Wednesday, 26 October 2016

भगवान भी बदल गये हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

दादा जी कहते थे ढूंढने से भगवान भी मिल सकते हैं। तुम तलाश करते रहना सच्चे मन से। मां सुबह शाम इक भजन गुनगुनाती रहती थी " भगवन बनकर तू अभिमान न कर , तेरा नाम बढ़ाया हम भक्तों ने "। मैंने उनको छोड़ और किसी को भगवान को ऐसे चेतावनी देते नहीं सुना , कि भले तुम विधाता हो फिर भी कोई अकड़ मत रखना , क्योंकि अगर हम तेरे उपासक ही तुझे नहीं मानेंगे तो तुम काहे के भगवान रहोगे , बस नाम मात्र के ही। मुझे इस से बढ़कर श्रद्धा किसी साधु संत सन्यासी या गुरु में नहीं नज़र आई। तभी मैंने किसी को गुरु नहीं बनाया आज तक। मिलता रहा भगवा सफेद पीला काला हरा नीला परिधान पहने महान समझे जाते लोगों से , तथाकथित धर्म को स्थापित करने में लगे प्रवचन करने वालों से। उनसे भी जो गीता ज्ञान या रामायण अथवा गुरु ग्रन्थ साहिब का या फिर कुरान बाईबल का अर्थ समझाते हैं। और बार बार इक शायर का शेर याद आता रहा। " तो इस तलाश का मतलब भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला "।
                           लेकिन कहते हैं ना लगे रहो तो सफलता इक दिन मिल ही जाती है। कल रात मुझे भगवान मिल ही गये साक्षात रूप में। नहीं किसी धर्म स्थल पर नहीं यूं ही इक उजड़े हुए वीरान घर में वह भी अकेले उदास और बेहाल। मैं दुनिया के लोगों से घबरा कर यूं ही चला गया था उधर जिधर कोई जाता ही नहीं। शहर की भीड़ से दूर गंदी बस्ती से भी और आगे जाकर। अंदर गया था उस खंडर नुमा इमारत में छुप कर अकेले में आंसू बहाने देश समाज की बदहाली को देख कर। मेरा दर्द किसी को समझ आता ही नहीं है , सभी कहते हैं मैं पागल हूं जो व्यर्थ चिंता करता रहता हूं। मुझे चुपचाप रोते रोते आभास हुआ कोई और भी है यहां पर , अंधेरा था तब भी मुझे दिखाई दिया वो चमकती लौ की तरह दिया बनकर या शमां की तरह। मन ही मन सोचा इस वीरान घर में कौन है जो रौशनी करता है , नज़र क्यों नहीं आता सामने , छिपकर रहता है , कोई चोर है या अपराधी। बस इतना सोचते ही वो मेरे सामने खड़ा थे , मुझे प्यार से गले लगा लिया और कहने लगे , तुम तो मुझे चोर या अपराधी मत समझो। मैं तो कब से तुम्हारी और तुम जैसे और उन लोगों की राह देखता रहा हूं
जो मुझे ढूंढते रहते हैं। आज मिला हूं तो मुझे पहचाना भी नहीं , भूल गये अपने दादा जी की बात , तुम्हारी माता जी जो गुनगुनाती थी उस भजन को भी भूल गये। याद करो और आज पहचान लो मुझे। और मुझे यकीन करना पड़ा था क्योंकि उन्होंने मुझे सब कुछ साफ साफ़ दिखला भी दिया था और समझा भी। भगवान की लीला थी कि मैं सुबह जागा तो अपने घर में बिस्तर पर। मगर वो कोई सपना नहीं था , मैं वास्तव में रात भाग कर गया था इस दुनिया से।  वापस कौन कब कैसे मुझे पहुंचा गया , मुझे नहीं मालूम। मुझे याद है भगवान ने मुझे जो भी बताया था , आपको सुनाता हूं , चाहे आप विश्वास करना या नहीं।
                       भगवान ने बताया था , तुमने पढ़ा होगा , सुना होगा , देव और दानव , पुण्य और पाप , सत्य और झूठ , अच्छाई और बुराई , धर्म और अधर्म के बारे में। पढ़ना इक बात है समझना दूसरी और तीसरी बात होती है विचार करना। दुनिया बनाते समय सभी को सोचने समझने को बुद्धि दी और कर्म करने को हाथ पैर , देखने को आंखें और अन्य कामों को सभी अंग भी। भगवान कौन है क्या है कहां है सोचा समझा विचार किया कभी। जाने किस किस को भगवान बना लिया आपने अपनी सुविधा से या स्वार्थ की खातिर। जैसे तुम इंसानों में अच्छाई और बुराई दोनों रहती हैं , विवेक से तुम अच्छा बनते हो बुराई लुभाती हो  तब भी बचते हो , उसी तरह मुझ में भी राम-रावण , कृष्ण-कंस , दोनों बसते हैं। और ईश्वरीय सत्ता उसी के पास रहती है जिसको सभी भगवान मानते हैं। आज मेरा जो रूप बुराई का है वही पूजा जाता है इसलिये जिस भगवान को तुम ढूंढते रहे वो तुम्हें किसी मंदिर मस्जिद गिरिजाघर या गुरूद्वारे में मिला ही नहीं। मुझे , मेरे उस स्वरूप को निकाल दिया गया उन सभी जगहों से , आज जो विशाल भवन मेरे नाम पर दिखाई देते हैं , उन में मैं नहीं रहता। कभी जाता ही नहीं उस ओर मैं भूल कर भी , करोड़ों की आमदनी संपति , चढ़ावा। मुझे क्या समझ लिया लोभी लालची रिश्वतखोर जो खुश होकर आपकी हर मनोकामना पूरी करता है। ठीक से पढ़ना फिर से सभी धर्म ग्रन्थ , उनमें समझाया गया है देवता वही होते जो देते हैं , दानव होते जो औरों का छीनते हैं। आज कलयुगी भक्त अपने जैसे बुरे की उपासना करते हैं , सही करते या गलत बिना सोचे। यूं समझ लो अधर्म का नाम बदलकर उसको धर्म नाम दे दिया है। पहचान करना भगवान जो थे वो अब नहीं हैं , बदल गये हैं। भगवान पापियों की सुनते हैं उनकी कामनाओं की पूर्ति करते हैं , बुराई तभी बढ़ रही है। खेद है मेरे लिये लोकतंत्र जैसा चुनाव भी नहीं होता , जो मैं आपको समझाता , बुरे को नहीं अच्छे को भगवान बनाना इस बार। देखता हूं भारत में सत्ता बदलते ही भला लगने वाला भी बुरे से बद्दतर आचरण करने लगता है। मैं भी क्या करुं आप बताओ मुझे। वो भगवान खुद को बताने वाले चले गये मगर इक किरण रौशनी की मुझे दिखला गये हैं।

Sunday, 23 October 2016

क्या इसको मुहब्बत कहते हैं ( कविता ) 1 2 3 डॉ लोक सेतिया

क्या इसको मुहब्बत कहते हैं
प्रेमिका हो चाहे हो पत्नी ,
आपकी सोच आपकी समझ
वही रहती है पुरातन पुरुषवादी ,
औरत के लिये सारे कर्तव्य निभाने को
और पुरुष के लिये सभी अधिकार
औरत की  नहीं हो सकती  कभी भी
कोई राय न कोई सोच न  कोई विचार
उसको नहीं सोचने तक का अधिकार
क्या इसको मुहब्बत कहते हैं।
आप भले कितने शिक्षित हो जायें
आपको बेशक मालूम हो ये भी
होना चाहिये समानता का अधिकार
हर महिला को हर इक पुरुष को भी ,
आपका धर्म भी देता हो शिक्षा नारी
को आदर देने को , देवी समझ कर
लिखा हो वाणी में , समझाया गया हो
" सो किंव मंदा आखिये जिन जन्में राजान , "
तब भी आपको लगता हो श्रेष्ठ हैं पुरुष
नहीं देते  अगर उचित स्थान नारी को
फिर भी चाहते अच्छे  इंसान  कहलाना
करते हों पवित्र बंधन के नातों की बातें
क्या इसको मुहब्बत कहते हैं।
आपको याद अपना  हक निर्णय का
अपने सभी निर्णय , करना चाहते आप
महिला के हर फैसले पर देते आप दखल
जो आपका है समझते है वो आपका ही
आपकी मर्ज़ी है जिसे  दें या नहीं दें ,
महिला का जो भी समझते  आपका है
खुद उनको भी नहीं है उस  पे अधिकार
ये मानसिकता भला कहला सकती है ,
उचित उनके लिये जिनको करते प्यार
क्या इसको मुहब्बत कहते हैं।

Tuesday, 18 October 2016

तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं ( सत्येन्द्र दुबे की आत्मा पूछती है ) आलेख डॉ लोक सेतिया




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     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ,  हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर जी  , टीवी और अख़बार वालो पत्रकारो , सच के झंडाबरदार मीडिया वालो , खुद को जनसेवक कहने वाले और देशभक्त बताने वाले नेता और आला अधिकारी , आप सभी देखो ध्यान से इन तस्वीरों को , नहीं याद आया ये चेहरा , आप सभी से सवाल करती है सत्येंद्र दुबे की आत्मा। नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया में इंजीनियर युवक जिसका दोष यही था कि उसने तब के देश के प्रधानमंत्री जी के कार्यालय को सूचित किया था भ्र्ष्टाचार के बारे में और वो गोपनीय जानकारी भृष्ट लोगों तक पहुंची और उसको कत्ल करवा दिया गया।
      जन्म :::::::::::   2 7 नवंबर 1 9 7 3
    कत्ल हुआ :::: 2 7 नवंबर  2 0 0 3
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     कोई सबक सीखा किसी ने , बिल्कुल भी नहीं। आज भी कोई शिकायत करे अगर सरकारी धन संम्पति की लूट की अपराध की तब क्या होता है जानते हैं। सत्ताधारी दल का कोई नेता आदेश देता है विभाग को अधिकारियों को जो अनुचित कार्य या गैर कानूनी काम करता उसको बचाने को। शिकायत करने वाले को जब मालूम होता है सभी देश को लूटने में शामिल हैं तब उसको क्या समझ आता है , खामोश रहो या जान से हाथ धोने को तैयार रहो। जाने कितने निर्दोष कत्ल हो रहे हैं कोई नहीं जानता किस तरह , आप ऐसे वातावरण में देश और समाज को महान और प्रगति की राह पर जाता बताते हैं। बेशक ऐसे मरने वाले की लाश पर मगरमच्छ जैसे आंसू बहाने वो भी जाते हैं जिनके कारण कत्ल हुआ।
               अब और कुछ नहीं रहा कहने को हां मेरी ग़ज़ल का इक शेर पेश है ::::

                  " तू कहीं मेरा ही कातिल तो नहीं , मेरी अर्थी को उठाने वाले "
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Sunday, 16 October 2016

ग़ज़ल 1 3 8 ( मधुर सुर न जाने कहां खो गया है ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

मधुर सुर न जाने कहां खो गया है
यही शोर क्यों हर तरफ हो गया है।

बता दो हमें तुम उसे क्या हुआ है
ग़ज़लकार किस नींद में सो गया है।

घुटन सी हवा में यहां लग रही है
यहां रात कोई बहुत रो गया है।

नहीं कर सका दोस्ती को वो रुसवा
मगर दाग़ अपने सभी धो गया है।

करेंगे सभी याद उसको हमेशा
नहीं आएगा फिर अभी जो गया है।

कहां से था आया सभी को पता है
नहीं जानते पर किधर को गया है।

मिले शूल "तनहा " उसे ज़िंदगी से
यहां फूल सारे वही बो गया है।

ग़ज़ल 111 ( दर्द अपने हमें क्यों बताए नहीं ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

दर्द अपने हमें क्यों बताए नहीं
दर्द दे दो हमें हम पराए नहीं।

आप महफ़िल में अपनी बुलाते कभी
आ तो जाते मगर बिन बुलाए नहीं।

चारागर ने हमें आज ये कह दिया
किसलिए वक़्त पर आप आए नहीं।

लौटकर आज हम फिर वहीं आ गए
रास्ते भूलकर भी भुलाए नहीं।

खूबसूरत शहर आपका है मगर
शहर वालों के अंदाज़ भाए नहीं।

हमने देखे यहां शजर ऐसे कई
नज़र आते कहीं जिनके साए नहीं।

साथ "तनहा " के रहना है अब तो हमें
उन से जाकर कहो दूर जाए नहीं।

ग़ज़ल 9 9 ( उसको न करना परेशान ज़िंदगी ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

