Wednesday, 26 June 2013

नहीं मिला तुम सा कोई ( कविता ) 0 ( डॉ लोक सेतिया )

 नहीं मिला तुम सा कोई ( कविता )

तुन्हें अच्छा लगता था ,
कोई और ,
जिसके प्यार में ,
तुमने छोड़ दिया ,
मुझे ही नहीं ,
सारी ही दुनिया को भी।

बेरुखी से तुम्हारी ,
तड़पता रहा मैं ,
रात दिन बहाता रहा अश्क ,
तुम्हारे प्यार में मैं बरसों।

कर दिया हालात ने ,
जुदा हम दोनों को ,
मगर दिल से नहीं हुए कभी ,
हम इक दूजे से जुदा उम्र भर।

अब नहीं हो तुम ,
अपनी दुनिया में ,
अब नहीं हो तुम ,
किसी दूजे की दुनिया में ,
छोड़ कर चले गये ,
इस जहां को तुम ,
अलविदा कहे बिना किसी से ,
मगर फिर भी रहते हो,
मेरे दिल की ,
दुनिया में  सदा तुम।

तुम्हें भी कुछ नहीं मिल सका ,
कभी किसी से ,
उम्र भर दुनिया में ,
मैं भी नहीं बसा सका ,
बिना तुम्हारे ,
अपने ख्वाबों की ,
कहीं कोई दुनिया।

आज ,
अकेला बैठा सोचता हूं ,
हम दोनों फिर से ,
मिलें शायद एक बार ,
अगले किसी जन्म में ,
और बसायें ,
अपना प्यार का कोई जहां ,
जिसमें दूजा कोई भी नहीं हो ,
मेरे और तुम्हारे सिवा मेरे दोस्त। 

Sunday, 23 June 2013

बिना मंजिल का सफ़र है ( कविता ) 0 ( डॉ लोक सेतिया )

बिना मंज़िल का सफर है ( कविता )

दौड़ रहे हैं ,
सभी दौड़ रहे हैं ,
क्यों , किसलिये ,
नहीं जानते ,
कहां जा रहे हैं ,
क्यों जा रहे हैं ,
फुर्सत नहीं है  ,
किसी को सोचने की ,
बस हर किसी को ,
यही  डर है ,
कहीं पीछे न रह जायें हम ,
सभी को सब से ,
आगे निकलना है।

कौन सी मंज़िल है ,
कौन सा रास्ता ,
किसका साथ है ,
छूट गया क्या क्या कैसे ,
नहीं जानता कोई भी ,
अपना अंजाम ,
बस भाग रहे हैं ,
तेज़ और तेज़ ,
वक़्त से आगे ,
निकलना है सभी को ,
जीवन भर ,
भागते जाना है ,
बेमकसद ,
इस अंधी दौड़ में ,
छूट गया जीवन भी ,
हासिल कर लिया बहुत ,
बहुत अभी करना है ,
अंत में मिलनी है ,
हर किसी को ,
दो गज़ ज़मीन ,
भागते भागते ,
निकल जानी है ,
किसी दिन जान।

विकास के नाम पर ,
विनाश की ओर जा रहे ,
मानवता के मूल्यों को ,
लोग सब बिसरा रहे ,
भौतिकता में ,
उलझे हैं हम ,
सुबह से शाम तक ,
रात को सुबह बताते ,
दिन को रात बता रहे ,
जानते हैं ,
समझते हैं ,
सही नहीं दिशा हमारी ,
मगर नासमझने को ,
समझदारी मानते ,
जो नहीं आया ,
खुद को भी अभी तक समझ ,
वही सबक लोग सब ,
औरों को समझा रहे।

चल रहे हैं लोग ,
ऐसी राह पर ,
जिस पर नहीं है ,
कोई भी मंज़िल कहीं ,
ख़त्म हो सकती नहीं ,
ज़िंदगी की दूरियां ,
चाहते हैं सभी खोजना ,
अपनी अपनी ज़िंदगी ,
हो रहे हर पल ,
मगर हैं दूर सभी लोग ,
अपनी ज़िंदगी से। 

Thursday, 20 June 2013

ग़ज़ल 2 0 7 ( सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे )

 सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे - लोक सेतिया "तनहा"

सितम रोज़ दुनिया के सहते रहेंगे ,
नहीं पर शिकायत कभी कर सकेंगे।

तेरा शहर गलियां तेरी छोड़ देंगे ,
नहीं अब कभी आपसे हम मिलेंगे।

कहें और क्या हम यही बस है कहना ,
तुम्हें खुश रखे हम खुदा से कहेंगे।

मिली ज़िंदगी मांगते मौत रहते ,
हैं ज़िन्दा नहीं हम ,न हम मर सकेंगे।

न कोई भी मंज़िल न कोई ठिकाना ,
चले रास्ते जिस तरफ चल पड़ेंगे।

मेरे दिल के टुकड़े हज़ारों ही होंगे ,
किसी दिन तेरा तीर खाकर मरेंगे।

बुझानी हमें प्यास "तनहा" सभी की ,
सभी जाम खाली हुए हम भरेंगे। 

Friday, 7 June 2013

ग़ज़ल 2 0 6 ( खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना ) - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता तेरे गुनाह , डरना - लोक सेतिया "तनहा"

