Sunday, 6 December 2020

फ्लॉप शो तीन शतक से शून्य तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

   फ्लॉप शो तीन शतक से शून्य तक ( तरकश ) डॉ लोक सेतिया

बड़े से बड़े अभिनेता बड़े से बड़े निर्देशक की बड़े से बड़े बजट की बेहद सफल निर्माता की फ़िल्म शानदार कहानी संगीत सब लाजवाब होने के बावजूद दर्शकों के बिना पर्दे पर टिकती नहीं है। आपको यकीन नहीं है तो मेरा नाम जोकर फिल्म को याद कर सकते हैं। बात बहारों के सपने से शुरू हुई थी और सेवक चौकीदार जैसे बदलते नामों के साथ बदलती अदाओं का असर कितनी मदहोश करने वाली नशीली चमकीली सोशल मीडिया के शोर शराबे की कड़ियों से नामुमकिन को मुमकिन करते पायदान पर चढ़ते गए। तीन कदम उठाना भारी पड़ सकता है क्योंकि ज़मीन पर रहने वाले उन भोले भाले आम गांव के खेती किसानी करने वालों को मंज़ूर नहीं कोई उनको अपने पैरों तले कुचलने के मनसूबे बनाकर सेवक चौकीदार का रूप धरकर खेत को खाने वाली बाड़ बन जाये। टीवी पर बिग बॉस शो फ्लॉप हो जाता है क्योंकि दर्शक ऊब जाते हैं घर वालों की झगड़ने की नौटंकी देखते देखते। मगर एंकर और शो बनाने वाले पुराने चल चुके कारतूस फिर से लाये हैं। 
 
जनाब ने भी वही पुराने तीर निकाल लिए हैं अपने अधिकार मांगने और उनके थोपे कायदे कानून को स्वीकार नहीं करने वालों को बदनाम करने का ढंग अपनाकर। चेहरे पर मुस्कान का मुखौटा लगाए बंद दरवाज़े के पीछे चालें बांटने से कुचलने की अपने सत्ता के अहंकार कायम रखकर। सांप के मुंह में छंछूदर की हालत है क्योंकि यदि सांप एक बार छंछूदर को मुंह में पकड़ ले तो उसके लिए छोड़ना और निगलना दोनों घातक होते हैं। उगलने पर वो अंधा हो जाता है और निगलने पर कोढ़ी हो जाता है। ये जनता सब जानती है पहचानती है मीठी मीठी बातों पर यकीन किया अपनी भूल को मानती है। पैसा दो गुना करने वाले ठग होते हैं इसका पता चलने में समय लगता है। चिट फंड कंपनी की बातों में आकर अपना धन गंवाने वाले नासमझ होते हैं और ठगने वाले उनको मूर्ख समझते हैं उल्लू बनाते हैं। 
 
उनको लगता है कि ये किसी बाबा का आंदोलन जैसा है जिस में बाबा सलवार पहन निकल लिया था या फिर किसी मासूम अन्ना को सामने रखकर चलाया आंदोलन जो राह से भटक गया था और देश समाज में बदलाव की बात छोड़ खुद ही बदलने वाले लोग सत्ता पाने को मकसद समझने लगे थे। चले थे हरिभजन को ओटन लगे कपास यही कर रहे हैं इक चादर मैली सी बनाई है देखें कब तलक संभलती है। माना आपका अभिनय बेमिसाल है आपके तमाशे भी कमाल होते रहे हैं और फ़िल्मी अदाकारों से बढ़कर सजने संवरने में आप से माहिर कोई राजनेता नहीं देखा है देश की जनता ने पहले न आगे कभी देखना चाहेंगे लोग क्योंकि सिर्फ मनोरंजन से गुज़र बसर होता नहीं है। टीवी सीरियल की तरह बिना दर्शक आप तालियों की आवाज़ भर सकते हैं कॉमेडी शो से उन बातों पर ठहाके लगवा सकते हैं जो वास्तव में फूहड़ता और बकवास कहला सकती हैं। मगर लोकराज लोकलाज से चलता है हमने अपने नेताओं से यही सुना हुआ है। मंच उखड़ने को है दर्शक अंडे टमाटर फेंकना छोड़ चुके हैं क्योंकि अंडे टमाटर के दाम नेताओं की विश्वसनीयता के दाम से अधिक हैं उनको बेकार बर्बाद नहीं किया जा सकता है। अन्यथा गांव के लोगों के पास ये दोनों रहते हैं उन्हें जिसको फैंकना है फैंकते हैं अपने ढंग से सही समय पर। तीन सौ बनाने वाले खिलाड़ी को शून्य पर आउट होते देखा है सवाल सही बॉल के ठीक निशाने पर लगने का है। 
 
छह साल से बहरूपिया नित नया रंग रूप नया लिबास नया किरदार बनकर देश को ठगता रहा है। ये बहरूपिया लोगों की सदियों पुरानी परंपरा है उनको वरदान है कि अभिशाप मिला हुआ कि उनको खुद कुछ महनत करके नहीं मांग कर जीवन भर ऐश करना है। खुद को कलाकार मानते हैं ऐसे लोग धीरे धीरे बहरूपिये गांव शहर से नदारद हो गए थे और मुंबई नगरी जैसे महानगर उनका बसेरा बन गया था। ये उन सभी बहरूपियों का सरदार चालीस साल भीख मांगकर जीता रहा उसके बाद उसने राजनीति के मंच पर अपनी कलाकारी दिखानी शुरू की तो लोग उसकी कलाकारी के कायल इस तरह हो गए कि उनको रोज़ उसका ढोंग करना सच्चा और अच्छा लगने लगा। एक फिल्म में सबसे अधिक रंग रूप किरदार निभाने वाले संजीव कुमार को बहुत पीछे छोड़ एक ही दिन में किरदार अपना रूप रंग बदलने का कीर्तिमान बनाया है। उसका सड़क पर शो देश विदेश में थिएटर में क्या शानदार सजी सभाओं में अपना प्रदर्शन किरदार बदलने की कलाकारी का मंचन सफल रहा है। कोई आम नागरिक किसान मज़दूर भला उनका मुकाबला कर सकता है जो उनकी दिल्ली आने की ज़िद करता है और कितने अलग अलग परिधान पहने चला आया है। 
 
कौन क्यों आया है इस को समझने को छोड़कर बहरूपिया उनके पहनावे पर ऐतराज़ करता है। दाढ़ी मूंछ कपड़े से उनको जाति धर्म से ही नहीं जाने किस किस देश विदेश से जोड़ता है। उनको इधर उधर की बात करनी आती है यही बहरूपिये की कला है और लोग पूछने लगे हैं काफ़िला क्यों लुटवाया है क्यों लुटवाना चाहते हो। चौकीदार भेस बदल कर बहरूपिया बनकर चालीस चोरों का सरदार बन गया है ये वास्तविकता हर किसी को अब समझ आने लगी है।

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