उसको न करना परेशान ज़िंदगी
टूटे हुए जिसके अरमान ज़िंदगी।

होने लगा प्यार हमको किसी से जब
करने लगे लोग बदनाम ज़िंदगी।

ढूंढी ख़ुशी पर मिले दर्द सब यहां
जाएं किधर लोग नादान ज़िंदगी।

रहने को सब साथ रहते रहे मगर
इक दूसरे से हैं अनजान ज़िंदगी।

होती रही बात ईमान की मगर
आया नज़र पर न ईमान ज़िंदगी।

सब ज़हर पीने लगे जानबूझकर
होने लगी देख हैरान ज़िंदगी।

शिकवा गिला और " तनहा " न कर अभी
बस चार दिन अब है महमान ज़िंदगी।

ग़ज़ल 9 4 ( आज खारों की बात याद आई ) डॉ लोक सेतिया " तनहा "

आज खारों की बात याद आई
जब बहारों की बात याद आई।

प्यास अपनी न बुझ सकी अभी तक
ये किनारों की बात याद आई।

आज जाने कहां वो खो गये हैं
जिन नज़ारों की बात याद आई।

साथ मिल के दुआ थे मांगते हम
उन मज़ारों की बात याद आई।

कुछ नहीं दर्द के सिवा मुहब्बत
ग़म के मारों की बात याद आई।

जब गुज़ारी थी जाग कर के रातें
चांद-तारों की बात याद आई।

दूर रह कर भी पास-पास होंगे
हमको यारों की बात याद आई।

आज देखा वतन का हाल " तनहा "
उनके नारों की बात याद आई।

Saturday, 15 October 2016

सुश्री कमल कपूर ( मित्र लेखिका ) जी की रचनाएं अवं परिचय

            प्रस्तुत हैं कमल कपूर जी की रचनाएं  :::::::::
1               असली चेहरा ( लघुकथा )
      शुभ्रा देवी खादी की रेशम सी चमकीली साड़ी पहन कर नगर के होली उत्सव में जाने को घर से निकली , सज धज कर नई नवेली दुल्हन सी , दरवाज़े से बाहर कार की तरफ जा रहीं थीं कि घर के माली की बिटिया केसर कंवर। राम राम सा , बधाई हो मालकिन आपको होली मुबारक हो , कहते झुक कर आदर से गुलाब की पंखुड़ियां और गुलाल उनके पैरों पर धर दिया ख़ुशी से मुस्कुराते हुए। गुलाल के कुछ कतरे उनकी साड़ी पे लगे उड़ कर और कुछ उनकी कार पर। ऐसा कोई और करता जिसको शुभ्रा देवी अपने बराबर मानती तो यकीनन वो इक शुभ शगुन लगता उनको , मगर नौकर की बेटी की शुभकामना उनको पसंद नहीं आई। डांट दिया बेचारी को , मूर्ख लड़की ये क्या किया देख नहीं सकती बाहर जा रही हूं , मेरी साड़ी खराब कर दी। केसर कंवर को समझ नहीं आया क्या भूल हुई उस से , बोली मैडम जी आज होली है। शुभ्रा देवी कहने लगी तो क्या तुम हमसे खेलोगी होली , समझती नहीं होली अपनी बराबरी वालों से खेली जाती है।
          रामू काका ड्राइवर देख रहे थे , प्यार से बुलाया केसर को और बोले बिटिया रानी मुझे लगाओ गुलाल और रंग लगवा उसको दस रूपये दिये मिठाई खाने को। सोचने लगे रामू काका अभी जब होली उत्सव में होंगी मैडम जी तब कोई गरीब लड़की भले वो अनजान भी हो यही कर दे तो शुभ्रा जी मुस्कुरा कर उसको गले लगाकर फोटो करवाती अख़बार वालों को देने को। महिला समाज सेविका का असली चेहरा अभी जो यहां दिखाई दिया कोई नहीं देख पाता।
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2                       पर्याय ( लघुकथा )
      इकलौता बेटा चार साल बाद चार दिन को विदेश से अपने देश आया तो मां की ख़ुशी की सीमा नहीं थी। जाने क्या सोच मां ने अपने दिल की बात कह ही दी , आखिर कब तक इंतज़ार करती कि खुद बेटा कहता मां पिता जी नहीं रहे तुम यहां अकेली कैसी जीती होगी। आपको साथ ले चलता हूं , बहु पोतों पोतियों के साथ रहना ख़ुशी से। आना तो मैं खुद ही अपने देश में वापस हूं पर क्या बताऊं मज़बूरी है नहीं संभव अब आना। मगर समझ चुकी थी नहीं कहेगा सुपुत्र ये बात। जी भर उसकी पसंद की हर चीज़ बनाकर खिलाने के बाद पास बैठ हाल चाल पूछते बताते कह दिया अब मुझ से अकेले नहीं रहा जाता। बेटा कहने लगा मां तुम नहीं रह सकोगी उस देश में विदेशी बहु भी नहीं चाहती साथ रहना। यहीं खुश रहो आप , देखो मैं आपके लिये क्या क्या लाया हूं। लैपटॉप स्मार्ट फोन और भी आधुनिक सामान , देख ही नहीं सकीं मां की भीगी हुई पलकें। बस यही सोच रही थी उसको किसकी ज़रूरत है इकलौती संतान की अथवा इस सामान की। क्या ये सब पर्याय बन सकती हैं बेटे का कभी। फिर भी मां थी आंसू छुपा कर मुस्कुराई थी बच्चे को उदास तो नहीं देख सकती थी।
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3                         तो कोई बात बने (  गीत )
       दर्द मिटता नहीं है रोने से ,
      जो दवा उस को बनाओ तो कोई बात बने ,
      अश्क पलकों पे सजा कर रख लो ,
      प्यार की धुन में गीत गाओ तो कोई बात बने।
     ये जो कांटें भरे हैं दामन में किसी ने ,
     हंस के उन से भी निभाओ तो कोई बात बने ,
     बाग़ में फूल खिलाना सभी को आता है ,
     कभी सेहरा में फूल उगाओ तो कोई बात बने।
     शायरी है डूबना गरहाई में जाकर ,
     मोती कुछ ढूंढ कर लाओ तो कोई बात बने ,
     लोग अंधरों को बढ़ाने के हैं हक़ में चाहे ,
     शमां उम्मीदों की जलाओ तो कोई बात बने।
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4           मेरे मन में तू  ( गीत )
     मेरे मन में तू , पा लिये सब अर्थ ,
    बस इक तेरे ही नाम में मैंने ,
    रहता है शामिल ,
    मेरी हर धड़कन में तू।
   राहें जुदा जुदा हैं तो क्या ,
   दूर हैं नहीं हैं पास तो क्या ,
  चाहत दोनों की कभी कम न होगी ,
  दिल में भी तू है जिगर में तू।
  गिला कैसा मिली रुसवाई से ,
  इश्क़ बढ़ता जा रहा तन्हाई में ,
 मिलेंगे किसी मुहब्बत के जहां में ,
 तुझ में हूंगी मैं तब मुझ में तू।      

क्या हम झूठे लोग हैं ( दोगला समाज ) विचार - डॉ लोक सेतिया

         बार बार देखा है जहां भी कुछ गलत हो रहा हो , कोई देश-समाज के नियम क़ानून या नैतिकता की धज्जियां उड़ा रहा हो , अधिकतर लोग खामोश रहते हैं। तब तक जब तक आग उनके घर तक नहीं पहुंचती। औरों की परेशानी हमें परेशानी लगती ही नहीं। हम सोचते ही नहीं कि जब कोई भी सामजिक या न्यायिक नियमों का उलंघन करता है तो जो व्यक्ति सभ्य है कायदे से चलता है उसका जीना दूभर हो जाता है। कहीं दो नवयुवक असमय दुर्घटना में घायल होकर मर जाते हैं क्योंकि कोई तेज़ गति से गलत साईड से वाहन चला रहा होता है शराब पी कर। आप अगर अपने बेटे को यही शिक्षा दे रहे हैं कि सरकारी नियम पालन करने की ज़रूरत नहीं है अगर विभाग को पता चल भी गया तो कुछ पैसे जुर्माना भर चैन से रह सकते हो। तब आप कितने भी समझदार या शिक्षित हों आप अपने बेटे को सभ्य नागरिक नहीं बना सकते। बड़ा होकर आपका बेटा भले जो भी बन जाये देश का इमानदार नागरिक नहीं बन सकता। मुझे गलत बातों का विरोध करते उम्र बीत गई है और मैंने देखा है जब आप सरकार प्रशासन या किसी भी व्यक्ति की अनुचित बात का विरोध करते हैं तब कोई भी आपका साथ देना नहीं चाहता जब तक खुद उसको कोई नुकसान नहीं हो। देश समाज का नुकसान किसी को अपना लगता ही नहीं। क्या देश आपका नहीं है और समाज भी। आपका कोई एक पैसे का नुकसान करे आप तिलमिला उठते हैं , देश समाज को लूट रहा हो आपको सरोकार नहीं। हां कहने को आप धर्म की सच्चाई की बड़ी बड़ी बातें कर सकते हैं जबकि आचरण में आप उसके विपरीत ही होते हैं। मैं ये सब क्यों करता हूं एक बार फिर से दोहराता हूं। जब डॉक्टर बना और अपनी क्लिनिक शुरू की तभी इक पत्रिका , सरिता , में इक कॉलम पढ़ा था , कुछ सवाल पूछे गये थे , जैसे कि आप पढ़े लिखे हैं अपना काम या नौकरी करते हैं पैसा कमाते हैं घर बनाते हैं शादी करते हैं बच्चे पैदा कर उनको पालते हैं , तब आप अपने देश और समाज के लिये क्या करते हैं। घर बनाना संतान पैदा करना तो पशु पक्षी जानवर भी करते ही हैं , हम इंसान हैं तो कुछ हमें देश समाज के लिये करना चाहिये। उसके बाद लिखा होता था क्या क्या किया जा सकता है। उन्हीं बातों में इक प्रमुख बात थी देश समाज में जहां कहीं भी कुछ गलत अनुचित अनैतिक होता दिखाई दे उसका विरोध करना हर तरह से। बस तभी मन में इक संकल्प लिया था ये सब करने का।
                              बीस साल हो गये ये काम करते करते , भ्र्ष्टाचार , सरकार की मनमानी , अफ्सरों की तानाशाही का और धर्म समाजसेवा की आड़ में अपने स्वार्थ सिद्ध करते लोगों की वास्तविकता को उजागर करते। फिर लगा मेरे प्रयासों से हासिल क्या हुआ जब ये सारी बातें और भी बढ़ती नज़र आती हैं।  निराश होकर इक लंबा पत्र लिखा मैंने विश्वनाथ जी को जो संपादक थे सरिता के , आज ज़िंदा नहीं हैं , मैंने पूछा था आपकी बात मान मैंने यही काम रोज़ किया है मगर आज लगता है जैसे व्यर्थ गया सारा का सारा प्रयास। जल्दी ही उनका पत्र मिला मुझे विस्तार से समझाया था , लिखा हुआ था आपने ऊंचे पहाड़ों से निकलती नदी को देखा है , बहुत तीव्र वेग से बहती है , राह में आने वाले पत्थरों को मिटा देती है , रेत बन जाते हैं कठोर पत्थर और लगता है उनका नामो-निशान मिट गया जैसे। आप कहोगे देखा नदी को रोक नहीं सके रास्ते के वो पत्थर , मगर असलियत ये नहीं है , सच ये है कि रास्ते के अवरोधों से उस नदी का तीव्र वेग जो विनाशकारी हो सकता था , बाढ़ की तरह धरती को काटता , वही अवरोधों के कारण इतना कम हो गया कि सिंचाई के काम आता है वही पानी। ठीक इसी तरह जो लोग सच की डगर चलते हैं बुराई का विरोध करते रहते हैं उनकी कोशिश असफल नहीं होती , काफी हद तक रुकावट से बुराई बढ़ नहीं सकती। अगर हम भी खामोश रहें तब देश और समाज और भी नीचे रसातल में चला जायेगा। बस तभी फिर से अपना प्रयास कभी खत्म नहीं करने की बात तय की थी।
               अफ़सोस ये नहीं होता कि आप अपराध या गैर कानूनी कामों का अनुचित कार्यों का विरोध करते हैं अकेले और कोई आपके साथ नहीं होता है , ये तो पहले से मालूम ही है इस डगर पर कायर लोग साथ नहीं दे सकते , लेकिन अफ़सोस तब होता है जब कुछ लोग मेरे जनहित के प्रयास का विरोध लाज शर्म त्याग करते हैं और जो अनुचित कार्य करता उसके साथ खड़े होते हैं। शायद इक चरित्र बन गया है लोगों का कि उनको लगता है नियम कायदे क़ानून पालन करने को हैं ही नहीं , जिसको जब जैसे सुविधा हो उनकी अवहेलना कर सकता है , आज जिस ने गलत किया जो उसके साथ खड़े हैं चाहते हैं जब वो भी कुछ भी अनुचित करें तब उनको कोई रोकने वाला नहीं हो , सब समर्थन करें उनकी गलत बातों का। कोई इन से सवाल करे क्या आप धार्मिक हैं , सच की राह चलते हैं , क्या आप देशप्रेमी हैं देश के क़ानून संविधान का आदर करते हैं। अथवा झूठे और दोगले लोग हैं जिनके चेहरों पर नकाब है अच्छा होने की जबकि मानसिकता खराब ही है। ऐसे सभी लोगों को मेरा दूर से सलाम है , उनके दोहरे मापदंड मुझे मंज़ूर नहीं हैं।

