दिसंबर 25, 2025

POST : 2046 देश समाज की बर्बादी को अग्रसर ( लूट का शासन ) डॉ लोक सेतिया

  देश समाज की बर्बादी को अग्रसर ( लूट का शासन ) डॉ लोक सेतिया 

शायद नहीं अब यकीनन कहा जा सकता है कि हमारे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल सभी अंग विधायिका कार्यपालिका न्यायपालिका का गठजोड़ पैसे वाले और गुंडे बदमाश से लेकर गंभीर अपराधियों तक से पूर्णतया हो चुका है । देश की अधिकांश जनता के लिए इन सभी के भीतर रत्ती भर भी मानवीय संवेदना नहीं है बल्कि उसको किसी न किसी तरह बहला फुसला कर झूठे वादों प्रलोभन के जाल में फंसा कर जैसे बेबस कर दिया गया है । राजनेताओं की राजनीति सभी दलों की सिर्फ सत्ता पर काबिज़ होकर पूरी व्यवस्था को अपने लिए हथियाना बन चुका है । देशभक्ति समाजसेवा जनकल्याण गरीबी भूख असमानता ये सब किसी राजनेता किसी प्रशासक किसी न्यायधीश की प्राथमिकता नहीं रही है , इन बातों का झूठा प्रचार कर डंका पीटना जानते हैं आचरण बिल्कुल उल्टा करते हैं । धनवान बड़े बड़े पूंजीपतियों से राजनेताओं सरकारी उच्च अधिकारियों न्यायधीशों तक सत्ता और पैसे की हवस में इस सीमा तक पागल हो चुके हैं कि देश की लोकतांत्रिक प्रणाली को घुन की तरह खोखला करने के बाद और भ्र्ष्टाचार को अधिकार बनाने के बाद अब प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर मानव जीवन तक को खतरे में डालने को आतुर हैं । समाज के प्रति कोई कर्तव्य किसी को भी याद नहीं है बल्कि समाज की बुनियाद को खोखला कर रहे हैं । जनता को धोखा देने को समझाते हैं कि आने वाले इतने सालों बाद देश अर्थव्यवस्था की बुलंदी पर पहुंच जाएगा और कोई भी भूखा बेघर नहीं रहेगा ।  आज़ादी का अर्थ ये कदापि नहीं था कि कुछ लोग सरकार की योजनाओं से लेकर धर्म और समाजसेवा एवं पत्रकारिता फिल्म टेलीविज़न को अपने स्वार्थों के लिए दुरूपयोग कर उनकी असली छवि को ही धूमिल कर देंगे । 
 
आजकल सभी सरकारी योजनाएं बड़ी बड़ी कुछ कंपनियों की तिजोरियां भरकर बदले में चंदा रिश्वत लेकर खुद ऐशो आराम की ज़िंदगी हासिल कर मौज मनाने का माध्यम बन गई हैं । उद्योगपतियों की मर्ज़ी से नियम कानून बनाने बदलने में नैतिकता की बात क्या पर्यावरण तक को दांव पर लगाने का कार्य किया जाने लगा है । विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि सरकार जंगलों पहाड़ों से पर्यावरण का विनाश कर रही है जिस से भविष्य में मानवता का जीवन खतरे में पड़ने वाला है । लेकिन इन सभी को करोड़ों लोगों की कोई चिंता नहीं है क्योंकि इन सभी ने भारत देश को अपना समझा ही नहीं हैं इन सभी को कभी किसी और देश में जाकर बसना है । तमाम ऐसे लोगों ने ऐसा प्रबंध कर लिया है अपने परिवार को किसी सुरक्षित देश में भेजने का । ऐसे लोग कभी देशभक्त नहीं होते हैं सिर्फ देशभक्ति की बातें करते हैं देश को समाज को कुछ देते नहीं बल्कि बदहाल कर रहे हैं । आपको लगता होगा ये धार्मिक आचरण करते हैं जबकि वास्तविक जीवन में अधर्म ही उनका आधार है सच्चाई और ईमानदारी धर्म की राह पर चलते तो ख़ुदगर्ज़ नहीं परमार्थ की बात करते और देश समाज का ऐसा खराब हाल होता ही नहीं । आपने कभी चावार्क ऋषि की बात सुनी होगी , ऐसा केवल एक व्यक्ति नहीं था बल्कि दार्शनिक शोध करने वाले बताते हैं कि ये इक विचारधारा थी जिस के कितने ही अनुयायी हुआ करते थे ।    
 
