कोई मीडिया से जुड़ा होगा। उनकी किताब आई है " एन अनसर्टेन ग्लोरी "  उस इंग्लिश नाम का उर्दू में अनुवाद है।  मगर ऐसा खुद उनकी बात हरगिज़ नहीं है क्योंकि उनकी शोहरत दुनिया मानती है। इंडिया जो भारत है उसकी सरकार जिनको देश में रहते नहीं पहचानती है उनको जब नोबेल  पुरुस्कार मिलता है तब सम्मानित करती है संसद में बुलाकर भी। मगर जिस कारण उनको नोबेल पुरुस्कार मिला उस अर्थशास्त्र की बात नहीं मानती है। अपनी इस नई किताब में उनका कहना है कि 2014 में इंडिया जो भारत है ने उल्टी दिशा में इक लंबी छलांग लगाई है। उधर इक उच्च अधिकारी वित्त मंत्रालय में हैं हंसमुख आधिया उनका कहना है कि जी एस टी की नाकामी की वजह इनफ़ोसिस का बनाया सॉफ्टवेयर है जो ठीक काम नहीं कर रहा है। हम इस सब को यहीं छोड़ देते हैं ये सियासत की बातें हैं अपनी समझ से बाहर हैं। दुनिया के दस्तूर निराले हैं नाम शोहरत वालों के पीछे दौड़ती है मगर जो वो कहते हैं सुनती ज़रूर है मानती कभी नहीं है। 
                        इक पुलिस वाला आया कागज़ों का पुलिंदा लेकर , दूर किसी शहर में कब से कोई मुकदमा चल रहा है और आपकी लिखावट पाई गई है , आपको वहां की अदालत में जाकर गवाही देनी है। मुझे कुछ समझ नहीं आया कि माजरा क्या है , मगर अदालती नोटिस है जाना तो होगा ही। अदालत जाने पर मालूम हुआ कि बहुत पहले इक रचना भेजी थी , मैंने ख़ुदकुशी नहीं की , मेरा कत्ल किया गया है। सच के कत्ल होने की बात थी मगर उस में अदालत पुलिस कहां से आ गये। पता चला कि डाकिया जब डाक को छांट रहा था इक लिफाफा खुल गया और उसने पढ़ भी लिया। उसने समझदारी दिखाते हुए जिनको भेजी गई थी रचना उनके बारे ये समझा कि किसी ने ख़ुदकुशी से पहले उनको दोषी बताया है। पुलिस ने करवाई की और उनको पकड़ लिया , इतना ही नहीं कागज़ों पर आदान प्रदान करते उस नाम के व्यक्ति की मौत की पुष्टि और जाने क्या क्या कर दिया। मैंने कहा न्यायधीश महोदय ऐसा कोई कत्ल वास्तव में नहीं हुआ और ये केवल इक व्यंग्य कहानी है सच के हो रहे कत्ल के बारे में। न्यायधीश बोले तुमसे जो सवाल पूछे जाएं उनके जवाब देने हैं। सच को कत्ल किया गया , तुम मानते हो। ये लोग भी सच को कत्ल करते हैं , आपको ये भी लगता है। लिखावट आपकी है इस से मुकर नहीं सकते। अभी तो आप सरकारी गवाह हैं आपको आने जाने का खर्चा भी मिलेगा , अगर बचाव पक्ष को बेगुनाह बताया तो तुम्हें भी उन्हीं में शामिल किया जा सकता है। भोजन अवकाश में पुलिस वाला समझाने लगा जैसा हम चाहते हैं वही बयान दो इस में तुम्हारी भलाई है। ये बड़े लोग हैं और टीवी मीडिया सब इस खबर को कवर कर रहे हैं। तुम्हारा नाम हो जायेगा और मश्हूर हो जाओगे। आप क्या सलाह देते हो सरकार और नेताओं की तरह झूठी शोहरत हासिल कर लूं। अपनी आत्मा अपने ज़मीर को मार कर खुद की खुदी को बेच कर ख़ास लोगों में शामिल कर इस मुकदमें पर टीवी अख़बार में बहस का हिस्सा बन धन दौलत जमा करने लग जाऊं इनकी तरह से। नहीं होगा मुझसे। अदालत को सब सच सच बताया और सबूत भी दिया कि ये रचना कई जगह छप चुकी है बहुत पहले ही और मेरे ब्लॉग पर भी लिखी हुई है। मुकदमा झूठा है बताना संभव नहीं था इसलिए अदालत ने निर्णय दे दिया है साक्ष्य नहीं मिलने और अभी तक सच की लाश बरामद नहीं हो पाने से सबूतों के आभाव में बरी किया जाता है।

Tuesday, 10 July 2018

जो जाना नहीं औरों को समझाते हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  जो जाना नहीं औरों को समझाते हैं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

 

    आग को हवा देना उसमें मिट्टी का तेल डालना किसी के ज़ख्मों पर नमक छिड़कना कोई भी कर सकता है। दूर से बैठे तमाशा देखने वालों की कमी नहीं है , आग लगी हो उसको बुझाने कोई नहीं जाता। सब अपना दामन बचाते हैं , किसी को नहीं मतलब कि आग बुझाई नहीं तो कभी अपना भी घर जला देगी। जो कभी खेत खलिहान नहीं गये धूप में हल नहीं चलाया सर्दी की बर्फीली रात को खेतों को पानी देने नहीं गये बरसात और तूफ़ान में खुले आसमान में अपनी फसलों को बचाने में अपनी जान का जोखिम उठाया नहीं। उनको अनाज की समर्थन मूल्य की कीमत कैसे समझ आएगी। लेकिन मुझे बात और करनी है देश की देश के सर की स्वाभिमान की। किसान की बात इसलिए की क्योंकि भले कभी मेरे पास खेती की ज़मीन थी मगर मैंने खुद कभी किसानी नहीं की , बहुत मेहनत का काम है। बस इसी तरह लोग देश की समस्याओं पर समझे बगैर बोलते हैं। आपने इश्क़ किया है कभी , नहीं किया तो आप क्या जानों ये क्या बला है। अभी भी आपको इश्क़ का मतलब आदमी औरत की मुहब्बत लगा हो तो हैरानी की बात नहीं है। इश्क़ मुहब्बत वतन से भी होता है और करने वाले खुदा से भी मुहब्बत करते हैं , मेरा जूनून है लिखना ये मेरा इश्क़ है। सच कहता हूं जब कोई बात विचलित करती है देश की समाज की तो नींद नहीं आती बेचैनी बढ़ती जाती है। आसान नहीं होता है किसी विषय पर लिखना , पहले सोचना समझना पड़ता है हर तरह से हर तरफ से। लोग पढ़ते हैं या नहीं मगर केवल शीर्षक देख कर अपनी राय बना लेते हैं। पायल के ग़मों का इल्म नहीं झंकार की बातें करते हैं। किसी ने अपने करीबी ने मुझे इक वीडियो भेजा जिस में बेहद खराब भाषा का उपयोग तो किया गया ही था साथ में महिलाओं को लेकर अपनी गंदी सोच को भी उजागर किया गया था। कश्मीर को इक बेवफा औरत बता रहे थे , और जो जो बोल रहे दोहराना भी अनुचित है। शायद इन्होंने ही कुछ समय पहले सेल्फी विद डॉटर की बात भी की हो जिसे आजकल शायद कम लोग करते हैं। उन्हें कुछ भी पता नहीं है , देश का बटवारा रियासतों का भारत पाकिस्तान में जिसे मर्ज़ी चुनना और कश्मीर के राजा का भारत में मिलने का निर्णय और उसके बाद बहुत कुछ जिसे इतनी आसानी से नहीं समझा जा सकता। उन्हें कुछ नहीं पता धारा 370 क्यों और कश्मीर को विशेष दर्जा देने का कारण क्या था। क्यों शेख अब्दुल्ला को सालों तक कैद रखा गया और किस ने उनसे समझौता किया ताकि कश्मीर के लोगों को भारत में शामिल होने को राज़ी किया जाये और उनके दिलों को जीत कर भरोसा दिलाया जाये उनकी कश्मीरियत को बचाये रखने का। ये जो लोग सवाल करते हैं कश्मीर से मिलता क्या है और उस पर खर्च कितना आता है , उन्होंने कभी विचार ही नहीं किया कि इस देश में जिस में भूख है गरीबी है एक राष्ट्रपति निवास जो 150 एकड़ में फैला हुआ है उसी के रखरखाव पर करोड़ रूपये तक हर दिन खर्च किये जाते हैं। देश में बहुत राज्य हैं जिनको अधिक सहायता की ज़रूरत होती है और खर्च  करने पड़ते हैं मगर ऐसा किसी का उपकार नहीं है संविधान सभी को बराबरी की बात करता है। इस तरह की बातें करने वाले शायद जानते ही नहीं कि देश की संसद ने संकल्प लिया था कोई। स्वाभिमान को सिक्कों से नहीं तोला जा सकता। कश्मीर सर के ताज की तरह है और आप कहते हैं उस पर मुकट की ज़रूरत क्या है। हम लोग शायद कभी नहीं समझना चाहते कि कुछ चीज़ें राजनीतिक फायदे नुकसान से ऊपर होती हैं , और जो लोग राम मंदिर समान नागरिक संहिता धारा 370 की बात करते हैं उनको सत्ता की चाहत थी उनका मकसद किसी समस्या का समाधान नहीं था। सत्ता मिली तो सत्ता को बनाये रखना ही ध्येय बन गया। आज वो किसी वादे की बात नहीं करते , अच्छे दिन कब आएंगे या आये तो किसके हिस्से में , या फिर यही जो आजकल हैं वही हैं अच्छे दिन। ऐसे सभी कठिन सवालों से बचने का ढंग है जनता को आपसी भेदभाव जाति धर्म क्षेत्रवाद के नाम पर बांटना। कश्मीर पर कितना धन खर्च होता है के साथ कभी पता करना दिल्ली पर कितना धन खर्च होता है , इससे भी आगे बाकी दिल्ली और लुटियन की दिल्ली में कितना अधिक अंतर है। हर बात पर बिना जाने समझे कुछ भी कहने से पहले समझना होगा वास्तविकता को। समझने को फुर्सत नहीं पढ़ने की आदत नहीं लिखने को वीडियो बनाने को स्मार्ट फोन है। तलवार हाथ में आना काफी नहीं है , तलवार सुरक्षा भी करती है और ज़ुल्म अत्याचार भी करती है। बोलने की आज़ादी दोधारी तलवार की तरह है। गांधी जी कहते हैं इंसान बोलना दो चार साल में सीख जाता है मगर जीवन गुज़र जाता है ये सीखने में बोलना क्या है और कैसे है। ग़ालिब का इक शेर है। इस विषय का अंत करना बेहद मुश्किल है।  सागर को गागर में भरना किसे आता है। ग़ालिब की बात को समझना ज़रूरी है :-

                      हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है ,

                      तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़ ए गुफ्तगू क्या है।

                     रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल ,

                     जब आंख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।

Monday, 9 July 2018

कायरता की कथाएं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       कायरता की कथाएं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

        शीर्षक कायरों की कायरता का इतिहास भी रखा जा सकता था मगर इतिहास लिखने वाले आजकल बचे नहीं हैं। इतिहास को तोड़ मोड़ कर अर्थ का अनर्थ होने लगा है। आजकल केवल झूठ का इतिहास लिखने का चलन है और उसे लिखने से अधिक घड़ा जा रहा है। लोग फेसबुक पर फॉलोवर्स की गिनती का इतिहास बनाने में लगे हैं अभी तक इसका हासिल क्या है कोई नहीं जानता है। खुद अपनी बढ़ाई करने की आदत ने आदमी को खिलौना बना दिया है। सच लापता है मिलता ही नहीं और झूठ हर गली चौराहे अपना शोरूम खोले हुए है। कायरता को अपनी साहूलियत से अच्छा सा कोई भी नाम दिया जाता है ताकि अपने भीतर की खीझ को ढका जा सके। सच ज़ुबान पर लाते ही नहीं हैं , झूठ बोलते ज़ुबां लड़खड़ाती भी नहीं। शर्म आना किसे कहते हैं अब शर्म से गाल लाल नहीं होते जब आशिक़ हुस्न की तारीफ करता है। नज़र झुकती नहीं न ही चार होती है , मुहब्बत भी तो कितनी बार होती है। ये राजनीति की दुकान है सौ टका की छूट है , फिर भी समाजसेवा में तगड़ी कमाई है , तरह तरह की लूट है। भाषणों में बहुत दहाड़ते हैं दो दिन बाद मुकर जाते हैं और पल्ला झाड़ते हैं। 
                         खुद को मुखर बतलाता है , जब बोलना हो झूठ खुद जुबां पर आता है। सच कहता हूं बार बार दोहराता है सच कहने से मन घबराता है। राग दरबारी खूब गाता है सरकार से जो मांगता है सब पाता है। झोली सरकार के सामने हर दिन फैलाता है , भीख लेता है मगर दाता कहलाता है। पांव सत्ता की कुर्सी के दबाता है जितना नीचे झुकता उतना ऊपर उठता जाता है। तमगे सीने पर लगवाता है। ज़मीर को मार कर अमीर होता जाता है। कौन जाने किस किस से कैसा नाता है , हर गधे को अपना बाप बताता है। जाने को मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाता है मगर धर्म कर्म से नहीं दूर का भी रिश्ता नाता है। भगवान जाने भगवान को क्या चढ़ाता है आता है खाली हाथ खाली जेब मगर वापस कभी नहीं खाली जाता है। कोई नहीं जनता मकसद क्या उसको लाता है , भगवान खुश हुआ दिल को बहलाता है। याद कब रखता ऊपर वाले का भी अपना बही खाता है जो हिसाब किताब में नहीं चूक पाता है। 
                        अभी आपको समझ नहीं आया शायद कथा किस किस की है। अब समझाता हूं।  नारद जी बहुत आते जाते हैं धरती पर और हर बार भगवान को कुछ नया सुनाकर खुश कर देते हैं। नारद जी बोले भगवन आपने पता लगाने को कहा था आपके भारत में शराफत कितनी बची हुई है। ऊपर उसी पर विवरण बताया जो अभी आप भी नहीं समझे ऐसा लग रहा है। हर कोई राजनीति में घुसना चाहता है क्योंकि ऐसा करते ही आप शराफत की चादर ओढ़ कर बदमाशों से बड़े बदमाश बन सकते हैं। अधिकतर लोग जो शरीफ हैं बदमाश बनना चाहते हैं शराफत से पीछा छूटता ही नहीं है। जब सत्ताधारी दल के छोटे छोटे नेताओं से मिलकर अपनेपन से बात की तो पता चला वो अपने दल के बड़े नेताओं की गलतबयानी और मनमानी से परेशान ही नहीं हैं बल्कि उनको लगता है बड़े नेता उनका शोषण करते हैं। पाप ऊपर वाले करते हैं मगर पापी ये नीचे के लोग समझे जाते हैं , जब मतलब हो उनको बलि का बकरा बना देते हैं सूली चढ़ाते हैं। ये सभी खुद आज अपने लिए बोलने की आज़ादी से वंचित हैं लोकतंत्र की झूठी बातें करने वाले बड़े बड़े नेताओं द्वारा अनुशासन की तलवार के डर से। नाम भर को कहीं दूर दराज शहरीकरण से बचे लोग शराफत से रहते हैं। अन्यथा अधिकतर शहरी लोग मज़बूरी में शरीफ और ईमानदार हैं।
                  वास्तव में अधिकतर लोग बुरे नहीं हैं मगर बुराई के साथ होते हैं कुछ पाने को कभी , तो कभी कुछ खोने के डर से। ये शायद विडंबना की बात है कि आज़ादी के इतने साल बाद भी लोग खुद किसी न किसी की गुलामी या चाटुकारिता के आदी हैं। उनको नहीं मालूम इतना भरोसा भगवान आप पर रखते और सच्चाई की राह चलते तो जो मिलता वो कितना अनमोल होता है। जिसे लोग समझते हैं बेहद शक्तिशाली है वो कितना कमज़ोर है और हर पल इक डर सताता है उसे सत्ता खोने का। अभी तक पुराने नेताओं को बुरा साबित करने में खुद को छोटा बनाने का काम करता आया है। जबकि उसे भी मालूम है कि उन लोगों ने ही लोकतंत्र को मज़बूती से स्थापित किया तभी आज उसके हाथ सत्ता है। मगर आज खुद वो सब से महान ही नहीं समझता बल्कि जैसे भी हो सत्ता पर काबिज़ रहना चाहता है। उसका मनसूबा देश की जनता को विवश कर केवल उसी के दल को वोट देने का ही नहीं साथ में दल में भी भीतरी लोकतंत्र को पूरी तरह खत्म करने का है। आप उसकी मुस्कुराहट देख सोच ही नहीं सकते उसके भीतर क्या है। मन की बात करता है मन ही मन , जिसे लोग मन की बात समझते हैं वो क्या है खुद वो भी जनता नहीं। शराफत की बात करना आजकल दुश्वार है।