Thursday, 13 October 2016

फेसबुक की महिमा अपार है ( बेसर-पैर की ) डॉ लोक सेतिया

      किसी शायर ने कहा है , क्यों डरें ज़िंदगी में क्या होगा , कुछ न होगा तो तजुर्बा होगा। मेरा अनुभव फेसबुक का भी यही है , कुछ नहीं मिला लेकिन ये तो समझ आया ही कि फेसबुक क्या बला है। मोहभंग कभी का हो चुका था आखिर अलविदा कह ही दिया , फिर भी कुछ बातें कुछ खट्टी मीठी यादें बाकी हैं। कहानियां भी कुछ न कुछ तो बनी ही हैं , किरदार भी असली नकली देखे हैं। हिसाब कभी लगाना नहीं सीखा , कहां पर खोया क्या और पाया क्या। कुछ दिन पहले लिखा था इक व्यंग्य भी फेसबुक पर देवी देवताओं की बातें देख कर कि भगवान को भी अपने देवी देवताओं के दर्शन करने फेसबुक पर आना पड़ेगा। वो सभी चौबीस घंटे रहते ही वहीं हैं अपने मंदिरों को छोड़कर , भला इतने भक्त और कहीं मिलते हैं थोक के भाव। लेकिन भगवान नहीं आये फेसबुक पर , उनसे फेक आई डी बनी नहीं और सच्ची बनाने नहीं दी फेसबुक ने , सब से पहले जन्म की तारीख बताने में ही मामला अटक गया। इक देवी ने प्रस्ताव रखा भगवन आप से नहीं बनाई जायेगी नई फेसबुक , आप मेरी वाली का पासवर्ड लेकर नाम बदल सकते हो आसानी से , कोई नहीं पूछेगा आप महिला से पुरुष कैसे हो गये और आपकी जन्म तिथि कब बदली भी और अब कोई देख ही नहीं सकता क्या तारिख है। मगर भगवान डर ही गये और मेरी तरह छोड़ गये फेसबुक की दुनिया को। आपको ये सूचना देना भी मेरा कर्तव्य था क्योंकि मैंने ही बताया था कि जल्दी ही भगवान आयेंगे खुद फेसबुक पर। फेसबुक कोई बहुत पुरानी नहीं है फिर भी इसका इतिहास लिखने को हज़ारों साल लग सकते हैं , आखिर यहां हर दिन नहीं हर मिंट इतना कुछ घटता रहता है कि उसको याद रखना भी इक चुनौती है। सुबह फेसबुक बनाई और शाम तक सौ दोस्त बन भी गये , बनने के बाद पूछते हैं भाई आपका नाम पता क्या है और कहां रहते क्या करते हैं। कौन कहे जब मित्र बनाया तब देखा नहीं वाल पर अबाउट में सभी तो बताया हुआ है। मगर कहां बस फोटो देख मित्रता की भले फोटो भी खुद की किसी ज़माने की हो या किसी और की ही। नाम में क्या रखा है जब यहां नाम भी दो महीने बाद बदल सकते हैं। फिर भी लोग हज़ारों दोस्त बनाते जा रहे हैं जब कि उनको किसी से कोई मतलब ही नहीं होता एक दिन बाद। खुश हैं देख कर हज़ारों की संख्या देख कर। फेसबुक पर सभी कुछ है , दुनिया भर की बातें , यहां तक कि देशभक्ति से समाजसेवा तक पर लिखना भी , ईश्वर और मानवता की बातों से लेकर मुहब्बत तक सभी उपलब्ध है इस बाज़ार में।  बस असली की गारंटी नहीं है , हर कोई खुद झूठ का कारोबार करता है और समझाता है बाकी सब को लेकर कि वो बिलकुल झूठ हैं। समस्या वही है , दर्पण बेचते हैं मगर खुद दर्पण में अपने आप को देखने से बचते हैं। इसलिये कि लोग आपको खूबसूरत बताकर लाईक करते हैं कमैंट्स लिखते हैं और आपका मन दर्पण आपको बताता है आपकी असलियत क्या है। बाहर देखते हैं सभी औरों को खुद अपने भीतर देखता ही नहीं कोई। इसी का नाम फेसबुक है। ये इतिहास नहीं है फेसबुक का , ये तो केवल संक्षिप्त भूमिका है , पूरा इतिहास लिखने की ताकत मुझ में तो नहीं है। समझना हो तो इतने से समझ लेना। समझदार को इशारा काफी होता है , सभी समझदार हैं। कौन खुद को नासमझ कहता है। में नासमझ हूं फिर भी समझा रहा सभी को , विचित्र बात लगती है।  

Monday, 10 October 2016

रावण बहुत हैं पर श्रीराम कहां हैं ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

        श्रीराम कहां गये , रावण को जलाना है , राम कहीं नज़र ही नहीं आ रहे। युद्ध जारी है दोनों तरफ ही रावण हैं आमने सामने लड़ते हुए। जीत रावण की ही होगी , रावण मरेगा फिर भी ज़िंदा रहेगा , लंका में हो चाहे अयोध्या में राजतिलक रावण का ही होगा। कोई भी मर्यादा पुरुषोत्तम राम की तलाश नहीं करना चाहता , सब ने मान लिया है इस युग में वो मिल ही नहीं सकते , सभी अपने अपने रावण को राम घोषित कर रहे हैं। नया इतिहास लिखा जाना है फिर से इक नई रामायण लिखनी है , कलयुगी तुलसीदास खोज लिये गये हैं। इन्होंने कितने ही नामों पर चालीसे लिख डाले हैं साहित्य में नाम कमाने को। रावण हर शहर में है और पिछले साल से अधिक ऊंचे कद का है , हर रावण को जलाने को और भी रावण हैं जो खुद को राम कहलाना चाहते हैं। उन सभी के पास अपना अपना तुलसी है जो उनको मर्यादा पुरुषोत्तम बता सकता है। बड़ी समस्या खड़ी हो गई है जनता को समझ ही नहीं आ रहा इतने रावणों में से किसको अपना राम समझे और उसकी वंदना करे। जनता की मज़बूरी है उसको आरती उतारनी ही है चाहे कोई भी मिल जाये बिना किसी को भगवान बनाये उसका गुज़ारा नहीं होता। जनता भेस देखती है , चरित्र को नहीं पहचानती , राम का भेस धरे खड़े हैं हर तरफ रावण , जनता है कि बंट गई है। हर रावण की जय-जयकार करने वाले लोग हैं , सभी का अपना अपना स्वार्थ जुड़ा हुआ है , किसी न किसी के साथ। इक बात सभी  की एक समान है , हर राम अकेला है , किसी के साथ लक्ष्मण नहीं है , न सीता ही है , हनुमान कौन है कोई नहीं जानता । जंग भी सीता को लेकर नहीं है , कुर्सी नाम की वस्तु को लेकर लड़ रहे हैं सब। सभी का दावा है वही कुर्सी का सही हकदार है , हक साबित करने की अपनी अपनी परिभाषा भी सब की है , देश और जनता की भलाई को छोड़ बाकी सब उनको याद है।
                      कलयुग में किसी को किसी का भरोसा नहीं है , भाई हो या पत्नी , चाहे कोई मित्र , कुर्सी की खातिर सभी बदल सकते हैं , इसलिये उनका त्याग भी किया जा सकता है। कुछ नये अवतार सामने आये हैं जो सब को निर्देश देते हैं कि जैसा हम बतायें वैसा ही विश्वास करें , जो भी हमारी बात से सहमत नहीं होगा उसको रावण साबित कर दिया जायेगा और उसी को आग के हवाले कर देंगे। खुद को राम घोषित करवाने को सभी उनकी बात का समर्थन कर रहे हैं। इन अवतारों का कहना है कि जो भी ये कहते हैं वही जनता का अभिमत है , उनका अपना सर्वेक्षण है अपनी बात को सच साबित करने को। कोई इनके अवतार होने पर शक नहीं कर सकता , जो ऐसा प्रयास करे वो पापी है झूठा है , नासमझ और नादान भी जो उनकी ताकत को नहीं पहचानता उनकी महिमा को समझना नहीं चाहता। वाकयुद्ध इनका ब्रह्मास्त्र है और उसका उपयोग करने में ये पारंगत हैं , इनका मानना है अब यही सब से बड़ा हथियार है। इनको एक ब्यान से कितने लोगों पर निशाना लगाना आता है , कोई इनका सामना करना नहीं चाहता। इनका झूठ ही आजकल सच कहलाता है। इनकी भी सेना है जो लड़ती रहती है छदम युद्ध सभी से , ये सभी सेनापति हैं , इनका सैनिक कोई भी नहीं है। मगर इनको इक मंत्र आता है जिसको जपकर ये जनता को अपना समर्थक बना लेते हैं , ये कहकर कि हम आपकी लड़ाई लड़ रहे हैं। इनको हर हाल में जीतना है , जीतने को सब कुछ करने को तत्पर हैं। ये हार भी जायें तब भी अपनी हार नहीं स्वीकार करते , हार को जीत साबित कर देते हैं।
                       आज युद्ध अच्छाई की बुराई पर जीत की खातिर नहीं है। सवाल किसी बुरे को भला साबित करना है , ताकि किसी रावण को राम घोषित किया जा सके जो खुद अपने को जलाने का चमत्कार दिखा कर भी कभी मरे नहीं ज़िंदा ही रहे। सभी अपने भीतर के रावण को बचाये रखना चाहते हैं , अहंकार रुपी रावण खत्म होता ही नहीं है। ये नया कुरुक्षेत्र है , किसी को धर्म की रक्षा नहीं करनी है , सब को राज्य पाकर जनता रुपी द्रोपती का चीरहरण करना है। सब व्याकुल हैं राजतिलक करवाने को , जीत की वरमाला पहनने का सपना हर किसी का है। बेबस जनता छली जाती है बार बार , फिर उसका चयन गलत साबित होता है , योग्य वर होता ही नहीं उसके पास कभी। मगर उसको जयमाला पहनानी ही पड़ती है , इनकार करने का अधिकार उसको नहीं है। काश अब के वो साफ कह दे साहस करके कि तुम सभी एक जैसे हो , मुझे तुम में किसी को वरमाला नहीं डालनी है। तुम में राम कोई भी नहीं है। अब मुझे न कोई अग्निपरीक्षा देनी है न ही धरती में समाना है। मैं इस युग की नारी निडर हो कर कहती हूं  , तुम सभी ही रावण हो राम नहीं हो। आज सीता कहीं भी सुरक्षित नहीं है न वन में न ही महलों ही में। नई रामायण लिखने वालो पहले जाओ कहीं से तलाश कर ढूंढ लाओ राम को। किस ने हरण कर लिया है श्री राम जी का , जनता रुपी सीता पूछती है कहां हैं श्री राम।

