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जून 21, 2026

POST : 2078 वे कर रहे हैं गुफ़्तगू ( योग रोग बन गया है ) डॉ लोक सेतिया

   वे कर रहे हैं गुफ़्तगू ( योग रोग बन गया है ) डॉ लोक सेतिया  

शायर दुष्यंत कुमार की याद आई है , कहते हैं ' वे कर रहे हैं इश्क़ पर संजीदा गुफ़्तगू , मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है '।  आखिर में पूरी ग़ज़ल पढ़ना , अभी ध्यान जिस तरफ है उस की बात करते हैं। सुबह सुबह सैर पर जाते दूर कहीं से योग दिवस पर भाषण की आवाज़ सुनाई दे रही थी पार्क के एंट्रेंस पर भी कोई योग से किसी सीमेंट कंपनी से जोड़ कर अपना कारोबार करता दिखाई दिया और पार्क में महिलाओं की टोली का फोटो अपने बैनर के साथ लेकर वापस अपने ठिकाने चला गया। पार्क में घूमते घूमते कोई पिता दिवस पर ख़ास छूट खून की जांच इत्यादि में दस हज़ार के टेस्ट दो हज़ार में का उपहार घोषित कर रहा था। आस पास कितने ही लोग विशेष अवसर पर आयोजित आयोजन को कैमरे में कैद कर रहे थे। योग दिवस की धूम मची हुई है कौन इस में शामिल नहीं होगा मगर मेरा दुष्यंत कुमार की तरह कहीं और ध्यान है। सब कुछ तो याद नहीं कुछ कुछ ध्यान में अभी तक भी है , कॉलेज के दिनों स्वामी विवेकानंद जी की ज्ञान योग कर्म योग ध्यान योग की कुछ किताबें पढ़ने को मिली थी। उन में बताया गया था योग का अभिप्राय संयम संयमित आचार विचार व्यवहार से खुद अपने पर भाषा से सामाजिक व्यवहार तक कितना कुछ शामिल है। योग केवल इक शारीरिक व्यायाम की बात नहीं है और आसान तो कदापि नहीं हैं कठोर साधना और मन मस्तिष्क पर नियंत्रण रखना आवश्यक है। आप गीता को योग से जोड़ते हैं जबकि गीता का योग बिल्कुल अलग बात है , हमने शब्दों को सुना पढ़ा और जैसा चाहा उपयोग करना शुरू कर दिया है। आधुनिक संदर्भ में योग को स्वास्थ्य से जोड़ने पर ध्यान है जिस में सरकार के साथ तमाम लोग शामिल हैं मगर क्या इस पर सही ढंग से शोध और विमर्श किया जाता है। 
 
निरोगी काया ही नहीं स्वास्थ्य में मानसिक ही नहीं सामाजिक आचरण में भी कुछ नियमों कुछ मूल्यों को अपनाना होता है। सत्य और नैतिक आदर्शों को अपने जीवन में सबसे पहले महत्व देकर सभी जीव जंतुओं पेड़ पक्षी प्रकृति से तालमेल बिठाना होता है। ईमानदारी से देखा जाये तो आधुनिक समाज भौतिक स्वरूप में भले बेहतर लगता हो मगर आध्यात्मिक और नैतिक रूप से भीतर से खोखला और गंभीर बीमार लगता है। हमने लगता है आडंबर करने को कितने ही दिन मनाने की परंपरा बनाई है लेकिन किसी भी को लेकर वास्तविक चिंतन मनन करने को हमारे पर वक़्त ही नहीं है बस कुछ पल को औपचरिकता निभाते हैं। सोशल मीडिया की तस्वीरों की बातें वास्तविक सामाजिक जीवन में दिखाई नहीं देती हैं। कहीं हम किसी भेड़चाल या ऐसी मानसिकता के शिकार तो नहीं हो गए हैं जिस में रेगिस्तान में चमकती रेत को पानी समझ दौड़ते दौड़ते प्यासे मरने की राह पर चल पड़े हैं। 
 
हमने अपने देश और समाज के वास्तविक रोग को जाना नहीं समझा नहीं और नीम हकीमों की तरह हर रोग का ईलाज योग को समझने लगे।  गीता का ज्ञान योगी बनने को कहता है कर्तव्य पथ पर निरपेक्ष भाव से कर्म करने को कौन अपना कौन नहीं की बात को छोड़ सत्य और धर्म को सामने रखना है।  आज का आधुनिक योग अपने स्वार्थ अपनी कामनाओं अपनी वासनाओं पर काबू पाने की बात नहीं समझाता है। आप योग मुद्रा में भी सोचते देखते समझते चाहते कुछ और ही हैं आपका अंतर्मन भटकता है आप हो कर भी नहीं हैं। रोज़मर्रा के कार्य में आपको सत्य असत्य सही अनुचित से अधिक चिंता अपने लाभ हानि की रहती है योग से कुछ भी बदलाव नहीं हुआ जीवन में । कोल्हू के बैल की तरह हम उसी इक परिधि में घूमते रहते हैं इक रस्सी से बंधे हुए। योगी कहलाते हैं चाहते हैं भोगी बनकर सभी कुछ हासिल कर आनंदित होना , ये विरोधाभासी चलन इक साथ कैसे हो। श्री आर पी शर्मा महृषि जी किसी शायर की तज़मीन इस तरह करते हैं। 
 

जिसको देखो वही हिर्सो - हवा का रोगी 

है सदाचार के बहरूप में कोई भोगी 

उसकी साज़िश की शिकार आज भी सीता होगी ,

' ये अलग बात है कि बना फिरता है जोगी 

आज के दौर में हर शख़्स है रावण की तरह। 

( राम प्रसाद शर्मा महृषि )  

 
 

ग़ज़ल : दुष्यंत कुमार  

 
वो आदमी नहीं है मुक़म्मल बयान है 
माथे पे उसके चोट का गहरा निशान है। 
 
वे कर रहे हैं इश्क़ पे संजीदा गुफ़्तगू 
मैं क्या बताऊं मेरा कहीं और ध्यान है। 
 
सामन कुछ नहीं है फ़टेहाल है मगर ,
झोले में उसके पास कोई संविधान है ।  
 
उस सिरफ़िरे को यूं नहीं बहला सकेंगे आप ,
वो आदमी नया है मगर सावधान है ।  
 
फिसले जो इस जगह तो लुढ़कते चले गए 
हमको पता नहीं था कि इतनी ढलान है । 
 
देखे हैं हमने दौर कई अब ख़बर नहीं 
पांवों तले ज़मीन है या आसमान है । 
 
वो आदमी मिला था मुझे उसकी बात से 
ऐसा लगा कि वो भी बहुत बेज़ुबान है । 
 
 

 
 
 
 
  


 
 
 

जून 13, 2026

POST : 2075 झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

 झूठ सच से बड़ा हो गया ( हास्य - व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया  

खोटा सिक्का बाज़ार में चल गया है , चमक दमक कर साबित खरा हो गया है , कैसा ग़ज़ब इधर हो गया है झूठ सच से बड़ा हो गया है। इक व्यंग्यकार ने बहुत पहले लिखा था कि सच और झूठ इक नदी में नहाने गए थे , शायद बनारस की बात थी , सच नहा रहा था झूठ ने उसका लिबास चुराया और पहन कर चल दिया , जब सच बाहर निकला नदी से नहाकर तो वहां झूठ का लिबास पड़ा हुआ था भला सच झूठ का लिबास कैसे पहनता , इसलिए वो नंगा ही खड़ा रह गया अभी तलक भी सच नंगा है तभी कहलाता है । समय के साथ कथाएं कहानियां अपना स्वरूप बदलती रहती हैं आधुनिक युग में झूठ की क्या बात है , राजा बोला रात है रानी बोली रात है मंत्री बोला रात है संतरी बोला रात है , ये सुबह सुबह की बात है । नकली झूठे लोकतंत्र को सभी ने एकमत से असली घोषित कर दिया है सभी संस्थाओं संगठनों ने झूठ का दामन थाम लिया है उसको अपना आका मान लिया है । चुनाव आयोग से सर्वोच्च न्यायालय ने अपना आचरण तौर तरीका बदल लिया है झूठ की शरण में ख़ुद को समर्पित कर अपनी हस्ती को मिटा दिया है , खुद को बेच कर सभी ने सब कुछ पा लिया है , सच किसी काम का नहीं सभी ने आज़मा लिया है बीच मझधार नाख़ुदा को ही अपना ख़ुदा मान लिया है । झूठ बिना इस दुनिया में जीना मुश्किल है इस सच्चाई को जान लिया है , कौन है जो डुबो कर सभी को अपनों की नैया पार लगाता है उसको पहचान लिया है । कोई सभी से पूछता है क्या आपने उसको देखा है जिस के हम मामा हैं जो हमको यहां लेकर आया था खुद को मेरा बतलाया था मुझे मामा कहकर बुलाया था । भरोसा किया था उसको अपना झोला पकड़वाया था उसने हमको मामा नहीं उल्लू बनाया था कोई ठग था बातों से उलझाया था , अंजाम सभी कुछ लुटवाया था । 
 
