Tuesday, 27 June 2017

मैं बदल गया ( कविता - अकविता ) डॉ लोक सेतिया

       मैं बदल गया  ( कविता - अकविता ) डॉ लोक सेतिया  

सभी ने समझाया , फिर भी समझ नहीं आया ,
ठोकरों से कभी भी , मैं नहीं आज तक घबराया।
इक घाटे का काम है , सच को सच ही कहना ,
फिर क्यों मैं सोचता , खोया है क्या क्या पाया।
गुज़ारी है उम्र मैंने , बस झूठ से लड़ते लड़ते ,
ये बात और है कि मैं , ये जंग हारता ही आया।
पर इस निज़ाम के हैं , दस्तूर सभी निराले बने ,
गहरी काली घटा बन , सूरज भी है कहलाया।
अब रौशनी नाम है , अंधकार का नया बदला ,
सब को डराता है अब , खुद ही खुद का साया।
सब कुछ वही है लेकिन , बदले हैं नाम सबके ,
बदहाली शब्द जो था , है खुशहाली कहलाया।
बस शोर हर तरफ है , मेरा देश बदल रहा है ,
बंधी आंखों पर पट्टी , इक कोल्हू चल रहा है।
अब बोलना मना है , सच बोलना गुनाह है ,
दम मेरा घुट रहा है , क्या मैं बदल गया हूं।
ये कौन आया जिसने , जलता दिया बुझा दिया ,
इक रौशनी को  आकर , बस धुआं बना दिया।
किसी की हर अदा पर , दुनिया है सारी फ़िदा ,
नहीं आदमी जी सकता , यहां आया जब खुदा।  

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