Sunday, 9 October 2016

श्री महेन्दर जैन जी ( मित्र लेखक ) की रचनाएं और परिचय

    साहित्य सृजन करना और बात है और समाज में साहित्य को बढ़ावा देना और बात। ये अदभुत गुण मैंने कवियत्री चन्दन बाला जैन जी में जितना देखा शायद पहले कहीं नहीं देखा था। हिसार के स्थानीय डिश टीवी पर अपने शहर से भी और आस पास दूसरे शहरों से भी शायर कवि आमंत्रित कर नियमित कार्यक्रम संचालित करना जैसे उनकी साहित्य की अर्चना थी। ममता और वात्सल्य की मूरत लगी थी मुझे वो। मेरी महेन्द्र जैन जी से पहचान उन्हीं से जुड़ी हुई है। वो उनकी बहिन थी और प्रेरणा भी साहित्य की सेवा को प्रेरित करने में , आज उनके स्वर्गवास होने के बाद भी " चन्दनबाला  जैन साहित्य मंच " संस्था उन्हीं के काम को जारी रखे है। महेन्दर जैन ग़ज़ल बाल साहित्य और दोहे जैसी विधाओं के रचनाकार ही नहीं हैं , उनका साहित्य और साहित्यकारों को बढ़ावा देने का काम उनको और भी अलग जगह प्रदान करता है। बेशक उनको ये गुण विरासत में मिला है उनका ये कहना है , मगर कितने लोग होते हैं जो अपने अग्रजों की अच्छी बातों को जीवन में लागू करते हैं। यकीनन खुद में वो भावना होना पहली शर्त है। आज उनकी रचनाओं को लिखने से पहले मुझे ज़रूरी लगा चन्दनबाला जी की इक लोकप्रिय ग़ज़ल को यहां लिखना। प्रस्तुत है ::::
                         चन्दनबाला जैन जी की ग़ज़ल ( दर्द की परछाइयां - पुस्तक से )
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              दर्द सबको ही सुनाएं , ये ज़रूरी तो नहीं
              हर जगह हम मुस्कराएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              कारवां लेकर चले थे , हम सफर पर दोस्तो
              साथ आखिर तक निभाएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              बेवजह कोई रूठ कर जाता है जाने दीजिए
              हम उसे जाकर मनाएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              यूं तो शायर ने लिखी होंगी हज़ारों पंक्तियां
              शेर सारे दाद पाएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
              कर लिया सामान यूं सौ साल जीने के लिए
             सबको खुशियां रास आएं , ये ज़रूरी तो नहीं।
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           अब कुछ ग़ज़लें महेन्द्र जैन जी की पेश हैं ::::::::
1                   ग़ज़ल
मैंने अक्सर यार हादसा ऐसा होते देखा है
परियों की गाथा सुन बच्चा भूखा सोते देखा है।
जिन लोगों के अपने चेहरे पर है कालिख पुती हुई
ऐसे लोगों को मैंने दर्पण को धोते देखा है।
बेदर्दी पत्थरदिल होकर रहते हैं जो इस जग में
अपने दुख में चीख चीख कर उनको रोते देखा है।
मेहनत करके भी पल दो पल सुख जिनको नहीं मिलता
अपनी खुशियों को सपनों में उनको संजोते देखा है।
नींद नहीं आती मालिक को नर्म मखमली बिस्तर पर
मज़दूरों को पत्थर पर आराम से सोते देखा है।
भूल न जाना कभी महेन्द्र तू ये बात बुज़ुर्गों की
उसने फ़स्ल वही काटी है जैसी बोते देखा है।
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2              ग़ज़ल
अंगारों पर चलना सीख
जीना है तो मरना सीख।
मोती ही शायद बन जाए
बनकर बूंद टपकना सीख।
तू शिव शंकर बन जाए
विष के घूंट निगलना सीख।
घाटी तक जाना है तुझे
पहले पर्वत चढ़ना सीख।
आएगा मधुमास ज़रूर
पतझड़ में भी रहना सीख।
दूर नहीं है साहिल अब
मंझधारों से लड़ना सीख।
सुख पाना है गर जग में
हर सांचे में ढलना सीख।
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3                ग़ज़ल
कैसे हैं हालात न पूछ
मुझसे तू हर बात न पूछ।
मिली तरक्की उनको पहले
क्या दी थी सौगात न पूछ।
आज न उसको घूस मिली तो
कैसे गुज़री रात न पूछ।
दुल्हन लिये बिना कैसे
लौट गई बारात न पूछ।
कैसे ले ली महंगी गाड़ी
बाबू की औकात न पूछ।
उसे सिनेमा घर में देखा
कौन था लेकिन साथ न पूछ।
थाने में जो कत्ल हुआ
किसका उसमें हाथ न पूछ।
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4            ग़ज़ल
झूठा सब व्यवहार हो गया
सच कितना लाचार हो गया।
रूप कहां चेहरे पर असली
नकली सब श्रृंगार हो गया।
झौपड़ियों की लाशों पर अब
महलों का विस्तार हो गया।
जिसने फ़स्ल उगाई थी वो
खुद भूखा लाचार हो गया।
मन्दिर मस्जिद टूट रहे हैं
बेघर अब करतार हो गया।
किसपर अब विश्वास करें हम
दोस्त ही जब गद्दार हो गया।
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5       ग़ज़ल
फिर-से शुरू कहानी कर
मत कोई नादानी कर।
व्यसनों के तू चक्कर में
मत बेकार जवानी कर।
कट जाएगा शीघ्र सफर
बातें नई पुरानी कर।
नाम कमाना यदि चाहे
तो कोई कुर्बानी कर।
करना है यदि काम बड़ा
बात कोई मर्दानी कर।
कब का बचपन बीत चुका
अब तो बात सयानी कर।
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6            ग़ज़ल
लगता जीवन सुन्दर है
दुख का मगर समुन्दर है।
पहले था लंका में ही
अब तो रावण घर-घर है।
पंछी उड़ न सकेगा अब
काट दिया इसका पर है।
हाल न पूछो संसद का
मछलीघर से बदतर है।
महल बना औरों के वो
खुद रह जाता बेघर है।
कातिल बदला है लेकिन
बदला कब ये ख़ंजर है।
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7         गीत

फूलों को बाहों में भरकर कांटों से भी प्यार किया है
जीवन की दुर्गम राहों को हंसते हंसते पार किया है।
जब भी पास निराशा आई आशावादी गीत लिखा है
जिसने भी ठुकराया मुझको उसको अपना मीत लिखा है
मंज़िल को पाकर भी मैंने राहों से अभिसार किया है।
फूलों को -------------------------------------
जगमग जग की चकाचौंध ने मेरे दिल को था ललचाया
भौतिक सुख के फूलों ने भी अपनी खुशबू से भरमाया
लेकिन जग की पीड़ाओं को भी मैंने स्वीकार किया है।
फूलों को ----------------------------------------

Saturday, 8 October 2016

मेरा घर है या पागलखाना ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    उसको देखा तड़पते हुए ज़ख़्मी हालत में तो मुझे दया आ गई और मैं उसको अपने घर ले आया। नाम पूछा तो कहने लगा सच है मेरा नाम। मैंने कहा सच ये कैसी हालत हो गई है तुम्हारी , किसने घायल किया है तुम्हें। कहने लगा अब किस किस का नाम लूं , सभी तो शामिल हैं मुझे ज़ख्म देने में। जब कोई अदालत किसी बाहुबली नेता को बरी करती है सभी गुनाहों के आरोपों को निराधार बता कर तब एक गहरा घाव मेरे बदन पर होता ही है। जब हर दिन टीवी वाले और अख़बार वाले सत्ता के लोभी नेताओं का गुणगान करते हैं उनको देशभक्त बताते हैं तब भी मुझे ज़ख्म मिलता ही है।चाहे नेताओं के झूठ फरेब वाले भाषण हों अथवा मीडिया द्वारा तर्क कुतर्क से गलत को सही और झूठ को सच साबित करना , मेरी आत्मा तक को घायल करते हैं। सच को ये रोज़ क़त्ल करते हैं और खुद को सच का पैरोकार भी बताते हैं। मैं सच को अपने घर ले आया तो घर के लोग मुझ से नाराज़ हो गये , कहते हैं भला किस काम है ये आजकल , सच को घर में जगह देना बड़ी मुसीबत मोल लेना है।  मुझसे कहते हैं परिवार वाले कभी तो फायदे  का सौदा किया करूं , जो भी करता हूं घाटे का ही काम करता हूं। मगर मैंने सच को अपने घर में ठिकाना बनाने दिया और सोच लिया कि जब ओखली में सर दिया है तो मूसलों से क्या डरना। सच को शायद थोड़ा चैन अवश्य मिला होगा मेरी बात से फिर भी बोला भाई लेखक तुम मुझे अकेला तो नहीं छोड़ दोगे अपना बना कर। मैंने कहा तुम निराश क्यों होते हो , मैं ही नहीं यहां और भी तमाम लोग हैं जो तुम्हें बेहद चाहते हैं वो सभी तुम्हारे लिये बहुत कुछ करेंगे जब देखेंगे तुम्हारी दशा को। बस तुम एक बार चल कर उनसे मिल तो लो अख़बार वालों से टीवी चैनेल वालों से। वह हंस दिया , मगर उसकी हंसी में तंज नहीं दर्द था , अपनों द्वारा छले जाने का। कहने लगा कितने मूर्ख हो लेखक अभी तक नहीं समझे उनको , उन्हीं के कारण ही तो मेरी ऐसी हालत हुई है। कभी मेरा ठिकाना वही था  , अब तो उन्होंने मुझे निकाल बाहर फैंक दिया है , पहचानते तक नहीं मुझे आजकल। मुझे समझाते हैं खामोश रहो नहीं तो जान से हाथ धो बैठोगे। वो तो झूठ को सच साबित कर उसका कारोबार करने लगे हैं , कोई पत्रकार सच को तलाश करने नहीं जाता कहीं। उनको तो मेरी क्या खबर की भी परिभाषा तक याद नहीं है।
                        मैंने कहा चलो हम चलते हैं उनको अपनी बात कहते हैं , उनका दावा है सभी के विचारों को  अभिव्यक्त करने के अधिकार की रक्षा करते हैं वो। सच बोला सुना है मैंने मगर ऐसा वो केवल अपने लिये मानते हैं दूसरों के लिये हर्गिज़ नहीं , और जो उनसे सहमत नहीं हो उसके लिये तो कदापि नहीं। अब खुद को समाज का चौकीदार या रखवाला नहीं खुदा समझते हैं जिस पर कोई सवाल नहीं उठा सकता , बस उन्हीं को हर किसी पर सवाल करने का हक है। देश समाज की भलाई से अधिक महत्व उनके लिये अपने अहम का है , समाज को जागरुक करना या बदलाव की बात करना उनका मकसद नहीं रहा , टी आर पी , प्रसार संख्या , सब से पहले और तेज़ कौन की अंधी दौड़ में शामिल होकर बाकी सब पीछे छोड़ आये हैं। आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास , पत्रकारिता की दशा ऐसी हो चुकी है। आज कुछ कहते हैं दो दिन बाद कुछ और कहते हैं , उल्टी बात को सीधा साबित करते हैं और कभी नहीं मानते कल जो कहा था वो गलत था , उनको खेद है। अपनी भूल कभी स्वीकार नहीं करते , औरों को खुद न्यायधीश बन अपराधी घोषित भी करते है और साबित भी। किसी से बयान लेते हैं मगर उसको बोलने नहीं देते , उसको कहते हैं आप यही कहना चाहते हैं , ऐसे अपनी बात अपने शब्द दूसरे के मुंह में ठूंसते हैं। हर बात में उनको अपना विशेषाधिकार याद रहता है , सभी को बराबरी का अधिकार हो ये उनको मंज़ूर नहीं है। प्रशासन और नेताओं से मित्रता करते हैं सरकारी विज्ञापन और अन्य सुविधा हासिल करने को , अपने काम निकलवाने को , अपनी गाड़ी पर प्रेस शब्द लिखवा समझते हैं अधिकार मिल गया यातायात नियमों को अनदेखा करने का। लगता है आज की पत्रकारिता निरंकुश है , बंदर के हाथ में तलवार की तरह खतरनाक। हर कोई इनसे भय खाता है , शरीफ लोग अधिक डरते हैं।
                         मैंने सच से कहा चलो आज खरा सच क्या है और किसके सच में खोट मिला है इसकी परीक्षा करते हैं।  इक नामी पत्रकार हैं जो साक्षात्कार लिया करते हैं हर किसी का और समझा जाता है नीर क्षीर को स्पष्ट कर सकते हैं। मैंने उनको फोन किया और बताया सच के बारे और पूछा क्या आप उस से मिलना चाहते हैं , सच से मुलाकात करेंगे ताकि उसका साक्षात्कार प्रकाशित कर सकें अपने कालम में। बोले पहले बताओ उसके पास कोई प्रमाणपत्र है सच होने का , किसी सरकारी विभाग से मिला परिचय पत्र , किसी अदालत ने उनकी सच होने की पहचान को शपथ लेकर प्रमाणित किया है। सच ने कहा भला सच को इनकी क्या ज़रूरत है , यूं भी यही सब तो झूठ लिये फिरता है सबूत सब को दिखने को। क्या खुद को सच साबित करने को मुझे भी झूठ ही का सहारा लेना होगा , प्रमाणपत्र पाने को। सच क्या सभी को समझ नहीं आता कि यही सच है। पत्रकार सच की बात से चिढ़ गये और बोले ये तो कोई पागल लगता है , मुझे किसी पागल से मिलने की फुर्सत नहीं है आज , आज तो मुझे साक्षात्कार लेने जाना है उन लोकप्रिय नेता जी का जिनको अदालत ने कई साल बाद ज़मानत पर रिहा किया है। किसी दार्शनिक ने कहा है सच बोलना पागलपन ही होता है , और समझदार लोग सदा सच से दूर रहते हैं ताकि किसी से बैर या टकराव की नौबत नहीं आये। झूठ की जय जयकार से लोग मालामाल हो जाते हैं। क्या जहां सच रहता हो वो पागलखाना होता है , मुझे अपने घर को क्या पागलखाना नहीं बनने देना चाहिये , क्या मैं भी पागल हूं , सच की तरह।

