Sunday, 27 December 2020

आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिए जाएंगे पर , आपकी ताज़िम में कोई कसर होगी नहीं।

 गोपनीय दस्तावेज़ बंद लिफ़ाफ़ा ( श्वेत पत्र ) डॉ लोक सेतिया 

क्यों न पहले दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल पढ़ी जाये। बहुत कुछ समझना आसान हो जाएगा। 
   ध्यान से पढ़ते हैं। 

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं , कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं। 

इन ठिठुरती उंगलियों को इस लपट पर सेंक लो ,धूप अब घर की किसी दीवार पर होगी नहीं। 

बूंद टपकी थी मगर वो बूंदो-बारिश और है , ऐसी बारिश की कभी उनको खबर होगी नहीं। 

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है , पत्थरों में चीख़ हरगिज़ कारगर होगी नहीं। 

आपके टुकड़ों के टुकड़े कर दिए जाएंगे पर , आपकी ताज़िम में कोई कसर होगी नहीं। 

सिर्फ़ शायर देखता है क़हक़हों की असलियत , हर किसी के पास तो ऐसी नज़र होगी नहीं। 

अब वास्तविक पोस्ट इक दुखियारी माता की दर्द भरी कहानी उसी की ज़ुबानी। 

            दो शब्द भूल गए हैं या बिसरा दिए गए हैं। पहले सरकार कभी कभी श्वेत पत्र जारी किया करती थी झूठ और अर्धसत्य से पर्दा उठाने को। अब पर्दों के पीछे कितने और पर्दे हैं सत्ता की हवेली घने अंधेरे में अनगिनत राज़ दफ़्न करती रहती है बाहर से जो महल चुंधियाती चकाचौंध रौशनी में चमकते दिखाई देते हैं उनके भीतर उजाला करना मना है। जैसे हवेली का हर कमरा कोई हम्माम है जिस में सभी नंगे हैं शर्मसार कोई भी नहीं। और इक और शब्द पीत पत्रकारिता हुआ करता था जब खबर सच सामने लाने की जगह किसी और मकसद या स्वार्थ से छिपाई जाये या गुमराह करने को झूठ को सच बताया जाये मनघड़ंत कहानियां बनाई जाएं। मां की ये दर्द भरी व्यथा कथा कोई नहीं जानता कोई नहीं समझता फिर भी उसके अपनी बात समय की डायरी के पन्नों पर अपने आंसुओं से भिगोकर अपनी कलम से लिख दी है। विरासत की तरह शायद। 
 
    मैंने अपने सभी बच्चों को एक जैसा समझा प्यार दिया पालन पोषण किया है। हर मां की पीड़ा है बच्चों को शिकायत रहती है। मां की मर्ज़ी नहीं होती हालात की विवशता भी होती है और अपनी विरासत परंपरा को सुरक्षित रखने का कर्तव्य निभाने का कार्य करना भी इसलिए उसको कभी इस कभी उस बेटे को उत्तरदायित्व सौंपना होता है। बच्चे जैसे भी हों लायक या नालायक मां किसी को पराया नहीं करती है। 74 वें साल में मां डायरी में लिख कर बंद लिफ़ाफ़े में अपने सिरहाने रखे बक्से में छिपकर जिसे रख रही है घर की देखभाल की ज़िम्मेदारी निभाने वाले बेटे की नज़र पड़ी तो जैसे घर का सभी कुछ जो मिला था उसको विरासत में संभालने को इसको भी बिना जाने समझे सस्ते दाम बेच सकता है। इतने सालों में जिनको ये बताता है कि लुटेरे थे उन्होंने अच्छा बुरा जो भी किया कितना कुछ घर के सदस्यों की भलाई सुरक्षा की खातिर बनवाया। आधुनिक युग में सभी के समान समय की रफ़्तार को समझ शिक्षा स्वास्थ्य बुनियादी ज़रूरतों पर ध्यान देते रहे। माना बहुत कुछ किया जाना चाहिए था जो किया नहीं गया मगर जितना मिला उसको बर्बाद नहीं किया जैसे ये बेटा रहीसाना ढंग से घर की कमाई से अपने शौक मौज मस्ती और अपने खास यार दोस्तों की दोस्ती निभाने को घर बार बेचने गिरवी रखने का काम करने लगा है। 
 
