Sunday, 25 August 2013

परीक्षा प्रेम की ( कविता ) 1 0 0 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

उसने कहा है ,
मुझे लाना है ,
नदी के उस पार से ,
इक फूल उसकी पसंद का।
मगर नहीं पार करना ,
तेज़ धार वाली गहरी नदी को ,
उस पर बने हुए पुल से ,
न ही लेना है सहारा ,
कश्ती वाले का।
मालूम है उसे भी ,
नहीं आता है तैरना मुझको ,
अंजाम जानते हैं दोनों ,
डूबना ही है आखिर ,
डर नहीं इसका ,
कि नहीं बच सकूंगा मैं ,
दुःख तो इस बात का है ,
कि मर के भी मैं ,
पूरी नहीं कर सकूंगा ,
अपने प्यार की ,
छोटी सी अभिलाषा।
परीक्षा में प्यार की ,
उतीर्ण नहीं हो सकता ,
मगर दूंगा अवश्य ,
अपने प्यार की ,
परीक्षा मैं आज।

Friday, 23 August 2013

सबक ( कविता ) 9 9 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

जीवन का तुम्हारे ,
कुछ बुरा वक़्त हूं ,
आया हूं मगर ,
नहीं रहूंगा हमेशा ,
चला जाऊंगा मैं जब ,
लौट आयेगा अच्छा वक़्त !
मुझे देख कर तुम ,
घबराना मत कभी ,
सीखना सबक मुझसे ,
आ जायेगा तुमको ,
पहचानना अपने पराये को !
भूल मत जाना मुझे ,
मेरे जाने के बाद भी ,
याद रखना हमेशा ,
निभाया साथ किसने ,
छोड़ गया कौन इस हाल में  !
खोना मत कभी उनको ,
हैं जो आज तुम्हारे साथ ,
गये चले जो छोड़कर ,
मत करना उनका इंतज़ार ,
कभी आयें जो वापस ,
फिर नहीं करना ऐतबार !

Tuesday, 20 August 2013

ग़ज़ल 2 0 9 ( हक नहीं खैरात देने लगे )

हक़ नहीं खैरात देने लगे ,
इक नई सौगात देने लगे !
इश्क़ करना आपको आ गया ,
अब वही जज़्बात देने लगे !
रौशनी का नाम देकर हमें ,
फिर अंधेरी रात देने लगे !
और भी ज़ालिम यहां पर हुए ,
आप सबको मात देने लगे !
बादलों को तरसती रेत को ,
धूप की बरसात देने लगे !
तोड़कर कसमें सभी प्यार की ,
एक झूठी बात देने लगे !
जानते सब लोग "तनहा" यहां ,
किलिये ये दात देने लगे !

Monday, 12 August 2013

चाहत प्यार की ( कविता ) 9 8 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

दूर दूर तक फैली है ,
नफरत की रेत यहां  ,
सब भटक रहे हैं ,
इक जलते हुए रेगिस्तान में ,
प्यार के अमृत कलश की ,
है सभी को तलाश ! !
मिलती है हर किसी को ,
हर दिन हर पल नफरत ,
मिलता है इस जहां में ,
केवल तिरिस्कार ही तिरिस्कार ,
भाग जाना चाहता है हर कोई ,
इस दुनिया से किसी दूसरी दुनिया में ! !
मगर नहीं मालूम किसी को भी ,
ऐसे किसी जहान का पता ,
मिल जाये जहां पर सभी को ,
कोई एक तो अपना उसका ,
जिससे कर सके प्यार और स्नेह की ,
पल दो पल को ही सही , कुछ बातें ! !
भर चुका है सभी का मन ,
झूठे दिखावे की रिश्ते नातों की बातों से ,
जी रहे हैं घुट घुट कर लोग ,
अपनी अपनी इस पराई दुनिया में ,
बिना किसी का सच्चा प्यार पाये ! !
दम घुटता है ,
सांसें टूटती हैं ,
धुंधली नज़रों को नहीं आता ,
कुछ भी नज़र कहीं पर भी ,
यूं ही ढोये जा रहे हम सब ,
बोझ अपने अपने जीवन का ,
बस इक प्यार की चाहत में ,
तमाम उम्र ! !

Tuesday, 6 August 2013

ग़ज़ल 2 0 8 ( बोलने जब लगे पामाल लोग )

बोलने जब लगे पामाल लोग ,
कुछ नहीं कह सके वाचाल लोग !
हम भला किस तरह करते यकीन ,
खा रहे मुफ़्त रोटी दाल लोग !
खा रहे ठोकरें हम बार बार ,
खेलते आप सब फुटबाल लोग !
देख नेता हुए हैरान आज ,
क्यों समझने लगे हर चाल लोग !
ज़ुल्म सह भर रहे चुप चाप आह ,
और करते भी क्या बदहाल लोग !
मछलियों को लुभाने लग गया है ,
बुन रहे इस तरह कुछ जाल लोग !
कुछ हैं बाहर मगर भीतर हैं और ,
रूह "तनहा" नहीं बस खाल लोग !

Monday, 5 August 2013

जाना था कहाँ आ गये कहाँ ( कविता ) 9 7 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

ढूंढते पहचान अपनी ,
दुनिया की निगाह में ,
खो गई मंज़िल कहीं  ,
जाने कब किस राह में ,
सच भुला बैठे सभी हैं ,
झूठ की इक चाह में !
आप ले आये हो ये ,
सब सीपियां किनारों से ,
खोजने थे कुछ मोती ,
जा के नीचे थाह में ,
बस ज़रा सा अंतर है  ,
वाह में और आह में !
लोग सब जाने लगे ,
क्यों उसी पनाह में ,
क्यों मज़ा आने लगा ,
फिर फिर उसी गुनाह में ,
मयकदे जा पहुंचे लोग  ,
जाना था इबादतगाह में !