Monday, 18 January 2021

दोहा :- झूठ यहां अनमोल है सच का ना व्यौपार। सोना बन बिकता यहां पीतल बीच बाज़ार। डॉ लोक सेतिया

       झूठ की फ़सल बोना सीखें ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया 

  दोहा :- झूठ यहां अनमोल है सच का ना व्यौपार। सोना बन बिकता यहां पीतल बीच बाज़ार। 

ये उनका युग है जिन्होंने झूठ की फ़सल बोई है और मालामाल हैं भला इस से बढ़कर आसान तरीका कोई दुनिया भर में किसी के पास मिल सकता है नाम दौलत शोहरत ताकत पाने का। कोई ज़मीन नहीं चाहिए खाद पानी देना नहीं पड़ता है हर मौसम में झूठ की फ़सल लहलहाती है कोई आंधी कोई तेज़ बारिश कोई तूफ़ान तो क्या कोई बिजली नहीं जला सकती है। कभी न कभी तो किसी न किसी को झूठ को सिंहासन पर विराजमान करवाना ही था कब तक सच की खातिर फांसी चढ़ते रहते लोग। पंजाबी कहावत है " सच्चे फांसी चढ़दे वेखे झूठा मौज मनाये , लोकी कहंदे रब दी माया मैं कहंदा अन्याय " की मैं झूठ बोलिया कोईना भाई कोईना। सत्यमेव जयते का उदघोष बदल देना चाहिए। सच बोलो सदा सच ही बोलो बेहद ख़तरनाक है झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गए और मैं था कि सच बोलता रह गया। सत्य ही ईश्वर है बस कहने की बात बची है अन्यथा भला कोई पूजा पाठ ईश्वर की भक्ति सभी को दिखाने को कर सकता है। दान धर्म भजन कीर्तन आडंबर की तरह करना खुद को महान दिखलाना भगवान को नहीं मंदिर को बड़ा बनाना कहां किसी धर्म में सबक सिखाया गया है। वास्तविक सच्चा धर्म अपनी हक की महनत की कमाई से खुद गुज़र बसर करना और किसी की सहायता करना होता है। भगवान की आरती पूजा अदि उपासना किसी को दिखाने को कभी नहीं हो सकती है और जो ऐसे कार्य करने से कमाई करते हैं उनके लिए धर्म और उपासना आस्था विश्वास नहीं कुछ और है बिना महनत आराम से जीने के लिए। पंडित पादरी मौलवी ज्ञानी भाई धर्म का उपदेश नहीं देते ईश्वर का कारोबार करते हैं जबकि भगवान कोई सामान नहीं है बाज़ार में बेचने का। 
 
आपको अच्छी कमाई करनी है तो सच्ची कमाई की बात भूलना होगा। इधर जिधर देखो झूठ का बोलबाला है झूठ का परचम लहरा रहा है झूठ झूम रहा है मौज मना रहा है। महलों में रहता है मनचाहा सभी कुछ पा रहा है। छप्पन भोग खा कर इठला रहा है भूखे नंगों को औकात बता रहा है झूठ का विस्तार बढ़ता जा रहा है। झूठ की शाखाएं हर जगह हैं झूठ की पाठशाला में दाखिला लेना आसान है झूठ की तस्वीर के सामने सर झुकाना है और शपथ उठानी है झूठ सच से महान है। झूठ वालों को मिला वरदान है बस हर शहर गांव गांव उनकी पहचान है सच कब से गुमनाम है। झूठ बोने का ढंग सत्ता सिखाती है अदालत भी झूठ के सामने थरथराती है। उनके पास दिया है जिस ने अत्याचार कर गरीबों का लहू पिया है झूठ की उस में जलती बाती है जो बुझाओ नहीं बुझती कभी हवा खुद उसको बचाती है।  सैंयां झूठों  का बड़ा सरताज निकला , दिल तोड़ चला बड़ा दगाबाज़ निकला। झूठ का मेला लगता है झूठ की सजधज उसकी चमक कमाल है सच घायल है फटेहाल है सच की राह पत्थरीली है फिसलन भरी और ढलान ही ढलान है। सच ज़िंदा तो है पर पल दो पल का महमान है झूठ भला चंगा है सच तो नंगा है जिसने झूठ से लिया पंगा है खून से वही रंगा है। कब तक आखिर इंतज़ार करेंगे सच की खातिर जिएंगे मरेंगे। झूठ को समझो झूठ को बोलो सच का तराज़ू कभी मत तोलो , झूठ की तरफ भीड़ लगी है आप भी इधर से उधर को हो लो। झूठ की जय बोलना ज़रूरी है झूठ की महिमा समझो झूठ बोलो झूठ बोलो झूठ बोलो। राम नाम सच है ये शब्द अर्थी उठाते समय बोलना है अभी क्या जल्दी है जीना है तो झूठ का साथ ही नहीं सहारा भी ज़रूरी है। सच्ची बात कही थी मैंने साबिर दत्त जी की ग़ज़ल जगजीत सिंह जी की गाई पेश है। सच बोलना छोड़ कर झूठ बोलना सीखो उसकी फ़सल से बेहतर कमाई किसी भी चीज़ में नहीं होती आजकल।
 



2 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' said...

आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (20-01-2021) को "हो गया क्यों देश ऐसा"  (चर्चा अंक-3952)   पर भी होगी। 
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
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हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
सादर...! 
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
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Dr (Miss) Sharad Singh said...

सार्थक सृजन 🌹🙏🌹