Sunday, 8 July 2018

लाज का घूंघट उतार दिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     लाज का घूंघट उतार दिया ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

        राज़ की बात खुलेआम कह दी। पहले एक दल का नाम लेते थे उस से देश को मुक्त करवाना है। अब बोलते हैं उस से मुक्त हो गया देश अब सभी विपक्षी दलों से भारत को मुक्त करवाने की तैयारी है। आगे आगे देखिये होता है क्या , अच्छे दिन देख लिए अब रोता है क्या। ये उन लोगों को आदर्श मानते हैं जिनको जब देश गुलाम था तब अंग्रेजी शासन से आज़ादी अच्छी नहीं लगती थी। गुलाम रहना नसीब नहीं हुआ तो देश को अपना गुलाम बनाने की राह चले हैं। याद नहीं किस ने कहा था सबका साथ सबका विकास। ये कैसा लोकतंत्र लाना चाहते हैं जिस में कोई विपक्ष ही नहीं हो। सब विपक्षी दल बुरे केवल आपका दल अच्छा। आपका सपना खुदा न करे सच हो गया तो उसके बाद किस से देश को मुक्ति दिलवाने की बात करोगे।  यकीनन अगली बारी विरोध करने वालों की होगी। न जाने ये देशभक्ति की कैसी परिभाषा गढ़ी है जिस में देश के संविधान को ही दरकिनार करना चाहते हैं। ये तो हद है 180 डिग्री घूम कर चाईना और रशिया , रूस और चीन की तरह का शासन लाने का इरादा है जिस में सत्ताधारी दल को ही चुनना होगा। अभी तक तोड़ने की बात करते रहे हैं जोड़ने की कब सीखोगे। बनाना कठिन है मिटाना आसान है। लोग आज भी आपके दल के उसी नेता की बात करते हैं जिस ने करिश्मा कर दिखाया था 24 दलों को साथ रखकर सरकार बनाने और चलाने का। लोग उनको महान समझते हैं जो अपने विरोधी को भी अपना बना सकते हैं। आप लगता है जो साथ दे उसी को खत्म करना चाहते हैं , ये किस धर्म में किस राजनीतिशास्त्र की किताब में लिखा है। जो लोग ये मानते हैं कि जो हमारे साथ नहीं वो दुश्मन के साथ है और हमारा दुश्मन है वो खुद ही आप अपने दुश्मन होते हैं। जिस दल में ऐसे बयान देने वाले नेता सत्ता में हों उनको बाहर किसी दुश्मन की क्या ज़रूरत है। आपको खतरा किसी भी और दल से नहीं है खुद अपने आप से है। आपका अहंकार आपका सबसे बड़ा दुश्मन है।

मुझको यारो माफ़ करना मैं नशे में हूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

 मुझको यारो माफ़ करना मैं नशे में हूं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

       दौलत का नशा उत्तर जाता है , शोहरत का नशा पागल कर देता है और हद से ज़्यादा नाम होने पर बदनामी कब मुकदर बन जाये पता नहीं चलता है। सत्ता का नशा जब चढ़ता है तो इंसान भगवान को भी चुनौती देने लगता है मगर जब सत्ता जाती है हाथ से तो फिर भगवान भी साथ नहीं देता है। महफ़िल में सभी मदहोश थे फिर भी हर कोई अपनी कहानी सुना रहा था कौन सुनता है कोई नहीं जानता। अगली सुबह किसी को रात की बात याद नहीं होती है। उनका भाषण जारी है , किसी ने इशारा किया सरकार आप आराम करो अभी आप नशे में हैं। डांट दिया मैं कभी कोई नशा नहीं करता तुम मुझे नशे में बताते हो। कनक कनक से सौ गुनी मादकता अधिकाय , वा खाये बौरात है ये पाये बौराय। सोने में धतूरे से सौ गुना नशा होता है , धतूरा खाने से नशा चढ़ता है सोना पाने से ही नशा हो जाता है। आप सत्ता के नशे में चूर हैं , अभी आपको मंज़िल तलाश करनी हैं पास हैं फिर भी दूर हैं। गाड़ी में बैठे लगता है सब पेड़ पौधे सड़कें पीछे की तरफ भागते जा रहे हैं। आप को शायद अनुभव नहीं है इतने लंबे सफर का जो दिन चढ़ते शुरू होता है और सब बहुत सुहाना लगता है , साथ कोई साथी अच्छा हो तो दिल करता है ये सफर हमेशा चलता ही रहे। मगर जब शाम ढलने लगती है और रौशनी कम हो रही होती है तब तेज़ चलाने लगते हैं गाड़ी को। मगर तब लगता है रास्ता और लंबा होता जा रहा है , अंधेरा बढ़ता जाता है तब गाड़ी में बैठे मुसाफिर को लगता है जैसे हम उल्टी तरफ को जा रहे हैं। आजकल वही हाल है आप सुबह से दोपहर बाद तक मस्ती में झूमते रहे , शाम होने लगी तो समझ आया कि अभी बहुत सफर बाकी है तय करना। मगर अब देर हो चुकी है। सौ साल की बात करते करते वादा करते हैं कुछ साल में सब बदलने का मगर समय कब बीत जाता है पता नहीं चलता। साल बाकी है अभी लगता है मगर हर दिन समय घटता जायेगा महीने गिनते गिनते दिन गिनने की नौबत आएगी। फिर वो घड़ी भी आनी है जब विदाई की बेला में समझ नहीं आता कौन सा गीत बजेगा। बाबुल मोरा नैहर छूटा जाये। या फिर लागा चुनरी में दाग़ छुपाऊं कैसे। चदरिया जस की तस रखनी कब किसी को आती है। अब आप चाहते हैं जल्दी से सब करना या करने का दिखावा करना मगर सावधान , ऐसे में दुर्घटना की संभावना रहती है , लेकिन आपको धीरे चलना पसंद नहीं। अभी भी आप को इतनी सी बात नहीं समझ आई कि आप जहां से चले थे वहीं पर खड़े हैं। कोल्हू के बैल की तरह गोल गोल घुमते रहे मगर पहुंचे कहीं नहीं। दुनिया वास्तव में गोल है ये तो चार साल में आपने आकाश की सैर करते देखा ही होगा। मगर आसमान में घर नहीं बनता है रहने को ज़मीन की ज़रूरत होती है। अब जब ज़मीन खिसकने लगी तो पांव थरथरा रहे हैं। आपको मेरी बात नहीं समझ आई होगी , मैं तो शुरू से समझाता आया हूं। समझते कैसे जनाब आप नशे में हैं।
       आपको पता है हमारे राज्य का हाल क्या है , अपराध बढ़ते रहे और सरकार सोती रही। खूब इश्तिहार छपवाए ईमानदारी के मगर बात किसी की नहीं सुनी। कहते हैं मीडिया वालो मुझे तुम से ज़्यादा पता है , ये ही नहीं पता कि अधिकारी आपकी आंखों में धूल झौंकते रहते हैं।  आप जब जब किसी शहर जाते तब तब उसी शहर की सफाई उसी जगह की चार दिन करते हैं और फिर वही सब होने लगता है। दफ्तर में बैठे दर्ज हुई शिकयतों को गिनती घटाने का काम करते हैं। पुलिस को कानून व्यवस्था सुधारने की चिंता नहीं आये दिन तमाशे करते हैं नाच गाना ताकि लोगों का मनोरंजन हो सके। आप जाकर आशावादिता का सबक पढ़ाते हैं और अंधेरी रात को दिन समझने का ढंग बताते हैं। सावन के अंधे जैसे हमेशा सब तरफ हरियाली बताते हैं। थक गए हैं मगर थकते नहीं हैं चल रहे हैं चलते रहे जीवन भर भागते जाते हैं। जो कहानी खुद नहीं पढ़ी कभी जाने कैसे उस कहानी का किरदार निभाते हैं। ज़रा सी बात पर ताव खाते हैं और मीडिया वालों को तहज़ीब सीखने का उपदेश दे आते हैं। उपदेशक इसी में मार खाते हैं।


             अब विपक्षी दलों से भारत को मुक्त करने की तैयारी

   8 जुलाई को फरीदाबाद में मनोहर लाल जी दो दिवसीय मंथन में उपरोक्त विचार व्यक्त करते हैं। भगवान न करे उनका ख्वाब सच हो मगर उनकी मंशा डराती है। जब विपक्ष नहीं होगा तो लोकतंत्र कैसे होगा , क्या रूस और चीन की तरह नाम को वोट डालने होंगे या फिर चुनाव आयोग की ज़रूरत ही नहीं होगी। खैर अच्छा किया लाज का घूंघट उतार दिया। पहले एक दल खराब बताते थे अब आपको छोड़ सभी खराब हैं की घोषणा कर रहे हैं। आगे आगे देखते हैं होता है क्या , देख कर  दिन अच्छे रोता है क्या। आपके आदर्श वो लोग हैं जो देश की आज़ादी के आंदोलन में साथ नहीं थे विदेशी शासक अच्छे लगते थे , गुलामी की जंजीरों को तोड़ने में कुछ नहीं किया अब देश को गुलाम बनाना चाहते हैं। विपक्ष होना ज़रूरी है। एक वो भी नेता आप ही के दल के हैं जो 24 दलों को लेकर गठबंधन की सरकार चलाने का करिश्मा कर सकते थे और आप हैं कि मैं ही मैं की बात करते हैं। किसी शायर ने समझाया था , हमीं हम हैं तो क्या हम हैं , तुम्हीं तुम हो तो क्या तुम हो। थोड़ा संविधान को समझ लो अच्छा है।  पुराने लोग समझते थे पहले सोचो , फिर तोलो फिर बोलो। अभी पॉज ले लो बाद में पछताना नहीं पड़ेगा। सलाह अच्छी कोई भी दे मान लेनी चाहिए। आगे आपकी मर्ज़ी। 

Saturday, 7 July 2018

शोहरत की कामना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

         शोहरत की कामना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

            मुझे याद है मेरे इक जन्म दिन पर मेरे बेटे ने मुझे उपहार में एक डायरी दी थी , उस पर अंग्रेजी भाषा में लिखा था " शोहरत इक गुनाह बन जाती है जिस पल आप उसकी कामना करते हैं। ये आपके आचरण पर है कि आपको शोहरत नसीब होती है अथवा नहीं। " आज भी वो डायरी मेरी अलमारी में सुरक्षित है। मुझे नहीं पता बेटे ने जब लिखी ये बात तब उसके मन में क्या रहा होगा। जहां तक खुद को मैं जनता हूं मैंने कभी कोई काम शोहरत हासिल करने को नहीं किया। बहुत काम उल्टा ऐसे किये और करता रहता हूं जिस से मुझे शोहरत या नाम नहीं बदनामी मिल सकती है शायद फिर भी मेरा ज़मीर मुझे विवश करता है जनहित और अपने लेखन की ईमानदारी को कायम रखने को। अभी इक दोस्त ने कहा मेरी पोस्ट पर लोग लाइक या कमेंट करने से बचते हैं इस डर से कि उनको सरकार विरोधी नहीं समझा जाये। जबकि सच किसी के विरोध में नहीं होता है। 
                 आज नाम की बात नहीं करते , किस किस का नाम लिया जाये। सभी तो नाम शोहरत के पीछे भाग रहे हैं। जाने क्या क्या नहीं अपनाते ढंग , सोशल मीडिया पर अधिकतर को किसी भी तरह यही चाहिए।  लोग समाजिक संस्थाओं में शामिल होते हैं मगर उद्देश्य शोहरत होती है समाज की भलाई नहीं। आप का बहुत नाम है देश विदेश में शोर है आपके नाम के चर्चे हैं फिर भी आपको लगता है आपसे पहले के नेताओं से अच्छे हैं आप और लोग उनको अच्छा नहीं समझें और आपको उनसे अच्छा समझें। लोग किसी को टंगड़ी लगाकर गिरा कर उससे आगे जाना चाहते हैं। जिनका मकसद औरों को बुरा साबित करना होता है उनको अक्सर निराश होना पड़ता है। हम जिस समाज में रहते हैं वो हमेशा मुहब्बत बांटने वालों को याद करता है नफरत फ़ैलाने वालों को हम कभी नायक नहीं समझते हैं। उसने ये नहीं किया उसने वो गलत किया यही दोहराने से आपको शोहरत हासिल नहीं हो सकती , खुद आपने जो किया उसी से निर्धारित होगा आपको क्या जगह मिलती है। मुझे बहुत लोग नीचा दिखाने का जतन करते हैं मगर मैं कभी उनकी बातों का बुरा नहीं मानता हूं। निंदक नियरे राखिये। सबक सीखता हूं। पाना कुछ नहीं है न खोने को है कुछ भी। इसलिए अपना कर्म करता रहता हूं। मुझे मेरे बाद कोई याद रखे ऐसा ख्वाब नहीं देखता। किसी शायर का इक शेर उधार लेकर अपनी बात कहता हूं :-

