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जनवरी 10, 2014

POST : 400 भ्र्ष्टाचार के अंत के बाद क्या होगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

     भ्र्ष्टाचार के अंत के बाद क्या होगा ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

             आखिर देश से भ्रष्टाचार का नामोनिशान मिट ही गया । अब सब जगह हर काम बाकायदा नियम कायदा और जन हित को महत्व देकर पूरी ईमानदारी से होता है । अब आप जब चाहें अपनी मर्ज़ी से प्लाट खरीद कर मकान नहीं बना सकते हैं । आपको सबसे पहले आवास मंत्रालय से अनुमति लेनी होगी , बताना होगा किस सरकारी विभाग से प्लाट आबंटन चाहते हैं अथवा किस बिल्डर से खरीदना चाहते हैं । इसके लिये आपको जानकारी देनी होगी मंत्रालय को कि आपके पास पहले कोई मकान या प्लाट या कोई फ्लैट है अथवा नहीं । अगर है तो कहां कहां कैसे कैसे कितनी जायदाद बना रखी है , कब और किस तरह का पूरा विवरण साथ देना होगा । मंत्रालय विभाग से जांच करवायेगा कि क्या वास्तव में आपको मकान या ज़मीन की आवश्यकता है । कहीं ऐसा तो नहीं कि इससे उन बेघर लोगों का घर बनाना कठिन हो जायेगा , आप जैसे लोगों को कई कई जगह मकान बनाने देने से घर बनाना महंगा हो जाने से , जो देश में सब को मूलभूत सुविधा देने का वादा संविधान करता है । अफ्सरों , सांसदों , विधायकों , मंत्रियों को भी सरकारी आवास तभी उपलब्ध करवाया जायेगा जब वो अपना निजि मकान अगर किसी अन्य जगह है तो उसको सरकार के हवाले कर देंगे ताकि उसको किसी दूसरे सरकारी आदमी को दिया जा सके । वे जब तक मुफ्त के सरकारी आवास में रहेंगे तब तक उनका निजि मकान बिना किसी किराये के सरकार के पास रहेगा । ये सब देश की आवास समस्या को हल करने के लिये लागू की गई निति के अनूरूप ही होगा । अब जब से भ्रष्टाचार मिटा है और सरकार व प्रशासन ईमानदारी से काम करने लगा है ताकि जनता की समस्याओं का शीघ्र अंत हो , तब से जिनके पास ज़रूरत से अधिक धन है उनके लिये नई समस्या खड़ी हो गई है कि इन पैसों का करें क्या ।
 
 अस्पताल  सरकारी हो चाहे निजि , केवल पैसे वालों का ही ईलाज नहीं किया जा रहा है , जिनकी जेब खाली है उनको भी कायदे से उचित स्वास्थ्य सेवा मिलती है । दूसरी तरफ कुछ धनवान मरीज़ों को बताया जा रहा है कि क्योंकि आपका रोग अधिक गंभीर नहीं है इसलिये आपको अभी दाखिल नहीं किया जा रहा है । बिना दाखिल किये भी आपका ईलाज किया जा सकता है , दाखिल होने के लिये अभी आपको इंतज़ार करना होगा । अब किसी को भी सिर्फ पैसा देने से अच्छा इलाज नहीं मिलता है , जिसको ज़रूरत हो केवल उसी को मिलता है । अब नेता अफ्सर या पत्रकार होने से आप को वी आई पी नहीं माना जायेगा , किसी को भी किसी प्रकार का विशेषाधिकार नहीं मिलेगा । हर नागरिक को समान समझा जाता है अब । पहले जैसे बाकी लोगों को अनदेखा कर आपको प्राथमिकता दी जाती थी अब नहीं मिल रही है ।अब चाहे राशनकार्ड बनवाना हो या फिर अपने ड्राइविंग लाइसेंस का नवीनीकरण करवाना हो इनको भी खुद जाना होगा सरकारी कार्यालय और इंतज़ार करना होगा अपनी बारी का । अब कोई नहीं सुनेगा कि आपका समय कितना कीमती है और न ही ये कि आम जनता की तरह इंतज़ार करना आपको अपना अपमान लगता है । आप कोई वाहन चला रहे हों अथवा कोई उद्योग चलाते हों , कोठी - कारखाना जो भी बनाना चाहते हों , सभी नियमों का पूरी तरह पालन करना ही होगा । मनमर्ज़ी करके जुर्माना भरने से अब छूट नहीं सकते हैं । किसी को भी अपनी सुविधा से ऐसा कुछ भी नहीं करने दिया जाता है जिससे बाकी लोगों को परेशानी हो सकती हो । जब चाहे गली या सड़क को रोक नहीं सकते हैं न धार्मिक आयोजन करने के लिये न ही सभा आयोजित करने के लिये और विरोध करने के लिये भी कोई किसी तरह आम जनता को ढाल नहीं बना सकता है । कानून ऐसा होते देख चुपचाप नहीं रहता अब । अब किसी को शोर मचाने और गंदगी फैलाने का भी कोई अधिकार नहीं रह गया , ऐसे हर कदम पर सज़ा मिलती है । अब कभी किसी को कुछ भी विरासत में नहीं मिलेगा न ही सिफारिश से ही । स्कूल कॉलेज में दाखिले से नौकरी तक सब काबलियत से ही मिलेगा , बाप दादा का नाम और पैसा सब आसानी से नहीं दिलवा सकता है ।
          
    कहना कठिन है कि राजनैतिक दलों को आसानी होगी या उनकी मुश्किलें अधिक बढ़ जायेंगी । अब उनके लिये सीमा से एक रुपया अधिक भी चुनाव पर खर्च करना मुसीबत बन जायेगा । दोषी पाये जाने पर उनका चुनाव ही रद्द नहीं होगा , उनको सज़ा भी मिलेगी और भविष्य में चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध भी । सब से बड़ी मुश्किल होगी सांसदों विधायकों को मिलने वाली हर वर्ष की कल्याण राशि को खर्च करने की । बिना भ्रष्टाचार किये ये कर पाना जब कठिन लगेगा तब वो खुद ही इस संविधान विरोधी अधिकार को छोड़ना चाहेंगे । जिस दिन से भ्रष्टाचार का अंत हुआ है , मीडिया वालों के दिन खराब आ गये हैं , न उनको ख़बरें मिल रही हैं न काम करने में कोई लुत्फ़ ही आ रहा है । अब कोई नेता कोई अफ्सर उनसे डरता नहीं है , कोई भी सर पर नहीं बिठाता है । वो पहले सी धाक नहीं रही कि प्रैस शब्द लिखवा लिया वाहन पर तो कोई रोक टोक नहीं हो , न ही पत्रकार हैं का परिचय देने से ही सब हाथ जोड़ काम कर देते हैं । अब जब कोई बताता है कि मैं पत्रकार हूं तो जवाब मिलता है तो हम क्या करें , यहां सभी एक समान हैं । आम और खास का रत्ती भर भी अंतर नहीं रह गया है जब से भ्रष्टाचार समाप्त हुआ है । सब लोग जो आसमान पर उड़ते रहते थे आजकल ज़मीन को तलाश करते नज़र आते हैं । ये सब जिस दवा से हुआ है वो है लोकपाल नाम की भ्रष्टाचार के कीटाणु को जड़ से मिटाने वाली रामबाण दवा , शायद कई देश चाहेंगे इसे हमसे खरीदना अपने देश से भ्रष्टाचार मिटाने के लिये ।  ये कथा का पहला भाग है जो 2014 में लिखा गया था जब लोकपाल नाम की भ्र्ष्टाचार मिटाने की रामबाण दवा बनाने की बात की गई थी । बाद में हुआ क्या कुछ साल बाद देखना याद रखना भूल जाओगे तो पछताओगे । ईमानदारी खरीदोगे तो समझोगे लोकपाल बनाकर कैसे रहोगे किस दुनिया में जाओगे । 
 
 
 Press Release:Press Information Bureau

जनवरी 09, 2014

POST : 399 बड़ा जूता , ज़्यादा पालिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

    बड़ा जूता , ज़्यादा पालिश ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

हमने बड़े अधिकारी से कहा " विभाग आपका बहुत ही बदनाम है। भ्रष्टाचार खुलेआम है , बिना रिश्वत होता नहीं किसी का भी काम है। " अधिकारी बोले साफ साफ कहो आपका कैसा काम है , हर काम का फिक्स दाम है। सच पूछो तो इसमें ही आराम है , जो भी है सरेआम है। हमको तो काम ही काम है , क्या बतायें सुबह है कि शाम है। पैसे का ही खेल सारा है। कर्मचारियों में कायम भाईचारा है। हर दिन का यही किस्सा है। बराबर सभी का हिस्सा है। लेने और देने वाले जब राज़ी हैं। आप किस बात के क़ाज़ी हैं। बेबुनियाद आपके इल्ज़ाम हैं। मुफ्त में कर रहे बदनाम हैं। नासमझ बीस पचास ले लेते हैं। ईमान को सस्ते में बेच देते हैं। हम कभी न ऐसा करते हैं। जब बिकते हैं अपना घर भरते हैं। वे ईमानदार कहलाते हैं , जो खुद भी खाते हैं और दूसरों को भी खिलाते हैं। हर दिन सब के काम आते हैं। जो भी देता है उसका ही हुक्म बजाते हैं। कुछ नोट मिल जाते हैं , सब चेहरे खिल जाते हैं। और नहीं दुनिया में कोई नाता है। सब जगह झूठा बही खाता है। चंद सिक्कों में बेड़ा पार है। नौ नकद न तेरह उधार है। तेल है तेल की धार है , आजकल का ये सच्चा प्यार है। आप तो बेवजह घबराते हैं , न खुद खाते हैं न हमें खिलाते हैं। खाली बातें ही बनाते हैं। बातों से कभी पेट भरता है , तुम क्या जानो पापी पेट क्या करता है। भ्रष्टाचार भी इक तपस्या है , ये नहीं कोई समस्या है। यह हर रोग की दवा है। तुम भी उधर चलो जिधर की हवा है। समझदारी से राह आसान हो जाती है , कुछ नोटों से गहरी पहचान हो जाती है। वरना यहां किसे कौन जानता है , जब भाई की भाई तक नहीं मानता है। सौ दो सौ लेने वाले रंगे हाथ पकड़े जाते है। वही रिश्वतखोर कहलाते हैं। लाखों खाने वाले नहीं हाथ आते हैं। करोड़ों खाने वाले सब छूट जाते हैं। "
    " रुपया दो रुपया भीख मांगना शर्म की बात होती है। चंदा मांगने वालों की और ही बात होती है। तब बस देने वालों की औकात होती है। कमीशन और दलाली बाज़ार के बड़े शो रूम वाला खेल है। भीख सड़क किनारे लगी सेल है। नेताओं को एंटीसिपेटरी बेल है , रहने को रेस्ट हाउस कहने को जेल है। भ्रष्टाचार तो दिलों का मेल है। इसकी बनी न कोई नकेल है। आप भी प्यार मुहब्बत को चलने दीजिये , जलने वालों को जलने दीजिये। चाहने वाले कहां घबराते हैं , राह नई रोज़ बनाते हैं। देश में कितने घोटाले हुए , कितने चेहरे काले हुए। कभी दलाली कभी हवाले हुए। सब के सब बरी होते रहे , आप तब चैन से सोते रहे। जाने कब सीधी राह पे आओगे , बहती गंगा में नहाओगे। अब भी नहीं समझे तो पछताओगे , प्यासे आये थे प्यासे ही जाओगे। "
                  सुनकर उनका प्रवचन हम तो घबरा गये , जाने कहां हैं हम लोग आ गये। दिन में भी लग रही रात है। हां ये इक्कीसवीं सदी की बात है। अधिकारी से बचकर जो बाहर को आये। बड़े बाबू से थे जा टकराये। वो मुस्कुरा कर बोले तो उनसे मिल आये , होंठ लगता है सिल आये। कहना जो हमारा मान जाते , सस्ते में ही छूट जाते। मामला जितना ऊपर जाता है , रिश्वत का भाव बढ़ता जाता है। बड़ा जूता अधिक पालिश खाता है। अब आपका काम करने से सब कर्मचारी डर गये हैं। समझो रिश्वत के दाम चढ़ गये हैं। ईमानदारी की बात करना छोड़ दीजिये , भ्रष्टाचार से नाता जोड़ लीजिये। काम आपका हो जायेगा। वहीं कोई सरकारी साधु भजन गा रहा था " जो खोयेगा वही पायेगा।  "

जनवरी 08, 2014

POST : 398 मृत्युलोक का सीधा प्रसारण ( तरकश ) डा लोक सेतिया

    मृत्युलोक का सीधा प्रसारण ( तरकश ) डा लोक सेतिया

      यमराज उस परेशान आत्मा को लेकर सीधे धर्मराज जी की कचहरी में आये। चित्रगुप्त ने बही खाता खोल कर उनके कर्मों का विवरण प्रस्तुत किया। और धर्मराज को बताया कि इस आत्मा ने सदा सदकर्म ही किये हैं जीवन भर , मगर हमेशा ही परेशान होते रहे हैं धरती पर लोगों को अपकर्म करते देख कर। लेकिन इनके मन में ईश्वर के न्याय के प्रति हमेशा सवाल उठते रहे हैं। यहां तक कि मरने के बाद जब यमराज इनकी आत्मा को ला रहे थे तब भी इनकी आत्मा यही सोचती आ रही थी कि अगर ईश्वर से सामना हुआ तो पूछेंगे कि अपनी बनाई हुई सृष्टि की व्यवस्था को सुधारने का कोई कारगर उपाय क्यों नहीं करते आप हे ईश्वर। परेशान आत्मा की बात समझ धर्मराज जी को भी उचित  लगा उसे उसके सवालों के जवाब स्वयं भगवान से दिलवाना। ईश्वर के निजि कक्ष में धर्मराज जा पहुंचे उस आत्मा को साथ लेकर , ईश्वर ने जानना चाहा ऐसी क्या परेशानी है जो आपको मेरे पास आना पड़ा। धर्मराज बोले कि इस आत्मा के कुछ सवाल हैं जो सुन कर मुझे भी चिंता करने वाले ही लगे और उनका जवाब आप ही दे सकते हैं। ये आत्मा आपकी बनाई सृष्टि की खराब व्यवस्था से बेहद चिंतित है और चाहती है आप उसको सुधारने को कोई कारगर उपाय शीघ्र करें। ईश्वर कहने लगे हे परेशान आत्मा आपकी परेशानी सही है और मैं भी बहुत ही बेचैन रहता हूं इस बात को सोच सोच कर। मगर कोई उपाय सूझ ही नहीं रहा है। जिनको सत्य का धर्म का मार्ग दिखलाना था सभी को वही खुद भटक गये हैं , लोग उनको धर्मगुरु मान सर झुकाते हैं जबकि वो लोभ मोह अहंकार में डूबे रहते हैं। बात एक कंस या एक रावण की होती तो मैं खुद अवतार लेकर उसका अंत कर देता , मगर वहां तो तमाम कपटी लोग खुद को मेरा ही अवतार घोषित करने लगे हैं और करोड़ों लोग उनके झांसे में आ उनकी जयजयकार करते हैं। अब इतने लोगों के इस अंधविश्वास का अंत कैसे करूं और कैसे सच और झूठ उनको समझाऊं ये मेरी भी समझ में नहीं आ रहा है। परेशान आत्मा बोली ईश्वर मैं आपको एक सुझाव देना चाहता हूं , हमारे देश में जब किसी समस्या का कोई हल नज़र नहीं आता है तब सरकार एक प्रतिनिधिमंडल अपने नेताओं एवं अफ्सरों का विदेश भेजती है कि वे देख कर आएं कि उस देश में ये सब क्यों नहीं है। क्या उपाय किया हुआ है उन देश वालों ने। वो अलग बात है वो नेता अफ्सर वहां ये जानने का प्रयास नहीं करते , बस सैर सपाटा कर लौट आते हैं। आने के बाद कोई एक नई समस्या खड़ी कर देते हैं , पहले चल रही कितनी ही असफल योजनाओं जैसी एक और योजना प्रस्तुत कर , जिसका कार्यभार उनको सौंप दिया जाये। नतीजा वही ढाक के तीन पात , लेकिन आप ऐसा नहीं हो इसलिये अपने ऐसे ईमानदार देवी देवताओं को पृथ्वी का भ्रमण करने को भेजें जिनको अपनी पूजा , अपने नाम पर बनाये मंदिरों के चढ़ावे और वहां आये भक्तों की भीड़ को देख प्रसन्न होने की बुरी आदत नहीं हो। जो किसी पापी या अधर्मी को क्षमा नहीं करते हों प्रार्थना सुनकर।

                   ईश्वर बोले परेशान आत्मा आपने मेरे सामने उस लोक से लेकर इस लोक तक की सही तस्वीर प्रस्तुत कर दी है। मैं आपको अपना विशेष सलाहकार नियुक्त करना चाहता हूं इस समस्या को समाप्त करने के उपाय खोजने के काम में योगदान दें आप भी। परेशान आत्मा बोली कहीं आप वही जल्दबाज़ी तो नहीं करने जा रहे जो हमारे प्रदेश में मुख्यमंत्री किया करते हैं। जिसको अपना विश्वासपात्र समझ ओ एस डी नियुक्त करते हैं वही उनके नाम पर सत्ता के जमकर दुरूपयोग करता है। सब से अधिक भ्रष्टाचार , घोटाले ऐसे ही लोग करते हैं , आप ऐसे आंख मूंद किसी का भी ऐतबार नहीं कर सकते। अधिकार मिलते ही सब बदल जाया करते हैं , मुझे खुद अपने आप पर भरोसा नहीं कि आपने मुझे इतनी शक्ति दे दी तो मैं क्या करूंगा , हो सकता है आपको भी धोखा देने लग जाऊं , इस कलयुग में कुछ भी संभव है हे ईश्वर। ये सुन ईश्वर की चिंता और अधिक बढ़ गई , उन्होंने पूछा परेशान आत्मा आपने तो मुझे दुविधा से निकालने की जगह मेरी दुविधा को और बढ़ा दिया है। आप क्या ये कहना चाहते हैं कि मैं अपने ही घर के सदस्य सभी देवी देवताओं पर भी भरोसा नहीं किया करूं। भला मैं ऐसा किस तरह कर सकता हूं , इस कदर अविश्वास करके हम एक साथ कैसे रह सकते हैं। परेशान आत्मा ने कहा कि अगर मेरी बात का बुरा नहीं मानें तो मैं आपको सुझाव दे सकता हूं। ईश्वर बोले अवश्य बताओ और अगर उचित लगा तो हम उस पर अमल भी करेंगे। परेशान आत्मा ने कहा हे ईश्वर आप सब कि पल पल की निगरानी की व्यवस्था करें। ईश्वर बोले ये सच है कि ऐसा माना जाता है कि मुझे सब की हर बात की खबर है , मगर मैं ऐसा नहीं कर सकता हूं , मुझे एक सीमा से अधिक किसी की निज्जता में झांकना अनुचित प्रतीत होता है। पल पल की बात पूछना या जानना तो मुमकिन नहीं है किसी भी तरह , आखिर मुझे भी कुछ समय चाहिये खुद के लिये। परेशान आत्मा कहने लगी मैं उपाय बताता हूं जिससे आपको कोई परेशानी नहीं होगी न किसी को कुछ मालूम होगा कि उनकी निज्जता में कोई दखल है , सब गोपनीय तरीके से होगा , आपको छोड़ किसी को भी कोई भनक नहीं लगेगी। बस आपको ये पुराने ढंग छोड़ नई तकनीक का सहारा लेना होगा। ईश्वर हैरान हो कर बोले बताओ ऐसी क्या तकनीक हो सकती है।

