बिकते जहां पे नेता बाज़ार मिल गया है ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया
बिकते जहां पे नेता , बाज़ार मिल गया है
भटके हुओं को आखिर घर- बार मिल गया है ।
अपना नसीब इक दिन शायद बदल ही जाए
हलवा उन्हें , हमें बस आचार मिल गया है ।
जितने गुनाह उनके सब माफ़ हो गए हैं
देखो यहां खुला इक दरबार मिल गया है ।
सोना जहां पड़ा था , दौलत जहां पड़ी थी
सब लुट गया है ख़ाली भंडार मिल गया है ।
जंगल में अब भी बाक़ी कुछ पेड़ तो खड़े हैं
कुछ लोग कह रहे हैं विस्तार मिल गया है ।
देखो यहां नया इक भगवान आ गया है
लो आपको ये सारा संसार मिल गया है ।
सच बोलना मना है ' तनहा ' न कुछ भी कहना
बस झूठ लिख रहा है अख़बार मिल गया है ।
1 टिप्पणी:
Wahh samyik sher
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