चावार्क की सोच वाले ये सभी बड़े बड़े लोग हैं जिनको लगता है कि बस यही लोक ही वास्तविक है और कोई स्वर्ग नर्क नहीं है कोई भगवान नहीं है । आपको मौज मस्ती करनी है अपनी ख़ुशी की खातिर जीना है , जब ऐसे शासक प्रशासक अन्यायी अत्याचारी और अपराधी लोगों को संरक्षण देते हैं तब उनको पाप पुण्य भलाई बुराई की नहीं बस अपनी आकांक्षाओं की पूर्ति करनी होती है । ऐसे लोगों का धार्मिकता प्रदर्शन अपने असली चरित्र को छिपाने को होता है । लेकिन सिर्फ वही नहीं हम में भी बहुत लोग यही करते हैं मंदिर मस्जिद गुरुद्वारे गिरजा घर जाते हैं लेकिन सभी अनुचित कर्म भी करते रहते हैं । कुछ लोग गुमराह करते हैं कि जितने भी पाप करते रहो कुछ तरीके हैं पापमुक्त होने को , जबकि वास्तव में अगर परमात्मा है तो ऐसा होने कैसे दे सकता है । अपने भीतर से अपराधबोध को हटाने का ये खोखला प्रयास है , व्यक्ति हमेशा बेचैन रहता है खुद अपनी ही अंतरात्मा से डरता है । आजकल शासक पुरानी सभी परिभाषाओं को बदल रहे हैं जिन बातों को अनैतिक और असमाजिक कहा जाता था उनको आवश्यक घोषित किया जाने लगा है , विकास के नाम पर विनाश को आमंत्रित करने लगे हैं लोभी ख़ुदगर्ज़ स्वार्थी सत्ताधारी लोग ।  पिछले कुछ सालों में सरकारी योजनाओं की भेंट करीब तीन करोड़ पेड़ काटकर किये गए हैं जबकि आदमी का सांस लेना दूभर हो गया है , मगर सरकार की बेशर्मी झलकती है जब ब्यान आता है कि फेफड़ों का स्वच्छ हवा से कोई रिश्ता नहीं है जैसे शासकों का ईमानदारी और समाज कल्याण से वास्तव में कोई नाता नहीं है उनको सभी कुछ चाहिए किसी भी कीमत पर और ऐसा करने में सामने आने वाली बाधा को मिटाया जाना उसको अपना अधिकार लगता है । 
 

ठंडी ठंडी छांव ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

घर के आंगन का वृक्ष हूं मैं
मेरी जड़ें गहराई तक फैली हैं
अपनी माटी में
प्यार से सालों साल सींचा है
माली ने पाला है जतन से
घर को देता हूं छाया मैं ।

आये हो घर में तुम अभी अभी
बैठो मेरी शीतल शीतल छांव में
खिले हैं फूल कितने मुझ पर
निहारो उनको प्यार से
तोड़ना मत मसलना नहीं
मेरी शाखों पत्तों कलियों को
लगेंगे फल जब इन पर
घर के लिये  तुम्हारे लिये 
करो उसका अभी इंतज़ार ।

काटना मत मुझे कभी भी
जड़ों से मेरी
जी नहीं सकूंगा 
इस ज़मीन को छोड़ कर
मैं कोई मनीप्लांट नहीं
जिसे ले जाओ चुरा कर
और सजा लो किसी नये गमले में ।