      तब परेशान आत्मा ने बताया बिग बॉस नामक टीवी शो में यही होता है , बिग बॉस किसी को दिखाई नहीं देता मगर उसको सब नज़र आता रहता है। वह आदेश देता है , निर्देश देता है , कैमरे और माईक से पल पल की खबर रखता है। घर में रहने वाले अगर चाहें भी झूठ नहीं बोल सकते , ज़रूरत होने पर उनको उनकी असलियत दिखाई जा सकती है। आप मृत्युलोक से अपने पास सीधा प्रसारण करवाने की व्यवस्था करें , और खुद देखते रहें सब कुछ। आपको नज़र आएगा किस तरह नेता , अफ्सर देश को लूट रहे हैं , सरकार और प्रशासन कितना अमानवीय कर्म कर रहे हैं। जब सभी के अपकर्मों को आप खुद देख सकेंगे तब अपने सभी देवी देवताओं को भी निर्देश दे सकेंगे कि वे अपने अपने भक्तों को अपकर्मों की कड़ी सज़ा दें न कि अपनी स्तुति से प्रसन्न हो उनके अपराध क्षमा करते रहें। जब ईश्वर ने अपने लोक में नये टीवी चैनेल स्थापित करने की योजना को स्वीकृति प्रदान कर दी तब परेशान आत्मा ने कहा हे ईश्वर एक अंतिम बात और बतानी ज़रूरी है। सावधान रहना , अपना चैनेल किसी मुनाफाखोर को ठेके पर कभी मत देना वर्ना कोई हमारे देश के टीवी चैनेलों की तरह झूठे विज्ञापनों द्वारा पैसा कमाने के लालच में अपने ध्येय से भटक सकता है। ईश्वर ने इस कार्य के लिये महाभारत वाले संजय की सेवायें लेने का निर्णय लिया है। नेता , अपराधी , पाप - अधर्म करने वालों के साथ साथ धर्मोपदेशक भी संभल जायें , क्योंकि ईश्वर न केवल खुद सब देखेगा बल्कि इनके अपकर्मों को सभी को दिखाया भी करेगा , बिग बॉस की तरह। अब पता चलेगा असली बिग बॉस कौन है ।  

जनवरी 07, 2014

POST : 397 कविता की बात ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

      कविता की बात ( हास-परिहास ) डा लोक सेतिया

हमने पहले से ही तय कर लिया था कि अगर कभी भी हम प्यार करेंगे तो सिर्फ कविता से करेंगे। जब हम कवि हैं तो हमारी कविता भी होनी चाहिये कोई , जिसे दिलोजान से प्यार करें उम्र भर हम। मगर हमारे नसीब में लिखा ही नहीं था किसी कविता नाम की लड़की से कभी मुलाकात करना। फिर भी ये शब्द हमें अपना सा लगता था और हम हमेशा यही सोचा करते थे कि अगर हमें कोई कविता नहीं मिलेगी तब हम जो भी मिलेगी विवाह के बाद उसका नाम कविता रख लेंगे। अफसोस न कोई कविता नाम वाली मिली न हमने कभी इश्क़ किया। समझा जाता है कि इश्क़ में आशिक को अच्छी कविता लिखना खुद ब खुद आ जाता है। लेकिन जब हमारे विवाह की बात चली तो और हमें बताया गया कि कन्या का नाम कविता है तो हमने देखे बिना ही हामी भर दी। अब जिसका नाम कविता है उसे देखने की क्या ज़रूरत , सोच लिया उम्र भर कविता को ही देखेंगे , कविता ही पढ़ा करेंगे , लिखते तो पहले से ही हैं। शादी का शुभ महूर्त निकालते समय पंडित जी कहने लगे कि कविता नाम तुम पर बहुत भारी पड़ सकता है इसे बदलना ही उचित है , हमने कहा कि ऐसा है तो ग़ज़ल नाम रख देते हैं , मगर ये भी उनको नहीं जचा तो हमने कह दिया कि फिर हमारा नाम बदल कर कविता के हिसाब से रख दो। ये सुन कर हंस दिये सभी कि भला ऐसा कहीं होता है , लेकिन हमने कविता को कविता ही रहने देने की ज़िद ठान ली और नाम को नहीं बदलने दिया। इस तरह हमने अपनी ख़ुशी से शादी कर ली कविता नाम की लड़की के साथ। और बहुत जल्द हमें कविता कविता में ज़मीन आसमान का अंतर नज़र आने लगा , साथ ही इस बात का अर्थ भी समझ आने लगा कि एक म्यान में दो तलवारें कभी नहीं समा सकती। पर अब हमें तो तमाम उम्र दोनों कविताओं को साथ रखना ही था।

                                    इधर जब से हमें बुलावा आया है कवि सम्मलेन में कविता सुनाने का तब फिर से खुद के कवि होने का यकीन होने लगा है , अन्यथा श्रीमती जी की बातों को मान हमने भी सोच लिया था कि हम जो लिखते हैं वो बेकार की तुकबंदी के सिवा कुछ भी नहीं है। यूं भी पत्नी होने के नाते हमारी कविताओं को बिना पढ़े , बिना सुने ही रद्द करने का उनका विशेषाधिकार है। जब सुहागरात को ही हमने उनको अपनी कविता सुनाई थी जो उनके नाम लिखी थी हमने तभी उन्होंने तय कर लिया था कि कैसा बर्ताव अपनी सौतन से करना है। बस वही पहली और आखिरी बार हमारी कविता सुनी थी श्रीमती जी ने। बहुत कोशिश की मगर कविता जी को कविता कभी पसंद नहीं आ सकी। हमने उनकी तारीफ में भी लिखी कविता , मगर उनको वो तारीफ भी फीकी ही लगी , हम हार गये इस प्रयास में आखिर। एक बार यूं ही भूले से कह बैठे कि आग लगा सकती है ये कविता तो वे बोलीं देखेंगी किसी दिन चूल्हे में डालकर। तब से हमने उनको अपनी कविताओं से और अपनी कविताओं को उनसे फासले पर रखना लाज़मी समझा है। अब उनको भी तसल्ली है कि बच गई हैं मेरी कवितायें सुनने से। हमें इस बात का अफ़सोस रहता था कि हमारे फन की कद्र नहीं जानती हैं। जब कभी घर आ कर बताते कि दोस्तों ने कविता सुन बड़ी दाद दी , तब उनका कहना होता कि ज़रूर उनको कुछ मतलब होगा , तभी खुश करना चाहते हैं आपको।श्रीमती जी को यकीन ही नहीं बल्कि उनका दावा है कि जो वो मानती हैं या कहती हैं वही सब से बड़ा सत्य है और बाकी सब कुछ मिथ्या है। एक दिन जब बाहर से घर आये तो देखा कि जिन कागज़ों पर हमारी कवितायें लिखी हुई हैं वो नीचे फर्श पर बिखरी पड़ी हैं। पूछने पर जवाब मिला कि तुमने ही बोला था घर की साफ सफाई के लिये , इसलिये कबाड़ी को बुलाया था फालतू का सामान बेचने के लिये। सब खरीद कर ले गया लेकिन इन स्याही से लिखे कागज़ों को उसने अखबार की रद्दी के भाव भी लेने से इनकार कर दिया। देख लो इन कविताओं को ढाई रुपये किलो भी नहीं खरीदा उसने। हमने शुक्र मनाया कि बाल बाल बच गये और अपनी कविताओं को समेट कर अलमारी में रख ताला लगा दिया। लेकिन जब से हमने अपनी रचनायें पत्र पत्रिकाओं में भेजना शुरू किया और वो छपने लगी तब से श्रीमती जी के तेवर थोड़ा नर्म होने लगे थे। जब पहली बार किसी कवि सम्मेलन का बुलावा आया तो श्रीमती जी कहने लगी वहां सफेद कुर्ता पायजामा पहन कर मत जाओ , लोग सुना है अंडे टमाटर साथ लाते हैं फैंकने को। मगर हम नहीं माने थे , और जब सही सलामत घर वापस आये तो अपना कुर्ता उतार कर उनके हाथ में पकड़ा कर कहा कि देख लो कोई दाग़ नहीं लगने दिया इसपर हमने। श्रीमती जी आदत से मज़बूर कुर्ते की जेब को टटोलने लगी , और उसमें से एक लिफाफा निकाल बोली ये क्या है। हमने कहा , याद आया ये कवि सम्मेलन के आयोजकों ने दिया था ये कह कर कि सम्मान पूर्वक दे रहे हैं। श्रीमती बोली कि इसमें है क्या , हमने कहा कि हमने देखा नहीं आप ही देख लो क्या डाला हुआ है। उन्होंने देखा तो ढाई सौ रुपये निकले , मगर श्रीमती जी ये मानने को हर्गिज़ तैयार नहीं कि जिस रद्दी को कबाड़ी ढाई रुपये किलो भी लेने को नहीं माना था उसके दो पन्नों को पढ़ कर सुनाने पर कोई ढाई सौ रुपये दे देगा। हमने कहा ये आपके लिये हैं तो खुश होकर पैसे रखने के बाद भी उनका मानना है कि ये खुद हमने अपनी जेब में रखे होंगे उनको खुश करने के लिये। और जैसा सदा वे समझती हैं जो वो मानती हैं वही सच है। हम तो बस मन ही मन सोचते रह जाते हैं कि काश कविता जी कभी कविता का मोल समझ पाती। ये इक कविता की बात है और दूजी कविता का दर्द भी। 

जनवरी 06, 2014

POST : 396 फ्रैंडली क्रिकेट मैच ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       फ्रैंडली  क्रिकेट मैच ( तरकश ) डा लोक सेतिया

       इस देश में हर किसी को एक काम करना बहुत अच्छी तरह आता है। क्रिकेट खेलना। नेता अभिनेता अफ्सर शिक्षक डॉक्टर वकील छात्र चाहे जो भी कुछ हों हम , अपना वास्तविक काम भले करना जानते हों या नहीं , क्रिकेट खेलना ही नहीं इस खेल की हर बात जानते हैं सभी। इसमें पुरुष या स्त्री का भी कोई अंतर नहीं , सब इक दूजे से बढ़कर हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि टीम इंडिया के खिलाड़ियों को छोड़ कर बाक़ी सब बेहतरीन क्रिकेट खेलने वाले हैं। लगता है हमारे देश के लोगों के पास ये खेल खेलने को फुर्सत ही फुर्सत है , उसके इलावा और कुछ भी करना बिल्कुल ज़रूरी नहीं है। सब के पास वक़्त है क्रिकेट खेलने के लिये , तभी यहां फ्रैंडली क्रिकेट मैच आयोजित होते रहते हैं। कभी नेताओं कभी कलाकारों कभी प्रशासन कभी पुलिस कभी पत्रकारों का ,तो कभी इनमें से किसी का किसी के साथ फ्रैंडली क्रिकेट मैच होता ही रहता है। खेल भले कोई भी रहा हो , जनता ताली बजाने को रहती है हर बार। भारत देश में जिसे क्रिकेट खेलना नहीं आता उसका देश प्रेम अधूरा समझा जाता है। क्रिकेट का खेल ही अब पैमाना है देशप्रेम को परखने का , हम देशप्रेम प्रकट करने के लिये अन्य किसी बात किसी खेल को महत्व नहीं देते , बस यही एक साधन है देश के प्रति अपनी भावना व्यक्त करने के लिये। क्रिकेट में हारना जीतना हमारे लिये राष्ट्रिय चिंता का विषय होता है। अब तो हम ये भी मानते हैं कि क्रिकेट को खाया जा सकता है , बिछौना बना कर सोया जा सकता है , ओढ़ना पड़े तो ओड़ा जा सकता है , और ज़रूरत हो तो शीतल पेय की तरह पिया जा सकता है। ऐसे जनता को जो भी चाहिये , रोटी , पानी , छत या वस्त्र सब मिल सकते है केवल इसी से। बड़े ही काम की चीज़ है क्रिकेट। दोस्त को दुश्मन बना सकता है ये खेल और दुश्मन को दोस्त भी यही बना सकता है। यहां तक कि किसी को भगवान बना सकता है क्रिकेट। क्रिकेट ने एक नया भगवान दिया है हमें , देने को सिनेमा ने भी दिया है दूसरा एक भगवान लेकिन जो बात क्रिकेट वाले भगवान की है वो और किसी की भला हो सकती है। क्रिकेट माया है और इक मायाजाल है क्रिकेट का। क्रिकेट जैसा और कुछ भी नहीं है। इसकी महिमा का बखान करना इस तुच्छ लेखक के बस की बात नहीं है। क्रिकेट तो क्रिकेट ही है।

                                     चोरियों के सुहाने मौसम में चौकीदार इलैवन का थानेदार इलैवन के साथ फ्रैंडली क्रिकेट मैच रखा गया है। ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि प्रयोजक चोर सभा ही है और मामला चोरी के माल में बंदरबांट का भी है। दोनों ही टीमों में चोरों को शामिल किया गया है जीत की संभावना बढ़ाने के लिये। कौन सी टीम कितने रन बनाती है और कितने विकेट बचा पाती है इसी को आधार बनाया जायेगा ये तय करने का कि चोरी के माल में उसका कितना हिस्सा होगा। इसलिये बात खेल भावना से अधिक पापी पेट की बन गई है। कुछ पुराने समझदार चोरों ने चौकीदार इलैवन के कप्तान को समझाने का प्रयास किया कि थानेदार इलैवन को जीतने देने में ही सबकी भलाई है। लेकिन वो ज़िद पर अड़ गया है कि उनको हरा कर ही रहेगा ताकि अधिक हिस्सा हासिल कर सके। वो थानेदार इलैवन को कड़ी टक्कर देने की बात करने लगा है। अब वो ये नहीं होने देना चाहता कि सारा माल बंदर हड़प जायें और हम बिल्लियों की तरह आपस में झगड़ते रह जायें। थानेदार को भी आसार अच्छे नहीं नज़र आ रहे , उसे भी लग रहा है कि अब उसका रौब पहले जैसा नहीं चल रहा है। चोरों की बातों का असर चौकीदारों पर भी होने लगा है , उनको भी लगता है कि मेहनत हम करते हैं और फल कोई और खाता रहता है। मुकाबला शुरू होने से पहले दोनों टीमें अभ्यास में जुटी हुई हैं। जब थानेदार और चौकीदार टॉस करने लगे तब चोरों को एक सुनहरी अवसर मिल गया है।

                            अचानक चोरों ने ये घोषणा करके सनसनी पैदा कर दी है कि वे थानेदार या चौकीदार इलैवन में शामिल होकर नहीं खेलेंगे , बल्कि अपनी अलग टीम बना खेल में भाग लेंगे। उन्होंने मांग की है कि एक मैच न रख कर त्रिकोणीय मुकाबला करने को तीन मैच होने चाहियें ताकि सब को समान अवसर मिले अपनी प्रतिभा दिखाने का। खेल खेल न रह कर जंग बनता जा रहा है। मामला बिगड़ नहीं जाये इसलिये एक सर्वदलीय बैठक आयोजित की गई जिसमें कुछ वरिष्ठ लोगों की समिति का गठन किया गया खेल के नियम और रूपरेखा तय करने के लिये ताकि खेल को मित्रता की भावना से खेला जा सके। समिति ने विचार विमर्श करने के सब सुलझा दिया है। सब को ये बात समझा दी गई है कि हम सभी का हित जीत हार में नहीं बल्कि आपसी भाईचारा कायम रखने में है। एक प्रकार से मैच को पहले से फिक्स कर दिया गया है। सभी की भलाई इसी में है ये सब मान गये हैं। समिति का कहना है कि जब टीम इंडिया के खिलाड़ी खेल से अधिक ध्यान विज्ञापनों की आय पर रख सकते हैं तो चोरों , चौकीदारों को ही क्रिकेट की चिंता करने की क्या ज़रूरत है। सब को अपना अपना हिस्सा मिलता है और मिलता रहेगा। हमारा ध्येय आपसी प्यार को विश्वास को बढ़ाना है। थानेदार इलैवन की जीत ही चोरों और चौकीदारों की जीत है।

जनवरी 05, 2014

POST : 395 कब और कैसे बदलेगी तस्वीर देश की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

  कब और कैसे बदलेगी तस्वीर देश की ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

