अप्रैल 23, 2017

POST : 641 झूठ सब का दीन-धर्म है ( आज का समाज ) डॉ लोक सेतिया

  झूठ सब का दीन-धर्म है ( आज का समाज  ) डॉ लोक सेतिया 

       अख़बार में इश्तिहार मिला जिस में दावा किया गया है श्री श्री आयुर्वेदा द्वारा नाड़ी परीक्षण और आयुर्वेद चिकित्सा "आर्ट ऑफ लिविंग " बैंगलोर आश्रम से प्रशिक्षित अमुक आयुर्वेदिक चिकत्स्क बिना किसी जांच मात्र दो मिंट में हर रोग का निदान और उपचार इक दवा की दुकान पर आकर करेंगे। इक विज्ञापन टीवी पर आता है बाबा रामदेव का फोटो दिखाते जिस में करोड़ों लोगों पर सफल प्रयोग करने और तमाम देसी जड़ी बूटियों को खोजने की बात की जाती है। बहुत महान कार्य कर रहे हैं ये सौंदर्य प्रसाधन बनाकर महिलाओं को खूबसूरत बनाने में सहयोग कर के। क्योंकि असली रोग तो सब पहले ही योग और दो घूंट पीने से ठीक हो गये हैं। रोज़ नया शोर सरकार का सुनाई देता है , स्वच्छता अभियान तीन साल में वास्तविकता तो कहीं नहीं दिखाई देती। और भ्र्ष्टाचार आज भी कोई सरकारी काम बिना सिफारिश या रिश्वत होता नहीं , कोई अधिकारी आज भी आम नागरिक की परेशानी समझता ही नहीं , आज भी अफ्सर चाटुकारिता कर तरक्की पाते हैं। हर विभाग और अधिक धन जनता से वसूल करने में लगा हुआ है। देश में आम जनता आज भी त्रस्त है बदहाल है और शासक जनता के खून पसीने की कमाई अपने ऐशो-आराम पर खर्च कर गर्व महसूस करते हैं। आम लोग हमेशा की तरह चढ़ते सूरज को प्रणाम करते हैं , बिना समझे कि वास्तव में उसने सत्ता पाकर किया क्या है। क्या देश की जनता की हालत सुधरी है , कोई सवाल नहीं करता , कोई सोचता तक नहीं। सब को अपने अपने अनुचित कार्य उचित लगते हैं , सब की कथनी और है करनी कुछ और। नियम कानून सही गलत और नैतिक अनैतिक की परवाह किसी को नहीं है। अपने आप को कोई नहीं देखता कि मैं जो कर रहा वो मेरा कर्तव्य है अधिकार है अथवा केवल स्वार्थ है। धर्म वाले उपदेश कुछ देते हैं खुद कुछ करते हैं। शिक्षा को भी लूट का धंधा बना लिया है और ज्ञान नहीं देते शिक्षा को बेचते हैं। बड़े बड़े अस्पताल स्वास्थ्य सेवा नहीं किसी भी तरह अधिक से अधिक धन कमाने में रोगियों का शोषण करते हैं अपने अधिकार का दुरूपयोग करते हैं। हज़ारों रूपये के टेस्ट कमीशन की खातिर , बिना ज़रूरत दवायें लिखना , जो कभी नीम हकीम किया करते थे आज उच्च चिकिस्या की शिक्षा हासिल किये लोग उस से बढ़कर आपराधिक ढंग से उपचार के नाम पर करते हैं। लोग हर सरकार की तरह आज की सरकार की कमियों को नाकामियों को अनदेखा कर उस के प्रचार को सच समझ मानते हैं सब ठीक होने वाला है। नहीं हो रहा ये कहने का साहस कोई आम नागरिक क्या तथाकथित समाज का दर्पण कहलाने वाला मीडिया और साहित्य भी नहीं कर रहा। सब को अपने अपने हित की चिंता है , जब खुद ईमानदार नहीं हैं अपने स्वार्थ में डूबे हुए हैं तब दूसरे की कमी देख भी कैसे सकते हैं। हर तरफ हर कोई खुद को मसीहा साबित करने को व्याकुल है , मगर किसी की भलाई कोई नहीं करना चाहता। सब अपने पापों को पुण्य कहलाना चाहते हैं। झूठ आज का धर्म है आदर्श है ईमान है। झूठ की जयजयकार करना सभी की आदत बन चुकी है। सच की पहचान किसी को नहीं है , सच घायल हुआ कराहता रहता है , उसकी पुकार किसी को सुनाई नहीं देती है। 

 

अप्रैल 21, 2017

POST : 640 अहंकार की लाल बत्ती ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया

     अहंकार की लाल बत्ती ( चिंतन ) डॉ लोक सेतिया 

  मुझे माता पिता ने दिया क्या था , ये तो मेरी समझदारी और मेहनत है जो आज मेरे पास सब कुछ है। आप को अजीब लगेगा मगर ऐसा सोचने वाले लोग बहुत हैं। उनको मालूम ही नहीं होता कि किन हालात में माता पिता ने उनकी परवरिश कैसे की। शायद उनकी छिपी मेहनत का फल है जो खुद उनको नहीं मिला आपको मिला है। पेड़ लगाने वाला खुद फल नहीं खाता कभी उसके फल कोई और खाता है। आज जो लोग शोर मचाते हैं केवल हम ही सब अच्छा करते हैं और अभी तक बाकी सब सिर्फ बुरा ही करते आये हैं उनको बताना होगा कि आज आप जिस जगह हैं शायद होते ही नहीं अगर आपसे पहले वालों ने ऐसा अवसर सब को मिल सके वो सब नहीं किया होता। किसी नेता या दल की सरकार अगर ये मानती है कि वही सब को सभी कुछ दे रही है तो इसको उनका अहंकार कहना होगा। क्योंकि कोई दल कोई नेता अपनी जेब से या अपनी जायदाद बेच कर जनता को कुछ नहीं देता है , बल्कि देश की जनता के धन पर शाही ढंग से रहता है। शासन करना देश सेवा नहीं होता , देश और जनता की सेवा तब होती जब आप सफेद हाथी की तरह देश के खज़ाने पर बोझ नहीं होते। इसलिए आप जैसी भी राजनीति करें ये दावा नहीं करें कि आप कोई त्याग जैसा महान कार्य करते हैं। पिछली सरकारों ने जो किया जनता जानती है , आप को उनके किये पापों का ही नहीं अपने कर्मों का भी हिसाब देखना है। अभी निर्णय किया गया लाल बत्ती हटाने का जो सही है मगर ऐसा करना ही काफी नहीं है। वास्तविक काम सत्ता की राजनीति नेताओं और प्रशासन की सोच और तौर तरीके बदलने का है। आप ख़ास क्यों हैं जब देश का संविधान सब को बराबरी का हक देता है। और लोकतंत्र का पहला नियम है कोई आपका विरोध कर सकता है , और सत्ता में होते उनके विरोध करने के अधिकार की रक्षा करना आपका फ़र्ज़ है। ऐसा शायद पहली बार आजकल दिखाई दिया है कि मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री की सभा में जाने वालों की वेशभूषा पर ऐतराज़ किया जाये और काली कमीज़ काली स्वेटर क्या रुमाल और जुराब तक उतरवा दी जाये। पूरा बहुमत फिर भी इतना डर। केवल सड़क पर ही नहीं आपके वाहन पर लाल बत्ती होती है , आप दफ्तर में या जहां कहीं भी हैं आपको खुद को आम नागरिक से अधिक महत्व अपना नहीं समझना चाहिए। ये बात नेताओं अधिकारीयों पर ही नहीं और सब पर भी लागू होती है।

        मैं सब से बड़ा जानकर ज्ञानी , मैं सब से बड़ा गुरु , मैं सब से धनवान , मैं सब से बड़ा दानवीर , मैं सब से पवित्र आत्मा , मैं सब से अधिक देशभक्त और ईमानदार , बड़ा संत साधु सन्यासी , सब से काबिल डॉक्टर वकील या न्यायधीश आदि आदि। मैं मैं मैं। मैं आम आदमी हूं लिखने वाले तक की मानसिकता खुद को सब से ख़ास बताने की नज़र आती है। पत्रकार होना क्या है , आप का ख़ास दर्जा है , आपको सब ख़ास समझें यही चाहते हैं। प्रैस शब्द अपने वाहन पर लिखवाना किसी लाल बत्ती लगवाने जैसा ही है। इसी तरह लोग अपनी कार पर दल का प्रधान या कोई ओहदा लिखवा या सत्ताधारी दल का चिन्ह या झंडा लगा चाहते हैं उनको पुलिस या अन्य लोग विशेष समझें। वास्तव में ऐसा करने वाले लोग भीतर से खोखले होते हैं , जैसे किसी की खुद की कोई काबलियत या पहचान नहीं होती। हर किसी को बताता है मैं उसका बेटा या क्या क्या हूं। अहंकार बड़े होने की नहीं छोटे होने की निशानी है। असली महान लोगों को किसी तमगे लगाने की ज़रूरत होती ही नहीं है। 

 

अप्रैल 20, 2017

POST : 639 की उसने मेरे कत्ल के बाद कत्ल से तौबा ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 की उसने मेरे कत्ल के बाद कत्ल से तौबा (  व्यंग्य )  डॉ लोक सेतिया

  पच्चीस साल बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने माना उन्होंने आपराधिक षड्यंत्र किया था। सत्तर साल उनको समझ आया लाल बत्ती कल्चर सही नहीं है। जो उनको चुनते वो लोग आम और विधायक सांसद मंत्री ख़ास भला क्यों हो सकते हैं। तो अभी तक आप अनुचित करते आये और आज अनुचित करना छोड़ रहे क्या इसको महान कार्य कहोगे। सवाल इतना भर नहीं है , सवाल ये है क्या भविष्य में आप खुद को वी आई पी और ख़ास समझना छोड़ दोगे। मगर इंसाफ की इक अदालत और भी है जहां कोई वकील आपको बचा नहीं सकता है। उस ऊपर वाली अदालत में फैसला देरी से नहीं होता , न ही ऐसा देखा जाता है कि आप अभी किसी संवैधानिक पद पर हैं इसलिए आप पर मुकदमा चल नहीं सकता। हैरानी की बात नहीं है क्या , कोई षड्यंत्रकारी किसी राज्य का राज्यपाल है।  नैतिकता की बात कौन करता है। जब ऊपरी अदालत में फैसला होगा तब भगवान राम भी सवाल करेंगे आपने मेरे नाम पर देश और संविधान की मर्यादा से खिलवाड़ किया और खुद को मेरे भक्त बताते हो। अपनी स्वार्थों की राजनीति में मुझे अपना मोहरा बना दिया किस से पूछ कर। कब किस को मैंने कहा था मेरे लिये कोई मंदिर बनाओ , राम राज्य का अर्थ सब को न्याय और जीने के अधिकार होता है न कि मंदिर बनाना। मुझे महलों से कभी प्यार नहीं रहा इतना तो जानते हो और मैं सत्ता का लालची भी नहीं सब को पता है। ये कैसी अजीब विडंबना है आप अनुचित करना छोड़ते हो या छोड़ने की बात करते हो तब भी ये स्वीकार नहीं करते कि अभी तक आपने जो किया वो गलत किया।

           उस ऊपरी अदालत में सब से हर बात का हिसाब मांगा जायेगा। आप तो डॉक्टर थे आपने अपना कर्तव्य निभाया रोगियों की सहायता करने का या किसी भी तरीके लूट खसूट से धन ऐंठते रहे। आप जो दवा बेचते थे ज़हर बांटते रहे जानबूझकर। और न्यायधीश जी आपको उम्र लग गई इतना तय करने में कि उन्होंने कोई धर्म का कार्य नहीं षड्यंत्र रचा। अभी भी भगवा भेस धारण किये कोई दावा करता है जो किया खुल्ल्म खुल्ला किया सब के सामने। भगवान से छुपकर कोई कुछ नहीं कर सकता , उसको जवाब देना जो किया तेरे नाम पर किया , गुनहगार तुम और कीचड़ के छींटे भगवान के सर पर।

            एक दिन की बात चली है किसी ने एक दिन का अवकाश रखने का सुझाव दिया है , एक दिन उनको भी राजपाठ को छोड़ चिंतन करना चाहिए आपको सत्ता मिली किस उदेश्य के लिए थी और आपने उसे किस स्वार्थ की खातिर उपयोग किया है। सजन रे झूठ मत बोलो खुदा के पास जाना है , न हाथी है न घोड़ा है वहां पैदल ही जाना है। लाल बत्ती वहां काम नहीं आती न कोई पद किसी का कवच बनता है उसकी अदालत में।

अप्रैल 19, 2017

POST : 638 हम होंगे कामयाब एक दिन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

     हम होंगे कामयाब एक दिन ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

हम होंगे कामयाब , हम होंगे कामयाब , हम होंगे कामयाब , एक दिन।
कितना अच्छा लगता है , एक दिन सब अच्छा ही अच्छा होगा , जाने कब।

बस एक दिन सप्ताह में पेट्रोल पंप बंद रखो ईंधन की बचत होगी। 
बात मन की है । 
सलाह हो या सुझाव या फिर आदेश अथवा कानून सरकार का सर माथे । मालूम नहीं दिल्ली में ऑड इवन नंबर से नतीजा क्या निकला , फरमान था अमल किया सब ने। चलो इसे भी कर देखते हैं , एक दिन की ही तो बात है। हम मंगलवार शाकाहारी हो जाने वाले लोग हैं , एक दिन उपवास भी रख लिया करते हैं। ये दूसरी बात है कि इसी देश में करोड़ों लोग हर दिन भी इक समय उपवास करते हैं फिर भी प्रभु उनकी नहीं सुनता। मगर एक दिन और भी बहुत कुछ नहीं करने का सुझाव अपन आम लोग भी दे सकते हैं।

        हर रविवार को कोई नेता भाषण नहीं दे , कोई रैली रोड शो प्रदर्शन नहीं किया जाये। ध्वनि प्रदूषण से लेकर साम्प्रदायिकता का ज़हर तक घट सकता है , शांति रह सकती है देश भर में और बचत की बचत भी।

       हर रविवार अगर टीवी पर सरकारी विज्ञापन नहीं दिखलाये जायें न ही अख़बार में छपें तो जनता के धन का कितने करोड़ रूपये का फज़ूल खर्च कम हो जायेगा। मीडिया वाले भी भूखे नहीं मर जायेंगे।
    और अगर मीडिया वाले भी सप्ताह में एक दिन रविवार को केवल वास्तविक सच्ची खबरें ही दिखायें , कोई तमाशा नहीं , फालतू की बहस नहीं , खुद अपने आप का गुणगान नहीं। मगर पहले खबर किसे कहते हैं उस परिभाषा को तो पढ़ लें। वो सूचना जो कोई लोगों तक पहुंचने नहीं देना चाहता पत्रकार का कर्तव्य है उसका पता लगाना और उसको सार्वजनिक करना। जिस का खुद कोई शोर मचा रहा है उसको खबर नहीं कहते। फायदा होगा , सच सप्ताह में एक दिन खुल कर सांस ले पायेगा।