इधर देश में लगता है कोई भी संजीदा बात किसी गंभीर विषय पर नहीं करता है राजनीति मज़ाक बन गई है चुटकुलेबाज़ी का चलन है । इक पुराना चुटकुला फिर से याद आया है सुनाता हूं , कुछ बच्चे मैदान में खेल रहे थे तभी उनके अध्यापक उधर से गुज़रे , अध्यापक ने पूछा बच्चो क्या खेल खेल रहे हो । बच्चों ने बताया मास्टरजी हमको इक कुत्ते का पिल्ला मिला है और हमने ये शर्त रखी है कि जो भी सबसे बड़ा झूठ बोलेगा ये पिल्ला उसी का हो जाएगा । कैसे झूठ बोलते हैं अध्यापक ने मिसाल देने को कहा तो बताया जैसे देश की राजनीति में सभी झूठी बातें करते हैं और चुनाव जीत कर मौज मस्ती करते हैं । मास्टरजी ने हैरान हो कर कहा क्या ज़माना आ गया है जब हम छोटे बच्चे थे तो हमको झूठ शब्द का मतलब तक मालूम नहीं था । इतनी बात सुनते ही सभी बच्चों ने मिलकर कहा मास्टरजी ले जाएं ये कुत्ते का पिल्ला आपका हुआ आप शर्त में सबसे अव्वल रहे हैं । यकीनन इस से बड़ा कोई झूठ बोल ही नहीं सकता था कि उसको झूठ क्या होता है मालूम तक नहीं । लगता है कोई है जिस ने झूठ की शिक्षा की पढ़ाई में डिग्री हासिल की हुई है तभी जिधर देखते हैं उसका झूठ का ही परचम फहरा रहा है । झूठ सच को छोटा बताकर अपना कद बढ़ा रहा है ऐसे में किसी कवि का लिखा याद आ रहा है , कवि कहता है बौने कद वालों को पहाड़ पर चढ़ने का बड़ा शौक होता है । पहाड़ की ऊंचाई पर खड़े हो कर उनको लगता है उनकी ऊंचाई बढ़ गई है जबकि वास्तव में पहाड़ पर खड़े होकर वो और भी बौने दिखाई देते हैं । आजकल सभी एक से बढ़कर ऊंचे शिखर पर खड़े हैं ऐसे शिखर जिनकी कोई बुनियाद ही नहीं है बस कुछ और कहना व्यर्थ है । झूठ के चाहने वालों को सच कड़वा लगता है उनको मीठा ज़हर पसंद है भले उस से अंजाम जैसा भी हो सामने दिखाई दे तब भी अनदेखा करते हैं चाटुकारिता इक गुण समझा जाने लगा है । मीडिया झूठ को ख़ुदा बताने ही नहीं बनाने को अपने ज़मीर को नीचे गिराने लगा है , सभी को झूठ लुभाने लगा है , ऊंठ पहाड़ को छोटा बताने लगा है।  आखिर में इक पुरानी ग़ज़ल पेश है।  
 
 

 ग़ज़ल  : डॉ लोक सेतिया 

 
पूछते सब ये क्या हो गया
बोलना तक खता हो गया।

आदमी बन सका जो नहीं
कह रहा मैं खुदा हो गया।

अब तो मंदिर ही भगवान से
लग रहा कुछ बड़ा हो गया।

भीख लेने लगे लगे आजकल
इन अमीरों को क्या हो गया।

नाज़ जिसकी वफाओं पे था
क्यों वही बेवफा हो गया।

दर-ब-दर को दुआ कौन दे
काबिले बद-दुआ हो गया।

कुछ न ' तनहा ' उन्हें कह सका
खुद गुनाहगार-सा हो गया। 
 
 
 Pasand: सच और झूठ का महत्व
 
 

अप्रैल 01, 2026

POST : 2074 मूर्ख बनाने का विश्व कीर्तिमान ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  मूर्ख बनाने का विश्व कीर्तिमान ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कोई बाहरी व्यक्ति नहीं है हमारे अपने देश का ही शख़्स है जिसने कभी मांगा नहीं लेकिन सभी जानते है उस के रहते भला कोई और इस कीर्त्तिमान का दावेदार होने की सोच भी सकता है ।  कोई और दुनिया भर को उल्लू बना सकता है भगवान होने का भरोसा किसी और में कभी दिखाई नहीं देता है खुद भगवान पछताते हैं ऐसे व्यक्ति को धरती पर भेजा भी तो भारतवर्ष में जन्म दिया लेकिन उसको लगता है उसका जन्म नहीं हुआ अवतार लिया है ।  बस इक वही अजर अमर है बाकी सब  संसार नश्वर है उसको रहना है और कण कण में दिखाई देना है सिर्फ इसी मकसद से उसने अपने महिमामंडन प्रसार प्रचार पर धन पानी की तरह बहाया है ।  उसने जो भी चाहा है पाया है इस ख़ातिर उसने क्या क्या नहीं गंवाया है खुद नैया पार लगाने को खेवनहार को भी डुबोया है ।  कौन है जो हंसता दिखाई देता है संविधान लोकतंत्र क्या सभी का रोना है किसने रोया है बस उसकी अश्रुधारा ने दुनिया को डुबोया है । उसकी कटु मुस्कान पर कौन फ़िदा नहीं होता वो नहीं चाहता तो देश दुनिया में कोई हादसा नहीं होता , काश कोई आपसा कभी नहीं होता ।  इक वही शाम का जैसे बढ़ता हुआ साया है काली घटा बनकर आसमान पर छाया है आपको समझ कभी नहीं आती उसकी क्या माया है । कोई जाल उसने बिछाया है हर मछली ने खुद कांटा निगला है उसको अपना रक्षक घोषित किया तब ज़िंदा रहने का अवसर पाया है ।  ज़हर सभी को अमृत बताकर पिलाया है जाने कैसा मज़ा है जो हर कोई मौत को खुद बुला लाया है । आज पहली अप्रैल पर हास्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया है ख़ुशी मनाओ दुनिया को मूर्ख बनाने का कीर्तिमान हासिल कर उसने सभी को बदलाली में भी हंसना सिखलाया है आपदा को अवसर घोषित कर उसने इक और महान कारनामा कर दिखलाया है । कवियों ने जो पढ़ा नीचे लिखा है खूब लुत्फ़ उसने उठाया है । 
 
   

हैरान हैं  भगवान ( क्षणिकाएं : हास्य - व्यंग्य  ) 

क्या ऐसे होते हैं इंसान 
क्या यही है शराफ़त की पहचान , 
चोर से कहते चोरी कर कोतवाल से भी पकड़वाते , 
कोयला करने लगा है हीरे की पहचान । 
 
भाई से भाई , बेटे से बाप की करवाते लड़ाई ,
आफ़त खुद जिसने बुलाई 
शामत उसकी आई , 
खाते सभी से खूब मलाई , 
कहना मत उनको हरजाई आदत है बनाई ।  
 
बेच ईमान दौलत कितनी कमाई , 
जिसकी खाई उसकी बजाई 
दो तरफ़ा है किरपान ,   
मान न मान सभी लोग नादान 
बस इक अपनी आन बान शान । 
 
कौन किसका है कद्रदान , 
मिलता है सभी को जीने का वरदान 
मीठा ज़हर पहचान , 
किस किस की ऊंची है दुकान 
फ़ीके फ़ीके सभी पकवान ।

अपने बनकर समझते 
सभी को पायदान ,
जाके पैर न फटी बिवाई , 
वो क्या जाने पीर पराई ,
बिछा हुआ क़ालीन नीचे छुपा 
सभी कूड़ा कर्कट बाहरी शान ।  
 
ऊपर बैठा हुआ हैरान 
कोई भगवान ,
सच और झूठ की मिलावट 
करते हैं नासमझ नादान ,
पर उपदेश कुशल बहुतेरे , 
करते दुनिया पर कितने एहसान । 
 
 