स्वछता अभियान से तमाम खोखली बातों तक ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        ये बात सबसे पहले साफ कर देना चाहता हूं कि मुझे दल अथवा व्यक्ति से न कोई लगाव है न ही विरोध ही। ये भी हो सकता है जो मैं जैसे देखता हूं बाकी लोग उस तरह नहीं देखते हों , इसलिये आप मुझे से असहमत हों तो ये आपका अधिकार है। मगर मुझे जो बात जैसे लगती है मैं उस बारे अपनी राय रखने का हक तो रखता ही हूं। जब से मोदी जी की सरकार आई है हर कुछ दिन बाद कुछ न कुछ नया सामने आता रहता है जनता को बतलाने को कि ये सरकार कितना काम कर रही है। शुरुआत हुई थी दफ्तर में मंत्री से अधिकारी तक समय पर आने को लेकर। उसके बाद बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की चर्चा , फिर मेक इन इंडिया , गंगा सफाई योजना से स्वच्छता अभियान की बात और खुले में शौच बंद करने की बात। अगर आप भी गौर से देखते हैं अपने आस पास क्या होता है और क्या बदला है तो समझ सकते हैं जो दावे किये जाते हैं और जो असलियत सामने दिखाई देती है उनमें कोई मेल होता नहीं है। आज भी किसी भी सरकारी दफ्तर जाकर देख सकते हैं कोई भी सुबह समय पर आता नहीं है। महिलाओं के साथ शोषण और अपराध आज भी कम नहीं हुए हैं और पुलिस या प्रशासन का ढंग आज भी बदला नहीं है। आज भी जब कोई महिला शिकायत करती है तो प्रयास किया जाता है पुलिस और पशासन द्वारा कि किसी तरह मामला सुलट जाये समझौता करवा दिया जाये। सही और गलत को समझना और ऐसी घटनाओं को नहीं होने देना किसी की प्राथमिकता ही नहीं है। कन्या भ्रूण हत्या की हालत आज भी यही है कि लिंग जांच की जा रही है और ज़्यादा पैसे लेकर। स्वच्छता अभियान और सरकारी लोगों के काम का ढंग बदलना दोनों कहीं भी कारगर होते दिखते नहीं हैं। गंदगी पहले से अधिक ही हुई लगती है और सरकारी अधिकारी आज भी मनमानी करते हैं। कायदे क़ानून तोड़ने वाले बेफिक्र हैं और सभ्य नागरिक उल्टा अधिक परेशान प्रशासन को शिकायत कर के। प्रशासन आज भी सरकारी  प्लाट्स पर या  सरकारी भूमि पर सड़कों पर फुटपाथों पर नाजायज़ कब्ज़ा किये हुए लोगों पर कोई कठोर करवाई नहीं करना चाहता । विभाग के अधिकारी आंखे बंद किये हुए हैं।
              शायद जिस गति से इस सरकार की योजनाओं के विज्ञापन बदलते हैं गिरगिट भी रंग नहीं बदलती होगी। क्या नेता समझते हैं कि हर कुछ दिन में कोई नया शोर कोई तमाशा कोई आडंबर करते रहने से जनता भूल जाएगी पिछली बात को जो मात्र प्रचार ही बन कर रही। कुछ तस्वीरें हैं जो स्पष्ट करती हैं मेरे फतेहाबाद शहर जो हरियाणा का एक ज़िला भी है उसकी सबसे पॉश कालोनी की गंदगी और सरकारी विभाग की खाली दुकानों पर खुलेआम अनाधिकृत कब्ज़े को विभाग की अनदेखी या सहमति से। अगर हरियाणा सरकार वास्तव में भ्र्ष्टाचार को समाप्त करना चाहती है तो ये वास्विकता उसको हर शहर में देखनी और बदलनी होगी।





Thursday, 6 October 2016

आयुर्वेद और योग की भलाई अथवा सिर्फ झूठ धन कमाने को ( गंभीर चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

           विज्ञापन सच नहीं होते सभी जानते हैं फिर भी झांसे में भी आते ही हैं लोग। आज कुछ ऐसे ही विषय की बात करनी है। विज्ञापन दावा करता है हमारा मुनाफा किसी व्यक्ति के लिये नहीं है समाज सेवा के लिये है। वास्तविकता सामने आती है कि उस कंपनी का मालिक दुनिया के अमीरों में शुमार हो गया है। शायद देश में कहीं कोई ज़रूरत बाकी ही नहीं रही समाजसेवा की अन्यथा वो पैसा जमा होता ही नहीं किसी के पास। क्या सच देश समाज स्वर्ग बन गया है , कहीं न किसी स्कूल की कमी है न अस्पताल की , न कोई भूखा है न ही बेघर या दुखी। अगर ये सब समस्याएं हैं तो वो धन जो दावा था समाजसेवा पर खर्च होगा बचा हुआ कैसे है।
चलो ये मान लेते हैं कि ऐसा झूठ बोलने वाली वही पहली कंपनी नहीं है , और भी है जो विज्ञापन में दावा करती हैं कि उनका प्रोडक्ट खरीदो तो उसका एक भाग किसी विशेष मकसद पर खर्च होगा। उनका उद्देश्य समाजसेवा नहीं होता अपना सामान बेचना होता है आपकी भावनाओं का उपयोग कर के। लेकिन जब कोई खुद यही करता है लोगों की भावनाओं का फायदा उठाने को प्रचार करता है कि हम अपने मुनाफे के लिये नहीं कर रहे ये सब तो समाजसेवा की खातिर है तब उसका अमीर होते जाना धोखा है ठगी है। अब उनका प्रचार है नये विज्ञापन में नये ढंग से , बताते है वो सन्यासी पहाड़ों जंगलों में जाता रहा है और जड़ी बूटियों को खोज लाया है , और बताता है मैंने किस किस जड़ी बूटी में क्या खोजा क्या पाया है। कब गया कहां गया किसे मालूम। लगता तो नहीं पिछले कई सालों से उसको कारोबार करने से , राजनीति में दखल रखने से , योग को व्योपार बनाने से पल भर भी फुर्सत मिली होगी। फिर भी मान लेते हैं भगवा भेस धारी सच कहता होगा , तो पूछना होगा आपने खोजा क्या नया। टूथपेस्ट बनाना , फेसक्रीम बनाना , और सौंदर्य प्रसाधन बनाना , क्या यही आयुवेद है। आपको पता भी आयुर्वेद का उद्देश्य , लोगों को रोगमुक्त करना रोगों का निदान और उपचार करना। और शायद इक बात सभी जानते हैं बीमार को खुद देखे जांचे बिना कोई वैद भी सही निदान और उपचार नहीं कर सकता है। भूल मत जाना कि देश में इक कानून भी , भले उसको ठीक से लागू किया नहीं गया हो , कि कौन डॉक्टर वैद हकीम है जो उपचार करने का अधिकारी है। कोई डिग्री कोई शिक्षा ज़रूरी है। जैसे आप गली गली शहर शहर दुकानें खुलवा ईलाज करने का दावा कर रहे हैं वो खिलवाड़ है देश की जनता के स्वास्थ्य के साथ। आप सिर्फ और सिर्फ धन अर्जित करने का कार्य कर रहे हैं वह भी उचित अनुचित की परवाह किये बगैर। चलो इक सवाल और भी आखिर में , लोग समझते हैं आपने बड़ा काम किया है योग को प्रचार कर के। मगर जैसा आपका दावा है योग से स्वास्थ्य का , क्या कोई बता सकता है योग करने से देश में लोग कितने अधिक स्वस्थ हो गये हैं , रोग कम हुए हैं। वास्तव में आपने योग को भी अपना कारोबार ही बनाया है , आपका बताया योग देश की सत्तर प्रतिशत गरीब जनता के लिये किसी काम का नहीं है। जो धनवान हैं खुद अपना काम नहीं करते न ही कोई मेहनत ही करते उनको आप कसरत से मोटापा और चर्बी घटाने का उपाय बताते हो। किसी भूखे को मत कहना ये करने को , वो मर जायेगा।  योग क्या है योगी कौन इस पर अभी बहुत बातें हैं कहने को समझने को समझाने को , मगर फिर कभी। 

Wednesday, 5 October 2016

जीना चाहती है देश की इक बेटी ( इक फरियाद - इक दास्तां - इक विडंबना ) डॉ लोक सेतिया

      " बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ "   सभी कह रहे हैं , मगर कह किस को रहे हैं नहीं मालूम। शायद हमारी आदत है खुद जो नहीं करते न ही करना चाहते वही औरों से कहते फिरते हैं ये करो। नहीं करोगे तो बहु कहां से लाओगे , यहां भी बेटी को बचाना है मगर इंसान समझ कर नहीं , अपना स्वार्थ पूरा करने को। किस की बेटी है वो कह नहीं सकता , कल मेरे पास चली आई अपनी विपदा को लेकर। कैसा समझाता बेटी इक लेखक क्या कर सकता है तुम्हारे लिये , कविता , कहानी , ग़ज़ल , व्यंग्य या आलेख लिखने से तुम्हारी वेदना कम नहीं होगी। पढ़ कर भले लोग वाह वाह करें , मगर जब ज़रूरत हो तब तुम्हारा साथ कोई भी नहीं देगा। हर किसी को अपनी जंग खुद ही लड़नी पड़ती है , और जीवन की जंग कभी समाप्त नहीं होती है। जिनको तुम्हारे साथ न्याय करना चाहिये वही जब साथ नहीं खड़े होना चाहते तो तुम्हारा निराश होना समझ सकता हूं , मगर निराश होकर हार मानना इतना सरल भी नहीं है। खुद अपना ही नहीं अपनी संतान का भी भविष्य तभी संवर सकता है अगर तुम जूझती रहो  तब तक जब तक अपने और अपने बच्चे के लिये न्याय हासिल नहीं कर लेती। इक बात तो तुम्हें समझ आ ही गई है कि हमारी व्यवस्था में जिन संस्थाओं को बनाया गया है जिन जिन मकसद की खातिर वो चाहती ही नहीं उन मकसदों को पूरा करना। तभी पुलिस प्रशासन महिला आयोग महिला थाना क्या समाज तक तुम्हारे साथ अन्याय होते देखता खड़ा है खामोश तमाशाई बनकर। कितनी आसानी से कहते हैं सभी ये तुम्हारा परिवारिक मामला है हम कुछ नहीं कर सकते। क्या पति और ससुराल के लोग मारपीट करें तभी महिला पर अत्याचार होता है , अगर उसके मायके में भाई भाभी या बाकी सदस्य करें मारपीट तो वो निजि मामला है। क्या औरत इक जानवर है , गाय भैंस की तरह , जिसके खूंटे से बंधी है वो जो चाहे कर सकता है।
                     प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी , बताएं मुझे मैं क्या करूं , आपको कैसे दिखलाऊं ये सब कड़वा सच , किसी के दर्द को समझना आसान नहीं है। आप उस पर भाषण दें या मैं कविता कहानी लिखूं दोनों किस काम के , सवाल तो इस सब को रोकना है। मगर खेद की बात है कि हमारे देश का प्रशासन किसी की वेदना को देखता ही नहीं समझना तो बहुत दूर की बात है। मुझे यहां शायर दुष्यंत कुमार की पहली ग़ज़ल का शेर याद आता है , जो उनकी मौत के चालीस साल बाद भी उपयुक्त लगता है :::::::
                                  "  यहां दरख्तों के साये में धूप लगती है ,
                                   चलो यहां से चलें और उम्र भर के लिये। "
        जो विभाग जो संस्थायें न्याय देने को बनाई गई थी जब वही अन्यायकारी हो जायें तो कोई क्या करे , शायर ने तो कह दिया चलो यहां से चलें , मगर जायें कहां। अभी तक कहने को बहुत कुछ कह दिया मगर फिर भी आपको लगता होगा क्या कहना चाहता हूं , किसलिये परेशान हूं , किसकी बात है ये , वास्तविकता है अथवा कहानी है। या ये प्रार्थना पत्र है या शिकायती खत है , क्या है।  नहीं पता मुझे क्या है मगर इतना कसम खाकर कहता हूं आपके देश के समाज का सच है शत प्रतिशत सत्य। " सत्यमेव जयते " आदर्श वाक्य है। फिर भी सच हर कदम हारता हुआ दिखाई देता है।  संक्षेप में विवरण बताता हूं , ज़रा गौर से पढ़ना , यही आपकी तस्वीर है देश की दशा की जो सरकारी कागजों में कहीं नहीं लिखी हुई।
                                  मैं आपकी बेटी हूं ( कहानी )
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    अठारह बरस की होने से पहले पिता ने विवाह कर दिया था , पति दस प्लस दो तक शिक्षित , रिश्ता हमारे समाज में ज़मीन देख कर किया जाता है। मगर वो ज़मीन कभी न बेटी की होती है न ही बहु की। पिता की पति की भाई की अथवा बेटे की हो सकती है। बड़ी बड़ी बातें करने वाले कभी बेटी को जायदाद में बराबरी का अधिकार नहीं देते। ये बताना ज़रूरी है इसलिये नहीं कि मुझे पिता की या पति की जायदाद चाहिये , इसलिये बता रही हूं कि महिलाओं की समस्या की जड़ यहां है। खैर शादी हुई इक बेटा दिया भगवान ने मगर फिर पति एक कत्ल के केस में जेल भेज दिया गया लंबी अवधि की सज़ा में। पिता को लगा ऐसे में बेटी को सहारे की ज़रूरत है , पढ़ाया लिखाया ताकि अपने पांव पर खड़ी हो सकूं। और मैं स्वालंबी बन गई , खुद नौकरी करती हूं और बेटे का लालन पालन कर रही हूं। मां और पिता दोनों की मौत हो गई और मैं मायके के घर में रह रही हूं , काफी बड़ा घर है तीन सौ गज़ का करीब होगा , उसमें साथ रह सकते हैं सभी। मगर भाइयों को लगता है घर के एक कमरे में आश्रय पाती बहन किसी दिन जायदाद में बराबरी का हिस्सा नहीं मांग ले। बस इसी लिये मुझे रोज़ परेशान किया जाता है मारपीट की जाती है ताकि मैं अपने पिता के घर को छोड़ कहीं और चली जाऊं। मैंने समझाया भी है मुझे जायदाद का मोह नहीं है सुरक्षित रहना चाहती हूं पिता के घर में जब तक खुद कमा कर अपना छोटा सा घर नहीं बना लेती और बेटा जो अभी नौवीं क्लास में है उसको किसी काबिल नहीं बना लेती। क्या हमारा समाज अपनी बहन को इतना भी अधिकार नहीं देना चाहता , बेटियां आपसे कानूनी हक नहीं मांगती , भले मांग सकती हैं और उनको मिलना भी चाहिये , वो चाहती हैं कि उनको इक भरोसा हो कि कोई उनका अपना है।  उधर पति जेल से बाहर निकल आया है और वो भी पुरुषवादी सोच के कारण या हीन भावना के कारण चाहता है कि मैं इक उच्च शिक्षा प्राप्त महिला अपनी नौकरी छोड़ उसके साथ गांव में जाकर रहूं और किसी जानवर की तरह उसके खूंटे से बंधी रहूं चुप चाप अपमान अन्याय शोषण को सहती। अभी तीस बरस की हूं मैं और मेरी कहानी अभी शायद और बहुत लंबी उम्र तक चलेगी , कब तक नहीं जानती। मगर लगता है देश में समाज में शायद संविधान तक में मेरे लिये , या मुझ जैसी  लाखों अकेली महिलाओं के लिये कहीं कोई उजाले की किरण नहीं है।
                         मानवाधिकार महिला आयोग न्यायपालिका सरकार और समाजसेवी संस्थायें मुझे इतना भी भरोसा नहीं दिला  सकती कि तुम अकेली बेसहारा नहीं हो और इक आज़ाद देश में रहती नागरिक हो जिसको जीना का अधिकार हासिल है।