     पुलिस वाले , प्रशासन वाले , नेता लोग , वी आई पी समझे जाने वाले या कहलाने वाले , बड़े बड़े अभिनेता , खिलाड़ी , धनवान उद्योगपति , धर्म गुरु उपदेशक , सब को सादगी की बात समझाने वाले ,सप्ताह में एक दिन अपने सभी शाही ठाठ बाठ , शान-ओ -शौकत छोड़ आम नागरिक की तरह रहकर ये समझने का प्रयास करें कि देश में वास्तविक समानता के क्या मायने हैं। आप सोचोगे भला इस से क्या होगा , मुमकिन है कुछ लोगों को समझ आ सके कि उनकी शान-ओ -शौकत की कीमत कोई और चुकाता है। क्योंकि आपके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है इसीलिए करोड़ों के पास ज़रूरत लायक भी नहीं है।

       आखिर में इक शायर के लोकप्रिय शेर पर इक दूसरे शायर की ताज़मीने से :-

            ख्याल उसकी तरफ कब गया है मौसम का ,
           कभी जो पूछे सबब उस गरीब के ग़म का ,
          खुले भी राज़ तो फिर कैसे चश्मे-पुरनम का ,
         "चमन में कौन है पुरसाने-हाल शबनम का ,
             गरीब रोई तो गुंचों को भी हंसी आई "।

          (  चश्मे-पुरनम= अश्रुपूर्ण नेत्र।  पुरसाने-हाल=हाल पूछने वाला। )  

 

अप्रैल 18, 2017

POST : 637 लोक सेतिया केवल लोक सेतिया ही काफी है ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

       लोक सेतिया केवल लोक सेतिया ही काफी है ( कटाक्ष ) 

                                         डॉ लोक सेतिया

आपका नाम छापना है निमंत्रण पत्र पर , बड़ी विनम्रता से उन्होंने सवाल किया , थोड़ा बता दें क्या नाम छपवाना उचित रहेगा। थोड़ी हैरानी हुई , कहा महोदय आप इतने करीब से जानते हैं मुझे , भला आपको मेरा नाम याद नहीं। चलो कोई विशेष बात नहीं है , ये गलती मुझसे भी कभी कभी हो जाती है , कोई पहचाना हुआ मिलता है मगर तब भूल जाता हूं उसका नाम क्या है। आप मेरा नाम लोक सेतिया छपवा सकते हैं , यही मेरा नाम है। आप समझे नहीं , वो कुछ झिझकते हुए कहने लगे , ये तो अच्छी तरह पता है आप डॉ लोक सेतिया हैं , मगर सभी नाम से पहले कोई विशेषण अथवा अंत में कोई उपाधि लगाते हैं। आप क्या कहलाना पसंद करते हैं , लोग आपको क्या समझें। नाम तो हर आम आदमी का होता है विशिष्ट लोग खुद को साहित्यकार पत्रकार समाजसेवी वरिष्ठ नेता अथवा किसी धर्म या गुरु से जुड़ा कोई शब्द लगाकर नाम को ख़ास बनवा लिखते हैं। आप अभी सोच सकते हैं दो चार दिन बाद बताएं क्या उचित रहेगा। मुझे इक उलझन में डाल कर चले गये मित्र।

               मैं लोक सेतिया हूं मुझे यही मालूम है , मगर लोग मुझे क्या समझें ये मैंने कभी सोचा ही नहीं। जैसे किसी समारोह में देने को खूबसूरत स्मृति चिन्ह या ट्रॉफी बाज़ार से मिलती हैं उसी तरह कोई तो जगह होगी जहां अलग अलग नाम अपनी पहचान को परिभाषित करने को उपलब्ध होंगे। सब से पहले अपनी जानी पहचानी जगह चले गये उनके पास जो मेरी रचनाएं प्रकाशित करते हैं। उनसे मुझे प्रस्ताव मिला था कुछ दिन पहले पत्रकारिता और साहित्य को लेकर उनके साथ जुड़ काम करने का। मुझे अनुबंध में रहना पसंद नहीं इसलिए इंकार किया था ये साफ कर कि मुझे सब पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं छपवाना उचित लगता है और आपकी शर्त है किसी और को कभी अपनी रचना नहीं भेज सकता जो मेरे लिये कठिन है। मैं कई विधाओं में लिखता हूं और आपको मेरी केवल एक ही विधा की रचनाएं छापनी हैं। लेकिन उन से जब खुलकर बात हुई तो समझ आया उनके लिये सच मात्र इक साधन है कारोबार करने का।  उनको झूठ को सच बताकर बेचने या झूठ को सच साबित करने में कोई खराबी नहीं लगती , इसको प्रैक्टिकल होना मानते हैं। खरा सच बिकता ही नहीं आजकल उन्होंने समझाया , पीतल पर सोने की परत चढ़ाना ज़रूरी है। अच्छा हुआ जल्दी समझ आ गई बात और तय कर लिया खुद को ये नहीं होने देना है।
                                  इक संस्था बनी थी समाज की समस्याओं की बात को लेकर , समाजसेवा करनी है का दावा था। मगर चार दिन बाद सभा का मकसद प्रचार कर शोहरत हासिल कर प्रशासन पर अपना प्रभाव स्थापित करना ज़रूरी बताया गया। ताकि खुद कुछ नहीं करना सिवा मासिक बैठक में कोई प्रेस नोट जारी करने के प्रशासन से मांगना क्या क्या करे सरकार। मुझे लगा ऐसा तो मैं सालों से अकेला करता चला आ रहा ये कुछ ख़ास कैसे होगा , मगर तब कहा गया जब हम संगठन बनाकर एक साथ जाएंगे अधिकारी या नेता से मिलने तब वो हमें आदर सहित पास बिठा चाय ठंडा पिला हमारा रुतबा बड़ा करेंगे और कभी खुद हमारा कोई काम होगा तब ये जान पहचान ये संपर्क बड़े काम आएगा। तो ये समाजसेवा भी अपने मतलब से होगी , जब समझे तो अलग होना ही सही लगा। फिर इक लेखकों का संगठन भी मिला साहित्य की सेवा का दम भरने को , मगर वहां भी खुद से बड़ा कोई किसी को नहीं समझता मिला। सब को इक सीढ़ी की तरह संगठन को उपयोग करना उचित लगा। लिखना गौण हो गया और लेखक कहलाना महत्वपूर्ण। तालमेल नहीं बैठा अपना और समझ लिया साहित्यकार का तमगा किसी काम का नहीं है।

                  देशभक्ति और जनता की सेवा की बात करने वालों से भी मुलाकात हो गई इत्तेफ़ाक़ से , झंडा फहराना देश प्रेम के गीत गाना और भारतमाता की जय के उदघोष वाले नारे लगाना। करना क्या कोई नहीं बता पाया , बस खुद को देशभक्त कहलाना है। क्या देशप्रेम और देशभक्ति केवल प्रदर्शन या दिखावे की बात है। नहीं समझे इस से हासिल क्या होगा। धर्म वालों से भी मुलाकात हुई अक्सर , गुरु जी समझा रहे थे अधिक संचय मत करो और खुद आश्रम बनवा रहे थे जगह जगह। लाखों करोड़ों की ज़मीन जायदाद खुद की और प्रवचन दीन दुखियों की सेवा ही धर्म है वाला। मगर किसी गरीब की क्या मज़ाल जो उनके करीब भी आये , जो धनवान चढ़ावा चढ़ाते वही परमभक्त अनुयायी कहलाते हैं। किसी को समझा रहे थे कल मंच से मुझे एक सौ आठ नहीं एक हज़ार आठ बतलाना और मेरे नाम से पहले श्री श्री भी एक नहीं दो बार लगाना। अपना कद और ऊंचा करने में लगे हुए कोई बड़ा छोटा नहीं का उपदेश देते विचित्र लगे।

                   सब को पहाड़ पर चढ़ना है अपना कद बड़ा दिखलाना है। मुझे नहीं समझ आती ऐसी बातें। मैं कुछ नहीं हूं , समाजसेवी नहीं , पत्रकारनहीं , साहित्यकार नहीं  , देशभक्त होने का दावेदार नहीं , किसी धर्म का किसी गुरु जी का भक्त सेवक भी नहीं। मुझे लोक सेतिया ही रहने दो , यही रहना है मुझे कोई तमगा लगाना नहीं है। 

 

अप्रैल 17, 2017

POST : 636 उनकी संवेदना उनका प्यार ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

उनकी संवेदना उनका प्यार ( हास्य-कविता ) डॉ लोक सेतिया

जनता बेचारी अबला नारी
नहीं समझी कभी क्यों हुई बलिहारी
जब जब जिस ने दिखलाई 
झूठी संवेदना उसकी दुर्दशा को देख
उसकी सेज सजा दी बिना जाने समझे
गले में उसके माला डारी ।

जिस जिस ने भोली भाली जनता से
किया प्यार करने का वादा
उस उस को परमेश्वर समझ लिया
कदमों में उसके समझा स्वर्ग
हर प्रेमी झूठा निकला बस
उसका स्वामी बनकर लुत्फ़ उठाया ।

नारी की  इक चाहत अपनापन और
अपनी प्रशंसा सुन खुश होना
कितनी बार यही किया
कितनी बार किस किस से धोखा खाया
सब उसी पर शासन करने आये
नहीं किसी ने उसको रानी बनाया ।

नेताओं की संवेदना होती है
शोकसभाओं में दो पल का दिखावा
नहीं होता किसी को शोकसभा में
किसी की मौत पर कोई दुःख
इक औपचरिकता निभाते हैं लोग
बेदिली से होती है प्रार्थना भी ।

तब भी हम ये झूठी रस्म निभाते
चले जा रहे हैं बिना विचारे
ये सब तो हैं मझधार में जाकर
साथ छोड़ने वाले नाम को अपने
नहीं मिला करती मंज़िल
नहीं मिलते किनारे इनके सहारे ।

हम फिर भी सुबह शाम उन्हीं की
आरती हैं गाते फूल चढ़ाते
मतलबी लोग शासक बनकर
नहीं कभी वादे किये निभाते
हम उनके झूठ पर कुर्बान जाते
झूठ को सच वो बताते ।

वो सब सुख देना वो सब कुछ
तुम्हारा है की प्यारी बातें
मिला कभी नहीं कुछ जागते हुए
काटी हैं हमने रट रट सारी रातें
दिया कुछ नहीं सिवा कहने को
प्यार संवेदना की झूठी बातें । 
 
 Household Consumption Expenditure Survey 2022-23 report | Jansatta
 

अप्रैल 16, 2017

POST : 635 लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम ( आज के वक़्त की सरकार के नाम आखिरी खत ) डॉ लोक सेतिया

         लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम 

        ( आज के वक़्त की सरकार के नाम आखिरी खत ) डॉ लोक सेतिया 

चालीस साल से अधिक समय हो गया है मुझे जनहित के पत्र लिखते लिखते। बेशक किसी भी सरकार से मेरी आशायें नेताओं और प्रशासन के संवेदनशील और वास्तविक लोकतांत्रिक होने की पूरी नहीं हुई हों , इंदिरा गांधी से लेकर सभी बदलती सरकारों में , जिन में वाजपेयी जी की भी सरकार शामिल रही है , और मनमोहन सिंह जी की केंद्र की और हरियाणा में भुपिंदर हुड्डा जी की सरकार तक। फिर भी शायद इक उम्मीद बची हुई थी कि किसी दिन मैं अपने जीवन में वो बदलाव देख सकूंगा जो मेरा ख्वाब है। कभी कोई नेता आयेगा जो खुद राजसी शान से रहना अपराध समझेगा जब देश की वास्तविक मालिक जनता गरीबी और भूख में जीती है। मगर आपके नित नये नये झूठे प्रचार के शोर में हर तरफ जब बस एक ही नाम का शोर है तब ऐसे सत्ता के होते विस्तार के जश्न भरे माहौल में भला किसी मज़लूम की आह या चीख किसी को सुनाई देगी। आपका सारा संवाद एकतरफा है मन की बात से तमाम तथाकथित ऐप्स तक की बात। तीन साल में आपको पी एम ओ ऑफिस में देश के भ्र्ष्टाचार और आपकी सभी योजनाओं की असलियत तक की जानकारी भेजी पत्र द्वारा। और आपके सभी दावे शत प्रतिशत झूठे साबित हुए। आपका स्वच्छ भारत अभियान और खुले में शौच मुक्त का दावा इस कदर कागज़ी और झूठा सब को नज़र आता है अपने आस पास। सब से अनुचित बात आपको कभी लगा ही नहीं कि प्रशासन को उत्तरदायी बनाया जाये उनका तौर तरीका बदला जाये। जो पहले मुख्यमंत्री हुए उन्होंने भी हर अफ्सर को यही निर्देश दिया था कि उनके दल के कार्यकर्ता की हर बात मानी जानी चाहिए। ये कैसा लोकतंत्र है , दल की सरकार का अर्थ क्या हर तथाकथित नेता का शासक होना है। संविधानेतर सत्ता जितनी आज है कभी नहीं रही। खेद इस बात का भी है कि पहले मीडिया का कुछ हिस्सा सत्ता के हाथ की कठपुतली बनता था आज सभी बिक चुके लगते हैं। जिस तरह हर राज्य में मनोनयन से मुख्यमंत्री बनाये जा रहे हैं उस से तानाशाही का खतरा साफ मंडरा रहा है। आज तक जितनी भी सरकारें आईं उन्होंने कभी भी सच बोलने वालों को इस कदर प्रताड़ित नहीं किया जितना भाजपा के शासन में जनहित की बात करने पर मुझे झेलना पड़ा है। सी एम विंडो की बात छोड़ो प्रधानमंत्री जी से जनहित की शिकायत भी बेअसर है। आपके ऑफिस में लिखे किसी पत्र का को उत्तर नहीं मिला न कोई प्रभाव। आपके मीडिया में खुद के सोशल मीडिया पर महानता के चर्चे बस आपकी इकतरफा बात है। सौ पचास की भलाई की बात को अपने प्रचार में बताते क्या कभी बताया कितने लाख या शायद करोड़ की अर्ज़ियाँ रद्दी की टोकरी में फैंक दी। हो सकता है आपकी लोकप्रियता चरम पर हो और तमाम लोग आपके नाम का गुणगान करते हों मगर मैं आपकी केंद्र की सरकार और हरियाणा में राज्य की सरकार से इस कदर निराश हो चुका हूं कि भविष्य में जनहित की बात सरकार प्रशासन या नेताओं को लिखना ही छोड़ रहा हूं। शायद आप सभी के लिए ये राहत की बात होगी कि मुझ जैसे लोग तंग आकर खामोश हो जायें।

