Sunday, 16 February 2014

खबर खबर वालों की ( मीडिया की बात ) डा लोक सेतिया

वो सच की बात कहने का दावा करते हैं। मगर सच क्या है ये वो भी जानते हैं। हर सच पूरा सच नहीं होता , उसके पीछे कोई और कहानी भी होती है जिसको सामने नहीं आने दिया जाता। कभी पत्रकारिता में बड़े ज़ोर शोर से चर्चा होती थी पीत पत्रकारिता की। अब ये विषय कभी सुनाई ही नहीं देता। देखा जाये तो आज की सारी की सारी पत्रकारिता ही पीलिया रोग से पीड़ित है। सावन के अंधों जैसे बन चुके हैं , सब ने किसी न किसी रंग का चश्मा लगाया हुआ है। इनकी वास्विकता को उजागर करने से पहले ये जान लेना ज़रूरी है कि इनकी खुद की परिभाषा क्या है। आज इनको याद दिलाना ज़रूरी है कि पत्रकारिता का पहला सबक क्या कहता है। खबर किसको कहते हैं ? " खबर वो सूचना है जिसको कोई छिपाना चाहता है , लोगों तक पहुंचने ही नहीं देना चाहता , पत्रकार का काम है उसको खोजना उसको तलाश करना उसको ढूंढना और पता लगा कर लोगों तक पहुंचाना "। मगर आज के अखबार वाले और समाचार टीवी चैनल वाले तो वही बता रहे जिसको कोई खुद बताना चाहता है। कोई प्रैस नोट भेजता है कोई पत्रकार वार्ता करता है। बात ये भी नहीं कि इनको धृतराष्ट्र की तरह कुछ दिखाई नहीं देता हो , अफसोस तो इस बात का है कि इन्होंने खुद गंधारी की तरह अपनी आंखों पर पट्टी बांध रखी है। इनको अपना स्वार्थ ही नज़र आता है , कर्त्तव्य नहीं। टी आर पी , प्रसार संख्या और विज्ञापनों का मोह , ये सब के सब फंस चुके हैं इसी जाल में। सिनेमा वालों ने जिस तरह खलनायक को नायक बना प्रस्तुत किया और ऐसा संदेश समाज को देने लगे कि ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिये और बुराई का अंत करना है तो खुद भी बुरे बन जाने में कोई हर्ज़ नहीं। कोई आपके प्रेम को स्वीकार नहीं करे तो उसको डराना , भयभीत करना प्यार है। आज जिनको आप नायक महानायक बता रहे हैं उन्होंने अपनी फिल्मों में यही उल्टी परिभाषा गड़ी है। क्या ये यही बताना चाहते हैं कि जो सच की राह पर चलते रहे तमाम मुश्किलों के बावजूद वो नासमझ थे। जो प्यार में त्याग किया करते थे वो मूर्ख थे। सच कहा जाये तो सिनेमा भी कब का सही मार्ग से भटक गया है। लेकिन हम बात पत्रकारिता की कर रहे थे , ये तो बीच में मिसाल याद आ गई।
                           अब देखा जाये पत्रकारिता का दावा करने वालों का असली चेहरा। चलो सब से पहले उस बात का ज़िक्र करते हैं जिसका शोर आये दिन किया करते है ये सभी। घोटालों की बात। आपको मालूम है कि आज तक का सब से बड़ा घोटाला क्या है।  ज़रा सोचो क्या हो सकता है। ख़ास बात ये कि वो हमेशा से हो रहा है , हर दिन होता है , हमारे सामने होता है और शायद सदा होता ही रहेगा। क्योंकि उसकी बात कोई नहीं करता , करेगा भी नहीं। भला जिस के दम पर आपका वजूद टिका हो आप उसको समाप्त होने दोगे। ये सब दावा करते हैं सब से तेज़ दौड़ने का लेकिन इन सब को ज़रूरत है उन सरकारी विज्ञापनों की बैसाखियों की। यही है देश का आज तक का सब से बड़ा घोटाला। सरकार का धन किसी ऐसे कार्य पर खर्च करना जिस से जनता का कोई भला न हो केवल कुछ लोगों को फायदा पहुंचाया जा सके , उसको भ्रष्टाचार ही कहते हैं।अभी एक नया विज्ञापन दिखाया जा रहा है बेघर लोगों को घर देने का , जिसमें विज्ञापन देख कर ही बस्ती में रहने वाले खुश को निकल पड़ते हैं झूमते गाते। गरीबी हटाओ खाने को अधिकार शिक्षा का अधिकार ईलाज का अधिकार सभी कुछ है सरकार के विज्ञापनों में। क्या ये सच है , पैसे लेकर हर झूठ का प्रचार करवा लो इन सच के झंडाबरदारों से। ये प्रयोजित कार्यकर्म दिखाते हैं अमीर बनने के यंत्र वाले , लोगों को अंधविश्वास के जाल में फसाते हैं चंद पैसों की खातिर। भूत प्रेत की डरावनी कहानियां , सनसनी फैलाने वाले किस्से , क्या बीमार मानसिकता को बढ़ावा नहीं दे रहे। अब तो इनका काम समाचार देना नहीं रह गया , ये खबर बनाने लगे हैं। बिना मतलब की चर्चा होती है पूरा दिन भर किसी भी विषय पर। नतीजा कुछ नहीं , पानी में मधानी मारना कहा जाता है इसे। कभी माखन नहीं निकलता इस काम से , मगर ये मलाई खा रहे इसी दम पर , दस मिंट की चर्चा में बीस मिंट का ब्रेक विज्ञापनों का। कभी कोई जानता नहीं था जिस राखी सावंत को , इनकी कृपा से बिग बॉस में और भी चर्चित होकर वो शख्सियत बन जाती है।