देखो मुझ पर बना है घौसला
उस नन्हें परिंदे का
उड़ना है उसे भी खुले गगन में
अपने स्वार्थ के पिंजरे में
बंद न करना उसको
रहने दो आज़ाद उसको भी घर में
बंद पिंजरे में उसका चहचहाना
चहचहाना नहीं रह जायेगा
समझ नहीं पाओगे तुम दर्द उसका ।

जब भी थक कर कभी
आकर बैठोगे मेरी ठंडी ठंडी छांव में
माँ की लोरी जैसी सुनोगे
इन परिंदों के चहचहाने की आवाज़ों को
और यहां चलती मदमाती हवा में
आ जाएगी तुम्हें मीठी मीठी नींद । 
 
 
 Aravali mountain range, अरावली पर्वत श्रृंखला, विश्व की सबसे पुरानी पर्वत  श्रृंखला, अरावली पर्वत, - YouTube

दिसंबर 15, 2025

POST : 2045 सतसंग की चर्चा में चर्चा ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

       सतसंग की चर्चा में चर्चा   ( हास - परिहास  ) डॉ लोक सेतिया  

सभा में प्रवचन किया जा रहा है आयोजक कोई भी हो सकता है वास्तव में उसकी हैसियत प्रयोजक जैसी होती है । उपदेशक दुनिया भर को खराब बता रहे हैं बुरे लोगों को अच्छाई का सबक पढ़ा रहे हैं सुनने वाले दिल ही दिल में पछता रहे हैं वही पुरानी बातें सुनते हुए उकता रहे हैं । मकसद कुछ और था सतसंग में भक्ति पर चर्चा करनी थी उसको भुला कर जाने क्या क्या समझा रहे हैं , किसी फ़िल्मी गीत ग़ज़ल को भजन है कहकर गा कर श्रोताओं को लुभा रहे हैं । खुद अपना शुल्क लिया हुआ है सभी को माया जाल से बचने की राह दिखाने को प्रयास कर रहे हैं अपनी गागर में सागर तक भर रहे हैं । कभी किसी की बुराई नहीं करनी चाहिए उपदेशक खुद यही हमेशा करते हैं । अच्छे लोग हैं जिन्होंने उनको बुलाया है उनके नाम से कितनी पहचान क्या क्या कितना महान है विस्तार से बताते हैं बस वही देवतुल्य हैं अन्य इंसान भी नहीं लगते हैं ऐसे शिखर पर बिठाते हैं सभी लोग अपनी तुलना समझ शर्माते हैं । सभागार से बाहर बैठी कुछ महिलाएं अपना समय बिताने को मेलजोल बढ़ाती हैं , जो उनकी परिचित उपस्थित नहीं उनकी असलियत सभी को बताती हैं । बड़ी झूठी है जाने खुद को क्या समझती हैं चार पैसे हैं बस तभी इतराती हैं , जलती हैं हर किसी को खुद से नीचा बताती हैं सतसंग नहीं सुनने आती पार्टियां करती झूमती गाती हैं । सभी को मालूम है दोनों कितनी करीब हैं रोज़ आपस में घंटों फोन पर बतियाती हैं , किस किस की क्या ख़बर है विषय पर दुनिया कितनी ख़राब है समझती समझाती हैं ।    
 
इक चतुर नार बड़ी होशियार सभी परिजनों को अपनी उंगलियों पर नचाती है नाच न जाने आंगन टेढ़ा बताती हैं । सभी को हर बात अपने रंग ढंग से सुनाती समझाती है हर किसी को नानी याद आती है , अपनी बात पर सभी से हामी भरवाती है कोई नहीं समझता तो उसको नादान कह कर मनवाती है । उनको किसी की किसी द्वारा तारीफ़ बिल्कुल नहीं सुहाती है ऐसे में जिसकी तारीफ़ की गई उसकी जन्म जन्म की कुंडली दिखाती है ।महिलामंडल की अध्यक्ष है सभी को आईना दिखाती है खुद को विश्वसुंदरी से भी बढ़कर हसीन बताती है । ज़िंदगी ऐसी महिला बड़ी शान से बिताती है चांदनी रात सामने उस के मैली नज़र आती है । कौन कौन है संत महात्मा सभी को अपना अध्यात्म गुरूजी बताती है हर महीने किसी को अपने आवास पर आमत्रित करती है शहर भर को अपना करिश्मा दिखलाती है । हज़ारों साल नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा ।  अल्लामा इक़बाल का शेर है , मुझको समझने वाला पारखी कद्रदान नहीं मिला अफ़सोस जताती है ।   
 