                    लो आज हमने छोड़ दिया रिश्ता ऐ उम्मीद ,
                   लो अब कभी गिला न करेंगे किसी से हम। 

 

POST : 634 कौन कौन है सच का कातिल ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  कौन कौन है सच का कातिल ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

आज इक फिल्म देखी जिस ने मुझे भीतर तक झकझोर कर रख दिया। नायक नायिका दोनों की आंखें नहीं हैं , खलनायक नायिका से अनाचार करते हैं और जिनको अपराधी को पकड़ना है वही शिकायत करने वालों को अपमानित और प्रताड़ित करते हैं। नायिका ख़ुदकुशी कर लेती है और नायक बाद में बदला लेता है खुद अपराधियों को सज़ा देता है। मुझे तभी कुछ लोग याद आये जो यही करते हैं , सी एम विंडो हरियाणा की शिकायत की जगह से पुलिस प्रशासन विभाग के अधिकारी से विभाग के बड़े ऑफिस तक सभी। उपयुक्त को महीनों अपना कर्तव्य याद नहीं रहता , विभाग इक जूनियर इंजीनियर को बार बार पत्र भेजता जिसकी प्रति शिकायत करने वाले को मिलती रहती साल तक। फिर कभी शिकायत निपटा देने कभी करवाई की बात का एस एम एस भेजते इक साथ। ये जानते हैं कि जो कर रहे उसका अर्थ अनुचित कार्य करने वालों का पक्ष लेना और जनहित की बात करने वाले को प्रताड़ित करना है। इस तरह ये तथाकथित देशभक्त जनता के सेवक सच को अपराध बना देते हैं और जो सरकार को अवैध कार्यों की जानकारी दे उसको खलनायक बनाना चाहते हैं। कोई विवेक कोई अंतरात्मा इनको झकझोरती नहीं है , इनको पता है फिल्म की तरह वास्तविक जीवन में कोई अपराधियों से खुद नहीं लड़ सकता , न ही इनकी अकर्मण्यता को साबित किया जा सकता है। पर शायद किसी दिन ऊपरवाला इनका इंसाफ करेगा , क्योंकि इनकी मर्ज़ी से किसी की शिकायत जब चाहे बिना कुछ किये बंद की जा सकती है , और उसके बाद बड़े अधिकारी से मिलने वाले पत्रों को जिन में ये बताने को लिखा होता है कि अभी आपने भेजा नहीं क्या किया , जवाब बिना दिये फैंका जा सकता है , मगर भगवान की फाइल खुली हुई है और उसको ये बंद नहीं कर सकते। हां इन्होंने प्रशासन और अधिकारीयों पर से , न्याय व्यवस्था पर से लोगों का भरोसा खत्म कर दिया है। जो एक बार इनकी असिलयत देख लेगा वो दोबारा कोई जनहित की अथवा देश की व्यवस्था की बदहाली की शिकायत कभी नहीं करेगा। ऐसे लोगों ने कितने अपराधियों को बचाया और कितने बेगुनाहों को अपमानित व प्रताड़ित किया इक दिन तो हिसाब होगा ही। 

 

अप्रैल 11, 2017

POST : 633 स्वच्छ भारत , स्वच्छ हरियाणा , स्वच्छ फतेहाबाद शहर ( डेढ साल बाद वही तस्वीर ) डॉ लोक सेतिया

2 7 नवंबर 2 0 1 5 को आखिर मैंने भी मुख्यमंत्री को शिकायत का पत्र लिख दिया। और साल तक वो शिकायत भटकती रही दफ्तर दफ्तर। साल पहले की ली कुछ तस्वीरें ये हैं।
 



 
ये सभी अधिकारीयों को अख़बार वालों को भेजता रहा।
सरकारी विज्ञापन छापने वालों को भला ये कैसे दिखाई देता।
मालूम नहीं किस तरह मेरी शिकायत को साल बाद दाखिल दफ्तर का दिया गया।
पिछले महीने खबर छपी उपयुक्त को शहर को स्व्च्छ आवारा पशु मुक्त और खुले में शौच मुक्त कराने पर इनाम पुरुस्कार मिला। तब की ताज़ा तस्वीरें ये भेजी मैंने सभी को।





मगर ये भी किसी को दिखाई नहीं दिया। कागज़ों पर सभी योजनायें हर सरकार की तरह।
दो दिन पहले फतेहाबाद के विधायक का फोन नंबर मिल गया और उनको फोन कर सब असलियत बताई।
उस दिन 9 अप्रैल की भी तस्वीरें ले लीं उनको दिखाने को जो ये हैं। 

कल 1 0 अप्रैल को जब विधायक जी को शिकायत का पत्र देने जाने लगा तब जो देखा सामने उसकी भी तस्वीर ले जाना उचित लगा और ये कल सुबह दस बजे की तस्वीर भी फोन में ले ली। जिस में नगरपरिषद वाले कूड़ा ट्रॉली में भर रहे और आधा वहीं आग लगा जला भी रहे थे।

 
दस बजे मैं विधायक जी के ऑफिस पहुंचा और शिकायत का पत्र दिया , बहुत आदर से पास बिठाया और चाय को पूछा। मैंने उनको पत्र दिया जिस को उन्होंने रख लिया , कहने लगे आप गंदगी से परेशान हैं। मैंने कहा नहीं मैं प्रशासन के तौर तरीकों से झूठ से और जनता की समस्याओं से परेशान हूं। चालीस साल से जनहित की बात लिख रहा मगर किसी शासक किसी अधिकारी पर कोई बदलाव दिखता नहीं। सब को अपना प्रचारित झूठ सच और जनता की असलियत झूठ लगती है। खैर उन्होंने फोन किया बिना अर्ज़ी को पढ़े ही नगरपरिषद प्रधान को कुछ इस तरह। " भाई ये डॉ साहब मेरे  पास बैठे हैं शिकायत कर रहे , आपका अपना वार्ड है मॉडल टाउन देखो "। कुछ समझे , जैसे उनको समस्या और इतने अरसे तक बदहाली की फ़िक्र नहीं , उनको तो विवश होकर फोन करना पड़ा जब कोई आया है। वास्तव में उनका ध्यान दो भगवा वेश धारी साधुओं की तरफ था जिनको वो पांच सौ रूपये दान देकर कोई पंचमुखी रुद्राक्ष ले रहे थे और उन से मंत्री बनाने को उनकी खातिर जप करने को कह रहे थे। शायद विपक्ष के विधायक को उनकी पूजा और आशिर्वाद ही मंत्री बनवा सकता है। अब जो खुद औरों से खुद अपने लिये सहायता चाहता हो मुझे उस से सहायता क्या मांगनी थी , मुझे तो उनको उनका कर्तव्य याद दिलाना था , कि आपका फ़र्ज़ है जनता की दशा देखना। मैंने उन्हें सब बताया भी दिखलाया भी आगे उनको मर्ज़ी है।  


अप्रैल 10, 2017

POST : 632 हमारे घोटाले शाकाहारी हैं ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    शाकाहारी घोटालों की सरकार ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

           देखो ये भाईचारा है इसको घूस लेना मत कहो। कोई आकर घर पर मिठाई की जगह नकद पैसे नेता या अधिकारी के घर इनके बच्चों को दे कर अपना कोई काम निकलवा जाता तो बुरा है क्या। सभा में मंत्री जी को महंगे उपहार भेंट करना अनुचित कहां है। सदभावना की खातिर स्वीकार करते हैं कोई मांग कर नहीं लेते। अब अगर हर सरकारी योजना का धन बड़ा अधिकारी अपने कुछ ख़ास चाटुकारों का एन जी ओ बनवा आबंटित करता है थोड़ा खुद भी बचाता है तो गलत क्या है। जनता की सहायता को है राशि तो क्या अधिकारी देश की जनता में शामिल नहीं है , जो उसके परिचित ख़ास लोग हैं वो भी जनता ही हैं। आप अफ्सरों द्वारा किसी दुकानदार से कोई वस्तु खरीद मोल नहीं चुकाने को अपराध नहीं साबित कर सकते। जब देने वाला खुद कहता है भला आपसे झोला भर सब्ज़ी और टोकरा भर फल प्रतिदिन लेने के हम पैसे वसूल कर सकते हैं। ऐसे में उस पर कृपा की दृष्टि रखना हमारा परम कर्तव्य बनता ही है। ऐसे कारोबार वाले के कानून तोड़ने या कायदे का पालन नहीं करने पर भला कोई सख्त करवाई की जा सकती है। उच्च अधिकारी क्या मंत्री तक भेजते रहें पत्र बार बार कि आपने क्या किया शिकायत पर , कौन जवाब देता है। उच्च अधिकारी या मंत्री भी पत्र लिख इतिश्री कर लेते हैं , सब इक दूजे की समस्या समझते हैं। जाने क्यों अभी तक ये नियम साफ नहीं किया गया है कि उपहार देना लेना हमारी पुरानी परंपरा रही है। इक अवैध निर्माण करने वाला नकद रिश्वत देने के विरुद्ध है , मगर अपने सरकारी ज़मीन पर अवैध कब्ज़े को अफ्सर के घर देसी घी का टीन और कुछ सामान अपने गांव से लाया शुद्ध बताकर देता है और अधिकारी खुश होकर उसका काम कर देता है। ये सब भाईचारा है , फिर भी आपको घोटाले लगते हैं तो ये विशुद्ध शाकाहारी हैं सेहत के लिये लाभकारी , कोई दुष्प्रभाव नहीं इनका। आजकल कोई घोटाला नहीं होता है बस प्रेम और भाईचारा बढ़ाने को थोड़ा लेन देन किया जाता है। ऐसा इक अध्यादेश जारी किया जाना चाहिए। सच जो है सबको समझाना चाहिए। आपको इक रुपया चाहिए और हमें पहले बस चार आना चाहिए। ये चलन अच्छा है इसको चलते जाना चाहिए। उपहार लेने देने को जायज़ बताना चाहिए , मतलब को ही सही इक दूजे के काम आना चाहिए। चोर चोरी करे बेशक उसे ईमानदार बताना चाहिए , चोरी के माल को मिलकर छुपाना चाहिए। जिसको हुनर आता हो इसका चौकीदार लाना चाहिए। लोग क्या कहते हैं छोड़ो लोगों को तोहमत लगाने का कोई न कोई बहाना चाहिए। बोझ सबको मिलकर उठाना चाहिए , लूटने का तौर तरीका सबको सिखाना चाहिए। दिन भर बाहर रहकर जो किया सब ठीक है , शाम ढलने को है घर लौट जाना चाहिए।  

अप्रैल 08, 2017

POST : 631 शब्द वही हैं अर्थ बदल गये हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    शब्द वही हैं अर्थ बदल गये हैं ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

बड़े बड़े पोस्टर सरकारी प्रचार के विज्ञापनों वाले दावा करते हैं आपका देश आपका शहर स्वच्छ हो रहा है , आपके शहर के अधिकारी को उत्कृष्ट कार्य का इनाम भी दिया जा चुका है। अब अगर आप अपने आस पास की बढ़ती गंदगी की तस्वीर उनको दिखाना चाहोगे तो उनको बुरा लगना ही है। आप आंखें बंद नहीं रखना जानते चुप रहना भी नहीं आता तो आप इन लोगों का नया शब्दकोष लेकर पढ़ लो नया अर्थ। इसी हर तरफ फैली गंदगी को आप स्वच्छ भारत अभियान नाम देकर देखो आपको कितनी ख़ुशी होगी। समझ जाओगे अच्छे दिन आ चुके हैं , आपको पता ही नहीं था अच्छे दिन शब्द का अर्थ क्या है। आपका दोष नहीं है आपने कभी देखे ही नहीं थे अच्छे दिन , अब बेशक सोचो इन अच्छे दिनों और उन खराब दिनों में फर्क कहां है। आपने सुना ये नया शासक दिन में अठाहर घंटे काम करता है , क्या काम करता है ये क्यों सोचते हो। अब आपको ये अधिकार थोड़ा है कि आप सूचना के अधिकार में ऐसे सवाल करो कि तीन साल के 1 0 9 5 दिनों में उन्होंने कितनी सभाओं में कितना समय भाषण देने में बिताया , कितने दिन किस किस देश की यात्रा की , किस किस धर्मस्थल क्या क्या दान किया क्या क्या पूजा पाठ किया। भला किस शासक को याद है दरिद्र नारायण की सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं होता और शासक अगर अपना फ़र्ज़ निभाता ईमानदारी से तो भगवान अपनी पूजा से कहीं अधिक खुश होता है। आपने तो पद ग्रहण करते देश के संविधान की शपथ ली थी , क्या उसकी याद रही , लोकतांत्रिक मूल्यों की चिंता कभी की। आप औरों पर परिवारवाद का आरोप लगाने वाले सभी राज्यों में किसी भी तरह अपना शासन कायम करना ही नहीं अपितु हर राज्य में अपने द्वारा मनोनित व्यक्ति को ही सत्ता सौंपते हुए वही सब करने लगे जिस की आलोचना करते थे। शायद आपके शब्दकोश में इसी को संविधानिक मर्यादा का पालन करना कहते हैं। आंतकवाद और कालाधन क्या खत्म हो गया , कितना काला धन पकड़ा आपने , जब खुद राजनैतिक दलों को सब छूट देनी थी तब ये तमाशा किया ही किसलिये। आपके दल के अपराधी भी माननीय हो गये और आप उनका प्रचार उनकी बढ़ाई कर करते रहे। झूठ की परिभाषा तक बदल कर रख दी आपने , बहुत खुश हैं हर तरफ आपकी धूम है। ऐसे में किसी की भूख किसी की चीख आपको क्या सुनाई देगी , अब जो ख़ुदकुशी कर रहे या जिनकी हालत बद से बदतर होती गई आपके शासन में , उनको कौन बताये यही अच्छे दिन हैं जो आने वाले हैं का शोर मचाकर आप आये थे। शायद आप भी वही मानते हैं कि जनता कहां याद रखती है क्या वादा किया किस नेता ने , लेकिन आप अभी से दो साल बाद फिर से चुनाव जीतने की चिंता में डूबे हुए हैं। अर्थात सत्ता ही आपका एक मात्र मकसद है , अन्यथा आपको फ़िक्र होती कि तीन साल पहले जो जो करने का संकल्प किया था उसको कितना पूरा किया और कैसे बाकी भी पूरा करना है। अगर सोचते और हिसाब लगाते तो जान पाते अभी कुछ भी नहीं बदला है। आज भी प्रशासन पुलिस सब निरंकुश हैं , आम आदमी आज भी डरा सहमा है , निराश है। आपके सरकारी विज्ञापनों में असली किसानों को वो अभिनेता उपदेश देता है जो खुद किसान कहलाने का झूठा प्रमाणपत्र जालसाज़ी से बनवा लाया था। किसी ने उस से सवाल किया जब जिस प्रमाणपत्र को दिखला आपने लोनावला में ज़मीन खरीदी थी जिसको किसान ही खरीद सकते थे , वही अदालत में फर्जीवाड़ा साबित हुई तो आपकी खरीदी ज़मीन अवैध क्यों नहीं है। याद आया आप शासक जब चाहे किसी अनुचित काम को उचित घोषित कर सकते हो। जैसे कल जिस रिहायशी जगह कारोबार करना गैर कानूनी था आज आपने कुछ पैसे लेकर उसको उचित करार दे दिया। एक दिन देश को संबोधित करते आपने कहा अब कभी काले धन को घोषित करने का अवसर नहीं दिया जायेगा और उसके ठीक बीस दिन बाद इक नयी योजना आधा आधा की ले आये। ये कैसी नैतिकता है क्या मूल्य हैं , आप करो तो पुण्य और करें तो पाप। अच्छा अच्छा ये अच्छे दिनों की तरह बदली परिभाषा है। शिक्षक दुविधा में हैं किस शब्दकोश से बच्चों को अर्थ समझायें , क्या मालूम आपके बाद कोई और आप से बढ़कर निकले और शब्दों के अर्थ क्या शब्द ही नये रचने लगे। लगता है आपको भी कोई नया इतिहास रचना है , ऐसा इतिहास जिस में बस आप नायक बाकी सब खलनायक हों।  लेकिन ध्यान रखना इधर लोग खलनायकों को ही नायक बनाने लगे हैं , मिसाल आपके सामने है। सब फ़िल्मकार यही आदर्श स्थापित कर अमीर बन रहे हैं , जब भगवा धारण कर व्यापार किया जा सकता है तब कुछ भी हो सकता है। कुछ भी हो सकता टीवी शो वाला भी आपका चाहने वाला है , मगर आपको मालूम तो है ना कि ऐसे दोस्त अच्छे नहीं होते जो आपको सच नहीं कह सकते हों। तब वास्तव में कभी भी कुछ भी हो सकता है। चलो शायद कभी नेता अधिकारी भी सच में बदल कर देशसेवक और ईमानदार बन जायें , कठिन तो है फिर भी उम्मीद करने में बुरा क्या है। हो सकता है अच्छे दिन सच को आ जायें , दिल को मज़बूत रखना कहीं ख़ुशी में जान ही नहीं चली जाये देखकर।