हक़ नहीं खैरात देने लगे , इक नई सौगात देने लगे। मेरी ये ग़ज़ल तब भी सच थी जब खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया गया था और आज भी सच है। बहुत खेद की बात है कि हर सत्ताधारी खुद को दाता और जनता को भिखारी समझता है। जनता को उसके अधिकार कब मिलेंगे और कैसे असली सवाल यही है। बहुत सारी बातें हैं चर्चा को , बारी बारी से कुछ खास पर आज चिंतन किया जाये। सब से पहले उसकी बात जो सब बातों का आधार है , लोकतंत्र के बारे में सोचा जाये। शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि कोई सरकार जनता के पचास प्रतिशत से अधिक वोटों को हासिल कर बनी हो , इसके बावजूद नेता दावे करते हैं कि उनको जनादेश मिला है। वास्तव में कभी किसी भी दल ने ये ज़रूरी ही नहीं समझा कि सच में देश की जनता का बहुमत उसको मिले। सभी का ध्येय निर्वाचित सदस्यों का बहुमत हासिल करना रहा है। और उसको जुटाने के लिये हर किसी से समझौता किया जाता है , विचारधारा का कोई सवाल ही नहीं। मतलब सब की विचारधारा एक समान है कि जैसे भी हो कुर्सी पर आसीन होना। जनता जब एक दल को हराती है और दूसरे को चुनती है तब उसको केवल नाम और चेहरे नहीं बदलने होते , व्यवस्था में परिवर्तन करना होता है। मगर बार बार धोखा मिलता है देश की जनता को , लोग , नाम , दल , चेहरे ही बदलते हैं बाकी कुछ भी नहीं बदलता है। एक बात हैरानी की है कि हम लोग धर्म और राजनीति दोनों के बारे सोचते हैं सब जानते हैं जबकि जानते बहुत ही कम हैं। हम जिन ग्रंथों को पूजते हैं उनमें जो लिखा है उस पर शायद ही विचार करते हैं। अगर करते होते तो इतने धर्मों , मंदिर , मस्जिद , गिरिजाघर और गुरुद्वारों के होने और इतने धार्मिक आयोजन होने के बाद इतना पाप इतना अधर्म हर तरफ दिखाई नहीं देता। कुछ ऐसा ही हम लोकतंत्र को और जिस पर हमारा लोकतंत्र टिका है उस संविधान को ही जानते हैं। क्या आप जानते हैं कि संविधान में किसी दलीय लोकतंत्र की कोई बात नहीं कही गई है। केवल जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि चुनने की बात है , और ये भी कि जनता के निर्वाचित प्रतिनिधि चुनेंगे देश की सरकार चलाने को पधानमंत्री अथवा राज्यों का मुख्यमंत्री। आज क्या हो रहा है , कब से होता आया है कि कोई दल पहले से तय करता है कि कौन अगली सरकार का मुखिया होगा। क्या ये अधिकार उनका नहीं होना चाहिये जिनको जनता अपना प्रतिनिधि चुनेगी। एक और बेहद महत्वपूर्ण बात है कि हम सब बातें करते हैं आज़ादी की जबकि हमारे विधायक और सांसद तक आज़ाद नहीं हैं , उनको अपने दल की हर बात माननी होती है। क्या राजनीतिक दल बड़े हैं , हमारी निजि आज़ादी उनके हितों से छोटी है। दिल्ली में एक नई सरकार बनी है अभी अभी , बहुत बदलाव की बातें की इन लोगों ने।  मगर चार दिन भी नहीं टिक पाये अपनी बातों पर। ये भी नहीं सोचा कि उनको कोई पूर्ण बहुमत नहीं मिला जिसको सही मायने में जनादेश समझा जाता और अभी से इतराने लगे हैं। अब वे भी अन्य दलों की तरह सोचते हैं कि यहां सत्ता मिल गई अब देश की सत्ता को हासिल करना है। काश कोई सोचता कि केवल सत्ता ही हासिल नहीं करनी बल्कि व्यवस्था को बदलना है जिससे तंग आकर जनता ने पिछली सरकार को हराया है। सिर्फ बिजली पानी में छूट देने से कुछ नहीं बदल सकता , साफ कहें तो ये एक छल है क्योंकि जो सबसिडी सरकार किसी भी रूप में देती है वो भार जनता पर ही पड़ता है घूम फिर कर। इनसे महत्वपूर्ण काम हैं , अस्प्तालों में सही इलाज , स्कूलों में सही शिक्षा सभी को एक समान मिले , कानून व्यवस्था को सही किया जाये , अन्याय और शोषण बंद हो। सब से पहला काम होना चाहिये कि कुछ मुट्ठी भर लोग ही सब फैसले करने के हकदार नहीं हों। विधानसभा हो या संसद या फिर कोई संगठन हो चाहे मंत्री परिषद , हर जगह सभी की राय ली जानी चाहिये। लोकतंत्र के नाम पर अभी तक कुछ लोग , कुछ परिवार ही शासन करते रहे हैं , अब इसका अंत होना ही चाहिये।जिस देश की दो तिहाई आबादी गरीबी की रेखा से नीचे नर्क से बदतर जीवन जीती हो उसके नेता अगर विलासिता पूर्वक जीवन जनता के पैसे से जियें तो ये किसी जघन्य अपराध से कम नहीं। कहने को लोकतंत्र में जनता देश की मालिक है और प्रशासन व सांसद , विधायक उसके सेवक।  मगर क्या ये उचित है कि जो मालिक हो वो भूखा रहे और जो उसके सेवक हों वो ऐश से रहें। बहुत बातें की जाती हैं सब को बराबर सब कुछ मिलने की , मगर कैसे हो ऐसा ये कोई नहीं बताता। देश का धन , संपति , हर सुविधा का एक बहुत बड़ा हिस्सा कुछ एक लोगों के कब्ज़े में है , अगर गरीबों का कल्याण करना है तो अमीरों से लेना ही होगा जो उनके पास ज़रूरत से बहुत अधिक है। अभी तक सरकारें इसका उल्टा ही करती आई हैं। आम जनता को जब भी कुछ देने की बात होती है तो ढोल बजाकर प्रचार किया जाता है , लेकिन उससे कहीं अधिक बड़े बड़े उद्योग घरानों को चुपचाप दे दिया जाता है। आपने देखा होगा वित्तमंत्री प्रधानमंत्री को इन सभी से मिलते , इनकी बात सुनते। कभी देखा है गरीबों से मिलते उसकी बात सुनते , नहीं उसको केवल भाषण सुनाये जाते हैं या अपने दरबार में बुलाया जाता है हाथ जोड़ भीख मांगने को। संविधान की रक्षा की शपथ लेने वालों ने आज तक उसकी भावना का अनादर ही किया है। आज तक किसी अदालत ने ये सवाल नहीं किया कि संविधान में विधायिका को खुद कोई धन खर्च करने का अधिकार ही नहीं दिया गया है उसे योजना बनाने और कार्यपालिका से लागू करवाना चाहिये और उसकी निगरानी करनी चाहिये। ये जो सांसदों और विधायकों को कल्याण राशि मिलने का प्रावधान किया गया है और जिसमें भ्रष्टाचार बहुत आम है वो संविधान की अवधारणा के विपरीत है। जनता के धन को नेताओं ने चोरी का माल समझ कर हमेशा बेदर्दी से बर्बाद किया है। चुनाव जीतते ही इनको कोठी कार ही नहीं जाने कितना ताम झाम चाहिये। हर दिन करोड़ों रुपये इनकी रैलियों पर खर्च होते हैं , जो किसी इमानदार की जेब से नहीं आते , ये सारा पैसा आता है उन लोगों से चंदा या उगाही करके जिनको अनुचित लाभ मिलते हैं। कभी सोचा है कि जब कोई मुख्यमंत्री बनता है तब उसका परिवार , बेटा बेटी , पत्नी दामाद , सब के सब इस तरह आचरण करते हैं जैसे उनकी रियासत हो। ये मीडिया वाले भी ऐसे में उनके बच्चों तक का साक्षात्कार लेने लगते हैं। इस देश में कितने लोग बेघर हैं , मगर शायद ही कोई नेता हो जिसके पास अपना घर नहीं हो। फिर भी विधायक सांसद , मंत्री बनते ही इनको सरकारी आवास चाहिये। चलो माना इनको जहां इनका अपना घर है वहां रह कर काम करने में असुविधा हो तो दूसरी जगह घर मिल जाये , लेकिन तब क्या इनका पहले का घर तब तक सरकारी उपयोग में नहीं रहना चाहिये जब तक इनको मुफ्त आवास सरकार से मिला रहे। वास्तव में किसी भी अफ्सर को जब सरकारी घर मिले तब उसके खुद के घर को जो जिस किसी भी नगर में हो सरकार अथवा जनता के काम के लिये उपयोग किया जाये तो इनकी खुद की आवास समस्या हल हो सकती है। बाकी सब बातों से पहले प्रमुख बात ये है कि क्या कभी इन तथाकथित जनसेवकों को महसूस होगा कि इनसे पहले सभी कुछ उस जनता को मिले जिसकी सेवा करने का ये दम भरते हैं। चलो आज इतना ही , बाकी फिर कभी । 

 

जनवरी 04, 2014

POST : 394 लौट के वापस घर को आये ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    लौट के वापस घर को आये ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     सचिवालय क्या होता है मुझे मालूम नहीं था , कभी गया ही नहीं था अभी तक ऐसी किसी भी जगह। जाने को तो मैं किसी कत्लगाह भी नहीं गया मगर नाम से ही पता चलता है कि वहां क्या होता होगा। सचिवालय शब्द से समझ नहीं सकते कि वो क्या बला है। जब हमारे नगर में सचिवालय भवन बना तब लगा कि वहां सरकार के सभी विभागों के दफ्तर साथ साथ होंगे तो जनता को आसानी होती होगी , काम तुरंत हो जाते होंगे। वहां कुछ पढ़े लिखे सभ्य लोग बैठे होंगे जनसेवा करने का अपना दायित्व निभाने के लिये। मगर देखा वहां तो अलग ही दृश्य था , जानवरों की तरह जनता कतारों में छटपटा रही थी और सरकारी बाबू इस तरह पेश आ रहे थे जैसे राजशाही में कोड़े बरसाये जाते थे। सरकारी कानून का डंडा चल रहा था और लोगों को कराहते देख कर्मचारी , अधिकारी आनंद ले रहे थे , उन्हें मज़ा आ रहा था। कुर्सियों पर , मेज़ पर और अलमारी में रखी फाईलों पर बेबस इंसानों के खून के छींटे साफ नज़र आ रहे थे। कुछ लोग इंसानों का लहू इस तरह पी रहे थे जैसे सर्दी के मौसम में धूप में गर्म चाय - काफी का लुत्फ़ उठा रहे हों। लोग चीख रहे थे चिल्ला रहे थे मगर प्रशासन नाम का पत्थर का देवता बेपरवाह था। उसपर रत्ती भर भी असर नहीं हो रहा था , लगता है वो अंधा भी था और बहरा भी। मैं डर गया था , वहां से बचकर भाग निकलना चाहता था , लेकिन उस भूल भुलैयां से निकलने का रास्ता ही नहीं मिल सका था। तब मुझे बचपन में नानी की सुनाई कहानी याद आई थी जिसमें राजकुमारी राक्षसों के किले में फंस जाती है और छटपटाती है आज़ाद होने के लिये। मगर उसकी तरह मेरा कोई राजकुमार नहीं था जो आकर बचाता मुझे। मैं उन राक्षसों से फरियाद करने , दया की भीख मांगने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था।

                        मुझे नज़र आया एक दरवाज़ा जिसपर बजट व अर्थव्यवस्था का बोर्ड टंगा था , सरकारी लोग उसमें से कहीं जा रहे थे। उस पर लिखा हुआ था आम जनता का जाना मना है , मगर मैं परेशानी और घबराहट में देख नहीं सका और उधर चला आया था। मैंने देखा वहां से एक नदी बहती हुई निकल रही थी और दूर बहुत दूर राजधानी की तरफ जा रही थी। आम जनता का जो लहू सचिवालय के कमरों के फर्श पर बिखरा हुआ था वो धीरे धीरे बहता हुआ उस नदी में आकर पैसे चांदी सोने में बदल जाता था। उसी से बंगले फार्महाउस नेताओं के बनाये जा रहे थे। इस जादू के खेल को वहां लोकतंत्र नाम दिया जा रहा था। उस नदी के एक तरफ स्वर्ग जैसी दुनिया बसी हुई थी , नेता अफ्सर , धनवान लोग जिसमें सब सुख सुविधा पाकर रहते थे।  तो उस पार नदी के दूसरी तरफ नर्क का मंज़र था जहां तीन चौथाई देश की जनता मर मर कर जीने को विवश थी। बता रहे थे हर पांच साल बाद चुनाव रूपी पुल बना कर नेता आते हैं जनता के पास और वादा करते हैं कि बहत जल्द आपके लिये भी स्वर्ग का निर्माण किया जायेगा। झूठे सपने दिखला कर जनादेश लेकर वापस चले जाते हैं अपने स्वर्ग का आनंद लेने को।

                         सचिवालय की सब से ऊपरी मंज़िल बेहद खास लोगों के लिये आरक्षित थी। उसके प्रमुख द्वार पर कड़ा पहरा था और एक बड़ा सा ताला उसपर लगाया हुआ था। सूत्रों से ज्ञात हुआ कि उसमें आज़ादी नाम की मूल्यवान वस्तू बंद कर रखी गई थी जिसके दर्शन केवल वी आई पी लोग ही कर सकते थे। कभी कभी उधर से अफवाह की तरह से जानकारी मिलती थी कि आज़ादी की दशा शोचनीय है , लेकिन हर बार सरकार और सचिवालय खंडन करते थे और कहते थे वो ठीक ठाक है बल्कि पहले से स्वस्थ है। हर वर्ष जश्न मनाते थे और सरकारी समारोह आयोजित कर बताते रहते थे कि आज़ादी इतने वर्ष की हो गई है। मैंने वहां सुरक्षा में तैनात कर्मियों से विनती की थी कि मुझे दूर से ही अपनी आज़ादी की देवी को देख लेने दो , मगर उन्होंने इंकार कर दिया था और मुझसे कहा था तुम सीधे सादे आम आदमी लगते हो , गलती से यहां आ गये हो , चुपचाप वापस चले जाओ वर्ना कोई देश द्रोह का झूठा इल्ज़ाम लगा कर बेमौत मारे जाओगे। तुम्हें नहीं पता कि लोकतंत्र में आम आदमी को आज़ादी को सच में क्या सपने में देखना तक प्रतिबंधित है। हां अगर तुम भी नेता या अफ्सर बन जाओ तो आज़ादी को देख ही नहीं उसके साथ कोई खेल भी खेल सकते हो। तब तुम्हें छूट होगी जो चाहे करने की।

                किसी तरह उस इमारत से बाहर आया था और उसके पिछले हिस्से में पहुंच गया था। देखा सभी दल के नेता वहां वोटों की राजनीति का सबक पढ़ रहे थे। जाति धर्म के नाम पर जनता को मूर्ख बनाने और लाशों पर सत्ता का गंदा खेल खेलने का पाठ पढ़ाया जा रहा था। चुनाव में जीत कर इंसानों की खोपड़ियों को फूलमाला बना गले में पहन इतरा रहे थे। कल तक चुनाव में दुश्मन की तरह लड़ने वाले सहयोगी बन गये थे , इक दूजे को गले लगा बधाई दे रहे थे। नैतिकता की बात करने वालों का अनैतिक गठबंधन हो गया था , विरोधी सहयोगी बन गये थे। दोनों को वोट देने वाली जनता ठगी सी खड़ी थी , अब अगले पांच साल इनकी बंधक बन चुकी थी। उसे अभी भी नर्क में ही रहना है और जब भी सचिवालय की तरफ आना पड़े उसे वही सब झेलना है। मैं भटकते भटकते सचिवालय के सामने पहुंच ही गया था। भाग कर अपने घर वापस आ गया हूं और कसम उठा ली है फिर कभी उधर नहीं जाने की। जान बची तो लाखों पाये।

POST : 393 आईना बेमिसाल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

         आईना बेमिसाल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        आज मैं इक नये मंदिर में खड़ा हूं , जहां किसी भगवान की कोई मूर्ति नहीं है , हर तरफ दर्पण ही दर्पण हैं। हर दर्पण अपनी तरह का है , सब की अपनी अपनी विशेषता है। एक ऐसा दर्पण है जिसमें आप जिस शहर जिस गांव जिस जगह को देखना चाहते हैं वही आपको दिखाई देता है। दूसरा दर्पण आपको फिर से अपना बचपन भी दिखला सकता है और ये भी कि बीस वर्ष बाद आप कैसे नज़र आयेंगे। देखते देखते मैं आईनों के देवता के सामने आ गया हूं , वहां जो आईना टंगा है उस पर लिखा हुआ है , आईना बेमिसाल। मैं उस देवता से सवाल करता हूं कि इस बेमिसाल आईने की विशेषता क्या है। वो बताता है कि इसमें सब कुछ अच्छा दिखाई देता है। बदसूरत से बदसूरत को भी ये सब से खूबसूरत दिखलाता है , पतझड़ भी इसमें बहार नज़र आती है। मुझे लगा कि ये तो सरकार के बजट जैसा , राजनैतिक दलों के चुनावी घोषणापत्र जैसा और प्रशासन की फाईलों जैसा है , उनमें भी जनता को खुश करने को यही तो होता है। मैंने आईनों के देवता से वही आईना मुझे देने को कहा , देवता ने पूछा उस आईने से जाना चाहते हो इसके साथ इसके देश में। आईना बेमिसाल मान गया और देवता ने मुझे देते हुए हिदायत दी कि इसका सही उपयोग ही करना। जब लोगों को पता चला कि मेरे पास ऐसा दर्पण है तो बहुत सारे लोग उसे मांगने लगे हैं। हर किसी का दावा है कि वही इसको पाने का हकदार है। पर्यावरण विभाग वाले चाहते हैं कि उन्हें ये मिल जाये ताकि वो हर तरफ हरियाली दिखा अपने झूठे आंकड़े सही साबित कर सकें। प्रशासन भी इसको लेकर वो विकास दिखाना चाहता है जो अभी तक उसने फाईलों में किया दिखा रखा है। पुलिस वाले इसको अपने हैड आफिस में लगाना चाहते हैं कानून और न्याय व्यवस्था को चाक चौबंद दिखाने के लिये। वो चाहते हैं कि दर्पण में नज़र आये कि पुलिस वाले रिश्वत नहीं लेते न ही शराब पी कर ड्यूटी पर गलत आचरण ही करते हैं। नगरपालिका के लोग चाहते है कि उनको ये मिल जाये ताकि वो दिखा सकें कि कहीं पर भी गंदगी के ढेर नहीं हैं , कोई सड़क टूटी फूटी नहीं है , किसी गली में भी अंधेरा नहीं है और सब को साफ़ पीने का पानी मिल रहा है। सत्ताधारी दल चाहता है इसको मुझसे मुंह मांगी कीमत में खरीद कर जनता को दिखाना कि उसके शासन में कोई भ्रष्टाचार नहीं है , महंगाई नहीं है , लोग असुरक्षित नहीं हैं , कोई भूखा नहीं है , कोई बेघर नहीं है , कोई अशिक्षित नहीं है न ही कोई बेरोज़गार है कोई भी। जो जो वादे किये थे जनता से वो सब के सब पूरे कर दिये गये हैं। और ये देख कर लोग फिर से सत्ता सौंप दे। जनता को नज़र आये कि सब को मूलभूत सुविधायें मिल रही हैं , प्रशासन ईमानदारी से कर्त्तव्य निभा रहा है , कल्याण राशि शत प्रतिशत जनता तक पहुंच रही है , किसी नेता ने चुनाव जीत कर फार्महाउस नहीं बनाये न पैट्रोल पंप उनको मिले हैं। आतंकवाद का नामोनिशान तक मिटा दिया गया है और लोग निडर हो चैन से रहते हैं। जो दुश्मन देश बुरी नज़र से देखता था उसको सबक सिखा दिया गया है , वो फिर कभी इधर देखने का सहस नहीं कर सकता है।