 
 
 नाच न जाने आँगन टेढ़ा मुहावरे पर आधारित प्रेरक कहानियाँ! Short Stories

दिसंबर 13, 2025

POST : 2044 कोई और करे तो गलत खुद करें तो सही ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   कोई और करे तो गलत खुद करें तो सही   ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कुछ बातें कभी भी बदलती नहीं हैं , उनका अर्थ उनका अभिप्राय बदल देते हैं , सरकार प्रशासन ही नहीं सामान्य लोग भी कहते हैं कि हमसे पहले कितना कुछ उचित नहीं था मगर हमने वही सब किया भी , लेकिन कोई अनुचित नहीं करार दे सकता है जैसे हमने किया बढ़िया है । सही क्या गलत क्या के मापदंड बदल देते हैं और कहते हैं कि समय बदल गया है हालात बदले हुए हैं जबकि वास्तव में बदलता कुछ भी नहीं है सिर्फ नामकरण कर दिया पाप को पुण्य घोषित कर दिया , लूट को समाज की सेवा कह दिया , मनमानी करने को देश कल्याण नाम दे दिया जाता है । कौन कहता है कि लिखी हुई इबारत को कोई मिटा नहीं सकता है इधर इतिहास को अलग ढंग से समझाया जाता है सूरज को दीपक दिखलाया जाता है । झूठ को सच साबित किया जाता है काले को सफ़ेद करने को सबको आंखें बंद रखने को आदेश देकर इस तरह चूना लगाया जाता है कि दुनिया को सही मार्ग से भटकाया जाता है । नियम कानून को दरकिनार कर अपने लिए रास्ता बनाने को पेड़ों को कटवा कर पर्यावरण संरक्षण को ठेंगा दिखाया जा रहा है , बाकी दुनिया को कुछ अलग सबक पढ़ाया और समझाया जा रहा है । कठपुलियों को उंगलियों पर नचाने का हुनर जानते हैं सत्ता का नंगा नाच खुलेआम खेल कर पर्दों से छिपाया जा रहा है । रोज़ हैरानी होती है कुछ लोग आपस में चर्चा करते हैं ज़माने भर की बातें बताते हैं अवगुण सभी के उनकी आंखों को नज़र आते हैं , मगर अपने आचरण पर कभी ध्यान ही नहीं देते खुद उसी तरह से व्यहवार करने को ज़रूरी समझते हैं ये फ़रमाते हैं ।  
 
 

सच और झूठ की लड़ाई में ( हास्य- कविता ) 

डॉ लोक सेतिया 

 
शिखर पर खड़ा हुआ है झूठ सच पड़ा हुआ खाई में  
इंसाफ़ क़त्ल होता रहता सच और झूठ की लड़ाई में
 
सियासत की अर्थी भी निकलेगी मगर बरात बन कर
जनता की डोली का दुःख दर्द दब जाएगा शहनाई में
 
शासकों को क्या खबर क्या क्या होने लगा समाज में 
जंग लाज़मी है चुनावी खेल में , हर भाई और भाई में
 
आत्मा ज़मीर आदर्श और ईमानदारी से फ़र्ज़ निभाना 
कोई कबाड़ी खरीदता नहीं ये सब सामान दो पाई में 
 
जिनको इतिहास लिखना आधुनिक समय का यहां 
भर लिया इंसानी खून उन्होंने कलम की स्याही में 
 
राजनेता अधिकारी धनवान लोग शोहरत जिनकी है 
खोटे साबित हुए सब कसौटी पर हर बार कठिनाई में 
 