अप्रैल 04, 2017

POST : 630 दुनिया के यातायात के नियम ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   दुनिया के यातायात के नियम ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

    आप पैदल चलते हैं या किसी वाहन की सवारी कर सफर करते हैं आपको कुछ कायदे कुछ नियम समझने ज़रूरी होते ही हैं। बायीं तरफ चलना देख कर कदम रखना और ऊंचाई या निचाई फिसलन या धूल और गंदगी के इलावा जानवर आदि का ध्यान रखना होता है। सड़क पार करनी हो तब इधर उधर देख सही जगह से करना होता सुरक्षा की खातिर। जब आप वाहन चलाते हैं तब भी आपको बहुत बातों का ध्यान रखना होता है। किस गति से चलना किस तरफ कैसे मोड़ काटना सिग्नल पर रुकना और हैलमेट पहनना। आपको सिर्फ खुद अपने वाहन का ही ध्यान नहीं रखना होता , दायें बायें आगे पीछे चलते वाहनों का भी ख्याल रखते हैं। कभी सोचो अगर सब केवल खुद अपनी मर्ज़ी से इधर उधर होते बगैर सब को रास्ता देते चलने लगें तो कितना टकराव हो कितनी दुर्घटनायें घटती हैं ऐसी लापरवाही से। पुलिस हवालदार और जुर्माने का डर काफी मदद करता है खुद हमारी सुरक्षा में।

                         मगर क्या हम अधिकतर जीवन में इन बातों पर विचार करते हैं , जीने का सही तरीका भी वही है जब हम सब केवल अपनी सुविधा नहीं सभी की परेशानियों और अधिकारों की परवाह करें। कभी ध्यान देना हमारी अधिकतर समस्याओं की जड़ खुद हमारे अथवा किसी दूसरे के सामाजिक नियमों की अनदेखी करना होता है। मुझे जो चाहिए जैसे चाहिए की सोच उचित नहीं है , क्यों और किसलिए भी सोचना समझना ज़रूरी है। काश इतनी छोटी सी बात सभी समझ लें कि चाहे जो भी हो हमें सही राह पर चलना है , मुश्किलों से बचने को आसान रास्ते नहीं तलाश करने। कहने को बेशक हम सब दावा करते हों कोई अनुचित कार्य नहीं करने का , मगर वास्तविकता ये नहीं है। अगर हम अनुचित नहीं करते तो कोई हमारे कारण परेशान नहीं होता। खेद की बात तो ये है कि हम हर अनुचित काम उसको उचित ठहरा कर करते हैं। आप अपने घर के सामने सफाई रखते हैं और चुपके से या छिपकर अपनी गंदगी पड़ोसी के दरवाज़े के सामने या जहां कहीं चाहते हैं डाल देते हैं। कोई रोकता है तो हम समझते हैं वही गलत है , इस तरह हम चोरी और सीनाज़ोरी करते हैं। रिश्वत खाना और खिलाना दोनों अनुचित हैं , हम उचित काम भी अपनी सुविधा से करवाने को ऐसा मर्ज़ी से भी करते हैं और कभी विवश होकर भी। आपने रिश्वत देकर अपना काम ही नहीं करवाया अपने दूसरों के लिए भी मुश्किल खड़ी कर दी , क्योंकि आपने गलत लोगों की आदत बना दी घूस लेने की।

            सोचो अगर सरकारी अधिकारी अपना काम निष्पक्षता से पूरी इमानदारी से करते तो आज देश की ऐसी दुर्दशा कभी नहीं होती। चंद सिक्कों की खातिर अपना ईमान बेचकर कुछ मुट्ठी भर लोगों ने देश के करोड़ों लोगों के प्रति अपराध किया है। यही बात नेताओं की है , उद्योगपतियों कारोबारियों , सभी ने नैतिकता और सामाजिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाईं हैं। अध्यापक या डॉक्टर क्या इस लिये होते हैं कि शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा को मानव कल्याण के खिलाफ अपने मतलब के लिये इस कदर लूट खसूट का कारोबार बना देना चाहें। वकील और न्यायधीश न्याय को हैं अथवा अपनी ज़रूरत अपनी सुविधा अपनी आय ही सब से बड़ा धर्म है। कोई जो भी काम करता है उसको अपने कर्तव्य में ईमानदारी को महत्व देना होगा , जब कोई भी अपना फ़र्ज़ नहीं निभाता और अधिकार सब चाहते तब यही होना है जो आज होता दिखाई देता है।

           आम आदमी क्या तथाकथित महान कहलाने वाले लोग भी अपने मार्ग से भटके हुए हैं। धर्मप्रवचक उपदेशक खुद मोह माया और नाम शोहरत में उलझे हैं , आये थे हरिभजन को ओटन लगे कपास। क्या यही उपदेश है किसी भी धर्मग्रंथ में लिखा कि धर्मस्थल अपने पास धन दौलत के अंबार जमा करते रहें। दीन दुखियों की सेवा की बात किस को याद है। पत्रकारिता और लेखकों कलाकारों अभिनय करने वालों फिल्मकारों आदि को मालूम है उनको क्या आदर्श स्थापित करने हैं। समाज का आईना जब बिगड़ गया है और धन दौलत हासिल करना सफलता का पैमाना बन गया हो तब क्या होगा।  पथप्रदर्शक मार्ग से भटक गये हैं। शायद किसी को फुर्सत ही नहीं ये सोचे कि उसका अपना कर्तव्य सही ढंग से नहीं निभाना उसकी निजि बात नहीं है। हर मानव समाज का हिस्सा है और हर हिस्से को सही काम करना चाहिए। आप प्रकृति को देखें हवा पानी आग मिट्टी , पेड़ पौधे सूरज सब नियमित अपना अपना काम करते हैं , दुनिया तभी कायम है। आपके जिस्म में हर अंग अपना अपना काम ठीक करता है तभी हम ज़िंदा हैं , हाथ पांव क्या बदन का छोटे से छोटा भाग ठीक नहीं हो तब मुश्किल होती है।  जिस्म के अंदर भी मांस हड्डी रक्त और हृदय गुर्दे और फेफड़ों की तरह कितने और भाग हैं मस्तिष्क  की नाड़ियों से लेकर महीन ग्रन्थियों तक , सब अपना काम रात दिन करते हैं तभी जीवित हैं हम सब। यही नियम समाज का भी है , जब हम में कोई अंग रोगग्रस्त होता है बिमारी का असर सारे समाज पर पड़ता है।

                           शायद अब आप सोचोगे कि काश इंसान के लिये भी कोई कानून का पालन करवाने वाला हवालदार होता जो हर लाल बत्ती की तरह गलत दिशा में जाने से रोक देता। मगर वास्तव में ऐसा है , वो ईश्वर है या जो भी जिसने इंसान को बनाया है , उसने इक आत्मा इक रूह इक ज़मीर सभी में स्थापित किया है। मगर क्या हम अपनी अंतरात्मा अपने ज़मीर की आवाज़ सुनते हैं , ये फिर लाल बत्ती पर कोई हवालदार खड़ा नहीं होने पर सिग्नल तोड़ आगे निकल जाते हैं। सब जानते है उचित क्या है अनुचित क्या , पाप पुण्य का अंतर समझने को शिक्षित होना ज़रूरी नहीं है। जब भी किसी के साथ अन्याय करते हैं या किसी को उसका अधिकार नहीं देते तब हम जानते हैं ऐसा गलत है। हर धर्म यही समझाता है मगर हम खुद को धार्मिक बताने वाले धर्म-अधर्म में अंतर जानते हुए भी अनुचित मार्ग अपनाते हैं खुदगर्ज़ी में। लेकिन क्या हम सोचते हैं हमें अपने अपकर्मों की कर्तव्य नहीं निभाने की कोई सज़ा नहीं मिलेगी। ये खुद को धोखे में रखना है। आप बबूल बोते हैं तो आम कैसे खाओगे। आपका बीजा बीज इक दिन उगेगा पेड़ बनकर , अगले जन्म की बात नहीं है , इसी जन्म में सब को अपने अपकर्मों की सज़ा मिलती है ये कुदरत का नियम है जो किसी सरकारी कानून की तरह बदला नहीं जा सकता। हैरानी की बात ये है कि जब हम सभी को कोई दुःख कोई परेशानी होती है तब हम ये नहीं सोचते कि ऐसा अपने किसी अपकर्म के कारण तो नहीं हुआ , हम किसी और को दोषी ठहरा अपने आप को छलते हैं। सही यात्रा के लिये यातायात के नियम पालन करने की ही तरह सार्थक जीवन यात्रा जीवन में मानवीय मूल्यों का पालन कर ही संभव है। 
 

 

मार्च 28, 2017

POST : 629 कबूलनामा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

         कबूलनामा ( कविता ) डॉ लोक सेतिया


तमाम उम्र जीने का इक गुनाह किया है ,
हर रोज़ खुद अपने हाथ से ज़हर पिया है ,

मैं दुनिया में हर किसी का गुनाहगार हूं ,
न जाने कितना सभी से कर्ज़ लिया है ।

हर रोज़ अपनी नाकामी का गवाह रहा हूं  ,
चाहा जो आज तलक कर नहीं सका हूं ,

इक अपराधबोध है मेरा जीवन तमाम ,
जाने ये कैसी आग में दिन रात जला हूं ।

कुछ भी मैं मांगता तुझसे और मेरे खुदा ,
बस चाहता हूं खत्म कर दो जीने की सज़ा ,

शायद जी के नहीं मर कर ही दे सकूं कुछ ,
चुका सकूं कुछ तो कर्ज़ है यही इक इल्तिज़ा ।

आंसू मेरे भी शायद नहीं काम कर सके कोई ,
फरियाद किस तरह करूं जो सुन सके कोई ,

कैसे सभी से भीख क्षमा की मांगने को जाऊं ,
ये चाहता हूं मुझे कभी न माफ़ भी करे कोई ।
 

 



मार्च 26, 2017

POST : 628 कोई मुझे उसका पता बता दे ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

कोई मुझे उसका पता बता दे ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

कोई मुझे
उसका पता बता दे
जिस गांव जिस शहर
जिस राज्य में
कोई अधिकारी
खुद को राजा नहीं समझता ।

कोई सरकारी कर्मचारी
घूस नहीं चाहता हो
कोई थानेदार बेगुनाह पर
ज़ुल्म नहीं करता हो ।

किसी की फरियाद हाकिम
अनसुनी नहीं करता हो
किसी नागरिक को
अपने अधिकार भीख की तरह
मांगने नहीं पड़ते हों ।

जिस गली में
कोई गंदगी दिखाई नहीं देती हो
किसी तरह की भी गंदगी
जिस सरकारी दवाखाने में
कोई रोगी बिना इलाज
नहीं मरता हो ।

जिस अदालत में
न्याय इतने विलंब से
नहीं मिलता कि अन्याय लगे
जिस जगह
आम नागरिक होना
जुर्म नहीं समझा जाता हो ।

अभी तलक कोई नेता
कोई मंत्री कोई मुख्यमंत्री
कोई प्रधानमंत्री
मुझे भी बता दे वो जगह
जिस जगह को उसने वास्तव में
आज़ादी से जीने के काबिल
बना दिया हो ।

अब तो
मुझे पल दो पल
देखना है उस
सपनों के आज़ाद भारत
की तस्वीर को ज़िंदा रहते ।

वो ख्वाब जन्नत का
वो सपना स्वर्ग जैसे
सारे जहां से अच्छे वतन का सबका
किसी को कभी तो
सच हुआ आया ही होगा नज़र ।

मुझे देखना है
एक बार खुद जाकर
सभी सरकारी
विज्ञापनों वाला हिंदुस्तान
जिसकी खबर छपती है
हर अख़बार में अब । 
 

 