                           इन सभी के सामने मैंने आईने से पूछा कि किसके पास जाना पसंद करोगे तुम। उसने इन में किसी के भी साथ नहीं जाने की बात कह कर इनको वापस लौटने को कह दिया है। उसका कहना है वो कोई झूठ छल फरेब नहीं कर सकता है। ये सब जो करते हैं वो मैं दर्पण कहला कर कभी नहीं कर सकता हूं। आईना बेमिसाल चाहता है मैं उसे बच्चों को ले जाकर दिखाऊं , उनको आशावादी बना सकूं ये देश की खूबसूरत तस्वीर दिखा कर और बताऊं कि आप ही ऐसा कर सकते हो , बस तय कर लो कि जागरुक रहना है और ठान लेना है छिहासठ सालों की निराशा का ख़त्म करना है। आईना बेमिसाल ने मुझसे वादा लिया है उसको देश के गांव गांव गली गली ले जाने का ताकि अपने देश की बदहाली का अंत कर सकूं। अचानक मैं नींद से जाग गया हूं और वो सपना अधूरा रह गया है। मगर मुझे लगने लगा है , अंधेरा छटने को है , सुबह होने वाली है।

जनवरी 03, 2014

POST : 392 संपादक जी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

          संपादक जी ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      संपादक जी मेरे दिये समाचार को पढ़ रहे थे और मैं सोच रहा था कि ये सब क्या हो रहा है। समाज किस दिशा को जा रहा है , आखिर कहीं तो कोई सीमा होनी चाहिये। नैतिक मूल्यों का अभी और कितना ह्रास होना बाकी है। " शाबाश अरुण " संपादक जी उत्साह पूर्वक चीखे तो मेरी तन्द्रा भंग हो गई ,  " धन्यवाद श्रीमान जी "  मैं इतना ही कह सका। उनहोंने चपरासी को चाय लाने को कहा व फिर मेरी तरफ देख कर बोले " तुम वास्तव में कमाल के आदमी हो , क्या खबर लाये हो खोजकर आज , कल फ्रंट पेज के शीर्षक से तहलका मचा देगी ये स्टोरी। " मुझे चुप देख कर पूछने लगे " क्या थक गये हो " मैंने कहा कि नहीं ऐसी बात नहीं है। तब उनहोंने जैसे आदेश दिया , अभी बहुत काम करना है तुम्हें , किसी दूसरे अख़बार को भनक लगे उससे पहले और जानकारी एकत्र करनी है। इधर उधर से जो भी जैसे भी हासिल हो पता लगाओ , ये टॉपिक बहुत गर्म है इसपर कई संपादकीय लिखने होंगे आने वाले दिनों में। एक तो कल के अंक में लगाना चाहता हूं , थोड़ा मसाला और ढूंढ लाओ तो मज़ा आ जाये। " सम्पादक जी को जोश आ गया था और मैं समझ नहीं पा रहा था कि जिस खबर से मेरा अंतर रोने को हो रहा है उस से वे ऐसे उत्साहित हैं जैसे कोई खज़ाना ही मिल गया है। कल अख़बार में इनका संपादकीय लेख पढ़ कर पाठक सोचेंगे कि ये बात सुनकर बहुत रोये होंगे संपादक जी। कितनी अजीब बात है जो आज ठहाके लगा रहा है वो कल अखबार में दर्द से बेहाल हुआ दिखाई देगा। चाय कब की आ गई थी और ठंडी हो चुकी थी , मैंने उसे पानी की तरह पिया और इजाज़त लेकर उनके केबिन से बाहर आ गया था। मुझे याद नहीं संपादक जी क्या क्या कहते रहे थे , लेकिन उनका इस दर्द भरी बात पर यूं चहकना मुझे बेहद खल रहा था। उनके लेखों को पढ़कर जो छवि मेरे मन में बन गई थी वो टूट चुकी थी।
                  मैं भी इस बारे और जानकारी हासिल करना चाहता था , संपादक जी के आदेश से अधिक अपने मन कि उलझन को मिटाने के लिये। शाम को कई बातें मालूम करने के बाद जब दफ्तर पहुंचा तो संदेश मिला कि संपादक जी ने घर पर बुलाया है। जाना ही था पत्रकार होना भी क्या काम है। उनको भी मेरा बेसब्री से इंतज़ार था , पूरी जानकारी लेने के बाद कहने लगे अब यही कांड कई दिन तक ख़बरों में , चर्चा में छाया रहेगा। ये सुन उनकी श्रीमती जी बोली थी इससे क्या फर्क पड़ता है। उनका जवाब था , बहुत फर्क पड़ता है , हम अख़बार वालों को ही नहीं तमाम लिखने वालों को ऐसा विषय कहां रोज़ रोज़ मिलता है। देखना इसी पर कितने लोग लिख लिख कर बहुत नाम कमा लेंगे और कुछ पैसे भी। इस जैसी खबर से ही अख़बार की बिक्री बढ़ती है , जब अख़बार का प्रसार बढ़ेगा तभी तो विज्ञापन मिलेंगे।  देखो ये अरुण जो आज इस खबर से उदास लग रहा है , जब कल इसके नाम से ये स्टोरी छपेगी तो एक अनजान लड़का नाम वाला बन जायेगा। अभी इसको ये भी नहीं समझ कि इसकी नौकरी इन ख़बरों के दम पर ही है , कल ये भी जान जायेगा अपने नाम की कीमत कैसे वसूल सकता है। मैं ये सब चुपचाप सुनता रहा था और वापस चला आया था।

                अगली सुबह खबर के साथ ही मुखपृष्ठ पर संपादक जी का लेख छपा था
                   :: " घटना ने सतब्ध कर दिया और कुछ भी कहना कठिन है ::::  : 

         " मुझे बेकार लगा इससे आगे कुछ भी पड़ना , और मैंने अख़बार को मेज़ पर पटक दिया था। मैं नहीं जानता था कि साथ की मेज़ पर बैठे सह संपादक शर्मा जी का ध्यान मेरी तरफ है। शर्मा जी पूछने लगे , अरुण क्या हुआ सब कुशल मंगल तो है , खोये खोये से लग रहे हो आज। मैंने कहा शर्मा जी कोई बात नहीं बस आज की इस खबर के बारे सोच रहा था। और नहीं चाहते हुए भी मैं कल के संपादक जी के व्यवहार की बात कह ही गया। शर्मा जी मुस्कुरा दिये और कहने लगे अरुण तुमने गीता पढ़ी हो या नहीं , आज मैं तुम्हें कुछ उसी तरह का ज्ञान देने जा रहा हूं , जैसा उसमें श्रीकृष्ण जी ने दिया है अर्जुन को। अपना खास अंदाज़ में मेज़ पर बैठ गये थे किसी महात्मा की तरह। बोले " देखो अरुण किसी पुलिस वाले के पास जब क़त्ल का केस आता है तो वो ज़रा भी विचलित नहीं होता है , और जिसका क़त्ल हुआ उसी के परिवार के लोगों से हर तरह के सवाल करने के साथ , चाय पानी और कई साहूलियात मांगने से गुरेज़ नहीं करता। कोई इस पर ऐतराज़ करे तो कहता है आप कब हमें शादी ब्याह पर बुलाते हैं। इसी तरह वकील झगड़ा करके आये मुवकिल से सहानुभूती नहीं जतला सकता , क्योंकि उसको फीस लेनी है मुकदमा लड़ने की। जब किसी मरीज़ की हालत चिंताजनक हो और बचने की उम्मीद कम हो तब डॉक्टर की फीस और भी बढ़ जाती है। पुलिस वाले , वकील और डॉक्टर दुआ मांगते हैं कि ऐसे लोग रोज़ आयें बार बार आते रहें। पापी पेट का सवाल है। ख़बरों से अपना नाता भी इसी तरह का ही है , और हम उनका इंतज़ार नहीं करते बल्कि खोजते रहते हैं। देखा जाये तो हम संवेदनहीनता में इन सभी से आगे हैं। ये बात जिस दिन समझ जाओगे तुम मेरी जगह सह संपादक बन जाओगे , जिस दिन से तुम्हें इन बातों में मज़ा आने लगेगा और तुम्हें इनका इंतज़ार रहेगा उस दिन शायद तुम संपादक बन चुके होगे। कुछ लोग इससे और अधिक बढ़ जाते हैं और किसी न किसी पक्ष से लाभ उठा कर उनकी पसंद की बात लिखने लगते हैं अपना खुद का अख़बार शुरू करने के बाद। हमारी तरह नौकरी नहीं करते , हम जैसों को नौकरी पर रखते हैं।

       सब से बड़ा सत्य तुम्हें अब बताता हूं कि आजकल कोई अख़बार ख़बरों के लिये नहीं छपता है , सब का मकसद है विज्ञापन छापना। क्योंकि पैसा उनसे ही मिलता है इसलिये कोई ये कभी नहीं देखता कि इनमें कितना सच है कितना झूठ। सब नेताओं के घोटालों की बात ज़ोर शोर से करते हैं , सरकार के करोड़ों करोड़ के विज्ञापन रोज़ छपते हैं जिनका कोई हासिल नहीं होता , सरासर फज़ूल होते हैं , किसी ने कभी उन पर एक भी शब्द बोला आज तक। शर्मा जी की बातों का मुझ पर असर होने लगा था और मेरा मूड बदल गया था , मैंने कहा आपकी बात बिल्कुल सही है शर्मा जी। वे हंस कर बोले थे मतलब तुम्हारी तरक्की हो सकती है।

            इन बातों से मेरे मन से बोझ उतर गया था और मैं और अधिक उत्साह से उस केस की जानकारी एकत्र करने में जी जान से जुट गया था। शाम को जब अपनी रिपोर्ट संपादक जी को देने गया तो उन्होंने मुझे कि उनकी बात हुई है अख़बार के मालिक से तुम्हारी पदोन्ति के बारे और जल्दी ही तुम सह संपादक बना दिये जाओगे। जी आपका बहुत शुक्रिया , जब मैंने संपादक जी का आभार व्यक्त किया तब शर्मा जी की बात मेरे भीतर गूंज रही थी। मैं शर्मा जी का धन्यवाद करने गया तब उन्होंने पूछा कि अरुण तुम्हें कर्म की बात समझ आई कि नहीं। मैंने जवाब दिया था शर्मा जी कर्म का फल भी शीघ्र मिलने वाला है। हम दोनों हंस रहे थे , अख़बार मेज़ से नीचे गिर कर हमारे पांवों में आ गया था , कब हमें पता ही नहीं चला।

जनवरी 02, 2014

POST : 391 तलाश लोकतंत्र की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        तलाश लोकतंत्र की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

       जाने कितने वर्ष हो गये हैं इस मुकदमें को चलते हुए , मगर देश की सुरक्षा की बात कह कर इसे अति गोपनीय रखा गया है। किसी को मालूम नहीं इसके बारे कुछ भी , उनको भी जिनका दावा रहता है सब से पहले हर इक बात का पता लगाने का। आज मैं आपको उस मुकदमें का पूरा विवरण बता रहा हूं बिना किसी कांट छांट के , बिना कुछ जोड़े , घटाये। जनता का आरोप है कि उसने लोकतंत्र का क़त्ल होते अपनी आंखों से देखा है। नेताओं ने मार डाला है लोकतंत्र को। क्योंकि कातिल सभी बड़े बड़े नेता लोग हैं इसलिये पुलिस और प्रशासन देख कर भी अनदेखा कर रहा है। अदालत ने पूछा कि क्या लोकतंत्र की लाश बरामद हुई है , उस पर किसी ज़ख्म का निशान मिला है , पोस्ट मॉर्टम रिपोर्ट क्या कहती है। जनता ने बताया है कि लोकतंत्र को एक बार नहीं बार बार क़त्ल किया जाता रहा है और उसकी लाश को छिपा दिया जाता रहा है। नेताओं ने परिवारवाद को पूंजीवाद को लोकतंत्र का लिबास पहना कर इतने सालों तक देश की जनता को छला है। अदालत ने जानना चाहा है कि क्या कोई गवाह है जिसने देखा हो क़त्ल होते और पहचानता हो कातिलों को। जनता बोली हां मैंने देखा है। अदालत ने पूछा है कि खुलकर बताओ कब कैसे कहां किसने किया क़त्ल लोकतंत्र को। जनता ने जवाब दिया कि आज़ादी के बाद से देश में हर प्रदेश में इसका क़त्ल हुआ है। कभी विधानसभाओं में हुआ है तो कभी संसद में हुआ है। अदालत को सबूत चाहिएं थे इसलिये जनता ने कुछ विशेष घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया है। एक बार आपात्काल घोषित करके लोकतंत्र को कैद में बंद रखा गया था पूरे उनीस महीनों तक। जब ये मुक्त हुआ और जनता ने राहत की सांस ली तब इसको दलबदल का रोग लग गया और ये अधमरा हो गया था।

       हरियाणा प्रदेश में इसको जातिवाद ने अजगर की तरह निगल लिया था , एक बार महम उपचुनाव में राजनीति के हिंसक रूप से लोकतंत्र लहू लुहान हो गया था। तब भी इसका क़त्ल ही हुआ था मगर उसको एक दुर्घटना मान लिया गया। कितने ही राज्यों में लोकतंत्र के नाम पर तानाशाही चलती रही और चल रही है। पिता मुख्यमंत्री है तो सारा परिवार ही शासक बन जाता है। किसी नेता का निधन हो जाये तो लोक सभा , राज्य सभा अथवा विधान सभा की जगह उसके बेटे , पत्नी , दामाद को मिलना विरासत की तरह क्या इसे लोकतंत्र माना जा सकता है। बिहार में , पश्चिम बंगाल में हिंसा में मरता रहता है लोकतंत्र। साम्प्रदायिक दंगों में दिल्ली , पंजाब , उत्तर प्रदेश , गुजरात और कितने ही अन्य राज्यों में लोकतंत्र की हत्या की गई है। भ्रष्टाचार रूपी कैंसर इसको भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है कितने ही वर्षों से , बेजान हो चुका है लोकतंत्र। वोट पाने के लिये जब धन का उपयोग होता है तब भी लोकतंत्र को ही क़त्ल किया जाता है। सांसद खरीदे गये , विधायक बंदी तक बनाये गये हैं बहुमत साबित करने के लिये। संसद और विधान सभाओं में नेता असभ्य और अलोकतांत्रिक आचरण करते हैं जब , तब कौन घायल होता है।

     अभी तक सरकारी वकील चुपचाप बैठा था , ये सब दलीलें जनता की सुन कर वो सामने आया और कहने लगा , जनता को बताना चाहिये कि कब उसने लोकतंत्र को भला चंगा सही सलामत देखा था। जनता ने जवाब दिया कि पूरी तरह तंदरुस्त तो लोकतंत्र लगा ही नहीं कभी लेकिन अब तो उसके जीवित होने के कोई लक्षण तक नज़र नहीं आते हैं। आप किसी सरकारी दफ्तर में , पुलिस थाने में , सरकारी गैर सरकारी स्कूलों में , अस्प्तालों में , कहीं भी जाकर देख लो , सब कहीं अन्याय और अराजकता का माहौल है जो साबित करता है कि देश में लोकतान्त्रिक व्यवस्था चरमरा चुकी है। सरकारी वकील ने तर्क दिया है कि जब किसी का क़त्ल होता है तो उसकी लाश का मिलना ज़रूरी होता है , मुमकिन है वो कहीं गायब हो गया हो , अपनी मर्ज़ी से चला गया हो कहीं। बिना लाश को बरामद किये क़त्ल का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता इन तमाम बातों की सच्चाई के बावजूद। जनता का कहना है कि उसको शक है नेताओं ने ही उसको क़त्ल करने के बाद किसी जगह दफ़न किया होगा। सरकारी वकील का कहना है कि अदालत को जल्दबाज़ी में कोई निर्णय नहीं करना चाहिये। लोकतंत्र को लापता मान कर उसको अदालत के सामने पेश होने का आदेश जारी कर सकती है या चाहे तो उसको जिंदा या मुर्दा होने की जानकारी देने वाले को ईनाम देने की भी घोषणा कर सकती है। सब से पहला सवाल ये है कि क्या वास्तव में लोकतंत्र था , कोई सबूत है उसके कभी जीवित होने का , अगर किसी के जिंदा होने तक का ही सबूत न हो तो उसका क़त्ल हुआ किस तरह मान लिया जाये। लगता है इस मुकदमें में भी नेता संदेह का लाभ मिलने से साफ बरी हो जायेंगे , जैसे बाकी मुकदमों में हो जाते हैं। अदालत ने सरकार को कहा है कि अपने प्रशासन को और पुलिस को आदेश दे लोकतंत्र को ढूंढ कर लाने के लिये , कोई समय सीमा तय नहीं है। जनता को अभी और और इंतज़ार करना होगा। लोकतंत्र की तलाश जारी है।

        जाने कैसे इक नेता को किसी तहखाने में घायल लोकतंत्र मिल ही गया और उसने जनता को देश की तमाम समस्याओं से मुक्त करवाने का झूठा वादा कर सत्ता हासिल कर ली। मगर सत्ता मिलते ही उस ने सच्चे संविधान में वर्णन किये लोकतंत्र की जगह किसी छद्म झूठे लोकतंत्र को स्थापित करने का काम शुरू कर दिया उसके होने के निशान तक को मिटाने लगा। खुद को सबसे अच्छा और मसीहा या भगवान कहलाने को रोज़ तमाशे और आडंबर करने लगा जिस से बहुत लोग सम्मोहित होकर उसकी जय जयकार करने लगे। उनको अपने नेता का झूठ और झूठी देशभक्ति वास्तविक सच और संविधान वाले लोकतंत्र से अधिक पसंद आने लगी। धीरे धीरे लोग भूलने लगे हैं आज़ादी का अर्थ और लोकतंत्र की परिभाषा तक को। किसी राजनीतिक दल काखोटा सिक्का चलने लगा खरा बनकर और जो खरे थे उनको कूड़ेदान में फेंक दिया गया। अदालत ने लोकतंत्र की तलाश करने वाली फ़ाइल बंद करवा दी है हमेशा हमेशा को। 