सबका भला नहीं सिर्फ खुद अपने लिए जीना मरना 
खूब मुनाफ़ा अब बाजार में अच्छों की झूठी बुराई में  
 
 सूरज को दीया कौन दिखा सकता है? |Yog Se Yogyata | योग से योग्यता |  #Meditation With Ojaank Sir| - YouTube
 


दिसंबर 05, 2025

POST : 2043 क़त्ल मर चुके लोगों का ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया

    क़त्ल मर चुके लोगों का ( हास - परिहास ) डॉ लोक सेतिया  

आपने देखा होगा राजनेता दिखावे को सफाई अभियान की शुरुआत सोशल मीडिया अख़बार टीवी चैनल पर दिखलाने को जब हाथ में झाड़ू पकड़े गंदगी को हटाते नज़र आते हैं तब उस जगह पहले बदबूदार गंदगी नहीं बल्कि ऐसा कूड़ा डाला जाता है प्रशासन द्वारा जो गंदगी नहीं होता है ।  हमारे देश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था में ये चलन आधुनिक नवयुग की देन है जिसे करने की ज़रूरत है उसका उपहास बना देना । कूड़ा सबसे अधिक प्रशासनिक व्यवस्था में ही जमा है जिस की कभी सफाई कोई नहीं करता है और जिन्होंने भी कभी पहले ऐसा करने की कोई कोशिश की थी उनकी दिखाई राह पर सबसे अधिक कांटे बिछाने का कार्य बाद में आने वाले लोगों ने किया है । नतीजा देश समाज दिखलाने को शानदार लगने लगा है जबकि भीतर से खोखला और बेहद बदसूरत बनता गया है । किसी अधिकारी ने राजनीती से अपराधीकरण मिटने की कोशिश की तो तमाम लोगों ने अपराध की राजनीति की पटकथा लिखनी शुरू कर दी और अपराधी सभी को भाने लगे । राजनेता से प्रशासन तक सभी गरीबी मिटाने की जगह गरीबों को ही सताने लगे उनको ज़िंदगी और मौत का फासला समझाने लगे । देश की आज़ादी से नवनिर्माण की खातिर अपना जीवन समर्पित करने वालों को आधुनिक ख़ुदगर्ज़ लोग कटघरे में खड़ा कर उनके गुनाह गिनवाने लगे हैं खुद कुछ भी नहीं करना जानते हैं सभी कुछ मिटाना चाहते हैं । पचास साठ साल पहले मर चुके लोगों को फांसी पर चढ़ाने लगे हैं उनकी हर कुर्बानी को झुठलाने लगे हैं अपनी सूरत नहीं देखते शीशे के महल में रहते हैं पत्थर फैंक कर खुद को जो नहीं बन सकते बतलाने लगे हैं । 
 
इधर आजकल चर्चा नहीं फुसफुसाहट होने लगी है , कोई है जो सत्ता के गलियारे में बैठा सोशल मीडिया टीवी चैनल अन्य तमाम दुनिया को निर्देश जारी किया करता रहा है खुद ही भ्र्ष्टाचार की दलदल में फंसा हुआ मिला है । उसका अंजाम क्या हुआ किसी को नहीं मालूम कि छोड़ गया या निकाला गया है सत्ता की सेवा से निवृत हुआ , कुछ लोग अचानक ख़ामोशी से गायब हो रहे हैं । उनकी कारगुज़ारियों को छुपा दिया जाता है जो हर दिन सभी की खामियां ढूंढ ढूंढ कर प्रचारित किया करते थे बस इक उनके आका का आभामंडल बनाये रखने को । ख़ामोशी पसरी हुई है देश की राजधानी की सत्ता की गलियों में इस विषय पर कोई आवाज़ नहीं सुनाई देती है , जिस विभाग की जांच में उनके नाम सामने आये वो भी बेबस है अन्यथा सामन्य लोग क्या विपक्षी राजनेता होते तो कब का नोटिस भिजवा बुलवाया जाता । अपनी साख पर विभाग कालिख लगने देता है तो माजरा कुछ तो है बनाये न बने छुपाये न बने ।  
 