             बाद ए फनाह फज़ूल है नामो निशां की फ़िक्र ,

                जब हमीं न रहे ,  तो रहेगा मज़ार क्या। 

      कल फिर राजस्थान में मोदी जी की अपने ही पसंद के बुलाये लोगों की जामातलाशी ली गई। दुष्यंत कुमार कह गए थे , फिरता है कैसे कैसे ख्यालों के साथ , उस शख्स की जामातलाशी तो लीजिये। ये ख्याल दिल वाले बहुत डराते हैं , हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खटटर तो डरते थे अब मोदी जी की सभा में सुक्षाकर्मी लोगों की तलाशी ले रहे थे कि किस किस ने काले रंग का कुछ भी पहना हुआ तो नहीं है। काले झंडे काली पट्टियां दुनिया भर में विरोध का सभ्य शांतिपूर्वक ढंग समझे जाते हैं। ये कोई खतरे की चीज़ नहीं हैं , शायद फिर आपत्काल से पहले जयप्रकाश नारायण के भाषण की बात दोहराना ज़रूरी है। सुरक्षा कर्मी की निष्ठा देश के लिए होनी चाहिए किसी राजनेता या अधिकारी के लिए नहीं और अगर शांतिपूर्वक विरोध करने वालों पर कोई नेता या अधिकारी बलप्रयोग की बात करता है तो उनका हुक्म नहीं मानना है। जिसे जनता के कपड़ों के रंग पर भी ऐतराज़ है उसे जनता के बीच जाना ही नहीं चाहिए। ये आपका डर आपको कहीं का नहीं छोड़ेगा। मोदी जी के अंध समर्थक तो कहते हैं जब सभी किसी के विरोध में खड़े हों तो समझो आदमी बढ़िया है। मोदी जी विरोध भी शोहरत दिलाता है। मुझे याद है , मैं बंसी लाल जी का समर्थक नहीं हूं , उनकी बात याद आई तो बता रहा हूं , काली पट्टियां काले झंडे दिखाने वालों को लेकर उन्होंने कहा था मेरी मां 36 गज़ काले कपड़े का घाघरा पहनती है। जिनका रंग गोरा होता है उन पर काला रंग और निखार ले आता है। आप तो बेदाग़ होने का दम भरते हैं फिर काले रंग से क्यों इतना डरते हैं।

उसी राह पर उसी मोड़ पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     उसी राह पर उसी मोड़ पर ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     हो रहा है हूबहू , जैसा फिल्मों में होता है। गीत याद आया थरी इडियट फिल्म का। बात तब 1975 की और थी जस्टिस जगमोहन मिश्र ने फैसला सुना दिया था इंदिरा गांधी को गद्दी छोड़नी होगी उनका चुनाव अवैध घोषित किया जा चुका था। उनका बेटा बसों में भर भर कर हरियाणा यूपी से लोग ला रहा था दिल्ली में इक चौक पर नारे लगाने को। मैं तब दिल्ली में रहता था। भीतर से खुद को कमज़ोर और बेबस महसूस कर रही इंदिरा गांधी को खुद अपने समर्थको की भीड़ से अपनी जय के नारे लगवाना इक ढांढस की तरह था। आज जब वही बात मोदी जी को राजस्थान में दोहराते हुए अपनी ही राज्य सरकार द्वारा सात करोड़ ऐसे लाखों लोगों की भीड़ जुटाने को खर्च करवाने की खबर सुनी तो लगा बात अंदाज़ वही है। ये बेहद अजीब लगता है कि कोई देश का प्रधानमंत्री केवल उन्हीं लोगों को बुलाकर सभा में चर्चा करने की बात करे जो घोषित तौर पर उनकी चार साल की योजनाओं से लाभ उठा चुके हों ये तय हो। इतना काफी नहीं बल्कि ये भी खबर आई कि कुछ लोगों को प्रशिक्षण दिया जा रहा है कि आपने कैसे जवाब देने हैं और केवल साकारात्मक ढंग से बात करनी है। एक लड़की ने ऐसा करने से इनकार कर दिया तो पता चला उसे हटा दिया सवाल जवाब करने वाले लोगों की सूचि से। हास्यास्पद बात लगती है , बात रोने की लगे फिर भी हंसा जाता है , यूं भी हालात से समझौता किया जाता है। ये राजा नंगा है कहानी दोबारा बार बार याद आ ही जाती है। शाबास उस देश की निडर बच्ची के साहस को। बेटियां वास्तव में इतिहास रचने लगी हैं।
                        अभी मोदी जी की सरकार को कोई खतरा नहीं है , किसी अदालत ने भी कुछ नहीं कहा है। जनता की अदालत में जाना है साल बाद , अभी चार साल का जश्न मना रहे हो फिर क्यों ऐसी घबराहट। कोई नहीं कह रहा आप हार सकते हो , जीत का भरोसा कोई भी नहीं दे सकता किसी को। जीत हार चुनावी लोकतंत्र का हिस्सा है और देश की जनता हमेशा समझदारी दिखलाती रही है। अभी तो आपने साल पहले अपने गुणगान की खूबसूरत किताब बांटनी शुरू की है और हरियाणा में मुख्यमंत्री और पार्टी के नेता लोगों को समझने में लगे हैं आपने क्या क्या किया है। खटटर जी तो बाकयदा बैंक्विट हाल में मिलते हैं लोगों से या अभी दिन में कितनी जगह जाकर ख़ास जान पहचान वालों संग चाय की चुस्की लेते है। कोई मांगपत्र नहीं लेते साफ कहते हैं। सब उसी तरह चल रहा है जैसे आपने तय किया हुआ है। कभी कभी लगता है जैसे कंपनी के सीईओ अपने कर्मचारियों को कोई टारगेट सेट कर पूरा करने को कहते हैं। ऐसे में मुनाफा तय होता है फिर भी किसलिए घाटे की बात सोचकर दुबले होते हैं।
                    टीवी वाले भी आजकल आत्मा की बात करने लगे हैं।  दिल्ली ही की बात है 11 लोग मर गए हैं तो ख़ुदकुशी की है यही पुलिस मानकर चल रही है। उनमें कोई एक नहीं पांच आत्माओं से संपर्क रखता था और सभी घर के सदस्य उसकी बात पर भरोसा कर जो वो कहता मानते थे और खुद लिखा करते थे इक रजिस्टर में। आपको हैरानी नहीं हुई आज भी कोई कागज़ कलम से लिखता है अपनी डायरी की तरह। लोग तो फेसबुक पर लाइव ख़ुदकुशी करने तक जा पहुंचे है मगर ये लोग अभी भी इतना पिछड़े हुए थे। लगता है आपकी ऑनलाइन योजनाओं और ऐप्स से अनजान थे। किसी ओझा से बात करो कहीं आपको भी किसी आत्मा का साया तो नहीं परेशान कर रहा। कभी नेहरू कभी इंदिरा की बात करते हैं। उनको बुरा भी बताते हैं और उनकी ही तरह उसी राह उसी मोड़ पर होने का एहसास होता है। कभी कभी किसी को लगता है मैं खड़ा हूं और रास्ता चलता जा रहा है।
                 उधर पड़ोसी देश में भ्र्ष्टाचार में पनामा दस्तावेज़ों में नाम आने पर शरीफ साहब को दस साल और उनकी बेटी को सात साल की सज़ा सुनाई गई मगर आपकी सरकार बनी ही भ्र्ष्ट लोगों को जेल भेजने के वादे पर थी फिर भी जिनके नाम ऐसे दस्तावेज़ों में सामने आये उनसे कोई सवाल तक नहीं पूछता है। हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और जैसी बात है। सब पापी गंगा स्नान कर के पावन हो चुके हैं शायद तभी वारणसी में गंगा और भी मैली हो गई है। कोई समझ नहीं पा रहा क्या क्यों कैसे है।  जब सब बढ़िया है तो चिंता क्यों है। साल भर बाकी है और शायद दुनिया के कुछ देश बचे होंगे , करिये सैर अभी।  चार साल में चर्टेड विमान पर 377 करोड़ खर्च करने पर बधाई गरीबों की तरफ से नज़राना समझो। हर दिन हर देशवासी की जेब से केवल 25 लाख ही तो खर्च हुए हैं। महान देश है जो अपने चौकीदार को इतना देता है। विकास इसी को कहते हैं और अच्छे दिन आये मगर केवल आपके खुद के लिए।

Thursday, 5 July 2018

मूर्खों की कमी नहीं है , मूर्खता की सीमा नहीं है ( खरी-खरी ) डॉ लोक सेतिया

     मूर्खों की कमी नहीं है , मूर्खता की सीमा नहीं है ( खरी-खरी ) 

                                         डॉ लोक सेतिया 

  शायद ही कोई हो जो खुद को मूर्ख मानता हो , मगर शायद ही कोई हो जो कभी मूर्ख नहीं बनाया गया हो। हम लिखने वालों का हौसला है जो पहली अप्रैल को धूम धाम से मूर्खता दिवस मनाते हैं। बाहर लोग बुद्धीजीवी समझते हैं खुद अपने घर में मूर्ख होने की सबसे बड़ी उपाधि पाते हैं। आओ सभी समझदारो आज आपको ये सबक भी पढ़वाते हैं। आपकी नहीं अपनी कहानी दोहराते हैं। जो मूर्ख बनाने की कला जानते हैं वही पंडित जी कहलाते हैं। भगवान को भोग लगाने वाले खुद खाते हैं भक्त लोग नाम को ही प्रसाद पाते हैं। आपका भविष्य क्या है समझाते हैं। मैं तीस साल तक इस मोहजाल से बचा रहा , जो भी मिला उसी को मुकदर समझा। मगर फिर भविष्य बताने वालों की चौखट पर ऐसा गया कि सब समझ कर भी नहीं कुछ भी समझा। अच्छे दिन आने वाले हैं देश की जनता को चार साल पहले बताया गया होगा , मुझे हर साल यही राशिफल बताया जाता रहा। मुझे ज़िंदगी से नहीं कोई शिकवा गिला , अफ़सोस है जो कुंडली में लिखा हुआ बताया बस वही कभी नहीं मिला। मगर शराब नहीं पीता फिर भी उधर जाता रहा और साकी से यही कहा कभी कोई जाम मुझे भी तो पिला। थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे , मुझको बंगला कार दिला दे। कैसे केसों को दिया है , ऐसे वैसों को दिया है। सपने बेचने वालों की दुकान में सामान कुछ नहीं होता है। 
             अपने देश में भविष्यवक्ता गली गली हैं , सब कहते हैं जो भाग्य में लिखा वही मिलता है , मगर साथ साथ भाग्य बदलने की बात भी करते हैं। उपाय बताते हैं जाने क्या क्या नहीं करवाते हैं। सच ये है जेब खाली करवा हम खाली हाथ आते हैं। अगर वास्तव में इन सब से समस्याओं का निदान होता तो अपने देश में इतने लोग हर दिन यही करते  करवाते हैं , उस से सब ठीक हो जाता। सरकार नेता अधिकारी सभी हर काम का शुभ मुहूर्त निकलवाते हैं ये पुल फिर भी गिर जाते हैं।  हम वो लोग हैं जो बच गए तो शुक्र मनाते हैं मरने वालों की कब्र पर फूल चढ़ाते हैं।  मौत आई थी आनी है आएगी दोहराते हैं। चलो देखते हैं अच्छे दिन वाले अबके क्या ख्वाब बुनकर बहलाते हैं। आज आपको इक सच्ची कथा सुनाते हैं। 
                    घटना सच्ची है नाम नहीं बताना उचित। कोई अपने कारोबारी भागीदार को साथ लेकर मीलों दूर इक जाने माने ज्योतिषाचार्य की चौखट पर गया। साथ उसका परिवार भी था। इस कहानी का कल रात की ज़िंदगी के क्रॉस रोड्स से कोई संबंध नहीं है। हाथ की रेखाओं को देखकर पति को कष्ट की बात बताई और पत्नी को लंबी आयु की बात समझाई। वापस आने के महीने भर बाद पत्नी की अचानक बारी आई , उसकी मौत से भागीदार बहुत घबराई। उनसे सवाल पुछवाया ये पहले क्यों नहीं बताया भाई। तब ज्योतिष विज्ञान की परिभाषा गई समझाई। पति को कष्ट आना था तभी पत्नी को जाना था। महिला की लंबी आयु में दोष उसके पति की लंबी आयु को रखा उपवास सफल रहा खुद सदा सुहागिन रही पति को अकेला कर आई। 
         वास्तुशास्त्र वाले घर के द्वार पर धातु की बनी शेर की भाला लिए खड़े सुक्षाकर्मी की , कोई तलवार को दीवार पर टंगवा कर उपाय करता है सुरक्षा का। देश की सीमा पर वास्तुशास्त्रीय सुरक्षा होती तो आतंकवादी कैसे भीतर आते। राजनेता कभी पड़ोसी देश के साथ जंग नहीं करने की बात नहीं करते हैं , उनका मिलना इस बात को लेकर होता है कि कब ब्यानबाज़ी करनी है कब फूल भेजने हैं और कब सीमा पर लड़ाई और नफरत की बात करना फायदे की बात है। हर कोई दूसरों को मूर्ख बनाकर अपना उल्लू सीधा करता है , सब चाहते हैं कोई मिले जिसे बुद्धू बनाकर समझदार होने का प्रमाण हासिल किया जाये। मगर इक कहावत है कि आप कुछ लोगों को कुछ समय तक मूर्ख बना सकते है लेकिन सब को हमेशा के लिए मूर्ख नहीं बनाया जा सकता। आज़ादी के सत्तर साल बाद देश की जनता मूर्ख बनती रही है मगर हमें मूर्ख बनाने वाले लोग बदलते रहे हैं। कोई पांच साल तो कोई दस साल तक मूर्ख बनाने में कामयाब होता रहा है। हमारी जन्म कुंडली में कोई मंगल शनि राहु दोष नहीं है , दोष है मूर्खता काल में जन्म लिया है हमने। आपको शायद मालूम नहीं जब आज़ादी मिलनी थी तो पंडितों ने ज्योतिष वालों ने आधी रात का समय अशुभ बताया था। बस कुछ घंटे और गुलामी में रह लेते तो सुबह शुभ समय में आज़ादी मिलती और ये घना अंधेरा जो छाया हुआ है शायद नहीं होता। अंधकार को दूर किया जा सकता है मगर जब लोग गंधारी की तरह खुद अपनी आंखों पर किसी नेता या दल की निष्ठा की काली पट्टी बांध खुद ही सच नहीं देखना चाहते तो कोई रौशनी काम नहीं आ सकती है।