POST : 627 आम राय से फैसला ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

         आम राय से फैसला ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

                      दो पक्ष बन गये थे और तमाम प्रयास करने पर भी कोई निर्णय हो नहीं पा रहा था। उधर तारीख भी नज़दीक आती जा रही थी , सवाल आने वाले को पूरी तरह खुश करने को था। बस वो खुश होकर मनचाहा वरदान दे जाये मसीहा बनकर डूबती नैया को किनारे लगा जाये। इक टीम चुनी गई जिसको तय करना था कौन कौन सा फल टोकरी में डालकर भेंट करना , कौन कौन सा फूल गुलदस्ते में सजाना स्वागत में पेश करने को। कौन कौन सी मिठाई खिलानी और किस हलवाई की बनाई। सब चाहते थे सही चुनाव किया जाये , मगर तभी इक सदस्य ने आरोप लगाकर कि मुझपर दोनों पक्ष दबाव डाल रहे हैं उनकी पसंद की दुकान से कमीशन लेकर खरीदारी करने का। और ऐसे में हम निष्पक्ष होकर फैसला एकमत से नहीं कर सकते , ये बात दोनों पक्षों को सूचित कर दी गई। उसके बाद जो इतने दिनों से नहीं हो पा रहा था ठीक वक़्त पर हो गया। मगर ये कैसे हुआ ये इक राज़ की बात है। दोनों पक्षों की दो दुकानें हैं बाज़ार में सब्ज़ी की। जिस जिस को टीम में लिया गया था वो सब भी अलग अलग फल बेचते हैं। दो फल महंगे लगे उनको छोड़ दिया गया बाकी हर फल का एक एक पीस शामिल कर लिया टोकरी में। फूल और मिठाई पर मतभेद होना लाज़मी था , जो मधुमेह रोग से पीड़ित थे उनको कठिनाई थी सामने होते पसंद का मिष्ठान नहीं खाना परहेज़ की खातिर। बाकी जगह चुप चाप छुप कर स्वाद ले लेते थे पर सब के सामने करना मुश्किल था। फूल भी कुछ लोग सुगंध से एलर्जी के कारण पास नहीं देख सकते थे , और ये भी लगा कि फूलों को तोड़ना गलत है साथ ये मिलते भी बहुत महंगे दाम हैं। इसलिए सब्ज़ियों का इक टोकरा सजाया गया जो मसीहा को दिया जाना है जिसका उपयोग वो बाद में कर सकेगा।

                        प्याज़ आलू भिंडी बैंगन मूली गाजर खीरा गोभी सब को मिला दिया गया , मिक्स वेज का काम और साथ में सलाद भी। और सब मान भी गये , सब की दुकान से कुछ न कुछ शामिल किया गया। जब भरी सभा में उनको भेंट किया गया तो उनको पसंद आया ये नुस्खा , उन्होंने पूछा ये असंभव कार्य किस तरह संभव हुआ , सब को साधना सहज नहीं होता। तब किसी ने उनको इक पुरानी कहानी पढ़कर सुनाई। एक बार किसी बड़े आदमी के खानसामा से बेहद महंगी कोई डिश बेस्वाद बन गई , अब फिर से सब सामान मंगवाना आसान नहीं था और कुछ ही देर में महमान आने को थे। खानसामा ने बाकी सब खाने का सामने रख दिया मगर उस डिश को आखिर में खिलाने को रख लिया। साथ में इक तेज़ नशे की शराब भी पिलाने को प्रस्तुत करता गया। शराब के नशे में धुत सब महमान जो जैसा था खाते गये , आखिर में उस डिश को सभी को अपने हाथ से खिलाने को सुंदर महिलायें सोलह श्रृंगार किये बुलाई गईं। खाने वाले स्वाद से अधिक उनके सौंदर्य का रस पीते रहे और सब को उस बिना स्वाद की डिश सब से अच्छी लगी। बस कुछ इसी तरह सब को खुश किया गया उनको इशारे से समझाया गया।

                     कहानी का अंत हुआ नहीं था , मामला अभी भी अदालत और पंचायत दोनों का पास लटका हुआ है। कोई था जो अड़ा हुआ था कि समझौता नहीं इंसाफ होना चाहिए। और इंसाफ है कि छुपने को जगह तलाश करता फिरता है। घटना सच्ची है मगर हमेशा की तरह सच बोलना नहीं है आपस की बात है। दिन क्या है और क्या रात है। बारिश के मौसम में भी हुई नहीं बरसात है , कौन है गुनहगार सब को मालूम है , पेचीदा मामला है हर किसी का हाथ है कोई नहीं लगाता लात है। घात लगाने वाले को भी लगी घात है। देखते हैं अभी तो नई शुरुआत है।

POST : 625 परस्तिश की आदत हो गई ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

       परस्तिश की आदत हो गई ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

कल किसी ने प्रधानमंत्री मोदी जी की महिमा का बखान करते हुए उसको मसीहा तक घोषित कर दिया। इतना काफी नहीं था , उसके बाद यह तक लिख डाला अगर ये मसीहा कुछ नहीं कर सकता तो कोई दूसरा मसीहा कभी नहीं आयेगा फिर। बहुत बातें ध्यान में आईं जो शायद इस संदेश भेजने वाले को पता ही नहीं हों। दिन में अठाहर घंटे काम करना और खुद को प्रथम देशसेवक बताना सब से पहले बिना प्रचार या अहंकार अगर किसी ने किया तो वो जवाहर लाल नेहरू जी ने। मैं किसी व्यक्ति का उपासक नहीं हूं , जब नेहरू जी का देहांत हुआ तब मैं मात्र तेरह बरस का छोटा सा बच्चा था। नेहरू जी का जन्म दिन बाल दिवस के रूप में तब भी मनाया जाता था , क्योंकि उनका बच्चों से बेहद प्यार चर्चा में था। ये शायद उसी का असर था कि मैंने पहली कविता नेहरू जी पर लिखी थी। सताइस मई को याद करो चल बसे थे चाचा प्यारे। मगर स्कूल में कार्यक्रम में कई दिन तैयारी करवाने के बाद ठीक समय पर अध्यापक ने मुझे मंच पर जाने से रोक दिया था क्योंकि मैं इक गांव का रहने वाला छात्र पेंट नहीं पायजामा डाल सभास्थल पर चला आया था। आज इक बात सोचता हूं क्या आज किसी के वेशभूषा से पहनावे से भेदभाव किया जाये तो सोशल मीडिया में शोर मच जाता। मेरे मन में वो बात आज तक गहरी से बैठी है जो तब किसी को बताने का साहस तक नहीं कर पाया था। मगर आज बात नेहरू जी और देश की करनी है। शायद यहां ये साफ़ करना ज़रूरी है कि युवक होते मेरी मानसिक परिपक्वता देश समाज और राजनीति को समझना तब शुरू हुआ जब 1975 में इंदिरा गांधी का समय था। और कुछ चाटुकार व्यक्ति पूजक उनको देवी बताने लगे थे। मैं तब से ऐसी राजनीति का विरोधी रहा हूं और नेता ही नहीं कोई खिलाड़ी या अभिनेता भी जब बहुत लोगों को विशेषकर टीवी अख़बार वालों को भगवान लगता है तब मुझे वो इक गुलामी की मानसिकता लगता है। ये सभी अपने अपने मकसद को अपना काम करते हैं निस्वार्थ कुछ भी नहीं , इंसान बन जाना बड़ी बात है भगवान नहीं बन सकते। आपको आज धर्म-ग्रन्थ की परिभाषा बताना शायद सही होगा , देवता वो लोग होते हैं जो अपना सब लोगों में बांटते हैं , और दैत्य वो जो औरों से सब छीन लेना चाहते हैं , राक्षसी स्वभाव आपको सत्ता का साफ दिखाई दे सकता है , हर सत्ताधारी हज़ार लोगों से अधिक खुद चाहता है, उपयोग करता है  , तब भी उसकी हवस मिटती नहीं। तीन साल में मुझे मोदी जी की सरकार में जो जो उनका दावा था वो कहीं वास्तव में दिखाई नहीं देता। भ्र्ष्टाचार और जनता से अभद्र व्यवहार आज भी आपको पहले की तरह मिलेगा जाकर देखो कभी सरकारी दफ्तर। ट्विट्टर  और व्हाट्सऐप से आपको असिलयत दिखाई नहीं दे सकती है। नेहरू जी की गलतियां आपको पता होंगी जिन में जीप घोटाला और पंजाब के मुख्यमंत्री प्रतापसिंह कैरों पर कठोर करवाई नहीं करने से लेकर कश्मीर समस्या तक की बात है। शायद उनका पंचशील समझौता भी कुछ लोगों को इक गलती लगता है , जो पड़ोसी देशों से किया गया था शांति की खातिर। क्या उनका विचार गलत था कि जो देश आज़ाद हुए हैं उनको देश के विकास पर ध्यान देना चाहिए जंग पर हथियारों पर धन बर्बाद नहीं करना चाहिए। मगर उनके भरोसे को तोड़ा गया चीन द्वारा आक्रमण कर के सीमा पर और 1962 की उस हार ने देश और देश की जनता को बेहद विचलित किया था। उसकी टीस अभी भी बाकी है। आपको मालूम है आज देश जिस दिशा में बढ़ता जा रहा है उसको निर्धारित किस ने किया था। वो नेहरू जी थे जिन्होंने तय किया कि बांध बनाना कारखाने लगाना और समय के साथ कदम मिलाकर आगे बढ़ना है। परमाणु विज्ञान की बात पर आलोचना हुई कि देश की गरीबी मिटाने से पहले परमाणु बंब पर धन खर्च करना कितना उचित है।  मगर वो चाहते थे दोनों काम साथ साथ हों , विज्ञान भी आगे बढ़ता रहे और देश की समस्याओं पर योजनाएं भी चलती रहें। उन्होंने कभी नहीं कहा कि उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने देश की आज़ादी में अपना सब दे दिया था , जैसे आजकल लोग कुछ किये बिना घोषणा करते हैं हमारा जीवन देश को समर्पित है। जब कि उनका ध्येय सत्ता का विस्तार और खुद को एक मात्र देशभक्त कहलाना है। मोदी राज में स्वच्छता अभियान से लेकर हर योजना प्रचार में ही दिखाई देती है , जनता का धन खर्च कर विज्ञापनों पर , धरातल में कहीं नहीं। गंदगी हर जगह है और व्यक्तिवाद की परकाष्ठा है जब हर राज्य में मुख्यमंत्री विधायक नहीं दो चार लोग मनोनित करते हैं। मोदी जी में बहुत कुछ अच्छा होगा मगर लोकतंत्र के प्रति आदर कदापि नहीं है। बस संसद की चौखट पर माथा टेकना काफी नहीं , जब आपको संसद को जवाब देना था आप जनसभा में भाषण देकर लोकतांत्रिक मर्यादा की खिल्ली उड़ाते रहे। आपको खतरा है जान का , इतनी सुरक्षा में ऐसा कहना क्या जनता को बरगलाना है , नेहरू जी के साथ इक सिपाही मात्र डंडा लिए होता था और वो पैदल टहलते हुए अपने ग्रह मंत्री के घर किसी समस्या पर बात करने चले जाते थे। किसी नेता को प्यार मिलना और विश्वास हासिल होना बड़ी बात है , सत्ता पर रहते जयजयकार होना बड़ी बात नहीं होती। इस बात से कोई असहमत नहीं हो सकता कि भारत में लोकतंत्र की नींव मज़बूत करने और लोकतांत्रिक मूल्यों को स्थापित करने में नेहरू जी का बहुत योगदान रहा है। परिपक्ष की संख्या बेशक कितनी कम रही हो तब भी विपक्ष की बात को अनसुना कभी नहीं किया जाता था। आज कोई प्रधानमंत्री किसी विपक्षी दल के नेता का इस तरह आदर शायद ही दे सकता हो जैसे नेहरू जी ने अटल बिहारी वाजपेयी जी को लेकर कहा था आप ज़रूर कभी देश के महान नेता कहलाओगे , काश आप हमारे दल में होते। आज के नेता इक दूसरे को नीचा बताने में ज़रा भी संकोच नहीं करते। बेशक नेहरू इक धनवान परिवार में पैदा हुए और देश के गरीबों की दशा को मुमकिन है ठीक से नहीं समझ सके , मगर उनमें अभिमान या सत्ता का अहंकार रहा हो कभी ऐसा उनके विरोधी भी नहीं कह सके। ये उनकी स्थापित लोकतांत्रिक मर्यादा ही थी कि उन्होंने अपने परिवार से या दल से किसी को अपना उत्तराधिकारी घोषित करने का कोई प्रयास नहीं किया था। शायद बहुत कम लोग जानते हैं कि जब नेहरू के बाद सांसद अपना नया नेता चुनने को सभा कर रहे थे तब लाल बहादुर शास्त्री जी जब पंहुचे तब उनको कोई खाली कुर्सी नज़र नहीं आई और वो प्रवेशद्वार से नीचे आती सीढ़ियों पर ही बैठ गये थे। जब किसी नेता ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा तब सब की नज़रें उनको तलाश करने लगीं और तब किसी ने शास्त्री जी को बताया आप को अगली पंक्ति में जाना है आपका नाम का प्रस्ताव किया गया है। ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी आम परिवार के सदस्य को चुना गया था काबलियत को देखकर , बिना किसी की कृपा के। आजकल जैसे पहले से निर्धारित किया जाता है कि दल के बड़े नेताओं द्वारा तय व्यक्ति के नाम पर विधायक अथवा सांसद केवल मोहर लगाते हैं उसको संविधान और लोकतंत्र का उपहास ही नहीं निरादर कहना होगा। जिन को गलतफहमी है मोदी जी चाय वाले से देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे हैं उनको पता होना चाहिए कि उनको गुजरात का मुख्यमंत्री पद भी बिना जनता द्वरा चुने इक संस्था द्वारा अपना प्रचारक होने के कारण मिला था और जब 2014 के चुनाव में प्रधानमंत्री पद का दल का नेता घोषित करना था तब भी वही दोहराया गया। तभी से मीडिया और कुछ सुविधा संम्पन लोग उनके नाम की माला जपने लगे थे बिना ये समझे कि ऐसा करना कितना खतरनाक हो सकता है। यही पहले इंदिरा गांधी के लिए किया गया था और इंदिरा इस इंडिया तक कहने लगे थे चाटुकार लोग ठीक इसी तरह जैसे आज मोदी मोदी रट रहे हैं। अभी तक जो समझ आता है वो इंदिरा गांधी की ही तरह लगता है। खुद को देश में गरीबों की मसीहा ही नहीं चौगम और गुट-निरपेक्ष देशों की सब से बड़ी नेता कहलाने की महत्वाकांक्षा में तमाम आयोजन विश्व बैंक और आई एम एफ से कर्ज़ लेकर करवाना। सत्ता और जब अंकुशरहित पूर्ण सत्ता मिलती है तब शासक के विस्तारवादी होने की चाहत होना इक खतरा होता है।  शायद मोदी जी उसी दिशा में अग्रसर हैं। मगर विडंबना देखिये जिन लोगों ने मोदी जी को आगे बढ़ाया मोदी जी को कोई भी उनमें अपने से ऊंचा नहीं लगा तभी उनको , महात्मा गांधी और सरदार पटेल की प्रतिमाओं को स्थापित करना पड़ा, उधार लेकर । ये महान लोग किसी दल के नहीं देश के होते हैं , मगर इनको अपने स्वार्थ की राजनीति में उपयोग करना उचित नहीं।  नेहरू जी को मोदी कभी उस तरह सामने नहीं लाना चाहेंगे क्योंकि ऐसा उनकी राजनीति और एकछत्र शासन की महत्वाकांक्षा के हित के बीच आता है।  ये भी इक विसंगति है एक धोती में सादगी से रहने वाले गांधी की बात करने वाला क्या शान से सज धज कर रहता है 15 एकड़ के बंगले में और सत्ता मिलते ही करोड़ रूपये की चंदन की लकड़ी किसी मंदिर में सरकारी ख़ज़ाने से दान देता है। जो लोग नेहरू जी की विलासिता की बात करते हैं कि उनके कपड़े विलायत से ड्रायक्लीन होकर आते थे उनको पता होना चाहिए ऐसा उनकी निजि आमदनी से हुआ था देश के ख़ज़ाने से नहीं। इक और घटना शायद नेहरू के व्यक्तित्व को और साफ करती है , उनके सहायक रहे इक अधिकारी ने लिखा है अपनी किताब में कि जब वो साक्षात्कार देने गये तब खुद नेहरू जी उठकर पहले दरवाज़ा खोला अंदर आने को फिर साक्षात्कार के बाद दोबारा शिष्टाचार निभाने दरवाज़े तक छोड़ने आये थे। देश की सब से बड़ी कुर्सी पर बैठा व्यक्ति इस तरह विनम्र हो सकता है , ये तब वास्तव में था। आज कहना पड़ता है हम को जीत मिली है तो विनम्र होना चाहिए , ऐसी विनम्रता खुद आप में अभी तलक मुझे तो नज़र नहीं आई मोदी जी। मैं किसी दल का समर्थक नहीं , विरोधी नहीं। मगर किसी को खुदा या फरिश्ता नहीं मानता। नेता लोग देवता नहीं होते फिर दोहराता हूं। इक शेर बशीर बद्र जी का।