जो ज़िंदा नहीं कब के मर चुके हैं उनके कर्मों का हिसाब कौन ले रहे हैं जिन्होंने खुद कभी कुछ समाज की खातिर नहीं किया , जबकि धर्म संस्कृति समझाती है कि मर चुके लोगों की बुराई कभी नहीं करते हैं । खुद अपनी लकीर खींचना कठिन लगता है इतिहास से औरों की लंबी लकीरों को छोटा नहीं करना चाहते उस को मिटाकर कुछ और बनाना चाहते हैं । धनवान उद्योगपति से शासक प्रशासक तक सभी मिलकर ऐसा भयानक दृश्य बना रहे हैं कि लोग जीना छोड़ मौत को गले लगा रहे है , कैसे ख़्वाब दिखलाये थे क्या मंज़र सामने आने लगे हैं ।  बड़े बड़े पदों पर आसीन लोगों के आपराधिक कारनामे शासन वाले छुपाने लगे हैं उनको त्यागपत्र से ही राहत मिल जाती है जबकि ऐसे अपराध कोई और करे तो खूब शोर चोर चोर का मचाने लगे हैं । चोर शोर मचाने लगे हैं  , दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल याद आई है  : - 
 

कैसे मंज़र सामने आने लगे हैं  

गाते - गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ।  

अब तो इस तालाब का पानी बदल दो 

ये कँवल के फूल कुम्हलाने लगे हैं । 

वो सलीबों के करीब आए तो हमको 

कायदे - कानून समझाने लगे हैं । 

एक क़ब्रिस्तान में घर मिल रहा है 

जिसमें तहख़ानों से तहख़ाने लगे हैं । 

मछलियों में ख़लबली है , अब सफ़ीने 

उस तरफ जाने से कतराने लगे हैं ।

मैलवी से डाँट खाकर अहले मक़तब 

फिर उसी आयत को दोहराने लगे हैं । 

अब नयी तहज़ीब के पेशे - नज़र हम 

आदमी को भूनकर खाने लगे हैं ।   

 

चोर मचाए शोर… 😒🤦🏻‍♂️, लेकिन देश और बिहार से धोखाधड़ी के करत बा, ई जनता  सब बुझेला!, #NDA4Bihar 

दिसंबर 02, 2025

POST : 2042 कहनी है बात खरी खरी , भली लगे या लगे बुरी ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया

        पापियों के पाप धोते धोते ( कटाक्ष ) डॉ लोक सेतिया 

               { कहनी है बात खरी खरी , भली लगे या लगे बुरी }

टी एन शेषन  ने जो अभियान देश की गंदी राजनीति को स्वच्छ करने को 1990 में मुख्य चुनाव आयुक्त का प्रभार संभालने पर शुरू किया है 2025 तक कुछ ऐसा हुआ है कि भगीरथ की गंगा खुद ही इस कदर मैली लगने लगी है कि लोग चुनाव आयोग को लेकर आशंकित हैं । अंकुश जिन पर लगाना था उन को छोड़ अन्य सभी पर कठोर होने लगी है , अपराधी राजनेताओं और अनुचित ढंग से चुनाव लड़ने वालों पर मुलायम और मेहरबान हुई लगती है । चुनाव आयोग अपनी भूमिका बदल चुका है और उधर खड़ा दिखाई देता है जिधर सभी राजनेता सत्ता पाने को नियम कानून से आदर्श नैतिकता को ताक पर रखने को अपना अधिकार समझते हैं । आजकल लोकतंत्र का अर्थ जनता और समाज को बेहतर बनाना नहीं बल्कि सिर्फ और सिर्फ किसी भी तरह सत्ता पर अधिकार हासिल कर मनमानी करना है । खेद की बात है कि सभी दल एक जैसे हैं सरकार बदलने से भी जनता की देश की तस्वीर और तकदीर नहीं बदलती है । 
 