जनवरी 01, 2014

POST : 390 मरने भी नहीं देते ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        मरने भी नहीं देते ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       ख़ुदकुशी करना अगर जुर्म है तो जीना किसी सज़ा से कम नहीं। शायद यही अकेला जुर्म है जो कामयाबी से करने पर सब सज़ाओं से बचा लेता है मगर इस जुर्म करने में जिसे नाकामी हासिल हो उसे कई सज़ायें झेलनी पड़ती हैं। उस पर कुछ लोग जो मरने के नाम से ही थर थर कांपने लगते हैं , ये इल्ज़ाम लगाते हैं कि ख़ुदकुशी करना कायरता है। हम अच्छी तरह जानते हैं कि ये कितने साहस का काम है। हर कोई नहीं कर सकता ऐसा हौसला , यूं मरने की बातें सभी करते रहते हैं। मौत जब सामने आती है तो सब जीने की चाहत करते हैं। अब कानून का क्या है वो ख़ुदकुशी को सही माने चाहे गल्त। कानून क्या सभी को जीने के अधिकार की बात नहीं करता है , तो क्या सब को मिलता है जीने का अधिकार। क्या हम सब जी रहे हैं जिस तरह उसको ज़िंदगी कह सकते हैं। अदालतों ने कभी इस पर कुछ कहा है कभी कुछ और कह दिया। करते रहें बहस लोग कि ख़ुदकुशी करने का अधिकार देना उचित होगा या अनुचित जिसने मरने को ठान लिया उसे इस सब से क्या मतलब। कल अगर कानून ख़ुदकुशी करने की इजाज़त दे भी दे तो क्या हर कोई जो मर जाने की बात करता है सच में ख़ुदकुशी करने का सहस कर सकेगा। मांगने से मौत कब मिलती है किसी को।

              "मरने भी नहीं देते दुश्मन मेरी जां के" गीत मुझे शादी से पहले भी बेहद पसंद था लेकिन शादी के बाद तो मैं इसके सिवा दूसरा कोई गीत कभी गुनगुना ही नहीं सकी। मुझे आज भी याद है जब मैंने तय कर लिया था कि ख़ुदकुशी करके मरना है और हिम्मत करके नदी में कूद गई थी। मगर मेरी इस सहस पूर्वक की कोशिश को नाकाम करने ये जाने खां से चले आये थे और मुझे मरने नहीं दिया था। जब आंख खुली तो सामने भीड़ को देख जितना घबराई थी उतना तो सामने मौत को देख भी नहीं डरी थी। तब मेरी हालत को देख इन्होंने सब को जाने को कह दिया था और मुझे पकड़ कर कुछ दूर ले गये थे। जब इन्होंने मुझसे ख़ुदकुशी करने का कारण पूछा और पुलिस की बात की तो मैंने इनसे कह दिया प्लीज़ आप ये बात किसी को मत बताना। तब इनको वादा किया था फिर कभी ख़ुदकुशी नहीं करने का। जब ये मुझे मेरे घर छोड़ने आये तो इन्होंने ही बहाना बना दिया था कि मेरा पांव फिसल गया था और मैं नदी किनारे से नदी में गिर गई थी। और उसके बाद मेरे पांव ही नहीं मेरा दिल भी फिसल गया था और मैं इनके प्रेमजाल में फस गई थी।

      हमारी शादी हो गई थी लेकिन मैं इस बात से अनजान थी कि मुझे उम्र भर कीमत चुकानी है अपनी जान बचाने की। उसके बाद मैं कब कब कैसे कैसे मरती रही कोई नहीं जानता न मैं ही बता सकती हूं किसी को। लेकिन ये समझ आ गया था कि अब मरना भी उतना आसान नहीं रह गया है। अब तो मुझे पानी से भी डर लगने लगा है। कभी भूले से इनको कह बैठी कि ऐसा जीना भी कोई जीना है तो इनका जवाब होता है कि मैं तुम्हें बचाने की सज़ा ही तो काट रहा हूं। शादी को उम्र कैद बताते हैं , कहते हैं कि उनका एहसान है जो ज़िंदा हूं वरना कब की मर गई होती। कभी कहते हैं कि अगर मैं जीने से बेज़ार हो चुकी हूं तो वे खुद मुझे अपनी भूल को सुधार नदी में धक्का दे देते अगर कानून ऐसी अनुमति दिया करता। बहुत से देशों में मांग हो रही है मरने का हक देने की , कभी न कभी तो ये मांग हमारे देश में भी पूरी हो जायेगी। तब पूछूंगी इनसे क्यों मुझसे मेरा अधिकार छीना था , मुझ पर कोई उपकार नहीं किया था तुमने।

       ज़िंदा रह कर मुझे क्या कुछ नहीं झेलना पड़ा है , कितने दर्द कितनी मुश्किलें मुझे सहनी पड़ी हैं आपके कारण। मेरी जान बचाने के बदले इनको तो मैं मिल गई थी उम्र भर के लिये ईनाम सवरूप। मुझे क्या दे सकते अगर कल कानून बदल जाये और ऐसा समझे कि ये दोषी हैं मुझे बचाने के और इस कारण मुझे कितनी तकलीफें सहनी पड़ी हैं। इनके कारण मेरी हालत ऐसी हो गई है कि न जी सकती हूं न मर ही सकती हूं। कितने सालों से इनकी गल्ती की सज़ा मुझे मिल रही है न चाहते हुए भी इनके लिये जीने की। उस एक गल्ती को सुधारने का क्या कोई उपाय नहीं है। आपको समझ आये तो बताना मुझे या फिर आत्महत्या का कोई सरल उपाय ही सुझा दें , बढ़िया सा तरीका जिसे कोई असफल नहीं कर सके इस बार।

दिसंबर 31, 2013

POST : 389 घोटालों का देश हमारा है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     घोटालों का देश हमारा है ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

          दिल पर किसी का बस नहीं है , दिल गधी पर आया तो परी क्या चीज़ है। इश्क़ बुरा उन्हीं को लगता है इन्होंने कभी किया नहीं। रिश्वत नहीं मिलती तभी ईमानदारी पसंद आती है मज़बूरी है। नशाबंदी अभियान वाले थककर शाम को जाम छलकाते हैं। भ्र्ष्टाचार को नाहक बदनाम किया है जिस ने भी रिश्वत खाई है काम किया है। ईमानदारी जन्नत की तरह ख्वाब है दिल को बहलाने को ग़ालिब ये ख्याल अच्छा है। घोटाले देश की शान हैं इनसे बना देश महान है। जो कहते हैं गरीबी है बस उनकी बदनसीबी है। युगों से ये कला चलती आई है भला लेन देन भी कोई बुराई है। जिसने भी नहीं खाने की कसम खिलाई है खुद उसी को मिली सारी मलाई है। सरकार इस तरह बनाई है , रिश्वत सुंदर कन्या है सत्ता संग बियाही है नेता अधिकारी दो भाई है। जनता जैसे जीजे का साला है उसके मुंह पर लगाया ताला है , ससुराल पर दामाद का अधिकार क्यों कहलाता घोटाला है। घोटालों की जांच जो करते हैं अपनी जेबें ही बस भरते हैं। कब किसी ने सज़ा पाई है , खोदा पहाड़ मरी चुहिया नज़र आई है। सच कहने में किस बात की शर्म है , भ्रष्टाचार सरकार का धर्म है। पैसा नेताओं का भगवान होता है झूठ कहते हैं नेताओं का भला ईमान होता है। सत्ता को मिला खाने का वरदान होता है जो नहीं जनता बड़ा नादान होता है। आदि है न कोई अंत है भ्र्ष्टाचार कथा अनंत है। सुबह शाम पाठ जो भी करता है वो किसी से भी नहीं डरता है। बचा लो इसको भ्र्ष्टाचार को जो मिटाओगे , अभी भी सोच लो वर्ना बाद में बहुत पछताओगे।

          अचार सब को पसंद होते हैं , दाल रोटी के साथ अचार भी ज़रूरी होता है। खाने का मज़ा कई गुणा बढ़ जाता है। वेतन तो दुल्हन की तरह है , और रिश्वत दहेज की तरह। अभी तक तो कोई बिना दहेज की दुल्हन नहीं चाहता। कोई जितना भी अमीर हो और कितना भी कमाता हो फिर भी क्या लड़की वालों के सामने दोनों हाथ ही नहीं पूरी झोली तक नहीं फैलाते सभी। क्या हो गया कानून बनने से और क्या बदल गया अच्छी शिक्षा अच्छी नौकरी मिलने से। देखा जाये तो यहां हर कोई भिखारी है , कोई भगवान से मांगता है कोई इंसान से।  कोई न मिले तो छीन लेना जनता है। कौन है जो दूसरों को देना चाहता हो बेशक उसके पास कितना भी अधिक क्यों न हो। डॉक्टर लोग जब अचार पर पाबंदी लगा देते हैं तब खाने का मज़ा ही नहीं आता , और अगर दुल्हन दहेज नहीं लाई हो अपने साथ तो वो भी कम ही भाती है ससुराल वालों को। रिश्वत को नाहक बदनाम किया गया है , ये एक विशुद्ध शाकाहारी चीज़ है जो लेने वाले से अधिक भला उसका करती है जो दे रहा होता है। जो दोनों का भला करे उसे बुरा बताना बुरी बात है। वास्तव में भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की बात वही लोग करते हैं जिनको खुद अवसर नहीं मिल पाता भ्रष्ट बनने का। और तब वे झूठा प्रचार करते हैं कि भ्रष्टाचार ने देश का बंटाधार किया है। सच पूछो तो देश का उद्धार करने के लिये भ्रष्टाचार भी उतना ही ज़रूरी है जितना विश्व बैंक या आई एम एफ से क़र्ज़ लेना। हमारे देश की कोई बड़ी परियोजना बिना कोई क़र्ज़ लिये शुरू ही नहीं हो सकती न ही बिना रिश्वत के लालच के इस देश का प्रशासन कभी कुछ करना ही चाहता है। जिस तरह गंगा लाख पापियों के स्नान करने के बाद भी पावन ही रहती है उसी तरह भ्रष्टाचार भी तमाम रुकावटों विरोधों के बावजूद भी फलता फूलता रहता है। हमारे देश के नेताओं और अफसरों ने भ्रष्टाचार में कितने ही नये आयाम स्थापित किये हैं जिससे भारत देश विश्व में किसी भी दूसरे देश से कभी पीछे नहीं रह सकता। इसके लिये कभी पदक मिलने लगे तो सवर्ण , रजत , कांस्य सभी अपने ही नाम पर होंगे। जैसा कि आप जानते हैं कुछ लोग फिर से भ्रष्टाचार को मिटाने की बात करने लगे हैं। पहले भी होता रहा है ऐसा। मगर ये उचित नहीं होगा , भ्रष्टाचार को किसी से भी कोई खतरा नहीं है , लेकिन जिस दिन देश से भ्रष्टाचार का खात्मा हो गया उस दिन जाने क्या होगा। जिस तरह दमे का मरीज़ बिना दमे की दवा एक पल जिंदा रह नहीं सकता उसी तरह ये देश बिना भ्रष्टाचार कैसे रहेगा ये सोच कर भी डर लगता है। कभी ये ऐलान किया गया था कि गरीबी को खत्म करेंगे और सरकार के आंकड़े हमेशा गरीबी की रेखा से नीचे के लोगों को कम होता बताने का ही काम करती रहती है , फिर भी गरीबों की संख्या कभी कम नहीं हो सकी है। आज जब विवाह करना हो तो वेतन से पहले ऊपर की कमाई के बारे पूछा जाता है। इस महंगाई में वेतन से गुज़ारा करना बहुत ही कठिन है।

                 मगर सब से ज़रूरी बात और है , ये जो हर कोई नेता बनना चाहता है और उसके लिये सब जोड़ तोड़ करता है वो किसलिये। अगर भ्रष्टाचार के अवसर नहीं होंगे तो कौन मूर्ख नेता बन जनता की सेवा करना चाहेगा। और जब नेता नहीं होंगे तो लोकतंत्र का क्या होगा। इसलिये नेता और भ्रष्टाचार दोनों को बचाना होगा , इनका आपस में बेहद करीबी रिश्ता है। पता नहीं कौन किसकी नाजायज़ औलाद है। अब तो कानून भी मानता है कि नाजायज़ औलाद को भी सभी अधिकार मिलने चाहिएं । कहीं ऐसा न हो कि भ्रष्टाचार को मिटाते मिटाते हम नेता नाम की प्रजाति को ही मिटा बैठें। जब किसी प्रजाति के लुप्त होने का खतरा हो तब उसको संरक्षण दिया जाता है , शायद कल नेता और भ्रष्टाचार दोनों को संरक्षण की ज़रूरत आन पड़े। नेताओं के बिना हमारा लोकतंत्र भी अनाथ न हो जाये। सब जानते हैं कि आज तक देश में कोई भी ऐसा कार्य नहीं हुआ है जिसमें भ्रष्टाचार नहीं हुआ हो , सच तो ये है कि नेता और अफसर अभी तक विकास का हर काम करते ही इसलिये रहे हैं कि उनके खाने पीने का समुचित प्रबंध हो सके। जिस काम में भ्रष्टाचार की संभावना न हो उसे कोई करना ही नहीं चाहता। जब भ्रष्टाचार समाप्त हो गया तो कौन विकास के काम करना चाहेगा , गरीबी और भूख की तरह हर योजना अधर में लटकती रहेगी। अपने अफसर और मंत्री अभी भी फाईलों को दबाये रहते हैं अपने पास या इधर उधर सरकाते रहते हैं लेकिन फैसला नहीं करते। जब कुछ मिलना ही नहीं होगा तो कौन फैसला करने का सरदर्द अपने ऊपर लेना चाहेगा। सब सोचेंगे जाने कब कुछ गड़बड़ हो जाये और उनपर कोई मुसीबत आ जाये। और विकास के काम रुकने से देश व जनता को कुछ हो न हो उसका पहला असर दलालों कमीशनखोरों और ठेकेदारों पर होगा ही , क्या ये सब के सब भी लुप्त प्रजाति के प्राणी बन जाएंगे। लगता है जो भ्रष्टाचार का विरोध कर रहे हैं उन्होंने सोचा तक नहीं कि इसके क्या क्या दुष्प्रभाव किस किस पर हो सकते हैं। यूं भी जिस तरह हम लोग चाय , सिगरेट , शराब , सिनेमा और आजकल केबल टीवी के आदि हो चुके हैं और इनमें लाख बुराईयां होने पर भी इनको छोड़ कर नहीं रह सकते हैं , उसी तरह हमारी रग रग में भ्रष्टाचार समा चुका है , इसको ख़त्म कर हम कैसे जी सकेंगे। बेहतर यही होगा कि भ्रष्टाचार मिटाने की बात को भूल जायें। खाओ और खाने दो की आदर्श परंपरा को क्या इतनी आसानी से छोड़ा जा सकता है। राजनीति का यही नारा है घोटालों का देश हमारा है। 

