Saturday, 12 November 2016

मेरा राज्य तेरा राज्य नहीं , सभी का देश ( सोचने की बात ) डॉ लोक सेतिया

        पानी की इक बूंद नहीं देंगे , ये ऐलान किया है बादलों ने , इक बड़ा बादल इक छोटा बादल। अपने नाम की ही लाज रख लेते। मगर क्या किया जाये हवा चल रही है चुनावी , और चुनाव किसी जंग से कम नहीं होते। सत्ता की खातिर हर बात को ताक पर रख सकते हैं। कानून या न्यायालय किस खेत की मूली हैं। उनका बस नहीं चलता अन्यथा हवा को भी अपने क्षेत्र में रोक लेते। लेकिन इस के बावजूद जब कभी खुद के लिये ज़रूरत हो यही नेता संविधान और न्याय पर भरोसा करते हैं वाला बयान रट लिया करते हैं। देश की एकता अखंडता को कायम रखने की कसम भी खाया करते हैं। देश को एक समझते भी हैं क्या ये तमाम नेता चाहे किसी राज्य के हों और जिस किसी दल से संबंध रखते हों। वोटों की खातिर जनता को कितनी तरह से बांटते हैं , कोई हिसाब नहीं। जिस देश में लोग खुद को देशवासी नहीं समझते बल्कि अपनी अपनी अलग पहचान बताते हों , उस देश का भविष्य सुनहरा भला कैसे हो सकता है। सत्तर साल होने को हैं आज़ाद हुए मगर आज भी इतनी दीवारें बीच में खड़ी हुई हैं , और उनको गिराना तो क्या हम और ऊंची उठाने और मज़बूत करने का काम करते रहते हैं अपने अपने मतलब या दलगत स्वार्थ की खातिर। परिवार , शहर , राज्य , जाति - धर्म , हमारे लिये पहले हैं देश बाद में। नफरतों के बीज बोते हैं तमाम नेता लोग , आग लगाना जानते हैं , मुहब्बत करना नहीं आता , बारिश की बात कैसे करें। शायद खुद जिस धर्म को मानने की बात करते हैं उसी की शिक्षा भूल गये हैं। मिल कर खाना , सच ही ईश्वर है , सभी की भलाई , मानवता की बातें , केवल पढ़ने को नहीं लिखी हुई। भटक गये हैं शायद सभी सच्चाई की राह से। कुदरत को कैद करने लगे हैं बिना समझे कि अंजाम क्या होगा। परमात्मा सभी को सदबुद्धि प्रदान करे , मन में अहंकार नहीं हो , सोच छोटी नहीं हो।  ये कोई जयकारा नहीं है , इक संदेश है जिसको याद रखना है समझना है और अपनाना है। विनती है , उपदेश नहीं जिसे सुन लिया मगर भुला दिया। विचार अवश्य करना सभी , इधर भी उधर भी।

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