मुहाफिज़ गरीबों के ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

             देखो तुम नाराज़ मत हो , जो हम कर रहे उसका बुरा नहीं मानो , ऐसा करना ज़रूरी है। टीवी का एंकर उस गरीब महिला को बहला रहा है , जो आग बबूला हो गई थी जब कैमरा मैन ने उसकी कमीज़ को फाड़ दिया था। वो समझ रहा है , तुम्हारी भूख और गरीबी पूरी तरह दिखाई देगी तभी देखने वालों पर असर होगा। तुम्हारी कमीज़ को इसीलिये फाड़ा गया है ताकि दर्शकों की नज़रें तुम पर ठहरें , नंगा बदन देखने को , तुम्हारे लिये सहानुभूति पैदा करना ही हमारा मकसद है आज। तुम्हें नहीं मालूम हमारे कैमरे की नज़र पड़ते ही छोटी से छोटी चीज़ बड़ी लगने लगती है। लाखों लोग तरसते हैं कि कभी मीडिया उन पर मेहरबान हो और उनका चेहरा टीवी पर आये और वो आम से ख़ास होकर फोकस में आयें ताकि सेलिब्रिटी बन सकें। तुम्हें मुफ्त में ये अवसर मिल रहा है , बस्ती की सीधी साधी भोली औरत को एंकर चुप करवा रहे हैं , सामने देखो सभी को तुम्हारी छिपी सुंदरता भा रही है। बेचारी महिला अपमानित महसूस करती करती मान गई है कि उसकी और बाकी गरीबों की भलाई हो रही है टीवी शो से , शायद यहां से निकलते ही उनको सब कुछ मिलेगा जो अभी तक सिर्फ सरकारी वादों घोषणाओं में ही था। एंकर खुद एक कठपुतली है उस के हाथों की जिसका टीवी चैनेल से अनुबंध है हर रविवार कोई चर्चा शो आयोजित करने का। सप्ताह भर उसको चिंता रहती है नया विषय तलाश करने की। काफी दिन से अख़बार और समाचार चैनेल वाले इस सदाबहार विषय को भुला बैठे हैं और फालतू की बहस में पूरा दिन उलझे रहते हैं , जैसे देश में भूख - गरीबी जैसी कोई समस्या बाकी ही नहीं रही , और सरकारी आंकड़े सच हैं। कुछ नया और दूसरों से अलग और सब से पहले की चाह में ये विषय आज की बहस का चुना है। प्रभावशाली बनाने को कुछ गरीब लोग बस्ती से पकड़ लाये हैं खुशहाली का सपना दिखला कर और शो के बाद भरपेट खाना खिलाने का वादा करके। कार्यक्रम शुरू होने से दो घंटे पहले उनको लाकर फोटोजनक रूप दिया गया है , कुर्ता पायजामा उतार धोती बनियान पहनाई गई है , किसी की सलवार कमीज़ बदल घाघरा चोली पहनने को कहा गया है। भूख से मुरझाये चेहरों को मेकअप से चमकाया गया है कैमरे की खातिर , इस पर इतना पैसा खर्च किया गया है जितने से वो सप्ताह भर भोजन कर सकते थे। मगर करें क्या मीडिया का कैमरा खाली पेट को नहीं देख सकता , मनहूस मुरझाया चेहरा उसको अच्छा नहीं लगता। बताया गया है यहां सब वास्तविक है , कुछ भी नकली नहीं है।
                  टीवी चैनेल के पास कुछ खास गिने चुने लोग हैं जो बुद्धिजीवी कहलाते हैं और हर विषय पर बहस कर सकते हैं। ज़रूरत हो तो एंकर ही तय करता है किस को किस पक्ष की बात कहनी है , और उनके विचार उसी पक्ष में बदल भी जाते हैं , मज़बूरी है उनकी दाल रोटी इसी तरह चलती है। उनका भी एक ग्रुप सा है , अपनी सुविधा से तय करते हैं आज किस को बुलाना है विषय का विशेषज्ञ समझ कर। जब टीवी पर उलझते हैं तब ऐसा प्रतीत होता है जैसे जन्म जन्म के विरोधी हैं , इक दूजे की जान के दुश्मन , लेकिन रिकार्डिंग खत्म होते ही  सभी गले मिल बधाई दे रहे होते हैं प्रभावशाली ढंग से बहस करने की। नतीजा तुरन्त उनको हज़ारों रूपये का चैक मिल जाता है टीवी चैनेल से , उनका वास्तविक सरोकार इसी से ही होता है। गरबों की चिंता , पर्यावरण की बातें , सांप्रदायिक सदभावना जैसी बातें सिर्फ मिलने वाली राशि की खातिर होती हैं।
                       सभी पैनिलिस्ट आ गये हैं , बहस शुरू हो रही है।आंकड़े बता कर सब को प्रभावित किया जा रहा है , कोई सेलफोन कार ऐ सी के आंकड़े लाया है तो दूसरे के पास भूख से मरने वालों की संख्या में साल दर साल बढ़ोतरी के आंकड़े भी हैं। कोई बता रहा गरीबी की रेखा से नीचे प्रतिशत लोग है तो कोई देश में बढ़ती करोड़पतियों की गिनती बता रहा है। लेकिन कैमरा बार बार वहीं जाकर रुक जाता है जहां उस महिला की कमीज़ को फाड़ दिया था ताकि उसकी गरीबी के साथ सुंदरता भी दर्शक देख सकें। इक पैनेलिस्ट भी ये देख खुद को रोक नहीं पाता और बात बात में इशारा भी करता है कि जिसके पास भगवान की दी ऐसी खूबसूरती हो उसको गरीब कहा ही नहीं जाना चाहिये। उसके पास तो खज़ाना है , सभी बेशर्मी से खिलखिला देते हैं। पूरी चर्चा में कहीं भी किसी के चेहरे पर गरीबी और गरीबों की दुर्दशा पर संवेदना का भाव भूले से भी आया नहीं। टीवी शो की शूटिंग पूरी होने के बाद सभी मेहमान साथ के हाल में डिनर का आंनद ले रहे हैं शाकाहारी मांसाहारी और शराब के जाम का भी लुत्फ़ उठाया जा रहा है। उन गरीबों को सभी भूल गये हैं जो कब से खाना मिलने की आस लगाये हुए थे। गरीबी घबरा गई है अमीरों को करीब देख कर , गरीब बाहर निकल आये हैं , एक भूख से बेताब ने साहस कर वहां खड़े किसी से पूछ ही लिया कि उनको खाने को कब मिलेगा कुछ। बताया गया है बड़े लोग खा रहे हैं , उनके खाने के बाद जो बचेगा तुमको बांट दिया जायेगा। शायद गरीबों के प्रति सहानुभूति बहस में ही खर्च हो गई थी , खाने के वक़्त दिलों में इंसानियत बाकी ही नहीं बची थी। सारे भूखे गरीब इक बैंच पर बैठ इंतज़ार कर रहे थे रोटी मिलने का। बहुत देर बाद एक पैनलिस्ट और एंकर झूमते हुए निकले थे , गरीब हाथ जोड़ खड़े हो गये थे। ये वही पैनलिस्ट थे जो सुंदरता को दौलत बता रहे थे , एंकर से कह रहे थे उसको मेरी कोठी पर आने को कह देना , मुझे उसकी गरीबी पर बहुत तरस आ रहा है। कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा। खास लोगों के जाने के बाद बचा हुआ कहना पैक कर गरीबों को दिया जा रहा है , घर जाकर खाने को। अब ऐसी साफ सुथरी जगह उनको खाने की अनुमति भला कैसी दी जा सकती है।  गरीब आज भी अमीरों की गरीबी दूर करने को काम आये हैं  , आखिर इन्हीं के नाम से कार्यक्रम सफल होगा और टीवी वालों को खूब मुनाफा भी होगा विज्ञापनों की आमदनी से।
                                   एंकर उस गरीब महिला से बात कर रहे हैं , उनका विज़िटिंग कार्ड देकर समझ रहे हैं , तुम उनको खुश करोगी तो गरीबी कभी तुम्हारे पास तक नहीं फटकेगी। पैसा घर नाम कार तक सब मिलेगा। अच्छा , गरीब महिला ने पूछा उनको खुश करने को क्या करना होगा मुझे , ये भी बता ही दो। बस उनकी रातें रंगीन करनी होगी , बेहद बेशर्मी से एंकर बताता है। गरीब महिला गुस्से से पूछती है , क्या तुम लोग इसी तरह अमीर बने हो , क्या क्या बेचा है , अपना ज़मीर भी। अपने पूरे कार्यक्रम में क्यों ये नहीं बताया कि तुम सभी की सोच कैसी गिरी हुई है , गरीबी मिटाने का यही उपाय समझ आता है तुमको। इक बात जान लो अगर ऐसे गरीबी मिटानी होती तो हम कब के गरीबी से छुटकारा पा लेते , मगर नहीं हमको तुम जैसे दोगले लोगों की दिखाई रह पर कभी नहीं चलना। आज तुम पर ऐतबार कर धोखे में आ गये थे पर अब देख लिया तुम लोगों का चेहरा उतरी हुई बकाब के बाद। सच तुम बेहद कुरूप हो , हमारी गरीबी कभी इतनी कुरूप नहीं हो सकती।
  ( अख़बार - पत्रिका वाले चाहें तो रचना प्रकाशित कर सकते , ब्लॉग से साभार लिख कर )