दिसंबर 30, 2013

POST : 388 चुनाव अध्यक्ष का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

        चुनाव अध्यक्ष का ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

हम शांति पूर्वक घर के अंदर बैठे हुए थे कि तभी बाहर से कुत्तों के भौंकने की आवाज़ें आने लगी। श्रीमती जी देखने गई कि इतनी आवाज़ें किसलिये हो रही हैं। और तुरंत घबरा कर वापस भीतर आ गई और कहने लगी कुछ ख्याल भी है कि बाहर क्या हो रहा है। हमने पूछा ये इतना शोर क्यों है , लगता है गली से बाहर का कोई कुत्ता आया होगा , और अपनी गली के सारे कुत्ते उस पर भौंकने लगे होंगे। श्रीमती जी बोली आप बाहर निकल कर तो देखो यहां अपने घर के सामने वाले पार्क में सारे शहर के कुत्ते जमा हो गये हैं और वे एक दूसरे पर नहीं भौंक रहे , जो आदमी उनको भगाने का प्रयास करे उसको काटने को आते हैं। अपना टौमी भी उनके बीच चला गया है , ऐसे आवारा कुत्तों में शामिल हो कर वो भी आवारा न बन जाये , उसको बुला लो। घर से बाहर निकल कर हमने जब अपने टौमी को आवाज़ दी तो पार्क में जमा हुए सभी कुत्ते हमारी तरफ मुंह करके भौंकने लगे। जब हमने देखा कि हमारा टौमी भी उनमें शामिल ही नहीं बल्कि हम पर भौंकने में सब से आगे भी है तो हम घबरा गये। तब हमें कुत्तों के डॉक्टर की बात याद आई कि अगर कभी टौमी कोई अजीब हरकत करे तो तुरंत उसको सूचित करें। हमने तभी उनसे फोन पर विनती की शीघ्र आने की और वे आ गये। आते ही सीधे वे उन कुत्तों की भीड़ में चले गये और उनको देख कर कोई कुत्ता भी नहीं भौंका सब के सब खामोश हो गये। जैसे बच्चे चुप हो जाते हैं अध्यापक को देखकर। हम दूर से देख कर हैरान थे और वे एक एक कर हर कुत्ते को पास बुलाते और उसके साथ कुछ बातें करते इशारों ही इशारों में। हम कुछ भी समझ नहीं पा रहे थे मगर लग रहा था उनको मालूम हो गया है क्या माजरा है। थोड़ी देर बाद डॉक्टर साहब ने आकर बताया कि चिंता की कोई बात नहीं है , आपका टौमी और बाकी सभी कुत्ते तंदरुस्त हैं। आज उनकी एक विशेष सभा है। हमने उनकी फीस दी और उनसे पूछा कि ये कैसी सभा है , ऐसा तो पहले नहीं देखा कभी भी हमने। उन्होंने बताया कि वे कुत्तों की भाषा को समझते हैं और हमें बता सकते हैं कि आज क्या क्या हो रहा है इस सभा में। वे कुत्तों से बातें करते रहे हैं और आज उन सब ने बताया है कि यहां आज शहर के कुत्तों ने अपना प्रधान चुनना है।
          डॉक्टर साहब ने बताया हमें जो जो भी बातें आपस में कर रहे थे सब कुत्ते। कई कुत्ते चाहते हैं प्रधान बनना और वो अपना अपना दावा पेश कर रहे हैं। आप विश्वास रखें उनमें कोई लड़ाई नहीं हो रही है , हर कोई अपनी बात रख रहा है और सब की बात सुनी जा रही है।  जिसको भी ज़्यादातर सदस्य पसंद करेंगे वही प्रधान घोषित कर दिया जायेगा , प्रयास है कि चुनाव सभी की सहमति से ही हो। कोई वोट नहीं , बूथ कैप्चरिंग नहीं ,जात पाति , रिश्ते नातों का कोई दबाव नहीं , न ही कोई प्रलोभन , सब खुले आम पूरे लोकतांत्रिक ढंग से हो रहा है। जो बातें उन्होंने देख कर बताई वो वास्तव में दमदार हैं ज़रा आप भी सुनिये।
                सब से पहले शहर के प्रधान का कुत्ता बोला कि उसको ही प्रधान बनाया जाना चाहिये। जब तुम सभी के मालिकों ने मेरे मालिक को अपना प्रधान चुना है तो तुम सब को वही करना चाहिये , शहर के प्रधान का कुत्ता होने से मेरा हक बनता है प्रधानगी करने का। इस पर कई सदस्यों ने सवाल उठाया कि शहर वाले तो हमेशा प्रधान चुनने में गलती कर जाते हैं और जिसको समझते हैं काम करेगा वो किसी काम का नहीं होता है। प्रधान बनने के बाद सारे वादे भूल जाता है और कुर्सी को छोड़ने को तैयार नहीं होता चाहे लोग न भी चाहते हों। प्रधान का कुत्ता बोला कि मैं ऐसा नहीं करूंगा , जब भी कहोगे हट जाउंगा , मैं कुत्ता हूं आदमी जैसा नहीं बन सकता। तब एक सदस्य ने सवाल उठाया कि तुमने अपना धर्म नहीं निभाया था , जब तुम्हारे मालिक के घर में चोरी हुई थी तब तुम भौंके ही नहीं। प्रधान के कुत्ते ने कहा ये सच है कि मैं नहीं भौंका था लेकिन तुम नहीं जानते कि ऐसा इसलिये हुआ कि प्रधान के घर से जो माल चोरी गया वो माल भी चोरी का था और उसको जो चुराने वाले थे वो भी प्रधान के मौसेरे भाई ही थे। इस पर पुलिस वाले का कुत्ता खड़ा हो कर बोला हम सभी को अपनी सुरक्षा पर ध्यान देना चाहिये , आजकल चोर चोरी से पहले कुत्ते को जान से मारने का काम करने लगे हैं , हमें पुलिस से रिश्ता बनाना चाहिये ताकि वो हमारी सुरक्षा कर सके। तब एक सदस्य ने कहा क्या हम पुलिस पर यकीन कर सकते हैं ,पुलिस खुद चोरों से मिली रहती है। जान बूझकर चोरों को नहीं पकड़ती है , उनसे रिश्व्त लेकर चोरी करने देती है। तब पुलिस के कुत्ते को क्रोध आ गया और वो बोला था , और तुम खुद क्या करते हो। तुम्हारा मालिक जनहित का पैरोकार बना फिरता है और सब से फायदा उठाता रहता है ये क्या मुझसे छुपा हुआ है। इस बीच शहर के बड़े अधिकारी का कुत्ता खड़ा हो गया और बोला आप सभी ख़ामोशी से ज़रा मेरी बात सुनें। जब सब चुप हो गये तो वो पार्क के बीच में बने चबूतरे पर खड़ा हो लीडरों की भाषा में बातें करने लगा। कहने लगा मैं ये नहीं कहता कि मुझे अपना प्रधान बनाओ , मगर जिसको भी बनाया जाये उसको पता होना चाहिये कि हम सब को क्या क्या परेशानियां हैं। हमारी तकलीफों को कौन समझता है , हम केवल चोरों से घर की रखवाली ही नहीं करते हैं , अपने अपने मालिक के शौक और उनका रुतबा बढ़ाने के लिये भी हमारा इस्तेमाल किया जाता है। मालकिन के साथ कार में , उसकी गोदी में , उसके साथ खिलौना बन कर पार्टियों में जाकर हमें कितनी घुटन होती है , और कितना दुःख होता है सब के सामने उसके इशारों पर तमाशा बन कर। हम क्या उसके पति हैं। इसके इलावा हम में बहुत सदस्य ऐसे भी हैं जिनके मालिक न भरपेट खाना देते हैं न ही रहने को पूरी जगह ही। हम बेबस जंजीर में जकड़े कुछ भी नहीं कर पाते। हमें जब मालिक बचाव के टीके न लगवायें और हम बीमार हो जायें , तब खुद ही हमें गोली मार देते हैं ये क्या उचित है। आपको पता है कितने मालिक अपने कुत्तों से पीछा छुड़ाने के लिये उसको दूर किसी जंगल में छोड़ आते हैं भेड़ियों के खाने के लिये। और भी बहुत सारी बातें हैं जिनसे हम अनजान ही रहते हैं। मेरे को यूं भी फुर्सत नहीं है कि प्रधान बन कर ये सब काम करूं , आप किसी को भी अपना प्रधान चुनो मगर वो ऐसा हो जो ये बातें जनता हो समझता हो और इनका समाधान कर सके। सभी कुत्ते तब एक साथ बोले थे कि वो आपके बिना दूसरा कोई हो ही नहीं सकता है। और आला अधिकारी के कुत्ते को प्रधान चुन लिया गया , उसको फूलमाला पहना दी गई। 

POST : 387 क्या वास्तव में बदल रहा देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

   क्या वास्तव में बदल रहा देश ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

अभी कुछ भी कहना बड़ी जल्दबाज़ी होगी। मगर जो सामने नज़र आ रहा है उसको अनदेखा करना भी उचित नहीं है। दिल्ली में सरकार बदल गई , बहुत शोर भी हो रहा बदलाव का , मगर क्या सब कुछ बदल गया है। मैंने तो बहुत कुछ वही दोहराते हुए देखा है। मुख्यमंत्री बनते ही किसी का गुणगान होना कोई पहली बार नहीं हो रहा। उसका गांव , उसके माता पिता यहां तक कि उसका बेटा तक टीवी पर साक्षात्कार देता है। उसकी बचपन की कहानियां सुनाई देने लगी हैं , उसकी जन्मपत्री की बात हो रही है , उसके लिये पूजा पाठ हो रहा है। और ये सब कुछ उसके लिये हो रहा है जिसका दावा है वी आई पी कल्चर को समाप्त करने का। क्या वो मीडिया वालों की मानसिकता को बदल सकता है , जिनके खुदा रोज़ बदलते रहते हैं। हां एक बात पहली बार सुनी है कि कोई कहता है सरकार तो हम बना रहे हैं मगर विधान सभा में बहुमत साबित करने की ज़िम्मेदारी किसी और की है। आप को प्रशासन के ढंग को बदलना है , लोकतंत्र की परिभाषा को नहीं। और विश्व में जहां भी कहीं लोकतंत्र होता है सत्ताधारी लोगों का फ़र्ज़ होता है बहुमत से सरकार चलाना। भारत में पहले भी सरकारें बनाई बहुत लोगों ने बहुत बार मगर कभी ऐसा नहीं कहा गया कि बहुमत की व्यवस्था करना उनका काम नहीं है। अगर कोई घर का मुखिया कहे कि मैं घर के सभी सदस्यों की हर मांग पूरी कर सकता हूं लेकिन इसके लिये धन की व्यवस्था किसी और को करनी होगी। जहां तक आम और खास का फर्क है , तो जो विधायक - मंत्री बन जाता है वो आम आदमी नहीं रहता खास बन जाता है। आम आदमी को अपने सीने पर कोई तमगा नहीं लगाना पड़ता कि मैं आम आदमी हूं। वास्तव में हम लोग हमेशा से आदी रहे हैं गुलामी करने के , किसी न किसी के सामने सर झुकाये  रहना आदत बन गई है। सोचते हैं कोई मसीहा कहीं से आयेगा और हमारी सभी परेशानियों को दूर कर देगा। मगर एक छोटा सा सवाल है जिसका जवाब किसी को नहीं मालूम। देश में किसी भी चीज़ की कमी नहीं है , समस्या है कि कुछ प्रतिशत को बहुत अधिक मिलता है और अधिकतर को बहुत कम। देश की दो तिहाई जनता को न के बराबर मिलता है। अब अगर सब को एक समान होना चाहिये तो जो अमीर हैं उनसे लेना होगा और देना होगा उनको जो गरीब हैं। यहां बात केवल धन दौलत की नहीं है , अधिकारों की भी है , न्याय की भी है। भाषण देने से क्रांती के गीत गाने से ये सब हो सकता तो कभी का हो गया होता। सब से पहले हमें खुद को बदलना होगा। जब जो बुलंदी पर हो उसको खुदा समझने की आदत छोड़नी होगी। जो आज सत्ता पर आसीन हैं उनको खाली बयानबाज़ी करना छोड़ कुछ कर के दिखाना होगा। जनता ने बदलाव चाहा है , आप अगर बदलाव नहीं ला सके तो आप को भी बदला जा सकता है इस बात को याद रखें। आप अभी पास नहीं हुए हैं , अभी तो बहुत सारी परीक्षायें आपका इंतज़ार कर रही हैं।
           क्या दस मंत्रियों के पुलिस सुरक्षा नहीं लेने से सब हो जायेगा। क्या हज़ारों सरकारी अफसरों के सरकारी वाहनों और साधनों के दुरूपयोग रोक सकते हैं आप। पुलिस की जिप्सी अफसरों की बीवी को बच्चों को स्कूल बाज़ार नहीं ले जायेगी अब से। क्या सत्ताधारी लोगों को हर चीज़ कतार में खड़े हो कर लेनी मंज़ूर होगी। बात करने में और उसपर अमल करने में अंतर होता है ज़मीन आसमान का। बताएं भला जब भी सरकारी लोगों की मीटिंग होती है तब उसपर खाने पीने पर इतना खर्च किसलिये। ये काम की मीटिंग हैं या तफरीह करने को जमा हुए हैं लोग। मीटिंग में क्या चाय काफी ही काफी नहीं , क्या ये सब वी आई पी कल्चर नहीं है। हां एक खास बात और , मुख्यमंत्री बनते ही ये बयान देना कि कोई रिश्व्त मांगे तो मना नहीं करना ,उससे तय कर लेना और शिकायत कर पकड़वा देना , इस में नई बात क्या है , ऐसा लोग पहले भी कर सकते हैं। आप ऐसा क्या करेंगे कि लोग रिश्वत मांगे ही नहीं। असल में आपको मालूम ही नहीं कि जनता से छोटे छोटे कामों में रिश्वत मांगी नहीं जाती है , उसको विवश किया जाता है कि वो वो खुद चाहे किसी तरह रिश्वत दे कर अपना काम करवाना। आपके पास ये सबूत नहीं ये कागज़ नहीं , ऐसा नियम है , ये भी चाहिए , जैसे काम किये जाते हैं। आखिर कायदा कानून भी कोई चीज़ है और हम लोग आदि हैं किसी कायदे कानून का पालन नहीं करने के। इसलिए बहुत बार रिश्वत लोग अपनी आसानी के लिये देते ही नहीं बल्कि तलाश करते हैं कोई जो बीच में बात तय करवा काम दे रिश्वत देकर। पूरी की पूरी प्रणाली प्रदूषित है।  सवाल तालाब के पूरे पानी को बदलने का है। और ये आपको करना होगा बहुत सोच समझ कर और बिना शोर मचाये। अभी तो आप का ढोल बज रहा है , बहुत शोर है , आपको छोड़ दूसरी कोई आवाज़ सुनाई नहीं दे रही है। जब ढोल की पोल खुलेगी तब पता चलेगा उसके भीतर क्या है। अधिक शोर यही बताया करता है कि अंदर खोखलापन है कहीं । 

 

दिसंबर 29, 2013

POST : 386 उत्पत्ति डॉक्टर की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       उत्पति डॉक्टर की ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

पृथ्वी का भ्रमण कर नारद जी ब्रह्मलोक वापस आये तो बहुत उदास लग रहे थे। ब्रह्मा जी ने उनको आदर सहित आसन देकर पूछा "आपको सफर में किसी प्रकार की कोई परेशानी तो नहीं हुई। लगता है बेहद थक गये हैं अब कुछ पल आराम कर लें , फिर बताएं आकर कि क्या समाचार खोज कर लाये हैं मृत्युलोक से"। नारद जी बोले ब्रह्मा जी मैं थका हुआ नहीं हूं , किसी बात से परेशान हो गया हूं और उदास भी। मैं सीधा आपके पास आया हूं एक प्रश्न का जवाब पूछने और जब तक मुझे अपने सवाल का उत्तर नहीं मिल जाता मैं न आराम कर सकता हूं न ही मुझे चैन ही आ सकता है। वैसे तो पृथ्वी लोक में कुछ भी सही नहीं है , राजा बेईमान है , अफसर भ्रष्ट हैं , आतंकवाद है , चोरी - लूट , ठगी - धोखा , हत्या - बलात्कार जैसी तमाम बातें हैं जो बुराई की हर सीमा को लांग चुके हैं। धर्म के नाम पर अधर्म का कारोबार फल फूल रहा है , संत महात्मा कहलाने वाले तक व्यभिचारी हैं , लोभ लालच , मोह माया के जाल में फंसे हुए हैं। मगर एक ऐसे प्राणी को मैंने देखा जिसको वहां डॉक्टर कह कर बुलाया जाता है , और मैं समझ नहीं पा रहा कि आपने उस जीव की उत्पत्ति किस प्रयोजन से की है। वो जीव तो बहुत सारे दुःखों का कारण लगता है। सब उसको भगवान का दूसरा रूप कहते हैं जबकि वो मरीज़ों को दुःखी देख कर भी दुःखी नहीं होता बल्कि उनको रोगी देख कर खुश होता है , उनका ईलाज करता है मगर उनको बेरहमी से लूट भी रहा है। कई बार ईलाज में लापरवाही बरतता है और खराब अंग की जगह ठीक अंग को ही काट देता है। अब बड़े बड़े अस्प्तालों में इंसान के भीतर के अंगों की चोरी तक होती है और इंसानियत को भुला कर उनका कारोबार होता है। एक और नई समस्या उसने पैदा कर दी है , कन्या के भ्रूण को जन्म लेने से पहले ही कोख में ही मार दिया जाता है। इतनी अच्छी शिक्षा पाने के बाद भी उसको न उचित अनुचित का अंतर समझ आता है न ही मानव धर्म। मुझे लगता है आपसे बहुत बड़ी भूल हो गई है उस जीव की उत्पत्ति करके। नारद जी की बात सुनकर ब्रह्मा जी बोले , मुनीवर आपकी बातें सच हैं , लेकिन उस डॉक्टर नाम के जीव को बनाना भी बहुत आवश्यक हो गया था। उसे कब कैसे और किसलिये बनाया गया मैं आपको विस्तार पूर्वक बताता हूं , तभी आपकी चिंता का निदान हो पाएगा।

            एक बार एक नगर में बहुत सारे लोग रहते थे , उनमें से एक व्यक्ति बहुत भोला और मासूम था , उसका मस्तिष्क अविकसित था , और वो मंद बुद्धि था कुछ कारणों से। सब नगर वासी उसको पगला पगला कह कर तंग किया करते थे। बच्चे उसपर पत्थर फैंकते , बड़े उसको अपमानित किया करते। इसके बावजूद भी वो सब के सामने हाथ जोड़ता और हर किसी का कहना मानता , जो भी कोई काम करने को कहता वो उसे चुपचाप कर दिया करता। लोग उसे डांटते फटकारते व अपने से नीचा समझते। अपने काम करवाने के बाद भी उसको बदले में कुछ भी नहीं दिया करते। कोई नहीं देखता कि वो भूखा है तो उसको दो रोटी ही दे दे। वो भूखा प्यासा रहता और अकेले में कभी खुद ही हंस लेता कभी खुद ही रो भी लेता। वहां किसी को उसकी ख़ुशी उसके दर्द से कोई सरोकार नहीं था। उन लोगों को उसमें एक इंसान नहीं दिखाई देता था , अपने अपने स्वार्थ सभी को नज़र आते थे। वक़्त आने पर वो सभी लोग मृत्यु को प्राप्त होने के बाद यमराज के सामने लाये गये। चित्रगुप्त जी ने देखा उनका सभी का बहुत बड़ा अपराध था एक अकेले भोले मनुष्य पर उम्र भर करते रहना बिना किसी भी कारण के। जबकि वो मनुष्य उनके अत्याचार सह कर भी उनको आदर और सम्मान देता रहा था। उसपर ज़ुल्म करने का उनको न कोई अधिकार ही था न ही कोई कारण ही। धर्मराज जी ने अपने सलाहकारों से ये विचार करने को कहा कि ऐसे बेरहम लोगों को क्या सज़ा दी जानी चाहिये। उनकी राय थी कि इन सब को जानवर बना दिया जाये और उस को जिसपर ये अत्याचार करते रहे कसाई बना दिया जाये। मगर ये सुन कर वो मनुष्य बोला कि क्या ऐसा करने से मुझे इंसाफ मिल जायेगा। मैं तो हमेशा सभी का आदर करता रहा हूं , जबकि मेरे कसाई बनने पर मुझे सब नफरत किया करेंगे। और मैं तो पूरी उम्र तड़पता रहा इनके अत्याचार सहते हुए जबकि इस तरह इनको केवल एक ही बार कष्ट सहना होगा। आप देखें अपने इंसाफ के तराज़ू की तरफ क्या दोनों पलड़े बराबर होते हैं। धर्मराज जी ने देखा उनके इंसाफ के तराज़ू के पलड़े एक समान नहीं लग रहे हैं। जब उनको नहीं समझ आया कि कैसे उसको सही मायने में इंसाफ दिया जा सकता है तब उन्होंने विष्णु जी और महेश जी से चर्चा की तब फैसला किया गया कि डॉक्टर नाम से उस जीव की उत्पत्ति करना ही एक मात्र समाधान है , उनके अपराधों की सज़ा देने के लिये।

