Monday, 29 July 2013

आँगन ( कविता ) 9 4 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                  आंगन ( कविता )-  डॉ लोक सेतिया 

ऊंचीं ऊंची दीवारें हैं घेरे हुए मुझे ,
बंद है हर रास्ता मेरे लिये ,
धूप आंधी सर्दी गर्मी बरसात ,
सब कुछ सहना पड़ता है मुझे ,
खिड़कियां दरवाज़े हैं सब के लिये ,
मेरे लिये है खुला आसमान ,
देख सकता हूं उतनी ही दुनिया ,
जितनी नज़र आती है ,
ऊंची ऊंची दीवारों में से ,
दिखाई देते आकाश से।

खुलते हैं दरवाज़े और खिड़कियां ,
हवा के लिये ,
रौशनी के लिये ,
सभी कमरों के मुझ में ही आकर ,
जब भी किसी को पड़ती है कोई ज़रूरत ,
रात के अंधेरे में ,
तपती लू में ,
आंधी में तूफान में ,
बंद हो जाती है हर इक खिड़की ,
नहीं खुलता कोई भी दरवाज़ा ,
सब सहना होता है मुझको अकेले में ,
सहना पड़ता है सभी कुछ चुप चाप ,
मैं आंगन हूं इस घर का ,
मैं हर किसी के लिये हूं हमेशा ,
नहीं मगर कोई भी मेरे लिये कभी भी।

Saturday, 27 July 2013

अभ्यस्त ( कविता ) 9 3 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

                    अभ्यस्त ( कविता )- डॉ लोक सेतिया

परेशान थी उसकी नज़रें ,
व्याकुल थी देखने को ,
मेरी टूटती हुई सांसें।

मैं समझ रहा था ,
बेचैनी उसकी ,
देख रहा था ,
उसकी बढ़ती हुई घबराहट।

वक़्त गुज़रता जा रहा था ,
और उसके साथ साथ ,
बदल रहा था हर पल ,
उसके चेहरे का रंग।

मुझे दिया था भर कर ,
अपने हाथों से उसने ,
जब विष का भरा प्याला ,
और पी लिया था ,
चुपचाप मैंने सारा ज़हर।




उसके साथ साथ मैं भी ,

कर रहा था इंतज़ार मौत का ,
पूछा था सवाल उसने ,
न जाने किस से ,
मुझसे अथवा खुद अपने आप से ,
नहीं क्यों हो रहा है ,
उसके दिये ज़हर का ,
कोई भी असर मुझपर।

समझ गया था मैं लेकिन ,
किस तरह समझाता उसे ,
उम्र भर करता रहा हूं ,
प्रतिदिन विषपान मैं ,
दुनिया वालों की ,
सभी अपनों बेगानों की ,
बातों का जिन में भरा होता था ,
नफरत के ज़हर का ,
अभ्यस्त हो चुका हूं ,
विषपान का कब से ,
तभी कोई भी ज़हर अब मुझ पर ,
नहीं करता है कुछ भी असर। 

Saturday, 13 July 2013

कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता ) 9 6 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

कविता को क्या होने लगा है आज ( कविता  ) -  डॉ लोक सेतिया

रात कविता सुन रहा था मैं ,
घर में बैठा ,
टीवी पर बन दर्शक।

सुना रहा था कोई कवि ,
कविता व्यंग्यात्मक ,
देश की दशा पर ,
बात आई थी ,
देश में नारी की अस्मत लुटने की।

और टीवी कार्यक्रम में ,
शामिल सुनने देखने वाले ,
कह रहे थे ,
वाह वाह क्या बात है।

कोई झूमता नज़र आ रहा था ,
जब कह रहा था कवि ,
बेबसी , भूख , विषमता की बात।

मेरे भीतर का कवि रो रहा था ,
देख कर ऐसी संवेदनहीनता ,
अपने सभ्य समाज की।

और सोच रहा हूं ,
क्या इसलिये लिखते हैं ,
हम कविता , ग़ज़ल ,
लोगों का मनोरंजन कर ,
वाह वाह सुनने के लिये।

या चाहते हैं जगाना संवेदना ,
सभी सुनने वालों ,
कविता पढ़ने वालों में ,
समाज में बढ़ रहे ,
अन्याय अत्याचार आडंबर के लिये।

भला कैसे कोई हंस सकता है ,
नाच सकता है ,
गा सकता है मस्ती में ,
किसी के दुःख दर्द की बात सुन।