                         सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा ,
                        इतना मत चाहो उसे , वो बेवफ़ा हो जायेगा।   

 

मार्च 24, 2017

POST : 624 अकेले चलना है अपने सफर में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   अकेले चलना है अपने सफर में ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

मैं क्या करूं  , किधर जाऊं , सब खुदा बने हुए हैं , आदमी कोई है ही नहीं जिस से कोई बात कहूं। ये शहर इशारों का शहर है , मुझे इक मित्र की ग़ज़ल का इक शेर याद आता है। दिन भर भटकता ही रहा कोई बात तो करे , मुझको थी क्या खबर ये इशारों का शहर है। इशारे गूंगे लोगों की भाषा होती है , मैं बोलता हूं , बोल सकता हूं , मैंने सीखी ही नहीं ऐसी भाषा। इशारों इशारों में दिल लेने वाले बता ये हुनर तूने सीखा कहां से। महफ़िल में चला जाता हूं भूले से कभी कभी , नहीं समझता तौर तरीके आजकल की दुनिया के। सब दावा करते हैं कोई उनका आदर्श है वही उसके अनुयायी हैं भक्त हैं। और अपना कॉपी राईट चाहते उस नाम पर अपनी दुकान चलाने को। देश धर्म क्या पशु पक्षी तक सब को बांट दिया है। जिसे देखो वही पहाड़ पर चढ़ना चाहता है , ये सोचता है कि ऊंचाई पर खड़ा होने से उसका कद बड़ा हो जायेगा। कोई नहीं समझता कि पहाड़ पर चढ़ बौना आदमी और बौना दिखाई देता है। मुझे पहाड़ पर चढ़ने का शौक नहीं है , ज़मीन पे रहना चाहता , पहाड़ों से फिसलते देखा है अक्सर लोगों को। ये और बात है कि लोग रसातल में गिरने को भी मानते हैं आकाश को पा लिया है। कथनी और करनी में ऐसा विरोधभास देख मुझे घबराहट होती है। जो खुद अपने आप को नहीं पहचानते वो कहते हैं आपको भगवान से मिलवा देंगें। मैं बड़ा कहलाना चाहता हूं चाहना खुद अपने आप को छोटा बनाता है। विडंबना है लोग पल भर में अपनी सोच बदल लेते हैं , जो नहीं करना कभी कहते , अगले ही पल वही करते नज़र आते हैं। चेहरा कुछ है मुखौटा कोई और लगा रखा है। ऐसी झूठी नकली दुनिया में कोई किस तरह जी सकता है। मुझे हर बार यही समझ आया है ऐसे लोगों के बीच रहने से कहीं अच्छा है , अकेले रहना। न काहू से दोस्ती न काहू से बैर।  
 

 

मार्च 23, 2017

POST : 624 अमर शहीदों की याद में ( श्रधासुमन ) डॉ लोक सेतिया

    अमर शहीदों की याद में ( श्रधासुमन ) डॉ लोक सेतिया

देश की आज़ादी का इतिहास बिना कुछ मुकदमों के नहीं लिखा जा सकता। ऐसे आज़ादी के मुकदमों पर इक किताब जाने माने साहित्यकार बालमुकुंद अग्रवाल जी की लिखी हुई है। उस में भगत सिंह राजगुरु सुखदेव पर चले मुकदमें के इलावा गांधी सुभाष और अन्य लोगों पर चलाये अंग्रेजों द्वारा मुख्य मुकदमों की जानकारी है।
भगत सिंह जी के मुकदमें की बात लिखने से पहले कुछ शब्द जवाहर लाल नेहरू जी की जीवनी से उद्यत किये गये हैं। जो ये हैं :-

              भगत सिंह एक प्रतीक बन गए थे। उनका कार्य ( सांडर्स की हत्या ) भुला दिया गया , लेकिन प्रतीक याद रहा और कुछ ही महीनों में पंजाब के शहर और गांव में तथा कुछ हद तक बाकी भारत में भी उनका नाम गूंजने लगा। उन पर अनेकों गीत रचे गये और उनको जो लोकप्रियता मिली वह अद्वितीय थी।
    कुछ लोग बिना पूरी जानकारी दो अलग अलग तरह की विचारधारा के आंदोलनों को परस्पर विरोधी बताते हैं , जो सही नहीं है। सब का अपना महत्व है और सभी का मकसद एक ही था। मंज़िल एक थी रास्ते अलग अलग थे। जो गांधी सुभाष भगतसिंह को अपना अपना कहते हैं अपने हित साधने को बांटते हैं वो किसी भी देशभक्त की भावना को नहीं समझते। आज अधिक नहीं कहते हुए कुछ जाने माने शायरों के कलाम से समझने का प्रयास करते हैं , आज़ादी का अर्थ क्या है।

                इक़बाल के शेर :-


अपनी हिकमत के खम-ओ-पेच में उलझा ऐसा ,
आज तक फैसला-ए -नफ़ा-ओ-ज़रर न कर सका।

उठा कर फैंक दो बाहर गली से , नई तहज़ीब के अण्डे हैं गंदे।
इलेक्शन मिम्बरी कौंसिल सदारत , बनाये खूब आज़ादी के फंदे।


          जाँनिसार अख्तर के शेर :-


जल गया अपना नशेमन तो कोई बात नहीं , देखना ये है कि अब आग किधर लगती है।
सारी दुनिया में गरीबों का लहू बहता है , हर ज़मीं मुझको मेरे खून से तर लगती है।

वतन से इश्क़ गरीबी से बैर अम्न से प्यार , सभी ने ओड़ रखे हैं नकाब जितने हैं।

         दुष्यंत कुमार के शेर :-


परिन्दे अब भी पर तोले हुए हैं , हवा में सनसनी घोले हुए हैं।
ग़ज़ब है सच को सच कहते  नहीं वो , कुरानो-उपनिषद खोले हुए हैं।

ये रौशनी है हक़ीक़त में एक छल लोगो , कि जैसे जल में झलकता हुआ महल लोगो।
किसी भी कौम की तारिख के उजाले में , तुम्हारे दिन है किसी रात की नकल लोगो।

           आखिर में कुछ शेर मेरी ग़ज़लों से भी पेश हैं :-  ( डॉ लोक सेतिया "तनहा" )


तुम्हें ताली बजाने को सभी नेता बुलाते हैं , भले कैसा लगे तुमको तमाशा खूब था कहना।
नहीं कोई भी हक देंगे तुम्हें खैरात बस देंगे , वो देने भीख आयें जब हमें सब मिल गया कहना।

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई , हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई। 
 

 

मार्च 22, 2017

POST : 623 बात मतलब की , पते की बात नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  बात मतलब की , पते की बात नहीं ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया 

न्याय क्या है आजकल इसको नहीं देखना चाहते लोग। सच की डगर चलना आसान नें बहुत कठिन है। लोग आसान राह चाहते हैं मुश्किल यही है , आसान रास्तों से मंज़िल मिल जाये ये मुमकिन नहीं है। देश की सब से बड़ी अदालत भी वही कहती है जो मेरे शहर का पुलिस का दरोगा कहता है। क्या मिलेगा कोर्ट कचहरी धक्के खाकर मिल बैठ समझौता कर लो सब मुसीबत से छुटकारा पाओ। इस युग में सत्यमेव जयते सिर्फ इक लिखा हुआ वाक्य है जिस को कोई नहीं पढ़ता। कुर्सी के पीछे की बात पढ़ना संभव ही नहीं है , शायद यही शब्द यही वाक्य कुर्सी पर बैठे अधिकारी नेता मंत्री न्यायधीश को सामने हर वक़्त पढ़ने को मिलते तो उनपर कुछ प्रभाव पड़ता भी। जब दो पक्ष लड़ते हैं और समझते हैं हम सही दूसरा गलत है , तब कोई न्याय दोनों को पसंद कैसे  आ सकता है। ऐसे में देश की अदालत अगर कई साल तक खामोश बैठी रहने के बाद मात्र सुझाव देती है किसी गांव की बिरादरी की पंचायत की तरह कि अच्छा है मिल बैठ सब भाई समझौता कर लो। चाहो तो हम बीच में मध्यस्थता को राज़ी हैं। भारत पाकिस्तान में अमेरिका कभी समझौता नहीं करवाना चाहेगा , उसका फायदा हमारी लड़ाई जारी रहने में है। अमेरिका भारत का मित्र नहीं हथियार का सब से बड़ा सौदागर है , और भारत और पाकिस्तान उसके खरीदार , बिल्लियों की लड़ाई में बंदर बन सब खुद खाना उसका मकसद रहा है।

                        न्याय कभी अधूरा नहीं होता , आधा सच झूठ होता है। खेद की बात है अगर देश की सब से बड़ी अदालत इंसाफ नहीं समझौता पसंद है। आप कैसे राजनीति से अपराधीकरण को खत्म करोगे अगर आप चुप चाप लोकतंत्र की हत्या होते देखते हैं। जब विधायक नहीं कोई और निर्णय करता है कौन उनका नेता और मुख्यमंत्री बनेगा तब लोकतंत्र कहां बचता है। मनोनित लोग शासन करें और निर्वाचित हाशिये पर बैठ ताली बजायें तब लोकतंत्र और संविधान के साथ क्रूर उपहास ही किया जा रहा होता है। 
 

 

मार्च 21, 2017

POST : 622 फिर एक और सर्वदलीय बैठक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   फिर एक और सर्वदलीय बैठक ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 सुप्रीम कोर्ट में इक सरफिरे की याचिका पर चुनाव आयोग ने हलफनामा दायर कर कहा है कि वो निष्पक्ष चुनाव के लिए प्रतिबद्ध है और याचिका दायर करने वाले की बात  से सहमत है। पिछली बार सर्वदलीय बैठक एकमत थी कि विधायकों सांसदों मंत्रियों आला अधिकारियों का वेतन भत्ते सुविधायें और कई गुणा बढ़ाना देश की जनता की गरीबी जैसी समस्याओं को मिटाने को अतिअवश्यक है। सुप्रीम कोर्ट जाने क्यों बार बार आपराधिक और दागदार नेताओं को राजनीति से बाहर निकलना चाहता है , जब कि सब अपराधी विश्वास करते हैं यही अदालत उनको किसी दिन निर्दोष घोषित करेगी। न्याय की देवी की आंखों पर काली पट्टी बंधी इसी लिये है , समझ नहीं आता सब अपना घर छोड़ दूसरे के घर में तांक झांक क्यों करते हैं। सुप्रीम कोर्ट को पहले अदालतों का हाल देख उसको ठीक करना चाहिए , औरों को नसीहत देने से पहले अपने गिरेबान में झांक लेना चाहिए। जो खुद शीशे के घर में रहते हों उनको दूसरों पर पत्थर नहीं फैंकने चाहियें। मंच संचालक आज की सर्वदलीय बैठक की शुरुआत करते ये उदगार व्यक्त कर रहे थे , और उसके बाद बारी बारी सभी नेता गंभीर समस्या का निदान खोज रहे थे अपना अपना मत प्रकट कर संबोधन  में। इक वरिष्ठ नेता ने सवाल किया जब महिलाओं को उनकी आबादी के समान स्थान नहीं मिलने पर आरक्षण की बात की जाती है तब अपराधी क्या देश के नागरिक नहीं हैं। सभी दलों में तीस प्रतिशत उमीदवार आपराधिक पृष्ठ भूमि से होते हैं , जनता खुद भी अपराधी है ऐसे अपराधियों को पसंद करती अपने सर पर बिठाती और जितवाती है। जब हम इस विचारधारा को मानते हैं कि पाप से घृणा करो पापी से नहीं , तब अपराधी से नफरत किसलिये। अपराध करना उनका कारोबार है पेशा है , और राजनीति उनकी देशसेवा है।

