Tuesday, 2 February 2021

ऊंचे किले बंद दरवाज़े और हवेली ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया

   ऊंचे किले बंद दरवाज़े और हवेली ( व्यंग्य ) डॉ लोक सेतिया 

कभी कभी डरावने साये नज़र आने लगते हैं तब बड़े बड़े ताकतवर लोग घबरा जाते हैं। ऐसे में लगता है जो रास्ते बनवाये गए खतरनाक हैं जाने कब किधर से कोई आपकी हवेली में घुसकर कुछ भी कर सकता है। अचूक सुरक्षा व्यवस्था का क्या भरोसा है सबसे पहले आधुनिक संचार व्यवस्था को ठप करना होगा उसके बाद जिन राहों पर आपके लिए अथवा किसी अन्य की खातिर फूल और मखमली कालीन बिछते थे उन पर अवरोधक कांटेदार तारें तीर जैसे ऊंचे कील ज़मीन सड़क पर घायल करने को लगाने के उपाय किये जाने ज़रूरी हैं। जब तक आधुनिक यातायात और आवाजाही बाधित करने संपर्क करने के सभी साधन खत्म नहीं किये जाते नींद कैसे आएगी। किसी और देश नहीं अपने ही देश के लोगों से खतरा है कहीं 25 जून 1975 जैसी हालत नहीं बन जाये क्योंकि तब अंदोलन करने में शामिल थे आज सिंघासन पर बैठे हैं। सत्ता का मोह तब किसी को देश संविधान से महत्वपूर्ण लगता था आज भी हालत कम नहीं है सत्ता की मनमानी ज़िद पर अड़ी है। सवाल कानून का नहीं उनकी नाक का बना लिया है। मगर उस महिला जैसा हौंसला नहीं है अन्यथा राजधानी की सड़कों पर अथाह सागर विरोध करने वाली जनता का था फिर भी तानशाही गरूर ने हार नहीं मानी थी। अनुचित ही सही अनावश्यक ही सही आपात्काल की घोषणा की गई थी। अब तो बिना घोषित आपात्काल की दशा है। इतनी शक्ति और अहंकार के बावजूद घबराहट है फिर कोई कवि वही बात लिखने का साहस नहीं दिखला दे। सिंघासन खाली करो कि जनता आती है। 
 
बात बहुत आगे बढ़ चुकी है सत्ता का खेल संविधान की भावना न्याय और नागरिक अधिकार की अवहेलना करने से खतरनाक जन जन की आवाज़ को खामोश करने को उन्हें दुश्मन समझने लगा है। आपको अपने ही देश में कहीं जाने पर सरकारी रुकावटों बाधाओं को लांघना है सत्ता का मद टकराव चाहता है वार्तालाप की बात दिखावा है। उनको नहीं मालूम इस तरह कितने समय तक आप न केवल विरोध करने वालों बल्कि तमाम सामन्य लोगों को रोक कर उनके संविधान के मौलिक अधिकारों का हनन कर सकते हैं। जो बात विरोध और आंदोलन करने वाले करें तो गलत है वही सरकार देश और राज्य की करते हैं तो मतलब साफ है उनको देश की जनता का भरोसा हासिल नहीं और उनको जनमत पर विश्वास नहीं अपनी सत्ता की ज़िद और अहंकारी रवैये पर भरोसा है कि उसी से बच सकते हैं। न्यायपालिका की बात करना आफत को घर बुलाना है अन्यथा क्या उनको इतना समझ नहीं आता कि जो किया जा रहा उसकी परिणीति क्या हो सकती है और मकसद छुपा हुआ नहीं है। ये ज़रूरी नहीं कोई आपका दरवाज़ा खटखटाये खुद आपको अपनी आंखों की पट्टी खोल सच समझना देखना चाहिए अन्यथा सत्यमेव जयते उदघोष व्यर्थ है। 
 
शायद सत्ता नेताओं को सदियों पुराने ऊंचे ऊंचे किलों में रहना होगा और सड़कों पर टोल प्लाज़ा नहीं पासपोर्ट दिखला देश में इधर उधर जाने पर अंकुश लगाना होगा। मगर तब आपकी सभाएं रैलियां और जलसे जलूस सड़कों पर निकलना भीड़ बनकर इतिहास बन जाएगा। हर शासक को सच और जनमत डरायेगा लेकिन जब भी कोई महल में ऊंचा गुंबद हो कर बुनियाद के पत्थर की ज़रूरत नहीं समझ पाएगा बड़ा पछताएगा। बुनियाद हिलते ही गुंबद गिर कर मिट्टी में मिल जाएगा। शासक जब जब अत्याचार की हद से बढ़ जाएगा कोई जननायक आकर उसको ललकारेगा उसकी हस्ती क्या है समझाएगा।
 
25 जून 1975 जे पी की रैली की तस्वीर है ये इस भीड़ में इक नाम अपना भी है। जाने कितनों को भूल गया मुझे कभी नहीं भुला वो दिन वो भाषण भी। लोकनायक जी ने कहा था और सच कहा था शांतिपूर्वक विरोध करने वालों पर लाठी गोली नहीं चलाना क्योंकि सुरक्षा बल किसी नेता अथवा सरकार नहीं संविधान के लिए निष्ठा रखने वाले होने चाहिएं।
 
 
 
 
J P Andolan And Emergency Story - 42 साल पहले आज के दिन शुरु हुई थी  'संपूर्ण क्रांति', मिला था 'आपातकाल' | Patrika News
  
चलो आखिर में इक फ़िल्मी गीत सुनते हैं। बदले बदले मेरे सरकार नज़र आते हैं। फूल भी अब तो मुझे खार ( कांटे ) नज़र आते हैं। जिन्होंने आपकी राहों में फूल बिछाये जो लोग फूल उगाते हैं देश को हरियाली से भरते हैं आपको इसलिए अखरते हैं क्योंकि आपसे नहीं डरते हैं। 
 

 

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