Saturday, 17 June 2017

मेरे वास्तविक आदर्श कुछ लोग ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

               मेरे वास्तविक आदर्श कुछ लोग ( आलेख )

                                             डॉ लोक सेतिया 

कुछ लोग हमारे जीवन में मिलते हैं जिन को अपना आदर्श बना लेते हैं हम। हम उनके बताये मार्ग पर चलते हैं या फिर चलना चाहते हैं , चल पाते हैं या कभी चलते रहने का प्रयास करते हैं। इधर देखते हैं लोग हर महान आत्मा का अनुसरण करने की बात करते हैं जबकि आचरण उसी के विपरीत ही किया करते हैं। महात्मा गांधी , लोकनायक जयप्रकाश नारायण , अंबेडकर ही नहीं लोहिया से लेकर तमाम ऐसे लोगों की हमने केवल पत्थर की मूर्तियां ही फूल अर्पित करने को बना ली हैं जो देश की आज़ादी की खातिर अपनी जान भी कुर्बान कर गए , तन मन धन सब देश पर न्यौछावर करने वाले असली नायक। और अब ऐसे ऐसे तथाकथित नायक बन गए हैं जिनको अपने स्वार्थ से बड़ा कुछ नहीं लगता। सत्ता और धन दौलत जिनका भगवान है उनको कोई आदर्श भला बना कैसे सकता है। मगर इधर यही होता है , टीवी वाले अख़बार मैगज़ीन वाले ही नहीं शिक्षा के मंदिर भी सफल हुए कुछ लोगों की राह चलने का पाठ छात्रों को पढ़ाते हैं। अर्थात हमारा विकास हमें उस जगह ले आया है कि जहां सफलता का एक ही मापदंड है धन अर्जित करना। हम जानकर अनजान बन जाते हैं कि सफल होने को किसी उद्योगपति ने कितने अनुचित ढंग अपनाये। किसी नेता ने क्या क्या गलत तरीके नहीं अपनाये सत्ता की खातिर , जो चाहते उसको पाने को अपनी आत्मा अपने विवेक अपने ज़मीर तक को दफ़्न कर दिया। और लोग हैं उन्हीं का गुणगान करने लगे हैं। कहां सादगीपूर्ण जीने वाले महान लोग और कहां उनके अनुयायी कहलाने वाले देश पर सफेद हाथी जैसा बोझ बने सत्ताधारी नेता। 
          मेरे दादा झंडाराम जी मेरे लिए सच्चा आदर्श थे और हैं , आप को अचरज होगा वो कभी स्कूल नहीं गए शिक्षा पाने को। दस साल की आयु में पिता का निधन होने के बाद अपनी ज़मीन पर किसी के कब्ज़ा करने पर उनको माता जी ने कोई और काम अपनी मेहनत से करने की शिक्षा दी। ताकि उनका इकलौता पुत्र दबगों से लड़ाई में जान नहीं गंवा बैठे। ये बातें आज की नहीं अंग्रेज़ों के काल की हैं क्योंकि आज से करीब 4 5 साल पहले मेरे दादा जी का निधन नब्बे साल की उम्र में हो चुका है। वो इक बालक था जो वीरान खेत में काम किया करता था और तब नहर किनारे बने घर में रहता था। सरकारी अफ़्सर रास्ते पर आते जाते रुकता और वो बिना किसी मकसद के उनको पानी पिलाता चाय बना देता या जो भी पास वो अतिथि को खिलाता जब कि पास कुछ नहीं होता था। इक अधिकारी ने देखा ये अनपढ़ बच्चा अपनी इक भाषा लंडे में लिखता है और नहर बनाने में कितनी मिट्टी निकली ढेर का गणित बिना कलम चलाये एकदम सही निकाल देता है। उस अधिकारी ने कहा आप बहुत तीव्र बुद्धि रखते हो आप कोई काम करो , और उनको बनाई जा रही नहर का इक हिस्सा बनाने का ठेका दिया था। अपनी समझ से आगे बढ़ता वही लड़का इक दिन बड़ा ठेकेदार बन गया और आपको बताना चाहता हूं भाखड़ा डैम से जो नहर हरियाणा के टोहाना तक आती है उसको मेरे दादा जी ने ही बनवाया था। अब आप सोचोगे मैं भी वही बात कहने लगा हूं किसी की सफलता से प्रभावित होकर , मगर नहीं। मेरा तो तब जन्म ही हुआ था 1951 में , और दादा जी की मौत होने तक मैं इक युवक था बीस साल का कॉलेज की पढ़ाई करता। मगर संयुक्त परिवार में अपने खेती करते ज़मीन पर गांव में रहते हुए ही उनहोंने इक घर फतेहाबाद शहर में लिया था बच्चों की शिक्षा की खातिर। बचपन में उनकी कई बातें हम सब को बुरी लगती थी जिन में उनका