उन्होंने जो करना शुरू किया पहले उन पर ध्यान देना ज़रूरी है : - 

 
आचार संहिता को सख्ती से पालन करवाना । 
सभी मतदाताओं के लिए फोटो लगा पहचान पत्र शुरू करवाया । 
उम्मीदवारों के निर्धारित खर्चों पर अंकुश लगाना । 
चुनाव में पर्यवेक्षक तैनात करने की प्रक्रिया को सख़्ती से लागू किया ।  
 

कई भ्र्ष्ट प्रथाओं को ख़त्म करने की कोशिश : -

मतदाताओं को लुभाने या डराने की व्यवस्था का अंत करने का प्रयास । 
चुनाव के दौरान शराब और अन्य चीज़ें बांटने पर सख़्ती से रोक लगाना । 
प्रचार के लिए सरकारी मशीनरी के दुरूपयोग पर रोकने की कोशिश करना । 
जाति या साम्प्रदायिक आधार पर मतदाताओं से वोट देने की अपील पर रोक । 
चुनाव प्रचार के लिए धर्म स्थलों के इस्तेमाल पर रोक लगाना । 
पूर्व अनुमति के बगैर लाउडस्पीकर और तेज़ आवाज़ में संगीत पर रोक लगाना । 
 
आज ये सब पढ़कर अचरज होता है कि कभी इतने शानदार साहसी ईमानदार अधिकारी हुआ करते थे , चुनाव आयुक्त पर आसीन होने से पहले जब वह वन और पर्यावरण मंत्रालय में थे तब उस को भी सार्थक और कारगर बना दिया था । बड़े से बड़े सत्ताधारी को नहीं कहने की परंपरा उन्होंने ही शुरू की थी क्योंकि उनकी निष्ठा देश संविधान और जनता के प्रति थी किसी सरकार दल या संगठन के प्रति नहीं थी । अब सब कुछ सामने है चुनाव आयोग आंखें बंद कर सभी उपरोक्त नियमों की धज्जियां उड़ाने देता है । चुनाव घोषित होते ही जनता को प्रलोभन और प्रचार के लिए सत्ता का दुरूपयोग धन बल बाहुबल का खुला प्रदर्शन जनता को भयभीत करने से अपने बिछाये जाल में फंसाने को किया जाने लगा है । ऐसे माहौल में कोई शरीफ आदमी ईमानदारी से चुनाव लड़ ही नहीं सकता है क्योंकि कोई रोकने टोकने वाला नहीं है कि सभी इक समान अधिकार से चुनाव में भागीदार बन सकते हैं । 
 
लेकिन जो चुनाव आयोग 35 साल बाद भी अपने वास्तविक उद्देश्य से भटक कर जनता समाज संविधान सभी की उपेक्षा कर मनचाहे ढंग से ही नहीं बल्कि अपने अधीन कार्य करने वालों को लेकर भी निर्दयी होकर कितनी मौतों खुदकुशियों का तमाशाई बना हुआ है उस में साधरण नागरिक के प्रति संवेदना की कोई उम्मीद ही कैसे की जा सकती है । जानकारी मिली है कि इक चुनाव आयुक्त ने कुछ ऐसी टिप्पणी की थी लेकिन उसको सामने लाने की बात छोड़ रिकॉर्ड से हटाया गया तो उस पर मानवीय आधार पर विचार करने की ही कैसे होगी । हमने गंगा सफाई अभियान यमुना सफाई अभियान पर बहुत देखा समझा है मर्ज़ बढ़ता ही गया ज्यों ज्यों दवा की जैसी हालत है । सरकारी तमाम योजनाओं का अंजाम लूट खसूट से सिवा कुछ भी नहीं है क्योंकि सरकार शासक प्रशासन से लेकर न्याय करने वालों और निगरानी करने वाली संस्थाओं में सभी हम्माम में नंगे हैं कोई किसी को आईना कैसे दिखाएगा । संसद भवन नया बनने से उस में बैठने वालों में कोई बदलाव अच्छा नहीं आया है अपराधी और बदमाश संख्या में बढ़ते ही गए हैं और सत्ताधरी दल में संगीन अपराध का आरोपी होना जैसे प्रवेश का रास्ता लगता है । 
 
