गली से बच के उनकी अब निकलना है ( ग़ज़ल )
डॉ लोक सेतिया ' तनहा '
गली से बच के उनकी अब निकलना है
सदा ख़ामोश रह कर दर्द सहना है ।
पकड़ कर हाथ जब चाहा छुड़ा लेते
नहीं अब साथ जीना साथ मरना है ।
हुए थे सादगी पर हम फ़िदा जिनकी
उन्हें भाता बहुत , सजना संवरना है ।
ज़रूरत ही नहीं वादा निभाने की
बहाना कर के वादे से मुकरना है ।
सियासतदान ऐसे लोग बनते हैं
फ़रिश्ते बन के जिनको जुर्म करना है ।
सभी से भूल आखिर हो ही जाती है
संभल जाना नहीं फिर से फिसलना है ।
रहोगे कब तलक ' तनहा ' ऊंचाई पर
कभी वापस ज़मीं पर ही उतरना है ।
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1 टिप्पणी:
बहुत खूब सर
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