           क्षणिकाएं ( हास्य - व्यंग्य कविताएं ) 

सरकार है कायदा है कानून संविधान है 
भूखों का पेट भरने को रोटी नहीं है , पर 
भूखे मर जाने पर मिलता सभी को बराबर 
लाखों की मुआवज़ा राशि का प्रावधान है ।  
 

2  

बड़ा ही निराला अदालती खेल है
अनगिनत बेगुनाह हैं कैदी जेलों में  
हमेशा से गुनहगारों के लिए मिलती 
बचने को अग्रिम ऐंटिसिपेटरी बेल है ।    
 

लोकतंत्र भी इक खेल तमाशा है 
कभी तोला है तो कभी वो माशा है 
मुंह में पानी है नेताओं प्रशासन के  
जनता क्या है बस मीठा बताशा है । 
 

मंच पर भाषण देते समय जनाब 
चिंता भ्रष्टाचार पर जतला रहे थे 
दलालों को इशारों इशारों में ही 
घर शाम को अपने बुला रहे थे । 
 
 

राजनेता (  व्यंग्य -  कविता  ) 

दफ़्न रूह की आवाज़ कर गया 
जी रहा मगर इक शख़्स मर गया ।  
 
ऐतबार उसका ,  क्या करें भला 
और कुछ कहा , कुछ और कर गया ।  
 
मांगता सदा , ख़ैरात वोट की 
जीत कर न जाने फिर किधर गया ।  
 
रहनुमा बनाकर भूल हमने की 
देश लूटकर घर बार भर गया । 
 
क्या नशा चढ़ा सत्ता जो मिल गई 
ज़ुल्म की हदों से , है गुज़र गया । 
 
बेचने लगा अपना इमान तक 
देख कर उसे शैतान डर गया । 
 
मैं ग़ुलाम हूं  , सरकार आप हैं 
कह के बात ' तनहा ' ख़ुद मुकर गया ।  
 
 
 

   सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता ) 

 
शिखर पर खड़ा हुआ है झूठ सच पड़ा हुआ खाई में  
इंसाफ़ क़त्ल होता रहता सच और झूठ की लड़ाई में
 
सियासत की अर्थी भी निकलेगी मगर बरात बन कर
जनता की डोली का दुःख दर्द दब जाएगा शहनाई में
 
शासकों को क्या खबर क्या क्या होने लगा समाज में 
जंग लाज़मी है चुनावी खेल में , हर भाई और भाई में
 
आत्मा ज़मीर आदर्श और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाना 
कोई कबाड़ी खरीदता नहीं ये सब सामान दो पाई में 
 
जिनको इतिहास लिखना आधुनिक समय का यहां 
भर लिया इंसानी खून उन्होंने कलम की स्याही में 
 
राजनेता अधिकारी धनवान लोग शोहरत जिनकी है 
खोटे साबित हुए सब कसौटी पर हर बार कठिनाई में 
 
सबका भला नहीं सिर्फ खुद अपने लिए जीना मरना 
खूब मुनाफ़ा अब बाजार में अच्छों की झूठी बुराई में  
 
 


 

फ़रवरी 20, 2026

POST : 2059 आता नहीं झूठ बोलना जानते चोरी करना ( हास-परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       आता नहीं झूठ बोलना जानते चोरी करना  ( हास-परिहास ) 

                                     डॉ लोक सेतिया  

सत्यवादी हरीशचंद्र जी के वशंज कहलाते हैं , सत्य ही ईश्वर है की रट हम लगाते हैं , लेकिन अभी तक भी झूठ बोलने का सलीका नहीं आया है , जब भी बोलते हैं पकड़े जाते हैं । झूठ बोलने से कोई पाप नहीं लगता है कहते हैं जिस झूठ से किसी की चाहे खुद की ही भलाई हो उस से पाप नहीं लगता पुण्य समझते हैं । हम धर्मात्मा बनकर झूठ की कथा बांचते हैं सुनने वालों को मोह माया से बचने की बात करते हैं खुद मायाजाल में फंसते जाते हैं । झूठ का सागर बहुत गहरा है जो लोग डूबते हैं गहराई में पार उतर जाते हैं हीरे मोती उनकी झोली में भरते जाते हैं । हम चोर नहीं साहूकार कहलाते हैं चोरी करना अपना हुनर है दुनिया को दिखाते हैं असली चोर कभी नहीं पकड़े जाते हैं थानेदार बनकर कायदा कानून सबको समझाते हैं । कौन अपनी खामियां बताता है हर शख्स खुद को काबिल समझदार ईमानदार बतलाता है बस किसी की बात पर ऐतबार कभी किसी को नहीं आता है कोई ये बोलता नहीं समझता है झूठ बोलना सभी को खूब आता है । झूठ ही अपना सच कहलाता है सच से हमारा कभी नहीं रहता रिश्ता नाता है सच से हर शख़्स बचता है झूठ से ही दिल को चैन आता है सच कहने सुनने से दिल घबराता है । झूठ आपको मुसीबत से बचाता है सच का कोई भी ऐतबार ही नहीं करता कभी पति पत्नी से कहता है तो जाओ झूठे कहीं के सब मुझको समझ आता है । कहने का तातपर्य ये है कि झूठ हमको स्वीकार है झूठों की महफ़िल में होती जयजयकार है । झूठ दौड़ता है भागता है सभी मानते हैं कि दुनियादारी में झूठ ही चलता है सच हमेशा दिखाई देता हाथ मलता है । अदालत से लेकर संसद विधानसभाओं में सभी जगह झूठ का ही बोलबाला है सच कोई हरजाई है मतवाला है उसके लिए सभी के हाथ में कांटों की कोई माला है । झूठ का रिश्ता मधुर है बीवी का भाई साला है अपनी बहन का वही रखवाला है । सच सामने खड़ा भी दिखाई नहीं देता मुंह पर लगाया झूठ का इक ताला है आपको समझना है क्या गड़बड़झाला है । 
 
चोरी करते हैं हम सभी शान से कोई भी जगह हो घर दफ़्तर या किसी दुकान से ,  सीसीटीवी तक नहीं पकड़ पाते हैं चोरी चोरी लोग आंख मिलाते है दिल लूटते हैं आप पछताते हैं । दुनिया में हम जैसा कोई और नहीं है चोरों की नगरी में शराफ़त का चलता ज़ोर नहीं । शरीफ़ लोग शराफ़त में मारे जाते हैं असली चोर मौज करते हैं बड़े भलेमानस कहलाते हैं । भगवान जिसको हमने बनाकर कहीं बिठाया है उस ईमारत को भी चोरी के धन से बनवाया है चोरी करने बच भी जाएं तब भी हेरा फेरी से नहीं बचते हैं । हम अपने पांव ख़ामोशी से छुप कर रखते हैं खुद को छोड़ सभी पर नज़र रखते हैं । दुनिया जानती नहीं कितना बड़ा कमाल है चोरी का जितना भी माल है भरी उसी से अपनी टकसाल है । चालीस चोर इक अलीबाबा की कहानी पुरानी है आजकी दास्तान आधुनिक है सुहानी है देश का सभी कुछ कब कौन कैसे चुराता है जनता को खबर नहीं उसका अपना हमदर्द बनकर कौन उसका हक का सब खाकर दानवीर कहलाता है । चोरी की शिक्षा कलाकारी भी कहलाती है कोई विश्वविद्यालय ये हुनर सिखाता है चोरी के माल को अपना बताकर  फंस जाता है ख़बर से हैरान सभी लोग होते हैं चोरी करने में ऐसी गलती हमसे कैसे हुई है हमने दुनिया को हमेशा ठेंगा दिखाया है चोरी भी सीनाज़ोरी भी सबक सीखा है पढ़ाया है । सभी का सर चकराया है जब ऊंठ पहाड़ के नीचे आया है । 
 लोहे के मशीने कुत्ते पर आँसू बहाने से क्या होगा। यह सिर्फ़ एक यूनिवर्सिटी  की बात नहीं है, सारे शिक्षा जगत में गलघोंटिया प्रयोग चल रहा है ...