Wednesday, 4 July 2018

भगवान से हिसाब मांगता है कोई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   भगवान से हिसाब मांगता है कोई ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

     क्या यही धर्मराज की अदालत है , आत्मा ने निडरता से सवाल किया।  चित्रगुप्त जी भी बही खाता छोड़ उसी तरफ देखने लगे। न्यायधीश की ऊंची कुर्सी पर बैठे धर्मराज को अपना अपमान सा लगा। आप कहना क्या चाहते हैं , आत्मा से पूछा। आत्मा ने कहा जनाब आपका परिचय ही जानना चाहा क्या ये भी गुनाह है इस अदालत में। धर्मराज को कहना पड़ा नहीं ऐसा नहीं है मगर आज तक किसी ने पूछा ही नहीं सब को मालूम होता है यहीं सब कुछ चुकाना है। आत्मा ने कहा चलो मान लिया , मुझे मेरा हिसाब मत बताओ मैं जानता हूं।  अपना फैसला सुना देना मान भी लूंगा बिना कोई सफाई दिए , मगर आपकी ही तरह मैंने भी हर दिन लिखा था भगवान और भगवान की अदालत का हर हिसाब किताब। मेरे पास कोई नर्क नहीं स्वर्ग नहीं मोक्ष नहीं देने को , मगर आपको आईना तो दिखला सकता हूं। क्या देखना चाहोगे आपके खुद के कर्मों की बात। अधिक समय नहीं लूंगा संक्षेप में सीधी सीधी बात करूंगा। अदालत में मौजूद सभी आत्माओं ने ज़ोर ज़ोर से तालियां बजाईं तो धर्मराज भी घबरा गये। कहीं ये कोई लोकतंत्र की बात तो नहीं , मामला संगीन लगता है। साक्षात भगवान को आने को बुलवाया और ऊंचे सिंहासन पर बिठाकर आत्मा की बात सुन कर समझाने की विनती की। भगवान बोले कहो क्या समस्या है। आत्मा ने कहा सुनोगे ध्यान से मेरी बात पूरी की पूरी बिना बीच में कोई बाधा उतपन्न किये। भगवान मान गये मगर समय की सीमा का ध्यान रखने की बात भी
जोड़ दी टीवी वालों की तरह। ठीक है मगर कोई छोटा सा ब्रेक लेने की बात मत कहना जब जवाब देते नहीं बनता हो। ओके फाइन। 
                                भगवान आपने सभी के अच्छे बुरे कर्मों का हिसाब किताब करने का प्रबंध किया मगर खुद आपका हिसाब किताब किसी को देने की व्यवस्था नहीं की। अन्यथा हमारी सरकारों की तरह सी ए जी जैसे संस्थाएं सरकारी योजनाओं की पोल खोल देती हैं। पिछली सरकार इतनी बदनाम हुई कि पूछो मत। पांच साल बाद बदल देते हैं सभी को जब वास्तव में वादे निभाते नहीं हैं। आप पर कोई सवाल ही नहीं करता कि जिस दुनिया को बनाया उसकी हालत को कभी देखा भी है। अपने मंदिर मस्जिद गिरजाघर गुरूद्वारे जाने क्या क्या बनवा कर पत्थर की मूरत बनकर या किसी और तरह अपना गुणगान सुनते रहते हो और समझते हो सब ठीक ठाक है। कहीं कुछ भी ठीक नहीं है मगर आपको चिंता ही नहीं। बुराई पर अच्छाई की विजय दिखाई देती ही नहीं कहीं , बुराई है जो सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। सच को सूली चढ़ाया जाता है और झूठ की जय जयकार होती है। आपकी कोई अदालत ऐसी है जो आपको भी कटघरे में खड़ा करे और आपको भी दोषी ठहरा सज़ा का एलान करे। हमारे देश की व्यवस्था में लाख खामियां हैं फिर भी हमारे देश की अदालतों के न्यायधीश इतिहास रचते रहे हैं देश की प्रधानमंत्री को अदालत में बुलाकर दोषी ठहराने का फैसला देकर। ये आपके नियुक्त किये धर्मराज आपसे आपका हिसाब मांग सकते हैं। आने विचार ही नहीं किया आपके नाम पर क्या नहीं हो रहा , आप उसके लिए उत्तरदाई कैसे नहीं हैं। क्या आपका नाम जपना और आपकी अर्चना करना ही धर्म है या वास्तविक धर्म मानवता की रक्षा करना है। आप सब से बड़े जमाखोर हो कितनी ज़मीन कितने आलिशान महलनुमा घर अकेले आपकी खातिर जब करोड़ों लोग भूखे हैं बेघर हैं। लिखवा दिया पापियों का अंत करने आओगे मगर कब आओगे। सरकारी अच्छे दिनों के झूठे वादे में और आपके किये वायदे में अंतर क्या है। सोचोगे तो समझोगे कितनी बड़ी भूल की है अपनी दुनिया की व्यवस्था करना नहीं आता तो नहीं बनाई होती। हम सभी को खिलौना समझ खेलते रहे मगर कभी नहीं सोचा इंसानों पर क्या बीती है। 
          आदमी को कहा जाता सब से अच्छा है सब से उत्तम योनि है। सब से खराब आदमी ही है। छल कपट झूठ धोखा अन्याय अत्याचार हर बुराई में सब से आगे है। खुश कभी नहीं होता बेशक भगवान ही समझने लगें लोग , तब भी इंसानियत नहीं याद रखता। मुझे तो लगता है भगवान तुम अच्छे लोगों और सच्चे लोगों का कभी साथ नहीं देते , तभी अधर्मी पापी फलते फूलते हैं और ईमानदारी का जीना दूभर है। मुझे बेशक जो चाहो सज़ा दे दो , आपके बारे भी साफ साफ सच्ची बात मन की लिखता रहा हूं। चाहो तो धरती से मंगवा कर पढ़ लेना कुछ भी कल्पना से नहीं लिखा है। आपकी दुनिया की असलियत ही लिखी है। नर्क तो देखा है कोई चिंता नहीं नर्क भेज दो भले , स्वर्ग की चाह कभी की नहीं , मिलेगा भी नहीं और मिल भी जाये तो नहीं रहना मुझे। नेता लोग होते हैं जो खुद स्वर्ग की सुविधाएं पाना चाहते हैं और जनता को नर्क के सिवा कुछ नहीं देते। फिर से जन्म देना तो इंसान नहीं बनाना , इंसानों में इंसानियत बची ही नहीं। पंछी बना देना चाहे मगर पिंजरे में कैद नहीं होना , पेड़ पौधे में भी जीवन होता है कोई सुंगध बांटने वाला साफ हवा छायादार और फलदार पेड़ भी बना सकते हो। कोई रास्ता जिसे लोग कुचलकर अपनी मंज़िल की तरफ बढ़ते जाएं उसकी धूल बनकर भी रहना मंज़ूर है मगर पत्थर नहीं बन सकता तुम्हारी तरह संवेदनहीन नहीं बनना चाहता। अभी फैसला अटक गया है भगवान को मेरा लिखा पढ़ने में जाने कितना वक़्त लगेगा , मैं अभी भी कटघरे में खड़ा हूं और आरोप उस पर लगा है जो कहते है उस से बड़ी अदालत कोई नहीं है। इंसाफ तो करना ही होगा चाहे फैसला खुद भगवान के खिलाफ हो या फिर मेरे। बहुत गहरी ख़ामोशी छाई हुई है।

Tuesday, 3 July 2018

संवाद लेखक कौन है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         संवाद लेखक कौन है ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  संवाद लेखक , नहीं समझते तो डायलॉग राइटर समझते होंगे। शोले फिल्म के डायलॉग अभी तक याद हैं। कितने आदमी थे। जब तक तेरे पांव चलेंगे बसंती तब तक तेरे आशिक की सांस चलेगी। बसंती इन कुत्तों के सामने नहीं नाचना।  होली कब है कब है होली। पचास कोस तक जब बच्चा रोता है तो मां कहती है सो जा सो जा नहीं तो गब्बर आ जाएगा। इक बच्चा पूछता है ये गब्बर अंकल कौन हैं। 1973 की बात 2014 में उस से भी हिट डायलॉग याद करो। मैं नहीं आया मुझे गंगा मईया ने बुलाया है। गंगा पछताती होगी ये क्या और मैली हो गई। डायलॉग कमाल का था।  बताओ भाइयो होना चाहिए कि नहीं होना चाहिए। क्या अभिनय क्या डायलॉग का अंदाज़ देश की जनता को यही तो पसंद आता है। मुझे उस लिखने वाले की ज़रूरत है जिस ने लिखे थे  डायलॉग उनकी खातिर। नहीं नहीं बिल्कुल भी नहीं , मुझे राजनीति में नहीं आना है न कोई चुनाव लड़ना है। मुझे अपनी लिखी कहानी " हिलती हुई दिवारें " के डायलॉग लिखवाने हैं। 
      2010 की बात है ऑनर किलिंग पर लिखी मेरी कहानी छपी थी। एक फ़िल्मकार ने सम्पर्क किया फिल्म बनाने को सभी अधिकार हासिल करना चाहते थे। जब कारण पूछा तो बोले कि इस पर बहुत मेहनत करनी है और आपका सिर्फ कांसेप्ट होगा रॉयल्टी डायलॉग लिखने वाले को मिलेगी। फिर भाषा की बात करते हुए बोले कि हिंदी नहीं अंग्रेजी भाषा में डायलॉग लिखवाने हैं क्या लिख सकते हो। मेरे इक दोस्त इंग्लिश के
अध्यापक हैं उनसे लिखवा भेजी कहानी अनुवाद की हुई मगर उनको मज़ा नहीं आया। तब से कोई और निगाह में नहीं आया जो सुपरहिट डायलॉग लिख सकता हो। अचानक मन की बात याद आई तो उनका ख्याल आया है। अभी तक मालूम  नहीं ये सारे डायलॉग किसने लिखकर दिए थे। आपको पता हो तो मुझे बता दो जो भी फायदा हुआ फिफ्टी फिफ्टी।

प्रेम रोग पर चर्चा ( वयंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         प्रेम रोग पर चर्चा ( वयंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