कविता में गीत में ग़ज़ल में ,
क्यों असफल होती लग रही है ,
आज के दौर की ये नयी कविता ,
सुनने वाले , पढ़ने वाले में ,
मानवीय संवेदना के भाव ,
जागृत करने के ,
अपने वास्तविक कार्य में। 

Wednesday, 10 July 2013

तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता ) भाग 95 - डॉ लोक सेतिया

तुम्हारी विजय , मेरी पराजय ( कविता ) भाग 95 - डॉ लोक सेतिया

छल कपट झूठ धोखा ,
सब किया तुमने क्योंकि ,
नहीं जीत सकते थे कभी भी ,
तुम मुझसे ,
इमानदारी से जंग लड़कर।

इस तरह ,
तुमने जंग लड़ने से पहले ही ,
स्वीकार कर ली थी ,
अपनी पराजय।

मैं नहीं कर सका तुम्हारी तरह ,
छल कपट कभी किसी से ,
मुझे मंज़ूर था हारना भी ,
सही मायने में ,
इमानदारी और उसूल से ,
लड़ कर सच्चाई की जंग।

हार कर भी नहीं हारा मैं ,
क्योंकि जनता हूं ,
मुश्किल नहीं होता ,
तुम्हारी तरह जीतना ,
आसान नहीं होता हार कर भी ,
हारना नहीं अपना ईमान।

Tuesday, 9 July 2013

कुझ वी भावें होर बन्दे सौ वार ,,,, पंजाबी ग़ज़ल ( डॉ लोक सेतिया )

 झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना ( पंजाबी ग़ज़ल ) लोक सेतिया

कुझ वी भांवें होर बंदे सौ वार बणना ,
झूठ वाला पर कदे नां अखबार बणना।

दुश्मनी करना बड़ा सौखा कम है लोको ,
पर बड़ा औखा है हुंदा दिलदार बणना।

राह मेरी रोक लैणा मैं भुल न जावां ,
मैं नहीं भुल के कदीं वी सरकार बणना।

लोक तैनूं जाणदे हन सौ झूठ बोलें ,
सिख नहीं सकिया किसे दा तूं यार बणना।

हर किसे दे नाल करदा हैं बेवफाई ,
कम अदीबां दा नहीं इक हथियार बणना।

नावं चंगा रख के कीते कम सब निगोड़े ,
सोच लै हुण छड वी दे दुहरी धार बणना।

शौक माड़ा हर किसे दे दिल नूं दुखाणा ,
आखदे ने लोक मंदा हुशियार बणना।

Monday, 8 July 2013

एक पंजाबी कविता ( मेरा पहला प्रयास ) 01 ( डॉ लोक सेतिया )

इक पंजाबी कविता - डॉ लोक सेतिया

मंगण तां अग तू आई ते चुल्ले दी मालक बण बैठी ,
तैनू सी भैन बणाया मैं तू मेरी ही सौतण बण बैठी।

खसमां नूं अपणे खाण दी गंदी हे आदत वी तेरी ,
छडिया ना इक वी घर जिसने इनी डायन बण बैठी।

भौरा वी अपणे कीते ते आई न तैनू शरम कदे ,
तेरा हथ पकड़िया जिस जिस ने सभ दे सर चढ़ बैठी।

जाणदी एं की करदी हें अपणे आप नू वेखा है कदी ,
माड़े माड़े करमां नाल वेख आपणी झोली भर बैठी।

धुप विच जिस रुख ने तैनू ठंडी ठंडी छां सी दित्ती ,
अपणे हथां नाल अज कटदी हैं उसदी तू जड़ बैठी।

न कदे किसे दी होई तू छड आई एं सारियां नूं ,
किचड़ मिट्टी विच जा बैठी मिट्टी दे ढेले घढ़ बैठी। 

Sunday, 7 July 2013

जीना सीखना है मैंने ( कविता ) 9 2 भाग दो ( डॉ लोक सेतिया )

 जीना सीखना है मैंने ( कविता )    - डॉ लोक सेतिया

मुझे याद है बचपन में ,
जब भी कोई कहता था ,
सब है ईश्वर ,
और भाग्य के हाथ में ,
मेरे मन में ,
उठा करते थे बहुत सवाल ,
जो पूछता था मैं ,
उन सभी से ,
जिनका काम था ,
फैलाना अंधविश्वास।

लेकिन जैसे जैसे बड़ा हुआ ,
मैं भी बन ही गया ,
उसी भीड़ का ही हिस्सा ,
और अपनी हर मुश्किल ,
हल करने के लिये ,
करने लगा ,
भरोसा भाग्य का ,
और देवी देवताओं का।