दिसंबर 15, 2025

POST : 2045 सतसंग की चर्चा में चर्चा ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       सतसंग की चर्चा में चर्चा   ( हास - परिहास  ) डॉ लोक सेतिया  

सभा में प्रवचन किया जा रहा है आयोजक कोई भी हो सकता है वास्तव में उसकी हैसियत प्रयोजक जैसी होती है । उपदेशक दुनिया भर को खराब बता रहे हैं बुरे लोगों को अच्छाई का सबक पढ़ा रहे हैं सुनने वाले दिल ही दिल में पछता रहे हैं वही पुरानी बातें सुनते हुए उकता रहे हैं । मकसद कुछ और था सतसंग में भक्ति पर चर्चा करनी थी उसको भुला कर जाने क्या क्या समझा रहे हैं , किसी फ़िल्मी गीत ग़ज़ल को भजन है कहकर गा कर श्रोताओं को लुभा रहे हैं । खुद अपना शुल्क लिया हुआ है सभी को माया जाल से बचने की राह दिखाने को प्रयास कर रहे हैं अपनी गागर में सागर तक भर रहे हैं । कभी किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए उपदेशक खुद यही हमेशा करते हैं । अच्छे लोग हैं जिन्होंने उनको बुलाया है उनके नाम से कितनी पहचान क्या क्या कितना महान है विस्तार से बताते हैं बस वही देवतुल्य हैं अन्य इंसान भी नहीं लगते हैं ऐसे शिखर पर बिठाते हैं सभी लोग अपनी तुलना समझ शर्माते हैं । सभागार से बाहर बैठी कुछ महिलाएं अपना समय बिताने को मेलजोल बढ़ाती हैं , जो उनकी परिचित उपस्थित नहीं उनकी असलियत सभी को बताती हैं । बड़ी झूठी है जाने खुद को क्या समझती हैं चार पैसे हैं बस तभी इतराती हैं , जलती हैं हर किसी को खुद से नीचा बताती हैं सतसंग नहीं सुनने आती पार्टियां करती झूमती गाती हैं । सभी को मालूम है दोनों कितनी करीब हैं रोज़ आपस में घंटों फोन पर बतियाती हैं , किस किस की क्या ख़बर है विषय पर दुनिया कितनी ख़राब है समझती समझाती हैं ।    
 
इक चतुर नार बड़ी होशियार सभी परिजनों को अपनी उंगलियों पर नचाती है नाच न जाने आंगन टेढ़ा बताती हैं । सभी को हर बात अपने रंग ढंग से सुनाती समझाती है हर किसी को नानी याद आती है , अपनी बात पर सभी से हामी भरवाती है कोई नहीं समझता तो उसको नादान कह कर मनवाती है । उनको किसी की किसी द्वारा तारीफ़ बिल्कुल नहीं सुहाती है ऐसे में जिसकी तारीफ़ की गई उसकी जन्म जन्म की कुंडली दिखाती है ।महिलामंडल की अध्यक्ष है सभी को आईना दिखाती है खुद को विश्वसुंदरी से भी बढ़कर हसीन बताती है । ज़िंदगी ऐसी महिला बड़ी शान से बिताती है चांदनी रात सामने उस के मैली नज़र आती है । कौन कौन है संत महात्मा सभी को अपना अध्यात्म गुरूजी बताती है हर महीने किसी को अपने आवास पर आमत्रित करती है शहर भर को अपना करिश्मा दिखलाती है । हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।  अल्लामा इक़बाल का शेर है , मुझको समझने वाला पारखी कद्रदान नहीं मिला अफ़सोस जताती है ।   
 
 
 
 नाच न जाने आँगन टेढ़ा मुहावरे पर आधारित प्रेरक कहानियाँ! Short Stories

दिसंबर 05, 2025

POST : 2043 क़त्ल मर चुके लोगों का ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    क़त्ल मर चुके लोगों का ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

आपने देखा होगा राजनेता दिखावे को सफाई अभियान की शुरुआत सोशल मीडिया अख़बार टीवी चैनल पर दिखलाने को जब हाथ में झाड़ू पकड़े गंदगी को हटाते नज़र आते हैं तब उस जगह पहले बदबूदार गंदगी नहीं बल्कि ऐसा कूड़ा डाला जाता है प्रशासन द्वारा जो गंदगी नहीं होता है ।  हमारे देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में ये चलन आधुनिक नवयुग की देन है जिसे करने की ज़रूरत है उसका उपहास बना देना । कूड़ा सबसे अधिक प्रशासनिक व्यवस्था में ही जमा है जिस की कभी सफाई कोई नहीं करता है और जिन्होंने भी कभी पहले ऐसा करने की कोई कोशिश की थी उनकी दिखाई राह पर सबसे अधिक कांटे बिछाने का कार्य बाद में आने वाले लोगों ने किया है । नतीजा देश समाज दिखलाने को शानदार लगने लगा है जबकि भीतर से खोखला और बेहद बदसूरत बनता गया है । किसी अधिकारी ने राजनीती से अपराधीकरण मिटने की कोशिश की तो तमाम लोगों ने अपराध की राजनीति की पटकथा लिखनी शुरू कर दी और अपराधी सभी को भाने लगे । राजनेता से प्रशासन तक सभी गरीबी मिटाने की जगह गरीबों को ही सताने लगे उनको ज़िंदगी और मौत का फासला समझाने लगे । देश की आज़ादी से नवनिर्माण की खातिर अपना जीवन समर्पित करने वालों को आधुनिक ख़ुदगर्ज़ लोग कटघरे में खड़ा कर उनके गुनाह गिनवाने लगे हैं खुद कुछ भी नहीं करना जानते हैं सभी कुछ मिटाना चाहते हैं । पचास साठ साल पहले मर चुके लोगों को फांसी पर चढ़ाने लगे हैं उनकी हर कुर्बानी को झुठलाने लगे हैं अपनी सूरत नहीं देखते शीशे के महल में रहते हैं पत्थर फैंक कर खुद को जो नहीं बन सकते बतलाने लगे हैं । 
 
इधर आजकल चर्चा नहीं फुसफुसाहट होने लगी है , कोई है जो सत्ता के गलियारे में बैठा सोशल मीडिया टीवी चैनल अन्य तमाम दुनिया को निर्देश जारी किया करता रहा है खुद ही भ्र्ष्टाचार की दलदल में फंसा हुआ मिला है । उसका अंजाम क्या हुआ किसी को नहीं मालूम कि छोड़ गया या निकाला गया है सत्ता की सेवा से निवृत हुआ , कुछ लोग अचानक ख़ामोशी से गायब हो रहे हैं । उनकी कारगुज़ारियों को छुपा दिया जाता है जो हर दिन सभी की खामियां ढूंढ ढूंढ कर प्रचारित किया करते थे बस इक उनके आका का आभामंडल बनाये रखने को । ख़ामोशी पसरी हुई है देश की राजधानी की सत्ता की गलियों में इस विषय पर कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती है , जिस विभाग की जांच में उनके नाम सामने आये वो भी बेबस है अन्यथा सामन्य लोग क्या विपक्षी राजनेता होते तो कब का नोटिस भिजवा बुलवाया जाता । अपनी साख पर विभाग कालिख लगने देता है तो माजरा कुछ तो है बनाये न बने छुपाये न बने ।  
 
जो ज़िंदा नहीं कब के मर चुके हैं उनके कर्मों का हिसाब कौन ले रहे हैं जिन्होंने खुद कभी कुछ समाज की खातिर नहीं किया , जबकि धर्म संस्कृति समझाती है कि मर चुके लोगों की बुराई कभी नहीं करते हैं । खुद अपनी लकीर खींचना कठिन लगता है इतिहास से औरों की लंबी लकीरों को छोटा नहीं करना चाहते उस को मिटाकर कुछ और बनाना चाहते हैं । धनवान उद्योगपति से शासक प्रशासक तक सभी मिलकर ऐसा भयानक दृश्य बना रहे हैं कि लोग जीना छोड़ मौत को गले लगा रहे है , कैसे ख़्वाब दिखलाये थे क्या मंज़र सामने आने लगे हैं ।  बड़े बड़े पदों पर आसीन लोगों के आपराधिक कारनामे शासन वाले छुपाने लगे हैं उनको त्यागपत्र से ही राहत मिल जाती है जबकि ऐसे अपराध कोई और करे तो खूब शोर चोर चोर का मचाने लगे हैं । चोर शोर मचाने लगे हैं  , दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल याद आई है  : - 
 

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं  

गाते - गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ।  

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो 

ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं । 

वो सलीबों के करीब आए तो हमको 

कायदे - कानून समझाने लगे हैं । 

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है 

जिसमें तहख़ानों से तहख़ाने लगे हैं । 

मछलियों में ख़लबली है , अब सफ़ीने 

उस तरफ जाने से कतराने लगे हैं ।

मैलवी से डाँट खाकर अहले मक़तब 

फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं । 

अब नयी तहज़ीब के पेशे - नज़र हम 

आदमी को भूनकर खाने लगे हैं ।   

 