मैं मां का अच्छा बेटा हूं उसकी देखभाल करता हूं बड़ा शोर मचाया है। मां किस हाल में है उसके ज़ेवर क्या उसका हर उपयोगी सामान घर से गायब होता जा रहा है। बैंक में जमापूंजी की हालत कोई नहीं जानता है घर फूंक तमाशा देख रहे हैं भवन मूर्तियां आडंबर महिमामंडन पर दौलत खर्च कर क्या साबित करना चाहते हो। मां अच्छे दिन की बहार लाऊंगा कहकर घर की रखवाली की बात करने के बाद सभी भाई बहनों को बदनाम और खराब बताने लगा है। दिलों को तोड़कर दिल को बहलाने को झूमने गाने लगा है बच्चों के साथ मां को भी रुलाने लगा है। घर का सब सामान बेटे को बदलना है कोई पुरानी निशानी छोड़ना नहीं चाहता पिछले लोगों के नाम मिटाने हैं और उनकी जगह अपना नाम लिखना है। तोड़ना सीखा है उसने बनाना नहीं आता मगर बनाए भी क्यों उसको नहीं पता कब तलक सभी उसके हवाले है जैसे उस से पहले जिन्होंने बनाया था उनको कहां खबर थी कोई आएगा और सब तहस नहस कर देगा। तब जो होगा देखा जाएगा अभी तो मैं जो चाहूं मेरी मर्ज़ी। 
 
मां होना क्या है बस वही जानती है। मां का आदर बाहर दिखावे को घर में उस से पाना चाहते हैं अधिकार मानकर उसको देते हैं पेट भरने को दो रोटी कपड़ा एहसान समझ कर। बेटे को सब सौंप दिया तब भी लगता है जाने कितना जमा किया छुपा है कहते हैं मां क्या करना है सब मुझे दे दो। मां कभी गरीब नहीं होती बेटे कितने अमीर हो जाएं उनकी गरीबी मिटती नहीं कभी। कैसा युग है मां को भी नदी को भी गंदगी डालने की जगह समझने लगे हैं। बड़ा हो या छोटा चाहे बीच का मझला सभी को लगता है मां का सब उसका मगर मां की देखभाल करना दूसरे का फ़र्ज़ है। आपको ये डायरी मिल जाए तो जो लाल रंग के निशान हैं उनको सजावट मत समझना। मां ने लिखते समय आंसू बहाये हैं खून के आंसू उसी के धब्बे हैं कोई रंग से बनी रंगोली नहीं। बस और नहीं पढ़ा जाता भीगी पलकों से धुंधला नज़र आने लगा है। हर कोई मां के नाम पर भावुक होकर आंसू बहाते दिखाई दे जाता है कभी किसी ने अपनी मां के आंसुओं को समझा नहीं। मैंने इक बार देखा था अपनी मां को रोते हुए , नहीं बताया पूछने पर क्या हुआ था। मैं भी इक कविता लिख पाया था अपनी मां के आंसू शायद पौंछ भी नहीं पाया कि उसके अपने दुपट्टे के पल्लू से मिटा दिए और हमेशा की तरह ममतामई मुस्कान दर्द को ढक गई थी। कविता से अंत करता हूं। 
 

          मां के आंसू ( कविता ) डॉ लोक सेतिया

कौन समझेगा तेरी उदासी
तेरा यहाँ कोई नहीं है
उलझनें हैं साथ तेरे
कैसे उन्हें सुलझा सकोगी।

ज़िंदगी दी जिन्हें तूने
वो भी न हो सके जब तेरे
बेरहम दुनिया को तुम कैसे 
अपना बना सकोगी।

सीने में अपने दर्द सभी
कब तलक छिपा सकोगी
तुम्हें किस बात ने रुलाया आज
मां
तुम कैसे बता सकोगी।