Tuesday, 4 October 2016

हम सभी देश भक्त हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

           देशभक्ति किसे कहते हैं शायद उसकी कोई परिभाषा कभी रही होगी , तब जब कुछ लोग देश को गुलामी से मुक्त करवाने की खातिर अपना तन मन धन सब कुछ देश की आज़ादी पर कुर्बान किया करते थे। जब देश आज़ाद हो गया तब भला उस पुरानी देशभक्ति की क्या ज़रूरत थी। बस देशभक्त कहलाने को नारे लगाना ही काफी था। फिर भी कुछ साल तक लोग थोड़ा तो लिहाज़ करते ही थे कि कुछ ऐसा नहीं करें जो लोग नफरत करने लगें कि देश के प्रति निष्ठा तक शक के घेरे में आ जाये। तब  तक नेता हों या प्रशासन के अधिकारी कुछ लाज रखते थे अपने पद की , इतने ऊंचे ओहदे पर बैठ इतना नीचे नहीं गिरना। आत्मसम्मान की कीमत धन दौलत से कहीं बड़ी समझी जाती थी। कहते हैं हम तरक्की कर आये हैं , कहीं से कहीं आ पहुचें हैं। आज देखते हैं कौन कौन क्या करता है और देशभक्त भी खुद को मानता है।
         बीस साल पहले मंत्री मुख्यमंत्री हो तो उसे भाई बंधु शहर में जहां कहीं भी किसी सरकारी विभाग की जगह या ज़मीन पड़ी हो या कोई पार्क अथवा मैदान हो उसको कब्ज़ाकर अपनी संपति घोषित कर लिया करते थे , और उसके बाद सत्ता का दुरूपयोग कर उसको अधिकृत भी करवा लिया करते थे। अधिकारी लोग भी हर काम के बदले घूस लेने लगे थे। आज़ादी का मतलब यही सभी को समझ आया था कि आपका देश है और जितना अंग्रेज़ नहीं लूट सके उतना खुद ही लूटना है। बस राजनीति और अफसरशाही में इक सहमति बन गई थी चोर चोर मौसेरे भाई वाली , मगर तब भी अपने अपकर्मों पर शर्म कभी  कभी आती अवश्य थी। उसके बाद जैसे जैसे परिवारवाद और जातिवाद राजनीति का आधार बना तो भ्र्ष्टाचार ही सत्ता की नींव बन गया।  सारा खेल ही पैसे की राजनीति का बन गया। चुनाव धन बल और बाहुबल से लड़ा और जीता जाने लगा। नैतिकता  को सब दलों ने ताक पर रख दिया और सत्ता की खातिर उन से हाथ मिला लिया जिन के विरुद्ध जनता के पास गये थे। जनता को ठगना राजनीति का अनिवार्य पाठ हो गया।
                  अब आज की बात , नेता ही नहीं प्रशासन के अधिकारी भी खुद अपराध कराते हैं , विभाग की भूमि या प्लॉट्स पर कब्ज़ा करवाना और बाद में कब्ज़ा करने वाले को मालिकाना हक देना उनका पसंद का काम बन गया है। बड़े अफ्सर क्या क्लर्क तक करोड़पति बन गये हैं। अवैध धंधे आजकल पुलिस की अनुमति या सहमति अथवा सहयोग से चलते हैं , किस की मज़ाल है उनको रोके। आप जाकर किसी सरकारी विभाग में देखो सब जनता को लूटने में लगे हुए मिलेंगे। मगर यही झंडा फहराते हैं और देश प्रेम पर भाषण भी देते हैं। जो खुले आम रिश्वत लेते रहे वही बाद में देश सेवा और ईमानदारी के लिये राष्ट्रपति जी से सम्मानित भी होते हैं। देशभक्ति का प्रमाणपत्र और तमगे इन सभी के पास रखे हुए हैं , इनके घर में ड्राइंगरूम की दीवार पर सजी हुई है देशभक्ति।

Monday, 3 October 2016

उनका साहित्य , मेरी बातें ( सवाल कठिन है ) डॉ लोक सेतिया

       कोई ऐसी बात तो नहीं की जो अनुचित कही जा सके , फिर भी मुझे अच्छी नहीं लगी उनकी बात , शायद मुझे उनसे आपेक्षा नहीं थी कि वो भी उसी तरह की ही बात करेंगे जैसी सभी दुनिया वाले करते हैं। बहुत नाम सुनता रहा हूं उनका , बहुत बड़े साहित्यकार हैं। मैंने उनसे साहित्य पर ही बात करने को संपर्क किया था , ये उनको भी मालूम भी था , फिर भी किसलिये वो साहित्य की बातों से इत्तर और ही बातें करना चाहते थे। मैं कहता रहा उनकी रचनाओं की बात और वो अनसुना करते रहे मेरे हर सवाल को , और मुझे से पूछते रहे मेरी ज़मीन जायदाद और आमदनी की बात। मेरे लिये जिन बातों का कोई महत्व नहीं था , उनको वही ज़रूरी लगती थीं। सच मैं नहीं समझ पाया उनकी बातों का मतलब। उम्र भर मिलता रहा हूं ऐसे लोगों से जो मुझे छोटा साबित करने को बिना पूछे मुझे बताया करते थे कि उनकी आमदनी कितनी अधिक है , क्या क्या बना लिया उन्होंने पैसा कमा कमा कर। फिर कहते आप खूब हैं जो कितनी कम आय में गुज़र बसर कर के भी खुश रहते हैं। उनको मेरी थोड़ी आमदनी से मतलब नहीं था , उस के बावजूद खुश रहने से परेशानी थी। मुझे पता है अधिकतर लोग एक ख़ुशी हासिल करते हैं ऐसी बातें कर के। शायद कहीं न कहीं वो हीन भावना के शिकार होते हैं और जिनको समझते हैं हमसे छोटे हैं उनसे ये बातें करते हैं अपनी हीन भावना को दूर करने को। लेकिन आज तक न वो अपनी हीन भावना मिटा पाये न ही मुझे हीन भावना का शिकार ही कर पाये हैं। उल्टा मुझे यही लगता है कि ये सब धन दौलत पाकर भी उनको वो ख़ुशी नहीं मिली है जो मेरे पास है बिना धन दौलत के। तभी मैं कभी दुनिया वालों से कोई मुकाबला करना चाहता ही नहीं। मुझे उनके मापदंड समझ ही नहीं आये  , खुद अपने बनाये मापदंडों से अपने को बड़ा साबित करने की कोशिश ही करते रहते हैं। मैं जो हूं जैसा हूं उसी को स्वीकार कर चैन से रहता हूं , आदमी को कितनी ज़मीन चाहिये , दो गज़ , उस कहानी को कभी भूला नहीं। कोई कह सकता है मैं तरक्की करना ही नहीं चाहता , मुझे परवाह नहीं उनकी बातों की , किसी की बातों से मैं जो नहीं करना है वो नहीं कर सकता दुनिया की दौड़ में तरक्की हासिल करने को।
                 आज मुझे इक लेखक एक साहित्यकार से वही बातें सुन समझ नहीं आया क्या चाहते हैं वो। क्या उनको मुझ से साहित्य की बात करना इसलिये पसंद नहीं था क्योंकि मुझे वो छोटा समझते हैं लेखन में। बेशक मैंने आज तक इक पुस्तक भी नहीं छपवाई है तो क्या इसी से मेरा आंकलन करते हैं। मुझे न लेखक कहलाना है न साहित्यकार कहलाने को लिखता हूं , मगर फिर भी नियमित लिखता रहता हूं अपने देश समाज की वास्तविकता को। क्या ये महत्वपूर्ण नहीं हो सकता। अब केवल उनकी और मेरी बात को छोड़ सभी की बात करते हैं। लेखक हैं लिखते हैं , कविता कहानी , लगता है सभी के दुःख-दर्द को महसूस करते हैं , सारे जहां का दर्द हमारे जिगर में है। मगर जब अपने आस पास लोगों को परेशान देखते हैं तब हमारे अंदर का दर्द कहां छुप जाता है , तब औरों की परेशानी या दुःख क्यों हमें परेशान नहीं करती और हम संवेदना रहित और पाषाण हृदय बन जाते हैं। ये देख कर मैं सोचता हूं जो कविता जो कहानी हमने लिखी , अगर वो खुद हम में संवेदना मानवीय दुःख दर्द के प्रति नहीं जागृत कर पाई तो क्या उसको सफल मान सकते हैं। सैकड़ों किताबें लिख कर भी क्या होगा , कोई क्या सोचता है कभी। साहित्य का ध्येय क्या है।

Sunday, 2 October 2016

हे राम ( महात्मा गांधी से धर्म तक ) इक पक्ष ये भी - डॉ लोक सेतिया

        2 अक्टूबर को गांधी जी को याद किया गया , मगर किस को , हाड़ मांस के इंसान को। उस को नहीं जो इक विचार है सोच है , उसको भुला दिया गया कभी का। हमने इक रिवायत सी बना ली है हर दिन को किसी तरह मनाने की , बिना मकसद ही। शायद भटक गये हैं , समझ नहीं पा रहे किधर जाना था , किधर आ गये हैं , और आगे किस तरफ जाना है। धर्म राजनीति समाज सभी जगह बस औपचारिकता निभा रहे हैं लोग।
          बार बार होता है यही , कुछ ख़ास दिन किसी देवी देवता की उपासना की धूम मची रहती है। तब जिधर भी देखते हैं वही दोहराया जाता दिखाई देता है , जैसे आजकल नवरात्रे हैं तो जय माता दी की आवाज़ गूंजती रहती सुबह शाम हर शहर हर गांव हर गली। जगराता होता है रात रात भर माता के भजन उसकी आरती सुनाई देती रहती है। ऐसे साल भर में भगवान और देवी देवताओं की भक्ति उनकी पूजा अर्चना पर करोड़ों रूपये खर्च किये जाते हैं। जब से मैंने होश संभाला है ऐसी बातें जिनको धर्म बताया जाता है बढ़ती ही गई हैं , लेकिन जो मुझे समझ आया है , अधर्म और पाप कम नहीं हुआ अपितु और भी अधिक होता जा रहा है। इक डॉक्टर होने के नाते मैं सोचता हूं अगर मेरी लिखी दवा से सुधार होने की जगह रोगी का रोग और बढ़ता जा रहा है तो ऐसी दवा को बंद करना ही उचित होगा। क्यों धर्म के पैरोकार बने लोग ऐसा धर्म को लेकर नहीं सोचते , क्या उनका मकसद वास्तव में धर्म को स्थपित करना बढ़ावा देना है , या उनको मात्र धर्म नाम से अपना कारोबार ही चलाना है। सोचना उन्हीं को है। मुझे तो इतना ही लगता है कि जितना धन लोग धार्मिक आयोजनों पर खर्च करते हैं उतना अगर धर्म कर्म पर खर्च करते तो मुमकिन है अधिक अच्छा होता। एक बात शायद हमें याद ही नहीं है कि दान धर्म पूजा आदि बताया गया है सभी ग्रंथों में कि हक हलाल की मेहनत की नेक कमाई से किया जाना चाहिये। किसी से लूट कर छीन कर या एकत्र कर के कदापि नहीं।
             नरेंद्र मोदी जी जब प्रधानमंत्री बने तभी इक मंदिर में विदेश में गये थे पूजा अर्चना करने को। तब वे एक करोड़ मूल्य की 2 5 0 0 किलो चंदन की लकड़ी दान में दे आये थे , क्या ये धर्म था। यकीनन ये पैसा देश की तिजोरी से खर्च किया गया था , जनता की बुनियादी ज़रूरतों की खातिर बजट नहीं होता है , नेताओं की इच्छाओं की खातिर सब हाज़िर है। ये लोकतंत्र का राजधर्म नहीं है। कैसी विडंबना है कि इस मुल्क में गरीब जनता किसी लावारिस लाश की तरह है जिसको जलाने को बजट में प्रावधान नहीं है , मगर नेताओं की चिता जलाने  को चंदन की चिता सजाई जाती है। ये कैसा जनतन्त्र है जिस में नेताओं की समाधियों के लिये कई कई एकड़ भूमि है मगर जनता की छत के लिये नहीं। इक राष्ट्रपति के आवास के रखरखाव पर ही करोड़ों रूपये हर महीने खर्च होते हैं , जितने पैसे से रोज़ हज़ारों लोग रोटी खा सकते हैं। कल महात्मा गांधी का जन्म दिन सरकार ने जाने कितना धन खर्च कर मनाया , क्या ये गांधी जी की विचारधारा से मेल खाता है। जो आदमी लोगों को नंगे बदन देख तय करता है कि उसने उम्र भर एक वस्त्र धोती ही डालनी है , उसकी विचारधारा का ये उपहास सरकार नेता और लोग कब तक करते रहेंगे।
                     सरकार का अर्थ ही जनता की सेवा के नाम पर धन की खुली लूट है बर्बादी है। अगर सरकारें फज़ूल खर्च नहीं करती तो देश में आज भूख और गरीबी नहीं होती। गांधी की समाधि पर फूल चढ़ाने से आप गांधीवादी नहीं हो जाते , आपको सोचना होगा गांधी जी क्या चाहते थे। उन्हीं का कहना था कि इस भारत देश में इतना कुछ तो है जो सभी की ज़रूरतों को पूरा कर सके मगर इतना नहीं है जो किसी की भी धन सत्ता की हवस को भूख को पूरा कर पाये। आज वास्तव में गांधी जी को हर दिन कत्ल किया जाता है , उनके नाम पर आडंबर के के , और उनकी सोच को दरकिनार कर के।

किस दिशा में जा रहा है समाज ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