                इस प्रकार उसको न्याय देने के लिये अगले जन्म में एक ऐसे जीव के रूप में पृथ्वी लोक पर उसको भेजा गया जो जो इन सब अपने पिछले जन्म के अत्याचारियों को दुःख दे और इनके दुःखों को देख कर वो भी राहत का अनुभव करे। इनके कष्टों की बिलकुल परवाह नहीं करे और इनसे ईलाज की मनमानी कीमत वसूल करे और चैन से रहे। ये कोठी कार और हर तरह के ऐशो-आराम हासिल करने में व धन दौलत जमा करने में ही लगा रहे। इसके बावजूद भी ये सब इसको आदर देते रहें और कहते रहें कि आप ईश्वर का दूसरा रूप हैं। इस तरह अपने पूर्व जन्म में हुए सभी अत्याचारों का बदला लेने के लिए इसको डॉक्टर बनाया गया और इस पर जो लोग पूर्व जन्म में अत्याचार करते रहे उन सब को इसका मरीज़ बनाया गया। इस प्रकार दोनों अपने पिछले जन्म का हिसाब बराबर कर सकते हैं। अब ये इनके साथ कोई सहानुभूति नहीं रखता है और कई बार तो रोगी रोग से नहीं मरता बल्कि इसके ईलाज से ही मर जाता है। ब्रह्मा जी बोले मुनिवर इस तरह न्याय व्यवस्था को नया आयाम देने का कार्य किया गया था इस जीव की उत्पत्ति करके। आप व्यर्थ की चिंता त्याग दें , बिना प्रयोजन पृथ्वी का कोई भी जीव नहीं बना है। ब्रह्मा जी से डॉक्टर की उत्पत्ति की ये कथा सुनते ही नारद जी की उदासी दूर हो गई थी। जो भी प्राणी इस कथा को ध्यान पूर्वक सुनेगा उसको जीवन में कभी किसी डॉक्टर के पास जाना नहीं पड़ेगा। वो ईलाज से नहीं , रोग से ही मर सकेगा। 

दिसंबर 26, 2013

POST : 385 नेता जी की नैतिकता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

      नेता जी की नैतिकता ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

     नेता जी को सदा चिंता रहती है नैतिक मूल्यों की। वे जो करते हैं केवल नैतिकता के आधार पर ही करते हैं। और उनके हर इक कदम से नैतिकता और भी मज़बूत होती है , बेशक उनका वो कदम कुर्सी पाने के लिये अपने दल को छोड़ दूसरे दल में जाना ही क्यों न हो। रिश्व्त लेना उनके उसूल के खिलाफ है , मगर भेंट स्वीकार करने से नैतिक मूल्यों की कोई हानि नहीं होती है ये उनका मानना रहा है। जो भी लोग नेता जी के पास आते हैं अपना कोई काम करवाने के लिये , नेता जी के सचिव उनको समझा देते हैं कि नकद पैसों की रिश्वत नेता जी अनैतिक कार्य मानते हैं इसलिये कुछ भी काम करवाने के लिये छुप कर रिश्व्त देने की जगह आप खुले आम कोई महंगा उपहार अथवा भेंट दें। इस बार सत्ता में आने के बाद जिन लोगों ने बड़े बड़े काम करवाने थे उनहोंने नेता जी को सोने के मुकुट , चांदी की गदा , सोने की तलवार जैसी कीमती चीज़ें उपहार में दी हैं और उन सब के काम हो चुके हैं। ये सब कीमती उपहार नेता जी की बैठक की शोभा बड़ा रहे हैं। ये फिक्स डिपॉज़िट हैं नेता जी के जो आयकर से भी मुक्त हैं , नेता जी को जिस दिन ज़रूरत होगी इनको बाज़ार में बेच देंगे। सोने चांदी का दाम कभी कम नहीं होता है , नेता जी को खूब पता है ।

                          एक हादसा हो गया है। नेता जी के घर से वो सारा कीमती सामान चोरी हो गया है। नेता जी बेहद दुःखी हैं , उन्हें लग रहा है जैसे उनकी सारी की सारी नैतिकता की पूंजी कोई लूट कर ले गया हो। नेता जी ने पुलिस वालों को दो दिन का समय दिया है चोर का पता लगाने और चोरी का माल बरामद करने के लिये। खबर है कि नेता जी के घर से पचास लाख कीमत के उपहार चोरी हो गये हैं। चोरों को कीमत पता चली तो वे बहुत खुश हुए। मगर जब वे सारा सामान बाज़ार में बेचने गये तो उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई है। सोना चांदी का सामान खरीदने वालों ने जब परखा तो पाया कि सब का सब नकली है। बाहर सोने की पॉलिश है और अंदर पीतल ही पीतल है , चांदी की जगह कोई बहुत सस्ती धातु है सफेद रंग की। इसलिये चोरों ने खुद सारा सामान थानेदार जी से भाईचारा निभाने के लिये जाकर उनके हवाले कर दिया है ताकि वो नेता जी को खुश कर नौकरी में तरक्की हासिल कर सकें और अपनी पुलिस की बदनामी से बच सकें। थानेदार जी ने पूरा सामान नेता जी के हवाले कर दिया और कहा चोरों से गलती हो गई थी जो अपने ही भाई के घर घुस आये थे , जब पता चला तो गलती को सुधारने के लिये खुद ही चोरी का माल वापस कर गये हैं। आप भी उनको माफ़ कर दें और चोरों को छोड़ने की इजाज़त दे दें। ये सुनते ही नेता जी नाराज़ हो गये और बोले कि जो उनको ठगे भला उसको कैसे छोड़ा जा सकता है। जब नेता जी नहीं माने और चोरों को सज़ा देने की ज़िद पर अड़ गये तो थानेदार जी ने पूरी असलियत उनको बता ही दी। कहा नेता जी ये सारा सामान ही नकली है और इसकी कीमत कुछ भी नहीं है। आपको ठगा उन लोगों ने है जो आपको ये सब उपहार दे कर अपने काम करवा गये हैं , इन चोरों को तो ईनाम मिलना चाहिये आपको अपने लोगों की असलियत बताने के लिये। नेता जी उदास हो कर कह उठे कि उनके साथ लोग वही करते रहे जो कहा जाता है कि हम नेता लोग किया करते हैं। नेता जी बोले सच बताना कहीं तुम पुलिस वालों ने तो असली को नकली नहीं बना दिया। थानेदार बोले हज़ूर पुलिस वाले राजनेताओं कि तरह बेईमान नहीं हुए अभी तक भी कि जिस पेड़ की छांव में बैठें उसकी ही जड़ों को काटने का काम करें। नेता जी सोच में पड़ गये कि अब क्या किया जाये ।

                      तभी विरोधी दल के नेता का फोन आया चोरी की घटना पर अफ़सोस जताने के लिये। वे नेता जी के भरोसे के मित्र हैं इसलिये नेता जी ने सारा मामला उनको बता कर पूछा आप ही मेरे मार्गदर्शक रहे हो , आप की बात मान कर ही आज मैं इस जगह पहुंचा हूं। आप ही बतायें उनके साथ क्या किया जाये जो मेरे साथ इतना बड़ा छल कर गये , सब को जानता हूं , सब को फायदा पहुंचाया है। उन विरोधी दल के नेता जी का कहना था कि इस बात का किसी से ज़िक्र नहीं करें कि सब नकली है। ये राज़ राज़ ही रहने दें कि कोई आपको मूर्ख बना अपने काम करवा गया है। जैसे लोग आपको मूर्ख बना खुश कर अपना मतलब हल करते रहे हैं वैसे ही अब आप भी करें। सच पूछो तो ये सामान नौटंकी वालों का है , भला इस युग में मुकुट , गदा , तलवार कोई उपयोग करता है। आप भी इसको किसी और को देकर अपना काम निकलवा सकते हैं। अगर आपको सच में ताज पहनना है तो ये सब आप ले जाकर मुख्यमंत्री जी को उनके जन्म दिन पर दे आयें और बदले में मंत्री पद पक्का समझें। सभी समाचार पत्रों में खबर छपी है कि नेता जी राजधानी जा कर मुख्यमंत्री जी को सोने की तलवार सोने का मुकुट और चांदी कि गदा भेंट कर आये हैं। नेता जी ने बयान दिया है कि उनको जो भी उपहार मिलते हैं जनता से वे उसे अपने पास नहीं रखते है बल्कि पार्टी को ही दे देते हैं। उनकी नैतिकता ऐसे उपहार अपने पास रखने की अनुमति नहीं देती है। उनको मंत्री बना दिया गया है और उनका कहना है कि वे सदा की तरह नैतिक मूल्यों पर आधारित राजनीति ही करते रहेंगे ।

दिसंबर 22, 2013

POST : 384 बाल की खाल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

            बाल की खाल ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    आखिर शर्मा जी का आप्रेशन हो ही गया। पांच साल से पेट दर्द का इलाज कराते कराते शर्मा जी जितना तंग आ चुके थे उससे ज़्यादा डॉ सिंह कोई आराम नहीं है की शिकायत सुनते सुनते। इसलिये उन्होंने ये आखिरी कोशिश करने का फैसला किया था कि पेट को चीर कर ही देखा जाये। अभी तक किसी भी टैस्ट से कुछ नहीं मिला था , शायद आप्रेशन से ही किसी रोग का पता चल सके। डॉ सिंह जब वार्ड का राउंड लेने आये तब शर्मा जी को होश आ चुका था , आते ही मुस्कुरा कर बोले लो शर्मा जी आपकी परेशानी का अंत हो गया है। आपकी आंतड़ियों में रुकावट थी उसको पूरी तरह दूर कर दिया है। बस अब किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं होगी। अब आप बिलकुल ठीक हैं , केवल दो तीन दिन तक कुछ भी खाना नहीं है , ग्लुकोज़ से ही खुराक देंगे। डॉ सिंह वापस जाने लगे तो शर्मा जी ने पूछ ही लिया डॉक्टर साहिब अब फिर से तो दर्द नहीं होगा कभी ! "नहीं अब कभी नहीं होगा वो दर्द लेकिन आपको एक बात का ख्याल रखना होगा खाना खाते समय कि खाने में बाल नहीं हों "। शर्मा जी को उनकी बात समझ नहीं आई इसलिये सवाल किया डॉ साहिब क्या मतलब। डॉ सिंह बोले , देखो शर्मा जी आपके पेट से बालों का गुच्छा निकला है उसी से सारी गड़बड़ थी , अब वो रुकावट फिर से नहीं हो इसके लिये एतिहात बरतनी होगी कि खाने के साथ बाल न खाओ। अच्छा ये बताओ शर्मा जी क्या श्रीमती शर्मा के बाल काफी लंबे हैं। "हां लंबे तो हैं "शर्मा जी ने जवाब दिया। डॉ सिंह बोले तब तो उनकी कटिंग करवा दो , आजकल फैशन भी है छोटे बालों का , न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी। हंसते हुए डॉ साहिब तो सलाह दे गये लेकिन शर्मा को एक नई चिंता दे गये। अब तक शर्मा जी को पत्नी से ये शिकायत रहती थी कि वो खाने में मिर्च मसाले ज़्यादा डालती हैं और शायद दर्द का यही कारण है। मगर ऐसा तो कभी नहीं सोचा था शर्मा जी ने कि जिस नागिन सी चोटी पर वो फ़िदा थे वो इस कदर खतरनाक भी हो सकती है। कितनी बार उन्होंने रोटी से बाल निकाल कर फैंक दिये थे और बस इतना ही कहा था श्रीमती जी बालों को बांध कर रखा करो , यूं खुला न छोड़ा करो। वो भी मुस्कुरा भर देती थी , मगर उनसे बाल कटवाने को कहना एक बड़ी समस्या थी। वो कितनी बार घने लंबे और रेशमी बालों की प्रतियोगिताओं में प्रथम आ चुकी थी और अगर उनको अपने पति और बालों में से किसी एक को चुनना पड़े तो शायद वो अपने बालों को ही चुनेंगी , शर्मा जी को लगता था ।

    फिर भी सहस बटोर कर शर्मा जी ने डॉ सिंह की कही बात अपनी पत्नी से कह ही दी जब वो मिलने को आई। एक बार तो थोड़ा परेशान और हैरान हुई वो फिर कुछ देर खामोश रहने के बाद सोचते हुए कहने लगी ये सब डॉ सिंह कि मिसेज़ कि चाल लगती है। दो बार मुझसे प्रतियोगिता में मुझसे पीछे रही है तो ऐसे मेरा पत्ता साफ करवाना चाहती है। शर्मा जी को लगा कहीं वो बात का बतंगड़ न बना दे इसलिए समझा कर कहने लगे भला डॉ सिंह ऐसा क्यों करने लगे , वो जाने माने सर्जन हैं , कभी भी कोई गलत काम नहीं कर सकते। ऐसे उनपर शक करना गलत है और बालों का गुच्छा निकला है ये वो नर्स भी जानती है जो तुम्हारी सहेली है और आप्रेशन में डॉ सिंह के साथ ही थी। लेकिन श्रीमती शर्मा कब मानने वाली थी , कहने लगी आप बताओ डॉ सिंह को क्या मालूम कि वो मेरे बाल हैं। शादी से पहले आप माता जी के हाथ की रोटी खाते रहे हैं उनके भी तो हो सकते हैं। फिर भी आपको मुझे ही दोष देना है तो लो आज से मैं रोटी नहीं बनाया करूंगी , आप घर के लिये एक नौकरानी का प्रबंध कर दो , ये कह श्रीमती जी ने गेंद उनके पाले में डाल दी थी।
                   शर्मा जी को आने वाले तूफान का एहसास होने लगा था , मगर ये सोच कर चुप हो गये थे कि अस्पताल से छुट्टी के बाद इसका कोई हल खोजेंगे। और बहुत विचार करने के बाद शर्मा जी को लगा कि श्रीमती जी को समझने से सरल काम है नौकरानी रख लेना। ऐसे थोड़ा प्रयास करने पर पांच सौ रूपये महीना पर एक नौकरानी मिल ही गई थी , मगर जब पहले ही दिन जब छमियां उलझे और बिखरे बाल लिये आई तो शर्मा जी से रहा नहीं गया और कह दिया ,छमियां ज़रा अपने बालों की ठीक से चोटी बना कर आया करो। लेकिन छमियां तो गर्ज ही पड़ी , साहब हमको ऐसी वैसी न समझियो हां … । वह तो श्रीमती जी ने बात संभाल ली वर्ना शर्मा जी तो घबरा गये थे कि जाने समझ बैठी छमियां। इसलिये शर्मा जी ने ये समस्या हल करने का काम श्रीमती जी को ही सौंप दिया था। अगले दिन श्रीमती शर्मा ने एक पुरानी साड़ी देकर और सौ रूपये पगार बढ़ा कर छमियां को मना ही लिया था उसके बाल कटवाने के लिये। मगर जब छमियां ने अपने बाल कटवाने पर पगार बढ़ने की बात कही तो उसका मर्द बिदक ही गया , तू वहां काम करना जा रही है कि साहब से शादी करने , बोल क्या सारी उम्र वहां रहना है तुझे।  छोड़ दो दिन की पगार और मत जाना कल से काम पर उनके घर। लगता है उनका मगज़ ही खराब है , छमियां ने भी इसी में अपनी भलाई समझी थी ।

         दो महीने बीत गये लेकिन ऐसी किसी नौकरानी का प्रबंध नहीं हो सका जिसके बाल गिरने का खतरा न हो। इस बीच शर्मा जी के पुराने मित्र मल्होत्रा साहब घर आये तो उनको अपना दुखड़ा सुना ही दिया शर्मा जी ने। बस इतनी सी बात पर परेशान हो , मल्होत्रा जी बोले थे , याद है जब हम दोनों साथ रहते थे तब मैं सब्ज़ी बनाया करता था और तुम रोटी बनाते थे। अब मुझे भी रोटी बनाना आ गया है , तुम्हें भी थोड़ी प्रैक्टिस करने से फिर से रोटी बनाना आ जायेगा। सुन कर शर्मा जी कुछ दुविधा में पड़ गये तो मल्होत्रा जी कहने लगे यार क्या सोचने लग गये।  मैं बताऊं आपको मैंने खाना बनाना किसलिये शुरू किया था , मैंने एक सर्वेक्षण की बात पढ़ी थी अख़बार में कि जिनकी पत्नियां मज़ेदार खाना खिलाती हैं उनको बहुत सारी बिमारियां होने का खतरा होने और जल्दी मरने की संभावना अधिक होती है। फिर तुम्हारी समस्या का तो सब से बेहतररीन हल ही यही है। गंजे होने का ये फायदा तुम्हें अब समझ आयेगा , जब बाल ही नहीं तो गिरेंगे कैसे।  दोनों ने ठहाका लगाया था। मल्होत्रा जी के तर्क अचूक थे और शर्मा जी को अपनी समस्या का समाधान मिल गया था।  

दिसंबर 15, 2013

POST : 383 सत्ताशास्त्र ( व्यंग्य ) डा लोक सेतिया

           सत्ताशास्त्र ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

    किसी ज़माने में जो शिक्षा राज्य के राजकुमारों को दी जाती थी ताकि वो जब राजा बनें तो शासन करने के तौर तरीके ठीक से जानते हों। वही बातें इस किताब में विस्तार से समझाई गई हैं। यह पुस्तक एक अति गोपनीय दस्तावेज़ है , विकिलीक्स की तरह मैं बड़ा जोखिम लेकर इस में लिखी हुई सभी राज़ की बातें आपको बताने जा रहा हूं। मैंने इस पुस्तक की जानकारी किसी सरकारी वेबसाईट से हैक नहीं की है , वास्तव में इसके बारे में सरकारी उच्च पदों पर बैठे लोगों तक को कुछ भी पता नहीं है। इस पुस्तक की गिनी चुनी प्रतियां ही उपलब्ध हैं और इसके प्रकाशन या फोटोप्रति बनाने तक पर देश में प्रतिबंध है। जब भी कोई प्रधानमंत्री अथवा मुख्यमंत्री बनता है तब शपथ लेने के बाद  उसको ये पुस्तक सीलबंद मिलती है ताकि उसको शासन करने के गुर पता चल सकें। और जब वो पदमुक्त हो जाता है तब वो इस पुस्तक को सीलबंद कर के रख जाता है अपने बाद आने वाले नये शासक को देने के लिये। इस पुस्तक की सुरक्षा का कड़ा प्रबंध रखा जाता रहा है हमेशा से , आम जनता का इस पुस्तक के बारे जानने का प्रयास तक बहुत संगीन अपराध है। आप तक इस पुस्तक की जानकारी पहुंचाने का वास्तविक श्रेय उस चोर को जाता है जिसने अपने मौसेरे भाई , सत्ताधारी शासक के पास से इस पुस्तक को चुराने का साहसपूर्ण कार्य कर दिखाया है। क्योंकि वह चोर खुद अंगूठा छाप है और खुद पढ़ने में असमर्थ है इसलिये ये किताब मुझे दे गया है , इस ताकीद के साथ कि इसको ठीक प्रकार से पढ़ कर समझ कर उसको सत्ता के सभी गुर सिखला दूं। अब आगे उस पुस्तक की हर बात जस की तस।