   छात्र सवाल पूछता है शिक्षक से , सर ये प्रेम रोग कैसी बिमारी होती है। शिक्षक बताता है आजकल ये रोग नहीं होता है इसका अंत कभी का हो चुका है। फिर भी तुम्हें मालूम होना चाहिए कि ये बेहद बुरा रोग हुआ करता था और इसकी कोई दवा भी नहीं मिलती थी। कहते थे मरीज़े इश्क़ पर लानत खुदा की , मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की। कब किसी को किस से इश्क़ का नामुराद रोग हो जाये कोई नहीं जानता था। बचाव के टोटके किये जाते थे तरह तरह के मगर रोग पर असर होता नहीं था। इस रोग में किसी का दिल किसी पर आ जाता था और दिल तो पागल है दीवाना है कहलाता था। बस उसी सूरत को हर  तरफ सामने पाता था , बिना देखे नहीं चैन आता था , मिलने पर भी दिल घबराता था। आदमी किसी काम का नहीं रह जाता था। खुद भी रोता रहता था महबूब को भी रुलाता था। आशिकों का मिलन कभी नहीं हो पाता था। लैला लैला गाता रहता और पत्थर खाता था। कोई पत्थर से न मारे मेरे दीवाने को लैला की बात किसी को समझ नहीं आई वो क्या कहना चाहती है , पत्थर से नहीं मारें तो फिर किस से मारना है। बचाना नहीं चाहती बस पत्थर की जगह जूते होते तो अच्छा होता शायद यही सोचती थी। बीसवीं सदी आते आते इश्क़ एक से नहीं अनेक से होने लगा ये रोग भयानक था एक साथ कितनों को अपने चपेट में लेने लगा था। मगर सच्चा प्यार उसी को माना जाता जो जब तक पहली वाली महबूबा की शादी किसी और से नहीं हो जाती तब तक दूसरी की तरफ आंख उठाकर भी आशिक़ नहीं देखता था। पारो नहीं मिली तभी चंद्रमुखी पास जाता था देवदास। आशिकों की दास्तान अधूरी रहती थी कभी पूरी नहीं होती थी।
              गुरूजी ये भी बताओ उस रोग का खात्मा कब और किस दवा  बचाव के टीके से हुआ। क्या पोलियो की तरह दो बूंद पिलाई जाती थी। नहीं बच्चा आज तक कोई दवा कोई इलाज नहीं मिला है इस का। पहले फोन का ज़माना आया तो पिया रंगून से फोन करता तुम्हारी याद आती है जिया में आग लगाती है। मोबाइल फोन आया तो बातें महंगी और आशिक सस्ते होने से एस एम एस ही से काम चलाते थे आशिक। लड़कियों को आशिक से फोन रिचार्ज के इलावा कुछ भी नहीं चाहिए था , मगर आशिकों को मलाल रहता था रिचार्ज वो करवाते हैं मगर बात माशूका औरों से अधिक करती है , आशिक की याद रिचार्ज खत्म होने पर ही आती थी। तभी स्मार्ट फोन किसी देवता की तरह आया और सब कुछ बदल गया। अब सभी को रोटी कपड़ा मकान के साथ इक कार और इक स्मार्ट फोन की चाहत होती थी। मोक्ष मिलना इसी को कहते हैं जब कुछ भी पाने को नहीं बचा हो। दुनिया में स्मार्ट फोन से बढ़कर कोई दूसरा सुख नहीं है।  नारद जी ने भगवान को जाकर आधुनिक ज्ञान की कथा सुनाई।
                                      भगवान अब किसी को किसी के लिए फुर्सत नहीं है सब अपने अपने स्मार्ट फोन पर व्यस्त हैं। भगवान आपको भी लोग स्मार्टली याद करते हैं हर सुबह अलग अलग संदेश मंडे तो संडे सातों दिन शुभ सौम मंगल बुध वीर शुक्र शनि रविवार। खुश अब आप भी। मनोरंजन बन गया है सब कुछ ज्ञान विज्ञान क्या धर्म कारोबार क्या , मिलना जुलना नहीं ज़रूरी बस ऑनलाइन दिखाई दिया तो सब कुशल मंगल है। शोकसभा की खबर भी व्हाट्सएप्प से मिलती है और त्यौहार की शुभकामना भी। रामबाण औषधि की तरह हर काम एक स्मार्ट फोन से। सरकार भी स्मार्ट हो गई है लोग भी बेकार के काम में सब कुछ भूल गए हैं। इक महिला , पुरुष भी हो सकता है , स्मार्ट फोन पर बिज़ी देख यमराज को आया देख भी घबराते नहीं।  रुको भाई चलते हैं ये सोशल मीडिया पर आखिरी स्टेटस तो लिखने दो प्लीज़। पता ही नहीं चलता समय अच्छा बुरा दोनों बीत जाते हैं। यमराज को समझाया ये कितने काम का है और यमराज भी मुफ्त उपहार लेने से इनकार नहीं कर सके। आत्मा के साथ कुछ भी जाता मगर यमराज भी मन गये स्मार्ट फोन साथ होगा तो सफर में सहूलियत होगी। गूगल से रास्ता तक मालूम हो जाता है , यमराज से भी गलती हो जाती थी किसी और को ऊपर उठाकर लाने के बाद बड़ी कठिनाई होती थी। झुक गया आसमान की बात अभी भूली नहीं है। आखिरी वक़्त जो भी दिल में होता है वही आत्मा को आगे मिलता है , आजकल आखिरी वक़्त भी किसी को स्मार्ट फोन को छोड़ कुछ भी याद नहीं रहता , भगवान को भी बगैर फोन याद कैसे करें। भगवान से भी हर आत्मा मुफ्त स्मार्टफोन और मुफ्त डाटा वाला सिमकार्ड मांगती है अपने अच्छे कर्मों के बदले में। इक भक्त ने अपनी कंपनी का अनुबंध ईश्वर से कर लिया है। भगवान ने पुराने आशिकों को भी यही सोचकर स्मार्ट फोन दे दिया ताकि वो चाहे जहां कहीं भी हों बात कर सकें। मगर ये क्या उनमें कोई भी पहले प्यार से बात करने को तैयार नहीं। कितना बदल गया इंसान , भगवान भी देख बड़ा हैरान। नारद जी ने समझाया कि ये रोग खत्म नहीं हुआ है बदल गया है। आधुनिक युग का इश्क़ फरवरी महीने में ज्वर की तरह चढ़ता है एक सप्ताह को। बाकी साल कितने और काम रहते हैं करने को।  

Monday, 2 July 2018

दुनिया का पहला ऐसा मंदिर फतेहाबाद में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

दुनिया का पहला ऐसा मंदिर फतेहाबाद में ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

       तय कर लिया है मुझे ही बनाना है और अपने ही शहर में ही। शहर वालों को कुछ तो नया मिलेगा और लोग गूगल पर सर्च किया करंगें कहां बना है इकलौता ऐसे देवता का मंदिर। पहली बात मैं ही क्यों बनाऊं , आखिर झूठ के देवता को दूसरा कोई क्यों नहीं मिला। झठों की कमी नहीं है मगर शायद मुझ पर झूठ के देवता को ऐतबार है तभी मुझे साक्षात दर्शन देकर अपना मंदिर बनाने को कहा। दीपक जलाने की ज़रूरत उसी जगह होती है जिस जगह अंधेरा छाया हो , झूठ का मंदिर यहां बनाना उचित होगा क्योंकि इस शहर में सच की दुकान गली गली खुली हुई है। सच के झंडाबरदार अख़बार टीवी वाले देश दुनिया को चौबीस घंटे सच बता बता कर परेशान किये हुए हैं। झूठ मिलता ही नहीं जब ज़रूरत हो सब परेशान होते हैं। एक नेता जी को किसी स्वर्गवासी नेता का भूत परेशान किये है , सब उसी की गलती है दोहराते हैं , कभी वाराणसी में कभी मुंबई में पुल गिरता है तो समझते हैं उसी की चाल होगी कि जब मेरा शासन होगा तभी विनाश होगा। अगर भगवान राम की तरह नल नील से बनवाते पुल तो कभी नहीं गिरते। बात झूठों की नहीं झूठ के देवता की हो रही है। सब से पहले सभी को जानकारी देना ज़रूरी है कि इस तरह के मंदिर का कॉपीराइट हासिल कर लिया है मैंने इसलिए कोई दूसरा नहीं बना सकता है। 
           फतेहाबाद शहर ही नहीं हरियाणा राज्य को भी गर्व होना चाहिए कि केवल हमारे यहां ऐसा मंदिर है। शायद पर्यटन को बढ़ावा देने को रेल मंत्री यहां रेल की पटरी बिछवा दें। बुलेट ट्रैन न सही आम यात्रा गाड़ी ही सही , हम उसी से काम चला लेंगे छत पर बैठ सफर करने का लुत्फ़ उठा सकेंगे। जिनको भरोसा है झूठ आजकल सबसे महत्वपूर्ण बन चुका है उनको मेरा साथ देना चाहिए। आपको झूठ को आसमानी ऊंचाइयों तक पहुंचाना है। सच बोलने से आफत आती है झूठ बोलने से दौलत। किसे क्या चाहिए खुद तय करो। झूठ की महिमा को समझना ज़रूरी है। झूठ से लोग खुश ही नहीं होते बल्कि ख़ुशी से पागल होकर सत्ता सौंप देते हैं और झूठ की जय जयकार करने लगते हैं। कलयुग में झूठ ही सब से बलशाली है , सच को तो पीलिया रोग हो गया है। फतेहाबाद सचिवालय में उपयुक्त पुलिस अधीक्षक सहित तमाम दफ्तरों में डेंगू रोग का लारवा मिला है। वाटरकूलर नहीं ऐसी हैं सब के ऑफिस में , लारवा को शरण फिर भी उन्हीं से मिलती है। ये सभी रोग बढ़ाने में योगदान नहीं देते तो रोग क्या योग भी नहीं बचता और सभी डॉक्टर खाली बैठे मिलते। झूठ के मंदिर में इन सभी का योगदान मिलना चाहिए , झूठ से बचकर इनका गुज़ारा नहीं हो सकता है। आप निसंकोच आकर मुझे मिल सकते हैं , अगर चाहोगे तो आपका नाम किसी को पता नहीं चलेगा। मेरे पास कोई सीसी टीवी कैमरे नहीं हैं और न ही झूठ के देवता के मंदिर में लगाए जाएंगे कभी भी। सहयोग जिस तरह भी चाहो दे सकते हैं। सोचना नहीं इस को लेकर , झूठ पर मगज़मारी नहीं करते हैं।


मोक्ष की चाह , या जीवन की राह ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   मोक्ष की चाह , या जीवन की राह ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

          " ख़ुदकुशी आज कर गया कोई , ज़िंदगी तुझसे डर गया कोई "

     जीते जी स्वर्ग नहीं मिलता , नर्क खुद हमने बना रखा है धरती पर और मोक्ष की बातें करते हैं। पूरे परिवार की मौत का रहस्य कोई नहीं जनता कयास लगा रहे हैं। यहां दुष्यंत का शेर भी नहीं कह सकते। कई फाके बिताकर मर गया जो उसके बारे में , वो सब लोग कहते हैं ऐसा नहीं ऐसा हुआ होगा। अकेला आदमी ख़ुदकुशी करता है तो दो सेकंड की खबर बनती है 11 लोग मौत की आगोश में चले गये तो दो दिन यही विषय है। ये भी याद तब तक जब तक कुछ और नहीं मिल जाता हम सभी को भी और खबर वालों को भी वक़्त बिताने को। यकीन माने कोई विचलित नहीं होता है किसी भी हादिसे से सब अपना ज्ञान बघारते हैं। ये संवेदना व्यक्त करने का बेहद असंवेदनशील तरीका है। ग़ालिब ने सच कहा था , मौत का एक दिन मुआयन है , नींद क्यों रात भर नहीं आती। अगर विचार करें तो इतने लोग एक साथ मिलकर ख़ुदकुशी करने को राज़ी नहीं हो सकते। आपको हैरानी होगी इक सर्वेक्षण बहुत पहले किया गया था , जिस में पता चला कि शायद ही कोई हो जिसने कभी न कभी मरने की चाह नहीं की हो। लेकिन हम में से आधे लोग कभी ख़ुदकुशी करने की असफल कोशिश कर चुके हैं। मोक्ष कोई वस्तु नहीं है और मौत को गले लगाना साहस का काम भी नहीं है। जो भगवान को मानते हैं उन्होंने अगर वास्तव में उसे सकझा है तो उसको पाना खुद को पाना है और तमाम संत महात्मा चिंतन से अध्यन से उसे पाना अर्थात समझने का जतन करते रहे हैं। कोई उसे निर्गुण निराकार बताता है कोई उसे इंसान की तरह समझता है। आमने सामने देखना शायद हमारी सोच की सीमा है महसूस करना चाहो तो हर किसी में है सभी जगह है। इक ग़ज़ल मेरी याद आई है :-
ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं  ,
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं ,
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में ,
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को ,
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।

गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर ,
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों ,
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग "तनहा" मुझे देख लें कभी भी ,
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं।
                                          शायद हमने अपने धर्म को कभी समझना भी नहीं चाहा , कोई भी धर्म नहीं बताता इस तरह मौत को गले लगाने से मोक्ष मिल सकता है। मौत बुरी चीज़ नहीं है मौत सभी को सब दर्द सब परेशानियों सब दुःखों से निजात दिला देती है , मगर वो मौत खुद आती है हमारे बुलाने से नहीं आती है। जो विधाता को मानते है वो अगर समझते हैं मर कर उस से मिलना है तो इंतज़ार करते हैं कब वो खुद बुलाएगा। बिना बुलाये भगवान के घर भी नहीं जाना चाहिए वर्ना बाहर खड़े रहोगे मुलाकात नहीं होगी। आप किसी छोटे से ओहदे वाले से मिलने समय लेकर जाते हैं और अपनी बारी का इंतज़ार करते हैं तो जो सब से बड़ा है सब से शक्तिशाली है उसे मिलने को कितने लोग जाते होंगे। आपने अपनी बारी का इंतज़ार नहीं किया और चले गये। क्या समझा था कोई सिफारिश काम आएगी कोई रिश्वत कोई पूजा प्रार्थना आरती से खुश हो जाता होगा। इतना ही समझा तो मोक्ष के हकदार नहीं हो सकते हो। जब जन्म मरण उसके हाथ है तो आप कैसे भगवान के काम में दखल देने लगे। जितना समय टीवी वाले और हम सभी इस विषय पर चर्चा और बेकार की बहस में बर्बाद कर रहे हैं अच्छा हो उस समय का सार्थक उपयोग लोगों को ऐसे भटकाव से बचने की बातों में लगाकर कोई सार्थक पहल करते। अभी तक तो हमारी सर्वोच्च अदालत ये भी निर्णय नहीं कर पाई है कि ख़ुदकुशी करना जुर्म है या नहीं। सरकार कब से योजना बनाए इंतज़ार कर रही है ख़ुदकुशी करने वालों की सहायता करने को सेंटर खोलने को।  इसे मज़ाक नहीं समझना। ये राज़ की बात है।

Sunday, 1 July 2018

आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम ( सच्ची कहानी ) डॉ लोक सेतिया

 आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम ( सच्ची कहानी ) डॉ लोक सेतिया 

  कल शाम ही की बात है मेरी धर्मपत्नी जी बाज़ार गई थी अपने लिये कुछ नये सूट खरीदने को। अधिकतर हम एक ही दुकानदार की दुकान से खरीदते हैं कपड़े। हर बार की तरह वापस आते ही घर में मुझे दिखाये और पूछा कैसे हैं। कुछ ख़ुशी थी चेहरे पर बताते हुए कि आज ये अपनी बचपन की साथ वाले घर वाली सहेली की दुकान से खरीदे हैं और दो लेने थे मगर तीन ले आई हूं। कल से ही उसी की बातें फोन पर बहनों को भी बता रही हैं। बाज़ार से गुज़रते नज़र आई अपनी पड़ोस में बचपन में साथ खेलने वाली सखी। सालों बाद अपने घर परिवार बच्चों की बातों के साथ बचपन की पुरानी बातें याद करती रही दोनों। कितना सुंदर अनुभव होता है। क्या ज़माना था , घरों की छत के बीच नाम की दीवार होती थी , उस तरफ वो इस तरफ ये साथ साथ मिलकर खाना खाते आपस में अचार चटनी लेते देते। कभी उस बीच की दीवार पर ही चढ़ बैठते और बातें किया करते। गर्मी के दिनों छत पर ही बिस्तर लगा लेटे लेटे बातें करते सो जाया करते। आज भी बात होती है मगर ऐसी चला बंद कमरे में व्हाट्सऐप पर किसी किसी पड़ोस की दोस्त से। आधुनिकता ने कितनी दूरियां बढ़ा दी हैं। बहुत मुश्किल से मिलते हैं मधुर यादों के पल। चुराया करो आप भी जीवन से ऐसे ही कभी कभी।

