Tuesday, 29 December 2020

रहम की भीख ज़ालिम देते हैं ( हिक़ायत फ़साना ) डॉ लोक सेतिया

रहम की भीख ज़ालिम देते हैं ( हिक़ायत फ़साना ) डॉ लोक सेतिया 

    दरबार में चर्चा है कुछ लोग फिर से सर उठाने लगे हैं दर्द से कराहने चिल्लाने लगे हैं महल वाले घबराने लगे हैं ऊंचे गुंबद डगमगाने लगे हैं। लोग सभी दीवारें गिराने लगे हैं आज़ादी का मतलब समझाने लगे हैं। सत्ता के दलाल शोर मचाने लगे हैं भूखे नंगे लोग भरपेट क्यों खाने लगे हैं उनको सब समझ आने लगा है हम सभी मिलकर उल्लू उनको बनाने लगे हैं। लूटकर सभी कुछ खुद चोर सारे चोर चोर चिल्लाने लगे हैं मगर होश अपने ठिकाने लगे हैं। जनाब बताओ कोई ईलाज क्या सोच कर बंसी बजाने लगे हो , बात रोने की है और आप मुस्कुराने लगे हो। महाराज हाथ अपना उठा रहे हैं सभा को वास्तविकता समझा रहे हैं। ज़ालिम हैं सभी शासक दुनिया भर के ज़ुल्म करना है किये जा रहे हैं बदनसीब ज़ुल्म हद तक सहे चले जा रहे हैं आपको मुझको सभी शासकों को मज़े आ रहे हैं। कभी किसी ने ज़ालिम की तलवार नहीं तोड़ी है छीनकर घाव खाकर दर्द सहे जाते हैं मगर हद से बढ़ जाये तब मरहम की मांग करने आते हैं। हम अपनी रिवायत निभाते हैं बेज़ुबानों पर सितम ढाते हैं लोग खुद हमको ख़ुदा बनाते हैं फिर बेगुनाही की सज़ा पाते हैं। इंसान की औकात क्या शैतान की भी बिसात क्या हम राजनेताओं अधिकारी लोगों और धनवान लोगों से भगवान भी घबराते हैं हम उसको खिलौना समझ कर खुले बाज़ार सस्ते दाम बेच आते है। रावण के दाम बढ़ते जाते हैं राम सभी को आखिरी घड़ी याद आते हैं। 
 
  मन की बात कोई नहीं जाने झूठ को सच बनाते हैं दिमाग से काम चलाते हैं। साफ बात आपको बताएंगे जिस दिन लोग सच समझ जाएंगे क़ातिल से इंसाफ़ मांगने नहीं आएंगे। हर ज़ालिम की सरकार गिराएंगे तब आज़ादी का जश्न मनाएंगे। पर हमने ऐसा विधान बनाया है जिसकी निराली माया है। लोगों ने सभी को आज़माया है फिर बार बार धोखा खाया है पर हमने जैसे जाल बिछाया है कोई भी नहीं समझ पाया है। घोटालों का देश कहलाता किसने कंगाल बनाया है। सबको इक महगाथा बंटवाई है साहिब के गुणगान को छपवाई है। मिलकर सभी ने ऊंचे सुर में गाकर सभी को समझाना है चलो मिलकर सब साथ गाते हैं मेरी धुन पर गाकर झूमते जाते हैं। चिंता को दूर भगाते हैं। भजन कीर्तन शुरू है आंखें बंद सोचना समझना बंद बस तोते की तरह रटने लगे हैं। आपको भी इसको गुनगुनाना है मस्ती में बिना समझे गाना है ये सत्ता की हिदायत है उसकी सच्ची हिक़ायत सच्चा अफ़साना है। अब भजन की तरह पढ़ना।
 

 जूतों में बंटती दाल है अब तो ऐसा हाल है मर गए लोग भूख से सड़ा गोदामों में माल है। बारिश के बस आंकड़े सूखा हर इक ताल है लोकतंत्र की बन रही नित नई मिसाल है। भाषणों से पेट भरते उम्मीद की बुझी मशाल है मंत्री के जो मन भाए वो बकरा हलाल है। कालिख उनके चेहरे की अब कहलाती गुलाल है जनता की धोती छोटी है बड़ा सरकारी रुमाल है। झूठ सिंहासन पर बैठा सच खड़ा फटेहाल है जो न हल होगा कभी गरीबी ऐसा सवाल है। घोटालों का देश है मत कहो कंगाल है सब जहां बेदर्द हैं बस वही अस्पताल है। कल जहां था पर्वत आज इक पाताल है देश में हर कबाड़ी हो चुका मालामाल है। बबूल बो कर खाते आम देखो  हो रहा कमाल है शीशे के घर वाला  रहा पत्थर उछाल है। चोर काम कर रहे हैं चौबीस घंटे और पुलिस की हड़ताल है हास्य व्यंग्य हो गया दर्द से बेहाल है। जीने का था पहले कभी अब  मरने का सवाल है। ढूंढता जवाब अपने  खो गया सवाल है।

पैसे ने किया बस अंधा है , देशभक्ति उनका धंधा है। बिकते नेता  सरकार बिकी , काम आता उनका चंदा है। फस गई सरकार बेचारी है , चेहरे पर कालिख कारी है। सीखा नहीं लेकिन घबराना  जब चोरों से ही यारी है। अब दाग़ सभी लगते अच्छे , बेची सब शर्म हमारी है। जाने क्या अभिशाप मिला है सत्ता की कुर्सी खुद सबसे बड़ी बिमारी है। वतन के घोटालों पर इक चौपाई लिखो , आए पढ़ाने तुमको नई पढ़ाई लिखो। जो सुनी नहीं कभी हो , वही सुनाई लिखो , कहानी पुरानी मगर , नई बनाई लिखो। क़त्ल शराफ़त का हुआ , लिखो बधाई लिखो , निकले जब कभी अर्थी , उसे विदाई लिखो। सच लिखे जब भी कोई , कलम घिसाई लिखो , मोल विरोध करने का , बस दो पाई लिखो। बदलो शब्द रिश्वत का , बढ़ी कमाई लिखो , हर किसी का दुश्मन है , लेकिन तुम उसको बड़ा  भाई लिखो। देखो गंदगी फैली , उसे सफाई लिखो , नहीं लगी दहलीज पर , कहीं  कोई काई लिखो। पकड़ लो पांव उसी के , यही भलाई लिखो , जिसे बनाया था खुदा , नहीं कसाई लिखो। बात निकली है उधर से पहुंची है वहां तक बंद दरवाज़े ऊंची दीवारों से टकराकर लौट आई है दोहे बनकर।
 

नतमस्तक हो मांगता मालिक उस से भीख
शासक बन कर दे रहा सेवक देखो सीख।

मचा हुआ है हर तरफ लोकतंत्र का शोर
कोतवाल करबद्ध है डांट रहा अब चोर।

तड़प रहे हैं देश के जिस से सारे लोग
लगा प्रशासन को यहाँ भ्रष्टाचारी रोग।

दुहराते इतिहास की वही पुरानी भूल
खाना चाहें आम और बोते रहे बबूल।

झूठ यहाँ अनमोल है सच का ना  व्योपार
सोना बन बिकता यहाँ पीतल बीच बाज़ार।

नेता आज़माते अब गठबंधन का योग
देखो मंत्री बन गए कैसे कैसे लोग।

चमत्कार का आजकल अदभुत  है आधार
देखी हांडी काठ की चढ़ती बारम्बार।

आगे कितना बढ़ गया अब देखो इन्सान
दो पैसे में बेचता  यह अपना ईमान। 

 

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