खुदा देखता  तेरे  गुनाह , डरना ,
सितमगर सितम की इन्तिहा न  करना।

कई लोग फिसले , फिसलते गये हैं ,
वहीं पर खड़े हो , संभलकर उतरना।

किये दफ़्न तुमने , जिस्म तो हमारे ,
बहेगा हमेशा प्यार का ये झरना।

परिंदे यही फरियाद कर रहे हैं ,
किसी के परों को मत कभी कतरना।

नहीं दूर अपनी मौत जानते हैं ,
किया पर नहीं मंजूर रोज़ मरना।

बिना नीवं देखो बन गई इमारत ,
किसी दिन पड़ेगा टूटकर बिखरना।

सुबह शाम "तनहा" देखकर के सूरज ,
हैं कहते, सिखा दो डूबकर उभरना। 

Thursday, 6 June 2013

कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता ) 1 6 भाग तीन ( डॉ लोक सेतिया )

 कलयुगी भक्त , कलयुगी भगवान ( हास्य कविता  ) लोक सेतिया

सभी धर्मों के ईश्वर ,
वहीं पर थे ,
सभी के सामने ,
लगी हुई थी ,
भक्तों की लंबी लंबी कतारें।

सभी बढ़ा कर हाथ ,
दे रहे थे अपने भक्तों को आशीष ,
खुश हो रहे थे ,
पा कर ढेर सारा चढ़ावा ,
किसी को नहीं था मतलब ,
कौन है अच्छा और कौन बुरा ,
कोई नहीं दे रहा था ,
जैसे जिसके कर्म हों ,
उसको वैसा फल ,
देख कर चुप नहीं रह पाया ,
आखिर को वो था इक पत्रकार ,
छोड़ सभी को पीछे ,
चला आया था वो सबसे आगे ,
बढ़ा दिया अपना कैमरा ,
सामने उन सभी भगवानों के ,
और माइक पकड़ ,
पूछने लगा उन सब से ,
अपने सवाल ,
ये क्या देख रहा हूं मैं ,
क्या कर रहे हैं सभी आप ,
सोचते नहीं ,
देखते नहीं ,
किसने किये कितने पुण्य ,
नहीं किसी को भी कह रहे ,
करते रहे कितने पाप ,
मुस्कुराने लगे ,
सभी के सभी ईश्वर ,
सुन उसकी बात ,
फिर समझाया उसको ,
किस युग की करते तुम बात ,
कलयुग में नहीं ,
लागू हो सकते नियम ,
सत्य युग वाले ,
इस युग में खुली छूट है ,
लूट ले छीन ले ,
जैसे भी कमा ले ,
बस हर बार हमें याद रख ,
सर झुका चढ़ा चढ़ावा ,
खुश कर हमें ,
और फलने फूलने का ,
हमसे आशीष पा ले ,
पत्रकार हो ,
इतना नहीं जानते ,
कलयुग कैसे कलयुग रहेगा ,
अगर पाप ही नहीं रहेगा ,
पापियों के लिये ही है ये युग ,
इसमें पाप हमेशा ही बढ़ेगा।

Monday, 3 June 2013

ग़ज़ल 2 0 5 ( अब सभी को खबर हो गई ) - लोक सेतिया "तनहा"

अब सभी को खबर हो गई - लोक सेतिया "तनहा"

अब सभी को खबर हो गई ,
बेहयाई हुनर हो गई।

ख़त्म रिश्ते सभी कर लिये ,
बेरुखी इस कदर हो गई।

साथ कोई नहीं जब चला ,
शायरी हमसफ़र हो गई।

आपने ज़ुल्म इतने किये ,
हर ख़ुशी दर बदर हो गई।

कल अचानक मुलाकात इक ,
फिर उसी मोड़ पर हो गई।

आज नीची किसी की नज़र ,
क्यों हमें देखकर हो गई।

और "तनहा" नहीं कुछ हुआ ,
जुस्तजू बेअसर हो गई। 

Saturday, 1 June 2013

ग़ज़ल 2 0 4 ( कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं )

 कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं - लोक सेतिया "तनहा"

कह रहे कुछ लोग उनको भले सरकार हैं ,
तुम परखना मत कभी खोखले किरदार हैं।

छोड़कर ईमान को लोग नेता बन गये ,
दो टके के लोग तक बन गये सरदार हैं।

देखकर तूफ़ान को, छोड़ दी पतवार तक ,
डूबने के बन गये अब सभी आसार हैं।

फेर ली उसने नज़र, देखकर आता हमें ,
इस कदर रूठे हुए आजकल दिलदार हैं।

पास पहली बार आये हमारे मेहरबां ,
और फिर कहने लगे फासले दरकार हैं।

हम समझते हैं अदाएं हसीनों की सभी ,
आपके इनकार में भी छुपे इकरार हैं।

गैर जब अपने बने, तब यही "तनहा" कहा ,
ज़िंदगी तुझसे हुए आज हम दो चार हैं।