Saturday, 30 June 2018

झूठ के देवता का घर ( मेरा नया व्यंग्य - 572 संख्या ) डॉ लोक सेतिया

      झूठ के देवता का घर ( मेरा नया व्यंग्य - 572 संख्या ) 

                                डॉ लोक सेतिया 

मुझे पता तक नहीं चला जाने कब किधर से दबे पांव मेरे कमरे में आ गया और सामने बैठ गया वो। राम राम कलमकार जी , चौंक गया आवाज़ सुनकर। नज़र उठाकर देखा , क्या शानदार पहनावा , सज धज और इतर की खुशबू जो मुझे भाती नहीं है। किसी को भी प्रभावित-आकर्षित कर सकता है व्यक्तित्व उसका। मैंने कहा अपना परिचय बताएं , माफ़ करें पहचानता नहीं मैं आप कौन हैं। ऐसे कैसे आ गये यहां समझ नहीं पा रहा। कहने लगे मुझे पहचान लो , मैं आजकल सबसे अधिक लोकप्रिय हूं। नाम है मेरा झूठ। आप सच लिखते रहो , बोलते रहो , मुझे कोई परेशानी नहीं है। फिर भी मुझसे दोस्ती दोस्ती नहीं करना चाहते तो जान पहचान ही सही। मुझे तो आपकी दुश्मनी भी स्वीकार है , बस मेरी इक काम में सहायता करो , यही विनती लेकर आया हूं। सच कहूं , उसकी बातें सुनकर मेरा तो सर चकराने लगा। मैंने कहा लगता है आप गलत जगह चले आये हैं , मैं आपके काम का आदमी नहीं हूं। नहीं जनाब , मैं सोच समझ कर आया हूं सही जगह पर और मेरी सहायता केवल आप ही कर सकते हैं। बस आप एक बार मेरी बात ध्यानपूर्वक सुन तो लीजिए। 
          सब से पहले आप इस बात को मान लो कि अब हर जगह मेरा ही शासन है। मेरा ही बोलबाला है , मेरे बगैर एक पल भी लोग रह नहीं सकते हैं। राजनेताओं की बात छोड़ दो , उनकी बात पर कभी लोगों ने विश्वास किया ही नहीं। धर्म वालों की हालत और भी खराब हो गई है। खुद सब करते हैं , लोभ मोह काम क्रोध अहंकार भरा हुआ है और उपदेश देते हैं अनुयाईयों को ये सब छोड़ने के। आपको सब लोग सोशल मीडिया व्हाट्सएप्प आदि पर कितने सुंदर संदेश , आदर्शवादी बातों वाले भेजते हैं और शुभकामनाएं देते हैं सुबह शाम। कितनी वास्तविक हैं ये आप को भी पता है वो भी जानते हैं। कहते हैं झूठ बोलने से कोई खुश होता है तो झूठ बोलना अच्छा है।
                        चार साल पहले जब देश में सरकार बदली थी , आपने दो आशिकों की कहानी लिखी थी। आपको नहीं पता आजकल उनका क्या हाल है। आपसे मिले नहीं आमने सामने , केवल फोन पर बताई थी आधी अधूरी अपनी दास्तां। थोड़ा सच ज़्यादा झूठ था और आप भावुक लेखक समझे ही नहीं नाम तक बदले हुए थे। कुछ दिन जिस फोन नंबर से बात की थी मतलब को वो मतलब नहीं पूरा हुआ तो नंबर बदल लिया था। जैसे देश की सरकार के हालात हैं उनका हाल भी आपको अब पता चला है , घर से प्रेमी के साथ भागने वाली लड़की दो साल से अधिक समय तक लिविंग रिलेशनशिप के नाम पर पति पत्नी बनकर रही और आखिर घर वापस लौट आई है। महीना भर हुआ उसने शादी कर ली है किसी और के साथ , फोटो देखना चाहोगे। ये देखो उसकी वास्तविक नाम की फेसबुक से डाउनलोड की है , लंगूर के हाथ अंगूर मत कहना , ये अंगूर खट्टे हैं न मीठे हैं नकली हैं प्लास्टिक से बने हुए। जिस तस्वीर को आप सच समझते रहे वो कौन जाने किस खूबसूरत लड़की की थी। आपका बचपन का दोस्त कितना भोला है , इतनी सी बात पर हैरान हो गया था कि जिस दोस्त महिला की फोटो महिला दोस्त ने लाइक की तीसरी महिला दोस्त को कह रही थी कितनी बकवास फोटो लगाई है।
                                 जो आज तक आपके लिखने का मकमसद नहीं समझ पाया , आपको लेकर राय देता है कि आपको मंज़िल नहीं मिली। खुद अपने को समझते नहीं औरों को बताते वो कौन हैं। आप भगवान की बात लिखते घबराते नहीं हैं सवालात करते हैं मगर जो नास्तिक होने का दम भरते हैं धर्म की बातों को रटते रहते हैं बिना समझे ही। सच बोलने का साहस नहीं और निडर होकर लिख सकते नहीं उनको कैसे समझाओगे समाज को सच का आईना दिखलाना ही लिखने का मकसद है आपका। मैंने कहा समझ गया और आपको पहचान भी लिया। अब साफ साफ शब्दों में संक्षेप से बताओ मुझसे क्या चाहते हो। बताता हूं , झूठ महोदय कहने लगे , इस समय सभी नहीं तो अधिकांश लोग मेरी जयजयकार करते हैं। मेरी ही पूजा करते हैं मेरे ही भक्त हैं , फिर भी मेरा अर्थात झूठ के देवता का कहीं कोई भी मंदिर नहीं है। अगर अभी नहीं बना तो फिर कब बनेगा मेरा कोई घर या मंदिर मेरी महिमा के गुणगान को। आप ये काम करने में मेरी सहायता कर सकते हैं। मुझे आप पर पूरा भरोसा है। मैंने हंसकर कहा जनाबेआली मेरे पास दौलत नहीं ज़मीन नहीं , किसी से दान मांगना भीख मांगना आता नहीं मुझे। मंदिर बनाते ही दान जमा कर ही हैं। उसने कहा आपको मांगना नहीं आता मांगोगे भी नहीं जनता हूं , आपको केवल इस बात की घोषणा करनी है कि झूठ के देवता का घर बनाना है। मेरे भक्त खुद आकर आपको धन ज़मीन सोना चांदी दे जाएंगे। मैंने कहा शायद आपको भी मालूम है कि आपके चाहने वाले भक्त अनुयाई जो भी हों , दान आदि तभी देते हैं जब उनका नाम लिखवाया जाये दानी लोगों की सूचि में। आपको लगता है कोई अपना नाम झूठ के देवता का पुजारी होने की बात लिखवा शोहरत पाना चाहेगा। झूठ खिलखिला कर हंस दिया , कहने लगा कोई भी अपना नाम लिखने को नहीं कहेगा मगर चुपके से दानपेटी में खूब पैसा डाल जाएंगे सभी भक्त।
                             मैंने कहा मुझसे कोई बैर निकालना है दुश्मनी करने का इरादा है जो मुझे अपने जाल में फंसा रहे हो। मैं कैसे दिखाऊंगा कहां से आया धन झूठ के देवता का मंदिर बनवाने को। फिर ठहाका लगाया झूठ महोदय ने , मुझे हैरान देख कर कहने लगा अभी भी नहीं समझे आप। मेरा सब से बड़ा भक्त वही तो है जिस के हाथ शासन की बागडोर है। झूठ बोलने का इतिहास रचा है उसी ने और अभी कितने ऊंचे शिखर पर ले जाएगा मुझे ये मैं भी नहीं जनता। यूं भी देवी देवताओं का हिसाब कोई नहीं पूछता यहां और ये नेता जो कितने ही मंदिरों में कितना धन कहां से दे आये खुद नहीं जानते काला सफेद की बात केवल वोटों के समय करते हैं। कल ही साक्षात्कार में सत्ताधारी नेता ने कहा है स्विस बैंकों में पिछले साल डेढ़ गुना अधिक पैसा जमा होने पर कि वो सारा काला धन नहीं है। इससे बढ़कर इशारा क्या होगा। एक नंबर का आयकर चुकाया पैसा कौन देता है मंदिर को दान के लिए या धार्मिक आयोजन में खर्च करता है कोई। बहुत बार तो आयकर बचाने को ऐसा किया जाता है। भगवान देवी देवता काला सफेद धन नहीं देखते हैं और न कोई मंदिर या किसी धर्म का स्थल पैसों से ज़मीन खरीद कर बनाया जाता है। आप जहां खाली  जगह कीमती ज़मीन सरकार की पड़ी दिखाई दे मेरे नाम का बोर्ड लगवा दो और शुरू करो सब लोग खुद -ब -खुद आएंगे सहयोग देने। कोई भी सरकार कोई भी दल कोई उद्योगपति कोई धनवान कोई मीडिया वाला कोई शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का कारोबारी झूठ का विरोध करने का साहस नहीं कर सकता है। उनका धंधा बिना मेरे सहारे चलता ही नहीं है। उन सभी की भलाई है मेरा मंदिर बनने में ताकि मेरे द्वार आकर मनचाही मुराद मांग सकें। सभी मन से आत्मा से मुझी को मानते हैं मेरी पूजा करते हैं। मेरा विरोध करने वालों के लिए आजकल कोई जगह नहीं बची है।

         सोच रहा हूं झूठ का इक मंदिर बनवा ही दूं , साथ दोगे आप।


Friday, 29 June 2018

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग - 3 डॉ लोक सेतिया

जीवन के दोराहे पे खड़े सोचते हैं हम ( टीवी शो की बात ) भाग 3    

                                     डॉ लोक सेतिया 

   आज की कहानी जितनी आसान टीवी दर्शकों को लगी उतनी आसान नहीं है। इक डरावना सच है हमारे देश समाज और हम सभी की सोच को लेकर। पहले कहानी पूरी समझ कर फिर सवालों से जूझते हैं। इक महानगरीय सोसाइटी जिस में अच्छे खासे सुविधा संपन्न लोग रहते हैं उसका चौकीदार जो बहुत थोड़ा वेतन पाता है शायद सात हज़ार। ईमानदार है अपने काम में। मगर जब बिमार पड़ता है तो जो दो लड़के उसे लेकर अस्पताल जाते हैं और जब डॉक्टर बताता है कि अंतड़ियों में रुकावट है और ऑप्रेशन करने को दो लाख चाहिएं तब वो लड़के लाते हैं पैसे जमा करवा उसकी जान बचाने को। मगर कुछ दिन बाद वही ईमानदार चौकीदार उन दो लड़कों को नकाब उतारते और चोरी के पैसे लाते देखता है। टीवी पर खबर सुनता है एटीएम की चोरी के सीसी टीवी फुटेज देख समझ जाता है ये उनकी ही बात है। ऐसे में वो पुलिस को सूचना देकर उन्हें पकड़वा देता है। लेकिन जब पुलिस की हवालात में उनसे जाकर मिलता है तो वही लड़के उसे बताते हैं कि हम चोरी उन में से एक की मां के इलाज की खातिर कर रहे थे। और अपनी जान बचाने के उपकार का बदला चुकाने का रास्ता बताते हैं कि हमने वो सारा चुराया हुआ पैसा एक बंद फ्लैट की बॉलकनी में डाला हुआ है तुम वो पैसा उठाकर अस्पताल में देकर उस की मां का इलाज करवा बचाओ। और वो यही करता है। मगर जो ईमानदारी से दो लड़कों को चोरी करने पर पकड़वाता है खुद जब उस फ्लैट की चोरी की पूछताछ करने पुलिस आती है तो अपनी चोरी कबूल नहीं करता है। यहां कहानी खत्म नहीं  होती है।   सवाल खत्म नहीं होते हैं। 

                                 मानवता का सवाल

    क्या ये उचित है कि जब भी किसी को कोई रोग हो तो उसका उपचार बिना लाखों रूपये नहीं हो सकता है। इस का मतलब न केवल हमारे देश की सरकारें निर्दयी हैं जो गरीबों को स्वास्थ्य सेवा भी उपलब्ध नहीं करवाती हैं बल्कि उनके साथ अस्पताल और डॉक्टर भी कोई इंसानियत का फ़र्ज़ नहीं निभाते और किसी गरीब का इलाज लाखों रूपये लिए बिना नहीं करते भले वो चोरी करे डाका डाले , और हम सभी बड़ी बड़ी समाजसेवा की बातें करने वाले धर्म की बातें करने वाले कोई सहायता नहीं करते। ये कैसा संदेश देती है कहानी , दो लड़कों ने जो किया चोरी के पैसों से चौकीदार की सहायता की उसका बदला उसने भी चोर बनकर ही चुकाया। जब वो लड़के हवालात में हैं दोषी हैं तो ईमानदार कहलाने वाला खुद बाहर है और कोई दोष उसके सर नहीं है। मेरी नज़र में उसका गुनाह अधिक बड़ा है। और की चोरी चोरी और आपकी की चोरी मज़बूरी , ये समझने लगे तो हर कोई अपराधी होने का अधिकारी बन सकता है। ईमान जान से बढ़कर होता है। ऐसी जान जीना तो मौत से बदतर है। ज़मीर ज़िंदा रहना ज़रूरी है।

                          पश्चाताप और प्रायश्चित 

 आगे दिखाया गया कि आत्मग्लानि के कारण चौकीदार अपनी नौकरी छोड़ जाता और मज़दूरी करने लगता है। वास्तव में कहानीकार अपने नायक को खलनायक नहीं बताना चाहता। अगर कोई वास्तव में ऐसा करेगा तो यही समझा जाएगा कि कहीं उसका फ्लैट से चोरी के पैसे चुराना सब को पता नहीं चल जाये इस डर में जीने से घबरा कर भाग गया। इधर लोग बैंक के पैसे को लूटने को जैसे बड़ा अपराध ही नहीं मानते। ये कहीं लेखक कोई और बात तो नहीं कहना चाहता इशारे  इशारे में। चौकीदार भी है जो पकड़ा नहीं गया है और बैंक को लूटने वाले भी लूट कर कहीं छुपे हुए हैं। आप उनकी मज़बूरी दिखला सकते हो कि क़र्ज़ चुकाने को पैसे नहीं थे बेचारे भाग गए तो क्या गुनाह किया। आपका मेरा पैसा तो नहीं था और बैंकों को भरपाई करने को सरकार और हमारा चौकीदार है ही। चौकीदार माल उड़ा रहे हैं वास्तव में मगर किसी मज़बूरी में नहीं। रोज़ पता चलता है चैन स्नैचिंग और कार छीन कर भागने वाले अपनी नशे की आदत और आपराधिक कार्यों की खातिर करते हैं ऐसा रोज़। ये कैसा ईमान कैसी ईमानदारी है , राजा हरीशचंद्र को भूल गये हो या उसे गलत साबित कर रहे हो। झूठ की महिमा का कैसा बखान है। बाहर सच लिखा है भीतर सब झूठ ही झूठ बंद कर बिकता है। 
   