कहां से शुरू करूं आप ही बताओ , अपने से , आप से , उन से जिनको सभी समझते हैं कि वो राह दिखाते हैं औरों को , या जिनकी हर बात का अनुसरण करते लोग , अथवा जो इन सभी से अधिक जानकार खुद को मानते हैं। सवाल बहुत सीधा है जीवन क्या है और किसको जीना कहते हैं। अख़बार पत्रिका टीवी चैनेल भी सभी को ध्यान से देखने पर लगता है जैसे बस दो ही उद्देश्य हैं इंसानों की खातिर। पैसा और मनोरंजन। आप अगर सोशल मीडिया पर हैं तब भी आपको सिर्फ समय बिताना है मौज मस्ती की बातों से। अगर कोई समझता है कि वहां लोग संजीदा बातों को पढ़ते हैं और संवेदनशील बनते है तो आपको वास्तविकता और बनावट में अंतर करना नहीं आता है। समझ नहीं आता करोड़ों लोग क्या हासिल करते हैं पूरा दिन फेसबुक या व्हाट्सऐप पर रह कर। टीवी अख़बार कभी लोगों को जानकारी देने और जागरुक करने का ध्येय लेकर चलते थे , आज विज्ञापनों की आय के मोह में ऐसे अंधे हुए हैं कि उचित और अनुचित की परिभाषा तक बदल ली है उन्होंने। क्या हंसना ही ज़िंदगी का मकसद होना चाहिए , टीवी शो सिनेमा से पत्रकारिता तक उलझे हैं बेहूदा बातों पर हंसने को सही बताते हुए जबकि ऐसी बातों पर कभी सोचा जाये तो रोना आना चाहिए। खेद है कि हर जगह इक बीमार मानसिकता हावी नज़र आती है जिस में औरत और मर्द में एक ही रिश्ता दिखाई देता है , वासना का। लोग बेशर्मी से इज़हार करते हैं टीवी पर अपनी गंदी सोच की कुत्सिक भावनाओं का। कॉमेडी शो से समाचार के चैनल तक सभी अपनी गरिमा को भुला चुके हैं। कभी कभी किसी कार्यक्रम में भावुकता भी दिखाई देती है और आंसू भी पल भर को , मगर तभी मंच संचालन करने वाला प्रयास करता है उसको भुला फिर से हा - हा का शोर शुरू करने का। क्या भावुकता और किसी के दुःख दर्द को समझ संवेदनशील होना ऐसी बात है जो नहीं हो तो बेहतर है। सोचा जाये तो पता चलता है यही आज अधिक ज़रूरी है , ऐसा इंसान बनना जो केवल अपने लिये मौज मस्ती और हंसी ही नहीं चाहे बल्कि समाज और बाकी लोगों की भी चिंता करे।
             टीवी पर धर्म के बारे बताते हैं वो लोग जिनको खुद अपना धर्म तक याद नहीं , पत्रकारिता क्या है , खबर किसको कहते हैं , और इक शब्द होता है पीत पत्रकारिता जिसको आज कोई बोलना तक नहीं चाहता क्योंकि पत्रकारिता इस कदर पीलियाग्रस्त हो चुकी है कि उसका ईलाज तक असंभव हो गया है। अंधविश्वास को बढ़ावा देना अपने आर्थिक फायदे की खातिर क्या यही पत्रकारिता का ध्येय है। लोगों को क्या ज्ञान देना चाहते हैं , उनकी समस्या किसी तालाब पर स्नान करने से , कोई जादू टोना , तथाकथित ज्योतिषीय उपाय से हल होगी अथवा खुद अपने प्रयास से। भाग्यवादी बना कर आप किसी का भला नहीं कर सकते हैं।  विडंबना की बात है आज विज्ञान के युग में और जब हमारे पास साधन हैं लोगों तक सभी तरह की जानकारी पहुंचाने को तब हम उनका सदुपयोग नहीं कर उल्टा दुरूपयोग करते हैं। आधुनिक सुविधाओं का सही उपयोग कम अनुचित उपयोग अधिक होने लगा है। निजि स्वतंत्रता के नाम पर क्या समाज को गलत मार्ग पर जाते देखना सही होगा।
                      अपराध हैं कि बढ़ रहे हैं , खासकर महिलाओं से अनाचार की घटनाओं में जैसे कोई रोक लगती दिखाई ही नहीं देती। संगीत का नाम पर , टीवी सीरियल या सिनेमा के मनोरंजन की आड़ में समाज को विशेषकर युवा वर्ग को भ्रमित किया जा रहा है और उनकी समझ को प्रदूषित। सब से खेदजनक बात ये है कि सरकार , धर्म की बातें करने वाले भी फ़िल्मी और टीवी मनोरंजन वालों की तरह देश की सत्तर प्रतिशत जनता को भूल गये हैं जिनको चमक दमक और आडंबर नहीं वास्तविक बातों से मतलब है। शिक्षा रोज़गार गरीबी छत और रोटी पानी ईलाज की समस्या। इन सभी के पास देश की बहुमत आबादी के वास्ते खोखली बातों के सिवा कुछ भी नहीं। ऐसे में साहित्य रचने वालों को तो सोचना होगा , किन की बात कहनी है लेखन में , या उनको भी अपने खुद के नाम शोहरत और ईनाम पुरुस्कार की दौड़ में ही समय बिताना है ताकि आखिर में समझ आये कि रौशनी की बातें करते करते भी अंधकार को ही बढ़ावा देते रहे हैं तमाम उम्र।
        विषय गंभीर है और इस पर चरचा भी कभी खत्म नहीं हो सकती , मगर आज यहीं विराम देते हैं।

Saturday, 1 October 2016

श्री रूप देवगुण जी ( प्रिय मित्र लेखक ) की रचनाएं और परिचय मेरी नज़र से

           मेरा वो पहला शहर से बाहर कहीं जाकर कविता पाठ करने का अवसर था , यूं निमंत्रण तो पहले भी मिलते रहे थे मगर जाना संभव नहीं हो सका था , डॉक्टर होने और निजि प्रैक्टिस में होने से सदा मन मार कर इनकार कर दिया करता था। शायद तब भी वही होता अगर आयोजक मित्र ने खुद आकर मिलकर मुझे विवश नहीं किया होता ये कहकर कि अगर नहीं गया तो वो मुझ से नाराज़ हो जायेंगे। मित्र को नाराज़ करना मेरे लिये जुर्म की तरह था और आज भी है। उस दिन रतिया नगर में हमारी पहली मुलाकात हुई थी जो फिर हमेशा की मित्रता के मधुर संबंध में बदल गई। तब से हम हमेशा सम्पर्क में रहे और जब भी जैसे भी संभव हुआ मिलते भी रहे , धीरे धीरे मुझे सिरसा शहर अपना लगने लगा तो रूप देवगुण जी के कारण। क्या ख़ास बात है जो मुझे उनके इतना निकट ले आई है। बहुत मधुर स्वभाव , निश्छल मन , सभी को अपना समझने और बनाने की कला , और किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं रखने की आदत , शायद अच्छे इंसान में यही गुण ही होते हैं। और मुझे कब से ऐसे अच्छे इंसान की तलाश थी , जो मिलना आसान नहीं था , मुझे रतिया नगर का आभार प्रकट करना चाहिये रूप देवगुण जी जैसे सच्चे इंसान से मिलवाने के लिये। ऐसे व्यक्ति से परिचय होना भी खुशनसीबी की बात है और  मित्रता होना तो इक बेशकीमती दौलत का अधिकारी होना है। बहुत किताबें लिखी है सभी विधा की आपने , मगर पहचान अधिक लघुकथा लिखने को लेकर है। कविता में कुदरत से , समंदर से पहाड़ से प्रकृति के रंगों से जैसा संबंध कायम करना उनको आता है वो अनुपम है। सब से अच्छी बात मुझे उनकी आशावादिता लगती है , जीवन में भी और लेखन में भी। उनके व्यक्तत्व पर ही किताब लिखी हुई है तो मैं प्रयास कर के भी कितना बता सकता हूं , फिर भी मेरी नज़र में यही हैं मेरे प्रिय मित्र रूप देवगुण जी।  उनकी कुछ रचनाएं जो मुझे बेहद पसंद हैं , आज लिखता हूं इक पोस्ट पर।
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                           ग़ज़ल
चमकती हैं बिजलियां
डर रही हैं बस्तियां।
हो गई कैसी नदी
मर गई सब मछलियां।
जब नहीं पानी रहा
क्या लगायें डुबकियां।
बाढ़ में देखो कहां
चल रही है कश्तियां।
खोजने मोती गये
ढूंढ लाये सीपियां।
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                   ग़ज़ल
क्यों उठी उंगलियां
हैं कहीं खामियां।
कब मिटेगा धुंआ
पूछती झुग्गियां।
फूल खिलने लगे
आ गई तितलियां।
आ रही रौशनी
खोल दो खिड़कियां।
प्यार के खेल में
किसलिए झिड़कियां।
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                दूसरा सच ( लघुकथा )
     घर के सदस्य गप्प शप्प मार रहे थे , अचानक पड़ोस के नवयुवक सुजीत का प्रसंग छिड़ गया।
पिता ने कहा , कितना भला है सुजीत , हमारे घर के सभी काम सहर्ष कर देता है।
   मां बोली थी , बहुत ही अच्छा है सुजीत , अपनी जेब से पैसे खर्च देता है और बहुत कहने पर भी वापस नहीं लेता है।
   छोटा भाई बोला था , सचमुच बहुत ही प्यारा है , मुझे अक्सर खिलोने भी दिला देता है।
    मगर बड़ी बेटी जो ये सब सुन रही थी , उठ कर बाहर चली गई थी। वह जानती थी कि इन सब कामों के बदले में सुजीत उस से बहुत कुछ प्राप्त करने की कोशिश करता रहता है।
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                  चुप सा रोना  ( कविता )
एक पक्षी ,
रह गया है ,
अकेला ,
चांदनी रत में ,
वह भटक रहा है ,
इधर उधर ,
बोलता जा रहा लगातार ,
बिछुड़ गया है वह अपनों से।
उसका दर्द ,
उमड़ आया है ,
मेरे मन में क्योंकि ,
इक दिन ,
मुझ से कहा था ,
मेरी अर्धांगिनी ने ,
जब मैं नहीं रहूंगी , 
तब क्या हाल होगा तुम्हारा ,
उस समय मैं भी बन गया था ,
अपने साथी से बिछुड़ा पक्षी ,
चिल्लाया नहीं ,
पर रोया था भीतर भीतर।
लोग जब हो जाते हैं अकेले ,
दिखाई देते हैं ,
भले चंगे सबको ,
पर ठीक होते नहीं हैं वो ,
रहते हैं बाहर से खामोश ,
मगर ,
रोते हैं भीतर भीतर ,
यह चुप सा रोना ,
व्यथा है दुनिया भर की ,
यह कही जाती नहीं ,
अकथ है ,
यही कथा है।
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                 पूछा मैंने किसी पक्षी से ( कविता )
सर्दी है  ,
धुंआ उठ रहा है ,
हर तरफ ,
पक्षियों को देखता हूं ,
बेखौफ , बेपरवाह , बेधड़क ,
उड़े जा रहे हैं।
किधर ,
क्या है मृत्यु ,
शायद नहीं उनको खबर ,
बैठे हुए हैं ,
वृक्ष की सबसे ऊंची टहनी पर ,
और हम हैं ,
पनाह लिये दुबके हुए ,
सर्दी से घबरा कर ,
बिस्तर में रज़ाई में।
कैसी होती है ,
सर्दी  , गर्मी , तपती लू , बरसात ,
बादलों की धुंध ,
यह प्रश्न पूछा उस पक्षी से ,
और दिया उस ने उत्तर मुझे ऐसे ,
उड़ गया खुले गगन में ,
दूर बहुत ऊंचा ,
हो गया मेरी आंखों से ओझल।
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               मेरी लघुकथा ( कविता )
उसके पास ,
गया तो था ,
मैं अपने दुःख-दर्द ,
सुनाने को ,
मगर वो मुझे ,
सुनाती रही थी ,
अपनी ही दर्द भरी ,
दास्तां ,
समझा तब मैं ,
उसकी कहानी है ,
इक उपन्यास और ,
मेरी मात्र इक ,
लघुकथा।
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             घर आई बिटिया रानी ( कविता )
शीतल पवन आती है ,
मदमाती हुई इठलाती सी ,
उपवन में ,
झूम उठती हैं ,
लताएं ,
लहलहा उठते हैं पौधे ,
खिल उठते हैं फूल ,
जैसे करते हों अभिनंदन ,
उसी तरह जैसे ,
आज खुश हैं सभी ,
घर के सदस्य जब ,
बहुत दिन के बाद ,
अपने मायके आई है ,
हमारी बिटिया रानी।
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              सलीका जीने का ( कविता )
सारी ज़िंदगी ,
रहा हूं भटकता ,
फिर भी ,
नहीं सीख पाया ,
दुनिया में जीने का ,
सलीका।
सीख जाता ,
अगर मैं तो ,
शायद नहीं लिखता ,
कविता कहानी।
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