                                   इनको यही चाहिये कि कुछ चटपटा मसाला मिलता रहे लोगों को बांधे रखने को। क्या यही मकसद होना चाहिये मीडिया का। मनोरंजन का साधन नहीं है पत्रकारिता। ये नहीं जानते कि इन्होंने अपने निजि स्वार्थ के लिये देश और समाज का कितना नुकसान किया है। जिस तरह पिछले कुछ दिनों में एक व्यक्ति टीवी अखबार और सोशल मीडिया का उपयोग करके मुख्यमंत्री के पद तक जा पहुंचा और खुद को हर कायदे कानून और संविधान से परे समझने लगा वो इनकी अपरिपक्वता की निशानी है। अगर आपका मकसद उचित है तो आपका रास्ता भी ईमानदारी का होना चाहिये। अन्यथा झूठे नारों से देश की जनता हमेशा ही छली जाती रही है। जो व्यक्ति सरकारी अधिकारी रहते राजनीतिक उदेश्यों के कार्य करता रहा , वेतन लेकर विदेश शिक्षा पाता रहा और वापस आने के बाद दो वर्ष नौकरी करना ज़रूरी है के नियम को ताक पर रख घर बैठा रहा छुट्टी लेकर , जो कर्ज़ लिया विभाग से उसको लौटने में आनाकानी करता रहा , हर बार कोई बात करने के बाद मुकरता रहा , सब के लिये सभ्यता को ताक पर रख अपशब्दों का प्रयोग करता रहा , अपने साथ वालों का गल्त आचरण देख कर भी चुप रहा और बाकी सब को ईमानदारी का पाठ पढ़ाता रहा , क्या वही है आपकी नज़र में नायक। लोकतंत्र में कोई तो मर्यादा हो जिसका पालन अपने विरोधी का विरोध करते भी किया जाना चाहिये। ये पहली बार देखा कोई शीशे के घर में रहने वाला भी पत्थर मारता हो दूसरों को। क्या ऐसा नहीं लगता कि जैसे अन्य दल वाले किसी मुद्दे को सत्ता पाने का बहाना बनाते रहे हैं , ये भी भ्रष्टाचार को अपनी नैया बना चुनाव की गंगा पार करना चाहते हैं। क्या मीडिया वालों को अभी तक इतनी सी बात नहीं समझ आई , क्या ये आम आदमी का नाम लेकर कुछ खास लोगों की महत्वांक्षा पूरी करने की बात नहीं। कितने ख़ास लोग इनके दल में शामिल हो रहे हैं आजकल , क्या ये सांसद और विधायक बनने की चाह में नहीं आये। क्या ये भी आम आदमी को पीछे नहीं छोड़ देंगे।
                              ये सब इसलिये बताना पड़ा है क्योंकि पहले भी पत्रकारिता को दुरूपयोग कर लोग सत्ता की गली में प्रवेश पाते रहे हैं।  आज कोई अखबार जब कई कई बार पूरे पन्ने पर इनका साक्षात्कार छापता है तो पूछना पड़ता है कि क्या ये खबरों का अकाल है या फिर आपकी सोच ठहर गई है। बहुत हैरानी की बात है , इन के पास एक सौ बीस करोड़ लोगों की खबर नहीं है कोई भी दिखाने को न ही छापने को। एक और बेहद ज़रूरी बात है इनकी , ये हर दिन दावे किया करते हैं लोगों की राय जानने के। कुछ सौ या कुछ हज़ार लोगों की राय भला पूरे देश का मानसिकता का पता दे सकती है। क्या ये जनता को गुमराह करने अथवा भ्रमित करने का काम नहीं है। मगर इनके लिये भी कोई सीमा निर्धारित नहीं उचित की अनुचित की। शायद यही चलन बन गया है आज का , सब दूसरों को आईना दिखाते हैं , खुद को कोई आईने में नहीं देखना चाहता। कभी अपने को आईने के सामने खड़े हो कर देखना चाहिये जो सब को सच का आईना दिखाने की बात करते हैं , जब कि वो आइनों का बाज़ार सजा उसका कारोबार करने लगे हैं। हां भाई भतीजावाद यहां भी छूटा नहीं है।  अपनों को रेवड़ियां बांटने का काम भी खूब होता है इनके घर में जिसको ये अपना विशेषाधिकार मानते हैं।