              याचिका दायर करने वाले का कहना है कि नेताओं के आपराधिक मुकदमों की एक साल में सुनवाई करवा जल्द फैसला किया जाये और दो साल की सज़ा मिलने पर उम्र भर का परिबंध चुनाव लड़ने पर लग जाये। ये तो पक्षपात होगा , जनता को भी बराबरी का हक है न्याय पाने का , जैसे किसी ने बीमा करवाया हुआ और जब ऑपरेशन की ज़रूरत हो बीमा कंपनी भुगतान नहीं करती। उसके बाद सात सात साल कोई इंतज़ार करता रहे खर्च किये पैसे वसूल करने को , जब मिलें तब डेढ़ लाख की कीमत जब खर्च हुए से इतनी कम हो चुकी हो कि मुकदमा करने वाला पछताता हो।  क्या ऐसे मुकदमों की सुनवाई जल्दी नहीं की जानी चाहिए। इक नेता का सवाल था क्या हर वोटर वोट देने से पहले शपथ खा सकता है कि उसने कभी कोई अपराध नहीं किया है। क्या घूस देना सिफारिश करवाना अनुचित नहीं है , पहले जनता को खुद अपनी बेगुनाही साबित करनी चाहिए तब नेताओं पर दोष लगाना चाहिए। 

                अपराध भी इक हिस्सा है समाज के बहुत सारे बाकी कामों की तरह , और ये जितना कमाई वाला है उतना ही जोखिम वाला भी। ये भी याद रखना ज़रूरी है कि अपराधी बेशक जनसंख्या का पांच प्रतिशत हों , उनके कारण कितने लोगों की रोज़ी रोटी चलती है। पुलिस वकील न्यायपालिका सब का काम अपराध के सहारे चलता है। अपराधी अपराध छोड़ देंगे तो ये सब क्या करेंगे। फिर भी हम नेता अदालत का सम्मान करते रहे हैं करते रहेंगे। जल्दबाज़ी में कोई फैसला लागू नहीं किया जाना चाहिए , इस युग में ढूध का धुला कोई नहीं है। मगर हम सभी को घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है , चुनाव आयोग किसी के चुनाव लड़ने पर क्या रोक लगायेगा , जब संविधान के अनुसार कभी किसी विधानसभा के विधायक अपना नेता तक चुनने को आज़ाद नहीं हैं। हर नेता खुद इक बंधुआ मज़दूर की तरह है , आलाकमान का हुक्म सर्वोपरि है। क्या किसी अदालत को ये अलोकतंत्र दिखाई नहीं देता , हम छोटे अपराधी हैं किसी जुर्म में आरोपित हैं , जो देश के संविधान को बंधक बनाये हुए हैं , विधायकों सांसदों को अपनी मर्ज़ी से नेता तक नहीं चुनने देते उनका अपराध क्या है। कोई जनहित याचिका ऐसे अनुचित लोकतंत्र विरोधी फैसलों पर क्यों नहीं दायर की जाती। चलो इक नया नया शेर सुनाता हूं :-

                       मतलूब सब हाकिम बने , तालिब नहीं कोई यहां ,
                       कैसे बताएं अब तुम्हें कैसी सियासत बन  गई ।

                     चुनाव आयोग और न्यायपालिका को सब से पहले संविधान और लोकतंत्र की रक्षा पर ध्यान देना चाहिए। हम लोग अपराधी थे , शायद अब अपराध छोड़ चुके हैं , जो खुलेआम खिलवाड़ कर रहे हैं , जनता के निर्वाचित प्रितिनिधियों से इतर किसी को मनोनयन से सत्ता पर बिठाना , उन को रोकना प्राथमिकता होनी चाहिए। कठपुतलियों का शासन लोकतांत्रिक नहीं है।

    लो इक ताज़ा खबर , सर्वोच्च न्यायालय सुझाव देता है , आप सभी पक्ष बाहर मिल बैठ समझौता कर लो , अगर ज़रूरत हो हम मध्यस्थ बनने को राज़ी हैं। वाह ! देश की सुप्रीम कोर्ट अब न्याय नहीं समझौता करवायेगी। इसका अर्थ क्या है , आपको क्यों सब को राज़ी करना है , आप न्याय करें। इतने साल तक सब आपकी तरफ देख रहे थे न्याय की खातिर। अब न्याय होगा या किसी गांव की पंचायत की तरह फैसला। नेताओ डरने की कोई ज़रूरत नहीं हमें भरोसा है कोई अदालत हम में किसी का कुछ नहीं बिगाड़ सकती। ऐसे न्यायधीश होते थे कभी गुज़रे ज़माने में जो तब की प्रधानमंत्री के चुनाव तक को अवैध करार कर देते थे। इंसाफ आजकजल नहीं होता , बस समझौते की राह देखते हैं।  सच कहना अपराध है , अवमानना है।
                     

मार्च 20, 2017

POST : 621 खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया "तनहा"

     खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई ( ग़ज़ल ) 

                        डॉ लोक सेतिया "तनहा"

खामोश रहना जब हमारी एक आदत बन गई
हर सांस पर पहरे लगाना सब की चाहत बन गई ।

इंसान की कीमत नहीं सिक्कों के इस बाज़ार में
सामान दुनिया का सभी की अब ज़रूरत बन गई ।

बेनाम खत लिक्खे हुए कितने छुपा कर रख दिये
वो शख्स जाने कब मिले जिसकी अमानत बन गई ।

मतलूब सब हाकिम बने तालिब नहीं कोई यहां
कैसे बताएं अब तुम्हें ऐसी सियासत बन गई ।

( मतलूब=मनोनित। तालिब=निर्वाचित )

अनमोल रख कर नाम खुद बिकने चले बाज़ार में
देखो हमारे दौर की कैसी कहावत बन गई ।

सब दर्द बन जाते ग़ज़ल , खुशियां बनीं कविता नई
मैंने कहानी जब लिखी पैग़ामे-उल्फ़त बन गई ।

लिखता रहा बेबाक सच " तनहा " ज़माना कह रहा
ऐसे  किसी की ज़िंदगी कैसी इबादत बन गई ।   
 

 

मार्च 19, 2017

POST : 620 सर्वेक्षण सेल्फी और पति की कीमत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

 सर्वेक्षण सेल्फी और पति की कीमत ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

                  सर्वेक्षण इक कारोबार है , सर्वेक्षण केवल चुनावों के ही नहीं किये जाते। जिनका धंधा है सर्वेक्षण करने का , कोई उन से जो चाहे सर्वेक्षण करवा सकता है। कोई भी सर्वेक्षण मुफ्त में नहीं होता , इस धंधे में कोई भाईचारा काम नहीं आता। एक हाथ दो दूसरे हाथ लो का नियम है , घाटे का व्योपार यहां नहीं होता। इधर दो बातें प्रचलन में हैं इक सेल्फी लेना दूसरी ऑनलाइन बेचना खरीदना। नई क्या पुरानी हर चीज़ बिकती है , किसी ने चेतावनी दी कि आपकी धर्मपत्नी आपकी फोटो ले रही हो तो संभल जायें , कहीं ऐसा नहीं हो कोई ओ एल एक्स पर मोलभाव कर रहा हो। आपको खबर तक नहीं हो और आपका सौदा तय हो चुका हो। पति अपनी पत्नी को जुए में दांव पर लगाते रहे हैं ये इतिहास पुराना है। कुछ साल पहले इक फिल्म में सहनायिका नायिका से उसके शादीशुदा पति का सौदा दो करोड़ में कर लेती है। सहसा यकीन नहीं होता , अपने पति परमेश्वर को बेच सकती कोई पत्नी खुद सौतन ला सकती घर। मगर पता चला फिल्मों से प्रेरित होकर जाने लोग क्या क्या नहीं करते। इक कंपनी जो सर्वेक्षण करवाती है को लगा ये नया आईडिया उसको खूब लोकप्रिय कर सकता है , और उस ने हमसे इक गोपनीय तरीके से ये सर्वेक्षण करने को कहा। हमने भी गोपनीयता की शपथ खाई सर्वेक्षण में शामिल हर महिला के सामने कि बंद लिफ़ाफ़े बिना नाम इक मतपेटी में डलवा बाद  में खोलने हैं।  सारे लिफ़ाफ़े एक जैसे होंगे ताकि हम भी न जान पायें किस का कौन सा लिफाफा है।

          अभी तक हम सर्वेक्षण कर चुके थे , फैशन , उत्पाद का रंग , पैकिंग , नाम को लेकर। इक कंपनी ने सर्वेक्षण करवाया और अपना नाम तक बदल लिया जो लोगों को बेहतर लगा रख लिया। आजकल लड़का लड़की क्या पसंद करते विवाह करने के अवसर पर , इक महिलाओं की पत्रिका ने ये भी सर्वेक्षण करवाया था। ये नहीं बताया जा सकता कौन कौन शामिल था और किस तरह संपर्क किया गया , मगर सर्वेक्षण बेचने वाली और खरीदार दोनों तरह की महिलाओं को मिलकर किया गया। बंद लिफाफों में क्या क्या क्या मिला सुन आप चौंक जाओगे। कुछ बातें जो निकली कुछ इस तरह की हैं। किसी ने सवाल लिखा था भला कोई करोड़पति महिला शादी ही क्यों करना चाहेगी , करोड़पति को पति की क्या ज़रूरत। फिर भी लेना होगा तो नया ही लेगी उपयोग किया सेकंड हैंड पति तो हर्गिज़ नहीं। दस लाख में डॉक्टर बीस में इंजीनियर पचास  में आई पी एस और एक करोड़ में आई ए एस बिकता है , इस से ऊंचे दाम में उद्योगपति क्या नेतापुत्र मिलते हैं। और अगर कोई फ़िल्मी नायक जैसा ईमानदार है तो आधे दाम भी कोई क्यों लेगी। मोल चुकाना है पूरा तो नया ही पसंद करेंगे , किसी का इस्तेमाल किया क्यों। फर्नीचर पंखें किताबें खरीद लेते सस्ती मिलती जब लगती नई सी हों।
इक और के विचार यूं भी पढ़ने को मिले , मेरा पति ईमानदार भी नहीं है , वेतन से दोगुनी ऊपरी कमाई है , ठीक ठाक काम भी देता ही है , फिर भी दो करोड़ क्या कोई एक करोड़ में खरीदना चाहती हो तो मौका नहीं गवाउंगीं। मैं व्योपारी पिता की होनहार समझदार बेटी हूं , जानती हूं पिता भी खुश होंगे जब पता चलेगा दो लाख में खरीद लाये जिसको पांच साल बरत कर भी करोड़ में बिक भी गया।

           तीसरी और आगे निकल गई , लिखती है मुफ्त में भी कोई नहीं लेगा इस निकम्मे को। जब से शादी की मैं खिला रही कमाकर। मेरी कमाई को शराब में उड़ाता है और पीकर मुझे ही पीटता भी है , ऐसे से पिंड छूटे तो चैन से रहूंगी अकेली। बहुत सारी पत्नियों ने लिखा क्यों ऐसा मज़ाक करते हैं , कोई और भला इसको पसंद करेगी।  मैं ही पागल थी जो फंस गई इनके जाल में , ये भी जानते हैं दूसरी कोई नहीं मिल सकती तभी मेरी उंगलियों पे नाचते हैं। इक और ने इतना ही लिखा था , काश ऐसा हो सकता। मेरा ऐसा नसीब कहां।

मार्च 18, 2017

POST : 619 मीठा ज़हर , शब्दों का उलटफेर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 मीठा ज़हर , शब्दों का उलटफेर ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

                   आप कितना कमीशन लोगे  , आपको इतनी छूट देंगे , साथ में अमुक उपहार मिलेगा , इस  में आपको मुफ्त में और बहुत फायदा भी मिलेगा। ये सब बातें एक जैसी ही हैं , बेचने खरीदने की बात है। प्रलोभन देना कोई उचित कार्य नहीं होता , सीधे हाथ नहीं निकलता घी तब चालाक लोग समझदारी से टेड़ी उंगली से निकाल लेते हैं। समस्या ये है कि सब बेईमान खुद को ईमानदार कहलाना चाहते हैं , गुड़ खाना गुलगुलों से परहेज़ करना जैसी बात है। कभी सोचा है देश में जितने भी घोटाले हुए हैं , किसी ने किसी को साफ बोला होगा कि मंत्री जी आप हमें ये दिलवा दो हम आपको इतने करोड़ की घूस देंगे। नहीं , ऐसा कहा जाता होगा इस काम में आपको मुनाफे से इतना दिया जायेगा। इधर ऐसे अनुचित अनैतिक कामों को लोग प्रोफेशन बताने लगे हैं जो पाप को पुण्य , झूठ को सच , अधर्म को धर्म घोषित करना है। हालात इस सीमा तक खराब हैं कि लोग मानते हैं सब बिकते हैं सब को खरीदा जा सकता है। छोटा क्लर्क थोड़े में , बड़ा बाबू कुछ ज़्यादा में , अफ्सर ऊंचे दाम में , मंत्री मुंह मांगी कीमत में बिकते हैं। बड़ा जूता ज़्यादा पोलिश खाता है , चपरासी तक सब को समझाता है। मुझे अगर कोई आकर कहे आप मेरे पास ग्राहक भेजने की कितनी कमीशन लोगे तो मेरा दिल चाहेगा उसको झन्नाटेदार झापड़ रसीद करना। मुझे अपमान लगेगा जब कोई मेरी कीमत लगाना चाहेगा , मुझे मेरे ज़मीर को सिक्कों में तोलना चाहेगा। मुझे जब कोई डॉक्टर बताता है कि जिस की दुकान  में बैठ मरीज़ देखता था उस से दवा और जांच को लिखे टेस्ट से हुई आमदनी से कमीशन लेना बाकी है , और कोई झगड़ा नहीं है , तब समझ नहीं आता ये क्या है। इस तरह तो चोर का थानेदार को आधा हिस्सा देना भी अपराध नहीं आपसी भाईचारा है। सुनते थे सब से बहुमूल्य वस्तु या इंसान वो होता है जिस की कोई कीमत नहीं लगा सकता , जो आपको कितनी बड़ी राशि चुकाकर भी मिल नहीं सके। जो बिकाऊ नहीं है। लोग सिर्फ पैसे से ही नहीं बिकते , कुछ को धन दौलत या महंगा उपहार नहीं कोई सम्मान कोई ओहदा कोई तमग़ा चाहिए होता है। उनको इनाम पुरूस्कार से खरीद सकते हैं , सरकार और नेता बहुत लोगों को लाभ देकर खामोश करवाते हैं। जब कोई प्रशासन से आर्थिक फायदा भी लेता है और आलोचना भी करता है तब अधिकारी उसको बुलाकर साफ कहता है ये नहीं चलेगा। खाओ भी गुर्राओ भी। शायद इस से अपमानजनक गाली कोई नहीं हो सकती , मगर लोग हैं यही करते रहते हैं लाज शर्म छोड़कर। कभी लोग कहते हैं हमारे बारे जो बिना किसी स्वार्थ कड़वा सच लिखते हैं , आप प्रैक्टिकल नहीं हैं। आपको चुभने वाले शब्द नहीं उपयोग करने चाहिएं , थोड़ा लिहाज़ कर सभ्य ढंग से काला नहीं सांवरा सलौना लिखा जा सकता है। 