               आज से आप शासन की बागडोर संभाल रहे हैं अर्थात आप शासक बन गये हैं , अब इस बात को पल भर को भी भुलाना नहीं है कि आज से आप राजा हैं और बाक़ी सब आपकी प्रजा। याद रखना है कि प्रजा को प्रजा ही बनाए रखना है कभी भी उसको अपनी बराबरी पर नहीं आने देना है अन्यथा आप राजा या शासक नहीं रह सकते हैं एक दिन को भी। आपका सबसे प्रमुख और महत्वपूर्ण कार्य है सदा राजा बन कर शासन करना। आपके लिये तमाम अधिकार आवश्यक हैं सरकार चलाने के लिये और सभी कर्तव्य आप बाकी लोगों के लिये छोड़ दें। जनता को , प्रशासन के अधिकारियों को , मंत्रियों , सचिवों और अपने सब सहायकों को बताते रहें कि उनका कर्त्तव्य है आपके हर आदेश का पालन करना। लेकिन आप खुद जो भी चाहें कर सकते हैं , कोई भी सीमारेखा आपके लिये नहीं है। कभी भी अगर कोई नियम कोई कानून कोई संविधान का प्रावधान आपकी राह में बाधा बने तो उसको तुरंत बदल डालें जनहित का नाम देकर।
         अब आपको किसी भी धर्म के लिये नहीं सोचना है , आज से सत्ता ही आपका धर्म है ईमान है भगवान है। पाप और पुण्य बाकी धर्म वालों के वास्ते हैं , आपका हर इक कर्म राज्य के हित में आवश्यक है। आपको नैतिक अनैतिक की चिंता को छोड़ हर प्रकार से मनमानी करनी है , अन्यथा शासन प्राप्त करने की क्या ज़रूरत थी। आपने चुनाव जीतने के लिये जो जो वादे जनता से किये थे उनको सदा याद रखना है और ये भी देखना है कि वो कभी भी पूरे नहीं हों। अगर शासक जनता की समस्याएं हल करने लगे और जनता को उसके सभी अधिकार देने लगे तो वो शासक नहीं रह जाएंगे बल्कि सेवक बन कर रह जाएंगे। लेकिन आपको भूल कर भी सेवक नहीं बनना है , आपको शासक बन कर राज करना है राजा बन कर , चाहे देश में लोकतंत्र हो। मगर आप जनता के सेवक हैं ऐसा प्रचार करना ज़रूरी है लोकशाही के नाम पर राजशाही कायम रखने के लिये।

   आप शासक जनता को कुछ भी देने के लिये नहीं बने हैं , आपको बार बार नये नये कर लगाने हैं अपने सरकारी खज़ाने को भर कर उसका उपयोग अपने लिये , अपने परिवार वालों के लिये , अपने प्रशासन के लोगों के लिये सभी सुःख सुविधायें उपलब्ध करवाने बेरहमी से करना है। जनता तक अपने बजट का बहुत छोटा सा भाग पहुंचने देना है ऊंठ के मुंह में जीरे के समान। लेकिन ऐसा करने को बहुत ही महान कल्याणकारी कदम घोषित करते रहना ज़रूरी है। आपको ऐसे हालात बनाने हैं कि जनता आपके सामने भिखारी की तरह भीख मांगने को मज़बूर रहे।

                 राज्य का प्रशासन , पुलिस ,न्यायपालिका आम जनता को इंसाफ देने के लिये नहीं बनाये गये हैं। इनको कभी भी ऐसा करने नहीं देना है। इन सब को अपने इशारों पर चलाने का काम करना है , इसलिये इन्हें भी अपने अधिकारों का दुरूपयोग करते रहने की अघोषित छूट देनी है और ज़रूरत पड़ने पर इनको बलि का बकरा बना कर अपनी खाल बचानी है। अपने अफसरों , मंत्रियों के अपकर्मों की जानकारी सबूत समेत अपने पास छुपा कर रखनी है ताकि इनमें से कोई अगर कभी आपकी राह में रुकावट डालने का कार्य करे तो उससे निपटने का काम बखूबी लिया जा सके। अब जब सत्ता आपके हाथ आ गई है तो ये कभी विचार नहीं करना है कि कभी आपको कुर्सी से हटना भी है या कोई आपको हटा सकता है। आपको यही मान लेना है कि अब कुर्सी आपकी अपनी विरासत बन गई है और आपने न केवल जीवन भर इस पर काबिज़ रहना है बल्कि आपके मरने के बाद भी इसको अपने बेटे , पत्नी या दामाद के लिये आरक्षित करने का कार्य करना है। हर सुबह आपने अपना एक आदर्श वाक्य दोहराते रहना है कि राजा कभी भी गलत नहीं होता है। आप जो भी कर रहे हैं वही सही है। यकीन माने सभी राज्यों के मुख्यमंत्री और देश का हर प्रधानमंत्री इस पुस्तक की हर बात पर पूरी तरह से अमल करते हैं करते रहे हैं और आगे भी करते ही रहेंगे।

POST : 382 हमारा समाज , राजनीति , हमारी विचारधारा और हमारा लेखन कर्म ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

 हमारा समाज , राजनीति , हमारी विचारधारा और हमारा लेखन कर्म

                        ( आलेख ) डॉ लोक सेतिया

बहुत दिनों से देख कर हैरान था फेसबुक पर ये सब। लगता है हम सब की आदत सी हो गई है किसी न किसी को खुदा बना कर उसकी इबादत करने की। मैं इस सब से गुज़र चुका हूं करीब छतीस वर्ष पहले , संपूर्ण क्रांति का आवाहन किया था तब जयप्रकश नारायण जी ने। भ्रष्टाचार और तानाशाही के खिलाफ थी वो जंग भी। नतीजा क्या निकला ? जनता ने आपात्काल के बाद सत्ताधारी दल को बुरी तरह परास्त कर एक नये बने दल को चुना था। मगर उसके बाद जो लोग आये वो भूल गये थे जनता क्या चाहती है और शामिल हो गये थे उसी सत्ता की गंदी राजनीति के गंदे खेल में। लालू यादव , मुलायम सिंह और भी सभी दलों के लोग , सब के सब शामिल थे। समाजवाद की बातें करने वाले आगे चलकर परिवारवाद को बढ़ावा देने और भ्रष्टाचार में नये कीर्तिमान स्थापित करने वाले बन गये। खुद जे पी तक निराश हो गये थे। जनता को फिर एक बार उसी दल को सत्ता में लाना पड़ा था , मध्यवती चुनाव हुए जब 1 9 8 0 में। किसी शायर का इक शेर है , तो इस तलाश का अंजाम भी वही निकला , मैं देवता जिसे समझा था आदमी निकला। मैं कभी किसी दल का समर्थक नहीं बना न ही किसी का अंधा विरोधी ही। लेकिन मुझमें कोई जे पी कोई भगत सिंह कोई लोहिया कोई गांधी रहा है जो मुझे देश की दुर्दशा देख खामोश नहीं रहने देता। और मैंने जो मुझे उचित लगता रहा हमेशा ही करता रहा , मैं हर दिन लिखा भ्रष्टाचार के खिलाफ। हर सरकार , हर अफसर , हर नेता को बेबाक लिखा मैंने। कुछ पाना मेरा मकसद नहीं था , कुछ मिला भी नहीं , मगर एक बात थी जो हासिल हुई। मैं अपने आप से नज़र मिला सकता था , क्योंकि मैं सब कुछ देख कर चुप नहीं बैठता था। अक्सर राजनीति से जुड़े लोग मिलते रहे मुझे और चाहते रहे कि मैं उनका समर्थक बन जाऊं। लेकिन मैंने उम्र भर किसी रंग का चश्मा नहीं पहना जो मैं हर चीज़ को उसी नज़रिये से देखता। लिखते लिखते पत्रकारिता को करीब से जाना और देख कर हैरानी हुई कि जो दावा करते हैं सब कोई आईना दिखाने का उनको खुद अपना पता तक नहीं है। कुछ लोग आये थे मेरे शहर में कुछ साल पहले , फिर से जे पी की संपूर्ण क्रांति की बातें करने। मिला जाकर उनसे , मेरे घर पर आये थे वो भी ,चर्चा की थी उनके साथ। समझ गया उनको भी किसी बदलाव की नहीं सिर्फ अपने को राजनीति में अपने आप स्थापित करने की ही चाहत है। देख कर हैरान हुआ कि वे जातिवाद का सहारा लेकर सत्ता की तरफ बढ़ना भी चाहते हैं और समाजवाद की बात भी करना चाहते हैं। मैंने इस सब को लेकर लिखा था इक लेख जो मुझे मालूम नहीं हुआ कि कब किस अख़बार में छप चुका था। बहुत सवाल उठाये थे उनके मकसद को लेकर , उनके तरीके को लेकर। शायद साल बीत गया था , वही लोग खुद चल कर आये थे मेरे घर , अचानक , बिना किसी सूचना के। स्वागत किया था , मैं चाय पानी का प्रबंध कर रहा था जब देखा वो कोई महीनों पुराना अख़बार लिये चर्चा कर रहे थे मेरे लिखे उस लेख को लेकर। मुझसे शिकायत करने आये थे कि मैंने उनके बारे लेख क्यों लिखा। मैंने उनसे लेकर वही लेख उनके सामने पढ़ा था और पूछा था कि इसमें जो लिखा है क्या वो सच नहीं है। आपको बता दूं वो कौन लोग थे और क्या करना चाहते थे। एक जनाब जो किसी विश्व विद्यालय में प्रोफैसर थे और टी वी पर चुनावों में समीक्षक का काम किया करते थे , अपने पिता के नाम पर नया राजनैतिक दल बनाना चाहते थे। ऐसे लोग दोनों हाथों में लड्डू रखना चाहते हैं , उनको जो भी कहना है , करना है , कुछ पाने को ही करना है। फिर देखा दो साल पहले वही सब , किसी अंदोलन में स्वार्थी लोग जुड़ रहे थे किसी तरह राजनीति में प्रवेश करने के लिये। कई सारे लोग आये काले धन और भ्रष्टाचार की बात करने , जनता की समस्याएं इनके लिए समस्या नहीं साधन हैं सत्ता की ओर जाने के लिये। इस बीच कोई और नेता आगे आ गया प्रधानमंत्री बनने का दावेदार बन कर , और लोग उसकी जय जय कार में भी शामिल हो गये। वास्तव में हम बिना जाने बिना सोचे बिना समझे विश्वास कर लेते हैं कि कोई मसीहा कहीं से आयेगा और सब कुछ बदल कर रख देगा। लेकिन ऐसा होता नहीं है , हम जिनको मसीहा समझते हैं वो जो कहते हैं वो कर नहीं पाते। क्योंकि कहने में और करने में बहुत अंतर होता है। हमें इतनी सी बात ही समझनी है कि हमें अगर देश को बदलना है , लोकतंत्र को बचाना है , राजनीति को साफ करना है तो किसी और पर नहीं खुद अपने आप पर भरोसा करना होगा और इसके लिये हर दिन प्रयास करना होगा। निष्पक्ष रह कर देखना होगा सभी की कथनी और करनी के अंतर को। सब इंसान हैं यहां कोई भी खुदा नहीं है , सभी में कमियां हो सकती हैं। जब भी लोग किसी को चुनाव में जिताते हैं तो वो खुद को कहता भले आम आदमी हो , समझता नहीं है कि वो आम है। सत्ता मिलते ही सब पर इक नशा छा जाता है। 
 
( बात सत्ता शास्त्र की , व्यंग्य इसको लेकर है , अभी लिखना हैं ब्लॉग पर , इंतज़ार करें , पढ़ना ज़रूर ) 
 

 

दिसंबर 13, 2013

POST : 381 झूठे कहीं के ( व्यंग्य ) डा लोक सेतिया

              झूठे कहीं के ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

       वकील किसी के मित्र होते तो नहीं मगर वो खुद को मेरा मित्र बताते हैं तो मेरे पास नहीं मानने का कोई तर्क नहीं होता। तलाक के मुकदमों के माहिर समझे जाते हैं। आजकल सब को मिठाई खिला रहे हैं। जब से खबर पढ़ी है अख़बार में कि एक नया कानून बनाने जा रही है सरकार जिसमें प्रावधान होगा कि तलाक लेने पर पत्नी को पति की अर्जित सम्पति के साथ साथ उसकी पैतृक सम्पति से भी बराबर का हिस्सा मिलेगा। अभी तक उनकी तलाक दिलवाने के मुकदमें की फीस इस बात को देख कर तय की जाती थी कि तलाक लेने के बाद महिला को अपने पति से क्या कुछ मिलने वाला है। वैसे उनको पुरुषों के तलाक के मुकदमें लड़ने से भी इनकार तो नहीं लेकिन वे खुद को नारी शक्ति , महिला अधिकारों और औरतों की आज़ादी का पक्षधर बताने में गर्व का अनुभव करते हैं। इस नया कानून बन जाने से उनके पास महिलाओं के तलाक लेने के मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी ऐसा उनको अभी से लग रहा है और वो अपनी फीस भी बढ़ाने की सोचने लगे हैं। मेरे घर खुद आये मिठाई बांटने और मेरी पत्नी से इस विषय पर ही चर्चा करने लग गये। मैंने कहा वकील साहब इन तिलों में तेल नहीं है , आपकी भाभी जी मुझसे कभी तलाक नहीं लेने वाली।  वे बोले मित्र बुरा मत मानना , मुझे तो हर इक महिला अपनी मुव्वकिल नज़र आती है। क्या पता कब भाभी जी का भी मन बदल जाये और उनको मेरी सहायता की ज़रूरत आन पड़े। इनसे तो मैं फीस भी नहीं ले सकूंगा , आखिर को हम मित्र हैं और मित्र की पत्नी से भला मैं फीस ले सकता हूं। तुम दोनों का विवाह भी मैंने ही करवाया था अदालत में , क्या गवाह बनने की कोई फीस मांगी थी। तुम दोनों ने जो उपहार दिया उसी को अपनी फीस समझ लिया था। लेकिन कभी मुझे तुम्हारी तरफ से तलाक का मुक़दमा लड़ना पड़ा तो फीस दोगुणी लूंगा तुमसे। तुम्हें आज़ादी की कीमत तो चुकानी ही होगी , तब मोल भाव मत करना। उनसे पुरानी मित्रता है इसलिये समझता हूं कि वकील कभी किसी के दोस्त नहीं हो सकते। भला घोड़ा घास से यारी कर सकता है। हर वकील को लड़ाई झगड़ा , दुश्मनी , चोरी डकैती जैसी बातें अपने कारोबार के लिये आशा की किरण नज़र आते हैं। समाज में अपराध और अपराधी न हों ये कोई वकील कभी नहीं चाहता , ऐसा हो गया तो सब के सब वकील भूखे मर जाएंगे।

          अभी वकील साहब हमें तलाक के फायदे समझा ही रहे थे कि उनकी धर्म पत्नी अर्थात हमारी भाभी जी भी आ गई। पत्नी को देख वकील साहब की हालत भी वैसी ही हो गई जैसी किसी भी पति की होती है जो पूरी दुनिया में बदलाव लाने की बात करता फिरता हो मगर खुद अपने घर कुछ भी बदलने को तैयार नहीं हो। भाभी जी मेरी तरफ मुखातिब हो कर बोली कि मैं जानती हूं ये किस ख़ुशी में मिठाई बांटते फिर रहे हैं। इसलिये आज इनके सामने ही आपसे पूछने आई हूं कि मुझे भी बताओ कोई ऐसा वकील जो मेरा इनसे तलाक करवा सके। मुझे भी देखना है कि दूसरों का घर बर्बाद करने वाले का जब खुद का घर बर्बाद हो तो उसकी कैसी हालत होती है। मैं आपसे सवाल करना चाहती हूं कि जो लोग , जो समाज कानून होने के बावजूद आज तक बेटियों को सम्पति का अधिकार नहीं देता है वो कानून बन जाने से बहुओं को आसानी से दे देगा। कहीं ऐसा न हो जैसे आजकल बलात्कारी बलात्कार कर के बच्चियों को जान से ही मार देते हैं वही तलाक चाहने वाली महिलाओं के साथ भी होने लग जाये। जायदाद की खातिर भाई भाई का दुश्मन बन जाता है तो जो पत्नी छुटकारा चाहती हो उसे छोड़ देगा उसका पति।

      आज तक आपका ये समाज महिलाओं को सुरक्षित जीने का अधिकार तो कभी दे नहीं सका न ही किसी सरकार ने कभी सोचा है कि जब आधी आबादी को इतना भी मिल नहीं सका तो फिर आज़ादी के क्या मायने हैं। और बात कर रहे हैं पैतृक सम्पति पति की से पत्नी को तलाक के बाद हक दिलाने का। मैं आपके सामने आपके इन वकील मित्र से पूछती हूं कि वे तैयार हैं मुझे तलाक देने के बाद अपनी सम्पति से बराबरी का हिस्सा देने को। आप ही बता दो कोई वकील जो मुझे भी ये सब दिलवा सकता हो , मिठाई मैं भी खिला सकती हूं आपको। ये सुनते ही वकील साहब का चेहरा देखने के काबिल था। उनके तेवर झट से बदल गये थे , अपनी पत्नी का हाथ पकड़ कर बोले से आप तो बुरा मान गई , भला आपको कभी तलाक दे सकता हूं मैं। मैं आपके बिना एक दिन भी नहीं रह सकता। आप ही मेरा प्यार हैं , मेरी ज़िंदगी हैं , मेरी दुनिया हैं , मेरा जो भी है सभी आपका ही तो है। बस दो बातों से उनकी पत्नी का मूड बदल गया था , और वो हंस कर बोली थी , बस ऐसे ही प्यार भरी बातों से बहला लेते हो आप सब पति लोग हम महिलाओं को हमेशा। वकील साहब कहने लगे कसम से सच कह रहा हूं।  उनकी पत्नी बोली थी जाओ झूठे कहीं के। सुन कर मुस्कुरा दिये थे वकील साहब , झूठे कहीं के सुन कर उन्हें बुरा क्यों लगता।