चोर मचाए शोर… 😒🤦🏻‍♂️, लेकिन देश और बिहार से धोखाधड़ी के करत बा, ई जनता  सब बुझेला!, #NDA4Bihar 

सितंबर 21, 2025

POST : 2024 बेताल सुनता , कहानी राजा सुनाता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

  बेताल सुनता , कहानी राजा सुनाता ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया  

शासक ने बेताल को बेबस कर चुपचाप उसकी कहानी सुन कर ताली बजाने को विवश कर ही लिया । हमेशा से बेताल अपनी शर्त मनवाता रहा इस बार बाज़ी पलट गई और राजा ने तौर तरीका बदल बेताल की पीठ पर खुद सवार हो गया था । राजा कहने लगा बेताल की कितनी कथाएं कहानियां दुनिया ने सुनकर भुला दीं पर कोई सबक नहीं सीखा आज भी राजतंत्र खत्म हुआ लोकराज स्थापित होने पर भी जनता खुद को किसी न किसी का गुलाम ही बनाये रखा । मूर्ख लोग गुलामी का भी लुत्फ़ उठाने लगे हैं पिंजरे में कैद ख़ुशी के गीत गाने लगे हैं । किसी भिखारी को ताज पहनकर खुद अपनी झोली फ़ैलाकर गंगा उलटी बहाने लगे हैं अपनी हस्ती खुद ही मिटाने लगे हैं सोशल मीडिया की चमक दमक की झूठी दुनिया को सच समझने लगे है क्या जाने किसलिए ज़ालिम को मसीहा समझ कर महिमा उसी की गाने लगे हैं । शासक कुछ भी जनता या समाज के कल्याण की खातिर नहीं करते हैं हमेशा अपनी तिजोरी भरते हैं मौज करते हैं लोग देखते हैं उनको बस आह भरते हैं । खुद सभी देशवासी शासक बनकर मनमानी करने की चाहत रखते हैं इसलिए झूठ का ही गुणगान करते हैं सच बोलने से डरते हैं । शासक बनते ही भूखे नंगे लोग भी बादशाह खुद को मानते हैं देश सेवा के नाम पर लूट खसौट करते हैं जनता को झूठे वादों से बहलाते हैं उसकी खैरात बांटते है अधिकार कभी नहीं देते खुद दानवीर कहलाने का ग़ज़ब ढाते हैं ।    
 
चोर चोर मौसेरे भाई हैं सत्ता की रेवड़ियां संग संग खाते हैं देशवासी हमेशा गलती करते हैं जिन पर भरोसा करते हैं वही ज़ुल्म ढाते हैं लोग चिड़िया खेत चुग जाती है तब बाद में पछताते हैं । सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तां हमारा गुनगुनाते हैं मगर अच्छा कुछ भी दिखाई देता ही नहीं झूठे ख्वाब सजाते हैं । मंदिर मस्जिद गिरजा गुरुद्वारा सभी लोग जाते हैं लेकिन भगवान कहीं नहीं मिलते आजकल इंसान भी कम नज़र आते हैं । जो लोग बबूल बीजते हैं सत्ता हासिल कर आम आदमी को चूसते हैं उसका सब निचोड़ कर पीते हैं बस गुठलियां गरीब को मिलती हैं शासक हंसी उड़ाते हैं ये तमाशा देख दिल बहलाते हैं ।  शासक देश विदेश जाकर भाईचारा बनाते हैं दोस्त देश दुश्मन देश कौन सब भूलकर लेन देन का ऐसा चक्र्व्यू रचाते हैं जिस में साधारण लोग बिना कुछ लिए कर्ज़दार बन कर जीवन भर किश्ते चुकाते हैं । आयात निर्यात के खेल में सत्ताधारी लोग अधिकारी उनके यार लोग गुलछर्रे उड़ाते हैं गरीब और गरीब अमीर और रईस बनकर देश का बंटाधार कर इतराते हैं समझते हैं हम बनाते हैं जब चाहे सरकार गिराते हैं । ख़ास वर्ग स्वार्थ की बेड़ियों में  कोल्हू के बैल की तरह अपनी परिधि में घुमते रहते हैं कभी आंखों से पट्टी नहीं हटाते मतलब की बात समझते हैं आपको ये समझाते हैं , कविता सुनाते हैं लोग आम क्यों नहीं खाते हैं । 
 
 

गुठलियां नहीं , आम खाओ ( व्यंग्य कविता ) 

डॉ लोक सेतिया

गुठलियाँ खाना छोड़ कर
अब आम खाओ
देश के गरीबो
मान भी जाओ ।

देश की छवि बिगड़ी
तुम उसे बचाओ
भूख वाले आंकड़े
दुनिया से छुपाओ ।

डूबा हुआ क़र्ज़ में
देश भी है सारा
आमदनी नहीं तो
उधार ले कर खाओ ।

विदेशी निवेश को
कहीं से भी लाओ
इस गरीबी की
रेखा को बस मिटाओ ।
 
मान कर बात
चार्वाक ऋषि की
क़र्ज़ लेकर सब
घी पिये  जाओ ।

अब नहीं आता
साफ पानी नल में
मिनरल वाटर पी कर
सब काम चलाओ ।

होना न होना
तुम्हारा एक समान
सारे जहां से अच्छा
गीत मिल के गाओ ।

Vikram Aur Betaal, Vikram Aur Betal Kahani, Vikram Aur Betal story

सितंबर 02, 2025

POST : 2007 फांसी चढ़ने के नौ साल बाद निर्दोष घोषित ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      

 फांसी चढ़ने के नौ साल बाद निर्दोष घोषित ( हास - परिहास ) 

                             डॉ लोक सेतिया  

उनकी कहीं कब्र नहीं बनी कोई कहीं कोई  समाधिस्थल नहीं , उनकी याद आई खुद उनको जिन्होंने नौ साल पहले उनकी मौत का फ़रमान सुनाया था , अफ़सोस जताने भी जाएं तो कहां । हुए मर के हम जो रुसवा हुए क्यों न गर्क़े - दरिया न कोई जनाज़ा उठता न कहीं मज़ार होता , ग़ालिब को कैसे ख़बर थी कभी दो बड़े ही लोकप्रिय पांच सौ और हज़ार रूपये के करंसी नोटों की ऐसी कहानी कोई लिखेगा । चार दिन क्या चार घड़ी भी उनको मोहलत नहीं मिली चार घंटे बाद उनका होना नहीं होना एक हो गया । कितनी हाहाकार मची थी तब भी तैं की तरस न आया । वैसे तो तुम्हीं ने मुझे बर्बाद किया है इल्ज़ाम किसी और के सर जाए तो अच्छा जैसा हुआ काला धन जमा होने का इल्ज़ाम उन पर लगाकर सूली चढ़ाने से पहले कोई सुनवाई नहीं किसी की भी फरियाद नहीं सुनी सरकार जनाब ने । शायद उनकी रूहें भटक रहीं हैं कोई विधिवत अंतिम संस्कार किसी ने नहीं किया पचास दिन में सौ बार बदलती रही रणनीतियां नतीजा हासिल कुछ नहीं कालिख़ मिटी करंसी रंगीन हो गई तब भी उनको लेकर कोई संवेदना जताई नहीं गई । पितृपक्ष आने को है और उनकी नौवीं बरसी भी आएगी कोई पिंडदान कोई स्मृति का तौर तरीका विचार करने का समय है । 
 
दुनिया कभी समझ नहीं सकती कि ऐसा क्यों होता है जिनको पापी गुनहगार घोषित कर सज़ा ए मौत का फ़रमान बादशाह अकबर सुनाते हैं उस अनारकली की मुहब्बत और आशिक़ी को लोग भुलाना नहीं चाहते हैं बिल्कुल उसी तरह पांच सौर और हज़ार रूपये के नोटों जैसा रुतबा फिर किसी को हासिल नहीं हुआ । ये भी शायद कोई श्राप लग गया था जो उनकी जगह जारी दो हज़ार की घड़ियां भी गिनती की रहीं आखिर । अब आजकल तो लोगों का कागज़ी करंसी से मोहभंग हो गया है वर्ना मुझे कभी मेरे पिताजी ने रूपये की कीमत इस तरह समझाई थी , कहा था सौ रूपये का नोट जेब में होने पर बोतल का नशा महसूस होता है । मुझे कभी कोई नशा चढ़ा नहीं इस एक लिखने का जूनून है जो रहता है रहेगा हमेशा , देश की अस्सी प्रतिशत की जेब अपनी तरह खाली रहती है मगर कोई ग़म नहीं सरकार का खज़ाना ख़ाली होने लगा है इसका गिला तो है । हमने अपना सब कुछ सौंप दिया तब भी आपकी शासकों की ज़रूरतें पूरी नहीं होती हैं ।  शायद कभी जिन पूर्वजों को ख़राब साबित करने की कोशिश में खुद अच्छा किरदार पर खरे नहीं उतरे उनको भी बताएंगे कि उन जैसा कभी कोई नहीं हो सकता है । किसी की बनाई लकीर को मिटाने से अपनी लकीर बड़ी नहीं बनती है आपको उनसे अधिक लंबी लकीर बनानी पड़ती है मगर आपने सांप सीढ़ी की तरह ऊंचाई चढ़ने का प्रयास कितनी बार किया और नतीजा धड़ाम से गिरना । अंत में मेरी इक ग़ज़ल पेश है । 
 