 

मार्च 15, 2017

POST : 618 लाठी भैंस को ले गई ( हास्य कविता ) डॉ लोक सेतिया

 लाठी भैंस को ले गई (  हास्य कविता )  डॉ लोक सेतिया

भैंस मेरी भी उसी दिन खेत चरने को गई
साथ थी सारी बिरादरी संग संग वो गई ।

बंसी बजाता था कोई दिल जीतने को वहां
सुनकर मधुर बांसुरी  सुध बुध तो गई ।

नाचने लग रहे थे गधे भी देश भर में ही
और शमशान में भी थी हलचल हो गई ।

शहर शहर भीड़ का कोहराम इतना हुआ
जैसे किसी तूफ़ान में उड़ सब बस्ती ही गई ।

तालाब में कीचड़ में खिले हुए थे कमल
कीचड़ में हर भैंस सनकर इक सी हो गई ।

शाम भी थी हुई सब रस्ते भी बंद थे मगर
वापस नहीं पहुंची भैंस किस तरफ को गई ।

सत्ता की लाठी की सरकार देखो बन गई
हाथ लाठी जिसके भैंस उसी की हो गई । 
 

 

मार्च 13, 2017

POST : 617 बोलना भी है मना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

        बोलना भी है मना ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया       

       बोलना मना नहीं है मगर आपको वही कहना होगा जो हम चाहते सुनना। किस्से अलग अलग हैं एक ही समय की बातें हैं और सभी मतलब एक जैसा ही नहीं एक समान ही है। घर से शहर के सरकारी दफ्तर से शुरू हुई बात राज्य की राजधानी होती हुई देश की सरकार तलक जा पहुंचती है। जिस बात पर मुझ को लताड़ मिलती है , और कोई काम नहीं आपको सरकार और प्रशासन की कमियां ढूंढते रहते हैं , वही बात जब टीवी पर कोई कहता है तो पसंद की जाती है। पूछ लिया ये वही बात तो है , जैसा मैं कह रहा था , जवाब मिलता है उनकी बात और है वो चर्चित लेखक नाम शोहरत दौलत और देश भर में पहचान है। तुम कहां वो कहां। मुझे मेरी औकात समझा रहे हैं , अब समझा बात सही या गलत अथवा उचित अनुचित की नहीं है। छोटा मुंह बड़ी बात का मामला है। पहले अपना कद अपना रुतबा ऊंचा करूं तब बड़े लोगों की वास्तविकता पर बोल सकता हूं। बोलना मना है।

                    महिला दिवस पर शहर के प्रशासनिक अधिकारी सब काम छोड़ ऑफिस में एक साथ बैठे टीवी पर उस सभा का सीधा प्रसारण देख रहे हैं जिस में दूसरे राज्य के इक नगर में प्रधानमंत्री जी को अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर भाषण देना है। यही सब से ज़रूरी काम है बाकी प्रशासनिक कर्तव्य अनावश्यक हैं। उसी आयोजन में भाग लेने ज़िले के एक बड़े अधिकारी गये हुए हैं साथ इक महिला ज़िले के इक गांव की सरपंच कार्यक्रम में व्याख्यान देने गई हुई हैं। सीधा प्रसारण हो रहा है , अचानक इक महिला अपना विरोध जताना चाहती है प्रधानमंत्री जी को मिलकर बताना चाहती है कि उनका पी एम ओ बार बार निवेदन करने पर भी उसके गांव की समस्या सुन नहीं रहा है। मगर उस महिला को महिला दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में महिला दिवस के दिन बलपूर्वक सुरक्षाकर्मी बाहर निकाल देते हैं। इक प्रधानमंत्री जो खुद को जनता का सेवक बताता है भूल जाता है उसने शपथ ली थी सब से न्याय की और सब के मौलिक अधिकारों की रक्षा की। देश भर के मीडिया वाले इस आपराधिक तमाशे को ख़ामोशी से देखते हैं , बस हंगामे की तस्वीर लेते हैं। कोई सवाल नहीं करता अपने विचारों को अभिव्यक्त करने की स्वतन्त्रता का , न ही याद दिलाता है प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा आये दिन सोशल मीडिया पर अपने अच्छे कामों का बखान करते रहने का , ऐसा सच छुपाया जाता है कोई नहीं जान पाता। सच बोलना मना जो है।

             एक और भी पक्ष है जिसको तथाकथित स्वतंत्र मीडिया न खुद देखना चाहता है न किसी को दिखाना चाहता है। सरकारी विज्ञापनों की हड्डी मिलती रहती है जुबां सिल जाती हैं आंखें मोतियाबिंद की शिकार हो जाती हैं। काश आज कोई इनको पत्रकारिता का पहला सबक फिर से पढ़वा याद करवाये , जिस में समाचार की परिभाषा लिखी हुई है जो भूल गये हैं सब पत्रकार। खबर वो सूचना है जिसे कोई छुपा रहा जनता से और पत्रकार को उसका पता लगाकर खोजकर जन  जन तक पहुंचना है। पीत-पत्रकारिता किसे कहते हैं ये भी समझना होगा , क्या मीडिया पीलियाग्रस्त है आज , सोचना होगा। खबर क्या है , जो सामने है शहर की गली गली गंदगी आवारा पशु हर सड़क पर और झुग्गी झौपड़ी वालों की मज़बूरी खुले में शौच को जाने की , अथवा प्रशासन का झूठा दावा स्वच्छता अभियान और शहर को खुले में शौच और आवारा पशुओं से मुक्त करवा चुके हैं का एलान। इतना ही नहीं बिना किये ही इन सब के लिए किसी बड़े अधिकारी का सम्मानित और पुरस्कृत होना। इक आडंबर एक छल एक धोखा हर योजना के साथ यही खेल। बस इक चलता फिरता शौचालय सड़क किनारे खड़ा कर दिया नाम को , हज़ारों लोग जिन के पास शौचालय नहीं क्या हर दिन कई किलोमीटर चलकर आ सकते हैं बच्चे महिलायें भी। सच सब देखते हैं जानते हैं बोलना मना है। 

                         इधर अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर राज्य में सरकार और विपक्ष मिलकर समारोह में शामिल होते हैं। पूर्व में मंत्री रही महिला आज की इक मंत्री महिला पर तंज कसती हैं , आप बोलोगी महिला अधिकार पर जिनके नाम पर सब काम काज उसके पति परमेश्वर देखते हैं। खुद कठपुतली हो पति के हाथ की और महिलाओं को सक्षम बनाने की बात करोगी भी कैसे। तू-तू मैं-मैं की तकरार में महिला खुद महिला को नीचा दिखाती है। ये सच किसी से भी छुपा नहीं है कि राजनीति में महिला प्रवेश करती है तो किसी पुरुष का सहारा लेकर , पति पिता भाई सास ससुर नहीं तो कोई प्रेमी ही सही। यही इतिहास है , राजनीति खुद ऐसी औलाद है जिस को पता ही नहीं उसको पैदा किस ने किया। सत्ता रुपी माता को तो पहचानते हैं सब राजनेता , जिस कर्तव्य रुपी पिता के कारण जन्म हुआ उसका नाम तलक कोई नहीं जानता। सच ही कहा जाता है कि राजनीति और वैश्यावृति दुनिया के दो सब से पुराने धंधे हैं और दोनों में बहुत समानताएं हैं। मगर आज की वैश्या भी खुद को राजनेता से अच्छा मान सकती है खुद अपना जिस्म बेचती है ईमान नहीं। राजनेता खुद अपना ज़मीर ही नहीं बेचते देश तक को बेच सकते हैं। और देश के संविधान की इस्मत को रोज़ तार तार करते हैं , मगर सर्वोच्च अदालत लताड़ लगाये तब भी शर्मिंदा नहीं होते। पिछले पंचायत चुनाव में जब शिक्षा का नियम लागू किया गया तब आज तक सरपंच बनते रहे लोग अपने अनपढ़ पुत्र के लिये आनन फानन में पढ़ी लिखी लड़की ढूंढ उसको बहु बना लाये चुनाव से पहले। गांव में बियाह कर आई नई नवेली बहु को गांव वालों ने अपना सरपंच चुना क्योंकि वही सब से काबिल समझी गई गांव का भला करने को। पंचायत में आरक्षण लागू करने वाली किसी सरकार ने संसद में इसको लागू नहीं किया न ही अपने दल में ही इक तिहाई महिलाओं को खड़ा किया चुनाव में।  मगर बिना आरक्षण मांगे सभी दल वालों ने इस बार पांच राज्यों के चुनाव में एक तिहाई से अधिक आपराधिक छवि वाले बाहुबली लोगों को अपना प्रत्याशी बनाया , हत्या बलात्कार , अपहरण के दोषी सब को लोकप्रिय दिखाई दिये जो जीत सकते हैं और उनको बहुमत दिलवा सकते हैं। महिला सशक्तिकरण हो न हो राजनीति में अपराधी काम नहीं होने चाहियें ऐसा सब मानते हैं। अपराध क्या है , गरीब जो भी विवशता में करता गुनाह है , नेता अफ्सर और धनवान वही चोरी अपने को अमीर बनाने को करते हैं तो उसको देश और समाज की सेवा घोषित किया जाता है। न्याय और कानून सब के लिए एक समान कहां हैं। मगर चुप रहो कहीं किसी अदालत की अवमानना नहीं हो। वो अगर लाठियां बरसायें तो कानून है ये , हाथ अगर उसका छुवें आप तो वो दंगा है। राजा नंगा है। बोलना अपराध है , मना है बोलना।

            मुझे इक लेखक मित्र का फोन आया कौन कौन शामिल होगा राज्य की राजधानी में साहित्य अकादमी के तीन दिवस के हरियाणा साहित्य संगम नाम के आयोजन के कार्यक्रम में।  पूछा कब है , हमें तो जानकारी नहीं है , यूं भी खुद को साहित्यकार का तमग़ा लगाना कभी ज़रूरी समझा ही नहीं। जाने क्या सोचकर थोड़ी देर बाद अकादमी के दफ्तर में फोन किया और जो बात कर रहे थे उनसे इस बारे पूछा। मैं कौन बोल रहा पूछा उन्होंने और कहने लगे आपको निमंत्रित करना कैसे भूल गये निदेशक जी , आप मुझे अपना व्हाट्सऐप नंबर दो अभी भेजता आपको निमंत्रण। मैंने सवाल किया आप जानते हैं मुझे , जवाब मिला आपकी भेजी रचनाओं से मेलबॉक्स भरा हुआ है , क्या कमाल लिखते हैं बेबाक और निडरता पूर्वक। धन्यवाद आपको पसंद आया मेरा लेखन , यही कहना ही था।  निमंत्रण भेजने की बात को टाल दिया ये कहकर आपने खुद जब आने का आग्रह किया है तो वही बहुत है निमंत्रण पत्र की औपचारिकता की ज़रूरत नहीं , आना होगा तो बिना निमंत्रण पत्र भी चला आऊंगा। कार्यक्रम उन लेखकों की खातिर हर साल आयोजित किया जाता है जिनको सम्मान या पुरुस्कार देने होते हैं।

                                      मेरे शहर में कई साल पहले इक प्रशासनिक अधिकारी ने अपने समकक्ष इक और राज्य के अधिकारी से मिलकर इक आयोजन किया था। जिस में दो राज्यों की साहित्य अकादमियों का संगम हुआ था मगर उस में वास्तविक ध्येय उन दो अधिकारियों को महान साहित्यकार घोषित किये जाने का हुआ। हम इस राज्य और शहर के लेखक मात्र दर्शक और श्रोता बनकर शामिल हुए। ठीक समय पर मेरे शहर के अधिकारी ने मुझसे पूछा क्या आप को भी मंच पर स्थान चाहिए और अपनी रचनायें सुना सकते हैं। मैंने कहा महोदय आप जानते हैं मेरे साथ कुछ और भी स्थानीय लेखक मित्र हैं , मैं इस तरह अकेला ऐसा नहीं कर सकता , फिर भी आप कहो तो दो और लेखक साथ के शहर
S
से आये हुए हैं आपके बुलावे पर आप उनको तो अवसर दे सकते हैं। उस आयोजन में उनको सम्मानित किया गया या यूं कहना होगा उन्होंने खुद को सम्मानित करवाया था , क्योंकि हमारे साहित्यिक मंच को भी उनको इक प्रशस्तिपत्र और स्मृतिचिन्ह देने का उनका अनुरोध हम ने स्वीकार किया ही था। उस दिन की बात मैंने इक कविता में लिखी थी। जो  कुछ इस तरह है , इक लेखक को सम्मानित किया सरकार ने और उनको पुरुस्कार के साथ इक सवर्ण जड़ित कलम भी भेंट की गई। जब कभी वो गरीबों की बात लिखना चाहते उनका हाथ कांपने लगता , शायद ऐसे किसी डर से या न जाने क्यों उन्होंने वही कलम मुझे भेज दी शुभकामना के साथ। मैं देखा उस कलम को जिस में मुझे लाल रंग की स्याही में दिखाई दिया लहू गरीबों का जिन के कल्याण की राशि से ऐसा आयोजन हुआ था। जब वो अधिकारी जाने लगे शहर से तबादला होने से , तब उन्होंने मुझे बुलवाया था ऑफिस में और इक चैक दिया था इस निर्देश के साथ के इस पैसे से हमारी संस्था इक कार्यक्रम आयोजित करे जिस में उनको मुख्य मेहमान बनाकर आमंत्रित किया जाये। वो चैक नहीं लिया था मैंने जो रेडक्रोस फंड से दिया जा रहा था हर किसी को जबकि उसका उपयोग किया स्वास्थ्य सेवाओं पर जाना चाहिए।

            सत्ता मिलते ही सत्ताधारी नेता अपने चाटुकार लोगों को साहित्य अकादमी , महिला आयोग , मानव अधिकार आयोग , नगर की समितियों आदि सब जगह पर नियुक्त करते हैं। और इस में भेद भाव नहीं करने या निष्पक्षता की ली शपथ कहीं उलझन नहीं बनती है। सत्ता का दुरूपयोग केवल योजनाओं का पैसा अपना घर भरने को उपयोग करना नहीं है। हर मुख्यमंत्री प्रधानमंत्री विधायक सांसद कल्याण राशि का सच जनता है। अव्यवस्था इस युग की व्यवस्था है। मगर ये बोलने पर सख्त मनाही है।