शासकों ने जिन संस्थाओं ने अनुचित संसाधन अपनाने पर निगरानी रखनी थी , उनका उपयोग अपने लिए चंदे के नाम पर जबरन वसूली करने का माध्यम बनाकर जैसे किया उसे जंगलराज ही कहना चाहिए । काला धन नहीं मिला बल्कि अब सरकार कहती है रिज़र्व बैंक नहीं जानता कि पिछले दस साल में देश से कितना काला धन विदेश गया है । काला धन गरीबी बेरोज़गारी की बातें सत्ता पाने को माध्यम थे सत्ता पाकर कुछ भी बदलना उनकी मंशा कभी नहीं थी । हैरानी की नहीं खेद ही नहीं शर्मसार होने की बात है कि हमारे देश में समाज के सभी अंगों में निरंतर पतन होता गया है । विकास और आधुनिकता की दौड़ में हम इतने पागल हुए हैं कि खुद अपनी सुध बुध खो बैठे हैं । हर कोई जिस शाख पर बैठा है उसी को काट रहा है , ऐसा कहावत में सुनते कहते थे हक़ीक़त में देखना पड़ेगा कभी कल्पना नहीं की थी । देश की गिरावट को लगता है टी एन शेषन जी ने भांप लिया था शायद उनकी पुस्तक  ' डीजनरेशन ऑफ़ इंडिया ' पढ़ कर मालूम हो , मैंने पढ़ी नहीं है अभी तक ।  विषय गंभीर है मैंने उस को कटाक्ष करने की भूल की है शायद क्योंकि आजकल सभी कुछ ऐसा ही करने लगे है बात रोने की पर ठहाके लगाने लगे हैं और इसको रोग भगाने की विधि बताने लगे हैं । साहिर लुधियानवी की ग़ज़ल फ़िल्म बहू बेग़म आशा भौंसले की आवाज़ लगता है आज की वास्तविकता है । 
 

निकले थे कहां जाने के लिए पहुंचे हैं कहां मालूम नहीं , 

अब अपने भटकते कदमों को मंज़िल के निशां मालूम नहीं । 

 

हमने भी कभी इस गुलशन में एक ख़्वाब - ए - बहारां देखा था ,

कब फूल झड़े कब गर्द उड़ी कब आई ख़िज़ां मालूम नहीं । 

 

दिल शोला - ए - ग़म से ख़ाक हुआ या आग लगी अरमानों में ,

क्या चीज़ जली क्यों सीने से उठता है धुंवा मालूम नहीं ।

 

बर्बाद वफ़ा का अफ़साना हम किससे कहें और कैसे कहें ,

ख़ामोश हैं लब और दुनिया को अश्कों की ज़ुबां मालूम नहीं । 

   
 इक हास्य व्यंग्य कविता से विषय का अर्थ समझाने की कोशिश मैंने भी की है ।    
 
 

 ग़ाफ़िल कहता ग़ाफ़िल की बात ( हास्य व्यंग्य कविता ) 

             डॉ लोक सेतिया

 
दिल ही समझा ना है दिल की बात 
लहरों से होती क्या साहिल की बात ।
 
दर्द अपना किसे बताएं लोग जब अब  
मुंसिफ़ ही कहता है क़ातिल की बात ।  

दिल्ली में कोहराम मचा हुआ है कोई
कीचड़ से सुन कर कमल की बात । 

जमुना का पानी रंग बदलता नहीं कभी  
मछलियां जब करती जलथल की बात ।
 
आई डी दफ़्तर में रखा है सर का ताज़
यही पुरानी आज बनी इस पल की बात ।
 
गूंगों बहरों की बस्ती में होता शोर बहुत 
यही है दिल्ली की हर महफ़िल की बात ।