Thursday, 28 June 2018

खामोश रहना नहीं आसां , पर कुछ भी कहना नहीं आसां - लोक सेतिया "तनहा"

     खामोश रहना नहीं आसां , पर कुछ भी कहना नहीं आसां 

                        - लोक सेतिया "तनहा" 

खामोश रहना नहीं आसां ,
पर कुछ भी कहना नहीं आसां। 

जिनको नहीं तैरना आता ,
विपरीत बहना नहीं आसां। 

कुछ ज़ख्म नासूर बन जाते ,
हर ज़ुल्म सहना नहीं आसां। 

जो नफरतों ने खड़ी कर दी ,
दीवार ढहना नहीं आसां। 

 





ताकि ज़माना याद रखे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       ताकि ज़माना याद रखे ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

किसी शायर की ग़ज़ल के शेर है :- बाद ए फनाह फज़ूल है नामो निशां की फ़िक्र , जब हमीं न रहे तो रहेगा मज़ार क्या। मगर सत्ता वालों को यही फ़िक्र सबसे अधिक होती है। साहिर लुधियानवी की नज़्म है :- इक शहंशाह ने दौलत का सहारा लेकर , हम गरीबों की मुहब्बत का उड़ाया है मज़ाक। मेरी महबूब कहीं और मिला कर मुझको। जब ताजमहल फिल्म बन रही थी तो साहिर को उस फिल्म के गीत लिखने को कहा गया लेकिन उन्होंने इनकार कर दिया अपनी कही नज़्म की बात को बदल नहीं सकते थे। आजकल के कवि शायर से जो चाहो करवा लो , यू ट्यूब पर कविता के नाम पर चुटकुले सुनकर हंसाते कवि कविता का कत्ल करते हैं या चीरहरण। पत्थर के सनम पत्थर के खुदा पत्थर के ही इंसां पाये हैं , तुम शहर ए मुहब्बत कहते हो हम जान बचा कर आये हैं। ग़ज़ल लिखने वाले ने जो कहा वही आज सामने है। वक़्त बदला तो पत्थर की जगह फौलाद के बुत बना रहे हैं ताकि याद रहे , दस्तावेज़ में आखिर में लिखने वाला अपना नाम दर्ज किया करता था या है और लिखता पढ़कर सुनाई है , ये वसीयत लिख दी है ताकि सनद रहे। अच्छे लोगों को लोग कभी भूलते नहीं हैं , बुरे लोगों को भुलाना आसान नहीं होता है। जो किसी ओर के नहीं होते उनकी याद में मंदिर और श्मशानघाट में पत्थर पर नाम लिखवाते हैं। 
                                  इधर इमरजेंसी की याद आई उनको जो आपत्काल में डरे छिपे रहे। मेरी क्लिनिक के पड़ोस में इक मास्टरजी रहते थे जो सरकारी नौकरी में थे। शाम को अख़बार पढ़ने आया करते थे मेरे पास और चर्चा हो जाया करती थी। आपत्काल का दौर था और मास्टरजी भले आदमी थे और आर एस एस से जुड़े हुए भी थे। मैं तब भी निडरता से अपनी बात कहता था और वो तथा मेरे बहुत और साथी मुझे समझाते थे चुप रहने को। शायद भगवान साथ था जो कभी तब मेरे साथ कोई गलत व्योवहार हुआ नहीं , लेकिन अब बिना आपत्काल घोषित होता है। वो काली अंधियारी रात थी ये घना अंधकार छाया हुआ है। विश्व में भूखों में भारत की हालत बदतर है। महिलाओं के लिए मेनका गांधी भी कहती हैं देश डरावना है। सरकार ने चार साल नाम बदलने के इलावा कुछ भी नहीं किया है। अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले लोग बड़े बड़े पदों पर बैठे हैं , विज्ञान की बात अंधविश्वास की बात साथ साथ नहीं हो सकती। 
                          कभी सभी मानते थे कि झूठ से बड़ा पाप कोई नहीं है। आज झूठ सामने आने पर कोई लज्जित नहीं होता है। मैंने पहले ही लिखा था कि आज अगर झूठों की प्रतियोगिता आयोजित हो तो सब से पहला नंबर हमारे देश के नेता का होगा ही होगा। टीवी वाले रोज़ खबर को छोड़ कर वारयल सच की बात करते हैं। सोशल मीडिया पर चल रहे विडिओ को लेकर। ये क्या कर रहे हो। मेरे पास किसी ने एक विडिओ भेजा बिना सिलेंडर के चूल्हा जल रहा है , भाई जिस धर्म की बात करते हो वो तो अंधविश्वास से लड़ते रहे और समझाते रहे अपना दिमाग इस्तेमाल करो। कोई कहानी सुना रहा कि अमुक संत के सतसंग से सालों से सूखा बाग़ हरा भरा हो गया। वास्तव में उन कथाओं का मकसद कुछ और होता था मगर लोग चमत्कार को नमस्कार करते हैं इसलिए बात को बदल दिया गया। आज इक मैसेज मिला जिस में भगवान को एक तारीख के दिन घर आने की शर्त कही गई और वही कहानी में हुआ। अगर इनको आधार बनाओगे तो बहुत पछताओगे। लाओ कोई संत जो सूखे पेड़ों को हरा कर दिखाए , जो बिना सिलेंडर गरीबों के घर का चूल्हा जला दिखाए , जो भगवान सामने आकर खड़ा हो जाये। आपको हैरानी होगी मुंबई में इक संस्था यही बात करती है , हर सप्ताह अख़बार निकलता है भगवान सामने आओ। सोचो जो भी आजकल हो रहा है सच सच लिखा गया किसी इतिहास की किताब में तो पचास साल बाद लोग पढ़कर हंसेंगे मज़ाक उड़ाएंगे कि हम ऐसे मूर्खतापूर्ण कार्य करते थे या करने वालों का समर्थन तालियां बजाकर किया करते थे। मुझे मरने के बाद नाम की बदनामी की चिंता नहीं है , मगर मुझे मूर्खों में शामिल समझा जाये ये कभी मंज़ूर नहीं है। समझदार नहीं हूं जनता हूं , ज्ञानी भी नहीं हूं मानता हूं ये भी मगर लोग मुझे मूर्ख समझते हों ये नहीं स्वीकार कर सकता कभी। नासमझ लोग कभी जिस डाल पर बैठे हों उसे नहीं काटते है ये मूर्ख लोग हैं जो उसी शाख को काट रहे जिस पर बैठे हैं। संविधान और संवैधानिक संस्थाओं को बचाना ज़रूरी है नेता आते जाते रहते हैं।

Tuesday, 26 June 2018

हम-तुम बंधे इक बंधन में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     हम-तुम बंधे इक बंधन में ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

     कहते तो इसे विवाह ही हैं मगर यही सब से बड़ी जंग भी है। दो देशों में आपसी कारोबार शुद्ध अपने फायदे की सोच से किया जाता है। पहले पहले सब ठीक लगता है फिर बाद में घाटा नफा समझ आने पर शिकायत होती है जो बताया था क्वालिटी वो नहीं है। शादी में दुल्हन यही सोचकर ससुराल जाती है कि उसको जाकर सास ससुर ननद के चंगुल से अपने गुलाम को छुड़वाना है तभी अपनी जीत के बाद खुद अपना राज कायम करना है। कभी आंसू को हथियार समझती थी महिलाएं आजकल आंसू गैस साथ रखती है किसी को रुलाने को। अभी तक दुनिया को एक राज़ का पता नहीं चल पाया है कि औरत की ताकत क्या है कमज़ोरी क्या है और उसके कितनी तरह के हथियार हो सकते हैं।  बेलन तो अकारण ही बदनाम है , अभी तक एक टीवी सीरियल को छोड़कर बेलन से कोई मारा नहीं गया है। मगर दुनिया का बड़ा से बड़ा वीर भी पत्नी के साथ जंग में जीत नहीं पाया है आजतक। शासक कोई भी हो पर्दे के पीछे से राज किसी महिला के हाथ होता ही है। महिला का नाज़ुक कोमल दिखाई देना भगवान की इक चालाकी या चाल है पुरुष को जाल में फंसाने को। अपनी दुनिया को बनाये रखने को ही ऊपर वाले ने विवाह रुपी चक्रव्यू की रचना की थी और अभिमन्यू की तरह बाहर निकलने की राह किसी को नहीं समझ आई कभी।
                      मेरे पिता जी बहुत परेशान थे। मैं उनके जेब में एक रूपये का वो सिक्का था जिसको खुद वो ही समझते थे ये खोटा है कभी नहीं चल सकता। फैंकना भी मुश्किल होता है , ज़रा ईमानदार भी थे तो नहीं चाहते थे किसी को देकर ठगी की जाये। इक मुलतानी कविता भी आपको सुना देता हूं समझने को। हिंदी में अनुवाद इस तरह है। इक सूखी नदी से तीन नहरें निकली दो सूखी और एक बहती ही नहीं। जो बहती ही नहीं उस में नहाने तीन पंडित आये , दो अंधे और एक को दिखाई ही नहीं देता। जिसको दिखाई ही नहीं देता उसे नहर में मिली तीन गाय , दो फंडड़ ( जो गर्भधारण नहीं कर सकती ) और एक जो कभी ग़र्भधारण करती ही नहीं। जो सूए ही नहीं उस गाय ने दिए तीन बछड़े , दो लंगड़े और एक उठता ही नहीं। जो उठता नहीं उसकी कीमत तीन रूपये दो खोटे और एक चलता ही नहीं। जो चलता नहीं उसे देखने आये तीन सुनार। ये कविता राजनीति पर है कि चुनाव में क्या हासिल होता है। वापस अपनी बात पर , पिता जी के इक दोस्त ने अपनी बेटी की बात चलाई दोस्ती को रिश्तेदारी में बदलना चाहते थे। पिता जी ने उनसे कहा मुझे कोई इनकार नहीं है मगर मेरा रुपया मुझे खोटा लगता है किसी को देते हुए डर लगता है कोई धोखा नहीं हो जाये। उस दोस्त के पास भी इक खोटी अठन्नी थी जिस के साथ वो चाहते थे रिश्ता करवाना। मेरे पिता जी को कहा आप चिंता मत करो मुझे खोटा रुपया का आपका सिक्का पसंद है मैंने तो तिजोरी में रखना है।  किसी दिन यही कीमती हो जायेगा , कुछ लोग चलन से बाहर हुए सिक्कों को जमा किया करते हैं। पिता जी ने मुझे बताया तो मैंने मना कर दिया कारण थोड़ा अलग था आपको भी मेरे पिता जी की तरह समझ आएगा नहीं। मैंने कहा अपने पहले मन की बात बताई नहीं ( ये 1974 -1975 की बात है तब मोदी जी की मन की बात कोई नहीं करता था ) मैं तो उनकी बेटी को मिलता रहा बहन समझ कर मेरा ज़मीर नहीं मानता उसी से विवाह करूं। पिता जी को इसी बात का डर था ज़मीर पास हो तो बाज़ार में बिकते नहीं लोग। खैर उनके दोस्त बच गये क्योंकि खोटे रूपये की कदर आज तक किसी ने नहीं की और मैं अपनी पत्नी के पर्स का वही सिक्का हूं जिसे पाकर उनको लगता है धोखा हुआ है। डॉक्टर से शादी की और लेखक पल्ले पड़ गया।
        मगर असली काम शोध करना है , दस का दम टीवी शो की तरह सवाल का जवाब जानना है कि कितने प्रतिशत भारतीय शादी को ऐसा लड्डू समझते हैं जिसे खाने वाला पछताता ही है। इस में लव मैरिज भी शामिल है। मुझे मुमताज की रूह ने बताया है कि मुहब्बत बड़ी बेरहम चीज़ होती है जान जाती है तभी मर कर ताजमहल सी कब्रगाह नसीब होती है जीते जी जो मिला मेरे सिवा कोई नहीं जनता है। आधुनिक काल में मुहब्बत भी हिसाब किताब लगाकर करते हैं अपने बराबर की शिक्षा नौकरी जाने क्या क्या। अभी अभी इक पत्नी ने तलाक की अर्ज़ी दी है और पति को लगता है ये तो धोखा है बेवफाई है। चौथी श्रेणी का कर्मचारी है और जब शादी की तो अनपढ़ थी लड़की , उसके पढ़ाया लिखाया और अब वो पति से ऊंचे पद पर है। अब उसे तलाक चाहिए क्योंकि पति उसके काबिल नहीं है , आपकी सहानुभूति से कुछ नहीं होगा बेचारे का घर पत्नी को पढ़ाने में उजड़ता लगता है। आम तौर पर हर लड़का लड़की अपने से बेहतर जीवन साथी चाहते हैं मगर जो मिलता है बाद में सोचते हैं इससे बेहतर होता तो अच्छा था। मगर अधिकतर विवाह बने रहते हैं क्योंकि आज भी हम गुलामी करते शर्मसार नहीं होते हैं और आज भी पिंजरे में तोता पालना सब को पसंद है जो कड़वी मिर्ची खाकर भी जो सिखाते हैं वही दोहराता है। अंत में वॉट्सऐप के दो विडिओ की बात। एक बॉक्स में इक पक्षी बंद है और दूसरा पक्षी उस बॉक्स का कवर हटाता है तो भीतर बंद पक्षी उसी पर झपटता है , भलाई का ज़माना ही नहीं। इक और में बताया गया किसी ने तोता पाला हुआ था जो उसे सुबह उठाया करता था काम पर जाने को। अधिकारी जब लखनऊ में था तो तोता भी लखनवी तहज़ीब से बात करता और अपने आका को जगाता ये बोलकर कि हज़ूर उठिये आपको काम पर जाना है। अधिकारी का तबादला पंजाब में हो गया तो कुछ ही दिन में उसने पंजाबी बोलना सीख लिया वहां के तोतों से या किसी तोती से नज़दीक होकर। आजकल वो अपने मालिक को जगाता है ये कहकर। उठ ओए खोते दे पुत्तर कम ते तेरा पीओ जाऊ। इतनी ही कहानी है सगाई से शादी के थोड़ा बाद की। इस से अधिक लिखना संभव नहीं है माफ़ करें।
                                    