सादगी से रहने का उपदेश और चरित्र की महानता की बातें शामिल थीं। वो कहते थे आप बेशक महंगे कपड़े नहीं भी पहनोगे तब भी लोग आपको आदर देंगे जब उनको पता चलेगा आप लाला झंडाराम जी के पोते हैं। भले हमें समझ नहीं आती थी उनकी बात मगर यही सच था , जब कभी ज़िक्र होता था हम सुनते थे अच्छा आप उन के पोते हैं। हमारे परिवार में इक परंपरा उनकी कायम की हुई है कि घर आये हर किसी को प्रेम सहित भोजन खिलाना। अब खाने का समय है आप बिना भोजन किये भला कैसे जा सकते हैं , सालों बाद लोग उनकी ऐसी बातें हमें बताया करते थे। 
                   ठेकेदारी छोड़ चुके थे , मगर अपने बाद अपने वारिसों को सबक दे गए थे कि सरकारी काम को घर से अधिक ईमानदारी से करना है और कभी भी निर्माण में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। जो सामान मिलता है सीमेंट या तारकोल उसको बेचने का काम नहीं करना कभी कमाई करने को हराम की। अब कोई भी हमारे परिवार का ठेकेदारी का काम नहीं करता है। शायद अब ईमानदारी से करना संभव भी नहीं है जब कोई अधिकारी ठेकेदार को भुगतान बिना रिश्वत लिए करता ही नहीं। आपने अंग्रेज़ों से बांटो और राज करो का सबक तो सीखा ईमानदारी नहीं सीखी , आज उनके काल की बनी इमारतें खड़ी हैं पुल अपनी अवधि पूरी होने के बाद भी कायम हैं जबकि आजकल की बनी सड़क या पार्क या फुट पाथ अथवा भवन साल बाद जर्जर लगने लगते हैं क्योंकि सीमेंट टाईलें सब घटिया होती हैं और ठेकेदार होते हैं नेताओं अफ्सरों के परिचित लोग। आजकल ईमानदारी से काम करने की बात कहने वाले को लोग नासमझ नहीं पागल मानते हैं। ये तभी है कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण जिन को मैं सच्चा आदर्श मानता हूं के साथ सम्पूर्ण क्रांति में जुड़े लोग बड़े बड़े पदों पर आसीन हुए तो घोटालों के नए इतिहास रच डाले। 
                    मुझे आज कोई नेता नहीं दिखाई देता जो वास्तव में जिन को आदर्श बताता है उनकी राह पर चलता भी हो। किसी को भी अनावश्यक आडंबरों पर देश का धन व्यर्थ बर्बाद करना गुनाह तो क्या अनुचित तक नहीं लगता। तथाकथित यात्रायें निकाली जाती दिखावे को , कभी साहित्यिक यात्रा कभी सद्भावना यात्रा कभी स्वच्छता यात्रा। बस भाषण देकर सब हो गया घोषित किया जाता है और हर योजना में अपने लोगों को शामिल कर संस्था या एन जी ओ बना बंदरबांट होती है। अनाचार लूट हमारा राष्ट्रीय चरित्र बन गया है , कौन है जो ईमानदारी से जनता के धन के उपयोग की बात करे। शाही ढंग से हर दिन अपने पर लाखों करोड़ों खर्च कराने वाले जब त्याग और देश की सेवा की बात करें तब लगता है सच्चाई और ईमानदारी की अपनी ही परिभाषाएं गढ़ ली गई हैं। सब डाका डालते हैं और दानवीर कहलाते हैं। यही सत्तर साल की विकास की कहानी है। अंत में इक अपनी ग़ज़ल से कुछ शेर अर्ज़ करता हूं।


           लिखी फिर किसी ने कहानी वही है ,
           मुहब्बत की हर इक निशानी वही है। 

           सियासत में देखा अजब ये तमाशा ,
           नया राज है और रानी वही है। 

           हमारे जहां में नहीं कुछ भी बदला ,
           वही चोर , चोरों की नानी वही है। 

          जुदा हम न होंगे , जुदा तुम न होना ,
          दिलों ने हमारे भी ठानी वही है। 
         
          कहां छोड़ आये हो तुम ज़िंदगी को ,
          बुला लो उसे ज़िंदगानी वही है। 

          खुदा से ही मांगों अगर मांगना है ,
          भरे सब की झोली जो दानी वही है। 

          घटा जम के बरसी , मगर प्यास बाकी ,
          बुझाता नहीं प्यास पानी वही है।

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