 

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई ( ग़ज़ल ) 

 लोक सेतिया "तनहा"

नहीं कुछ पास खोने को रहा अब डर नहीं कोई 
है अपनी जेब तक खाली कहीं पर घर नहीं कोई ।

चले थे सोच कर कोई हमें उसका पता देगा 
यहाँ पूछा वहां ढूँढा मिला दिलबर नहीं कोई ।

बताना हुस्न वालों को जिन्हें चाहत है सजने की
मुहब्बत से हसीं अब तक बना ज़ेवर नहीं कोई ।

ग़ज़ल की बात करते हैं ज़माने में कई लेकिन
हमें कहना सिखा देता मिला शायर नहीं कोई ।

हमें सब लोग कहते थे कभी हमको बुलाना तुम
ज़रूरत में पुकारा जब मिला आ कर नहीं कोई ।

कहीं मंदिर बना देखा कहीं मस्जिद बनी देखी
कहाँ इन्सान सब जाएँ कहीं पर दर नहीं कोई ।

वहां करवट बदलते रात भर महलों में कुछ "तनहा"
यहाँ कुछ लोग सोये हैं जहाँ बिस्तर नहीं कोई । 
 
 
 
 
 
 
  
 
 
 
 
 


 

अगस्त 27, 2025

POST : 2004 छुपा - छुपी खेल रहे हैं ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

   छुपा - छुपी  खेल रहे हैं ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

बड़ी उम्र में भी बचपन के खेल खेलना जिनकी आदत होती है उनको हुनर आता है आधी अधूरी बात बताने का जितनी बताते हैं उस से ज़्यादा छुपा लेते हैं ।  राज़ खुल गया तो कहते हैं बताया तो था मगर लगा जितनी ज़रूरी है उतनी बताना चाहिए । घर दफ़्तर की हर बात बताना संभव नहीं होता है कांट छांट करना मज़बूरी है कुछ दूरी कुछ फासले रखना समझदारी है । इक अंग्रेजी कहावत है कि जो अपनी पत्नी को सभी कुछ जो भी जानता है बता देता है , वो कुछ भी नहीं जानता है । लेकिन कोई कितना भी चतुर सुजान हो पत्नी से कुछ भी छिपा रहता नहीं है आधुनिक युग में स्मार्ट फ़ोन से लेकर पति के सहयोगी मित्र से तमाम अन्य सूत्र होते हैं जिस का उपयोग करना हर नारी जानती है । मेरा जीवन खुली किताब है कहने वाले किताब में सूखे फूल को लेकर लाख कोशिश करें इश्क़ छुपाने से छिपता नहीं है । अनारकली जानती है कि बादशाह को चुनौती देना मुसीबत को दावत देना है , पर्दा नहीं जब कोई खुदा से बंदों से पर्दा करना क्या जब प्यार किया तो डरना क्या । आंकड़े छुपाना हमेशा सरकार की आदत रही है , कभी अपनी असलियत छुपाना जो नहीं हैं बताना भी राजनीति का हिस्सा समझे जाते हैं । 
 
पारदर्शिता सामाजिक सार्वजनिक जीवन में आवश्यक है , लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है देश समाज से कुछ भी छिपाने से शंका होती है कि सच को सामने लाना चाहिए । पत्रकारिता का पहला सबक खबर की परिभाषा से शुरू होता है , ' खबर वो सूचना है जो जनता से छुपाई जा रही है पत्रकार का फ़र्ज़ है उस की तलाश करना और सभी तक पहुंचाना ' , इसको भुलाना पीत पत्रकारिता कहलाता है । लेकिन जब पैसे से विज्ञापन और तमाम अन्य भौतिक संसाधन मिलने से पत्रकार उसी बात का चौबीस घंटे शोर मचाते हैं जिस का डंका शासक पीटते हैं तब माजरा संगीन लगता है । जनता की तरफ नहीं सत्ता संग रंगरलियां मनाना खुद ही अपनी मान मर्यादा का त्याग कर चाटुकारिता करने को पत्रकारिता का पतन कहलाता है । कितने ही लोग खुद अपनी असली सूरत नहीं दिखलाते तो छुपने छुपाने की ज़रूरत होती है । शरारती बच्चे अध्यापक की नज़र से बचने को कभी किसी कभी किसी की ओट लेकर छुपने की कोशिश करते हैं , आजकल शासक पत्रकार से इंसाफ़ की कुर्सी पर आसीन लोग आपस में तालमेल बिठाकर इक दूजे को ढकने का प्रयास करते करते खुद अपने आप को ही नंगा कर रहे हैं । 
 
बड़े बड़े लोग खुद कभी अपनी आत्मकथा लिखा करते थे और तमाम ऐसी घटनाएं जिनका किसी को पता नहीं था सार्वजनिक करते थे । मकसद होता था अपनी सफलताओं विफलताओं के पीछे कितना कुछ रहता हैं जिनसे कुछ होता कुछ नहीं संभव होता है । इधर जीवनी शासकों की किसी से लिखवाई जाती है जिस में केवल उजला पक्ष दर्शाया जाता है कालिख़ लगाने की बात नहीं सामने आती है । सत्ताधरी की ऐसी जीवनी सरकारी और निजी कॉलेज पुस्तकालय को खरीदने को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग कहता है ऊंचे दाम पर मगर बाद में वही पुस्तक आपको मिल सकती है बेहद सस्ते दाम पर । साहस का काम होता है अपने द्वारा हुए अनुचित कार्यों की बात को स्वीकार करना , आजकल कौन इतना सच्चा है इक कसौटी पर खरा उतरना जो चाहता हो , अपना गुणगान करवाना कोई बड़ा काम नहीं होता है । अपनी ऊंचाई को बढ़ाने को किसी चोटी पर खड़े होने की ज़रूरत बौने लोगों को पड़ती है और कुछ लालबहादुर छोटे कद के भी किरादर से बड़े साबित होते हैं दुनिया की नज़र में ।  
 
 ज़रा सामने तो आओ छलिये Zara Saamne To Aao Chhaliye - निरुपा रॉय सोंग - लता  मंगेशकर, मोहम्मद रफ़ी - YouTube

अगस्त 07, 2025

POST : 1992 परदेसियों को है इक दिन जाना ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

  परदेसियों को है इक दिन जाना ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

कोई हैरानी नहीं हुई जब अपने नगर से तीन महीने बाहर रहना पड़ा , जानता था किसी को मेरे होने नहीं होने से कोई फर्क नहीं पड़ता है । दो चार लोगों ने फोन कर घर पर नहीं होने की बात पूछी किसी मकसद से अन्यथा भला क्यों कोई जान पहचान वाले की खबर रखता कब से दिखाई नहीं देने पर । मसरूफ़ ज़माना मेरे लिए क्यों वक़्त अपना बर्बाद करे , साहिर ने कहा था , कुछ लोग उनको याद करते हैं क्योंकि उन का कारोबार ही यही है अन्यथा कोई याराना नहीं यूट्यूब पर वीडियो बनाकर साहिर की रचनाओं को नहीं खुद अपनी चाहत पूरी करते हैं कमाई भी और कहने को शायरी से गायकी से मुहब्बत भी । कभी हम भी बाज़ार में बिक पाए तो चाहने वाले ढूंढ लेंगे । लेकिन बाहर से अपने शहर में लौटने पर कुछ भी बदला नहीं था वही पुराने लोग वही तौर तरीका वही औपचरिकताएं निरर्थक महसूस होती हुई । लेकिन किसी ने पूछा बड़े दिनों बाद नज़र आये हैं तो बताना पड़ा शहर से बाहर था । उनका अगला सवाल था किस देश में गए हुए थे , मैंने बताया कि किसी और देश में नहीं अपने ही मुल्क़ में किसी अन्य राज्य में किसी शहर में , लगता उनको निराशा हुई कि अपने देश में परदेसी बन लौटना भी बात है । हमने इस विषय पर शोध किया कुछ समझदार लोगों से चर्चा की और निष्कर्ष ये निकला कि हमारे लिए अपना देश ही रहने को उचित जगह है , विस्तार से नहीं संक्षेप में समझाते हैं । 
 