शांति का नहीं तो जंग करने का समझौता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 शांति का नहीं तो जंग करने का समझौता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       आधी दुनिया की सैर के बाद उपाय आखिर मिल ही गया है। किसी एक देश के साथ ही नहीं सभी देशों को लेकर इस से अच्छा सस्ता बढ़िया और आसान की तरह का उपाय आपसी तालमेल बिठाने का कोई और हो ही नहीं सकता है। शांति समझौता नेहरू जी जैसे लोग किया करते थे , अहिंसा की बात करने वाले गांधी जी को हिंसा का शिकार होना ही पड़ा और गोली खाई। हे राम ! नहीं राम भी नहीं ये रामरहीम की शरण जाने वालों का स्वर्णिम युग है जिस में अपनी सुरक्षा को अपनी महिला और नपुंसकों की सेना की ज़रूरत होती है। पड़ोसी देश को भी शांति समझौते की नहीं जंग लड़ने की ज़रूरत है। हज़ार साल तक जंग लड़ने की कसम खाई हुई है अभी पचास साल गुज़रे हैं नौ सौ पचास साल बाकी हैं। नये नये ढंग अपनाना और प्रयोग करना उनको आता है , गुजरात को प्रयोगशाला बनाया गया था। चार साल से प्रयोग जारी हैं , प्रयोग दवा कंपनियों वाले चूहों पर करते हैं या भारत के लोगों को बिना बताये भी उनपर आज़माते हैं इंसानों पर असर देखना हो जब। 
                      उनके मन की बात सब से अधिक महत्व रखती है। उनको सब से अधिक भरोसा ऐप्स पर है। उन्होंने पड़ोसी देश के शासक को मन की बात चुपके से बताई किसी और को सुनाई नहीं दी। हम दोनों को वोट पाने हैं और सत्ता हासिल करनी है , लोगों की समस्याओं को हल करने से कितनी बार जीत मिलेगी। आखिर जनता को जोश तो नफरत और जंग लड़कर सबक सिखाने के भाषणों से ही आएगा। मगर हम बिल्लियों की लड़ाई में अमेरिका बंदर बनकर हथियार बेच कर सब खुद खाता रहता है। गोली कारतूस और मिज़ाइल से कोई जीत नहीं सकता कोई हारता भी नहीं है। इस से अच्छा है हम तय कर लें कि हम आमने सामने खून खराबा करने वाली लड़ाई नहीं लड़कर अपने सैनिकों को स्मार्ट फोन पर लड़ाई लड़ाई का खेल खेलने का अभियास करवा भविष्य में नया चलन जंग का शुरू करें। सुबह सब से पहले गुड मॉर्निंग का सन्देश भेजना शुरुआत से पहले और शाम को समय होते ही गुड नाईट का आदान प्रदान कर जंग को विराम देकर रिलैक्स करें। सैनिकों को हम होली पर या कॉमेडी शो की तरह की बंदूकें जिनसे रंग बिरंगे फूल या हवा में बुलबुले निकलते हों ही उपलब्ध करवाएं जो लड़ाई को मनोरंजक बना दे। 
       वायुसेना को बच्चों की तरह कागज़ से जहाज़ बनाकर उड़ाने का मज़ा लेने फिर से बचपन की याद दिला देगा। जलसेना को जगजीत सिंह जी की गए ग़ज़ल गाकर , वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी गाने को कहा जा सकता है। मुश्किल तो है कि बारिश नहीं होती जब हम चाहते हैं और पानी को हमने बचने कब दिया है मगर उसका भी उपाय कोई ऐप निकाल देगा। 
               समझौता मौखिक तौर पर हो चुका है। अड़चन एक ही बाकी है। नकली खिलौने वाली बंदूक एक देश की शर्त है वही बनाकर बेचता है उसी से खरीदनी होगी। हम अपने ख़ास उद्योगपतियों को ये अधिकार देना चाहते हैं जो सबसे अधिक चंदा देते हैं हमें। सवाल वापस वहीं आकर अटक गया है।  जंग इक मुनाफे का करोबार बन चुका है और किस कारोबारी को कितना हिस्सा मिले तय किया जाना है। कोई बाबा जी भी इस दौड़ में शामिल हो गए हैं , उनकी लंगोटी लंगोट बन गई है।

मरने से डर रहे हो , रोज़ मर रहे हो - डॉ लोक सेतिया

     मरने से डर रहे हो , रोज़ मर रहे हो - डॉ लोक सेतिया 

  मुझे इक दोस्त ने कहा कि लोग आपकी फेसबुक पोस्ट पर लाइक और कमेंट करने से डरते हैं क्योंकि आप सत्ताधारी दल की आलोचना करते हैं। मुझे नहीं लगता आज़ाद भारत के लोग इतने कायर हो सकते हैं। कोई किसी की पोस्ट लाइक करता है या कमेंट लिखता है तो उसका लिखी बात से कोई नाता नहीं बनता कि लिखने वाले से लोग सहमत हैं अथवा नहीं हैं। हम उन महान शहीदों की संतान हैं जो गुलामी के समय भी विदेशी अत्याचारी शासकों से नहीं डरे। मुझे लोकहितकारी लेखन करते चालीस साल से अधिक समय हो गया है और मैंने सरकारों अधिकारियों अन्य तमाम लोगों यहां तक कि धर्म के कारोबार की आलोचना भी की है। आलोचक आपका दुश्मन नहीं होता है , विरोधी भी नहीं , आप का हितचिंतक बन सकता है। निंदक नियरे राखिये , आंगन कुटी छुवाये , बिन साबुन पानी बिना मैल साफ कर जाये। बिलकुल सच है कि ऐसा मानने वाले लोग कम क्या अब कहीं नहीं मिलते। मुझे बहुत बार गलत कार्य करने वाले लोगों ने बदले की भावना से परेशान करने या डराने धमकाने की कोशिश की है लेकिन उनसे मेरे इरादे कमज़ोर नहीं हुए कभी भी। 
    मैं अपने दादा जी से काफी प्रभावित रहा हूं। वो बेहद निडर थे , वो ही नहीं मैंने गांव में अधिकतर लोगों को निडरता पूर्वक अपनी बात कहते देखा है। खामोश रहना शहरी तहज़ीब कहलाती होगी मगर जब बोलना ज़रूरी हो तब चुप रहना अपराध होता है। इक घटना की बात याद आई है। हमारे घर से थोड़ी दूर एक और बड़ा सा घर हमारा हुआ करता था , जिस में गाय भैंस बांधी जाती थी और दो कमरे तूड़ी और जानवरों को छाया को और दो और उनकी देखभाल करने वालों के रहने को बनाये हुए थे। बहुत बड़ा आंगन था जिस में आस पड़ोस वाले भी अपने जानवर बांधते थे अनुमति लेकर। एक बार देखभाल करने वालों ने बताया कि जो नया पड़ोसी आया है वो आकर उसके पिछले तरफ के आंगन को फीता लगाकर पैमाईश कर कह रहा था कि ये मेरा है और वो इस तरफ अपने घर में से रास्ता बनाना चाहता है। मेरे ताया जी ने दादा जी से पूछा क्या हम गांव से कुछ लोगों को बुलाकर उसके बंधे जानवर खोल दें।  दादा जी बोले इस काम के लिए मैं अकेला काफी हूं किसी की भी ज़रूरत नहीं है। दादा जी के हाथ में इक छड़ी हमेशा रहती थी जिसे खूंडी कहते हैं। दादा जी गये उसको उसके घर से बुलाया और पूछा तुमने ऐसा क्यों किया। अभी अपना जानवर खोल कर ले जाओ वरना ठीक नहीं होगा , हम पड़ोसी हैं तुम्हें कोई ज़रूरत हो तो मुझसे मांगकर ले सकते हो मगर छीनकर कभी नहीं। माफ़ी मांगी थी पांव पकड़ कर। निडरता आपकी सच्चाई में निहित है डरते झूठे लोग हैं। 
   किसी शायर की ग़ज़ल का एक शेर पेश है :-

                     लोग हर मोड़ पर रुक रुक के संभलते क्यों हैं ,

                     इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यों हैं।

Monday, 25 June 2018

हम शाकाहारी तुम मासाहारी - घोटालों की अनंत कथा - डॉ लोक सेतिया

     हम शाकाहारी तुम मासाहारी - घोटालों की अनंत कथा - 

                              डॉ लोक सेतिया 

 इस कथा का कोई  भी अंत नहीं है , आदि भी कहां से शुरू हुए भगवान जनता है। उनके घोटालों की बात और थी इनके घोटालों की अलग है। उस के भी खुद खाने की बात नहीं थी इसके भी खुद खाने का सुबूत नहीं है। सीख लिया शायद स्नानघर में रेनकोट पहन कर नहाना। मगर देखने वालों को राजा नंगा है जैसी बात लगती है लेकिन सच बोलने वाला बच्चा समझदार हो गया है। वो बताता ही नहीं इनके घोटालों की बात। जो खुद खाने को मिलता है उसे पचा लेते हैं डकार तक नहीं लेते। सब से बड़ा घोटाला सरकारी झूठे विज्ञापन का ही हैं जो अख़बार टीवी वालों को दिखाई नहीं देता मगर जनता का धन कुछ लोगों को देना जिस से हासिल कुछ नहीं हो घोटाला ही होता है। शाकहारी मासाहारी घोटालों को नहीं कह सकते। आज की खबर है हरियाणा की सरकार के स्वर्ण जयंती समारोह और जीता जयंती महोत्सव में 2017 मैं नियमों को ताक पर रख कर धन बर्बाद किया। निजी आयोजन पर भी खर्च का मामला आया है। दस किलोमीटर की दौड़ पैंतीस लाख की बर्बादी। ये रुकता नहीं है।  अभी दो दिन पहले की बात बताता हूं अपने शहर में जो जो हुआ।
         24 जून को मनोहर लाल खटट्र जी पुलिस विभाग द्वारा आये दिन आयोजित तमाशे राहगिरी में शामिल होने आये। पहले घोषणा की पुलिस लाइन्स में फिर पपीहा पार्क और आखिर आये लाल बत्ती चौक से एक किलोमीटर तक साईकिल चलाकर , हिसाब मत पूछो। जो हुआ सामने देखा बताता हूं। कई दिन तक सभी विभाग इसी काम में लगे रहे। जब सी एम को आना हो तभी सफाई और अनाधिकृत कब्ज़ों को तीन दिन को हटवाना भी उचित नहीं। सब से अजीब बात जो खुले में शौच बंद करने और आवारा पशु मुक्त होने का दावा ही नहीं उसका इनाम भी अधिकारी ले आये थे उसकी असलियत सामने आई है। ये तस्वीरें गवाह हैं।



ये चलते फिरते शौचालय जींद से आये हैं लिखा पढ़ सकते हैं। इनको खड़ा किया गया उसी तरह जैसे जी टी रोड पर योग करते गीत गाते खेलते बच्चे झांकियों की तरह। मगर इनका उपयोग किया ही नहीं जा सकता था , इनको सीवर लाइन से जोड़ने की ज़रूरत नहीं थी क्योंकि खेल खत्म होते ही वापस जाने थे।

                                             अवैध कब्ज़ों की बात

अगर वो सब गलत नहीं हैं जो रेहड़ियां लगाकर फुटपाथ रोककर और रोज़ अपनी गंदगी बीच राह सड़क पर डालकर बदबू और बिमारियों को बुलावा देते हैं तो मुख्यमंत्री के आने से दो तीन दिन पहले उनको हटाना और सी एम के राहगिरी मैं शामिल होकर जाते ही फिर सी उनको अनुमति देना दोनों बातें घोटाला हैं। आप सब कर सकते हैं वी आई पी के आने पर मगर बाक़ी रहने वाले आम नागरिक परेशान हों तो होते रहें। इस तरह कितना धन बर्बाद किया जा रहा है। सिरसा के बाबा का सालों से अवैध घोषित कई किलोमीटर का निर्माण जिस में होटल सिनेमाहाल रिसोर्ट शामिल है आजकल की सरकार वैध कर देती है इक अध्यादेश से। मोदी जी विदेश यात्राओं पर केवल चार्टेड विमान पर 375 करोड़ की राशि 40 यात्राओं पर खर्च करते हैं पूरा हिसाब तो कोई लगा नहीं सकता है। 

                          निराश नहीं होने खुश रहने का उपदेश 

  हरियाणा के मुख्यमंत्री भाषण देते हैं ये राहगिरी आपको निराशा छोड़ खुश रहने की खातिर है। चलो ये बात समझ आई कि लोग आपकी और मोदी जी की सरकार से निराश हो चुके हैं। मगर इस तरह का मनोरंजन आपको खुश करता होगा या आपके ख़ास लोगों अधिकारीयों को , आम नागरिक को तो आपके आने से पहले रुकावटों से ही परेशानी होती है। जब सब गलत होता हो सामने तब लोग खुश कैसे रह सकते हैं भला। नीरो की तरह बंसी बजाना उचित नहीं है। हरियाणा राज्य में सभी सरकारी ऐप्स धोखा हैं दफ्तर में बैठे बिना कोई समाधान किये बता देते हैं ठीक हो गया। मेरी सी एम विंडो की शिकायत कितनी बार बंद हुई खुली गिनती नहीं है। आखिर में मुख्यमंत्री कार्यालय लिखता है ये शिकायत नहीं सुझाव है। कोई अच्छा सुझाव देता है यही मानकर सुधार करते। आपको सुझाव भी आर एस एस के पसंद हैं और बड़े पद पर नियुक्ति के लिए योग्यता भी उस संस्था का सदस्य होना है ये अपने आप में घोटाला ही है। मगर मीडिया पर फेसबुक पर जो प्रचार है उस से सच्चाई को कब तक सामने आने से रोक सकते हैं।