खुद पर नहीं रह गया ,
मुझको यकीन ,
करने लगा जाने क्या क्या ,
ईश्वर को प्रसन्न करने को ,
अपना भाग्य बदलने को।

मुश्किलें ही मुश्किलें ,
मिलीं हैं उम्र भर मुझे ,
ज़िंदगी कभी आसान हो न सकी ,
मेरे ऐसे हर दिन किये ,
ऐसे सभी प्रयासों से।

दुआ मेरी आज तक ,
नहीं ला सकी कुछ भी असर ,
हुआ नहीं आज तक ,
किसी समस्या का कभी ,
समाधान भाग्य भरोसे ,
न ही ईश्वर को ,
प्रसन्न करने को की बातों से।

आज सोचता हूं फिर से वही ,
बचपन की पुरानी बात ,
किसलिये वो सभी हैं परेशान ,
जो करते हैं तेरी पूजा अर्चना ,
हरदम रहते हैं डरे डरे ,
तुझसे हे ईश्वर ,
करते हैं विश्वास ,
कि सब अच्छा करते हो तुम ,
जबकि कुछ भी ,
नहीं अच्छा होता आजकल।

सीखा नहीं अभी तक ,
जीने का सलीका हमने ,
समझना होगा आखिर इक दिन ,
सब करना होगा अपने आप ,
जूझना होगा मुश्किलों से ,
समस्याओं से  परेशानियों से ,
और लेना होगा ज़िंदगी का मज़ा।

खुद पर ,
अपने आत्मविश्वास पर ,
कर भरोसा ,
भाग्य और ईश्वर के भरोसे कब तक ,
पाते रहेंगे ,
बिना किये जुर्मों की ,
हम सज़ा। 

Thursday, 4 July 2013

कलम के कातिल ( कविता ) 0 ( डॉ लोक सेतिया )

कलम के कातिल ( कविता )

आपके हाथ में रहती थी मैं ,
लिखा निडरता से हमेशा ही सत्य ,
नेताओं का भ्रष्टाचार ,
प्रशासन का अत्याचार ,
समाज का दोहरा चरित्र ,
सराहा आपने ,
अन्य सभी ने मेरी बातों को ,
प्रोत्साहित किया मुझे ,
आपने अपने अंदर दी जगह मुझे ,
मैं समझने लगी खुद को हिस्सा आपका ,
मेरी आवाज़ को अपनी आवाज़ बनाकर ,
मेरी पहचान करवाई दुनिया से ,
मेरे सच कहने के कायल हो ,
मुझे चाहने लगे लोग ,
जो कल तक अनजान थे मुझसे।

आपका दावा रहा है सदा ही ,
निष्पक्षता का ,
विचारों की अभिव्यक्ति की आज़ादी का ,
मैंने आपकी हर बात पर ,
कर लिया यकीन ,
और कर बैठी कितनी बड़ी भूल ,
आपके कड़वे सच को लिखकर ,
आपसे भी बेबाक सच कहने की ,
मगर आप नहीं कर सके स्वीकार ,
जीत गया आपका झूठ ,
मेरा सच ,
सच होते हुए भी गया था हार।

आपने तोड़ डाला मुझे ,
सच लिखने वाली कलम को ,
और दिया फैंक चुपके से अपने कूड़ेदान में ,
आपने क़त्ल कर दिया मुझे ,
सच लिखने के अपराध में ,
मैं अभी भी हर दिन ,
सिसकती रहती हूं ,
आपके आस पास ,
मुझे नहीं दुःख ,
अपना दम घुटने का ,
यही रहा है हर कलम का नसीब ,
ग़म है इसका ,
कि मुझे किया क़त्ल आपने ,
जिसको समझा था ,
मैंने अपना रक्षक ,
सोचती थी मैं उन हाथों में हूं ,
जो स्वयं मिट कर भी ,
नहीं मिटने देंगे मुझे ,
मगर अब ,
आप ही मेरे कातिल ,
क़त्ल के गवाह भी ,
और आप ही करते हैं ,
हर दिन मेरा फैसला ,
देते हैं बार बार ,
सच लिखने की सज़ा ,
मैं करती हूं फरियाद ,
अपने ही कातिल से ,
रहम की मांगती हूं भीख ,
मैं इक कलम हूं ,
सच लिखने वाले ,
बेबस किसी लेखक की।