जून 22, 2012

POST : 02 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

 ढूंढते हैं मुझे मैं जहाँ नहीं हूँ ( ग़ज़ल ) डॉ लोक सेतिया ' तनहा '

ढूंढते हैं मुझे , मैं जहां  नहीं हूं 
जानते हैं सभी , मैं कहां नहीं हूं ।
  
सर झुकाते सभी लोग जिस जगह हैं
और कोई वहां , मैं वहां नहीं हूं ।

मैं बसा था कभी , आपके ही दिल में
खुद निकाला मुझे , अब वहां नहीं हूं ।
 
दे रहा मैं सदा , हर घड़ी सभी को
दिल की आवाज़ हूं ,  मैं दहां  नहीं हूं ।
 
(   दहां : चेहरा , मुख ,मुहाना )


गर नहीं आपको , ऐतबार मुझ पर
तुम नहीं मानते , मैं भी हां  नहीं हूं ।

आज़माते मुझे आप लोग हैं क्यों
मैं कभी आपका इम्तिहां  नहीं हूं ।

लोग ' तनहा ' मुझे देख लें कभी भी
बस नज़र चाहिए मैं निहां  नहीं  हूं ।
 
(  निहां : गुप्त , छिपा हुआ ओझल या अदृश्य )



 (  खुदा , ईश्वर , परमात्मा , इक ओंकार , यीसु ) 
 

 

1 टिप्पणी:

Sanjaytanha ने कहा…

प्यारी ग़ज़ल👌👍