सबसे पहले विदेश जाने को कोई सरकारी अथवा किसी संगठन संस्था का आसरा चाहिए जो हम जैसे साधरण लोगों के लिए नहीं होता है । या कोई विदेशी किसी को नाम शोहरत से प्रभावित होकर आमंत्रित कर सकता है मगर अपना ऐसा कोई डंका नहीं बजता है गुमनाम अनाम लेखक जीवन भर खुद से अनजान रहते हैं कुछ अख़बार पत्रिकाओं को नाम पता मालूम होता है सिर्फ इतना संबंध लेखक प्रकाशक का संपादक का । कई देशों की यात्रा कर चुके हास्य कवि ने समझाया कि विदेश जाना क्या होता है , दो प्रकार के देश प्रमुख होते हैं पहले अच्छे माहौल वाले शानदार देश जिन में रहना बहुत महंगा पड़ता है । सालों की जमा की हुई पूंजी सफ़ेद काली कमाई कुछ दिन में खर्च कर हासिल होती हैं कुछ खूबसूरत तस्वीरें उन देशों की शानदार सतरंगी रंगीनियों की जो कभी हमको नसीब नहीं होती ये एहसास छुपाये रहती हैं । हंसती मुस्कुराती मगर उदासी निराशा छुपी रहती है जिन में , टीस  रहती है काश हम उस देश में जन्म लेते । हास्य कवि जी ने कुछ ऐसे भी देशों में जाकर देखा जिनकी बदहाली हमारे देश से बढ़कर है , थोड़ा सुकून मिला कि अपना देश अभी कुछ छोटे छोटे देशों से बेहतर है ।   
 
हमारे देश में स्वर्ग कभी जीते जी नहीं मिलता धर्मगुरु से सरकार तक स्वर्ग बनाने के ख़्वाब दिखलाते हैं मगर नर्क बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते यही हमारा नसीबा है । बबूल ही बबूल हैं कांटेदार जिन से मीठे आम खाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं । सुनते थे पहले लोग गांव से शहर जाते तो लोग पूछते थे शहर कैसा है , अब कोई देश में किसी राज्य में किसी शहर में जाने की बात नहीं जानना चाहता सभी समझते हैं कुछ ख़ास अंतर नहीं है । आपने भी जाकर देखा होगा कितनी जगह चेहरे नये मिलते हैं तौर तरीके वही रहते हैं । तीन महीने में कुछ अनुभव हासिल हुए हैं लेकिन कौन पूछता है किसी को ये मनोरंजक नहीं लग सकती शायद किसी दिन कुछ यादों को खुद ही ताज़ा कर दिल बहलाना अच्छा होगा ।
 
सच तो ये है कि हमारे देश के बड़े बड़े राजनेता अनगिनत देशों की सैर पर हज़ारों करोड़ खर्च करते हैं और विदेशी शासकों कारोबारियों से संबंध बनाते हैं लेकिन हालात बदलते ही विदेशी शासक दोस्त दुश्मनी की सीमा लांघ जाते हैं । शासकों की दोस्ती पर कभी ऐतबार मत करना कब आपको नीचा दिखाने लग जाएं कोई ख़बर नहीं । ये लोग  प्रवासी पंछी की तरह होते हैं ,  मौसम बदलते ही उडारी मार किसी और देश को चल देते हैं ।  
 
 Migratory birds are taking off from Morel Dam, bird lovers gathered to see  beautiful birds | फिर लौट कर आना परदेसी...: मोरेल बांध से प्रवासी पक्षी ले  रहे हैं विदा, गजब की

जून 08, 2025

POST : 1983 शोध प्यार के फूलों पर ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

      शोध प्यार के फूलों पर ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया 

पीएचडी के लिए इक छात्र ने ये विषय चुना है उसने अपनी नानी से कभी इक कहानी सुनी थी कोई पौधा होता था जिस पर प्यार के फूल खिलते थे और समय आने पर खूब फलता फूलता था दो तरह के फल लगते थे भाई बहन कहलाते थे ।  पूरी की पूरी कहानी दो लोगों के प्रेम से विवाहित जीवन को दर्शाती थी लेकिन सबसे अधिक महत्वपूर्ण प्यार के फूलों के खिलने का मौसम और मुहब्बत के गुलशन में बहार आने की बात को लेकर छात्र को ज़रूरी लगा तो उसने तलाश करना शुरू किया कहीं ऐसा कोई फूल खिला दिखाई दे जाये । छात्र ने अपने मामा जी से पूछा आपको माता जी ने कुछ पहचान बताई होगी अगर याद है तो मुझे आसानी होगी । मामा जी कुछ दार्शनिक प्रकार के थे उन्होंने समझाया नानी दादी की कहानियां वास्तविक जीवन में नहीं मिलती हैं उनकी काल्पनिक सपनों की दुनिया हुआ करती थी जिस में परियां झरने पंछी चिड़िया फूल बंदर रहते थे । बाद में कुछ कवियों ने कविता लिखी प्रेम को पवित्र भावना बतलाया तो कुछ लिखने वालों ने प्यार को त्याग का नाम देकर उसे भगवान बनाया । प्यार वास्तव में धरती पर नहीं पैदा हुआ था कोई उस को स्वर्ग से लेकर आया और धरती को बड़ा खूबसूरत बनाने को अपना मकसद बनाकर जीवन बिताया । जाने कहां से कोई आया जो नफरतों की आंधी साथ लाया उसने प्यार के फूलों को मसला कुचला उस गुलशन को तबाह बर्बाद किया और अपना इक महल बनाकर खिलखिलाया । 
 
कितनी किताबें पढ़ कर दुनिया भर में प्यार की निशानियां ढूंढ ढूंढ देख समझ कर शोधग्रंथ बनाया है अभी तक उसको ढाई आखर का मतलब नहीं समझ आया है । खुद उसने इस बीच किया प्यार और धोखा खाया है खुद जिस को नहीं समझ पाए दुनिया को समझाया है । कभी लोग नासमझ थे नादान थे दुनियादारी से बिल्कुल अनजान थे कोई अपना था न ही पराया था जिस किसी ने बात की सभी को अपनाया था । प्यार क्या होता नफरत कैसे कोई नहीं जानता था घर गली गांव बस्ती सभी की बात सच है हर कोई मानता था । झूठ बोलना पाप कहलाता था हर आदमी ईमान से रखता नाता था । मगर इक दिन किसी वीराने में कोई चमकदार चीज़ नज़र आई थी बस उसी देख नीयत डगमगाई थी अपनी सभी ने बतलाई थी जानते हैं क्या थी वो चीज़ झूठ की परछाई थी । अचानक किसी ने किसी को पास बुलाया था सभी को बताना हमारी बनाई हुई है ये उसको अपना साथी बनाया था । प्यार के रिश्ते की शुरुआत झूठ से होती है ये हक़ीक़त है सच बोल कर कोई किसी से मुहब्बत नहीं कर सकता है , मुझे दुनिया में सबसे अच्छे आप लगते हो तुमसे बढ़कर सुंदर कोई भी नहीं है । प्यार का पहला सबक यही है दो लोगों को लगा दुनिया की सबसे कीमती चमकीली चीज़ हमको मिली है और दोनों उसी को संभालने संवारने लगे रहे उम्र भर । 
 
