Friday, 30 June 2017

आधी रात की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

         आधी रात की बात ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

      आधी रात की बात अलग होती है। आधी रात में आधा चंद्र्मा भी हो और महबूबा कहती हो रह न जाये तेरी मेरी बात आधी तब इश्क़ का लुत्फ़ होता है। आधी रात को अंधेरे में कभी कहते थे फ़रिश्ते आते हैं ज़मीं पर। आजकल आधी रात को लूट बलात्कार होते हैं , चोरी दिन दिहाड़े भी होती हैं और डाका आजकल जंगली डाकू नहीं डालते , कारोबारी धर्म वाले सच्चाई की दुकान वालों से लेकर भगवा धारी और सरकार तक डालते हैं। पहले डाकू अमीरों को लूटते थे आजकल सब गरीबों को लूटते हैं , कोई नहीं सोचता उसकी कमाई ईमानदारी की दूध सी है या फिर नानक उनकी रोटी को निचोड़ दिखाएं तो खून की नदी बहती होगी। खैर आज बात और है आधी रात को देश की सरकार इक शो आयोजित करने जा रही है जी एस टी को लागू करने पर। और उस में ख़ास बड़े बड़े लोगों को विशेष तौर पर बुलाया गया है। आम जनता की किसी भी समारोह में ज़रूरत होती नहीं मगर आपने ये सब लागू करना उसी पर है। अब अमिताभ बच्चन जैसे लोगों को जिनको कुछ मिंट का विज्ञापन करने पर करोड़ रूपये मिलते हों क्या फर्क पड़ता है महंगी सस्ती होने पर किसी वस्तु के। अभी विदेश यात्रा पर मोदी मोदी का शोर सुन कर लगता था जैसे वहां रहने वालों को पता चल गया हो कि तीन साल पहले जिन अच्छे दिनों की बात की थी वो लाये जा चुके हैं। हज़ारों रूपये टिकट के देकर मनचाहा भाषण सुनने वालों को क्या पता देश में अभी भी तीन चौथाई जनता को दो समय रोटी और पीने का साफ पानी नहीं मिलता। अभी तलक आम जनता को हासिल कुछ नहीं हुआ है , सरकार रोज़ नई नई बातें करती है मगर उस से हुआ क्या किसी को मतलब ही नहीं। 
                 ऐसा दिखाया जा रहा है मानों वास्तविक आज़ादी अब मिलने वाली है। जब कि खुद सरकार नहीं जानती कल इसका फल क्या निकलेगा। नोटबंदी से हासिल क्या हुआ कोई नहीं जनता। मगर असली बुनियादी सवाल ही और है। क्या हम आज़ादी के चाहने वाले हैं अथवा अभी भी हमारी मानसिकता वही गुलामी वाली ही है। हर किसी की जयजयकार करते हैं , उगते सूरज को सलामी देते हैं। नहीं सोचते उस ने देश समाज को दिया है कुछ या लिया है। इन पर हर पल लाखों करोड़ों खर्च करती है वो जनता जिस की खुद की आमदनी मासिक हज़ार रूपये भी कठिनता से होती है। अब अगर तब भी राजनेता शाही शान से रहते हैं और अपने पर बेतहाशा धन बर्बाद करने के बावजूद खुद को देश का सेवक घोषित करते हैं तो इसको क्रूर मज़ाक कहना होगा। आडंबर के समारोह अपनी शान दिखलाने को हर दिन आयोजित करने मानवता के खिलाफ अपराध जैसा ही है। आपने पल बनाया सड़क बनाई या भवन बनाया या आपको सत्ता मिले साल दो साल तीन साल हुए उस को जश्न या कोई और आडंबर करने की उपयोगिता क्या है। जब आपने भी वही करना है जो पहली सरकारें करती आईं तब बदलाव कैसे होगा। असंवेदनशीलता की पराकष्ठा है सरकारी धन को अपने महिमामंडन पर अथवा झूठे विज्ञापनों पर खर्च करना। अगर हम आज़ादी का अर्थ समझते है तो किसी को भी खुदा या मसीहा नहीं बनाएं ये खतरनाक है। आपने चुना है उनको जिस काम के लिए वो करना उनका कर्तव्य है उपकार नहीं है। कुछ लोग वास्तविकता दिखलाने को आलोचना मानते हैं जब कि हर सत्ताधारी अंधा होता है , उसको वही दिखाई देता है जो वो चाहता , तभी जब जिस जगह जाना होता मंत्री को बड़े अधिकारी को तब दो दिन पहले सब सही दिखलाने का प्रबंध किया जाता कार्यपालिका द्वारा। कभी किसी ने सोचा ये कितना अनुचित है , जो काम जनता की ज़रूरत को नहीं नेता अधिकारी को खुश करने को किये जाते उनको वास्तव में पहले ही होना चाहिए था। हम सब देख समझ कर भी सोचते क्यों नहीं ये क्या है। 
                               14-15 अगस्त की आधी रात को मिली आज़ादी अभी भी देश के बहुमत को कोई उजाला देने में सफल नहीं हुई है। ऐसे में फिर वही आधी रात की इतिहासिक भूल दोहराने जैसा काम सरकार करने वाली है जिस में वही लोग शामिल होंगे जो पहले से चमकीली रौशनी में सितारों की तरह रहते हैं। अंत में अपनी इक ग़ज़ल याद आती है। पेश करता हूं :-

चंद धाराओं के इशारों पर ,

डूबी हैं कश्तियां किनारों पर। 

अपनी मंज़िल पे हम पहुंच जाते ,

जो न करते यकीं सहारों पर। 

वो अंधेरों ही में रहे हरदम ,

जिनको उम्मीद थी सितारों पर। 

खा के ठोकर वो गिर गए हैं लोग ,

जिनकी नज़रें रहीं नज़ारों पर। 

डोलियां राह में लूटीं अक्सर ,

क्या भरोसा करें कहारों पर। 

ये भी अंदाज़ हैं इबादत के ,

फूल रख आये हम मज़ारों पर। 

डॉ लोक सेतिया " तनहा "

 


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