इधर - उधर सब धुआं - धुआं ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया 'तनहा'
इधर उधर सब धुआं - धुंआ
न रौशनी का बचा निशां ।
ये पूछती है नज़र - नज़र
है आदमी का कोई मकां ।
समझ सके जो यहां है कौन
जरा - सी इक बच्ची की ज़ुबां ।
कहीं भी दिल लगता ही नहीं
जो कोई जाए भी तो कहां ।
सुनाएं कैसे किसी को हम
इक उजड़े दिल की ये दास्तां ।
वही चमन ख़ुद जला रहे
जो बन के बैठे हैं बागबां ।
तबाह ' तनहा ' करो न अब
बसा सकोगे न फिर जहां ।

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