दुनिया सतरंगी नहीं बहुरंगी अतरंगी है , हर कोई उसी तरह की चीज़ पाने की कल्पना करने लगा और किसी ने कहा है फ़िल्मी डायलॉग है ' इतनी शिद्दत से मैंने तुम्हें पाने की कोशिश की है , की हर ज़र्रे ने मुझे तुमसे मिलाने की साज़िश की है ।  कमाल ऐसा हुआ कि जिसको जो मिला उसने उसे ही मुहब्बत नाम दे दिया और ऐसे सभी को जैसी पसंद थी वैसी मुहब्बत की कली मिलती रही खिलती गई । प्यार ही प्यार हर तरफ सभी की झोलियां भरी हुई थी , लेकिन आपसी संबंधों में बीच में तकरार आई और कभी प्यार कभी तकरार होना विवाहित होने की निशानी बन गया । लोग बदले दुनिया बदलती रही और इंसान की चाहत भी फ़ितरत भी बदलतने लगी लोग आपस में नहीं ज़माने की बातों को चाहने लगे , इस जगह आने तक कितने ही ज़माने लगे । दौलत शोहरत ताकत हासिल करने को प्यार को ठोकर लगाने लगे ऐसे लोग अपनी कोई नई दुनिया अलग बसाने लगे कभी उस तरफ कभी इस तरफ आने जाने डगमगाने लगे ज़रा सी हलचल से डगमगाने लगे ।    
 
शायद कोई दर्पण था जिस ने दुनिया को उलझाया हर शख़्स ने देखा खुद पर इतना प्यार आया मुझसे प्यारा और न कोई गीत गुनगुनाया । भगवान ने इक जैसा हर इक इंसान बनाया मगर अपनी शक़्ल देख सभी को महसूस हुआ वही विधाता है अहंकार ने खुद को ख़ुदा से बड़ा समझा कोई ये खेल नहीं समझ पाया । किसी को सत्ता ने पास बुलाया कुर्सी पर बैठा है आदमी जहां से हुआ पराया उसने चाबुक से शेर को पिंजरे में कैद कर दिखाया तो उसका जादू सभी को बहुत भाया । शासक का तराज़ू था दौलत और मुहब्बत दोनों पलड़ों पर रख कर देखा दौलत का पलड़ा भारी था जितने भी बार आज़माया । प्यार बिकने लगा कीमत चुकाकर बोली पर ख़रीददार ख़रीद लाया , इक दिन किसी ने मुहब्बत का बाज़ार लगाया क्या अपना क्या पराया । प्यार एक से नहीं हज़ार से हो सकता है जिस किसी को जितना मिले थोड़ा है पाकर फिर खो सकता है । आगे बहुत कुछ है पर आखिरी अध्याय पर आते हैं आपको अंजाम ए इश्क़ की व्यथा बताते हैं । 
 
ये इक्कीसवीं सदी है प्यार मुहब्बत इक खिलौना है , हर कोई समझता है करना है नहीं होना है , कौन मुकाबिल है क्या पाने की आरज़ू है सोच समझ कर साफ साफ बात करते हैं । भविष्य की रूपरेखा क्या क्या शर्त है पहले जानते समझते हैं तभी इक दूजे के होते हैं । समझदार हो गए हैं चलता फिरता आजकल लोग इश्तिहार हो गए हैं । आदमी औरत नहीं प्यार जानवर से होने लगा है मत पूछना ज़ालिम बोझ कैसा सर पर ढोने लगा है । वो पहले सी मुहब्बत कोई मांगता नहीं है हर कोई व्यस्त है इतनी फुर्सत ही किसी को नहीं है , जब तक साथ निभाए कोई उपकार समझना है उम्र भर कौन देता साथ ये नाता बेकार समझना है ।  अब कभी सूखे हुए फूल किताबों में नहीं मिलते हैं कागज़ के फूल जिधर देखो खिलते हैं बिखरते हैं ज़रा से झौंके से तेज़ हवा के आंधी तूफ़ान का हाल ना पूछो , शोध ने किया जो कमाल ना पूछो । बस इतना समझ लो ये सबक पढ़ना लाज़मी है , मिल जाएं आप गर तो किस बात की कमी है । 
 
 भारत में प्रेम के रुझान: मैक्एफ़ी ने बढ़ते एआई घोटालों और नकली डेटिंग ऐप्स  के बारे में चेतावनी दी | टेक न्यूज़ - बिज़नेस स्टैंडर्ड
 
 

जून 03, 2025

POST : 1979 ख़तरनाक हैं ख़िलौने ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया

     ख़तरनाक हैं ख़िलौने ( हास- परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

यही गलती विधाता से हुई थी इंसान रुपी खिलौने बनाये थे अपनी दुनिया को सजाने को , उसी आदमी ने भगवान की बनाई खूबसूरत दुनिया का क्या हाल किया है । जिस दिन से इंसान ने ईश्वर को चुनौती देना शुरू किया तभी से भगवान इक सामान बन गया और इंसान भगवान का भी भगवान बन गया । खिलौने बनाने की शुरुआत दोनों ने मिट्टी से ही की आदमी खिलौना था भगवान भी खिलौना बन गया है , अंजाम मिट्टी का मिट्टी होना है । आपको लग रहा होगा क्या दकियानूसी बात कर रहा हूं , नहीं बड़ी महत्वपूर्ण बात है और आज इस से ज़रूरी कुछ भी नहीं है । दुनिया में जंग का आलम है ऐसे में किसी ने अजब ग़ज़ब ढाया है खिलौनों का बाज़ार हर तरफ छाया है । ड्रोन जिसे हमने इक खिलौना समझा था उस ने अपना परचम लहराया है ।  ड्रोन कितने का बनता है , फाइटर प्लैन कितने का कौन बड़ा कौन छोटा है परिभाषा उपयोगिकता से समझ आती है कुछ लाख से बना इक खिलौना हज़ारों करोड़ खर्च कर बनाये लड़ाकू विमान और बंबों की वर्षा करने वाले जेट विमानों को ध्वस्त कर सकता है । हम चांद छूने की ख़्वाहिश पूरी भले कर ली हो लेकिन अभी तक खुद सैनिक लड़ाकू विमानों का इंजन नहीं बना पाये सभी कलपुर्ज़े विदेश से मंगवा कर देश में जोड़ने को ही कहा हम आत्मनिर्भर हो गए हैं और जब आवश्यकता पड़ी तो उनके तरफ देखने लगे जिन से महंगे विमान खरीदे थे मंगवाए थे लेकिन तकनीकी जानकारी बकाया थी ' उधार की खाई आगे कुंवा पीछे खाई ' कहावत याद आई ।
 
हमने भी देश में समाज में कुछ कीमती सामान बनाये हैं , लोकतंत्र कितनी महंगी कीमत चुकाकर लाये हैं । संसद विधानसभा संविधान न्यायपालिका बड़े कीमती गहने हैं कितना मोल चुकाया है जनतंत्र की चादर पर दाग़ ही दाग़ हैं खोकर आज़ादी पछताए हैं । इतने ऊंचे भव्यतापूर्ण संस्थानों का भी हुआ यही हाल है लूट भ्र्ष्टाचार की राजनीति से लोकतंत्र घायल और बेहाल है , सांसद विधायक मंत्री प्रशासन न्यायपालिका सुरक्षा व्यवस्था तक असली कुछ भी नहीं बचा है सभी नकली मिलावटी माल है ।  राजनेताओं से प्रशासनिक सरकारी अधिकारियों विभागों का बुना हुआ ऐसा जाल है जिस में ख़ास लोगों की मौज है साधारण जनता बेबस और बदहाल है । सत्ता के चेहरे पर नज़र आती जो लालिमा है भूखी नंगी जनता की खून पसीने की गाड़ी कमाई है लूटी है सत्ता की बेहयाई है । सियासत से लेकर रणनीति कूटनीति सभी को खेल तमाशा बना दिया है , इतना बहुत है आज ख़ामोश रहना निज़ाम की चाहत है वर्ना मुसीबत है । 
 
एक मुसाफ़िर एक हसीना फिल्म का गीत है रफ़ी जी की आवाज़ है शायर हैं रिज़वी जी  : -
 
हमको तुम्हारे इश्क़ ने क्या क्या बना दिया 
जब कुछ न बन सके तो तमाशा बना दिया । 
 
काशी से कुछ गरज़ थी न काबे से वास्ता 
हम ढूंढने चले थे मोहब्बत का रास्ता 
 
देखा तुम्हारे दर को तो सर को झुका दिया ।  
 
दिल की लगी ने कर दिया दोनों को बेकरार 
दोहरा के दास्तां ए मोहब्बत फिर एक बार 
 
मजनूं हमें और आपको लैला बना दिया । 
 
निकले तेरी तलाश में और खुद ही खो गए 
कुछ बन पड़ी न हमसे तो दीवाने हो गए 
 
दीवानगी ने फिर तेरा कूचा दिखा दिया । 
 
जलवों की भीख फेंकने वाले की खैर हो 
पर्दा हटाके देखने वाले की खैर हो 
 
बनके भिखारी इश्क़ ने दामन बिछा दिया ।  
 
 
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